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कैकेयी के दो वरदान

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · कैकेयी के दो वरदान

कैकेयी के दो वरदान

अयोध्या राम के युवराज होने का उत्सव सजा रही है। कोपभवन में कैकेयी दो वरदान माँगती हैं, और दशरथ का खिला हुआ मनोरथ उजड़ जाता है।

अयोध्या के राजद्वार पर भीड़ है। कोई भीतर जा रहा है, कोई बाहर निकल रहा है, और नगर के स्त्री पुरुष शुभ मंगलाचार की तैयारी में लगे हैं। राम के बचपन के साथी भी समाचार सुनकर मिलने आते हैं। उनके लिये यह आनन्द अपने प्रिय सखा के शील और स्नेह को फिर अनुभव करने का अवसर बन गया है। उसी नगर में कैकेयी अपने आभूषण उतारकर कोपभवन में पड़ी हैं। बाहर चल रहे उत्सव को अभी इस भीतर की कुचाल का कुछ पता नहीं है।

तुलसीदास के रामचरितमानस में यह प्रसंग मन्थरा का आदर करती हुई कैकेयी से खुलता है और दशरथ के भीतर उठते हुए विलाप पर ठहरता है। बीच में राजा बार बार प्रेम से बोलते हैं, अधिकार और सामर्थ्य का भरोसा दिलाते हैं, राम की सौगन्ध लेते हैं और अपने कुल की सत्यनिष्ठा सामने रखते हैं। कैकेयी इन्हीं आश्वासनों को दृढ़ कराकर अपनी माँग कहती हैं। उस माँग का पहला नाम भरत है। दूसरे में राम हैं, तपस्वी का वेष है और वन में रहने के पूरे चौदह वर्ष हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • कैकेयी मन्थरा की सीख मानकर कोपभवन में जानेवाली रानी, जो दो धरोहर रखे वरदान माँगती हैं।
  • दशरथ आनन्द से कैकेयी के महल में आनेवाले राजा, जिनके वचन और राम के प्रति प्रेम पर एक साथ आघात होता है।
  • मन्थरा वह दासी जिसकी बुद्धि का कैकेयी बखान करती हैं और जिसके सिखाये छल को राजा नहीं पहचान पाते।
  • राम जिनके युवराज होने के समाचार से नगर हर्षित है और जिनके लिये कैकेयी वनवास माँगती हैं।
  • भरत जिनके राजतिलक की माँग कैकेयी अपने पहले वरदान में रखती हैं।
  • राम के बालसखा प्रेम से मिलने और कुशल पूछे जाने के बाद प्रत्येक जन्म में सीतापति की सेवा का नाता माँगनेवाले साथी।

मन्थरा का आदर, और कोपभवन की ओर

कैकेयी ने कुबरी को प्राणों के समान प्रिय जान लिया है। वे बार बार उनकी बड़ी बुद्धि की प्रशंसा करती हैं। संसार में ऐसा हितकारी दूसरा कोई नहीं, यही उनका भाव है। अपने को वे बहती हुई मानती हैं और मन्थरा को उस बहाव में मिला सहारा। यह विश्वास अब उनके व्यवहार का आधार बन चुका है। जिस सलाह से विपत्ति उठनेवाली है, उसी सलाह देनेवाली को रानी अपना जीवन सँभालनेवाला सहारा कह रही हैं।

जौं बिधि पुरब मनोरथु काली । करौं तोहि चख पूतरि आली॥
बहुबिधि चेरिहि आदरु देई । कोपभवन गवनी कैकेई॥

चौपाई १

रानी की प्रसन्नता आगे का आश्वासन भी बाँध देती है। यदि विधाता कल उनका मनोरथ पूरा कर दें तो वे अपनी इस सखी को आँखों की पुतली की तरह रखेंगी। आँख की पुतली से बढ़कर सहेजने योग्य क्या होगा। मन्थरा को बहुत प्रकार से आदर दिया जाता है, और इसके बाद कैकेयी स्वयं कोपभवन में चली जाती हैं। उनकी चाल का यह आवश्यक मोड़ है। जो बात अभी दासी की बुद्धि का बखान थी, वह अब रानी के अपने उठकर जाने और रूठने का रूप ले चुकी है।

बिपति बीजु बरषा रितु चेरी । भुइँ भइ कुमति कैकई केरी॥
पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा॥

चौपाई २

तुलसी यहाँ उगते हुए पौधे का पूरा रूपक रखते हैं। विपत्ति उसका बीज है। दासी वर्षा ऋतु है, जिसके आने पर बीज को बढ़ने का अवसर मिलता है। कैकेयी की कुबुद्धि वह भूमि बन गयी है जिसमें वह बीज ठहर सके। कपट का जल पाकर अंकुर निकल आता है। उस अंकुर में जो दो पत्ते खुलते हैं, वे दो वरदान हैं। अन्त में इस पौधे पर दुःख का फल लगना है। बीज से फल तक कोई कड़ी छोड़ी नहीं गयी: अवसर, भूमि, सींचना, उगना, पत्ते और परिणाम, सभी सामने हैं।

दोनों वर अभी माँगे भी नहीं गये हैं और कवि उन्हें दुःख देनेवाले पौधे के पत्तों में दिखा चुके हैं। रानी को अपने मनोरथ की पूर्ति दिख रही है। कविता उसी बढ़ते मनोरथ में विपत्ति का विकास दिखाती है। इसीलिये मन्थरा के लिये वर्षा ऋतु और रानी की बुद्धि के लिये भूमि का चुनाव इतना तीखा पड़ता है। जिस सहारे का रानी ने अभी आभार माना था, उसके मिलते ही भीतर की बुरी मति को फलने का अवसर मिल गया। आगे की बातचीत इसी उगे हुए अंकुर को और बढ़ायेगी।

