रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · अवध से बिदा और तमसा का तट
अवध से बिदा और तमसा का तट
पिता के पास आशीर्वाद की विनती, गुरु के द्वार पर पीछे रहनेवालों की सँभाल, और राम के साथ चल पड़नेवाला वह नगर जिसे अपने घरों में सुख नहीं मिलता।
दशरथ के सामने राम हैं और राजा बोल नहीं पा रहे। हृदय में शोक का ऐसा सन्ताप है कि पुत्र को दिया जानेवाला उत्तर भी भीतर ही रह जाता है। राम अत्यन्त प्रेम से उनके चरणों में सिर रखते हैं, उठते हैं और बिदा माँगते हैं। अयोध्या से चलने की कथा इस रुके हुए बोल से खुलती है। एक ओर पिता हैं, जिनके लिये पुत्र का जाना असह्य हो रहा है। दूसरी ओर वही पुत्र हैं, जो जाने से पहले पिता का आशीर्वाद चाहते हैं और उनके यश की चिन्ता कर रहे हैं।
तुलसीदास इस बिदाई को कई सम्बन्धों के बीच से गुज़ारते हैं। सीता के लिये बड़ों की सीख है, कैकेयी के लाये हुए मुनिवेष के उपकरण हैं, वसिष्ठ के द्वार पर ब्राह्मणों के भोजन और सेवकों की देखभाल की व्यवस्था है। दशरथ सुमन्त्र को बुलाकर लौटाने के उपाय सोचते हैं। उधर नगरवासी राम के पीछे चल पड़ते हैं। उनके लिये घर का अर्थ बदल गया है। पहले दिन की यात्रा तमसा के तट तक पहुँचती है, और वहाँ ठहरते समय राम, सीता और लक्ष्मण के साथ अवध का प्रेम भी पहुँचा हुआ है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम पिता से बिदा माँगते हैं और प्रस्थान से पहले गुरु के हाथों सेवकों की देखभाल तथा नगरवासियों के हाथों माता-पिता का सुख सौंपते हैं।
- दशरथ वियोग से व्याकुल राजा, जो पहले राम को रोकने के उपाय करते हैं और फिर सुमन्त्र को रथ के साथ भेजते हैं।
- सीता और लक्ष्मण राम के साथ वन के लिये प्रस्थान करते हैं। सीता को घर पर रहने के लिये अनेक बड़े समझाते हैं।
- कैकेयी मुनियों के वस्त्र और अन्य उपकरण लाकर राम के सामने रखती हैं तथा स्वयं विचार करके निर्णय करने को कहती हैं।
- वसिष्ठ गुरु, जिनके द्वार पर राम ठहरते हैं और जिन्हें दास-दासियों की सार-सँभार सौंपते हैं।
- सुमन्त्र राजा की आज्ञा से रथ लेकर नगर के बाहर तीनों के पास पहुँचते हैं और उन्हें रथ पर बैठाते हैं।
- सुमन्त्र की पत्नी और अरुन्धती सीता को कोमल वाणी से समझानेवाली स्त्रियाँ। पोद्दार की टीका गुरु की पत्नी को अरुन्धती कहती है; सुमन्त्र की पत्नी का नाम यहाँ नहीं दिया गया।
- अवधवासी राम के बिना नगर में सुख नहीं पाते और बच्चों तथा वृद्धों को घर में छोड़कर साथ चल पड़ते हैं।
पिता का हाथ, पुत्र की बिदा
राम बिदाई के साथ दो चीज़ें माँगते हैं, आशीर्वाद और आज्ञा। पिता के चरणों में झुकने के बाद उनकी वाणी में कर्तव्य की प्रसन्नता है। वे इस अवसर को हर्ष का समय कहते हैं और पूछते हैं कि ऐसे समय शोक क्यों किया जा रहा है। सुननेवाले राजा के भीतर दारुण दाह है, फिर भी पुत्र उनकी ओर से संसार में जानेवाले यश को देख रहे हैं। उन्हें भय है कि प्रिय के प्रति प्रेम से कर्तव्य में त्रुटि हुई तो अपवाद उठेगा। अपने जाने को वे पिता के वचन और प्रतिष्ठा की रखवाली के रूप में सामने रखते हैं।
पितु असीस आयसु मोहि दीजै । हरष समय बिसमउ कत कीजै॥
चौपाई १
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू । जसु जग जाइ होइ अपबादू॥
इस सीख का भार उस सम्बोधन में है जिसमें राम बार बार पिता को पुकारते हैं। कर्तव्य समझाते हुए भी प्रणाम की निकटता बनी हुई है। वे अपने लिये कोई सुविधा नहीं गिनाते। जो यश चला जायगा, जो निन्दा होगी, वह पिता की चिन्ता है, और इसीलिये उसे पुत्र अपनी चिन्ता बनाकर कहते हैं। दशरथ यह सुनते हैं, स्नेह के वश उठते हैं और राम की बाँह पकड़कर अपने पास बैठा लेते हैं। अभी जो पुत्र उठकर बिदा माँग रहे थे, उन्हें पिता फिर बैठा रहे हैं। उस पकड़ में रुक जाने की पूरी इच्छा आ जाती है।
बैठाने के बाद दशरथ मुनियों की कही हुई बात स्मरण करते हैं। वे कहते हैं कि मुनि राम को चर और अचर जगत् का स्वामी बताते हैं। फिर शुभ और अशुभ कर्मों के फल का विधान सामने रखते हैं। ईश्वर हृदय में विचार करके कर्म के अनुरूप फल देते हैं, और जो कर्म करता है वही फल पाता है, ऐसी वेद की नीति सब कहते हैं। इस स्मरण के बाद राजा का अपना दुःख प्रश्न बनकर निकलता है। उन्हें इस घड़ी कर्म करनेवाला और उसका फल सहनेवाला अलग दिखाई दे रहा है।
