Lulla Family

भरत और राम का मिलाप

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · भरत और राम का मिलाप

भरत और राम का मिलाप

वन में दिखते चरणचिह्न, सेवा में ठहरे लक्ष्मण, भरत को उठाकर हृदय से लगाते राम, और एक मिलन जिसमें पूरे परिवार की आँखें भर आती हैं।

भरत को अभी राम दिखाई नहीं दिये हैं। सामने वृक्ष हैं, उनके बीच एक विशाल बड़ है, और सखा निषादराज अपना हाथ उठाकर उसी ओर संकेत कर रहे हैं। उस छाया में सीता के हाथों की बनायी हुई वेदी है। थोड़ी दूर पर चरणों के चिह्न मिलेंगे, फिर आश्रम दिखेगा, और फिर वह स्वर उठेगा जिसे लक्ष्मण बिना देखे पहचान लेंगे। तुलसीदास इस मिलन को उसके आने से पहले ही आँखों में भर देना चाहते हैं। पेड़, धूल, पुकार और आलिंगन, हर पड़ाव पर भरत का प्रेम एक नया रूप लेता है।

रामचरितमानस के इस प्रसंग में मिलने का सुख बहुतों तक पहुँचता है। भरत के साथ शत्रुघ्न हैं, सखा गुह हैं, पीछे गुरु, माताएँ और अयोध्या का समाज है। राम एक भाई को हृदय से लगाते हैं, फिर सबकी ओर बढ़ते हैं। हर भेंट का अपना क्रम है और अपना भाव भी। कैकेयी को सबसे पहले सान्त्वना मिलती है। सीता माताओं को देखकर सहम जाती हैं। इस तरह आलिंगन का आनन्द और बिछोह से बदली हुई देहों का दुःख एक ही आश्रम में आ मिलते हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम जो भरत को उठाकर हृदय से लगाते हैं और फिर प्रत्येक प्रियजन के भाव के अनुसार उससे मिलते हैं।
  • भरत और शत्रुघ्न दो भाई जो चरणचिह्नों से आश्रम तक आते हैं और सीता के चरणों में प्रणाम करके उनका आशीर्वाद पाते हैं।
  • लक्ष्मण राम की सेवा में खड़े भाई, जो भरत की पुकार पहचानते हैं और सेवा तथा भ्रातृस्नेह के बीच खिंच जाते हैं।
  • सीता जिनकी बनायी वेदी पर राम और मुनि विराजते हैं, और जो अपने पास आये दोनों भाइयों तथा माताओं से स्नेहपूर्वक मिलती हैं।
  • गुह निषादराज, रामसखा और पथ बतानेवाले, जिन्हें प्रेम में रास्ता भूल जाता है और जिन्हें वसिष्ठ हृदय से लगा लेते हैं।
  • वसिष्ठ और अरुन्धती गुरु और गुरुपत्नी, जिनसे राम, लक्ष्मण और सीता आदरपूर्वक मिलते हैं।
  • कैकेयी, सुमित्रा और कौसल्या माताएँ, जिनके मिलन में सान्त्वना, हर्ष और गहरा विषाद साथ आते हैं।

बड़ की छाया में सीता की वेदी

गुह दौड़कर ऊँचे स्थान पर चढ़ जाते हैं। भुजा उठाकर भरत से कहते हैं कि सामने पाकर, जामुन, आम और तमाल के विशाल वृक्ष देखिये। उनके बीच एक सुन्दर, बहुत बड़ा बड़ शोभा पा रहा है। भरत को आश्रम पहचानाने के लिये गुह पहले इन वृक्षों का परिचय देते हैं। पर्णकुटी जिस जगह है, उसका पता आसपास के जीवित वन से खुलता है। चार प्रकार के वृक्ष और उनके मध्य वह बड़, दृष्टि धीरे धीरे एक निश्चित स्थान पर ठहरती जाती है।

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई । कहेउ भरत सन भुजा उठाई॥
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥

चौपाई १

उस बड़ के पत्ते नीले और घने हैं, फल लाल हैं, और उसकी अविरल छाया हर ऋतु में सुख देती है। तुलसी उसकी सुन्दरता के लिये अन्धकार और लालिमा को एक साथ रखते हैं। मानो ब्रह्मा ने सारी शोभा बटोरकर इन दो रंगों की एक राशि बना दी हो। घने पत्तों की श्यामता के बीच लाल फलों का उभरना इस उपमा को दिखाई देने योग्य बनाता है। यहाँ छाया की घनता भी है और उसमें बसी रंग की आभा भी। जिस वृक्ष की ओर गुह का हाथ उठा है, वही अब भरत की आँखों के सामने एक पूरा चित्र बन जाता है।

ये वृक्ष नदी के निकट हैं। वहीं राम की पर्णकुटी है। गुह आगे बताते हैं कि वहाँ तुलसी के अनेक सुन्दर पौधे लगे हुए हैं। कुछ सीता ने लगाये हैं, कुछ लक्ष्मण ने। इस छोटे से विवरण में निवास करनेवालों के हाथ पहचान में आ जाते हैं। सीता और लक्ष्मण का लगाया हुआ अलग अलग स्मरण किया गया है। बड़ की छाया के नीचे जो सुन्दर वेदी बनी है, वह सीता ने अपने हाथों से बनायी है। भरत उस स्थान तक पहुँचने से पहले ही जान लेते हैं कि उसके पौधों और उसकी वेदी में किनका श्रम बसा हुआ है।

जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान॥ २३७॥

दोहा २३७

इस वेदी पर सीता और राम मुनियों के समुदाय के साथ प्रतिदिन बैठकर कथा सुनते हैं। शास्त्र, वेद और पुराणों के कथा तथा इतिहास वहाँ सुने जाते हैं। दोहे में सुनने की क्रिया दोनों के लिये है। सीता का बनाया हुआ स्थान उनकी अपनी उपस्थिति से भी भरा है, और राम भी उसी मुनिसमाज के साथ श्रोता हैं। वनवास के इस निवास में नियमित कथा का समय है। गुह ने जिस बड़ का परिचय दिया था, उसकी छाया अब हमें उस सभा तक ले आती है जहाँ सीता, राम और मुनि साथ हैं।

गुह ऊँचे चढ़कर भुजा उठाते हैं और आश्रम के पास के वृक्ष दिखाते हैं। बड़ की घनी छाया में सीता की बनायी वेदी है, आसपास सीता और लक्ष्मण के लगाये तुलसी के पौधे हैं। उसी वेदी पर सीता और राम मुनियों के साथ प्रतिदिन शास्त्र, वेद और पुराणों की कथाएँ सुनते हैं।

चरणचिह्नों की धूल और प्रेम का समुद्र

सखा की बात सुनकर और वृक्षों को देखकर भरत की आँखों में जल उमड़ आता है। दोनों भाई प्रणाम करते हुए आगे चलते हैं। सरस्वती भी उनके प्रेम का वर्णन करने में संकोच अनुभव करती हैं, ऐसा तुलसी कहते हैं। यह वही प्रेम है जो सामने के साधारण दृश्य को राम के निकट होने का सुख दे रहा है। वृक्षों का परिचय अभी मिला था, और भरत के भीतर उसका उत्तर आँसुओं के रूप में आ गया। शत्रुघ्न इस बढ़ने और प्रणाम करने में उनके साथ हैं।

हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका॥
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं । रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥

चौपाई २

राम के चरणचिह्न दिखते हैं तो दोनों भाइयों का हर्ष उस दरिद्र जैसा हो जाता है जिसे पारस मिल गया हो। वे वहाँ की धूल अपने मस्तक पर रखते हैं, हृदय और नेत्रों से लगाते हैं। तुलसी स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें राम के मिलने के समान सुख मिलता है। चरणचिह्न अपने पीछे चले गये प्रिय का संकेत हैं, और भरत तथा शत्रुघ्न उन्हें शरीर के इन तीन स्थानों पर धारण कर रहे हैं। सिर, हृदय और आँखें, तीनों इस धूल के स्पर्श में सम्मिलित हैं। मिलने की दूरी अभी बची है, पर उस मिलने का सुख यहाँ उतर आया है।

भरत की यह अकथ दशा देखकर वन के पशु और पक्षी प्रेम में मग्न हो जाते हैं। वृक्ष जैसे जड़ जीवों तक उसका प्रभाव पहुँचता है। फिर पथ बतानेवाले गुह का अपना हाल बदलता है। स्नेह के वश में आकर उन्हें रास्ता ही भूल जाता है। अब देवता सुन्दर मार्ग बताते हैं और फूल बरसाते हैं। गुह का भूलना और देवताओं का मार्ग देना, दोनों घटनाएँ यहाँ साथ रखी गयी हैं। प्रेम में डूबे सखा का काम इसी क्षण एक दूसरे सहारे से पूरा होता है।

सिद्ध और साधक इस दशा को देखकर स्वयं अनुराग से भर जाते हैं। वे भरत के सहज स्नेह की सराहना करते हैं। उनकी प्रशंसा में यह प्रश्न आता है कि पृथ्वी पर भरत का होना न होता तो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कौन करता। पोद्दार की टीका यहाँ भरत का जन्म और भरत का प्रेम, दोनों अर्थ देती है। वन के जड़ जीवों का प्रेम में भरना और पथ जाननेवाले सखा का अपनी सुध खोना, उस प्रशंसा को कथा में सामने घटित कर रहे हैं।

पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥ २३८॥

दोहा २३८

इस दोहे में भरत गम्भीर समुद्र हैं, विरह मन्दराचल पर्वत है और प्रेम अमृत है। मथनेवाले स्वयं कृपा के समुद्र राम हैं। उन्होंने देवताओं और साधुओं के हित के लिये भरतरूपी समुद्र को अपने विरह के मन्दराचल से मथकर यह प्रेमामृत प्रकट किया है। उपमा की हर वस्तु का अपना स्थान है। भरत की गहराई में विरह चलता है और उससे जो प्रकट होता है, वह दूसरों के हित का अमृत बनता है। अभी तक हम उस प्रेम के आँसू और उसकी विस्मृति देख रहे थे। अब तुलसी उसी प्रेम का व्यापक फल देवताओं और साधुओं तक पहुँचाते हैं।

दोनों भाई चरणचिह्नों की धूल सिर, हृदय और आँखों से लगाते हैं। भरत के प्रेम से वन के जीव मग्न हैं; गुह रास्ता भूलते हैं तो देवता मार्ग बताते हैं। तुलसी भरत को समुद्र, विरह को मन्दराचल और राम को मथनेवाला कहते हैं, जिनसे सबके हित का प्रेमामृत प्रकट होता है।

