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इंद्र का डर और मार्ग के लोग

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · इंद्र का डर और मार्ग के लोग

इंद्र का डर और मार्ग के लोग

भरत चित्रकूट की ओर बढ़ते हैं। स्वर्ग में उनके प्रेम से भय उठता है, मार्ग के गाँवों में उसी प्रेम को देखकर लोगों को अपना सौभाग्य मिलता है।

भरत का चित्त चित्रकूट में लगा है। प्रयाग से आगे चलने का समय आ गया है, और मार्ग में जहाँ राम ठहरे थे, वहाँ के वृक्ष को देखकर भी उनका प्रेम रोके नहीं रुकता। गुह साथ हैं, रास्ता जाननेवाले लोग साथ हैं, पूरा समाज साथ है। फिर भी इस यात्रा का सबसे निकट का सहारा वह समाचार है जो बता सके कि राम, सीता और लक्ष्मण कहाँ हैं और कैसे हैं। भरत उसे सुनते हुए आगे बढ़ते हैं।

तुलसीदास की इस कथा में उसी यात्रा को दो अलग जगहों से देखा जाता है। इंद्र सोचते हैं कि इतना प्रेम कहीं राम को लौटा न ले जाय। गाँवों के लोग घर और काम छोड़कर दर्शन को दौड़ते हैं और अपने भाग्य की सराहना करते हैं। इनके बीच देवगुरु का एक पूरा उत्तर है, जिसमें कर्म, भक्ति और राम के स्वभाव की बात खुलती है। यात्रा का अन्तिम दृश्य एक पर्वत का दर्शन है। मिलने की लालसा अभी सारे समाज के हृदय में भरी हुई है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • भरत राम को मनाने जाते हुए छोटे भाई, जिनके प्रेम को देखकर देवता और गाँवों के लोग अपनी अलग प्रतिक्रिया देते हैं।
  • शत्रुघ्न भरत के साथ चलनेवाले छोटे भाई, जो यमुना पार करके राजसमाज के पीछे पैदल जाते हैं।
  • गुह राम के सखा निषादराज, जो रास्ते की बातें सुनाते हैं, यमुना पार कराने की सेवा करते हैं और पर्वत दिखलाते हैं।
  • इंद्र देवराज, जिन्हें भरत और राम के मिलन से अपना काम बिगड़ने का भय होता है।
  • बृहस्पति देवगुरु, जो इंद्र को छल का विचार छोड़ने और भरत से प्रेम करने की सीख देते हैं।
  • मार्ग के स्त्री और पुरुष भरत तथा शत्रुघ्न को देखकर आनन्दित होनेवाले लोग, जिनके बीच पहचान, त्याग और सौभाग्य की बातें होती हैं।

प्रयाग से चलना, गुह के हाथ में हाथ

पोद्दार की टीका इस प्रस्थान को प्रातःकाल में रखती है। भरत तीर्थराज में स्नान करते हैं, समाज के साथ मुनि को सिर नवाते हैं और ऋषि की आज्ञा तथा आशीर्वाद को सिर चढ़ाते हैं। दण्डवत् करके वे बहुत विनती कहते हैं। विदा में स्नान, प्रणाम, आज्ञा और आशीष का अपना क्रम है। चित्रकूट की ओर मन लगा होने पर भी भरत मुनि के यहाँ से इन सबको ग्रहण करके ही आगे बढ़ते हैं। साथ चलनेवाला समाज भी इस प्रणाम में सम्मिलित है।

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा॥
रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी॥

चौपाई १

रास्ते की गति जाननेवाले कुशल पथप्रदर्शक साथ लिये जाते हैं। भरत सब लोगों को लेकर चित्रकूट में चित्त लगाये चलते हैं। उनका हाथ रामसखा गुह के हाथ में है। कवि को इस तरह चलते हुए भरत में शरीर धारण किया हुआ अनुराग दिखता है। यह उपमा उसी साथ चलने के बीच आती है, जहाँ मार्ग का परिचय गुह के पास है और भरत का प्रेम उनसे राम के रास्ते की बातें पूछ रहा है। परिचय और अनुराग एक ही यात्रा में साथ हैं।

भरत के पैरों में जूते नहीं हैं और सिर पर छाया का साधन नहीं है। तुलसी उनके प्रेम, नियम, व्रत और धर्म को निष्कपट कहते हैं। लक्ष्मण, राम और सीता इस मार्ग से कैसे गये, वे सखा से यही पूछते हैं। गुह कोमल वाणी में कहते हैं। जहाँ राम ने ठहरकर निवास किया था, वे स्थान और वृक्ष दिखाई देते हैं। उन्हें देखकर भरत के हृदय का प्रेम रोके नहीं रुकता। गुह की कही हुई बात के साथ अब उस जगह का दर्शन भी है, जहाँ तीनों कुछ समय रहे थे।

भरत की दशा देखकर देवता फूल बरसाते हैं। पृथ्वी कोमल हो जाती है और मार्ग मंगल का मूल बनता है। कवि आगे बादलों की छाया और सुख देनेवाली सुन्दर हवा दिखाते हैं। भरत ने अपने सिर पर छाया नहीं की थी, आकाश के बादल उन्हें छाया देते चले जाते हैं। नंगे पैर चलने का नियम अपनी जगह है, और धरती की कोमलता उसी पदयात्रा के मार्ग में आ गयी है। भक्त की दशा के साथ तुलसी पूरी प्रकृति की अनुकूलता रख देते हैं।

किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात॥ २१६॥

दोहा २१६

दोहा इस अनुकूलता को बहुत ऊँची तुलना तक ले जाता है। भरत के जाते समय मार्ग जितना सुखदायक हुआ, उतना स्वयं राम के लिये भी नहीं हुआ था। यहाँ कवि राम के प्रिय जन की महिमा गा रहे हैं। चलनेवाला अपने लिये सुविधा नहीं चुनता, फिर भी उसके चारों ओर सुखद हवा, छाया, फूल और कोमल भूमि का वर्णन भर जाता है। भरत की अपनी पूछताछ लगातार उन्हीं तीनों के विषय में है। इस सुखद मार्ग में भी उनके मन का केन्द्र राम का पिछला वनमार्ग है।

भरत प्रयाग में स्नान और मुनि से विदा लेकर गुह के साथ चलते हैं। वे पैदल हैं, राम के ठहरने के स्थानों को देखकर प्रेम में भरते हैं, और कवि उनके लिये धरती, हवा तथा बादलों को अनुकूल दिखाते हैं।

जिन्हें राम अपने मन में याद करते हैं

रास्ते के असंख्य जड़ और चेतन जीवों की बात आती है। कुछ को राम ने देखा था, कुछ ने राम को देखा था। कवि कहते हैं कि वे सब परमपद के योग्य हो गये थे, और भरत के दर्शन ने उनका जन्म और मृत्यु रूपी रोग मिटा दिया। पोद्दार की टीका इन दोनों बातों को अलग खोलती है। राम के दर्शन से वे परमपद के अधिकारी हुए थे, भरत के दर्शन से अब उन्हें वही परमपद प्राप्त हो गया। इस भक्ति वर्णन में अधिकार मिलने और प्राप्ति हो जाने के बीच का अन्तर पूरा रखा गया है।

जड़ चेतन मग जीव घनेरे । जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे॥
ते सब भए परम पद जोगू । भरत दरस मेटा भव रोगू॥

चौपाई २

भरत की इतनी महिमा कहकर तुलसी उसका आधार भी देते हैं। जिन भरत को राम स्वयं अपने मन में स्मरण करते रहते हैं, उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है। संसार में जो मनुष्य एक बार राम कह लेता है, वह भी स्वयं तरने और दूसरों को तारनेवाला हो जाता है, यह कवि का कथन है। फिर भरत तो राम के प्यारे हैं और उनके छोटे भाई भी हैं। नाम लेनेवाले की महिमा से बात उस प्रिय जन तक जाती है, जिसका स्मरण स्वयं राम करते हैं।

इसी भाव को सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि कहते हैं। वे भरत को देखकर हृदय में हर्ष पाते हैं और उनके लिये मार्ग का मंगलदायक हो जाना सहज मानते हैं। इन पंक्तियों में यात्रा के दर्शक भी कथा में आ गये हैं। भरत चलते हैं, उनके प्रेम को देखकर साधु आनन्दित होते हैं, और उस आनन्द में राम तथा भरत के सम्बन्ध का अर्थ कहते हैं। आगे देवगुरु इसी सम्बन्ध को इंद्र के सामने रखेंगे। जो यहाँ हर्ष का कारण है, वही वहाँ भय को समझाने का आधार बनेगा।

कवि भरत के दर्शन की महिमा राम के उस प्रेम से जोड़ते हैं जिसमें राम स्वयं उनका स्मरण करते हैं। सिद्ध, साधु और मुनि भरत की दशा देखकर हर्षित होते हैं।

इंद्र की आशंका और देवगुरु की मुसकान

भरत के प्रेम का प्रभाव देखकर इंद्र को चिन्ता होती है। टीका उनके मन का कारण स्पष्ट करती है। कहीं राम इस प्रेम के वश होकर लौट गये तो देवताओं का बना हुआ काम बिगड़ जायगा। तुलसी इस प्रतिक्रिया के साथ संसार को देखने की बात कहते हैं। भले के लिये जगत भला है, बुरे के लिये बुरा। एक ही प्रेम साधुओं को हर्ष दे रहा है और इंद्र को अपने काम के बिगड़ने की आशंका। भरत की यात्रा चल रही है, चिन्ता देखनेवाले के मन में उठी है।

इंद्र गुरु बृहस्पति से कहते हैं कि ऐसा उपाय कीजिये जिससे राम और भरत की भेंट ही न हो। अपनी आशंका को वे राम और भरत दोनों के स्वभाव से समझाते हैं। राम संकोची हैं, प्रेम के अधीन हो जाते हैं, और भरत तो प्रेम के समुद्र हैं। इंद्र को लगता है कि इन दोनों का मिलना उनकी बनी हुई बात बिगाड़ देगा। वे गुरु से कोई छल खोजकर उपाय करने का आग्रह करते हैं। इस समय उनकी माँग भेंट रोकने की है।

रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि॥ २१७॥

दोहा २१७

देवगुरु सुनकर मुसकराते हैं। हजार नेत्रोंवाले इंद्र को वे नेत्रों से रहित समझते हैं। टीका यहाँ ज्ञानरूपी नेत्र का अर्थ देती है। इंद्र भरत के प्रेम का प्रभाव तो देख रहे हैं, पर उसके सामने अपने लिये हानि की गणना कर रहे हैं। बृहस्पति उसी गणना की भूल पर उत्तर देते हैं। मायापति राम के सेवक के साथ कोई माया करेगा तो वह उलटकर उसी के ऊपर पड़ेगी। जिस छल को इंद्र बचाव का साधन मान रहे हैं, गुरु उसे हानि का कारण बताते हैं।

बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने । सहसनयन बिनु लोचन जाने॥
मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥

चौपाई ३

बृहस्पति पिछली बार का स्मरण भी रखते हैं। वे कहते हैं कि उस समय राम का रुख जानकर कुछ किया गया था। अब कुचाल करने से हानि होगी। उनके उत्तर में पहले किये गये काम का उल्लेख राम की इच्छा जानने से जुड़ा है। वर्तमान प्रस्ताव की जाँच भी उसी सम्बन्ध में होती है। गुरु इंद्र की बात सुनते ही कोई नया उपाय नहीं सुझाते। वे पहले यह स्पष्ट करते हैं कि अभी जिस माया का विचार हो रहा है, उसका परिणाम इंद्र की इच्छा के विपरीत होगा।

इंद्र राम और भरत की भेंट रोकने का छल चाहते हैं। बृहस्पति मुसकराकर समझाते हैं कि राम के सेवक के साथ की गयी माया अपने ही ऊपर लौटती है।

राम का स्वभाव, सेवक का प्रेम

बृहस्पति अब राम का स्वभाव कहते हैं। अपने प्रति किये हुए अपराध से रघुनाथ कभी रुष्ट नहीं होते। उनके भक्त का अपराध करनेवाला राम की क्रोधाग्नि में जलता है। गुरु लोक और वेद में प्रसिद्ध इतिहास का स्मरण कराते हैं और कहते हैं कि दुर्वासा इस महिमा को जानते हैं। यहाँ दुर्वासा का नाम उस बात के साक्षी की तरह आता है कि भक्त को पहुँचाया गया अपराध कितना भारी पड़ता है। इंद्र जिस भरत की भेंट रोकना चाहते हैं, उनकी पहचान इसी कसौटी पर होनी है।

जो अपराधु भगत कर करई । राम रोष पावक सो जरई॥
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा॥

चौपाई ४

भरत के समान राम का प्रेमी कौन है, बृहस्पति पूछते हैं। सारा जगत राम को जपता है और राम जिनको जपते हैं, वे भरत हैं। इस बात के बाद गुरु इंद्र को भक्त का काम बिगाड़ने का विचार मन में भी न लाने की चेतावनी देते हैं। ऐसा करने से लोक में अपयश होगा, परलोक में दुःख होगा और शोक का समूह दिन पर दिन बढ़ता जायगा। गुरु परिणाम को वर्तमान हानि तक सीमित नहीं रखते। इस लोक की कीर्ति और परलोक का दुःख, दोनों उनके उपदेश में साथ आते हैं।

राम को अपना सेवक परम प्रिय है। बृहस्पति कहते हैं कि सेवक की सेवा किये जाने में राम सुख मानते हैं और सेवक के साथ वैर को बड़ा वैर मानते हैं। उनके कथन में सम्बन्ध का विस्तार सेवक से उसके प्रति किये गये व्यवहार तक है। भरत को देखने का अर्थ केवल एक यात्री को देखना नहीं रह जाता। उनके काम में सहायता या बाधा करने का निर्णय राम के प्रिय सेवक के साथ व्यवहार का निर्णय बन जाता है। इंद्र को अपना प्रस्ताव उसी रूप में देखना है।

जद्यपि सम नहिं राग न रोषू । गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥
करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥

चौपाई ५

फिर गुरु समता की बात रखते हैं। राम सम हैं, उनमें राग या रोष नहीं है। वे किसी का पाप, पुण्य, गुण और दोष ग्रहण नहीं करते। विश्व में उन्होंने कर्म को प्रधान रखा है, जो जैसा करता है वैसा फल चखता है। सेवक के लिये उनके प्रेम का वर्णन करते हुए बृहस्पति इस समता को भी पूरा कहते हैं। न्याय का यह विधान उनके उत्तर में सुरक्षित है। अपने कर्म के फल की बात इंद्र पर भी लागू होती है, जिनके सामने अभी छल करने या कुटिलता छोड़ने का चुनाव है।

बृहस्पति इसके साथ भक्त और अभक्त के हृदय के अनुसार राम के सम तथा विषम व्यवहार की बात भी कहते हैं। पोद्दार की टीका उसका अर्थ इस तरह खोलती है कि वे भक्त को प्रेम से गले लगाते हैं और अभक्त को मारकर तार देते हैं। गुरु के कथन में राम गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस हैं। वही राम भक्त के प्रेम के वश सगुण हुए हैं। इस उत्तर में समता और हृदय के अनुसार सम्बन्ध दोनों हैं। प्रेम से प्रकट होने की बात उस गुणरहित स्वरूप के साथ कही गयी है।