कैकेयी कोप का पूरा साज सजकर जा लेटती हैं। तुलसी का निर्णय कठोर है: राज्य करती हुई रानी अपनी ही कुमति से बिगड़ गयीं। इतना अधिकार और सुख पास होने पर भी उस बुद्धि ने अनिष्ट की दिशा पकड़ ली। राजमहल और नगर में उस समय कोलाहल है, उत्सव की चहल पहल है। किसी को इस कुचाल का कुछ ज्ञान नहीं। कवि पहले भीतर का रहस्य बता देते हैं, फिर बाहर का उल्लास दिखाते हैं, इसलिए हर मंगल तैयारी के साथ हमें छिपे संकट की याद बनी रहती है।

प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार।
एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार॥ २३॥

दोहा २३

नगर के सभी स्त्री पुरुष प्रमुदित हैं। शुभ मंगलाचार सज रहे हैं और राजद्वार पर आने जानेवालों की इतनी भीड़ है कि दृश्य लगातार चलता हुआ लगता है। एक भीतर प्रवेश करता है, दूसरा निकलता है। रानी का कोप भी इसी समय का है। बाहर की तैयारी और भीतर का निर्णय अभी एक दूसरे से मिले नहीं हैं। इसी अज्ञान में नगर का आनन्द पूरा बना हुआ है। लोग जिस सुख को सजाने में लगे हैं, उसके सामने उठे हुए अवरोध से अभी अपरिचित हैं।

कैकेयी मन्थरा को प्राणप्रिय सहारा मानती हैं, मनोरथ पूरा होने पर आँखों की पुतली जैसा रखने का आश्वासन देती हैं और कोपभवन में चली जाती हैं। तुलसी विपत्ति के बीज से दुःख के फल तक पूरा रूपक रखते हैं। नगर और राजमहल उत्सव में व्यस्त हैं, इस कुचाल की किसी को खबर नहीं है।

बालसखाओं की वह अभिलाषा

राजतिलक का समाचार राम के बालसखाओं तक पहुँचता है तो उनके हृदय हर्ष से भर उठते हैं। पाँच दस साथी मिलकर राम के पास जाते हैं। इस छोटे से दृश्य में मिलनेवालों की पहचान बालसखा होना है, और राम उनके भीतर के प्रेम को पहचानते हैं। उनके आने का उत्तर आदर से मिलता है। कोमल वाणी में कुशल क्षेम पूछा जाता है। युवराज पद का समाचार जिस व्यक्ति के लिये आया है, उनके पास पहुँचकर साथियों को उसी निभे हुए स्नेह का अनुभव होता है जिसकी वे लौटते समय चर्चा करेंगे।

बाल सखा सुनि हियँ हरषाहीं । मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं॥
प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी॥

चौपाई ३

मिलना पूरा होने पर वे अपने प्रिय सखा की आज्ञा लेकर घर लौटते हैं। रास्ते में एक दूसरे से राम की बड़ाई करते हैं। प्रशंसा का विषय उनका आनेवाला पद नहीं है। वे शील और स्नेह निभाने की बात करते हैं: संसार में रघुवीर के समान इन्हें निभानेवाला कौन है। अभी मिले आदर और मृदु वाणी से इस प्रश्न का स्वाद समझ में आता है। जो प्रेम लेकर आये थे, वह पहचाना गया; जिनकी कुशल पूछी गयी, वे उसी व्यवहार को अपने घर तक ले जा रहे हैं।

जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं । तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं॥
सेवक हम स्वामी सियनाहू । होउ नात यह ओर निबाहू॥

चौपाई ४

उनकी अभिलाषा इस एक भेंट से बहुत आगे जाती है। कर्म के वश में घूमते हुए जिस जिस योनि में जन्म मिले, ईश्वर हर जगह यह दें कि हम सेवक हों और सीतापति हमारे स्वामी हों। यहाँ स्वामी का नाम सीता के नाथ के रूप में आया है। मित्रों की प्रार्थना में सेवा का नाता है और उस नाते के अन्त तक निभ जाने की इच्छा है। जन्म का रूप बदल सकता है, कर्म का भ्रमण चलता रह सकता है, पर सम्बन्ध बना रहे। वे अपने लिये इसी निरन्तरता की याचना करते हैं।

पहले उन्होंने राम के स्नेह निभाने की प्रशंसा की, फिर उसी निभाव को प्रत्येक जन्म के लिये माँगा। इस तरह उनके लौटने का वार्तालाप अपने अनुभव से प्रार्थना तक पहुँचता है। वे जिस प्रिय के पास से आ रहे हैं, उनसे सम्बन्ध का अन्त नहीं चाहते। नगर भर की अभिलाषा भी तुलसी ऐसी ही बताते हैं। थोड़े से बालसखाओं के मुख से जो निकला, वह पूरे नगर के मन का परिचय बन गया। उत्सव के बीच यह स्नेह है जिसे आगे आनेवाली माँग चोट पहुँचानेवाली है।

इसी के साथ कैकेयी के हृदय का बड़ा दाह रखा जाता है। नगर की चाह और रानी की जलन एक ही चौपाई में पास पास आ जाते हैं। कवि कुसंगति पर चेतावनी देते हैं: उसके मिलने पर कौन नष्ट होने से बचता है; नीच मत का अनुसरण करने पर चतुराई भी बनी नहीं रहती। यह निर्णय उसी मन्थरा की सीख और कैकेयी के व्यवहार की ओर लौटता है जिसे अभी हमने देखा। बुद्धि का बखान करते हुए रानी जिस राह चली थीं, तुलसी उसी पर बुद्धि के नष्ट होने का संकेत रखते हैं।