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
दोहा ७७
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु॥ ७७॥
दशरथ पूछते हैं कि अपराध कोई और करे और उसका भोग किसी और को मिले, यह कैसी विचित्र गति है। भगवान् की लीला को जान सकने का सामर्थ्य जगत् में किसके पास है। इस दोहे में राजा की व्याकुल आवाज़ सुनाई देती है। जिन्होंने अभी कर्म के अनुसार फल की नीति कही थी, वे उसी के सामने अपना असह्य अनुभव रख रहे हैं। प्रश्न का उत्तर सुनने से पहले ही कथा उनके रोकने के प्रयत्नों की ओर बढ़ जाती है। पुत्र सामने हैं और जाने का निर्णय बदलता नहीं दिखता।
राम पिता से आशीर्वाद और आज्ञा माँगते हुए उनके यश की चिन्ता रखते हैं। दशरथ उन्हें बाँह पकड़कर बैठाते हैं और अपने दुःख में प्रश्न करते हैं कि अपराध किसी का और उसका फल किसी दूसरे को क्यों मिल रहा है।
सीता के लिये शीतल सीख
राजा छल छोड़कर राम को रखने के लिये बहुत से उपाय करते हैं। तुलसी उनके प्रयत्न के साथ यह भी रखते हैं कि राम धर्म की धुरी सँभालनेवाले, धीर और सयाने हैं। दशरथ उनका रुख देख लेते हैं। पुत्र रहते हुए नहीं जान पड़ते। तब वे सीता को हृदय से लगाते हैं। बात का केन्द्र बदलता है, पर वही स्नेह उसमें बना रहता है। अब वे बड़े हित से बहुत प्रकार की सीख देते हैं, वन के दुःसह दुःख सुनाते हैं और सास, ससुर तथा पिता के पास रहने का सुख समझाते हैं।
इस समझाने में सीता के सामने घर के कई आश्रय रखे गये हैं। सास और ससुर हैं, पिता का घर है, सबके पास रहने का सुख है। दशरथ वन की कठिनाई और इन सम्बन्धों के आराम को एक साथ उनके सामने लाते हैं। पर सीता का मन राम के चरणों में अनुरक्त है। उसी अनुराग के कारण घर सहज नहीं लगता और वन विषम नहीं लगता। जिन दो जगहों को राजा सुख और कष्ट के अनुसार अलग कर रहे हैं, सीता उन्हें राम के साथ और राम के बिना अनुभव कर रही हैं।
केवल दशरथ ही नहीं समझाते। और सब लोग भी वन की विपत्तियों की अधिकता बार बार कहकर सीता को रोकना चाहते हैं। इनके बीच मंत्री की पत्नी, गुरु की पत्नी और दूसरी समझदार स्त्रियाँ विशेष रूप से आती हैं। पोद्दार की टीका मंत्री को सुमन्त्र और गुरु को वसिष्ठ बताती है तथा गुरु की पत्नी का नाम अरुन्धती देती है। सुमन्त्र की पत्नी का नाम नहीं आता। इन स्त्रियों की वाणी को तुलसी स्नेह से भरी और कोमल कहते हैं। वे सीता के हित की बात अपनी समझ के अनुसार रख रही हैं।
उनका आग्रह है कि सीता को तो वनवास दिया नहीं गया है। इसलिये ससुर, गुरु और सास जो कह रहे हैं, उसका पालन करना चाहिये। यह तर्क सीधा उनके ऊपर आये आदेश की सीमा को देखता है। बड़ों का कहना मानकर वे घर में रह सकती हैं। सब लोग जिस अवसर को बचा हुआ सहारा समझ रहे हैं, वह सीता के लिये राम से अलग रहने की बात है। इसलिए सीख के सारे मधुर गुण अपनी जगह होते हुए भी वह उनके मन में नहीं उतरती।
सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।
दोहा ७८
सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि॥ ७८॥
शीतल, हितकारी, मधुर, मृदु, एक ही सीख के लिये चार विशेषण रखे गये हैं। इसके बाद भी कहा जाता है कि वह सीता को नहीं सुहायी। कवि शरद् के चन्द्रमा की चाँदनी और उससे अकुलानेवाली चकई को सामने लाते हैं। प्रकाश शीतल है, उसके लगने पर पक्षी व्याकुल होता है। सीता के सामने लोग स्नेह से समझा रहे हैं, और वह स्नेह भरी बात भी वियोग का दुःख जगा रही है। दोहे का चित्र किसी के हित की इच्छा को नकारे बिना उस बात का सहनेवाले पर पड़नेवाला असर दिखा देता है।
सीता उत्तर नहीं देतीं। तुलसी इसका कारण संकोच बताते हैं। इसलिए उनके मौन को बड़ों के प्रस्ताव पर सहमति समझ लेने का अवसर नहीं है। अभी उनका मन राम के चरणों में लगा हुआ बताया गया, घर और वन के बारे में उनकी अनुभूति कही गयी, फिर सीख से उनकी व्याकुलता दिखाई गयी। इन सबके बाद उत्तर न देना आता है। सब बोल चुके हैं, पर सीता की ओर से कोई नया वचन जोड़े बिना ही उनका निश्चय सामने बना रहता है।