राम सदा सेवकों की रुचि रखते आये हैं, बृहस्पति इसके साक्षी वेद, पुराण, साधु और देवताओं को कहते हैं। वे इंद्र को कुटिलता छोड़ने और भरत के चरणों में सुन्दर प्रीति करने का उपदेश देते हैं। अभी तक उनका उत्तर छल के परिणाम समझा रहा था। अब उसमें अपनाने योग्य सम्बन्ध भी स्पष्ट है। भरत से भय करनेवाले इंद्र को भरत से प्रेम करने की सीख मिल रही है। जिस भेंट को रोकने का विचार आया था, उसी भक्त के प्रति मन बदलने का आग्रह गुरु रखते हैं।

राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल॥ २१९॥

दोहा २१९

राम के भक्त दूसरों के हित में लगे रहते हैं, दूसरों के दुःख से दुःखी होते हैं और दयालु होते हैं। फिर भक्तों के शिरोमणि भरत से भय कैसा। बृहस्पति आश्वस्त करते हैं कि राम सत्यप्रतिज्ञ हैं और देवताओं का हित करनेवाले हैं। भरत राम की आज्ञा के अनुसार चलनेवाले हैं। इंद्र की व्याकुलता में दोष भरत का नहीं है। अपने स्वार्थ के वश होकर इंद्र जो मोह पाल रहे हैं, चिन्ता वहीं से आती है। राम का सत्य और भरत का आज्ञापालन गुरु के उत्तर में साथ रखे गये हैं।

देवगुरु की श्रेष्ठ वाणी सुनकर इंद्र के मन में आनन्द होता है और चिन्ता मिट जाती है। हर्षित होकर वे फूल बरसाते हैं और भरत के स्वभाव की सराहना करने लगते हैं। इस संवाद का फल इंद्र के मन का बदलना है। भरत को रोकने का कोई छल यहाँ किया नहीं जाता। माँगा गया उपाय गुरु की सीख में छूट गया है, और भयभीत देवराज अब उसी प्रेम की सराहना करते हैं जिससे थोड़ी देर पहले अपनी हानि की आशंका कर रहे थे।

बृहस्पति कर्म के विधान, राम की समता और भक्त से उनके प्रेम को साथ समझाते हैं। वे इंद्र के भय को स्वार्थजनित मोह बताते हैं। इंद्र की चिन्ता मिटती है और वे भरत पर फूल बरसाते हैं।

यमुना का जल और विवेक का जहाज

भरत मार्ग में चले जा रहे हैं। मुनि और सिद्ध उनकी प्रेममयी दशा देखकर सिहाते हैं। जब वे राम कहकर लम्बी साँस लेते हैं, तुलसी को लगता है कि चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ा है। उनके वचनों को सुनकर वज्र और पत्थर भी द्रवित होते हैं, यह कवि का प्रेमचित्र है। अयोध्यावासियों का प्रेम भी वर्णन से बाहर कहा गया है। इस यात्रा में भरत की व्याकुलता सारे समाज से जुड़ी हुई है। राम की याद एक व्यक्ति की साँस में आती है और कवि उसका फैलाव चारों ओर दिखाते हैं।

बीच में एक मुकाम करके वे यमुना के तट पर आते हैं। नदी का जल देखते ही भरत के नेत्रों में जल भर आता है। उस सुन्दर श्याम जल में उन्हें रघुनाथ का रंग दिखाई देता है। यहाँ नदी पार करने की तैयारी से पहले उसका दर्शन मन में उतरता है। सामने जल है, उसके रंग में राम की याद है, और याद के साथ विरह का दुःख उठ आया है। भरत ही नहीं, सारा समाज इस दशा में है।

रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।
होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज॥ २२०॥

दोहा २२०

दोहा दो जलरूप साथ रखता है। यमुना का सुन्दर जल सामने है, भीतर विरह का समुद्र उमड़ता है। भरत समाज सहित उसमें डूबने लगते हैं, फिर विवेक के जहाज पर चढ़ते हैं। पोद्दार की टीका इस विवेक को खोलती है। राम के रंग का जल देखकर सब प्रेम में विह्वल हुए, राम को वहाँ न पाकर विरह की पीड़ा हुई। तब भरत को ध्यान आया कि जल्दी चलकर उनके साक्षात् दर्शन करेंगे। इस विचार से वे फिर उत्साहित हो गये।

इस रूपक का जहाज आगे बढ़ने की आशा है। जल का रंग भरत को राम की याद में मग्न करता है, और दर्शन की निकट सम्भावना उनकी यात्रा को फिर बल देती है। अभी वे यमुना के तट पर हैं। जिस राम की अनुपस्थिति पीड़ा दे रही है, उन्हीं के पास पहुँचना इस व्याकुलता से निकलने का विवेक बनता है। साथ का समाज भी उसी विरह में था, इसलिये दोहे में जहाज पर चढ़ने की बात सारे समुदाय के साथ कही गयी है।

यमुना का श्याम जल देखकर भरत और समाज राम के विरह में विह्वल होते हैं। जल्दी चलकर उनके साक्षात् दर्शन करने की आशा भरत को फिर उत्साह देती है।

