रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · राम का वनवास स्वीकारना और पिता से आज्ञा माँगना
राम का वनवास स्वीकारना और पिता से आज्ञा माँगना
अयोध्या की जागती रात से दशरथ की मौन प्रार्थना तक, और उस व्याकुल पिता के सामने राम की प्रसन्न विनती कि हृदय से आज्ञा दीजिये।
राजा दशरथ रात भर राम का नाम रट रहे हैं। वे चाहते हैं कि भोर न हो और कोई राम तक वह बात लेकर न पहुँचे, जिससे उनका हृदय इतना व्याकुल है। उधर अयोध्या में भी किसी को नींद नहीं आयी, पर वहाँ जागने का कारण राम के दर्शन की लालसा है। एक ही रात में पिता की व्यथा और नगर का उत्साह साथ जाग रहे हैं। सूर्य निकलेगा तो राजद्वार पर खड़े लोगों को सबसे पहले राजा के जागने में हुई देर खटकेगी।
तुलसीदास के रामचरितमानस की इस सुबह में राम पिता की दुर्दशा देखने आते हैं, कैकेयी से उसका कारण पूछते हैं और वन जाने की बात सहर्ष स्वीकार करते हैं। उन्हें अपने हित की बातों में वन के मुनियों का मिलना भी दिखता है और प्रिय भरत का राज्य पाना भी। सामने पिता का दुःख उन्हें अलग से व्यथित करता है। दशरथ पुत्र को हृदय से लगाये हुए मन में देवताओं से प्रार्थना करेंगे कि राम घर में रह जायँ। राम उन्हीं से प्रसन्न हृदय आज्ञा देने की विनती करेंगे।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम स्वभाव से आनन्दनिधान और करुणामय पुत्र, जो वन जाने को स्वीकार करते हैं और पिता की व्याकुलता दूर करना चाहते हैं।
- दशरथ अवधपति, जिनका पुत्रप्रेम उन्हें इतना व्याकुल कर देता है कि वे राम को सामने पाकर भी बोल नहीं पाते।
- कैकेयी दो वरदानों की बात राम को सुनानेवाली रानी, जो उनसे पिता के वचन और सुयश की रक्षा करने को कहती हैं।
- सुमन्त्र मन्त्री, जो राजा का रुख समझकर राम को बुलाते हैं और फिर दशरथ को सँभालकर बैठाते हैं।
- भरत राम के प्राणप्रिय भाई, जिनके राज्य पाने में राम अपना अनुकूल भाग्य देखते हैं।
वह रात जिसे राजा रोकना चाहते हैं
दशरथ के मुख पर बार बार राम का नाम आता है। शरीर की व्याकुलता दिखाने के लिये तुलसी पंखहीन पक्षी का चित्र रखते हैं। पक्षी की उड़ने की चाह बनी हुई है, पर वह उड़ नहीं सकता। राजा की दशा भी ऐसी ही असहाय है। उनके मन में इस समय दो विनतियाँ उठती हैं, भोर न हो और कोई राम को जाकर यह बात न कहे। रात का बीतना उन्हें उस समाचार के राम तक पहुँचने का समय निकट लाता लगता है। वे अँधेरे की अवधि बढ़ जाना चाहते हैं।
राम राम रट बिकल भुआलू । जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥
चौपाई १
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई । रामहि जाइ कहै जनि कोई॥
अब वे सूर्य को सम्बोधित करते हैं। हे रघुकुल के गुरु, उदय मत कीजिये, अयोध्या को देखकर आपके हृदय में भी शूल उठेगा। पोद्दारजी की टीका यहाँ गुरु का अर्थ कुल के बड़ेरे, मूलपुरुष बताती है। इस सम्बोधन में दशरथ का आग्रह और पास आ जाता है। जिनसे अपने कुल का सम्बन्ध है, उन्हीं के सामने वे अयोध्या का दुःख रख रहे हैं। अपने लिये रात माँगते हुए वे कहते हैं कि इस नगर की दशा देखकर सूर्य को भी पीड़ा होगी।
इस पुकार के साथ कवि राजा के प्रेम और कैकेयी की कठिनता को सामने रखते हैं। दोनों को विधाता ने उनकी सीमा तक बनाकर रचा है। दशरथ का प्रेम उस छोर पर पहुँच गया है जहाँ उन्हें सुबह सहन नहीं होती, और रानी का हृदय उनकी व्याकुलता से भी नहीं बदलता। महल में ये दोनों अवस्थाएँ साथ उपस्थित हैं। राजा की विनती उनके भीतर चलती रहती है और बाहर समय अपना क्रम पूरा कर देता है। विलाप करते करते ही भिनसार हो जाता है।
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा । बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥
चौपाई २
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक । सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥
राजद्वार पर वीणा, बाँसुरी और शंख की ध्वनि होने लगती है। भाट विरुदावली पढ़ते हैं, गायक गुण गाते हैं। वही स्वर सुनने पर दशरथ को बाणों जैसे लगते हैं। उनकी पीड़ा के लिये कुछ अमंगल बजने की आवश्यकता भी नहीं पड़ी। मंगल की ध्वनि ही उन्हें बींध रही है। बाहर से सुननेवाला जिस ध्वनि में सुख सुनेगा, भीतर पड़े राजा के लिये उसमें आनेवाले समय की चोट है। जिन स्वर और साज का अवसर है, उन्हें ग्रहण करने की दशा उनके मन में नहीं रही।
मंगल की सजावट भी राजा को नहीं सुहाती। तुलसी इसकी उपमा पति के साथ सती होने जाती स्त्री के आभूषणों से देते हैं। उस ऐतिहासिक उपमा में आभूषणों की शोभा और उन्हें पहननेवाली की विपत्ति एक साथ आती हैं। यहाँ राजद्वार का मंगल और राजा की विपत्ति भी उसी तरह साथ रखे गये हैं। फिर कथा महल से बाहर जागते नगर की ओर जाती है। उस रात किसी को नींद नहीं आयी थी, क्योंकि सभी के मन में राम के दर्शन की लालसा और उत्साह था।
द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।
दोहा ३७
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि॥ ३७॥
सूर्य निकल चुका है। सेवकों और मन्त्रियों की भीड़ राजद्वार पर खड़ी है और सब एक ही बात पूछ रहे हैं, अवधपति अभी तक जागे क्यों नहीं। कोई विशेष कारण अवश्य होगा। उन्हें भीतर की रात का हाल मालूम नहीं है। वे सामने दिखाई देती देर को देखते हैं और उस देर का कारण जानना चाहते हैं। जिस राजा के लिये रात एक लम्बा विलाप रही, उन्हीं के विषय में बाहर लोग समझ रहे हैं कि अभी सोकर नहीं उठे। भीतर का दुःख बाहर की प्रतीक्षा में पहले एक प्रश्न बनकर पहुँचता है।
दशरथ राम का नाम रटते हुए भोर टल जाने की प्रार्थना करते हैं। सुबह के मंगल स्वर उन्हें बाण जैसे लगते हैं। रामदर्शन के उत्साह में जागा नगर सूर्य निकलने पर आश्चर्य करता है कि राजा अभी तक क्यों नहीं जागे।
सुमन्त्र के कदम और महल का मौन
द्वार पर खड़े लोगों का आश्चर्य राजा की दिनचर्या से जुड़ा है। दशरथ तो नित्य रात के पिछले पहर जाग जाया करते हैं। आज सूर्य निकलने पर भी कोई आज्ञा नहीं मिली। सब सुमन्त्र से कहते हैं कि भीतर जाकर राजा को जगाइये, उनकी आज्ञा मिल जाये तो काम आरम्भ हों। बात अभी राजकार्य के ठहर जाने की है। सब अपने कार्य में लगना चाहते हैं और उस एक आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिसके लिये अब मन्त्री महल की ओर बढ़ते हैं।
सुमन्त्र भीतर पहुँचते हैं तो महल उन्हें भयानक लगता है। वे आगे जाते हुए डर रहे हैं। तुलसी उस भय को इतना सजीव करते हैं कि महल मानो दौड़कर काट खाने आयेगा। उसकी ओर देखा तक नहीं जाता। लगता है, विपत्ति और विषाद ने वहीं डेरा डाल लिया है। यह देखकर मन्त्री पूछते हैं, पर कोई उत्तर नहीं देता। राजद्वार के इतने लोगों के प्रश्न के बाद महल की यह निरुत्तरता आती है। किसी से बात का सिरा नहीं मिलता, इसलिये सुमन्त्र को और भीतर जाना पड़ता है।
वे उस भवन में पहुँचते हैं जहाँ दशरथ और कैकेयी हैं। राजा की जय और दीर्घजीवन की कामना कहते हुए सिर नवाते हैं और बैठते हैं। सामने राजा की दशा देखते ही उनका जी सूख जाता है। दशरथ सोच से व्याकुल भूमि पर पड़े हैं, चेहरे का रंग उड़ गया है। कवि उन्हें जड़ से छूटे कमल जैसा दिखाते हैं। इस चित्र में राजा के शरीर का निर्बल होकर पड़े रहना भी है और उनके मुख की खोयी हुई आभा भी। सुमन्त्र डर के मारे कुछ पूछ नहीं पाते।
परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।
दोहा ३८
रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु॥ ३८॥
अब कैकेयी बोलती हैं। उनके बोलने से पहले ही तुलसी उन्हें अशुभ से भरी और शुभ से खाली कहते हैं। रानी बताती हैं कि राजा रात भर सोये नहीं, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें। उन्होंने राम का नाम रटते हुए सुबह कर दी, पर अपना भेद कुछ नहीं बताते। यह कैकेयी का कहा हुआ है। सुमन्त्र के सामने वे राजा की दशा का कारण नहीं खोलतीं। रात की जाग और रामनाम का उल्लेख करके बात वहीं रोक देती हैं जहाँ मन्त्री को अभी भी आगे पूछने की आवश्यकता बनी रहे।