दशरथ और अन्य बड़े सीता को वन के दुःख तथा घर के सुख समझाते हैं। सुमन्त्र की पत्नी, अरुन्धती और अन्य स्त्रियाँ कहती हैं कि उन्हें वनवास नहीं दिया गया है। राम में अनुरक्त सीता को यह मधुर सीख नहीं सुहाती और वे संकोच से मौन रहती हैं।
कैकेयी के लाये हुए उपकरण
सीता को समझाने की ये बातें सुनकर कैकेयी तमककर उठती हैं। वे मुनियों के वस्त्र, आभूषण और बर्तन लाती हैं, उन्हें राम के आगे रख देती हैं और कोमल वाणी में बोलती हैं। पोद्दार की टीका यहाँ आभूषणों को माला और मेखला जैसे उपकरणों से तथा बर्तनों को कमण्डलु आदि से खोलती है। ये चीज़ें वनगमन की तैयारी को सामने रख देती हैं। जिन लोगों की वाणी अभी घर में रुकने की राह बता रही थी, उन्हीं के बीच मुनिवेष का सामान आ गया है।
सीय सकुच बस उतरु न देई । सो सुनि तमकि उठी कैकेई॥
चौपाई २
मुनि पट भूषन भाजन आनी । आगें धरि बोली मृदु बानी॥
कैकेयी राम को रघुवीर कहकर सम्बोधित करती हैं। वे कहती हैं कि राजा को राम प्राणों के समान प्रिय हैं। प्रेम से दुर्बल राजा शील और स्नेह छोड़ नहीं सकेंगे। पुण्य, सुन्दर यश और परलोक चाहे नष्ट हो जायें, वे राम से वन जाने को कभी नहीं कहेंगे। इस कथन में पिता की आज्ञा की प्रतीक्षा करते रहने की कठिनाई राम के सामने रखी गयी है। पिता का स्नेह इतना प्रबल है कि मुख से जाने का वचन निकलना असम्भव बताया जा रहा है।
फिर कैकेयी कहती हैं कि इस बात पर विचार करके जो अच्छा लगे, वही किया जाय। राम माता की सीख सुनकर सुख पाते हैं। उसी समय राजा को वे वचन बाण जैसे लगते हैं। एक ही कथन के बाद तुलसी दोनों की प्रतिक्रिया पास पास रख देते हैं। राम को अपने निर्णय का मार्ग साफ़ दिखता है, पिता का दुःख और तीखा हो जाता है। पोद्दार की टीका राजा के भीतर उठी वेदना को इस विचार में खोलती है कि ऐसे में भी अभागे प्राण क्यों नहीं निकलते।
राजा मूर्च्छित हो जाते हैं। आसपास लोग व्याकुल हैं और किसी को कुछ सूझ नहीं रहा कि क्या किया जाय। इसी घड़ी राम तुरन्त मुनि का वेष बनाते हैं। माता और पिता को सिर नवाते हैं और चल देते हैं। उनके चलने की तैयारी में आवश्यक वस्तुओं का साथ लेना भी आता है। दोहे में वन का साज-सामान सजने के बाद सीता और लक्ष्मण का साथ तथा ब्राह्मणों और गुरु के चरणों की वन्दना एक साथ कही गयी है।
सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।
दोहा ७९
बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत॥ ७९॥
यहाँ बिदा माँगने की बात वास्तविक प्रस्थान तक पहुँचती है। राम के साथ पत्नी और भाई हैं। पीछे वे लोग हैं जिन्हें उनके जाने ने अचेत कर दिया है। तुलसी चलनेवाले की तैयारी और पीछे रह जानेवालों की असमर्थता को एक ही दोहे में बाँधते हैं। वेष बन गया, वन का सामान साथ हो गया, वन्दना हो गयी, और चलना आरम्भ हुआ। पिता के दुःख की तीव्रता के बीच राम की ओर से प्रणाम और सम्बन्ध की मर्यादा हर कदम पर बनी रहती है।
कैकेयी मुनिवेष का सामान रखकर कहती हैं कि राजा स्नेहवश वन जाने को न कह सकेंगे, इसलिए राम स्वयं विचार करें। राम सीख से प्रसन्न होते हैं, राजा मूर्च्छित हो जाते हैं। मुनिवेष धारण कर राम माता-पिता, गुरु और ब्राह्मणों को प्रणाम करके सीता तथा लक्ष्मण के साथ चल देते हैं।
वसिष्ठ के द्वार पर पीछे रहनेवालों की चिन्ता
राजमहल से निकलकर राम वसिष्ठ के दरवाजे पर खड़े होते हैं। यह ठहरना गुरु के द्वार पर है। सामने वे लोग दिखाई देते हैं जिन्हें विरह की अग्नि जला रही है। राम प्रिय वचन कहकर सबको समझाते हैं। अपने जाने से उत्पन्न दुःख के बीच वे उस समाज की ओर ध्यान लगाते हैं जो पीछे रहेगा। फिर ब्राह्मणों की मण्डली बुलाते हैं और गुरु से कहकर उनके लिये वर्षभर के भोजन की व्यवस्था करते हैं। बिदाई की घड़ी में एक पूरे वर्ष का आश्रय सोचा जाता है।
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे । आदर दान बिनय बस कीन्हे॥
चौपाई ३
जाचक दान मान संतोषे । मीत पुनीत प्रेम परितोषे॥
