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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 10
अवध से बिदा और तमसा का तट
पिता के पास आशीर्वाद की विनती। गुरु के द्वार पर पीछे रहनेवालों की सँभाल, और वे नगरवासी जिनके मन में है कि राम के बिना सुख नहीं। वे उनके साथ चल पड़ते हैं।
राजा व्याकुल हैं और बोल नहीं पाते। राम राजा के चरणों में सिर नवाकर बिदा माँगते हैं। राजा उन्हें रखने के बहुत से उपाय करते हैं। राम रुकते हुए नहीं जान पड़ते।
इस प्रसंग में राजा, और उनके बाद सब लोग, सीता को सीख देते हैं, और वे कोई उत्तर नहीं देतीं। कैकेयी मुनि के वस्त्र, आभूषण और बर्तन लाती हैं। उनकी सीख सुनकर राम सुख पाते हैं, और मुनि का वेष बनाकर सबको अचेत करके चल देते हैं। वसिष्ठ के द्वार पर वे ब्राह्मणों का प्रबन्ध करते हैं, और सेवकों को गुरु की देखभाल में छोड़ते हैं। राजा मूर्च्छा से जागकर सुमन्त्र को रथ के साथ भेजते हैं। सुमन्त्र नगर के बाहर राम को रथ पर चढ़ाते हैं। लोग साथ चलते हैं, और पहले दिन राम तमसा के तट पर ठहरते हैं।
जानेवाले, रोकनेवाले, साथ चलनेवाले
- राम पिता से बिदा माँगते हैं, और जाने से पहले सेवकों की देखभाल गुरु को सौंपते हैं। वे सबसे कहते हैं कि उनका हितकारी वही है जिससे राजा सुखी रहें। नगरवासियों से वे वह उपाय करने को कहते हैं, जिससे सब माताएँ उनके विरह में दुःखी न हों।
- दशरथ व्याकुल राजा, जो बोल नहीं पाते, और पहले राम को रोकने के उपाय करते हैं और फिर सुमन्त्र को रथ के साथ भेजते हैं।
- सीता और लक्ष्मण राम के साथ वन के लिये चलते हैं। सीता को घर पर रहने के लिये राजा और सब लोग समझाते हैं।
- कैकेयी मुनियों के वस्त्र और दूसरे उपकरण लाकर राम के सामने रखती हैं और उनसे स्वयं विचार करके निर्णय करने को कहती हैं।
- वसिष्ठ गुरु, जिनके द्वार पर राम खड़े होते हैं और जिन्हें वे दास-दासियों की सार-सँभार सौंपते हैं।
- सुमन्त्र राजा की आज्ञा से रथ लेकर नगर के बाहर तीनों के पास पहुँचते हैं और उन्हें रथ पर बैठाते हैं।
- मंत्री की पत्नी और गुरु की पत्नी सीता को स्नेह से कोमल वाणी में समझानेवाली सयानी स्त्रियाँ। पोद्दार की टीका मंत्री को सुमन्त्र और गुरु की पत्नी को अरुन्धती बताती है। मंत्री की पत्नी का नाम टीका भी नहीं देती।
- अवधवासी राम के बिना नगर में सुख नहीं पाते और बच्चों तथा वृद्धों को घर में छोड़कर साथ चल पड़ते हैं।
पिता का हाथ, पुत्र की बिदा
राम पिता से आशीर्वाद और आज्ञा माँगते हैं। वे कहते हैं कि हर्ष के समय शोक क्यों किया जा रहा है। फिर कहते हैं, तात, प्रिय के प्रेम में प्रमाद हुआ तो जगत् में यश चला जायगा और निन्दा होगी।
दशरथ यह सुनते हैं, स्नेह के वश उठते हैं और राम की बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लेते हैं।
फिर दशरथ कहते हैं: तात, सुनिये, मुनि आपके लिये कहते हैं कि राम चर और अचर के स्वामी हैं। शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार ईश्वर हृदय में विचार करके फल देता है। जो कर्म करता है वही फल पाता है। ऐसी वेद की नीति है, यह सब कोई कहते हैं।
दशरथ आगे कहते हैं कि अपराध कोई और करता है और फल का भोग कोई और पाता है। भगवान् की गति बड़ी विचित्र है। जगत् में उसे जानने योग्य कौन है?
