रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · सुमंत्र का अवध लौटना
सुमंत्र का अवध लौटना
वन में तीनों एक दूसरे को सँभाल रहे हैं। अवध लौटते सुमंत्र को राजा के सामने वह रथ ले जाना है जिसमें राम, सीता और लक्ष्मण नहीं हैं।
रथ अवध की ओर लौट रहा है, और उसमें बैठे मंत्री के मन में एक ही कठिनाई बार बार उठती है। नगर में जो भी पूछेगा, उसे क्या उत्तर मिलेगा? जिन राजकुमारों और सीता को साथ लेकर गये थे, वे अब रथ में नहीं हैं। घोड़ों को भी उनका वियोग व्याकुल कर रहा है। किसी के मुँह से उन तीनों का नाम सुनते ही वे उसी की ओर प्रेम से देखने लगते हैं। सुमंत्र के लिये लौटने का मार्ग इतना भारी हो गया है कि उसे पूरा करने में निषादराज को अपने चार सेवक साथ करने पड़ते हैं।
तुलसीदास के रामचरितमानस का यह प्रसंग वन के सुख से खुलता है और अवध के शोक में पहुँचता है। पहले सुमंत्र मन ही मन आनेवाले प्रश्नों से घिरते हैं। फिर अँधेरा होने पर सचमुच महल में प्रवेश करते हैं, जहाँ राजा दशरथ उनसे पुत्रों का समाचार माँगते हैं। इसी बातचीत में गंगा के किनारे की स्मृति लौटती है। राम ने पिता, माताओं, गुरु, नगरवासियों और भरत के लिये अलग अलग संदेश दिये थे। उन सबकी चिन्ता में पिता की कुशल बार बार सामने आती है। आख़िर में सीता भी कुछ कहना चाहती हैं, पर स्नेह से उनकी वाणी रुक जाती है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- सुमंत्र राजा के मंत्री और सारथी, जिन्हें वन से लौटकर राम, सीता और लक्ष्मण का समाचार सुनाना है।
- निषादराज गुह राम के सखा, जो व्याकुल मंत्री को सँभालते हैं और चार सेवक उनके साथ करते हैं।
- दशरथ अवध के राजा, जो पुत्रों के समाचार की प्रतीक्षा में कौसल्या के महल में व्याकुल हैं।
- राम वन में रहते हुए भी पिता और अवध के परिजनों की कुशल का उपाय बतानेवाले पुत्र।
- लक्ष्मण राम और सीता की सेवा करनेवाले भाई, जिनके कठोर वचन राम आगे कहने से रोकते हैं।
- सीता वन में राम के साथ रहनेवाली जानकी, जिनका विदाई का संदेश वाणी में पूरा नहीं उतर पाता।
वन का सुख और लौटते हुए घोड़े
इस कथा की पहली छवि वन की है। राम सीता और लक्ष्मण की ऐसी सँभाल रखते हैं जैसे पलकें आँखों के गोलकों की रखती हैं। उपमा शरीर के उस छोटे से अंग से आयी है जो आँख के निकट रहकर उसकी रक्षा करता है। इसी के साथ सेवा की दूसरी दिशा भी सामने आती है। लक्ष्मण राम और सीता की सेवा में लगे हैं। पोद्दार जी की टीका इसका एक और अर्थ भी देती है, लक्ष्मण और सीता मिलकर राम की सेवा करते हैं। दोनों अर्थों में वन का निवास परस्पर देखभाल से भरा हुआ है।
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥
चौपाई १
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥
इस सेवा को तुलसी अज्ञानी मनुष्य की अपने शरीर के प्रति लगन से समझाते हैं। जिस तरह वह देह की देखरेख में लगा रहता है, उसी गहन लगाव से यहाँ सेवा होती है। राम पक्षियों, पशुओं, देवताओं और तपस्वियों के हितकारी होकर सुख से वन में बस रहे हैं। इस सुख को दिखाकर कवि स्वयं कथा का रुख़ बदलते हैं। राम के वनगमन का वर्णन कह चुकने के बाद वे अब सुमंत्र के अवध लौटने की बात सुनाते हैं। वन में राम के निवास और मंत्री की वापसी को इसी मोड़ से अलग अलग पहचान मिलती है।
राम को पहुँचाकर निषादराज लौटते हैं तो रथ के पास मंत्री को पाते हैं। सुमंत्र की व्याकुल दशा देखकर उन्हें ऐसा दुःख होता है जिसका वर्णन कवि के लिये कठिन है। टीका बताती है कि गुह को अकेले लौटा देखकर सुमंत्र राम, सीता और लक्ष्मण को पुकारते हुए धरती पर गिर पड़ते हैं। रथ के घोड़े दक्षिण दिशा की ओर देख रहे हैं। टीका इसी दिशा को राम के जाने की दिशा बताती है। उनका हिनहिनाना तुलसी को बिना पंख के पक्षियों की छटपटाहट जैसा लगता है।
नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।
दोहा १४२
ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥ १४२॥