टीका वर्षाशन का अर्थ वर्षभर का भोजन बताती है। इसके साथ आदर, दान और विनय हैं। ब्राह्मणों के प्रति व्यवहार में तीनों को एक साथ रखा गया है। याचक भी आते हैं। उन्हें दान के साथ मान देकर सन्तुष्ट किया जाता है। और मित्रों के लिये पवित्र प्रेम है। तुलसी हर समूह की तृप्ति का अपना रूप बताते हैं। अन्न का भरोसा, दान के साथ सम्मान, मित्र के लिये निर्मल स्नेह, इन छोटे छोटे भेदों से समझ आता है कि राम सबको अलग पहचानकर बिदा ले रहे हैं।
इसके बाद दास और दासियाँ बुलाये जाते हैं। राम उन्हें गुरु को सौंपते हैं और हाथ जोड़ते हैं। ये वे लोग हैं जिनकी सार-सँभार का भार उनके जाने पर किसी को उठाना होगा। उन्हें बुलाकर सामने रख देने से वह चिन्ता साफ़ और ठोस हो जाती है। गुरु के लिये कहा गया अनुरोध भी बड़ा सीधा है। इन सबकी देखभाल माता और पिता की तरह कीजियेगा। सेवा करनेवालों के लिये राम जिस व्यवहार की याचना कर रहे हैं, उसमें घर के सबसे निकट सम्बन्धों का आश्रय माँगा गया है।
दासीं दास बोलाइ बहोरी । गुरहि सौंपि बोले कर जोरी॥
चौपाई ४
सब कै सार सँभार गोसाईं । करबि जनक जननी की नाईं॥
हाथ जोड़ना यहाँ कथा की चाल को धीमा कर देता है। राम वन जाने की तैयारी कर चुके हैं, पर जिन लोगों के लिये व्यवस्था आवश्यक है उनके पास ठहरते हैं। दास-दासियों की देखभाल के लिये केवल रख लेने की बात पर्याप्त नहीं कही गयी। माता-पिता के समान सँभालने का आग्रह है। वर्षभर के भोजन का प्रबन्ध एक आवश्यक वस्तु की अवधि बाँधता है; सेवकों की सार-सँभार की प्रार्थना उनके साथ किये जानेवाले व्यवहार का रूप बाँधती है। दोनों चिन्ताएँ इसी बिदाई के भीतर पूरी होती हैं।
फिर राम बार बार दोनों हाथ जोड़कर सब लोगों से कोमल वाणी में बोलते हैं। वे कहते हैं कि उनका सब प्रकार से हित करनेवाला वही होगा जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें। उनसे प्रेम करनेवालों को वे पिता की ओर देखते रहने का काम दे रहे हैं। राम का अपना हित अब राजा के सुख में बताया गया है। जो लोग अभी राम को जाते देखकर दुःखी हैं, उनकी प्रीति के लिये यही काम सामने रखा जाता है कि पीछे रह गये पिता को सँभालें।
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।
दोहा ८०
सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन॥ ८०॥
महाराज के बाद सब माताओं का ध्यान आता है। राम परम प्रवीण पुरवासियों से आग्रह करते हैं कि ऐसा उपाय करें जिससे उनकी सभी माताएँ उनके विरह में दुःखी और दीन न हों। इस विनती में किसी एक माता को चुनकर नहीं कहा गया। सब माताएँ, यह विस्तार उसी घड़ी रखा गया है जब परिवार में इतना दुःख है। राम नगरवासियों की समझ पर भरोसा करके उपाय उनके हाथ सौंपते हैं। पिता के सुख और माताओं को वियोग में सँभालने की माँग के साथ गुरु के द्वार की बिदाई पूरी होती है।
वसिष्ठ के द्वार पर राम ब्राह्मणों को वर्षभर का भोजन, याचकों को दान और मान तथा मित्रों को पवित्र प्रेम देते हैं। दास-दासियों को गुरु की माता-पिता जैसी देखभाल में सौंपते हैं और नगरवासियों से महाराज का सुख तथा सभी माताओं की सार-सँभार चाहते हैं।
आशीर्वाद के बाद नगर का आर्तनाद
सबको समझाने के बाद राम हर्षित होकर गुरु के चरणकमलों में सिर नवाते हैं। गणपति, गौरी और गिरीश को मनाते हैं। पोद्दार की टीका इन नामों को गणेश, पार्वती और कैलासपति महादेव के रूप में खोलती है। आशीर्वाद पाकर रघुनाथ आगे चलते हैं। महल में माता-पिता को प्रणाम हुआ था, फिर गुरु के द्वार पर पीछे रहनेवालों की व्यवस्था हुई, और अब आशीर्वाद के साथ प्रस्थान बढ़ता है। रास्ते की ओर बढ़ते हुए सम्बन्धों को प्रणाम करके साथ लिये जाने का यह क्रम पूरा बना रहता है।
राम के चलते ही अयोध्या में भारी विषाद हो जाता है। नगर का आर्तनाद ऐसा है कि सुना नहीं जाता। जिन लोगों को उन्होंने प्रिय वचनों से समझाया था, उनके दुःख की तीव्रता प्रस्थान होते ही सामने आ जाती है। तुलसी यहीं दृष्टि का विस्तार करते हैं। अवध के शोक के साथ लंका के अपशकुन और देवलोक के मिले हुए हर्ष-विषाद को उसी चौपाई में रख देते हैं। एक ही वनगमन का अनुभव इन स्थानों पर अलग अलग रूप में प्रकट हो रहा है।