रानी का अगला वचन काम सौंप देता है, राम को शीघ्र बुला लाइये, फिर आकर समाचार पूछिये। सुमन्त्र राजा का रुख पहचानकर चल पड़ते हैं। वे इतना समझ लेते हैं कि रानी ने कुछ कुचाल की है। अभी उनके पास पूरे प्रसंग का ज्ञान नहीं है। इसी से रास्ते में चिन्ता और बढ़ती है। राम को बुलाकर राजा क्या कहेंगे। इस विचार से मन्त्री ऐसे व्याकुल हैं कि रास्ते पर पाँव नहीं पड़ते, आगे बढ़ना कठिन हो रहा है। जिस काम के लिये चले हैं, उसी के परिणाम की आशंका उन्हें घेरे है।
किसी तरह हृदय में धीरज धरकर वे द्वार तक आते हैं। बाहर के लोग उनका उदास मुख देखते ही पूछने लगते हैं। सुमन्त्र सबका समाधान करते हैं, किसी प्रकार समझाकर वहाँ से आगे बढ़ते हैं। उनके उत्तर के शब्द यहाँ नहीं दिये गये हैं। हम इतना ही देखते हैं कि प्रश्न करनेवालों को सँभालकर वे राम के पास पहुँचते हैं। सूर्यकुल के तिलक राम मन्त्री को आता देख पितातुल्य सम्मान देते हैं। उदासी में आये हुए सुमन्त्र को यहाँ आदर मिलता है, फिर वे अपना संदेश कहते हैं।
निरखि बदनु कहि भूप रजाई । रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥
चौपाई ३
रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं । देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥
सुमन्त्र राम का मुख देखते हैं, राजा की आज्ञा सुनाते हैं और उन्हें साथ लेकर चल पड़ते हैं। मार्ग में लोग राम को मन्त्री के साथ इस प्रकार जाते देखकर जहाँ तहाँ दुःखी होते हैं। पोद्दारजी की टीका इस चाल के लिये आये शब्द कुभाँति को बिना किसी लवाजमे के जाना बताती है। राम के साथ राजसी साथ सामान का न होना लोगों को खटकता है। उनके मन में अभी दर्शन का उत्साह था, और अब दिखाई देता यह रूप उन्हें बिलखने को विवश कर रहा है।
इस यात्रा में सुमन्त्र की भूमिका बहुत निकट की है। पहले वे राजा का रुख समझते हैं, फिर बाहर के लोगों को सँभालते हैं, और अन्त में राम को राजा की आज्ञा सुनाते हैं। भीतर से बाहर आते समय जो चिन्ता उनके कदम रोक रही थी, वह राम के सामने कोई बनाया हुआ वृत्तान्त नहीं बनती। वे बुलाने का काम पूरा करते हैं। राम भी उनका सम्मान करके साथ चल देते हैं। राजा की दुर्दशा अब स्वयं पुत्र के सामने आनेवाली है।
सुमन्त्र भयावह और निरुत्तर महल में दशरथ को व्याकुल देखते हैं। कैकेयी राम को बुलाने को कहती हैं। रानी की कुचाल का संदेह लिये मन्त्री राम के पास जाते हैं, जहाँ उन्हें पितातुल्य आदर मिलता है। राम उनके साथ बिना लवाजमे के चलते हैं और लोग दुःखी होते हैं।
पिता की दशा और कैकेयी का उत्तर
जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।
दोहा ३९
सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु॥ ३९॥
राम पहुँचकर देखते हैं कि राजा अत्यन्त बुरी दशा में पड़े हैं। तुलसी बूढ़े गजराज की उपमा देते हैं, जो सिंहनी को देखकर सहमकर गिर गया हो। अभी सुमन्त्र की दृष्टि में राजा जड़ से उखड़े कमल जैसे थे। अब पुत्र के आने पर यह दूसरा चित्र सामने है, वृद्ध और भय से गिरा हुआ गजराज। दोनों में राजा का अपना बल उनका साथ छोड़ चुका है। कैकेयी की उपस्थिति में उनका यह असहाय पड़ना राम के सामने खुलता है।
दशरथ के ओठ सूख रहे हैं, सारा अंग जल रहा है। वे मणि खो चुके साँप की तरह दीन हैं। निकट ही क्रोध से भरी कैकेयी बैठी दिखती हैं। कवि उन्हें मृत्यु के समान दिखाते हैं, जो घड़ियाँ गिन रही हो। पोद्दारजी की टीका इस घड़ी गिनने को राजा के जीवन की अन्तिम घड़ियाँ गिनना कहकर खोलती है। साँप की मणि और मृत्यु की घड़ी, दोनों चित्र राजा की दशा को और कठिन बना देते हैं। राम अपने पिता को इस प्रकार देखते हैं।
राम का स्वभाव कोमल और करुणामय है। ऐसा दुःख उन्होंने पहली बार देखा है, पहले कभी सुना भी नहीं था। समय का विचार करके वे धीरज धरते हैं और माता से मीठे वचनों में पूछते हैं। इस प्रश्न में पहले ही उनकी इच्छा खुल जाती है, पिताजी के दुःख का कारण बताइये, जिससे उसे दूर करने का यत्न किया जा सके। वे कारण जानने के साथ उपाय भी खोजना चाहते हैं। व्याकुल पिता के निकट पहुँचकर उनकी वाणी उसी पीड़ा के निवारण की ओर जाती है।