घोड़े घास नहीं चरते, पानी नहीं पीते, आँखों से आँसू बहाते हैं। उन्हें ऐसी दशा में देखकर सभी निषाद व्याकुल हो जाते हैं। गुह पहले अपने को सँभालते हैं, तब मंत्री से धैर्य रखने को कहते हैं। वे सुमंत्र को पण्डित और परमार्थ का ज्ञाता याद दिलाते हैं। विधाता प्रतिकूल हैं, इस विपरीत समय को पहचानकर शोक छोड़िये और धीरज रखिये। कोमल वाणी में अनेक बातें कहने के बाद वे मंत्री को लाकर बलपूर्वक रथ पर बैठाते हैं। सुमंत्र का शरीर शोक से इतना शिथिल है कि वे रथ हाँक नहीं पाते।
घोड़ों की दशा भी ऐसी ही है। वे तड़फड़ाते हैं, रास्ते पर ठीक नहीं चलते। तुलसी उन्हें रथ में लाये और जोते गये जंगली पशुओं की तरह दिखाते हैं। कभी ठोकर खाकर गिरते हैं, कभी पीछे देखने लगते हैं। राम का वियोग उनके चलने की लय तक बिगाड़ चुका है। कोई राम, लक्ष्मण या जानकी का नाम ले तो वे हिनहिनाकर उसकी ओर प्रेम से देखते हैं। उन तीनों के नाम से ही घोड़ों का प्रेम उस नाम को लेनेवाले की ओर उमड़ आता है। कवि उनकी विकलता के लिये मणि से बिछुड़े साँप की उपमा देते हैं।
भयउ निषादु बिषादबस देखत सचिव तुरंग।
दोहा १४३
बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग॥ १४३॥
मंत्री और घोड़ों, दोनों को इस दशा में देखकर गुह अपने चार अच्छे सेवक बुलाते हैं और सारथी के साथ कर देते हैं। सुमंत्र को विदा करके गुह लौट जाते हैं। उनका अपना विरह और विषाद भी कहने में नहीं आता। अब वे चार सेवक रथ लेकर अवध की ओर चलते हैं। टीका बताती है कि मंत्री और घोड़ों को देखकर वे भी क्षण क्षण दुःख में डूबते हैं। इस यात्रा का भार चारों साथियों तक पहुँच गया है। गुह ने जिस असमर्थता को देखा था, उसके लिये उन्होंने साथ चलनेवाले हाथ उपलब्ध कराये हैं।
वन में राम, सीता और लक्ष्मण परस्पर सेवा से सुखी हैं। उधर सुमंत्र और घोड़े वियोग से इतने व्याकुल हैं कि रथ का चलना कठिन है। गुह मंत्री को सँभालकर अपने चार सेवक साथ करते हैं और स्वयं लौट जाते हैं।
राह में अपने को दोष देते सुमंत्र
रथ चलता है तो सुमंत्र का मन अपने ही जीवन पर कठोर प्रश्न करने लगता है। राम से बिछुड़कर जीवित रहने को वे धिक्कारते हैं। यह शरीर अन्त तक रहनेवाला तो है नहीं, फिर वियोग की घड़ी में ही क्यों नहीं छूट गया? अपने दुःख में उन्हें यही लगता है कि उस समय प्राण चले जाते तो यश मिलता। अब वे अपने प्राणों को अपयश और पाप का पात्र कह रहे हैं। यह शोक से घायल मंत्री की अपने प्रति कठोर वाणी है। जिस लौटने का दायित्व उनके सामने है, उसी को वे अपने मन में असह्य अपराध जैसा अनुभव कर रहे हैं।
वे सोचते हैं कि प्राण अब भी क्यों नहीं निकलते, हृदय के दो टुकड़े क्यों नहीं होते। अपने मन को अवसर चूक जाने के लिये कोसते हैं। फिर पछतावा शरीर की क्रियाओं में दिखाई देता है। सुमंत्र हाथ मलते हैं, सिर पीटते हैं। तुलसी एक के बाद एक उपमाएँ रखते हैं, क्योंकि इस दुःख में केवल बिछोह नहीं है। मंत्री को हानि हुई है, अपने ऊपर लज्जा आ रही है, और अपने लौटने में असफलता दिखाई दे रही है। हर उपमा उस अनुभूति का अलग हिस्सा खोलती है।
मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई । मनहुँ कृपन धन रासि गवाँई॥
चौपाई २
बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई । चलेउ समर जनु सुभट पराई॥
धन का खजाना खो देनेवाला कृपण अपनी हानि पर जिस तरह पछताता है, सुमंत्र का हाथ मलना वैसा है। उसके पास जिसे सँभालने की सबसे अधिक चिन्ता थी, वही चला गया। इसके बाद युद्ध से भागते हुए योद्धा का चित्र आता है। जिसने वीर का बाना पहना हो और श्रेष्ठ शूरवीर कहलाया हो, वही संग्राम से पलायन कर रहा हो, ऐसी ग्लानि मंत्री की वापसी में भर गयी है। यहाँ किसी युद्ध की घटना नहीं हो रही। कवि उस आदमी का भीतर दिखाते हैं जिसे अपना लौटना अपने ही मान के विरुद्ध लग रहा है।
दोहा इसी पछतावे को एक और सामाजिक छवि में रखता है। विवेकशील, वेद का ज्ञाता, साधुओं को मान्य आचरणवाला कुलीन ब्राह्मण भूल से मदिरा पी ले और बाद में पछताये, सुमंत्र की चिन्ता को तुलसी वैसा बताते हैं। उपमा उस आचरण के अनजाने टूट जाने की है जिसे वह व्यक्ति अपना धर्म समझता आया है। फिर मन, वचन और कर्म से पति को देवता माननेवाली, समझदार और साधु स्वभाव की स्त्री का उदाहरण है। भाग्यवश उसे पति से अलग रहना पड़े तो उसके हृदय का दारुण ताप मंत्री के हृदय जैसा है। ये कवि की उपमाएँ उस समय के मर्यादा और निष्ठा के भाव लेकर आती हैं।