राम बालसखाओं का प्रेम पहचानकर आदर करते हैं और कोमल वाणी से कुशल पूछते हैं। साथी लौटते हुए उनके शील और स्नेह निभाने की प्रशंसा करते हैं तथा हर जन्म में सीतापति की सेवा का नाता माँगते हैं। नगर की इस अभिलाषा के बीच कैकेयी का हृदय जल रहा है और कवि कुसंगति के परिणाम पर चेताते हैं।

सन्ध्या को स्नेह निष्ठुरता के पास आया

साँझ समय सानंद नृपु गयउ कैकई गेहँ।
गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ॥ २४॥

दोहा २४

साँझ के समय राजा आनन्द से कैकेयी के महल में जाते हैं। अभी उनके आने में प्रसन्नता है। तुलसी इस यात्रा को दो भावों के मिलने का रूप देते हैं: मानो स्नेह ने शरीर धारण किया और निष्ठुरता के निकट चला आया। नगर में चलती हुई तैयारी के बाद यह संध्या की भेंट है। राजा के मन में जो है और रानी के भीतर जो है, दोनों का अन्तर इसी दोहे में खुल गया। आनेवाले को उस अन्तर का भान होने में अभी देर है।

कोपभवन का नाम सुनते ही दशरथ सहम जाते हैं। भय से आगे पाँव नहीं पड़ता। तुलसी उसी क्षण उनकी सामर्थ्य याद दिलाते हैं। देवराज इन्द्र जिनके बाहुबल के भरोसे रहते हैं और सारे राजा जिनका रुख देखते हैं, उन्हीं दशरथ की गति यहाँ रुक गयी है। दूसरों के लिये उनका बल भरोसा है, और अपनी प्रिया का क्रोध सुनकर वे स्वयं सूख गये हैं। कोपभवन का समाचार सुनने भर से राजा की दशा बदल गयी है।

कवि इसे कामदेव के प्रताप के रूप में देखते हैं। जो अपने अंगों पर त्रिशूल, वज्र और तलवार की चोट सहनेवाले हैं, वे रतिनाथ के फूलों के बाण से मारे गये। कठोर आयुधों के नाम गिनाने के बाद पुष्पबाण आता है, इसलिए राजा का यह भय और स्पष्ट होता है। जिस शक्ति से दूसरे डरते हैं, वह अभी उनके काम नहीं आ रही। प्रिया की अप्रसन्नता उन्हें इतनी भारी लगी है कि निकट जाना भी डरते डरते हो रहा है।

पास पहुँचकर कैकेयी की दशा देखी तो राजा को दारुण दुःख हुआ। रानी भूमि पर पड़ी हैं। पुराना मोटा कपड़ा पहन रखा है और शरीर के अनेक आभूषण उतारकर फेंक दिये हैं। कोप का जो साज पहले बताया गया था, उसकी वस्तुएँ अब एक एक करके दिखाई देती हैं। तुलसी इस कुवेष को उनकी कुमति के अनुरूप कहते हैं और उसमें भावी विधवापन की सूचना देखते हैं। वह कवि का आगे की ओर करता हुआ भयावह संकेत है। राजा सामने की इस दशा से ही व्यथित हो गये हैं।

दशरथ और पास जाकर कोमल वाणी में कारण पूछते हैं। प्राणप्रिय रानी किस बात पर रूठी हैं। पूछते हुए हाथ से छूते हैं तो कैकेयी उनका हाथ हटा देती हैं। इस हावभाव के दो अर्थ एक ही समय में उपस्थित हो जाते हैं। कवि उसमें काटने को तैयार क्रोध देखते हैं। राजा, होनहार के वश होकर, उसे प्रेम की क्रीड़ा समझ रहे हैं। जिस संकेत से संकट पहचाना जा सकता था, वही उनके लिये रूठी हुई प्रिया का विलास बन गया।

केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।
मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥
दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।
तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥

छन्द, सोरठा २५ के पूर्व

छन्द में कैकेयी क्रोधभरी नागिन की तरह विषम दृष्टि से देखती हैं। दोनों वासनाएँ उसकी दो जीभें हैं और दो वरदान उसके दाँत हैं। वह मर्म का स्थान देख रही है, जहाँ काटने से चोट सबसे गहरी लगे। पहले इन्हीं दो वरों को उगे हुए पौधे के दो पत्ते कहा गया था। अब वही दो संख्या विषदन्तों में लौटती है। अंकुर का बढ़ना भीतर चल रही तैयारी दिखाता था; नागिन का मर्म देखना राजा पर पड़नेवाला आघात दिखाता है।

राजा बार बार सम्बोधन बदलते हैं और फिर वही कारण पूछते हैं। सुन्दर मुखवाली, सुन्दर नेत्रोंवाली, कोयल जैसे बोल बोलनेवाली, हाथी जैसी चालवाली प्रिया, अपने क्रोध का कारण सुनाइये। उनकी दृष्टि अभी रानी के सौन्दर्य और प्रियता से बँधी है। हाथ हटाये जाने और कठोर दृष्टि के बाद भी उनके शब्दों में वही कोमलता बनी हुई है। कैकेयी के मन की दो माँगें अभी बाहर नहीं आयीं, इसलिए राजा अपनी ही समझ के सहारे मनुहार बढ़ाते जाते हैं।

बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि।
कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥ २५॥

सोरठा २५

सन्ध्या को आनन्द से आये दशरथ कोपभवन का नाम सुनकर डर जाते हैं। भूमि पर पुराने मोटे कपड़े में पड़ी और आभूषण फेंक चुकी कैकेयी को देखकर वे व्यथित होते हैं। रानी हाथ हटा देती हैं और क्रोध से देखती हैं; कवि इसे विषदन्तोंवाली नागिन का मर्म ढूँढ़ना कहते हैं, जबकि राजा इसे प्रेम की क्रीड़ा समझकर बार बार मनाते हैं।