कैकेयी उत्तर का आरम्भ राजा के स्नेह से करती हैं। सारा कारण यही है कि महाराज का राम पर बहुत प्रेम है। उन्होंने रानी को दो वरदान देने को कहा था और रानी को जो अच्छा लगा, वही उन्होंने माँग लिया। यह सुनकर राजा के हृदय में सोच उत्पन्न हो गया, क्योंकि वे राम का संकोच नहीं छोड़ पा रहे। रानी अपने माँगने को अपनी रुचि की बात कहती हैं और राजा के दुःख को पुत्र के प्रति उनके लगाव से जोड़ देती हैं।
सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।
दोहा ४०
सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु॥ ४०॥
इधर पुत्र का स्नेह है, उधर दिया हुआ वचन। कैकेयी कहती हैं कि राजा इसी संकट में पड़ गये हैं। राम से उनका आग्रह है, यदि कर सकें तो आज्ञा सिर पर धरें और राजा का कठिन क्लेश मिटायें। जिस दुःख का उपाय राम ने पूछा था, रानी उसे आज्ञा मान लेने से जोड़ती हैं। यह कहते समय वे बेधड़क बैठी हैं। उनके कटु वचनों को सुनकर मानो कठोरता भी व्याकुल हो उठती है। पिता का व्याकुल होना दिख रहा है, पर उनकी बात कहते हुए रानी का हृदय नहीं पिघलता।
अब तुलसी इस बोलने को धनुषविद्या का दृश्य बना देते हैं। जीभ धनुष है, अनेक वचन बाण हैं और राजा उस सामने रखे कोमल लक्ष्य के समान हैं, जिस पर वे बाण पड़ रहे हों। कठोरपन मानो किसी श्रेष्ठ वीर का शरीर धारण करके धनुष चलाना सीख रहा है। बात राम से कही जा रही है और उसकी चोट राजा पर पड़ती दिखाई देती है। इसी से यह उपमा संवाद की पीड़ा को पकड़ती है। रानी का एक एक वचन उनके सामने पड़े दुःखी पति को और बींधता है।
कैकेयी राम को सारा प्रसंग सुना देती हैं। भरत को राज्य मिलना है और राम को वन जाना है। इतना कहने के बाद वे मानो देह धारण की हुई निष्ठुरता की तरह बैठी रहती हैं। अब राम ने वह कारण सुन लिया है जिसके लिये पिता रात भर व्याकुल रहे और जिसे जानने के लिये उन्होंने माता से प्रश्न किया था। सामने पिता का दुःख बना हुआ है। इसी के बीच राम का उत्तर आरम्भ होगा, और उसके पहले तुलसी उनके मन की अवस्था स्वयं कह देते हैं।
राम पिता की दुर्दशा देखकर माता से दुःख दूर करने का उपाय पूछते हैं। कैकेयी दो वरदानों का प्रसंग सुनाकर पुत्रप्रेम और वचन के बीच राजा का संकट बताती हैं। उनकी माँग में भरत का राज्य और राम का वन जाना है। वे राम से आज्ञा मानकर पिता का क्लेश मिटाने को कहती हैं।
वन में अपना हित देखते राम
मन मुसुकाइ भानुकुल भानू । रामु सहज आनंद निधानू॥
चौपाई ४
बोले बचन बिगत सब दूषन । मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥
राम मन में मुसकराते हैं। तुलसी उन्हें सूर्यकुल का सूर्य और सहज आनन्द का भण्डार कहते हैं। उनकी प्रसन्नता का स्थान भी बता देते हैं, वह मन में है। इसके बाद मुख से निकलनेवाले वचन सभी दोषों से रहित, कोमल और सुन्दर हैं, मानो वाणी को ही भूषण मिल गये हों। कैकेयी की जीभ और वचनों का धनुष बाण रूप अभी सामने आया था। उसी वार्ता में राम की वाणी का यह दूसरा रूप आता है। उनके उत्तर में माता के लिये विनय और आज्ञा के प्रति अनुराग है।
वे जननी से कहते हैं कि भाग्यवान पुत्र वही है जिसे पिता और माता के वचनों से प्रेम हो। माता पिता को सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र संसार में दुर्लभ है। आज्ञा सुनने के साथ उनका ध्यान अपने कर्तव्य पर जाता है। जिस अवसर को दशरथ का हृदय सह नहीं पा रहा, उसी अवसर में राम अपने लिये माता पिता के वचन का पालन देखते हैं। वे इसे स्वीकार करते हुए अपने भाग्य की बात करते हैं। उनका उत्तर सीधे उस अनुराग से आरम्भ होता है जो माता पिता के कहे के प्रति है।
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
दोहा ४१
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥ ४१॥