वियोग के साथ लज्जा और विवशता जुड़ती गयी हैं। अब तुलसी मंत्री के शरीर की एक एक कठिनाई सामने रखते हैं। आँखें आँसुओं से भरी हैं, दृष्टि कम हो गयी है। कानों से सुनाई नहीं पड़ता, बुद्धि व्याकुल होकर अपना ठिकाना खो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुँह में लाटी लग गयी है। इन सबके बीच एक कारण ऐसा है जो प्राणों को रोके हुए है। हृदय में अवधि के किवाड़ लगे हैं। पोद्दार जी इस अवधि को खोलते हैं, चौदह वर्ष बीतने पर राम फिर मिलेंगे, इसी आशा ने प्राणों के निकलने का रास्ता रोक रखा है।
लोचन सजल डीठि भइ थोरी । सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी॥
चौपाई ३
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी । जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी॥
मिलने की वही आशा दुःख के भीतर बची हुई है। सुमंत्र का मुख इतना विवर्ण हो गया है कि उसे देखा नहीं जाता। तुलसी उनकी दशा को उस मनुष्य जैसा कहते हैं जिसने अपने माता पिता को मार डाला हो। फिर नरक की ओर जाते पापी के पछतावे से मंत्री के मन में छायी हानि और ग्लानि को समझाते हैं। ये अपराध मंत्री ने किये नहीं हैं। उपमाओं की कठोरता यह बताती है कि राम से खाली रथ लेकर लौटने का बोझ वे अपने ऊपर कितना बढ़ाकर अनुभव कर रहे हैं। मुँह से वचन भी नहीं निकलते। विचार फिर उसी नगर की ओर लौट आता है जहाँ इस रथ को सब पहचानेंगे।
सुमंत्र अपने लौटने को हानि, लज्जा और अपराध जैसी ग्लानि से भरकर देखते हैं। तुलसी की अनेक उपमाएँ उसी मनोदशा को खोलती हैं। शरीर शोक से टूट रहा है, पर चौदह वर्ष बाद राम से मिलने की आशा प्राणों को थामे हुए है।
जो प्रश्न अभी पूछे भी नहीं गये
मैं अवध जाकर क्या देखूँगा, सुमंत्र मन में पूछते हैं। राम से रहित रथ को जो भी देखेगा, वही मंत्री का मुँह देखने से संकोच करेगा, ऐसा उन्हें लगता है। नगर तक पहुँचे बिना ही वे नगर के स्त्री पुरुषों की व्याकुलता देख रहे हैं। सब दौड़कर पास आयेंगे और पूछेंगे। तब हर किसी को उत्तर देना होगा। इस भावी बातचीत के लिये तुलसी हृदय पर वज्र रखने का चित्र देते हैं। सुमंत्र को अपने भीतर उतनी कठोरता जुटानी पड़ेगी कि जिस समाचार को वे स्वयं सह नहीं पा रहे, उसे दूसरों के सामने कह सकें।
धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
दोहा १४५
उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि॥ १४५॥
इसके बाद माताओं का ध्यान आता है। वे सब दीन और दुखी होकर पूछेंगी, तब मंत्री क्या कहेंगे? सुमंत्र विधाता को सम्बोधित करके यही उलझन रखते हैं। फिर विशेष रूप से लक्ष्मण की माता का प्रश्न उनके मन में उठता है। उनके लिये कौन सा सुख देनेवाला संदेश होगा? यहाँ कोई माता अभी सुमंत्र से बात नहीं कर रही। मंत्री आगे होनेवाले मिलन का विचार कर रहे हैं और हर चेहरे के सामने अपनी कठिनाई को नया रूप लेते देख रहे हैं। एक ही समाचार नगर में भी देना है और उन माताओं को भी जिनके पुत्र वन गये हैं।
राम की माता की कल्पना आते ही उपमा बदल जाती है। नयी ब्यायी गाय अपने बछड़े को याद करके जिस तरह दौड़ती है, उसी तरह वे दौड़ी आयेंगी। इस दृश्य में मिलने की आकुलता है, और सुमंत्र के पास जो उत्तर है उसमें बिछुड़ने का समाचार। वे सोचते हैं कि माँ के पूछने पर यही कहना पड़ेगा, राम, लक्ष्मण और सीता वन चले गये। प्रश्न पूछनेवाला कोई भी हो, उत्तर यही है। सुमंत्र इस पीड़ा को अपने मन में उलटे शब्दों से कहते हैं, अब अवध जाकर यही सुख पाना है। उनके लिये यही सुख कहलाना भी एक करुण व्यंग्य है।
अब राजा का ध्यान आता है। वे दुःख से दीन होंगे और उनका जीवन राम के दर्शन के अधीन है। सुमंत्र सोचते हैं कि उन्हें कौन सा मुँह लेकर बतायेंगे कि राजकुमारों को कुशलपूर्वक पहुँचा आये हैं। पहुँचाना जिस कार्य की पूर्ति है, उसका समाचार सुननेवाले पिता के लिये वियोग की पुष्टि बन जाता है। मंत्री को भय होता है कि लक्ष्मण, सीता और राम का संदेश सुनते ही राजा शरीर को तिनके की तरह छोड़ देंगे। यह सुमंत्र का आगे का भय है। इस समय रथ मार्ग में है और राजा से मिलना अभी बाकी है।
हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।
दोहा १४६
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु॥ १४६॥
उनका विचार फिर अपने ही हृदय पर लौटता है। पानी के बिछुड़ने पर कीचड़ फट जाती है। राम के बिछुड़ने पर उनका हृदय क्यों नहीं फटा? सुमंत्र इस बचे हुए शरीर को यातना भोगनेवाला शरीर समझते हैं। पोद्दार जी की टीका यातनाशरीर का अर्थ नरक भोगने के लिये मिलनेवाले शरीर से खोलती है। मंत्री का यह आत्मधिक्कार उनकी असह्य मनोदशा को व्यक्त करता है। चौदह वर्ष बाद मिलने की आशा भी भीतर है और अभी जीवित रहने पर यह कठोर ग्लानि भी। दोनों के बीच उन्हें अवध पहुँचकर बोलने का दायित्व निभाना है।
नगरवासियों, माताओं और राजा के प्रश्न अभी सुमंत्र के मन में उठ रहे हैं। वे हर मिलनेवाले को वनगमन का वही उत्तर देने से डरते हैं। राजा के प्राण चले जाने की आशंका भी अभी मंत्री की चिन्ता है, घटी हुई घटना नहीं।
दिन पेड़ के नीचे, प्रवेश अँधेरा होने पर
इसी पछतावे में मार्ग बीतता है और रथ तमसा के तट पर आ पहुँचता है। सुमंत्र विनय करके चारों निषाद सेवकों को विदा करते हैं। वे दुःख से व्याकुल होकर मंत्री के पैरों पड़ते हैं और लौट जाते हैं। जिन साथियों को गुह ने रथ चलने की कठिनाई देखकर भेजा था, उनका साथ यहाँ समाप्त होता है। आगे अवध में प्रवेश सुमंत्र को करना है। नगर के निकट आकर उनका संकोच और गहरा हो जाता है। तुलसी फिर एक कठोर उपमा देते हैं, जैसे कोई गुरु, ब्राह्मण या गाय का वध करके लौटा हो। यह वही ग्लानि है जो रास्ते भर मंत्री को दोषी अनुभव कराती रही है।
वे सारा दिन एक पेड़ के नीचे बैठकर बिताते हैं। शाम होने पर अवसर मिलता है। इस छोटे से ठहराव में लौटने की कठिनाई का एक और रूप दिखाई देता है। नगर पहुँच जाने की इच्छा के साथ उसमें प्रवेश का संकोच लगा हुआ है। रथ अवध तक लाना है, और उसे देखते ही उठनेवाले प्रश्नों का सामना भी करना है। तुलसी पहले दिन के बीतने को बताते हैं, फिर अँधेरे में हुए प्रवेश को। सुमंत्र की इस वापसी में दिन का यह विराम अपनी स्पष्ट जगह रखता है।
अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें । पैठ भवन रथु राखि दुआरें॥
चौपाई ४
जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए॥
अँधेरा होने पर वे अवध में प्रवेश करते हैं। रथ द्वार पर खड़ा कर महल के भीतर जाते हैं। उनके आने का समाचार जिन जिन लोगों को मिलता है, वे रथ देखने के लिये राजा के दरवाज़े पर पहुँचते हैं। रथ पहचाना जाता है और घोड़ों की व्याकुलता दिखाई देती है। मंत्री ने रास्ते भर जिसे सोचकर भय किया था, वह दृश्य अब सचमुच नगर के सामने है। लोगों के शरीर धूप में पड़े ओलों की तरह गलते हुए लगते हैं। कवि इस उपमा से उस क्षीणता को सामने रखते हैं जो प्रियजनों की अनुपस्थिति देखते ही उनमें उतरती है।
नगर के स्त्री पुरुषों की व्याकुलता के लिये दूसरी उपमा घटते पानी में मछलियों की है। घोड़े अपना दुख लेकर आये हैं और उन्हें देखनेवाले उसी वियोग में घिर गये हैं। भीतर सुमंत्र के आगमन का समाचार सुनते ही सारा रनिवास व्याकुल हो उठता है। मंत्री को राजमहल भयानक लगता है, जैसे वहाँ प्रेतों का निवास हो। टीका इस छवि को श्मशान के अर्थ से खोलती है। जिस महल में समाचार पहुँचाना है, उसकी यह भयावह अनुभूति सुमंत्र की अपनी दृष्टि से सामने आती है।
सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
दोहा १४७
भवनु भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु॥ १४७॥
रानियाँ अत्यन्त आर्त होकर पूछती हैं, पर सुमंत्र से उत्तर नहीं बनता। जिन प्रश्नों का सामना करने का विचार वे रास्ते में कर रहे थे, उनके सामने वाणी अब रुक गयी है। कानों से सुनाई नहीं पड़ता, आँखों से कुछ सूझता नहीं। जो भी सामने आता है, मंत्री उसी से पूछते हैं कि राजा कहाँ हैं। दासियाँ उनकी व्याकुल दशा देखती हैं और उन्हें कौसल्या के महल में ले जाती हैं। नगर के लोगों से रानियों तक फैली पीड़ा के बीच अब वह भेंट होनेवाली है जिसका भय सुमंत्र के मन में सबसे अधिक था।