मनचाही बात माँग लीजिये

रानी कुछ बताती नहीं हैं, इसलिए दशरथ सम्भावित कारणों के पीछे चलते हैं। किसने उनका अनिष्ट किया है। किसके दो सिर हैं कि ऐसा साहस करे, यम किसे ले जाना चाहते हैं। इस प्रश्न में राजा का दण्ड देने का अधिकार बोल रहा है। वे मान रहे हैं कि प्रिया को किसी ने दुःख पहुँचाया होगा और उस अपराधी को दण्ड देकर उनका रोष दूर किया जा सकता है। पहले अपराधी का नाम माँगा जाता है, फिर सहायता के दूसरे रूप गिनाये जाते हैं।

किस निर्धन को राजा बना दें और किस राजा को देश से निकाल दें, इतना भर रानी कह दें। दोनों प्रस्ताव सामने हैं। उनके एक कहने पर किसी का पद उठ सकता है और किसी का राज्य में रहना समाप्त हो सकता है। दशरथ का आश्वासन आगे और बढ़ता है: कैकेयी का शत्रु अमर भी हो तो वे उसे मार सकते हैं। राजा अपनी वाणी में साधारण स्त्री पुरुषों को कीड़े मकोड़ों जैसा तुच्छ कहकर अपनी सामर्थ्य जताते हैं। इतनी बड़ी शक्ति का पूरा भरोसा वे रानी के सामने रख देना चाहते हैं।

इसके बाद उनका स्वर फिर निजी प्रेम पर लौट आता है। रानी उनका स्वभाव जानती हैं। उनका मन कैकेयी के मुखरूपी चन्द्रमा का चकोर है। अभी राजा अपने बाहुबल से लेकर राजपद देने और देश से निकालने तक की बात कर रहे थे। अब उसी वक्ता का मन एक मुख को देखता रहनेवाला पक्षी हो गया है। यह चित्र बताता है कि वे रानी के रूठने से इतने व्याकुल क्यों हैं। प्रिय मुख का प्रसन्न होना उनकी सारी मनुहार का केन्द्र है।

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें । परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥
जौं कछु कहौं कपटु करि तोही । भामिनि राम सपथ सत मोही॥

चौपाई ५

दशरथ फिर अपने समर्पण का पूरा विस्तार कहते हैं। प्रजा, परिजन, सम्पत्ति, पुत्र और प्राण, सब कैकेयी के वश में हैं। यहाँ किसी एक उपहार का वचन नहीं है। राजा अपने जीवन और अपने अधिकार के भीतर की सारी वस्तुएँ गिना देते हैं। पुत्र भी उसी सूची में हैं और अन्त तक पहुँचते हुए प्राण भी। अभी उन्हें मालूम नहीं है कि इसी कथन के भीतर उनके सामने आनेवाली माँग के लिये कितनी जगह बन गयी है। वे रानी को अपने विश्वास की पूर्णता समझा रहे हैं।

और यदि इन बातों में कुछ कपट हो, तो उन्हें सौ बार राम की सौगन्ध है। यह सौ संख्या उसी शपथ की तीव्रता है। जिस राम के युवराज होने से नगर हर्षित है, उन्हीं का नाम राजा अपने प्रेम को सत्य प्रमाणित करने के लिये लेते हैं। कैकेयी की प्रतिक्रिया इसी नाम को सुनकर बदलेगी। दशरथ के लिये इससे बढ़कर अपने हृदय की सच्चाई जताना कठिन है, और रानी इसी बड़ी सौगन्ध को मन में तौल रही हैं।

राजा चाहते हैं कि वे हँसकर मनभावन बात माँगें। अपने मनोहर अंगों पर आभूषण सजायें। समय और असमय का विचार करें, घड़ी कैसी है यह हृदय में देखें, और जल्दी इस कुवेष को छोड़ दें। उनका आग्रह बाहर के मंगल समय से भी जुड़ा है। रानी की इच्छा सुन लेना, उनका हँस देना और उनका फिर सज जाना, दशरथ को इस रूठने से निकलने का रास्ता लगता है। वे अनुरोध करते हैं कि प्रिया अब प्रसन्न होकर बोलें।

यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।
भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद॥ २६॥

दोहा २६

बड़ी सौगन्ध पर मन में विचार करके कैकेयी हँसती हुई उठती हैं और गहने पहनने लगती हैं। राजा ने सजने को कहा था, सो वही होता दिखाई देता है। पर तुलसी उस सजने की दूसरी छवि देते हैं: मानो भीलनी मृग को देखकर फंदा तैयार कर रही हो। यह उपमा इस विशेष छल की आखेट से तुलना है। रानी का उठना और अलंकार धारण करना फंदे की तैयारी बन जाता है, क्योंकि उससे पहले वे राम की शपथ को मन में परख चुकी हैं।

कवि इस दोहे में उन्हें मन्दबुद्धि कहते हैं। आरम्भ में कैकेयी ने दासी की बड़ी बुद्धि का बखान किया था; यहाँ उनके अपने निर्णय पर यह कठोर नाम रखा गया है। मुसकान लौट आयी है, आभूषण भी लौट रहे हैं, पर मन में चली आ रही माँग अपनी जगह है। रानी का बदला हुआ बाहरी व्यवहार देखकर दशरथ आगे प्रेम से बोलेंगे। जिस बात को वे मान मिटना समझ रहे हैं, उसके भीतर अपने कथन को पक्का कर देने का अवसर कैकेयी पा चुकी हैं।