वन का नाम लेते ही राम वहाँ मिलनेवाले मुनियों की बात कहते हैं। वहाँ विशेष रूप से मुनियों का मिलाप होगा और उसमें हर प्रकार से उनका हित है। उसके साथ पिताजी की आज्ञा भी है और जननी की सम्मति भी। इन बातों को वे एक साथ जोड़ते हैं। वन उनके सामने मुनियों के मिलने की जगह बनकर आता है, जहाँ जाना पिता की आज्ञा और माता की स्वीकृति के भीतर होगा। उनकी दृष्टि जिन बातों पर ठहर रही है, वे स्वयं उन्हें अपने हित की बातें कह रहे हैं।
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू । बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू॥
चौपाई ५
जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा । प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥
और भरत राज्य पायेंगे। राम भरत को प्राणप्रिय कहते हैं। भाई का राज्य पाना उनके सुख में शामिल है। मुनियों का संग, पिता की आज्ञा, माता की सम्मति और भरत का राज्य, इन सबको देखकर उन्हें लगता है कि विधाता आज हर प्रकार से अनुकूल हैं। वे माता के सामने अपनी सहमति का कारण पूरा रखते हैं। इतना अनुकूल अवसर पाकर भी यदि वे वन न जायँ तो मूर्खों के समाज में सबसे पहले उन्हीं की गिनती होनी चाहिये।
इस बात को दृढ़ करते हुए वे दो उपमाएँ देते हैं। कोई कल्पवृक्ष छोड़कर रेंड़ की सेवा करे, कोई अमृत त्यागकर विष माँग ले, तो ऐसे लोगों के विवेक का अनुमान हो जाता है। राम कहते हैं कि ऐसे लोग भी यह अवसर पाकर चूकेंगे नहीं। माता अपने मन में विचारकर देख लें। वे अपने सामने आये काम को इतना हितकारी मान रहे हैं कि उसे छोड़ना उस मूर्खता से भी आगे होगा। वन जाने के प्रति उनकी स्वीकृति इन स्पष्ट कारणों और उपमाओं में पूरी होकर आती है।
इस उत्तर में किसी बात को लेने से पहले दूसरी शर्त नहीं रखी जाती। राम पिता की आज्ञा के साथ जननी की सम्मति का आदर करते हैं, और प्रिय भाई के राज्य को भी उसी प्रसन्नता में स्थान देते हैं। कैकेयी ने जिन वरदानों के कारण राजा का संकट बताया था, राम उन्हीं के बीच अपना हित देख रहे हैं। उनका मन भीतर मुसकराता है और वाणी उसी सहमति को विस्तार से कहती है। फिर भी सामने पड़े पिता की व्याकुलता को लेकर उनका एक प्रश्न बचा हुआ है।
राम सहज आनन्द के साथ वन जाने को स्वीकार करते हैं। वे माता पिता की प्रसन्नता, वन में मुनियों के मिलाप और प्राणप्रिय भरत के राज्य पाने में अपना हित देखते हैं। ऐसा अवसर छोड़ देना उन्हें बड़ी मूर्खता लगता है।
एक दुःख जो राम को बना हुआ है
इतना सब कहने के बाद राम माता से अपना विशेष दुःख कहते हैं। महाराज को नितान्त व्याकुल देखकर उन्हें पीड़ा हो रही है। जिस वन जाने को वे अपने लिये हितकारी मानते हैं, उसके लिये पिता को इतना भारी दुःख हो, यह उन्हें विश्वास नहीं आता। उनके प्रश्न की माप इसी से बनती है। अपने लिये बात थोड़ी है और पिता का दुःख बहुत बड़ा दिखता है। इस अन्तर का कारण वे जानना चाहते हैं। वे वन की बात स्वीकार कर चुके हैं, अब उनके सामने व्याकुल पिता हैं।
राम कहते हैं कि राजा बड़े धीर हैं और गुणों के अगाध समुद्र हैं। ऐसे पिता उनसे कुछ कह क्यों नहीं रहे। क्या उनसे कोई बड़ा अपराध बन पड़ा है, जिसके कारण राजा मौन हैं। वे माता को अपनी शपथ देकर सच कहने को कहते हैं। इस प्रश्न में राम अपने लिये दोष की सम्भावना खोज रहे हैं। पिता की धीरता का उन्हें इतना विश्वास है कि उनका यह मौन और दुःख किसी बड़े कारण की ओर संकेत करता लगता है। वे उस कारण को जानकर उनकी पीड़ा दूर करना चाहते हैं।
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।
दोहा ४२
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान॥ ४२॥
राम के वचन स्वभाव से सीधे हैं। कैकेयी की कुमति उन्हें टेढ़ा करके जान रही है। तुलसी यहाँ जोंक का उदाहरण देते हैं। जल समान रहता है, पर जोंक उसमें टेढ़ी चाल चलती है। राम के सरल वचनों का रूप अपने आप नहीं बदला। उन्हें ग्रहण करनेवाली बुद्धि में कुटिलता है। इसी से सरल प्रश्न भी रानी को उसी ढंग से समझ आता है। राम अपनी पीड़ा और संदेह साफ कह रहे हैं, और कैकेयी उनके रुख को देखकर प्रसन्न हो उठती हैं।
