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भरत का राजगद्दी से इनकार

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · भरत का राजगद्दी से इनकार

भरत का राजगद्दी से इनकार

राज्य स्वीकार करने की सम्मति के सामने भरत अपनी पूरी व्यथा रखते हैं। राम की सेवा ही उनका हित है, और अगली सुबह उन्हीं के पास चलने का प्रस्ताव सभा को नया सहारा देता है।

भरत के सामने राज्य करने की सलाह है। गुरु का उपदेश, प्रजा और मन्त्रियों की सम्मति, माता की आज्ञा, सब एक ओर हैं। भरत इन सबका आदर करते हैं। वे जानते हैं कि उनके हित के लिये ही इतनी बात कही गयी है। फिर भी हृदय को सन्तोष नहीं मिलता। पिता स्वर्ग सिधार गये हैं और सीताराम वन में हैं। ऐसी दशा में अपने लिये राजगद्दी का नाम सुनना उनके लिये एक और पीड़ा हो गया है।

तुलसीदास के इस प्रसंग में भरत अपना उत्तर पूरा कहते हैं। उसमें बड़ों की आज्ञा का मान है, स्वयं पर कठोर आरोप हैं, माता के किये पर तीखा व्यंग्य है और राम की करुणा पर ऐसा भरोसा है जिससे अन्ततः आगे का उपाय निकलता है। उनके शब्द सुनकर सभा भी अपनी बात बदलती है। जिस उत्तर में भरत अपनी बात कहने की क्षमा माँगते हैं, उसी के अन्त में शोक से डूबे लोगों को आश्रय मिलता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • भरत राज्य स्वीकार करने की सलाह का उत्तर देते हुए राम की सेवा और उनके दर्शन को अपना हित माननेवाले भाई।
  • राम, सीता और लक्ष्मण वन में जिनके रहने का दुःख भरत की पूरी विनती में बना हुआ है।
  • गुरु भरत जिनके विवेक का आदर करते हैं और जिनसे अपने अनुकूल शिक्षा तथा आशीर्वाद चाहते हैं।
  • राम की माता भरत जिनकी सरलता और अपने प्रति विशेष प्रेम को पहचानते हैं।
  • कैकेयी जिनके किये के लिये भरत स्वयं को कठोर शब्दों में दोष देते हैं।
  • मन्त्री और नगरवासी भरत की बात सुनकर वन जाने के प्रस्ताव को स्वीकार करनेवाली सभा के सहभागी।

आज्ञा का आदर, हृदय की असन्तुष्टि

भरत पहले उस शिक्षा की अच्छाई स्वीकार करते हैं जिसका उत्तर देना है। गुरुजी ने सुन्दर उपदेश दिया है, प्रजा और मन्त्री भी उसी से सहमत हैं। माता ने उचित समझकर आज्ञा दी है और भरत उसे सिर पर रखकर करना चाहते हैं। अपने पहले ही वाक्य में वे सभा को आश्वस्त कर देते हैं कि उसके प्रति उनके मन में अनादर नहीं है। जो बात उन्हें स्वीकार करने में कष्ट है, उसे कहनेवालों के प्रेम को वे पहचानते हैं।

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका । प्रजा सचिव संमत सबही का॥
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा । अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥

चौपाई १

इसके बाद वे बड़ों की वाणी मानने का नियम स्वयं कहते हैं। गुरु, पिता, माता, स्वामी और हितैषी की बात सुनकर प्रसन्न मन से उसे भली जानना और उसका पालन करना चाहिये। भरत के कथन में ऐसी वाणी के सामने उचित और अनुचित का हिसाब लगाते रहने से धर्म जाता है और सिर पर पाप का भार चढ़ता है। सभा को यह नियम भरत को समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उत्तर देनेवाले ही उसकी पूरी गम्भीरता स्वीकार कर रहे हैं।

इसी स्वीकार के बाद उनका मन खुलता है। वे कहते हैं कि आप मुझे वही सरल शिक्षा देते हैं जिसके आचरण से मेरा भला हो। यह बात भलीभाँति समझ में आती है, फिर भी जी का सन्तोष नहीं होता। समझ लेना और सन्तुष्ट हो जाना यहाँ अलग अनुभव हैं। भरत को सलाह देनेवालों की नीयत पर अविश्वास नहीं है। कठिनाई उस जीवन की है जिसे यह सलाह उनसे जीने के लिये कह रही है। राम के वन में रहते हुए अपना राज्य करना उनके हृदय में बैठता ही नहीं।

अब वे सब लोगों से अपनी विनती सुन लेने को कहते हैं। शिक्षा उनकी योग्यता के अनुसार दी जाये, यह उनका आग्रह है। साथ ही उत्तर देने के अपराध की क्षमा माँगते हैं। वे साधु पुरुषों की करुणा का स्मरण कराते हैं, दुखी व्यक्ति के गुण और दोष गिनने में वे नहीं लगते। अपनी बात कहने का अवकाश भी भरत इसी दया से माँग रहे हैं। उनके लिये गुरु का सम्मान और अपनी वास्तविक दशा का निवेदन, दोनों साथ निभने हैं।

पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।
एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु॥ १७७॥

दोहा १७७

दोहा आते ही भरत सबको अपनी परिस्थिति एक साथ दिखा देते हैं। पिता स्वर्ग में हैं, सीता और राम वन में हैं, और उन्हें राज्य करने को कहा जा रहा है। इन तीन बातों को एक साथ रख देने से राज्य की सलाह का भार बदल जाता है। वह अब किसी सामान्य उत्तराधिकारी के लिये कही गयी बात नहीं रह जाती। उसके सामने पिता का वियोग और सीताराम का वनवास है। भरत पूछते हैं कि इस सलाह में आप मेरा हित समझते हैं, अथवा इससे अपना कोई बड़ा काम होने की आशा रखते हैं।