दशरथ अनिष्ट करनेवाले को दण्ड देने, निर्धन को राजा बनाने, राजा को देश से निकालने और अमर शत्रु को भी मारने का आश्वासन देते हैं। प्रजा, परिवार, सम्पत्ति, पुत्र और प्राण रानी के अधीन कहते हैं और कपट होने पर सौ बार राम की शपथ लेते हैं। उस बड़ी सौगन्ध को मन में विचारकर कैकेयी हँसती हुई उठती हैं और आभूषण पहनने लगती हैं।

राम का समाचार, और हँसी में छिपी पीड़ा

दशरथ कैकेयी को अपने हृदय में सुहृद समझकर फिर बोलते हैं। प्रेम से उनका शरीर पुलकित है और वाणी कोमल तथा सुन्दर है। वे कहते हैं कि रानी के मन की बात हो गयी है; नगर के घर घर में आनन्द के बधावे हो रहे हैं। राजा उस प्रसन्न समाचार को रानी का भी मनोरथ मानते हैं। अभी तक जो कुछ हो चुका है, उससे उनका यह विश्वास टूटा नहीं है कि राम के युवराज होने में प्रिया को सुख मिलेगा।

फिर वे साफ कहते हैं कि कल राम को युवराज पद देंगे, इसलिए सुन्दर नेत्रोंवाली रानी मंगल का साज सजायें। कैकेयी अभी आभूषण पहनने लगी थीं। राजा अब उन्हीं से उत्सव की तैयारी में लगने को कह रहे हैं। इसी वाक्य को सुनकर उनका कठोर हृदय दलक उठता है। तुलसी इसकी पीड़ा को पके हुए बालतोड़ के छू जाने जैसा कहते हैं। जिस समाचार को राजा सुख की पूर्ति समझाकर सुना रहे हैं, वह रानी के भीतर दुखते स्थान को छू गया है।

कैकेयी इतनी पीड़ा भी हँसकर छिपा लेती हैं। इसके लिये कवि चोर की स्त्री की उपमा देते हैं, जो अपना भेद खुल जाने के डर से प्रकट होकर नहीं रोती। उपमा का ध्यान छिपाये जा रहे दुःख पर है। हँसी देखकर राजा उस भीतर की पीड़ा तक नहीं पहुँचते। रानी को अपना उद्देश्य छिपाये रखना है और उनके सामने उसी उद्देश्य के विरुद्ध समाचार प्रेम से कहा जा रहा है। वे उसका आघात सहकर भी मुसकान बनाये रखती हैं।

राजा इस कपट चतुराई को पहचान नहीं रहे। रानी को करोड़ों कुटिलों की शिरोमणि गुरु ने पढ़ाया है, ऐसा तुलसी कहते हैं; पोद्दार की टीका इस गुरु को मन्थरा के नाम से पहचानती है। वही दासी, जिसकी बुद्धि का आरम्भ में बखान हुआ था, अब इस छिपाव की शिक्षा देनेवाली बनकर याद आती है। यहाँ उसका नया संवाद नहीं होता। उसकी सीख का प्रभाव कैकेयी की हँसी और छिपी हुई पीड़ा के बीच दिखाई देता है।

दशरथ नीति में निपुण हैं, फिर भी यह छल उनसे छिपा रहता है। कवि इस प्रसंग में स्त्रीचरित्र के लिये अथाह समुद्र का व्यापक और कठोर रूपक रखते हैं। सामने का दृश्य उस तुलना को कैकेयी के विशेष आचरण में दिखाता है: वे ऊपर का स्नेह और बढ़ाती हैं, नेत्र और मुख मोड़ती हैं, हँसती हैं और बोलने लगती हैं। राजा के हृदय का विश्वास और रानी का यह बनाया हुआ व्यवहार साथ चलते हैं। उनकी नीतिनिपुणता इस समय प्रिया के मन का भेद नहीं खोल पा रही।

मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥ २७॥

दोहा २७

कैकेयी का पहला उत्तर अभी उनकी माँग का नाम नहीं बताता। वे प्रियतम से उलाहना करती हैं कि आप माँगने को तो बार बार कहते हैं, पर देते लेते कभी कुछ नहीं। जिन दो वरदानों को देने की बात कही थी, उन्हीं के मिलने में सन्देह है। इस तरह बातचीत का केन्द्र रानी के रोष से हटकर राजा के दिये हुए वचन पर आ जाता है। दशरथ को अब पहले यह जताना है कि वरदान सचमुच मिलेंगे। रानी ने अपनी बात कहने से पहले उनके आश्वासन की जाँच सामने रख दी है।

दशरथ राम के युवराज होने को कैकेयी के मन की पूर्ति समझकर सुनाते हैं। रानी के हृदय में पके फोड़े के छूने जैसी पीड़ा होती है, जिसे वे हँसी में छिपाती हैं। मन्थरा की सिखायी कपट चतुराई राजा नहीं पहचानते। कैकेयी दो पुराने वरदानों के मिलने पर सन्देह जताकर वचन का प्रश्न उठाती हैं।

दो की जगह चार, और सत्य की प्रतिज्ञा

दशरथ हँसकर कहते हैं कि अब रानी का मर्म समझ गये। उन्हें मान करना बहुत प्रिय है। वे अभी भी उसी रूठने की पहचान में उत्तर दे रहे हैं जिसे पहले प्रेम की क्रीड़ा समझा था। जिन वरों की बात उठी है, वे रानी ने धरोहर रख छोड़े थे और फिर कभी माँगे नहीं। राजा अपना भूलने का स्वभाव भी स्वीकार करते हैं। माँग न उठने पर वह प्रसंग उन्हें याद नहीं रहा। पुराने वचन का यह पूरा परिचय इसी संक्षिप्त संवाद में मिलता है: दो वर रखे थे, लिये नहीं गये थे, और उनकी याद अब दिलायी गयी है।

झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू । दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥
रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥

चौपाई ६

वे आग्रह करते हैं कि उन्हें झूठा दोष न दिया जाय। दो के बदले चाहें तो चार वर माँग लें। यह उनकी उदारता का खुला प्रस्ताव है, जिसमें माँगी जानेवाली बात अभी अज्ञात है। कैकेयी ने दो मिलने पर सन्देह जताया था, दशरथ उसके उत्तर में संख्या दुगुनी कर देते हैं। फिर अपने कुल की रीति सामने रखते हैं। रघुकुल में सदा से यही चला आया है कि प्राण भले चले जायँ, वचन नहीं जाता। राजा अपनी बात को कुल की प्रतिष्ठा के साथ रखकर उसे और अटल बना देते हैं।

इस रीति में प्राण और वचन की तुलना है। दोनों में संकट पड़े तो वचन बना रहे, इतना वे कह चुके हैं। अभी कुछ ही पहले उन्होंने प्राण सहित सब रानी के अधीन कहा था। अब प्राण चले जाने की सम्भावना भी सत्य से पीछे रख दी। इन वाक्यों को कहते समय उनकी हँसी और विश्वास बने हुए हैं। जिस माँग के सुनते ही उनसे बोला नहीं जायेगा, वह अभी रानी के भीतर है, और राजा स्वयं अपने कथन की दृढ़ता विस्तार से बता रहे हैं।

नहिं असत्य सम पातक पुंजा । गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए । बेद पुरान बिदित मनु गाए॥

चौपाई ७

दशरथ सत्य का तर्क आगे खोलते हैं। असत्य के समान पापों का समूह भी नहीं हो सकता। इसके लिये घुँघचियों और पहाड़ का उदाहरण देते हैं: करोड़ों छोटे बीज मिलकर भी क्या पहाड़ के समान हो जायँगे। तुलना की भारी वस्तु असत्य है। उसके सामने दूसरे पापों का समूह छोटी घुँघचियों के ढेर जैसा पड़ता है। रानी के सन्देह का उत्तर देते हुए राजा केवल इतना नहीं कह रहे कि वे वचन निभायेंगे; वे असत्य का भार इतना बड़ा बता रहे हैं कि उसका आश्रय लेने की जगह ही न बचे।

इसके बाद सत्य का शुभ पक्ष कहते हैं। सभी सुन्दर सुकृतों की जड़ सत्य है। यह वेद और पुराणों में प्रसिद्ध है और मनु ने भी इसका गान किया है। उनके तर्क में दोनों बातें साथ हैं: असत्य का अनुपम पाप और सत्य पर टिका हुआ सारा पुण्य। इसीलिये कुल की रीति का कथन आगे धर्म के आधार तक जाता है। दशरथ जिन मान्यताओं के भीतर अपने वचन को रखते हैं, उनमें सत्य से हटना केवल एक प्रिय को निराश कर देना नहीं रह जाता।

उस सबके ऊपर उनके मुख से राम की शपथ भी निकल चुकी है। वे स्वयं इस शपथ को याद करते हैं और राम को अपने पुण्य तथा स्नेह की सीमा कहते हैं। रघुराज में उनके सुकृत का सर्वोच्च फल और उनके प्रेम का परम आश्रय एक साथ है। इसलिए राम का नाम लेकर कही गयी बात उनके लिये साधारण आश्वासन कैसे रहे। उनके पूरे उत्तर की आखिरी दृढ़ता उसी प्रिय नाम से आती है जिसे कैकेयी पहले ही मन में बड़ी सौगन्ध मान चुकी हैं।

रानी बात को इतना पक्का करा लेती हैं। फिर दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोलती हैं, ऐसा तुलसी कहते हैं। कवि की अगली छवि शिकार के लिये तैयार पक्षी की है। मानो बुरे विचाररूपी दुष्ट बाज की आँखों पर पड़ी कुलही खोल दी गयी हो। आँखों की वह टोपी हटने पर जिस आक्रमण की तैयारी है, उसका लक्ष्य अगले दोहे में दिखाई देगा। राजा का तर्क पूरा हुआ, उनकी प्रतिज्ञा दृढ़ हुई, और रानी के भीतर रखा वचन अब छोड़े जाने को तैयार है।

दशरथ कहते हैं कि दो वर धरोहर रखे गये थे और माँगे न जाने से वे भूल गये। वे दो की जगह चार माँगने को कहते हैं, रघुकुल की वचन निभानेवाली रीति बताते हैं, असत्य को पापों से भारी और सत्य को पुण्यों की जड़ कहते हैं। वेद, पुराण और मनु का प्रमाण देकर राम की शपथ याद करते हैं। कैकेयी इस प्रकार बात पक्की करा लेती हैं।

पहले भरत का तिलक, फिर राम का वनवास

भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।
भिल्लिनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥ २८॥

दोहा २८

राजा के मनोरथ को तुलसी सुन्दर वन कहते हैं। उसमें उनके सुख सुन्दर पक्षियों के समुदाय हैं। उस वन पर कैकेयी अपना भयंकर वचनरूपी बाज छोड़ना चाहती हैं, जैसे भीलनी शिकार का पक्षी छोड़ती हो। पहले सजते समय फंदा तैयार करने की छवि आयी थी, अब तैयार आक्रमण की छवि है। जिस आनन्द से दशरथ संध्या को महल में आये थे, उसके भीतर बसे सुखों का पूरा समुदाय इस एक वचन की पहुँच में है।

और अब कैकेयी माँग कहती हैं। उनका सम्बोधन प्राणप्रिय है। वे कहती हैं कि मन को भानेवाला एक वर दीजिये: भरत को राजतिलक। राजा अभी राम को अगले दिन युवराज करने का समाचार दे चुके हैं। उसी उत्सव के सामने यह पहला अनुरोध रखा जाता है। इसके बाद वे दूसरे वर के लिये हाथ जोड़ती हैं और नाथ से अपना मनोरथ पूरा करने को कहती हैं। माँग का ढंग विनय का है, हाथ जुड़े हैं, वाणी कोमल है। राजा के सामने उसका आशय अब खुलनेवाला है।