तमसा पर चारों साथी विदा होते हैं। सुमंत्र दिन भर पेड़ के नीचे बैठकर अँधेरे में अवध आते हैं। रथ और घोड़ों को देखकर नगर व्याकुल होता है। रानियों के प्रश्नों पर मंत्री की वाणी रुक जाती है और दासियाँ उन्हें कौसल्या के महल में राजा के पास ले जाती हैं।
सखा, राम कहाँ हैं
सुमंत्र राजा को देखते हैं तो तुलसी की उपमा अमृत से रहित चन्द्रमा की है। राजा आसन, शय्या और आभूषणों से रहित, अत्यन्त उदास होकर धरती पर पड़े हैं। लम्बी साँसें लेते हुए उनकी चिन्ता स्वर्ग से गिरे ययाति के शोक जैसी दिखाई देती है। फिर पंख जल जाने पर गिरे हुए सम्पाती का चित्र आता है। इन दोनों उपमाओं में अपनी पहले की स्थिति से गिर पड़ने की असहायता है। राजा क्षण क्षण शोक से छाती भरते हैं। उनके मुख पर राम का नाम है, फिर राम के साथ लक्ष्मण और जानकी की पुकार आती है।
देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।
दोहा १४८
सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु॥ १४८॥
मंत्री जयजीव कहकर दण्डवत् प्रणाम करते हैं। उनकी आवाज़ सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठते हैं और राम का पता पूछते हैं। रास्ते में सुमंत्र जिस क्षण की कल्पना कर रहे थे, वह आ गया है। दशरथ उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। तुलसी इसे डूबते मनुष्य को सहारा मिल जाने जैसा कहते हैं। मंत्री को प्रेम से पास बैठाते हैं और आँखों में आँसू भरकर पूछते हैं। राजा के सम्बोधन में सुमंत्र प्रेमी सखा हैं। समाचार की अपेक्षा इस पुराने अपनापे के भीतर रखी गयी है।
राम की कुशल कहिये। राम, लक्ष्मण और जानकी कहाँ हैं? उन्हें लौटा लाये हैं या वे वन चले गये? राजा के प्रश्न में लौट आने की सम्भावना अभी बची हुई है। इतना सुनते ही सुमंत्र की आँखें भी भर आती हैं। उत्तर के पहले ही राजा फिर पूछते हैं कि तीनों का संदेश तो बताइये। राम का रूप, उनके गुण, उनका शील और स्वभाव बार बार राजा के स्मरण में आते हैं। पुत्र की स्मृति और पुत्र का समाचार पाने की आकुलता साथ साथ उनकी वाणी में चल रही है।
दशरथ अपने को दोष देते हैं। वे कहते हैं कि राजा होने की बात सुनाकर उन्होंने राम को वनवास दे दिया। ऐसा सुनकर भी राम के मन में हर्ष या विषाद नहीं हुआ। इस कथन को राजा अपने पुत्र की स्थिरता और अपने अपराधबोध के साथ जोड़कर याद कर रहे हैं। ऐसे पुत्र से बिछुड़ने पर भी उनके प्राण नहीं गये, इसलिये वे अपने से बड़ा पापी किसी को नहीं मानते। मार्ग में मंत्री ने अपने जीवित रहने को दोष दिया था, महल में पिता उसी प्रकार अपना शरीर बचा रहने पर ग्लानि कर रहे हैं।
सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।
दोहा १४९
नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ॥ १४९॥
राजा की माँग अब सीधे यात्रा की माँग हो जाती है। राम, जानकी और लक्ष्मण जहाँ हैं, सुमंत्र उन्हें भी वहीं पहुँचा दें। अन्यथा वे सत्य भाव से कहते हैं कि उनके प्राण अब चलना चाहते हैं। यह बात कहकर भी उनका पूछना समाप्त नहीं होता। बार बार प्रिय पुत्रों का संदेश सुनाने को कहते हैं। फिर सखा से शीघ्र वह उपाय करने का आग्रह करते हैं जिससे राम, लक्ष्मण और सीता आँखों के सामने आ जायँ। संदेश सुनना और दर्शन पाना, दोनों एक साथ माँगे जा रहे हैं। सुमंत्र लौटे हैं, इसलिये राजा को उनमें उस मिलन का कोई सम्भव सहारा दिखाई देता है।
इस भेंट में राजा की व्याकुलता मंत्री को अपने संदेश तक पहुँचने के लिये धैर्य जुटाने को बाध्य करती है। दशरथ ने उन्हें पास बैठा लिया है, पर प्रश्न अभी भी बार बार उठते हैं। राम कहाँ हैं, लौटे हैं या वन चले गये, क्या कहा है, कैसे आँखों से दिखेंगे? हर प्रश्न का सम्बन्ध उसी अनुपस्थित पुत्र से है। सुमंत्र अब अपना धीरज बाँधकर कोमल वाणी में बोलना आरम्भ करते हैं। जिस मंत्री को गुह ने पहले पण्डित और परमार्थ का ज्ञाता कहकर धैर्य दिलाया था, वही मंत्री राजा को उनके ज्ञान और धैर्य का स्मरण कराते हैं।