राम चलत अति भयउ बिषादू । सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥
चौपाई ५
कुसगुन लंक अवध अति सोकू । हरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥
अवध में अत्यन्त शोक है। लंका में बुरे शकुन होने लगे हैं। देवलोक हर्ष और विषाद दोनों के वश में है। पोद्दार की टीका देवताओं के हर्ष का कारण राक्षसों के नाश की आशा और उनके विषाद का कारण अयोध्यावासियों का शोक बताती है। इस प्रकार देवताओं की प्रसन्नता भी नगर के दुःख को ढक नहीं पाती। उसी पंक्ति में दोनों भावों का साथ उनके ऊपर बना रहता है। कवि जितनी दूर दृष्टि ले जाते हैं, अवध की पीड़ा उतनी दूर भी उपस्थित मिलती है।
इधर राजा की मूर्च्छा दूर होती है। वे जागकर सुमन्त्र को बुलाते हैं। पहली बात अपने प्राणों से है। राम वन को चले गये, फिर ये प्राण किस सुख के लिये शरीर में रह रहे हैं। इससे अधिक बलवान और कौन सी व्यथा होगी जिसके आने पर वे देह छोड़ेंगे। राजा की भाषा में दुःख का माप अपने सह सकने की सीमा से हो रहा है। पुत्र का चला जाना उस सीमा तक पहुँच गया है, फिर भी उनका शरीर जीवित है और वे उसी पर विस्मित हैं।
इस विलाप के बाद दशरथ फिर धीरज धरते हैं। वे सुमन्त्र को सखा कहकर रथ के साथ राम के पीछे जाने को कहते हैं। यह सम्बोधन उस व्यक्ति से है जिसके हाथ अब राजा अपना उपाय सौंप रहे हैं। पुत्र सामने नहीं हैं; उन्हें रोकने की इच्छा अभी बनी हुई है। मूर्च्छा से उठे पिता पहले अपने प्राणों का दुःख कहते हैं, फिर उसी दुःख के बीच तीनों को वापस देखने की सम्भावना खोजते हैं। अगला दोहा इसी आशा को आदेश का रूप देता है।
गुरु को प्रणाम और गणेश, पार्वती तथा शिव का स्मरण करके राम आशीर्वाद सहित चलते हैं। अवध में आर्तनाद, लंका में अपशकुन और देवलोक में हर्ष-विषाद होता है। होश आने पर दशरथ सुमन्त्र को बुलाकर रथ साथ ले जाने को कहते हैं।
चार दिन बाद लौटाने की आशा
दशरथ दोनों कुमारों और जनकसुता की सुकुमारता स्मरण करते हैं। उनकी आज्ञा है कि तीनों को रथ पर चढ़ाया जाय, वन दिखाया जाय और चार दिन बीतने पर वापस लाया जाय। पिता के कहे हुए इस छोटे समय में उनकी आशा बसती है। राम वन के लिये निकल चुके हैं, और राजा उस यात्रा को ऐसी यात्रा के रूप में सोच रहे हैं जिसके बाद तीनों लौट आयें। सुमन्त्र को दिये गये आदेश में यही उपाय सबसे पहले आता है।
सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।
दोहा ८१
रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि॥ ८१॥
चार दिन की यह बात राजा का प्रस्ताव है। इसके तुरन्त बाद वे स्वयं दूसरी सम्भावना रखते हैं। यदि दोनों धीर भाई न लौटें तो क्या किया जाय। वे राम को सत्य की प्रतिज्ञा निभानेवाला और अपने व्रत में दृढ़ जानते हैं। इसलिए आज्ञा में ही यह विचार जुड़ता है कि पहले उपाय से बात न बने तो हाथ जोड़कर विनती की जाय। सुमन्त्र प्रभु से अनुरोध करें कि जनककुमारी सीता को लौटा दिया जाय। राजा का मन जितना लौटने की ओर जाता है, राम की दृढ़ता का ज्ञान उतना ही उस आशा के सामने खड़ा रहता है।
सीता के लिये संदेश कहने का अवसर भी दशरथ सोचते हैं। वे सुमन्त्र से कहते हैं कि जब सीता वन देखकर डरें, तब अवसर पाकर यह सीख सुनाई जाय। सास और ससुर ने कहा है कि पुत्री लौट आयें, वन में बहुत क्लेश हैं। यहाँ पिता अपने संदेश के लिये वह घड़ी कल्पित कर रहे हैं जिसमें वन का कष्ट सामने देखकर लौटने की इच्छा हो सके। उनकी बात के भीतर सीता के भय का अनुमान है। अभी सीता की ओर से ऐसा भय या वापस आने का कोई वचन नहीं आया है।
संदेश में रहने के लिये दोनों घर खुले रखे जाते हैं। कभी पिता के घर, कभी ससुराल, जहाँ इच्छा हो वहाँ रहें। यह वही पारिवारिक आश्रय है जिसके सुख पहले राजा ने सीता को समझाये थे। अब वह बात सुमन्त्र के द्वारा पहुँचाने के लिये दोहरायी जाती है। केवल एक जगह रहने की बाध्यता भी हटा दी गयी है। सीता की रुचि के अनुसार ठहरने की छूट देकर दशरथ उनके लौट आने की सम्भावना सँभालना चाहते हैं।