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का । देहु एक बर भरतहि टीका॥
मागउँ दूसर बर कर जोरी । पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥

चौपाई ८

दूसरा वर राम के लिये है। वे तपस्वी का वेष धारण करें, विशेष उदासीन हों और चौदह वर्ष तक वन में निवास करें। पोद्दार की टीका उदासीन होने का आशय राज्य तथा कुटुम्ब की ओर से भलीभाँति विरक्त होकर रहने से खोलती है। माँग में इसलिए स्थान के साथ वेष और मन की दशा भी रखी गयी है। वन जाना, तपस्वियों जैसा रहना और राज्य तथा परिवार से विरक्ति, ये सभी उस दूसरे वर का हिस्सा हैं। अवधि भी निश्चित है: पूरे चौदह वर्ष।

तापस बेष बिसेषि उदासी । चौदह बरिस रामु बनबासी॥
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू । ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥

चौपाई ९

भरत का राजतिलक पहले है, राम का वनवास दूसरे वर में है। कैकेयी अपनी ओर से इन दोनों को कह चुकी हैं। जिन दो वरदानों का पौधे के दो पत्तों और नागिन के दो दाँतों में संकेत था, वे अब शब्दों में सामने हैं। राजा ने अभी तक उनकी उपलब्धता और अपने सत्य की दृढ़ता पर उत्तर दिया था। अब उस प्रतिज्ञा में भरी जानेवाली वास्तविक माँग सुनायी पड़ी है, और उसका स्पर्श सीधे उनके हृदय पर होता है।

कोमल वचन सुनकर दशरथ के हृदय में शोक उठता है। तुलसी इसे चन्द्रमा की किरणें लगने पर चकवे के विकल हो जाने जैसा कहते हैं। बाहर की कोमलता और भीतर पैदा हुई विकलता साथ दिखाई देती हैं। कुछ देर पहले राजा का मन कैकेयी के मुखचन्द्र का चकोर था। अब चन्द्रकिरणों से विकल होता चकवा उनके शोक का चित्र है। उसी चन्द्रमा से जुड़ी दो पक्षी छवियों के बीच रानी की माँग आ चुकी है और राजा का अनुभव बदल गया है।

कैकेयी पहला वर भरत के राजतिलक का माँगती हैं। दूसरे के लिये हाथ जोड़कर कहती हैं कि राम तपस्वी के वेष में राज्य और परिवार से विरक्त होकर चौदह वर्ष वन में रहें। विनययुक्त वचन सुनकर दशरथ के हृदय में शोक भरता है, जैसे चन्द्रकिरणों के स्पर्श से चकवा विकल हो।

खिले हुए मनोरथ की जड़ उखड़ गयी

राजा सहम गये। उनसे कुछ कहते नहीं बनता। अभी तक वे पूछ रहे थे, आश्वासन दे रहे थे, सत्य का पूरा तर्क कह रहे थे। अब वाणी रुक गयी है। तुलसी फिर बाज का चित्र लाते हैं: मानो वन में बाज ने बटेर पर झपट्टा मारा हो। जो पक्षी पिछले दोहे में कैकेयी के भयंकर वचन का रूप था, उसके आक्रमण का फल अब राजा की दशा में दिखाई देता है। आघात के बाद उनका पहला हाल यही है कि उत्तर निकल नहीं पाता।

दशरथ का रंग बिलकुल उड़ गया है। इसके लिये ताड़ के वृक्ष पर गिरी बिजली का रूपक आता है। पोद्दार की टीका बिजली से झुलसे ताड़ के बदरंग हो जाने से इस दशा को समझाती है। सहमना, न बोल पाना और रंग उड़ जाना, शोक क्रमशः शरीर पर प्रकट हो रहा है। कवि हर बार दूसरा दृश्य सामने रखते हैं, पर चोट एक ही माँग की है। बाज का झपटना उसकी आकस्मिकता दिखाता है, बिजली से झुलसा ताड़ उसकी देह पर पड़ा प्रभाव।

माथें हाथ मूदि दोउ लोचन । तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥
मोर मनोरथु सुरतरु फूला । फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥

चौपाई १०

राजा माथे पर हाथ रखते हैं और दोनों नेत्र बन्द कर लेते हैं। तुलसी कहते हैं, मानो सोच स्वयं शरीर धारण करके सोचने लगा हो। इस संध्या की शुरुआत में स्नेह ने शरीर धारण करके निष्ठुरता की ओर गमन किया था। अब उसी राजा में सोच मूर्त हो गया है। पहले वे प्रेम से पास गये, फिर भय और दारुण दुःख हुआ, फिर मनुहार और विश्वास से बोलते रहे। वास्तविक माँग सुनने के बाद वे दोनों आँखें बन्द किये अपने भीतर के शोक में ठहर गये हैं।

उनके मन की बात मनोरथरूपी कल्पवृक्ष के रूप में उठती है। वह वृक्ष फूल चुका था। फलने का समय आया तो कैकेयी ने हथिनी की तरह उसे जड़ सहित उखाड़कर नष्ट कर दिया। फूल और फल के बीच का यह क्षण राजा के दुःख में बहुत भारी है। नगर की मंगल तैयारी, घर घर के बधावे और कल राम को युवराज करने का उनका निश्चय, सबके फल मिलने की घड़ी निकट थी। उसी समय पूरा वृक्ष समूल उजड़ गया, इसलिए चोट किसी एक डाल के टूटने तक सीमित नहीं है।