सीता के लिये शीतल सीख
राजा छल छोड़कर राम को रखने के बहुत से उपाय करते हैं। वे धर्म की धुरी सँभालनेवाले, धीर और सयाने राम का रुख देखते हैं, और राम रुकते हुए नहीं जान पड़ते। तब वे सीता को हृदय से लगाते हैं, और बड़े प्रेम से बहुत प्रकार की सीख देते हैं। वे वन के दुःसह दुःख सुनाते हैं, और सास, ससुर और पिता का सुख समझाते हैं।
सीता का मन राम के चरणों में अनुरक्त है। उन्हें घर सुगम नहीं लगता, और न वन विषम।
और सब लोग भी वन की विपत्तियों की अधिकता बार बार कहकर सीता को समझाते हैं। मंत्री की पत्नी और गुरु की पत्नी, सयानी स्त्रियाँ, स्नेह से भरी कोमल वाणी में बोलती हैं। पोद्दार की टीका मंत्री को सुमन्त्र और गुरु की पत्नी को अरुन्धती बताती है, और मंत्री की पत्नी का नाम नहीं देती।
वे कहती हैं: आपको वनवास तो दिया नहीं गया है। ससुर, गुरु और सास जो कहें, वही कीजिये।
यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सीख सुनकर सीता को नहीं सुहाती, मानो शरद् के चन्द्रमा की चाँदनी लगते ही चकई अकुला उठी हो।
सीता संकोच के वश कोई उत्तर नहीं देतीं।
कैकेयी के लाये हुए उपकरण
यह सब सुनकर कैकेयी तमककर उठती हैं। वे मुनियों के वस्त्र, आभूषण और बर्तन लाकर राम के आगे रख देती हैं और कोमल वाणी में बोलती हैं। पोद्दार की टीका आभूषणों में माला और मेखला जैसे उपकरण और बर्तनों में कमण्डलु आदि गिनती है।
कैकेयी राम से कहती हैं कि राजा को आप प्राणों के समान प्रिय हैं। भीरु राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे। पुण्य, सुन्दर यश और परलोक नष्ट हो जायें, वे आपसे वन जाने को कभी नहीं कहेंगे।
ऐसा विचारकर, वे कहती हैं, जो आपको अच्छा लगे, वही कीजिये। माता की यह सीख सुनकर राम को सुख मिलता है, और ये वचन राजा को बाण जैसे लगते हैं। पोद्दार की टीका राजा के मन की बात खोलती है: ऐसे में भी अभागे प्राण क्यों नहीं निकलते।
लोग व्याकुल हैं, राजा मूर्च्छित हैं, और किसी को नहीं सूझता कि क्या किया जाय। राम तुरन्त मुनि का वेष बनाकर, माता और पिता को सिर नवाकर चल देते हैं। वन का सब साज और समाज सजाकर, सीता और लक्ष्मण के साथ, वे ब्राह्मणों और गुरु के चरणों की वन्दना करते हैं।
सबको अचेत करके राम चल देते हैं।
वसिष्ठ के द्वार पर पीछे रहनेवालों की चिन्ता
निकलकर राम वसिष्ठ के द्वार पर खड़े होते हैं। वे देखते हैं कि लोग विरह की अग्नि में जल रहे हैं। राम प्रिय वचन कहकर सबको समझाते हैं। वे ब्राह्मणों की मण्डली बुलाते हैं और गुरु से कहकर उन्हें वर्षाशन देते हैं।
टीका वर्षाशन का अर्थ वर्षभर का भोजन बताती है। ब्राह्मणों को राम आदर, दान और विनय से अपना बना लेते हैं। याचकों को दान के साथ मान देकर सन्तुष्ट करते हैं, और मित्रों को पवित्र प्रेम से प्रसन्न करते हैं।
फिर दास और दासियाँ बुलाये जाते हैं। राम उन्हें गुरु को सौंपते हैं और हाथ जोड़कर कहते हैं कि इन सबकी देखभाल माता और पिता की तरह कीजियेगा।
फिर राम बार बार दोनों हाथ जोड़कर सब लोगों से कोमल वाणी में कहते हैं कि उनका सब प्रकार से हित करनेवाला वही होगा जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।