वे कपट का स्नेह दिखाते हुए उत्तर देती हैं। राम की शपथ है और भरत की सौगन्ध, उन्हें राजा के दुःख का दूसरा कोई कारण ज्ञात नहीं। राम को तात कहती हैं और बताती हैं कि वे अपराध करने योग्य ही नहीं हैं। वे तो जननी, जनक और भाइयों को सुख देनेवाले हैं। उनके कहे को रानी पूरा सत्य कहती हैं, क्योंकि वे माता पिता के वचनों के पालन में लगे रहते हैं। राम के प्रश्न का उत्तर निर्दोष कहकर दिया जाता है और उसी उत्तर में उनकी आज्ञाकारिता फिर सामने रख दी जाती है।
अब कैकेयी उनसे पिता को समझाने का आग्रह करती हैं। वे बलिहारी जाने की बात कहती हैं और चाहती हैं कि राम ऐसी बात कहें जिससे राजा को बुढ़ापे में अपयश न हो। जिस पुण्य ने उन्हें राम जैसे पुत्र दिये हैं, उसका निरादर उचित नहीं। रानी की वाणी में अब पिता का यश और पुण्य है। उन्होंने पहले स्नेह और वचन का संकट बताया था। अब वे राम को ही उस संकट में राजा का सुयश बचानेवाला मानकर उनसे बोलने को कहती हैं।
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे । मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥
चौपाई ६
रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥
कवि इन शुभ वचनों और उन्हें कहनेवाले मुख के मेल को देखते हैं। कैकेयी के बुरे मुख में ये बातें वैसी लगती हैं जैसे मगध में गया आदि तीर्थ। शुभ बात का अपना स्वरूप वहाँ भी बना हुआ है। अगले ही चित्र में राम उन वचनों को ग्रहण करते हुए दिखते हैं। उन्हें माता की सभी बातें अच्छी लगती हैं, जैसे गंगा में पहुँचा हुआ जल सुहावना हो जाता है। दो उपमाएँ एक ही चौपाई में हैं, पहली कहनेवाली की ओर से और दूसरी सुननेवाले की ओर से।
राम को माता के वचन भाते हैं। उनमें पिता की आज्ञा और उनकी भलाई की बात है, और राम उसी को अपनाते हैं। रानी ने स्नेह का कपट दिखाया है, यह बात कवि बता चुके हैं। राम के सहज सरल होने की बात भी वही कवि कहते हैं। यहाँ इन दोनों की प्रकृति संवाद में बनी रहती है। माता के प्रति राम की स्वीकृति पूरी है, और पिता को सँभालने की चिन्ता भी पूरी। अब इसी बीच दशरथ की मूर्च्छा दूर होने लगती है।
राम का विशेष दुःख पिता की व्याकुलता है। वे अपना अपराध होने की आशंका से माता को शपथ देकर सत्य पूछते हैं। कैकेयी राम और भरत की सौगन्ध लेकर दूसरा कारण न होने की बात कहती हैं, और राम से पिता का सुयश बचाने को कहती हैं। राम को माता के वचन अच्छे लगते हैं।
खोयी मणि फिर हृदय में
दशरथ की मूर्च्छा जाती रहती है। वे राम का स्मरण करके करवट लेते हैं। सुमन्त्र श्रीराम के आने की बात कहते हैं और समय के अनुकूल विनय करते हैं। जिन राजा से कुछ पूछने में पहले मन्त्री डर रहे थे, उन्हीं को अब पुत्र के आगमन का समाचार देते हैं। राजा सुनते हैं कि राम पधारे हैं तो धीरज धरकर नेत्र खोलते हैं। सुमन्त्र उन्हें सँभालकर बैठाते हैं। उसी समय दशरथ देखते हैं कि राम उनके चरणों में प्रणाम कर रहे हैं।
लिए सनेह बिकल उर लाई । गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई॥
चौपाई ७
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥
राजा स्नेह से व्याकुल होकर राम को हृदय से लगा लेते हैं। तुलसी फिर मणि और साँप की उपमा पर लौटते हैं। पहले राजा मणि से रहित साँप जैसे दीन थे, अब मानो वही साँप अपनी खोयी मणि फिर पा गया है। दोनों चित्रों के बीच राम सामने आ गये हैं और पिता ने उन्हें बाँहों में भर लिया है। राजा उन्हें देखते ही रह जाते हैं। नेत्रों से आँसुओं की धारा बहने लगती है। पुत्र को पाकर उनके प्रेम को देखने और आलिंगन में अपनी अभिव्यक्ति मिलती है।
शोक इतना अधिक है कि राजा कुछ कह नहीं पाते। वे बार बार राम को हृदय से लगाते हैं। उनके पास पिता की बाँहें हैं, आँसू हैं और सामने पुत्र का मुख है। वाणी अभी उनका साथ नहीं दे रही। मन में वे ब्रह्मा को मनाते हैं कि कोई ऐसा उपाय हो जिससे रघुनाथ वन न जायँ। रात में उन्होंने भोर रुक जाने की कामना की थी। अब भोर हो चुकी है और राम उनके निकट हैं, इसलिये प्रार्थना सीधे राम के वन जाने को रोकने की है।