एक खेवे में पार, पीछे पैदल दोनों भाई

उस दिन यमुना के किनारे निवास होता है। सबके लिये समय के अनुकूल सुन्दर व्यवस्था की जाती है। टीका इसमें खानपान आदि की व्यवस्था स्पष्ट करती है। रात में घाट घाट से अगणित नावें आ जाती हैं। पोद्दार बताते हैं कि निषादराज का संकेत पाकर वे नावें आयीं। कवि उनकी गिनती नहीं देते, उन्हें वर्णन से परे अनेक कहते हैं। पूरे समाज के लिये जो पार उतरने का प्रबन्ध चाहिये, वह रात के भीतर जुटता है।

सबेरे एक ही खेवे में सब लोग नदी पार कर लेते हैं। यह एक बार में सबके उतर जाने की बात है। रात में आयी हुई असंख्य नावों के साथ यह बात जुड़ती है और गुह की सेवा का विस्तार दिखाई देता है। सब रामसखा की सेवा से सन्तुष्ट हैं। फिर स्नान करके नदी को सिर नवाया जाता है। निषादराज के साथ दोनों भाई आगे चलते हैं। तट पर ठहरना, रात की व्यवस्था, सुबह पार होना और प्रणाम करके चलना, यात्रा का क्रम इतना साफ है कि प्रेम के बीच व्यवस्था का श्रम भी दिखता है।

आगें मुनिबर बाहन आछें । राजसमाज जाइ सबु पाछें॥
तेहि पाछें दोउ बंधु पयादें । भूषन बसन बेष सुठि सादें॥

चौपाई ६

सबसे आगे अच्छी सवारियों पर श्रेष्ठ मुनि हैं। उनके पीछे सारा राजसमाज है। उस समाज के पीछे दोनों भाई पैदल जा रहे हैं। भूषण, वस्त्र और वेष बहुत सादे हैं। साथ में सेवक, मित्र और मंत्री के पुत्र हैं। सभी लक्ष्मण, सीता और रघुनाथ का स्मरण करते चलते हैं। शत्रुघ्न भी भरत के साथ इस पैदल क्रम में आते हैं। बड़े समाज के भीतर तुलसी दोनों भाइयों की जगह और उनके साधारण वेष को अलग से दिखाते हैं।

जहाँ जहाँ राम ने निवास और विश्राम किया था, वहाँ वहाँ प्रेम से प्रणाम होता है। गुह के साथ चलते हुए भरत ने पहले राम के ठहरने के स्थान पूछे थे। यमुना के पार भी राम की यात्रा के उन्हीं स्थानों पर प्रणाम का सिलसिला है। रास्ते में रहनेवाले स्त्री और पुरुष आगमन का समाचार सुनते हैं। वे अपने घर और कामकाज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं। जिन दो भाइयों के मन में राम की स्मृति है, उन्हें देखकर अब दूसरे लोगों के मन में आनन्द भरता है।

मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।
देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ॥ २२१॥

दोहा २२१

कवि कहते हैं कि उनके सौन्दर्य और प्रेम को देखकर लोग जन्म का फल पा जाते हैं। रूप और स्नेह दोनों दर्शन का हिस्सा हैं। आगे गाँवों की स्त्रियाँ दोनों को पहचानने का प्रयत्न करेंगी। वे उम्र और रंगरूप के साथ शील, चाल और स्नेह भी देखेंगी। तुलसी पहले दर्शन की प्रसन्नता कहते हैं, फिर उन लोगों की बातचीत सुनाते हैं जिनके सामने ये दो भाई आये हैं। अब यात्रा के साथ मार्ग के गाँवों की अपनी आवाज भी जुड़ती है।

गुह के प्रबन्ध से सब लोग सुबह एक खेवे में यमुना पार करते हैं। मुनियों और राजसमाज के पीछे भरत तथा शत्रुघ्न पैदल जाते हैं। मार्ग के स्त्री और पुरुष उनका रूप और प्रेम देखने दौड़ते हैं।

गाँव की स्त्रियाँ पहचान करती हैं

गाँवों की स्त्रियाँ आपस में प्रेम से पूछती हैं कि ये राम और लक्ष्मण तो नहीं हैं। अवस्था, शरीर, रंग और रूप वही जान पड़ते हैं। शील और स्नेह भी वैसे हैं, चाल भी वैसी लगती है। पहचान में वे केवल मुख का आकार नहीं देख रहीं। दोनों भाइयों का बर्ताव और प्रेम भी उनके मन में राम तथा लक्ष्मण की स्मृति जगा रहा है। अनुमान के पीछे एक साथ कई समानताएँ हैं। वे एक दूसरी से उन्हें कहती हैं, जिससे पहचान का प्रश्न बातचीत में खुलता है।

बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा॥
नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा॥

चौपाई ७

फिर भेद सामने आते हैं। वेष वह नहीं है। टीका यहाँ राम और लक्ष्मण का वल्कल धारण किया हुआ मुनिवेष स्पष्ट करती है। इन दोनों के साथ सीता भी नहीं हैं। आगे चतुरंगिणी सेना चली जा रही है। मुख प्रसन्न नहीं हैं और मन में खेद दिखाई देता है। इन्हीं भेदों के कारण सन्देह होता है। स्त्रियाँ जितने ध्यान से समानता देखती हैं, उतने ही ध्यान से उन चिह्नों को भी रखती हैं जिनसे पहली पहचान पूरी नहीं बैठती।