राम परम प्रवीण सब पुरवासियों से कहते हैं कि वही उपाय कीजियेगा जिससे उनकी सब माताएँ उनके विरह में दुःखी और दीन न हों।
आशीर्वाद के बाद नगर का आर्तनाद
सबको समझाकर राम हर्षित होकर गुरु के चरणों में सिर नवाते हैं। फिर वे गणेश, पार्वती और शिव को मनाते हैं, जिन्हें पोद्दार की टीका कैलासपति बताती है। आशीर्वाद पाकर राम चल देते हैं।
राम के चलते ही बड़ा भारी विषाद छा जाता है। नगर का आर्तनाद सुना नहीं जाता।
अवध में अत्यन्त शोक है, लंका में बुरे शकुन होने लगे हैं, और देवलोक हर्ष और विषाद दोनों के वश में है। पोद्दार की टीका देवताओं के हर्ष का कारण राक्षसों के नाश की आशा बताती है और विषाद का कारण अयोध्यावासियों का शोक।
राजा की मूर्च्छा दूर होती है, तब वे जागते हैं। वे सुमन्त्र को बुलाकर कहने लगते हैं: राम वन को चले गये, और प्राण नहीं जाते। ये किस सुख के लिये शरीर में टिके हैं? इससे अधिक बलवान और कौन सी व्यथा होगी, जिस दुःख को पाकर प्राण देह छोड़ेंगे?
फिर दशरथ धीरज धरकर कहते हैं: सखा, आप रथ लेकर साथ जाइये।
चार दिन बाद लौटाने की आशा
दशरथ कहते हैं: दोनों कुमार अत्यन्त सुकुमार हैं और सीता सुकुमारी। उन्हें रथ पर चढ़ाकर और वन दिखाकर, चार दिन बीतने पर लौट आइये।
वे कहते हैं: यदि दोनों धीर भाई न लौटें, राम जो सत्यप्रतिज्ञ और दृढ़व्रत हैं, तो आप हाथ जोड़कर विनती कीजिये: प्रभु, सीता को लौटा दीजिये।
वे कहते हैं: जब सीता वन देखकर डरें, तब अवसर पाकर मेरी यह सीख उनसे कहियेगा: सास और ससुर ने ऐसा सन्देश कहा है। पुत्री, लौट आइये, वन में बहुत क्लेश हैं।
सन्देश में वे कहते हैं: कभी पिता के घर, कभी ससुराल, जहाँ आपकी इच्छा हो, वहीं रहिये।
वे सुमन्त्र को इस प्रकार बहुत से उपाय करने को कहते हैं। यदि सीता लौट आयीं तो उनके प्राणों को सहारा होगा।
नहीं तो, दशरथ कहते हैं, परिणाम उनका मरण होगा। विधाता उलटे हो जायें तो कुछ वश नहीं चलता। ऐसा कहकर राजा मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़ते हैं, और कहते हैं कि राम, लक्ष्मण और सीता को लाकर उन्हें दिखाया जाय।
नगर के बाहर सुमन्त्र का रथ
सुमन्त्र राजा की आज्ञा पाकर सिर नवाते हैं, और बहुत जल्दी रथ तैयार करते हैं। वे वहाँ पहुँचते हैं जहाँ नगर के बाहर सीता के साथ दोनों भाई हैं।
तब सुमन्त्र राजा के वचन राम को सुनाते हैं और विनती करके उन्हें रथ पर चढ़ाते हैं। सीता सहित दोनों भाई रथ में बैठकर चलते हैं, और जाते हुए हृदय में अयोध्या को सिर नवाते हैं।
राम को जाते देखकर लोगों को अयोध्या अनाथ होती दिखाई देती है। सब व्याकुल होकर साथ लग जाते हैं। राम उन्हें अनेक प्रकार से समझाते हैं। वे लौटते हैं, और प्रेम के वश फिर लौट आते हैं।
घर, बाग और चित्र में लिखे से खड़े जीव
अयोध्या बड़ी भयावनी लगती है, मानो अन्धकार से भरी कालरात्रि हो। नगर के नर और नारी भयानक जन्तुओं के समान एक दूसरे को देखकर डरते हैं।
घर श्मशान हैं, और परिजन मानो भूत हैं। पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यम के दूत हैं। बागों के वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं। नदियाँ और सरोवर देखे नहीं जाते।