आश्रम के भीतर दिखाई देते राम

सखा के साथ आती हुई भरत और शत्रुघ्न की मनोहर जोड़ी घने वन की आड़ में है। लक्ष्मण उन्हें देख नहीं पाते। भरत को राम का पवित्र और सुन्दर आश्रम दिखाई देता है। उसमें प्रवेश करते ही उनका दुःख और मन की जलन मिट जाती है। तुलसी इस अनुभूति को उस योगी की प्राप्ति से जोड़ते हैं जिसे परमतत्त्व मिल गया हो। भरत का आश्रम में प्रवेश ही इतना सुखकारी है। जिस निवास का परिचय अभी गुह दे रहे थे, अब वे उसके भीतर आ गये हैं।

भरत देखते हैं कि लक्ष्मण प्रभु के सामने खड़े हैं और पूछी गयी बात का प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं। पोद्दार की टीका इस खड़े होने को स्पष्ट करती है। लक्ष्मण के सिर पर जटा है, कमर में मुनियों का वल्कल वस्त्र बँधा है और उसी में तरकस कसा हुआ है। हाथ में बाण है, कंधे पर धनुष है। वनवासी वस्त्र, शस्त्र और राम के सामने उत्तर देते हुए लक्ष्मण, ये सब भरत की दृष्टि में एक साथ आते हैं। उस बातचीत का विषय यहाँ नहीं खुलता; उसके प्रेमपूर्ण होने का परिचय मिलता है।

वेदी पर मुनि और साधुओं का समाज बैठा है। सीता सहित राम उसमें विराज रहे हैं। राम का श्याम शरीर है, वल्कल वस्त्र हैं और सिर पर जटा है। सीता और राम की इस शोभा को पोद्दार की टीका रति और कामदेव के मुनिवेश से जोड़कर समझाती है। सुन्दरता के साथ वन का पहनावा पूरी तरह बना हुआ है। भरत जिनके दर्शन कर रहे हैं, उनके इस रूप को तुलसी अलग अलग अंग और वस्त्र के साथ ठहरकर दिखाते हैं।

बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा॥
कर कमलनि धनु सायकु फेरत । जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥

चौपाई ३

राम अपने करकमलों में धनुष और बाण फेर रहे हैं। उनके हँसकर देखने से हृदय की जलन मिट जाती है। टीका इसका अर्थ खोलती है कि जिस ओर वे एक बार हँसकर देखते हैं, उस व्यक्ति को परम आनन्द और शान्ति मिलती है। आश्रम में प्रवेश पर भरत की पीड़ा शान्त होने का उल्लेख आया था; अब उसी सभा के मध्य राम की दृष्टि का प्रभाव दिखता है। हाथों में धनुष बाण का सहज व्यवहार और देखने में इतनी शान्ति, दोनों एक ही रूप के अंग हैं।

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।
ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु॥ २३९॥

दोहा २३९

मुनिमण्डली के बीच सीता और राम की शोभा को तुलसी ज्ञान की सभा बनाते हैं। उसमें भक्ति और सच्चिदानन्द मानो शरीर धारण करके बैठे हैं। सीता भक्ति की और राम सच्चिदानन्द की मूर्त उपस्थिति में देखे जाते हैं। अभी सामने वेदी, वल्कल और जटा थे; वही दृश्य इस दोहे में तत्त्व के रूप में खुलता है। मुनियों की सभा ज्ञान है, और उस सभा का सौन्दर्य भक्ति तथा सच्चिदानन्द के साथ होने में है। भरत के लिये यह दर्शन अब ऐसा भराव ले आता है जिसमें अपने सुख दुःख का अलग हिसाब टिकनेवाला नहीं है।

वन की आड़ से लक्ष्मण आते हुए भाइयों को नहीं देखते। भरत आश्रम में प्रवेश कर राम के सामने उत्तर देते लक्ष्मण और वेदी पर सीता सहित राम को देखते हैं। मुनिमण्डली के मध्य सीता और राम तुलसी को ज्ञानसभा में साकार भक्ति और सच्चिदानन्द जैसे दिखाई देते हैं।

लक्ष्मण की दुविधा और राम का उठ पड़ना

भरत का मन छोटे भाई और सखा सहित प्रेम में मग्न हो जाता है। हर्ष, शोक, सुख और दुःख के सारे भेद विस्मृत हैं। वे राम को पुकारते हैं, हे नाथ, रक्षा कीजिये; हे गुसाईं, रक्षा कीजिये। इतना कहकर पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिर पड़ते हैं। यह प्रणाम अपने साथ पूरी असहाय पुकार लिये हुए है। दर्शन के भराव में भरत के लिये यही शब्द बचते हैं। राम के सामने उनका शरीर भूमि पर है और वाणी उन्हीं की शरण माँग रही है।

लक्ष्मण इन प्रेमपूर्ण शब्दों से पहचान जाते हैं कि भरत प्रणाम कर रहे हैं। पोद्दार की टीका यहाँ उनकी स्थिति समझाती है: लक्ष्मण का मुख राम की ओर है और भरत उनके पीछे हैं। इसलिये पहचान आँखों से नहीं हुई। भाई की वाणी ने बता दिया कि कौन आ पहुँचा है। अब उनके भीतर दो ओर का खिंचाव है। एक ओर भरत का सरस भ्रातृस्नेह है, दूसरी ओर स्वामी राम की सेवा का प्रबल बन्धन है। दोनों ही उनके अपने प्रेम के सम्बन्ध हैं।

मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई । सुकबि लखन मन की गति भनई॥
रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू॥