इस मौन को केवल अनकहा दुःख मानकर छोड़ देने पर राजा की इच्छा अधूरी रह जायेगी। वे भीतर एक निश्चित बात चाहते हैं, राम यहीं रहें। यही इच्छा आगे महादेव से की गयी विस्तृत विनती का रूप लेती है। राम को बार बार हृदय से लगाते हुए राजा बाहर बोल नहीं रहे। देवताओं को सम्बोधित जो शब्द आगे आते हैं, वे इसी भीतरी पुकार का विस्तार हैं। सामने पिता और पुत्र का आलिंगन है, उसके भीतर प्रार्थना चल रही है।
मूर्च्छा दूर होने पर दशरथ राम का आगमन सुनते हैं। सुमन्त्र उन्हें बैठाते हैं और वे प्रणाम करते पुत्र को हृदय से लगा लेते हैं। आँसू बहते हैं, वाणी रुकती है। राजा मन में ब्रह्मा से राम का वन जाना टालने की प्रार्थना करते हैं।
राजा की प्रार्थना जो मुख से नहीं निकलती
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी । बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥
चौपाई ८
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी । आरति हरहु दीन जनु जानी॥
दशरथ महादेव का स्मरण करते हैं और निहोरा करके अपनी विनती सुनने को कहते हैं। सदाशिव शीघ्र प्रसन्न होनेवाले हैं, माँगा हुआ दे डालनेवाले दानी हैं। राजा उन्हीं से अपने को दीन सेवक जानकर दुःख हरने का आग्रह करते हैं। प्रार्थना का आरम्भ अपनी असहायता से होता है। उनके हृदय में राम के बिछोह का भय है, और वे उस दुःख को दूर कर देने के लिये शिव की दयालुता तथा उदारता का आश्रय लेते हैं।
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
दोहा ४४
बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु॥ ४४॥
फिर वे अपनी इच्छा पूरी खोल देते हैं। शिव सबके हृदय में प्रेरक रूप से हैं, इसलिये राम को ऐसी बुद्धि दें कि वे पिता का वचन त्यागकर घर ही में रह जायँ। शील और स्नेह भी छोड़ दें। राजा को इस समय पुत्र का वचनपालन उन्हें वन ले जाता दिखाई दे रहा है। वे उसी आज्ञाकारी मन में दूसरी प्रेरणा चाह रहे हैं। जिस शील और प्रेम से पुत्र पिता के कहे को सिर पर रखेगा, दशरथ मन में उसी को छोड़ देने की प्रार्थना कर रहे हैं।
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ॥
चौपाई ९
सब दुख दुसह सहावहु मोही । लोचन ओट रामु जनि होंही॥
इस माँग का जो मूल्य हो, राजा अपने लिये स्वीकार करते हैं। संसार में अपयश हो जाये, सुयश नष्ट हो जाये। नरक में गिरना पड़े तो वह भी हो, और स्वर्ग हाथ से चला जाये तो वह भी। सब प्रकार के असह्य दुःख उनसे सहन करा लिये जायँ, पर राम आँखों की ओट न हों। यश, स्वर्ग और दुःख से मुक्ति, इन सबका अपना स्थान वे जानते हैं। पुत्र को दृष्टि से दूर जाने देने के सामने वे इन सबको खोने और विपत्ति उठाने को तैयार हैं।
कैकेयी ने कुछ ही पहले राम से कहा था कि पिता का बुढ़ापे में अपयश न होने दें। पिता अपने मन में उसी अपयश को स्वीकार कर रहे हैं। उनकी इच्छा का केन्द्र इतना निकट है, राम आँखों के सामने बने रहें। वे शिव से अपने लिये मान प्रतिष्ठा बचाने की कोई शर्त नहीं रखते। पुत्र के बने रहने पर सारे दुःख अपने ऊपर ले लेने की विनती करते हैं। ब्रह्मा से आरम्भ हुई मन की पुकार यहाँ अपना पूरा आशय और उसका स्वीकार किया हुआ मूल्य कह देती है।
ये बातें राजा मन ही मन विचार रहे हैं। वे बोले नहीं हैं। तुलसी इस बात को स्पष्ट करके उनके मन को पीपल के पत्ते की तरह डोलता हुआ दिखाते हैं। बाहर राम को लगाया जाता आलिंगन है और भीतर यह काँपता विचार है। पुत्र से वचन तोड़ने को कह देने का कोई बोला हुआ संवाद यहाँ नहीं होता। राजा का मन देवताओं के सामने यह निहोरा कर रहा है, और राम पिता को प्रेम के वश देख रहे हैं।
दशरथ मन में शिव से प्रार्थना करते हैं कि राम को पिता का वचन, शील और स्नेह छोड़कर घर रहने की बुद्धि दें। वे अपयश, सुयश का नाश, नरक, स्वर्ग की हानि और सभी असह्य दुःख स्वीकार करते हैं, यदि राम आँखों से ओझल न हों। राजा इनमें से कोई बात मुख से नहीं कहते।
प्रसन्न हृदय से आज्ञा दीजिये