करोड़ों घोड़े और हाथी, खेलने के लिये पाले हुए हिरन, नगर के पशु, चातक, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर। पोद्दार की टीका नगर के पशुओं में गाय, बैल और बकरी आदि गिनती है और चातक को पपीहा कहती है।
राम के वियोग में ये सब व्याकुल होकर जहाँ तहाँ खड़े हैं, मानो चित्र में लिखकर बनाये गये हों। पोद्दार की टीका इसे चुपचाप स्थिर खड़े होना पढ़ती है।
नगर फलों से भरा, घना और बड़ा भारी वन है, और सब स्त्री-पुरुष उसके बहुत से पशु-पक्षी हैं। पोद्दार की टीका इन फलों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष बताती है। टीका के अनुसार अवध वह नगरी थी जहाँ लोग सुख से ये चारों फल पाते थे।
जहाँ राम, वहीं समाज
विधाता ने कैकेयी को किरातिनी बना दिया, जिसने दसों दिशाओं में दुःसह दावाग्नि लगा दी। पोद्दार की टीका किरातिनी को भीलनी कहती है। लोग राम के विरह की अग्नि को सह नहीं सके, और सब व्याकुल होकर भाग चले।
सब अपने मन में विचार करते हैं कि राम, लक्ष्मण और सीता के बिना सुख नहीं है। जहाँ राम हैं, वहीं सारा समाज है। राम के बिना अवध में कोई काम नहीं।
यह विचार पक्का करके वे साथ चल पड़ते हैं, और सुख से भरे वे घर छोड़ देते हैं जो देवताओं को दुर्लभ हैं। जिन्हें राम के चरणकमल प्रिय हैं, उन्हें क्या विषयभोग वश में कर सकते हैं?
बच्चों और वृद्धों को घरों में छोड़कर सब लोग साथ हो लेते हैं।
पहले दिन राम तमसा के तीर पर निवास करते हैं।
प्रसंग का क्रम
राजा बोल नहीं पाते, और राम उनसे बिदा माँगते हैं। राम पिता से आशीर्वाद और आज्ञा माँगते हैं। राजा उन्हें बाँह पकड़कर बिठाते हैं, और कर्म और फल की, और भगवान् की गति की बात कहते हैं। वे राम को रखने के बहुत से उपाय करते हैं, और तब सीता को सीख देते हैं। और सब लोग भी सीता को समझाते हैं, और सीता कोई उत्तर नहीं देतीं। कैकेयी मुनि के वस्त्र, आभूषण और बर्तन राम के आगे रखकर कहती हैं कि जो अच्छा लगे वही कीजिये। राम उनकी सीख से सुख पाते हैं। राजा को वचन बाण के समान लगते हैं, और वे मूर्च्छित हो जाते हैं। पत्नी और भाई के साथ राम मुनि के वेष में चल देते हैं। वसिष्ठ के द्वार पर वे लोगों को समझाते हैं, ब्राह्मणों को वर्षाशन देते हैं, और दास-दासियों को गुरु को सौंपते हैं। वे सबसे कहते हैं कि उनका हितकारी वही है जिससे राजा सुखी रहें। गुरु को सिर नवाकर और गणेश, पार्वती और शिव को मनाकर वे चलते हैं, और नगर में आर्तनाद होता है। जागकर राजा सुमन्त्र को रथ के साथ, सीता के लिये सन्देश देकर भेजते हैं, और तब मूर्च्छित होकर गिर पड़ते हैं। नगर के बाहर सुमन्त्र राम को रथ पर चढ़ाते हैं। लोग साथ चलते हैं, लौटते हैं, और प्रेम के वश फिर लौट आते हैं। वे विचार करते हैं कि जहाँ राम हैं, वहीं सारा समाज है। बच्चों और वृद्धों को घर छोड़कर वे साथ चल पड़ते हैं। पहले दिन राम तमसा के तीर पर निवास करते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 77 से 84, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।