चौपाई ४

सेवा से क्षणभर अलग होकर मिलने जाना उनसे बन नहीं पड़ता, और प्रेमवश भरत की उपेक्षा करना भी सम्भव नहीं लगता। तुलसी कहते हैं कि लक्ष्मण के मन की इस गति को कोई सुयोग्य कवि ही कह सकता है। अन्ततः वे सेवा को अधिक भार देकर उसी में बने रहते हैं। उपमा चढ़ी हुई पतंग की है, जिसे उड़ानेवाला अपनी ओर खींच रहा हो। पतंग की गति और डोर का खिंचाव साथ अनुभव होते हैं। लक्ष्मण का मन भाई की ओर उमगा है, सेवा उन्हें अपनी जगह थामे हुए है।

इस दुविधा में उनका किया हुआ काम बहुत स्पष्ट है। वे पृथ्वी पर मस्तक झुकाकर प्रेम से राम को कहते हैं, हे रघुनाथ, भरत प्रणाम कर रहे हैं। भाई की पुकार की पहचान अब प्रभु तक पहुँच गयी। लक्ष्मण अपने सेवास्थान पर रहते हुए यही सूचना देते हैं। इतने भर का कहना राम के लिये पर्याप्त होता है। सुनते ही वे प्रेम में अधीर होकर उठ पड़ते हैं। कहीं वस्त्र गिरता है, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण। अभी जिन हाथों में धनुष बाण फिर रहे थे, अब उठने की इस आकुलता में वे भी सँभले नहीं रहते।

बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥ २४०॥

दोहा २४०

राम भरत को बलपूर्वक उठा लेते हैं और हृदय से लगा लेते हैं। भरत भूमि पर दण्डवत् पड़े थे; कृपानिधान उन्हें वहीं रहने नहीं देते। दोहे में उठाने के साथ लगा हुआ बल प्रेम का है। राम और भरत की इस भेंट को देखकर सब अपनी सुध खो देते हैं। आश्रम में अभी तक भरत और उनके साथी अपने सुख दुःख भूले थे। अब मिलन देखनेवालों तक वही आत्मविस्मृति पहुँच गयी है। दर्शन की आकुलता, पहचानी गयी पुकार और राम का आलिंगन, इन सबका फल इस सामूहिक विस्मृति में सामने है।

लक्ष्मण के खिंचाव और राम के उठने को पास रखकर देखिये। पहले सेवा किसी को अपनी जगह रोके हुए थी, फिर भरत का नाम सुनते ही राम की देह अधीर होकर उठ गयी। तुलसी दोनों अवस्थाओं को पूरा समय देते हैं। लक्ष्मण का मन किसी सरल निर्णय की तरह नहीं चलता और राम का उठना किसी सँभले हुए स्वागत की तरह नहीं होता। एक में प्रेम का संयम है, दूसरे में उसी प्रेम का वेग। दोनों के बीच लक्ष्मण का छोटा सा निवेदन है कि भरत प्रणाम कर रहे हैं।

भरत रक्षा की पुकार के साथ भूमि पर गिरते हैं। लक्ष्मण आवाज़ पहचानते हैं, सेवा को प्रधान रखते हुए राम को उनका प्रणाम बताते हैं। राम तत्काल अधीर होकर उठते हैं, वस्त्र और शस्त्र बिखर जाते हैं, और वे भरत को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं।

जिस मिलन के लिये शब्द छोटे पड़ते हैं

दोनों भाई परम प्रेम से पूर्ण हैं। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, इन चारों की सुध भूल गयी है। तुलसी पूछते हैं कि इस मिलन की प्रीति कैसे कही जाये। कर्म, मन और वाणी, तीनों के लिये वह कविकुल की पहुँच से बाहर है। यह कहना उसी दृश्य के बीच आता है जिसमें देखनेवाले पहले ही अपनी सुध खो चुके हैं। कवि भी अब अपने साधनों को परखते हैं। जो अनुभव सबको अपने आप से भुला रहा है, उसे शब्दों में पूरा उतारने की सामर्थ्य कहाँ से आये।

कवि का सच्चा बल अक्षर और अर्थ हैं। नट ताल की चाल के अनुसार नाच सकता है। तुलसी इस परिचित सम्बन्ध से अपनी कठिनाई खोलते हैं। वर्णन के लिये बुद्धि किस छाया का अनुसरण करे और किस आधार पर इस सुन्दर प्रेम को प्रकट करे। यहाँ कथन की सीमा कहकर वे प्रेम की अगम्यता बताते हैं। अक्षर तथा अर्थ जितना साथ दें, कवि उतना ही चल सकता है; यह मिलन उन्हीं सहारों को छोटा अनुभव करा रहा है।

अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को॥
सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥

चौपाई ५

भरत और राम के स्नेह तक ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का मन भी नहीं पहुँचता, ऐसा तुलसी का कथन है। फिर वे अपनी बुद्धि को छोटा कहकर एक और उपमा देते हैं। गाँडर की ताँत से सुन्दर राग कैसे बजे। पोद्दार की टीका बताती है कि गाँडर तालाबों और झीलों में होनेवाली एक प्रकार की घास है। इसी घास की बनी ताँत और सुन्दर संगीत की अपेक्षा के बीच कवि अपनी भाषा की अपर्याप्तता रख देते हैं। प्रेम का वर्णन कठिन होने की बात यहाँ साधन और साध्य की इस असमानता से समझ में आती है।