यह तर्क बाकी स्त्रियों के मन को भाता है। सब कहती हैं कि इस समझानेवाली के समान सयानी कोई नहीं। वे उसकी सराहना करती हैं और बात को सत्य मानकर उसका सम्मान करती हैं। अब दूसरी स्त्री मधुर वचन कहती है। वह प्रेमपूर्वक पूरा कथाप्रसंग सुनाती है कि राम के राजतिलक का आनन्द किस तरह भंग हुआ था। इसके बाद भरत के शील, स्नेह और स्वभाव की प्रशंसा करने लगती है। पहली बातचीत ने पहचान का सन्देह खोला था, इस कथन में भरत की यात्रा का प्रयोजन सामने आता है।

चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु॥ २२२॥

दोहा २२२

वह कहती है कि भरत पिता का दिया हुआ राज्य त्यागकर जा रहे हैं। पैदल चलते हैं, फल खाते हैं और रघुनाथ को मनाने का प्रयत्न करने चले हैं। आज उनके समान कौन है। राज्य का त्याग, पैदल चलना और फलाहार उसके कथन में एक साथ आते हैं। वह भाई को मनाने जाते हुए राजकुमार का परिचय उनके किये हुए त्याग से देती है। जो लोग अभी वेष और सेना के कारण सोच रहे थे कि ये कौन हैं, उनके सामने उसी साधारण वेष का दूसरा अर्थ खुल जाता है।

भरत का भाईपना, भक्ति और आचरण कहने तथा सुनने से दुःख और दोष हरते हैं, स्त्री उनकी ऐसी महिमा कहती है। उनके विषय में जो कहा जाय थोड़ा है। राम के भाई ऐसे क्यों न हों। वह उनके आचरण की प्रशंसा को राम के सम्बन्ध से जोड़ती है। देवगुरु ने इंद्र से जिस रामप्रिय भाई की बात की थी, गाँव की बातचीत में वही सम्बन्ध लोगों के आनन्द का कारण है। यहाँ वह बात उनके पैदल जाने और राज्य छोड़ने के दिखते हुए आचरण के साथ कही जाती है।

स्त्रियाँ दोनों भाइयों में राम और लक्ष्मण जैसी समानता देखती हैं, फिर वेष, सीता की अनुपस्थिति, सेना और उदास मुखों का भेद बताती हैं। दूसरी स्त्री भरत के राज्यत्याग और राम को मनाने जाने का परिचय देती है।

अपना भाग्य खुलने का आश्चर्य

स्त्रियाँ कहती हैं कि छोटे भाई शत्रुघ्न के साथ भरत को देखकर हम सब भी धन्य स्त्रियों की गिनती में आ गयीं। वे भरत के गुण सुनती हैं और उनकी दशा देखकर पछताती हैं। कुछ का दुःख कैकेयी की ओर मुड़ता है। वे कहती हैं कि ऐसा पुत्र कैकेयी जैसी माता के योग्य नहीं है। यह उनकी अपनी प्रतिक्रिया है, जिसमें बेटे के गुण और उसकी वर्तमान दशा देखकर माँ के प्रति उलाहना उठता है। अभी जिस दर्शन से वे अपने को भाग्यवती कह रही थीं, उसी दशा को देखकर उन्हें खेद भी होता है।

दूसरी ओर कोई कहती है कि रानी का भी दोष नहीं है। यह सब विधाता ने किया है, जो हमारे अनुकूल हुआ है। इस आवाज में घटना को अपने मिले हुए दर्शन से समझा जाता है। स्त्री अपने और साथ की स्त्रियों के लिये युग की सामाजिक दृष्टि से भरी हुई हीनता की भाषा कहती है। वे अपने को लोक और वेद की मर्यादा से हीन, कुल और आचरण में मलिन, तुच्छ स्त्रियाँ कहती हैं। वह कहती है कि हम बुरे देश और बुरे गाँव में रहती हैं और स्त्रियों में भी नीच हैं। यह उस बोलनेवाली का आत्मवर्णन है।

उसके आश्चर्य का दूसरा सिरा दर्शन की महिमा है। अपने को इतना अयोग्य कहने के बाद वह इस दर्शन को महान पुण्यों का परिणाम मानती है। जिन भरत को देखने का ऐसा सौभाग्य मिला, उनके आगमन में वह विधाता की अनुकूलता अनुभव करती है। बातचीत के दोनों मत बने रहते हैं। एक आवाज कैकेयी पर दुःख करती है, दूसरी कहती है कि इसी घटना ने हमारे लिये दर्शन सम्भव किया। गाँव की बात में पछतावा और कृतज्ञता अपने अलग कारणों के साथ सुने जाते हैं।