वे सुमन्त्र को इस प्रकार बहुत से उपाय करने को कहते हैं। यदि सीता लौट आयीं तो उनके प्राणों को सहारा होगा। इस यदि में राजा की बची हुई आशा है। पहले तीनों को चार दिन बाद वापस लाने की बात थी। फिर दोनों भाइयों के दृढ़ रहने की सम्भावना आई। उसके बाद सीता को लौटाने की विनती और उनके सामने रखने के लिये घरों का सुख आया। एक के बाद एक उपाय में पिता किसी ऐसे सहारे को खोजते हैं जिसके रहते पुत्रवियोग की पीड़ा जी सकें।
दशरथ कहते हैं कि ऐसा न हुआ तो परिणाम उनका मरण होगा। विधाता विपरीत हो जायें तो कुछ वश नहीं चलता। वे राम, लक्ष्मण और सीता को लाकर दिखाने की पुकार करते हैं और मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़ते हैं। सुमन्त्र के लिये आज्ञा अब पूरी हो चुकी है। उस आज्ञा में प्रेम, राजकीय आदेश और असहाय पिता की विनती एक साथ मिली हुई हैं। जो बात धीरज धरकर रथ भेजने से शुरू हुई थी, उसका अन्त फिर मूर्च्छा में होता है।
दशरथ चाहते हैं कि सुमन्त्र तीनों को वन दिखाकर चार दिन बाद लौटा लायें। यदि दोनों भाई न लौटें, तो सीता को लौटाने की विनती करें और अवसर मिलने पर सास-ससुर का संदेश सुनायें। पिता का घर और ससुराल दोनों विकल्प रखकर राजा उनके लौटने में प्राणों का सहारा देखते हैं।
नगर के बाहर सुमन्त्र का रथ
सुमन्त्र राजा की आज्ञा पाकर सिर नवाते हैं। बहुत जल्दी रथ जुड़वाते हैं और उस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ नगर के बाहर सीता के साथ दोनों भाई हैं। इस स्थान को दोहा स्पष्ट करके कहता है। राम महल से निकल चुके, गुरु के द्वार पर ठहर चुके और अब नगर के बाहर पहुँच चुके हैं। सुमन्त्र रथ लेकर यहीं उनसे मिलते हैं। राजा के पास हुई बातचीत और चलते हुए तीनों के बीच इतना अन्तराल बीत चुका है।
पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।
दोहा ८२
गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ॥ ८२॥
पहुँचकर सुमन्त्र राजा के वचन राम को सुनाते हैं। फिर विनती करके उन्हें रथ पर चढ़ाते हैं। सीता सहित दोनों भाई रथ में बैठ जाते हैं। अब यात्रा इसी रथ पर आगे बढ़ती है। जाते हुए वे हृदय में अयोध्या को सिर नवाते हैं। प्रणाम का यह रूप भीतर का है। माता-पिता के चरण और गुरु के चरण सामने थे; अब नगर से बाहर आकर पूरे अवध के लिये हृदय में प्रणाम होता है। जिस नगर से विदा हो रहे हैं, उसके प्रति आदर इस चलने में साथ है।
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए । करि बिनती रथ रामु चढ़ाए॥
चौपाई ६
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई । चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई॥
राम को जाते देखकर लोगों को अयोध्या अनाथ होती दिखाई देती है। सब व्याकुल होकर साथ लग जाते हैं। कृपा के समुद्र राम उन्हें अनेक प्रकार से समझाते हैं। समझाने पर वे अयोध्या की ओर लौटते भी हैं। फिर प्रेम के वश वापस चले आते हैं। तुलसी इस आने और लौटने को बार बार घटती हुई गति में रख देते हैं। राम का समझाना सुना जा रहा है, उसके अनुसार पाँव घर की ओर मुड़ते हैं, और फिर प्रेम उन्हें राम की ओर फेर देता है।
चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा॥
चौपाई ७
कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं । फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं॥
इस भीड़ का चलना केवल एक बार लिये हुए निर्णय का सीधा पालन नहीं है। उसमें राम के वचन का आदर भी दिखाई देता है और वियोग सह न पाने की व्याकुलता भी। वे लौटकर फिर आ जाते हैं। जिन लोगों को राम पिता का सुख और माताओं की सँभाल सौंप चुके हैं, उन्हीं नगरवासियों के सामने अपने हृदय को वापस ले जाने की कठिनाई है। अयोध्या में घर हैं, सम्बन्ध हैं, सुख हैं। पर राम के चलते ही उन्हें नगर के अनाथ हो जाने का अनुभव घेर लेता है।
सुमन्त्र रथ लेकर नगर के बाहर तीनों तक पहुँचते हैं, राजा के वचन सुनाते हैं और विनती करके रथ पर बैठाते हैं। वे हृदय में अवध को प्रणाम करके चलते हैं। लोग राम की सीख से लौटते हैं और प्रेम के कारण फिर उनके पास आ जाते हैं।
घर, बाग और मौन खड़े हुए जीव