देवताओं की प्रतिक्रिया अलग है। भरत और राम का मिलना देखकर वे भयभीत हो जाते हैं, उनकी धुकधुकी बढ़ती है। देवगुरु बृहस्पति उन्हें समझाते हैं। तब वे सचेत होकर फूल बरसाते हैं और प्रशंसा करने लगते हैं। इस छोटे से क्रम में देवताओं का भय, गुरु का समझाना और फिर उनका प्रशंसक बनना, तीनों घटित हैं। कवि जहाँ इस प्रेम को अपनी बुद्धि से अगम कहते हैं, वहीं देवताओं को भी सहज रूप से सब समझ लेनेवाला नहीं दिखाते। उन्हें गुरु का बोध आवश्यक होता है।

मिलन में दोनों भाई मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार भूल जाते हैं। तुलसी अक्षर, अर्थ, ताल और घास की ताँत के सहारे अपनी वर्णनसीमा बताते हैं। देवता पहले भयभीत होते हैं; बृहस्पति के समझाने पर फूल बरसाकर प्रशंसा करते हैं।

शत्रुघ्न, गुह और सीता के पास दोनों भाई

भरत से मिलने के बाद राम प्रेमपूर्वक शत्रुघ्न से मिलते हैं। फिर गुह से उनकी भेंट होती है। इसी दोहे में भरत और लक्ष्मण का मिलना भी आता है। लक्ष्मण प्रणाम करते हैं और भरत उनसे बहुत प्रेम से मिलते हैं। तुलसी सम्बन्धों की इस पूरी कड़ी को क्रम से रखते हैं। जिस भाई का नाम सुनकर राम अधीर हो उठे थे, उस भेंट के बाद छोटे भाई और सखा तक उनका स्नेह पहुँचता है। भरत के लिये भी लक्ष्मण से मिलना अपनी अलग प्रीति लिये है।

मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम॥ २४१॥

दोहा २४१

अब लक्ष्मण बड़ी उमंग से छोटे भाई शत्रुघ्न से मिलते हैं। फिर निषादराज को हृदय से लगा लेते हैं। राम की सेवा में ठहरे हुए लक्ष्मण की वह दुविधा पीछे रह गयी है; यहाँ उनका मिलने का अपना क्रम सामने है। इसके बाद भरत और शत्रुघ्न दोनों उपस्थित मुनियों को प्रणाम करते हैं। उन्हें मनचाहे आशीर्वाद मिलते हैं और दोनों आनन्दित होते हैं। इस भेंट में भ्रातृस्नेह, मैत्री और मुनियों का आशीर्वाद एक के बाद एक आते हैं। हर सम्बन्ध अपनी उचित रीति पाता है।

इसके बाद दोनों भाई सीता के पास हैं। छोटे भाई सहित भरत का प्रेम उमड़ता है। वे सीता के चरणकमलों की धूल मस्तक पर धारण करके बार बार प्रणाम करते हैं। रास्ते में राम के चरणचिह्नों की धूल दोनों ने सिर पर रखी थी; यहाँ सीता के चरणों की रज है और उनका साक्षात् स्नेह है। दोनों भाइयों का प्रणाम बार बार होना तुलसी स्पष्ट कहते हैं। इस मिलन में उनके लिये आदर और आत्मीयता साथ उमग रहे हैं।

सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा॥
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए । सिर कर कमल परसि बैठाए॥

चौपाई ६

सीता दोनों को उठाती हैं, अपने करकमलों से उनके सिरों का स्पर्श करती हैं और उन्हें बैठाती हैं। उनका आशीर्वाद मन ही मन है। वे स्वयं स्नेह में मग्न हैं और देह की सुध नहीं है। भरत सीता को सब प्रकार अपने अनुकूल पाकर निश्चिन्त हो जाते हैं। हृदय का कल्पित भय मिट जाता है। तुलसी उस भय को इसी रूप में पहचानते हैं, और उसके मिटने का कारण सीता का पूर्ण अनुकूल व्यवहार है। हाथों का स्पर्श, बैठाना और मन के भीतर दिया हुआ आशीर्वाद भरत को आश्वस्त कर देते हैं।

उस समय न कोई कुछ कहता है, न कुछ पूछता है। सबके मन प्रेम से परिपूर्ण हैं और अपनी चंचल गति से खाली हैं। पोद्दार की टीका इसे संकल्प विकल्प का थम जाना बताती है। इस मौन का कारण कथा स्वयं देती है। इतने मिलने के बाद भी अभी प्रश्नोत्तर आरम्भ नहीं होता। सीता का आशीर्वाद भी भीतर ही रहा था, और अब पूरे समूह में वाणी ठहरी हुई है। धीरज धरकर गुह ही हाथ जोड़ते हैं, प्रणाम करते हैं और आगे का समाचार निवेदन करने लगते हैं।

राम शत्रुघ्न और फिर गुह से मिलते हैं; भरत लक्ष्मण से मिलते हैं। लक्ष्मण शत्रुघ्न और गुह से मिलते हैं। भरत तथा शत्रुघ्न मुनियों को प्रणाम करके सीता के पास आते हैं। सीता दोनों को उठाकर सिर छूती हैं, बैठाती हैं और मन में आशीर्वाद देती हैं। भरत का कल्पित भय मिट जाता है।