दशरथ धरती पर शोकमग्न हैं। सुमंत्र की आवाज़ सुनकर उठते हैं, उन्हें गले लगाते और पास बैठाते हैं। राम की कुशल, वापसी और संदेश पूछते हुए राजा स्वयं को दोष देते हैं और तीनों के पास पहुँचाने अथवा दर्शन कराने की विनती करते हैं।
धैर्य की बात और गंगा का समाचार
सुमंत्र महाराज को पण्डित और ज्ञानी कहकर सम्बोधित करते हैं। वे शूरवीर हैं, उत्तम धैर्यवानों में श्रेष्ठ हैं, और सदा साधुओं के समाज का सेवन करते रहे हैं। मंत्री राजा को उनका अपना परिचय याद दिलाकर आगे की बात कहते हैं। जिस दुःख से वे इस समय घिरे हैं, उसके सामने उनके ज्ञान और विवेक का सहारा उपस्थित किया जाता है। सुमंत्र की वाणी कोमल है और उसे बोलने से पहले उन्होंने स्वयं धीरज धरा है। शोक में दोनों की दशा दिखाई दे चुकी है, इसलिये धैर्य की यह बात उसी कठिनाई के भीतर से निकलती है।
जनम मरन सब दुख सुख भोगा । हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा॥
चौपाई ५
काल करम बस होहिं गोसाईं । बरबस राति दिवस की नाईं॥
जन्म और मरण, सुख और दुःख के भोग, हानि और लाभ, प्रियजनों का मिलना और बिछुड़ना, मंत्री इन सबको काल और कर्म के अधीन बताते हैं। जैसे रात और दिन होते रहते हैं, वैसे ही ये अवस्थाएँ मनुष्य की इच्छा से बँधे बिना आती हैं। सुमंत्र का यह समझाना जीवन की अनेक विपरीत दशाओं को एक क्रम में रखता है। जिस मिलन को राजा चाहते हैं और जिस वियोग को सह नहीं पा रहे, वे भी इसी क्रम के भीतर हैं। बात को केवल वर्तमान दुःख तक सीमित रखने के बदले मंत्री उसके साथ जन्म, मृत्यु, लाभ और हानि सभी रखते हैं।
आगे वे कहते हैं कि जड़ लोग सुख में हर्षित होते हैं और दुःख में विलाप करते हैं, जबकि धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। राजा से उनका निवेदन है कि विवेक का विचार करके धैर्य धारण करें और शोक छोड़ें। उन्हें सबका हित करनेवाला रक्षक कहकर सम्बोधित किया जाता है। इस शिक्षा में मंत्री समता की बात कह रहे हैं। उनका अपना दुःख कथा में बना हुआ है। उसी व्याकुल सुमंत्र को राजा के सामने यह प्रयास करना पड़ रहा है कि अब समाचार सुना जा सके। धैर्य की विनती के बाद वे यात्रा का वृत्तान्त आरम्भ करते हैं।
प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।
दोहा १५०
न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर॥ १५०॥
सुमंत्र बताते हैं कि पहला पड़ाव तमसा के किनारे हुआ और दूसरा गंगा के तट पर। उनके इस समाचार में उस दिन सीता सहित दोनों भाइयों के स्नान करके केवल जल पीकर रहने का उल्लेख है। मंत्री आगे कहते हैं कि केवट ने बहुत सेवा की और रात सिंगरौर में बीती। पोद्दार जी यहाँ केवट की पहचान निषादराज से करते हैं और सिंगरौर को शृंगवेरपुर बताते हैं। इस प्रकार सुमंत्र की बात में पहले पड़ावों का क्रम आता है, फिर वहाँ मिली सेवा और अगली सुबह की तैयारी।
सुबह होते ही बड़ का दूध मँगवाया गया। टीका स्पष्ट करती है कि राम और लक्ष्मण ने उससे अपने सिर पर जटाओं के मुकुट बनाये। फिर राम के सखा निषादराज ने नाव मँगवायी। नाव पर चढ़ने का क्रम भी मंत्री के वर्णन में साफ़ है। पहले सीता को चढ़ाया गया, फिर राम चढ़े। लक्ष्मण ने धनुष बाण सजाकर रखे और राम की आज्ञा पाने के बाद स्वयं नाव पर चढ़े। समाचार यहाँ उस स्थान तक पहुँचा है जहाँ सुमंत्र को विदाई के संदेश मिलते हैं।
राम सखाँ तब नाव मगाई । प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई॥
चौपाई ६
लखन बान धनु धरे बनाई । आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई॥
अवध के महल में सुनायी जा रही बात अब सुमंत्र की अपनी उस व्याकुलता पर आती है जिसे राम ने देखा था। मंत्री कहते हैं कि उन्हें ऐसा देखकर रघुवीर ने धीरज धरा और मधुर वचन कहे। नाव की तैयारी के बीच भी उनका ध्यान उस व्यक्ति पर है जिसे लौटकर पिता का सामना करना है। आगे के संदेश उसी को सौंपे जाते हैं। सुमंत्र को केवल वन पहुँचने का समाचार नहीं मिला था। उन्हें यह भी कहा गया था कि अवध में किससे क्या निवेदन करना है और राजा की कुशल के लिये किस प्रकार प्रयत्न करना है।