अब तुलसी उस नगर को दिखाते हैं जहाँ लौटना लोगों को इतना कठिन लग रहा है। अयोध्या बड़ी भयावनी दिखाई देती है, मानो अन्धकार से भरी कालरात्रि हो। नगर के नर और नारी भयानक जन्तुओं के समान एक दूसरे को देखकर डरते हैं। पहचान के बीच भय आ गया है। जिन चेहरों के पास घर का भरोसा मिलता था, उन्हीं को देखकर डर लगता है। कवि का मानो इस बदली हुई अनुभूति को सामने रखता है। नगर अपनी सारी परिचित चीज़ों के साथ विरह में अपरिचित लग रहा है।
घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता॥
चौपाई ८
बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं । सरित सरोबर देखि न जाहीं॥
घर श्मशान के समान हैं। परिजन भूतों जैसे लगते हैं। पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यम के दूत हों। इन उपमाओं में वे सम्बन्ध आते हैं जिनसे घर सबसे अधिक अपना होता है। एक के बाद एक उन्हीं नामों पर दुःख का रंग चढ़ता है। बागों के वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं। नदियों और सरोवरों की दशा ऐसी भयावनी लगती है कि उनकी ओर देखा नहीं जाता। घर की भीतरी आत्मीयता और बाहर की हरियाली, दोनों पर वियोग का असर साथ दिखाई देता है।
इसके बाद पशुओं और पक्षियों की लम्बी पंक्ति आती है। घोड़े, हाथी, खेलने के लिये पाले हुए हिरन, नगर के पशु, चातक, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर गिनाये जाते हैं। पोद्दार की टीका नगर के पशुओं के उदाहरण में गाय, बैल और बकरी आदि बताती है और चातक को पपीहा कहती है। दोहे में करोड़ों की संख्या के साथ आया यह समुदाय नगर के दुःख को मनुष्यों की सीमा से बहुत आगे फैला देता है।
हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।
दोहा ८३
पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर॥ ८३॥
इस दोहे को अगली चौपाई के साथ पढ़ने पर इन सबकी दशा खुलती है। राम के वियोग में सभी व्याकुल खड़े हैं। जहाँ तहँ वे ऐसे स्थिर हैं जैसे किसी ने चित्र में बनाकर रख दिया हो। पशु-पक्षियों की इतनी विविधता गिनाने के बाद कवि उन्हें एक साझा मौन में खड़ा करते हैं। अलग अलग जीवों की पहचान बनी रहती है, पर इस समय सबकी गति ठहर गयी है। पोद्दार की टीका चित्र के इस भाव को चुपचाप स्थिर खड़े होने के रूप में स्पष्ट करती है।
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े । जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े॥
चौपाई ९
नगरु सफल बनु गहबर भारी । खग मृग बिपुल सकल नर नारी॥
इसी चौपाई का दूसरा भाग पूरे नगर को फलों से भरे हुए घने वन की उपमा देता है। स्त्री-पुरुष उस वन के बहुत से पशु और पक्षी हैं। पोद्दार की टीका इन फलों में अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष, चारों की प्राप्ति का संकेत खोलती है। अवध वह नगरी थी जहाँ लोग सुख से ये फल पाते थे। इसलिए उसके सघन और सफल वन होने का चित्र समृद्ध जीवन की ओर जाता है। अब उसी वन के भीतर रामवियोग की आग का दृश्य बननेवाला है।
विरह में अवध कालरात्रि जैसा, घर श्मशान जैसे और प्रिय सम्बन्धी भयावने लगते हैं। बाग कुम्हलाते हैं। दोहे में गिनाये गये सारे पशु-पक्षी रामवियोग में चित्र की तरह स्थिर हैं। फिर नगर को फलों से भरे सघन वन की उपमा दी जाती है।
जहाँ राम, वहीं समाज
फलभरे वन की उपमा के भीतर कैकेयी का रूप आता है। कवि कहते हैं कि विधाता ने उन्हें किरातिनी बना दिया, जिसने दसों दिशाओं में दुःसह दावाग्नि लगा दी। पोद्दार की टीका किरातिनी को भीलनी कहती है। इस चित्र में नगर वन है, नरनारी उसके जीव हैं और रामविरह वह आग है जिसे लोग सह नहीं सकते। कैकेयी उसी उपमा में आग लगानेवाली हैं। यह दुःख के फैलने का चित्र है, और दसों दिशाएँ उसे हर ओर पहुँचा देती हैं।
लोग व्याकुल होकर भाग चलते हैं। उनके मन में विचार दृढ़ हो जाता है कि राम, लक्ष्मण और सीता के बिना सुख नहीं है। जहाँ राम होंगे, वहीं सारा समाज होगा; रघुवीर के बिना अवध में उनका क्या काम। अब नगर के लिये स्थान से अधिक साथ का अर्थ खुलता है। अभी अयोध्या अनाथ लग रही थी। उसी अनुभूति से यह निर्णय निकलता है कि समाज को राम के पास रहना चाहिये। रहने की जगह का मूल्य उस सम्बन्ध से जुड़ गया है जिसे वे छोड़ नहीं पा रहे।