गुरु के पास, और गुह को मिला आलिंगन

नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग॥ २४२॥

दोहा २४२

गुह निवेदन करते हैं कि मुनिनाथ वसिष्ठ के साथ सभी माताएँ और नगर के लोग आये हैं। सेवक, सेनापति और मन्त्री भी हैं। सब राम के वियोग से व्याकुल हैं। इस सूचना में पीछे आये हुए समाज का पूरा विस्तार है। परिवार के साथ नगर और उसके काम सँभालनेवाले लोग भी इस बिछोह को अनुभव कर रहे हैं। अभी तक आश्रम में पहुँचे भाइयों का मिलना हुआ था। गुह के शब्दों से राम के सामने उन सबकी उपस्थिति आ जाती है जो साथ आये हैं और जिनसे मिलना बाकी है।

गुरु के आने की बात सुनकर राम शत्रुघ्न को सीता के पास रखते हैं और उसी समय वेग से चल पड़ते हैं। तुलसी उन्हें शील का समुद्र, धीर, धर्म की धुरी सँभालनेवाला और दीनों पर दया करनेवाला कहते हैं। गुरु के स्वागत के लिये चलने से पहले सीता के समीप शत्रुघ्न का रहना निश्चित किया जाता है। आगे गुरु से मिलनेवाले दोनों भाई राम और लक्ष्मण हैं। इस भेंट का क्रम इन छोटे किन्तु स्पष्ट विवरणों के साथ आगे बढ़ता है।

वसिष्ठ को देखते ही राम और लक्ष्मण प्रेम से भर जाते हैं और दण्डवत् प्रणाम करने लगते हैं। मुनिश्रेष्ठ दौड़कर दोनों को हृदय से लगा लेते हैं। उनकी भेंट में भी प्रेम का उमंग है। भरत को राम ने भूमि से उठाकर हृदय से लगाया था; यहाँ गुरु प्रणाम करते हुए दोनों भाइयों को अपने हृदय से लगाते हैं। एक दूसरे की ओर बढ़ता हुआ यह स्नेह हर बार सम्बन्ध की अपनी मर्यादा के साथ प्रकट होता है। शिष्य प्रणाम करते हैं और गुरु का प्रेम उन्हें आलिंगन में ले लेता है।

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू । कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥
रामसखा रिषि बरबस भेंटा । जनु महि लुठत सनेह समेटा॥

चौपाई ७

गुह प्रेम से पुलकित हैं। अपना नाम कहते हुए वे दूर से ही वसिष्ठ को दण्डवत् प्रणाम करते हैं। ऋषि उन्हें राम का सखा जानकर बलपूर्वक हृदय से लगा लेते हैं। तुलसी को यह ऐसा लगता है मानो धरती पर लोटते हुए स्नेह को समेट लिया गया हो। गुह की पहचान इस आलिंगन में रामसखा की है। जिस व्यक्ति ने दूरी से अपना नाम बताया था, उसके लिये गुरु का उत्तर हृदय से लगाना है। उपमा में स्वयं प्रेम ही भूमि पर है और ऋषि उसे समेट रहे हैं।

देवता आकाश से फूल बरसाकर राम की भक्ति को शुभ मंगलों का मूल कहते हैं। उनकी प्रशंसा में उस समय की ऊँच नीच की सामाजिक दृष्टि भी आती है। वे निषाद को सबसे नीचा और वसिष्ठ को सबसे बड़ा कहकर इस भेंट की महिमा बताते हैं। यह देवताओं की कही हुई पदानुक्रम की भाषा है। कथा में उसके सामने जो घटना है, वह वसिष्ठ का गुह को हर्षपूर्वक हृदय से लगाना है। अगला दोहा कहता है कि मुनिराज लक्ष्मण से भी अधिक आनन्दित होकर निषाद से मिले। इसे सीतापति के भजन का प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव कहा गया है।

गुह पूरे समाज के आने का समाचार देते हैं। राम शत्रुघ्न को सीता के पास रखकर लक्ष्मण सहित गुरु से मिलते हैं। वसिष्ठ दोनों भाइयों को हृदय से लगाते हैं, फिर दूर से प्रणाम करते गुह को भी रामसखा जानकर आलिंगन देते हैं। देवता इसे रामभक्ति की महिमा कहते हैं।

सबकी अपनी भेंट, कैकेयी सबसे पहले

राम जानते हैं कि सभी लोग मिलने की उत्कण्ठा से दुखी हैं। जो जिस भाव से मिलने की अभिलाषा रखता है, वे उसी के अनुरूप उसका मन रखते हैं। लक्ष्मण सहित पलभर में सब किसी से मिलकर उनका दुःख और कठिन संताप दूर कर देते हैं। तुलसी इसे राम के लिये कोई बड़ी बात नहीं कहते। करोड़ों घड़ों में एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब एक साथ पड़ सकता है। उसी तरह सबको अपनी अपनी भेंट का सुख मिलता है। अनेक लोगों के बीच प्रत्येक व्यक्ति की अभिलाषा अलग पहचानी जाती है।

नगरवासी गुह से भी प्रेम में उमगकर मिलते हैं और उनके भाग्य की सराहना करते हैं। गुरु के आलिंगन के बाद रामसखा के प्रति पूरे नगर का यह अनुराग दिखाई देता है। तभी राम की दृष्टि दुखी माताओं पर पड़ती है। वे ऐसी लगती हैं मानो सुन्दर लताओं की पंक्तियों को पाला मार गया हो। उपमा उनके दुःख को देह की दशा में देखने देती है। मिलने के आनन्द के बीच बिछोह ने जिन पर जो प्रभाव छोड़ा है, वह अब सामने आ रहा है।