गाँव गाँव में ऐसा ही आनन्द और आश्चर्य है। तुलसी उसकी उपमा मरुभूमि में कल्पवृक्ष के उग आने से देते हैं। सूनी भूमि में मनोवांछित फल देनेवाले वृक्ष का आ जाना, इसी से दर्शन का अप्रत्याशित सौभाग्य कहा गया है। गाँवों के लोग भरत को देखने दौड़े थे। अब कवि उनके अनुभव को उस बड़े आश्चर्य का रूप देते हैं जिसमें अपने गाँव में ही किसी को वह मिल जाय जिसकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ लगती थी।

भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु॥ २२३॥

दोहा २२३

दोहा यही बात एक और स्थानचित्र से कहता है। भरत को देखकर रास्ते के लोगों का भाग्य ऐसे खुलता है मानो दैवयोग से सिंहलद्वीप के निवासियों को प्रयाग सुलभ हो गया हो। यहाँ सिंहल के लोगों का वास्तविक आगमन नहीं होता। तुलना दर्शन के सहज मिल जाने की है। भरत प्रयाग से यात्रा करते हुए आगे आये हैं और अब उनके दर्शन को कवि मार्ग के लोगों के लिये प्रयाग की सुलभता जैसा कहते हैं। यात्रा के आरम्भ का तीर्थ दूसरे लोगों के सौभाग्य की उपमा बन गया है।

गाँव की बातचीत में कैकेयी के प्रति खेद और मिले हुए दर्शन के लिये विधाता का आभार, दोनों आवाजें हैं। कवि इस दुर्लभ आनन्द को मरुभूमि में कल्पवृक्ष और सिंहलवासियों को प्रयाग सुलभ होने की उपमा देते हैं।

किस वन में हैं तीनों

अपने गुणों के साथ राम के गुणों की कथा सुनते और रघुनाथ को स्मरण करते भरत आगे जाते हैं। मार्ग में तीर्थ दिखाई देते हैं तो स्नान करते हैं। मुनियों के आश्रम और देवताओं के मन्दिर दिखाई देते हैं तो प्रणाम करते हैं। इन स्थानों पर मन ही मन उनका माँगा हुआ वर भी बताया गया है, सीता और राम के चरणकमलों में प्रेम रहे। दर्शन की यात्रा के भीतर हर तीर्थ और प्रणाम उसी प्रार्थना से जुड़ता है। भरत का अपना गुणगान सुनाई देता है, उनके मन का स्मरण रघुनाथ का है।

मार्ग में भील, कोल और अन्य वनवासी मिलते हैं। वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी और विरक्त भी मिलते हैं। भरत जिस किसी से मिलते हैं, प्रणाम करके पूछते हैं कि लक्ष्मण, राम और जानकी किस वन में हैं। प्रश्न में तीनों साथ हैं। वन की पहचान और उनका समाचार भरत को सबसे चाहिये। लोग प्रभु के सब समाचार सुनाते हैं और कवि कहते हैं कि भरत को देखकर वे स्वयं जन्म का फल पाते हैं। समाचार माँगनेवाले और समाचार देनेवाले, दोनों ओर इस भेंट की अपनी प्रसन्नता है।

जे जन कहहिं कुसल हम देखे । ते प्रिय राम लखन सम लेखे॥
एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी॥

चौपाई ८

जो कहते हैं कि हमने उन्हें कुशलपूर्वक देखा है, वे भरत को राम और लक्ष्मण के समान प्यारे लगते हैं। किसी के केवल यह कह देने में कि तीनों कुशल हैं, भरत को कितना सहारा मिलता है, यह तुलना उसी को खोलती है। वे सबसे सुन्दर वाणी में पूछते हैं और राम के वनवास की कथा सुनते जाते हैं। गुह से रास्ते के वृक्ष और निवासस्थान जानने के साथ अब उन लोगों के प्रत्यक्ष समाचार भी मिलते हैं जिन्होंने उन्हें देखा है। यात्रा दर्शन की आशा के साथ कुशल की इन बातों से भरी है।

तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ॥ २२४॥

दोहा २२४

उस दिन वहीं ठहराव होता है। अगले दिन प्रातःकाल रघुनाथ का स्मरण करके सब आगे चलते हैं। साथ के लोगों में भी भरत के समान राम के दर्शन की लालसा है। कवि इस लालसा को पूरे समाज में समान रूप से रखते हैं। पहले यमुना के जल पर सबके विरह का वर्णन था, अब सुबह के प्रस्थान में सबकी मिलने की इच्छा कही गयी है। भरत के पीछे चलनेवाला समाज मन की इस उत्कण्ठा में उनके साथ ही है।

भरत तीर्थों में स्नान, आश्रमों और मन्दिरों में प्रणाम तथा सीताराम के चरणों में प्रेम की प्रार्थना करते हैं। मिलनेवालों से तीनों की कुशल पूछते हैं। एक रात ठहरकर सब अगली सुबह फिर चलते हैं।

पयस्विनी के पास वह पर्वत

अब सबको मंगलसूचक शकुन होने लगते हैं। सुख देनेवाले नेत्र और भुजाएँ फड़कती हैं। टीका पुरुषों के दाहिने और स्त्रियों के बायें नेत्र तथा भुजा की बात स्पष्ट करती है। समाज सहित भरत के मन में उत्साह है कि राम मिलेंगे और दुःख की जलन मिट जायगी। ये शकुन कथा में उसी आशा को बल देते हैं। मिलने की लालसा अब ऐसी प्रसन्न सम्भावना में बदल रही है जिसे सब अपने भीतर अनुभव करते हैं।