विपत्ति का जो पौधा आरम्भ में उगता दिखाया गया था, उसके सामने अब मनोरथ का यह उजड़ा वृक्ष है। उधर कपट का जल पाकर अंकुर निकला और दो वरों के पत्ते खुले थे। इधर फलने के समय कल्पवृक्ष जड़ से उखाड़ दिया गया। दोनों वनस्पति चित्रों में रानी की माँग और राजा के मनोरथ पर उसकी चोट साथ दिखाई देती हैं। कैकेयी की माँग कहे जाने पर दशरथ को अपना पूरा सुख छिनता दिखाई दे रहा है।

अगली अर्धाली इस आघात को अयोध्या तक फैलाती है। कैकेयी ने अवध उजाड़ दी और विपत्ति की अचल नींव रख दी, ऐसा कथन आता है। बाहर का नगर अभी हमें मंगलाचार और भीड़ में दिखाई दिया था। यहाँ उसके भाग्य पर पड़े आघात को उजड़ना कहा गया है। विपत्ति को नींव मिल गयी है, वह भी ऐसी जिसे डिगाना कठिन हो। राजा का टूटा मनोरथ और अयोध्या पर आया अनिष्ट इसी अन्तिम छोटी चौपाई में साथ रखे जाते हैं।

कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥ २९ ॥

दोहा २९

अन्तिम दोहे में दशरथ अपने मन में कहते हैं कि किस अवसर पर क्या हो गया। पत्नी पर विश्वास करके वे मारे गये। वे अपनी हानि की तुलना उस योगी से करते हैं जिसे योगसिद्धि का फल मिलने के समय अविद्या नष्ट कर देती है। यह उनके टूटे विश्वास का भीतर उठता हुआ विलाप है। फल मिलने का समय फिर आया है, जैसे अभी कल्पवृक्ष में आया था। ठीक उपलब्धि के निकट जो सहारा माना गया था, उसी ओर से विनाश का अनुभव हो रहा है।

दोहा राजा की इसी मनोदशा पर ठहरता है। कैकेयी से कोई लम्बा उत्तर अभी उनके मुख से नहीं निकलता। माथे पर हाथ और बन्द नेत्रों का चित्र बना रहता है, और भीतर अवसर के इस बदल जाने का शोक है। जिस राम का नाम उन्होंने सौगन्ध में लिया था, उन्हीं के लिये चौदह वर्ष का वनवास सुनना पड़ा। उनके दिये हुए आश्वासन अब इस सुनी हुई माँग के सामने हैं, और राजा उस चोट को बोलकर सँभाल भी नहीं पा रहे।

दशरथ सहमकर मौन हो जाते हैं, उनका रंग उड़ जाता है और वे माथे पर हाथ रखकर आँखें बन्द कर लेते हैं। उन्हें अपना फलने को तैयार मनोरथरूपी कल्पवृक्ष समूल उजड़ा लगता है। अवध के उजड़ने और विपत्ति की अचल नींव का कथन आता है। अन्त में राजा भीतर ही भीतर टूटे विश्वास पर विलाप करते हैं, जैसे सिद्धि का फल मिलते समय योगी को अविद्या नष्ट कर दे।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में विश्वास की अलग अलग आकृतियाँ सामने आयीं। बालसखा राम से मिले, अपना प्रेम पहचाना जाते देखा और हर जन्म के लिये वही निभनेवाला नाता माँगा। दशरथ कैकेयी को सुहृद मानकर आये और अन्त में उसी विश्वास पर विलाप करने लगे। इन दोनों के बीच शील और स्नेह निभाने का प्रश्न देर तक बना रहता है। मित्रों का अनुभव उन्हें सम्बन्ध की निरन्तरता माँगने तक ले गया। राजा का अनुभव उन्हें अपने ही भरोसे से हुए आघात के सामने छोड़ गया।

राम इस पन्ने पर बालसखाओं की कुशल पूछते हैं। फिर उनका नाम दशरथ की शपथ में आता है, युवराज पद के समाचार में आता है और अन्ततः कैकेयी की वनवास वाली माँग में आता है। हर जगह उसी नाम के चारों ओर अलग भाव इकट्ठे होते हैं: मित्रों का प्रेम, राजा का सत्य और स्नेह, नगर का आनन्द, रानी की जलन। जब चौदह वर्ष कहे जाते हैं, तब इस अवधि के साथ अभी देखे हुए स्नेह का सारा भार भी सुनायी देता है।

और वे दो वर, जिनका आरम्भ में अभी आशय भी नहीं खोला गया था, कविता में बार बार रूप बदलते रहे। पहले पत्ते, फिर विषदन्त, फिर वचनरूपी बाज की उड़ान। अन्त में वे बहुत साफ शब्द हैं: भरत का राजतिलक और राम का वनवास। इतने सीधे कथन तक पहुँचने के लिये तुलसी ने भीतर उगते संकट को पूरा दिखाया है। इसलिए राजा के मौन में हम उस संध्या की सारी बातचीत सुन सकते हैं, उनके प्रेमभरे प्रश्न भी और वचन न जाने देने की अभी कही हुई प्रतिज्ञा भी।

अयोध्याकाण्ड का यह प्रसंग बन्द आँखोंवाले राजा और उनके अन्तर्मन के विलाप पर रुकता है। बाहर जिस सुख के लिये मंगल साज सज रहे थे, उसी को वे अपने भीतर जड़ से उखड़ा हुआ देख रहे हैं। सन्ध्या को स्नेह शरीर धरकर आया था। अब सोच मानो शरीर धारण करके स्वयं सोच रहा है, और फल मिलने की घड़ी में नष्ट हुए मनोरथ का दुःख उसके भीतर भरा हुआ है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २३ से २९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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