प्रथम राम भेंटी कैकेई । सरल सुभायँ भगति मति भेई॥
पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी । काल करम बिधि सिर धरि खोरी॥

चौपाई ८

राम सबसे पहले कैकेयी से मिलते हैं। अपने सरल स्वभाव और भक्ति से उनकी बुद्धि को तर कर देते हैं। फिर उनके चरणों में गिरकर सान्त्वना देते हैं और दोष को काल, कर्म तथा विधाता के सिर रखते हैं। पहले मिलने का यह क्रम तुलसी स्वयं स्पष्ट करते हैं। राम का व्यवहार कैकेयी तक सीधे पहुँचता है। उनके सरल स्वभाव, चरणों में प्रणाम और प्रबोध, तीनों से उस भेंट का रूप बनता है। सान्त्वना किसी दूर खड़े हुए उपदेश की तरह नहीं आती; मातृचरणों में झुके हुए पुत्र के व्यवहार में आती है।

भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।
अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु॥ २४४॥

दोहा २४४

इसके बाद राम सभी माताओं से मिलते हैं। उन्हें समझाकर सन्तोष कराते हैं। वे कहते हैं, हे माता, जगत् ईश्वर के अधीन है, किसी को दोष नहीं देना चाहिये। यह राम का सांत्वनापूर्ण कथन है। कैकेयी के पास काल, कर्म और विधाता का उल्लेख था; अब सभी माताओं के लिये जगत् के ईश्वराधीन होने का आश्वासन है। इस समय उनका प्रयत्न शोकाकुल हृदयों को सन्तोष देना है। अपनी भेंट में वे प्रत्येक माता को इसी प्रबोध के साथ ग्रहण करते हैं।

फिर राम और लक्ष्मण गुरु की पत्नी तथा साथ आयी ब्राह्मणों की स्त्रियों के चरणों की वन्दना करते हैं। पोद्दार की टीका गुरुपत्नी का नाम अरुन्धती बताती है। दोनों भाई उन सबका गंगा और गौरी के समान सम्मान करते हैं। वे आनन्दित होकर कोमल वाणी में आशीर्वाद देती हैं। माताओं के बाद इस समूह के प्रति किया गया आदर भी पूरा वर्णित है। गुरु से भेंट के सुख में उनके साथ आयी स्त्रियों का सम्मान और उनका दिया हुआ आशीर्वाद शामिल है।

तब दोनों भाई सुमित्रा के पैर पकड़कर उनकी गोद से लग जाते हैं। तुलसी कहते हैं, मानो किसी अत्यन्त दरिद्र को सम्पत्ति मिल गयी हो। चरणचिह्न पाकर दोनों भाइयों की प्रसन्नता के लिये पहले दरिद्र और पारस की उपमा आयी थी। यहाँ सुमित्रा की गोद में मिलने के सुख के लिये सम्पत्ति का मिलना आया है। फिर राम और लक्ष्मण कौसल्या के चरणों में गिरते हैं। उनके सारे अंग प्रेम की व्याकुलता से शिथिल हैं। माता दोनों को अत्यन्त अनुराग से हृदय से लगा लेती हैं और अपनी आँखों के प्रेमजल से मानो उन्हें नहला देती हैं।

कौसल्या की इस भेंट में हर्ष और विषाद साथ हैं। तुलसी फिर कथन की सीमा कहते हैं: जैसे बोल न सकनेवाला व्यक्ति स्वाद का अनुभव कैसे बताये। आनन्द है, दुःख है, और दोनों का संयुक्त अनुभव शब्दों में पूरा नहीं आ रहा। राम लक्ष्मण सहित माता से मिलकर गुरु से आश्रम में पधारने का निवेदन करते हैं। वसिष्ठ की आज्ञा पाकर नगरवासी जल और भूमि की सुविधा देखकर अपने ठहरने के स्थान चुन लेते हैं। इस बड़े समाज के निवास का प्रबन्ध भी इसी क्रम में हो जाता है।

ब्राह्मणों, मन्त्रियों, माताओं और गुरु जैसे गिने चुने लोगों को साथ लेकर भरत, लक्ष्मण और राम पवित्र आश्रम की ओर जाते हैं। बाकी समाज अपने ठहरने की जगहों पर है। आश्रम की ओर जाते हुए समूह में भरत का नाम भी दोहा स्पष्ट कहता है। कुछ पहले राम गुरु से मिलने निकले थे; अब गुरु तथा परिवार के इस चुने हुए समूह को आश्रम लाया जा रहा है। वहाँ सीता हैं, और उनके लिये इन आगन्तुकों से मिलने का क्षण आनेवाला है।

राम लक्ष्मण सहित सब लोगों की रुचि के अनुसार उनसे मिलते हैं। माताओं में पहले कैकेयी को सान्त्वना देते हैं, फिर सभी माताओं को समझाते हैं। अरुन्धती और अन्य स्त्रियों का सम्मान होता है; सुमित्रा तथा कौसल्या से दोनों भाई मिलते हैं। नगरवासी ठहरते हैं और चुना हुआ समूह गुरु सहित आश्रम आता है।

सीता की बन्द आँखें और मन के आशीर्वाद

सीता आकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ के चरण लगती हैं और अपने मन की इच्छा के अनुकूल उचित आशीर्वाद पाती हैं। फिर मुनियों की स्त्रियों सहित अरुन्धती से मिलती हैं। उस प्रेम की मात्रा कही नहीं जा सकती, तुलसी कहते हैं। सीता सभी के चरणों की अलग अलग वन्दना करती हैं। प्रत्येक से उन्हें ऐसा आशीर्वाद मिलता है जो उनके हृदय को प्रिय है। मिलने की इस रीति में एक एक व्यक्ति को दिया हुआ आदर फिर सामने है, जैसा कुछ पहले राम और लक्ष्मण की भेंटों में था।