सबहिं बिचारु कीन्ह मन माहीं । राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं॥
चौपाई १०
जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू । बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू॥
यह विचार दृढ़ करके वे घर छोड़ देते हैं। तुलसी उन घरों के सुख को घटाकर नहीं दिखाते। वे कहते हैं कि वहाँ के सुख देवताओं को भी दुर्लभ हैं। ऐसे सुखों से भरे घरों से लोग चल पड़ते हैं। इसके बाद कवि पूछते हैं कि जिन्हें राम के चरणकमल प्रिय हैं, उन्हें विषयभोग कैसे वश में कर सकते हैं। पीछे की समृद्धि का पूरा मूल्य बताने से उनके चलने का चुनाव साफ़ दिखाई देता है। सुख उपस्थित है, पर इस घड़ी उनका प्रेम उन्हें राम के साथ ले जा रहा है।
चलनेवालों की सीमा भी अन्तिम दोहे में बता दी गयी है। बच्चों और वृद्धों को घर में छोड़कर लोग साथ हो लेते हैं। नगर के साथ चल पड़ने का व्यापक वर्णन इस एक बात से ठोस हो जाता है। हर आयु का हर व्यक्ति यात्रा में नहीं निकला। बालक और बूढ़े घरों में रहे। शेष लोग राम के पीछे चले और पहले दिन की यात्रा तमसा तक पहुँची। नदी का नाम और दिन का क्रम दोनों इसी दोहे में दिये गये हैं।
बालक बृद्ध बिहाइ गृहँ लगे लोग सब साथ।
दोहा ८४
तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ॥ ८४॥
पहले दिन रघुनाथ तमसा के तीर पर निवास करते हैं। महल में पिता के चरणों से चली बिदाई अब नदी के किनारे ठहरती है। बीच में गुरु का द्वार आया, नगर के बाहर रथ मिला और प्रेमवश लौट लौटकर आनेवाले लोग साथ हो लिये। तमसा का तट इसी पहले दिन का निवास है। अवध पीछे छूट गया है, और वहाँ से चले लोगों का समाज राम के साथ यहाँ उपस्थित है।
रामविरह की दावाग्नि सह न पानेवाले लोग निश्चय करते हैं कि जहाँ राम हैं वहीं उनका समाज है। देवताओं को भी दुर्लभ सुखोंवाले घर छोड़कर वे साथ चलते हैं। बालक और वृद्ध घर में रहते हैं, और पहले दिन राम तमसा के तट पर निवास करते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस बिदाई में पीछे रहनेवालों का ध्यान देर तक साथ रहता है। राम के वन की तैयारी के बीच ब्राह्मणों के वर्षभर के भोजन का विचार आता है। सेवकों के लिये माता-पिता जैसी देखभाल माँगी जाती है। पिता के सुख को अपना हित कहा जाता है और सभी माताओं को विरह में सँभालने का उपाय चाहा जाता है। जानेवाले के लिये आगे की राह आवश्यक है; इसी प्रसंग में उनके अपने मुख से पीछे के लोगों की आवश्यकताएँ भी उतनी स्पष्ट सुनाई देती हैं।
और दशरथ की आशा अपने छोटे छोटे उपायों में याद रहती है। चार दिन बाद तीनों लौट आयें। दोनों भाई दृढ़ रहें तो सीता लौट आयें। पिता का घर अच्छा लगे तो वहाँ रहें, ससुराल अच्छी लगे तो वहाँ। हर उपाय के पीछे राजा अपने प्राणों का सहारा खोज रहे हैं। उनके दुःख का कोई सहज उत्तर नहीं रखा गया। कथा उनकी पुकार सुनती है और सुमन्त्र को वह सब कहने का भार देकर नगर के बाहर भेजती है।
नगरवासी भी अपने हृदय की ऐसी ही कठिनाई में हैं। राम समझाते हैं तो वे लौट पड़ते हैं, प्रेम उन्हें फिर ले आता है। उनके आने और लौटने को देखकर हम बिदा होने की कठिनाई को पाँवों की गति में पहचानते हैं। जिन घरों में देवताओं को दुर्लभ सुख था, उन्हीं घरों के लोग तमसा तक साथ आ गये हैं। नदी के किनारे इस पहले निवास में वह निर्णय मूर्त है कि उनका सुख राम, सीता और लक्ष्मण के साथ है।
आरम्भ में पिता ने राम की बाँह पकड़कर बैठा लिया था। अन्त में नगर के लोग साथ चलते हुए तमसा के तट पर ठहरे हैं। बिदाई के इस पूरे फैलाव में प्रेम बार बार पास रहने का उपाय करता है। राम प्रणाम करते हुए आगे बढ़ते हैं, और उनके पीछे चलनेवाले लोग उसी दिन अपना समाज उनके आसपास ले आते हैं। तुलसी की कथा इस घड़ी नदी के तीर पर रुकती है, जहाँ पहले दिन का निवास बना है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ७७ से ८४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।