सुमंत्र काल और कर्म के अधीन मिलन वियोग की बात कहकर राजा से धैर्य माँगते हैं। फिर अपने वृत्तान्त में तमसा, गंगा, जलपान, निषादराज की सेवा और जटाओं की तैयारी बताते हैं। नाव पर पहले सीता, फिर राम और आज्ञा लेकर लक्ष्मण चढ़ते हैं।
पिता की कुशल सब संदेशों के बीच
राम ने सुमंत्र को तात कहकर पिता के लिये प्रणाम भेजा था। उनकी ओर से राजा के चरणकमल बार बार पकड़ने और पाँव पड़कर विनती करने को कहा। इस विनती में पिता को अपनी चिन्ता छोड़ने का आश्वासन देना है। राम कहते हैं कि पिता की कृपा, अनुग्रह और पुण्य से वन तथा मार्ग में उनका कुशल मंगल होगा। जिसके वन में जाने से पिता व्याकुल हैं, वही पुत्र अपने मार्ग के मंगल का आधार पिता के पुण्य को बता रहा है। प्रणाम के साथ यह भरोसा भी मंत्री को सौंपा गया है।
आगे राम पिता के अनुग्रह से वन जाते हुए सब सुख पाने की बात कहते हैं। आज्ञा का भलीभाँति पालन करेंगे और फिर कुशलपूर्वक लौटकर उनके चरणों का दर्शन करेंगे। इस संदेश में वन जाना, आज्ञा निभाना और लौटकर मिलना एक साथ आते हैं। पिता के सामने केवल बिछुड़ने का समाचार न रहे, इसलिये वापसी का आश्वासन भी उसी में रखा गया है। सुमंत्र को उस आश्वासन का वाहक बनना है। छन्द पिता से कही जानेवाली बात के बाद सभी माताओं के प्रति मंत्री का काम भी पूरा बताता है।
तुम्हरें अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं।
सोरठा १५१ से पूर्व का छन्द
प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं॥
जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी।
तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी॥
सब माताओं के चरणों में बार बार पड़कर उनका समाधान करना है, उनसे बहुत विनती करनी है। कोई एक माता इस निर्देश का अकेला विषय नहीं है। राम की चिन्ता में सभी हैं। तुलसी छन्द के अन्त में यह प्रयत्न सामने रखते हैं कि कोसल के स्वामी कुशल रहें। पिता के लिये प्रणाम और आश्वासन के बाद माताओं को सन्तोष दिलाने का काम भी उसी कुशल से जुड़ता है। संदेश अपने प्रत्येक सम्बोधन में घर के भीतर फैले शोक को सँभालने का कोई उपाय खोजता है।
गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि।
सोरठा १५१
करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति॥ १५१॥
गुरु के लिये अलग संदेश है। पोद्दार जी टीका में उन्हें वसिष्ठ कहते हैं। सुमंत्र को उनके चरणकमल बार बार पकड़कर निवेदन करना है कि वे ऐसा उपदेश दें जिससे अवधपति राम की चिन्ता न करें। गुरु की भूमिका समझाने और धैर्य देने की है। पिता को पुत्र ने आश्वासन भेजा है, माताओं के लिये विनती रखी है और अब गुरु से वह उपदेश माँगा है जिससे पिता का सोच घटे। प्रत्येक व्यक्ति से उसके सम्बन्ध के अनुसार सहायता माँगी गयी है।
फिर नगर के सभी लोगों और परिजनों की बारी आती है। सुमंत्र उनसे अनुरोध करके राम की विनती सुनायें। राम कहते हैं कि उनका सब प्रकार से हित करनेवाला वही है जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें। इस वचन में राम के हित का मार्ग अवध में रह गये राजा की देखभाल से जुड़ता है। जो लोग राम से प्रेम रखते हैं, उनके सामने करने योग्य काम रखा गया है। वे पिता को सुखी रखने का यत्न करें। वन में जानेवाले पुत्र का यह संदेश नगर के लोगों और घर के कुटुम्बियों, दोनों को सम्बोधित है।
राम पिता को प्रणाम, कुशल और लौटने का आश्वासन भेजते हैं। सुमंत्र को सभी माताओं का समाधान करना है। गुरु से पिता की चिन्ता मिटानेवाला उपदेश माँगा गया है, और नगरवासियों तथा परिजनों से राजा को सुखी रखने का प्रयत्न करने की विनती है।
भरत के लिये वचन, सीता की रुकी हुई वाणी
भरत के लिये संदेश उनके आने पर कहना है। राम का पहला निर्देश राजपद मिलने पर भी नीति न छोड़ने का है। राजा का पद मिलने और नीति बने रहने को एक साथ रखा गया है। इसके बाद प्रजा के पालन की बात आती है, कर्म से, मन से और वाणी से। शासन का दायित्व तीनों में व्यक्त होना चाहिये, यही राम का संदेश है। फिर घर की ओर बात लौटती है। सभी माताओं को समान जानकर उनकी सेवा करनी है। यह समानता भी भरत को सौंपे जा रहे दायित्व का स्पष्ट हिस्सा है।