जिसके मन में जैसा मनोरथ है, वह वैसा करता चलता है। कवि स्नेह की मदिरा से सबको मतवाला कहते हैं। अंग शिथिल हैं, रास्ते में पैर डगमगाते हैं और प्रेम के वश विह्वल वचन निकलते हैं। प्रेम की विह्वलता अब उनकी चाल में भी दिखाई देती है। यात्रा के आरम्भ में भरत के चलने को शरीर धारण किये हुए अनुराग की उपमा मिली थी। अन्त के निकट सारा समाज उसी प्रेम की विह्वलता में है। मिलने का उत्साह और प्रेम में अंगों की शिथिलता, दोनों इसी आगमन में दिखाई देते हैं।

उसी समय रामसखा निषादराज स्वभाव से सुहावना, पर्वतों में श्रेष्ठ पर्वत दिखलाते हैं। पोद्दार की टीका इसका नाम कामदगिरि बताती है। उसके समीप पयस्विनी नदी के तट पर सीता सहित दोनों भाई रहते हैं। गुह अब उस स्थान की पहचान कराते हैं जिसके निकट तीनों का निवास है। पीछे भरत लोगों से पूछते आये थे कि वे किस वन में हैं। अब उनके सामने वह पर्वत है और उसके साथ तीनों के निवास का परिचय है।

देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा॥
प्रेम मगन अस राजसमाजू । जनु फिरि अवध चले रघुराजू॥

चौपाई ९

पर्वत को देखकर सब जानकी के जीवन राम की जय कहते हैं और दण्डवत् प्रणाम करते हैं। राजसमाज प्रेम में ऐसा मग्न है मानो रघुनाथ अयोध्या की ओर लौट चले हों। कवि आनन्द को समझाने के लिये लौटने की उपमा देते हैं। अभी राम के लौटने की घटना नहीं हुई है। सामने कामदगिरि का दर्शन है और उसी दर्शन में समाज को लौटने जैसी प्रसन्नता हो रही है। मिलने की आशा अपने भाव में इतनी भर गयी है कि कवि उसका चित्र राम की वापसी जैसा रखते हैं।

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु॥ २२५॥

दोहा २२५

उस समय भरत का जैसा प्रेम था, उसे शेष भी पूरा नहीं कह सकते, तुलसी कहते हैं। कवि के लिये वह उतना ही अगम है जितना अहंता और ममता से मलिन लोगों के लिये ब्रह्मानन्द। अन्तिम दोहा वर्णन की सीमा को इसी उपमा से कहता है। हम समाज का प्रणाम देख सकते हैं, उसकी जय सुन सकते हैं, पर्वत के पास तीनों के निवास का समाचार पा सकते हैं। भरत के हृदय में उस समय कितना प्रेम है, उसके सामने कवि अपनी पहुँच की सीमा रख देते हैं।

गुह कामदगिरि दिखाते हैं, जिसके निकट पयस्विनी के तट पर राम, सीता और लक्ष्मण रहते हैं। पर्वत देखकर सब जय कहते और दण्डवत् करते हैं। प्रसंग इसी दर्शन और भरत के अकथ प्रेम पर ठहरता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस यात्रा में भरत के प्रेम को देखनेवालों के सामने अपना मन भी खुलता है। इंद्र को पहले अपने काम की हानि दिखाई देती है। बृहस्पति उनसे उस स्वार्थ को पहचानने को कहते हैं। गाँवों की स्त्रियों को अपना दुर्लभ सौभाग्य दिखाई देता है। उनके बीच भी एक ही मत नहीं है, कैकेयी के प्रति खेद और विधाता के प्रति आभार दोनों सुनाई देते हैं। तुलसी इन आवाजों को उनके कारणों सहित रखते हैं। हम भरत के प्रेम के साथ उसे देखनेवालों की अलग दृष्टियाँ भी पढ़ते हैं।

भरत का बार बार पूछा हुआ प्रश्न इन सबके बीच सीधा बना रहता है, राम, सीता और लक्ष्मण कहाँ हैं और कैसे हैं। कोई कुशल का समाचार देता है तो राम और लक्ष्मण के समान प्रिय हो जाता है। जो प्रेम देवगुरु के कथन में बड़ा धर्मविचार है, वही मार्ग में किसी से अच्छी तरह समाचार पूछने और उसके उत्तर को इतना मान देने में दिखाई देता है। अन्त में गुह पर्वत दिखाते हैं और पूरा समाज प्रणाम करता है। मिलने की लालसा ने उस निवास के निकट की भूमि को भी उनके लिये प्रणम्य बना दिया है।

प्रयाग के स्नान से कामदगिरि के दर्शन तक भरत ने आशीर्वाद लिया, राम के ठहरने के स्थान देखे, यमुना पार की और सबसे तीनों की कुशल पूछी। रास्ते में उनका प्रेम सुनने और देखनेवालों के अपने जीवन में आनन्द बनकर उतरा। पर्वत सामने है, पयस्विनी के पास निवास का समाचार मिल गया है, और राम से भेंट की आशा अभी पूरे समाज में भरी हुई है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २१६ से २२५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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