बंदि बंदि पग सिय सबही के । आसिरबचन लहे प्रिय जी के॥
सासु सकल जब सीयँ निहारीं । मूदे नयन सहमि सुकुमारीं॥

चौपाई ९

जब सीता सब सासुओं को देखती हैं तो सहमकर आँखें बन्द कर लेती हैं। माताओं की दशा को राम ने पाले से मारी गयी लताओं की तरह देखा था। सीता के सामने वही दुःख दूसरी उपमा में आता है। उन्हें लगता है मानो राजहंसिनियाँ बधिक के वश में पड़ गयी हों। पोद्दार की टीका इसे सासुओं की बुरी दशा देखकर उठे हुए भाव के रूप में समझाती है। कोमल जीवों का ऐसे हाथ में पड़ जाना, जहाँ उनका अपना वश नहीं, उस सहमने को समझने का आधार बनता है।

सीता के भीतर यह विचार उठता है कि कुचाली विधाता ने क्या कर डाला। उधर माताओं को भी सीता देखकर अत्यन्त दुःख होता है। उनकी ओर से यह भाव आता है कि दैव जो कुछ सहावे, वह सब सहना ही पड़ता है। पीड़ा दोनों ओर से एक दूसरे को देख रही है। अभी किसी का विस्तार से समाचार सुनाना नहीं हुआ है; एक दूसरे की दशा ही इतना करुण अनुभव दे रही है। आँखें बन्द कर लेने का क्षण इसी देखे हुए दुःख से उपजा है।

फिर सीता हृदय में धीरज धारण करती हैं। उनके नीलकमल जैसे नेत्रों में जल भरा है। वे जाकर सभी सासुओं से मिलती हैं। तुलसी कहते हैं कि उस अवसर पर पृथ्वी में करुणा छा गयी। यह मिलन आरम्भ की सहमी हुई अवस्था से होकर धैर्य तक आता है, और धैर्य के साथ आँसू भी रहते हैं। सभी माताओं से मिलने का काम सीता इसी भाव में करती हैं। जिस हृदय ने उनकी दशा देखकर आँखें बन्द कर ली थीं, वही अब सँभलकर प्रत्येक के पास पहुँचता है।

लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।
हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग॥ २४६॥

दोहा २४६

सीता सभी के पैरों लग लगकर बड़े अनुराग से मिल रही हैं। माताएँ प्रेम के वश में अपने हृदय में आशीर्वाद देती हैं कि वे सुहाग से भरी रहें, सदा सौभाग्यवती रहें। यह आशीष भीतर की है। थोड़ी देर पहले सीता ने भरत और शत्रुघ्न को मन ही मन आशीर्वाद दिया था; अब माताओं के हृदय से सीता के लिये मंगलकामना उठती है। अपनी पीड़ा के बीच भी उनका प्रेम सीता के सौभाग्य की कामना करता है। प्रसंग इसी पगवन्दना और मन के आशीर्वाद पर ठहरता है।

सीता गुरु, अरुन्धती और मुनिपत्नियों से मिलती हैं। माताओं की दशा देखकर सहमकर आँखें बन्द कर लेती हैं। फिर धीरज धरकर आँसुओं के साथ प्रत्येक सास के चरण लगती हैं। माताएँ अपने हृदय में उनके अटल सौभाग्य की आशीष देती हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस मिलन में हम बार बार देखते हैं कि प्रणाम का उत्तर किसी को उठा लेने या हृदय से लगा लेने में आता है। भरत भूमि पर हैं, राम उठा लेते हैं। दोनों भाई सीता को प्रणाम करते हैं, वे सिर छूकर बैठाती हैं। राम और लक्ष्मण गुरु को दण्डवत् करते हैं, गुरु उन्हें आलिंगन देते हैं। गुह दूर से अपना नाम कहते हैं, वसिष्ठ उन्हें समेट लेते हैं। हर बार आदर का अपना रूप है और उसे ग्रहण करते स्नेह का अपना उत्तर। इन क्रियाओं में सम्बन्ध आँखों के सामने प्रकट हो जाते हैं।

और इस सारे आनन्द के साथ तुलसी पीड़ा को भी देखने देते हैं। कौसल्या की भेंट में हर्ष और विषाद एक साथ हैं। सीता माताओं को देखकर आँखें बन्द कर लेती हैं। फिर वही सीता धैर्य धरकर सभी के पास जाती हैं और उनके भीतर से सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। मिलने से प्रियजन की पूरी दशा सामने आती है, उसका सुख भी और उसका दुःख भी। इस प्रसंग की करुणा उसी पूरे देखने में बसी है।

बड़ की छाया से शुरू हुई दृष्टि अन्त में माताओं के हृदय तक आती है। बीच में चरणों की धूल, भाइयों का आलिंगन, गुरु का स्नेह और सबकी अलग अलग भेंट है। राम और भरत का मिलाप इस तरह पूरे समाज को अपने भीतर ले लेता है। अन्तिम दोहे में सीता चरण लग रही हैं और माताएँ मन में मंगल कह रही हैं। उस मौन आशीष के साथ इस मिलन का करुण स्वर हमारे पास रह जाता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २३७ से २४६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English