कहब सँदेसु भरत के आएँ । नीति न तजिअ राजपदु पाएँ॥
चौपाई ७
पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी॥
राम भाई को पिता, माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपना अन्त तक निभाने को कहते हैं। राजपद, प्रजा और माताओं के बाद इस वचन में सम्बन्ध को निभाते रहने की बात आती है। घर के लोगों की सेवा उसी भाईपने का कार्य है। फिर सुमंत्र के लिये तात का सम्बोधन लौटता है। राजा को उस प्रकार रखना है जिससे वे कभी राम का सोच न करें। भरत के आने पर सुनानेवाले संदेश के साथ मंत्री के सामने भी पिता की देखभाल का आग्रह बना रहता है। राम ने जिन जिन लोगों का नाम या सम्बन्ध लिया है, सबकी ओर से राजा को सहारा मिलना चाहिये।
इतने संदेशों के बाद सुमंत्र लक्ष्मण की बात बताते हैं। लक्ष्मण ने कुछ कठोर वचन कहे थे। उनकी कठोरता का उल्लेख मिलता है, पर वे शब्द यहाँ बताये नहीं जाते। राम ने उन्हें बरजा और फिर सुमंत्र से निहोरा किया। उन्होंने बार बार अपनी शपथ दिलाकर कहा कि लक्ष्मण का लड़कपन वहाँ न कहें। मंत्री राजा को यह बताते हैं कि कठोर वाणी हुई थी और राम ने उसे आगे कहने से रोका था। उस वाणी का विषय और उसके वास्तविक शब्द अनकहे ही रहते हैं।
यह संयम उन्हीं संदेशों के साथ आता है जिनमें पिता की कुशल का आग्रह बार बार था। राम ने मंत्री को प्रणाम और आश्वासन सुनाने को कहा था, माताओं का समाधान करने और गुरु का उपदेश पाने को कहा था। लक्ष्मण के कठोर शब्दों को आगे न ले जाने का अनुरोध भी उसी विदाई में है। सुमंत्र उनकी कही बातों के साथ इस अनुरोध का समाचार देते हैं। राजा के सामने आनेवाला संदेश इसलिए अनेक लोगों की चिन्ता, सेवा और धैर्य की विनती से बना है।
कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।
दोहा १५२
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह॥ १५२॥
सीता ने भी प्रणाम कहा और कुछ कहना चाहा था। स्नेह के कारण वे शिथिल हो गयीं। उनकी वाणी रुक गयी, आँखों में जल भर आया और शरीर रोमांच से भर गया। सुमंत्र उनके लिये कोई पूरा वाक्य नहीं सुना पाते, क्योंकि उस समय वह वाक्य बन ही नहीं पाया था। राम के इतने विस्तृत संदेशों के बाद यह रुकी हुई वाणी आती है। उसका समाचार वही है जो मंत्री ने देखा, प्रणाम, कहने का प्रयत्न, आँसू और रोमांच। कथा की इस घड़ी में नाव पर तीनों हैं और सीता का स्नेह बोलने की क्षमता से आगे चला गया है।
भरत को नीति, मन वचन कर्म से प्रजा का पालन, सभी माताओं की समान सेवा और अन्त तक भाईपना निभाने का संदेश है। लक्ष्मण के कठोर शब्द राम आगे सुनाने से रोकते हैं। सीता प्रणाम के बाद कुछ कहना चाहती हैं, पर स्नेह से उनकी वाणी रुक जाती है।
और अन्त में, अपनी ओर
सुमंत्र की वापसी में संदेश ले जाने की कठिनाई पूरी दिखाई देती है। मार्ग में वे सोचते हैं कि किसको क्या उत्तर देंगे। महल में रानियाँ पूछती हैं तो बोल नहीं पाते। राजा के सामने धैर्य धरकर बोलते हैं तो राम के वचन सुनाने का दायित्व निभता है। अपने मन का भारी शोक साथ लिये हुए उन्हें दूसरे के शोक के लिये सान्त्वना पहुँचानी है। गुह ने उन्हें सँभाला था, अब वे दशरथ को सँभालने का प्रयत्न करते हैं।
हम राम के संदेशों को साथ पढ़ें तो उनकी बार बार लौटती हुई चिन्ता सामने रहती है, पिता कुशल रहें। माताएँ, गुरु, नगर के लोग, परिजन और भरत, सभी से उनके सम्बन्ध के अनुसार आग्रह किया गया है। वन की दूरी में भी घर के लिये सेवा का काम सोचा गया है। आरम्भ में पलकों की तरह सँभालने की छवि थी। अन्त तक वही देखभाल संदेशों में फैलकर अवध के उन लोगों तक पहुँचती है जिन्हें राम अपने पास से आश्वासन भेज सकते हैं।
राजा ने सुमंत्र से तीनों का समाचार माँगा था। मंत्री के वृत्तान्त में अब राम के वचन, लक्ष्मण के रोके गये कठोर शब्द और सीता का अधूरा कह पाना आ चुका है। सीता के लिये दोहा प्रणाम और आँसुओं पर ठहरता है। उनके मुख से पूरा संदेश नहीं निकलता, फिर भी उनका स्नेह उसी रुकी हुई वाणी में उपस्थित है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १४२ से १५२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।