राम पिता को प्रेम के वश जानते हैं। उन्हें अनुमान होता है कि माता फिर कुछ कहेंगी। पोद्दारजी की टीका यहाँ यह बात खोलती है कि माता के फिर बोलने से पिताजी को दुःख होगा। राम देश, काल और अवसर का विचार करके विनीत वचन कहते हैं। उनके सामने पिता की व्याकुलता है और उनके शब्द उसी समय के अनुकूल हैं। अब तक उन्होंने कैकेयी से कारण पूछा और अपना निर्णय कहा था। इस बार वे सीधे पिता से बोलते हैं।
पहले वे अपने बोलने के लिये क्षमा माँगते हैं। हे तात, हम कुछ कहने का साहस करते हैं, इस अनुचित ढिठाई को बालपन जानकर क्षमा कीजिये। आज्ञा माँगने से पहले उनकी वाणी में यह संकोच आता है। पिता अपने प्रेम से इतने व्याकुल हैं कि पुत्र का कहना भी उनके सामने विनय की तरह रखा जाता है। राम अपने कथन को आगे बढ़ाने से पहले पिता को आदर देते हैं और अपने बाल्य का स्मरण कराकर क्षमा का स्थान माँगते हैं।
फिर वे कहते हैं कि इस अत्यन्त छोटी बात के लिये पिताजी ने इतना दुःख पाया। किसी ने उन्हें पहले बताकर यह बात जनायी ही नहीं। स्वामी को इस दशा में देखकर उन्होंने माता से पूछा था। माता से पूरा प्रसंग सुनने पर उनके अंग शीतल हो गये। पोद्दारजी इस शीतलता का अर्थ बड़ी प्रसन्नता होना बताते हैं। राम पिता को अपनी अवस्था स्पष्ट कह रहे हैं। जिस बात पर दशरथ इतना व्याकुल हैं, उसे सुनने से पुत्र के शरीर तक में सुख की शीतलता आयी है।
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
दोहा ४५
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥ ४५॥
हे पिताजी, इस मंगल समय में स्नेह के वश होकर सोच करना छोड़ दीजिये। हृदय में हर्षित होकर आज्ञा दीजिये। राम की विनती का रूप यही है। वे पिता से अनुमति के साथ प्रसन्नता भी चाहते हैं। कहते हुए उनका पूरा शरीर पुलकित हो जाता है। मन की मुसकान से आरम्भ हुई उनकी स्वीकृति अब पिता के सामने कही गयी विनती और शरीर के रोमांच तक आती है। कथा की इस घड़ी में वन जाना उनके लिये स्वीकार किया हुआ मंगल है।
राम आज्ञा माँग रहे हैं। पिता की अनुमति मिलना और राम का यहाँ से चल देना अभी नहीं होता। हमारे सामने वही व्याकुल दशरथ हैं और उनके सामने प्रसन्न हृदय अनुमति की विनती करते राम। पिता के भीतर पुत्र को सामने बनाये रखने की इच्छा काँप रही है। पुत्र अपने अंगों की शीतलता कह चुका है और आज्ञा माँगते हुए पुलकित है। उसी अनुरोध पर यह प्रसंग ठहरता है।
राम अवसर देखकर पिता से विनय करते हैं, अपनी बात को बालपन जानकर क्षमा माँगते हैं और वनवास सुनकर हुई प्रसन्नता बताते हैं। वे पिता से सोच छोड़कर हर्षित हृदय आज्ञा देने को कहते हैं। उनका शरीर पुलकित होता है। यहाँ आज्ञा माँगी गयी है, प्रस्थान नहीं हुआ है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस सुबह को पढ़ते हुए हम राम की प्रसन्नता और उनकी करुणा को साथ देखते हैं। वन में मुनियों के मिलने और भरत के राज्य पाने पर वे अपना अनुकूल भाग्य कहते हैं। पिता को इतना व्याकुल देखकर वे विशेष दुःख भी कहते हैं। दोनों बातों का अपना विषय है और राम दोनों को स्पष्ट रखते हैं। उनका सहज आनन्द पिता की पीड़ा को देखने से उन्हें रोकता नहीं। इसी से वे पहले कारण पूछते हैं और अन्त में पिता से सोच छोड़ने की विनती करते हैं।
दशरथ के लिये सामने बने हुए राम ही उनकी प्रार्थना की सबसे बड़ी माँग हैं। राजा को पहले मणिहीन साँप की तरह दीन दिखाया गया था। पुत्र को हृदय से लगाते ही वही उपमा लौटती है, मानो खोयी मणि मिल गयी हो। पर मिलने का यह सुख बिछोह की आशंका को मिटा नहीं देता। इसी आलिंगन में आँसू हैं और मन के भीतर घर रहने की प्रार्थना है। तुलसी पिता के प्रेम को इन दोनों दशाओं में पूरा दिखाते हैं।
भोर रोकने की कामना से आरम्भ हुई रात अब पुत्र के सामने विनती तक पहुँच गयी है। दशरथ के मन में है कि राम आँखों की ओट न हों। राम के मुख पर है कि पिता प्रसन्न होकर आज्ञा दें। राजा का उत्तर अभी नहीं आया है। राम अनुरोध करते हुए सर्वांग पुलकित हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ३७ से ४५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।