प्रश्न में अपना कल्याण और सभा का कार्य, दोनों हैं। भरत आगे दोनों का उत्तर देंगे। पहले वे समझायेंगे कि स्वयं उनके लिये हित किसमें है। फिर इस आशा को भी परखेंगे कि उनके राजा होने से दूसरों को सुख मिल सकेगा। इसलिए यह प्रश्न केवल दुःख का उद्गार होकर नहीं रह जाता। पूरी विनती इसी से आगे बढ़ती है और उन कारणों को खोलती है जिनसे राजतिलक का प्रस्ताव उन्हें असह्य लगता है।

भरत गुरु, माता और सभा की हितकारी भावना स्वीकार करते हैं, पर अपने हृदय की असन्तुष्टि छिपाते नहीं। क्षमा माँगकर वे पूछते हैं कि पिता के स्वर्गगमन और सीताराम के वनवास के बीच उनका राज्य करना किसका हित करेगा।

राम के बिना किस वस्तु का मूल्य

अपने कल्याण की बात भरत निश्चय से कहते हैं। उनका हित सीतापति राम की चाकरी में है। माता की कुटिलता ने वही सेवा छीन ली, ऐसा उनका कहना है। उन्होंने मन में विचार करके देख लिया है कि दूसरा कोई उपाय उनके लिये कल्याणकारी नहीं है। जिस सेवा को वे अपना हित कहते हैं, उसके सामने राज्य कोई अधिक बड़ा लाभ नहीं बनता। उसका मिलना उस एक हानि की पूर्ति नहीं कर सकता।

लक्ष्मण, राम और सीता के चरणों का दर्शन न हो तो राज्य किस गिनती में आयेगा। भरत उसे शोक का समुदाय कहते हैं। जिनके बिना जीवन सूना है, उनकी अनुपस्थिति में मिलनेवाली सम्पदा पर उनका मन ठहर नहीं पाता। इस भाव को समझाने के लिये वे कई उदाहरण देते हैं। हर उदाहरण में बाहर से मूल्यवान दिखनेवाली वस्तु है, और उसके साथ वह आवश्यक आधार है जिसके बिना उसका मूल्य समाप्त हो जाता है।

सोक समाजु राजु केहि लेखें । लखन राम सिय बिनु पद देखें॥
बादि बसन बिनु भूषन भारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू॥

चौपाई २

पहला उदाहरण वस्त्र के बिना आभूषणों का है। आभूषण अपने स्थान पर सुन्दर और मूल्यवान हो सकते हैं, पर यहाँ वे केवल भार हो गये हैं। वस्त्र का अभाव उनके होने का अर्थ बिगाड़ देता है। दूसरा उदाहरण वैराग्य के बिना ब्रह्मविचार का है। ऊँचे विषय पर विचार करने का नाम भर पर्याप्त नहीं, भरत उसके साथ विरक्ति का होना आवश्यक बताते हैं। बाहर की शोभा के बाद वे भीतर की साधना पर आते हैं। दोनों जगह किसी वस्तु की महानता उसके आवश्यक आधार से जुड़ी हुई है।

सरुज सरीर बादि बहु भोगा । बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥
जायँ जीव बिनु देह सुहाई । बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥

चौपाई ३

तीसरा उदाहरण रोगी शरीर और अनेक भोगों का है। शरीर रोग से पीड़ित हो तो भोगों का ढेर सुख नहीं दे पाता। चौथा उदाहरण हरि की भक्ति के बिना जप और योग का है। भरत के भक्तिभाव में इन साधनों को फलदायी करनेवाला सम्बन्ध हरि से है। पाँचवाँ उदाहरण सबसे निकट आ जाता है, जीव के बिना सुन्दर देह। रूप की सुन्दरता बनी हुई कल्पना कीजिये, पर उसे जीवन देनेवाला ही न रहे। तब उस सौन्दर्य का क्या प्रयोजन होगा।

इन पाँचों के बाद भरत अपनी बात रखते हैं कि रघुनाथ के बिना उनका सब कुछ व्यर्थ है। वस्त्र और आभूषण, वैराग्य और ब्रह्मविचार, रोग और भोग, भक्ति और साधना, जीव और शरीर, इतने भिन्न उदाहरण एक ही अनुभव को खोलते हैं। हर बार किसी उपलब्धि की बाहरी गिनती से ध्यान हटकर उसके भीतर के आधार पर जाता है। भरत अपने लिये राम का वही स्थान मानते हैं। उनके बिना राज्य की सम्पन्नता भी भरत को जीवन से भरी हुई वस्तु नहीं लगती।

इसलिए वे आज्ञा माँगते हैं कि राम के पास जाने दिया जाये। उनके मन का निश्चय एक है, हित वहीं है। दोहे में जो दूसरा प्रश्न रखा था, उसका उत्तर भी अब देते हैं। यदि सभा उन्हें राजा बनाकर अपना भला चाहती है तो भरत की दृष्टि में वह भी स्नेह की जड़ता से कही हुई बात है। प्रेम के कारण सब उन्हें योग्य मान रहे हैं। अपने प्रति उसी प्रेम को वे सलाह के पीछे देखते हैं, पर उससे मिलनेवाले सुख की आशा स्वीकार नहीं कर पाते।

कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज॥ १७८॥

दोहा १७८

यहाँ भरत अपने लिये अत्यन्त कठोर विशेषण कहते हैं। कैकेयी का पुत्र, कुटिल बुद्धिवाला, राम से विमुख, लज्जा से रहित और अधम, इस तरह वे अपनी निन्दा करते हैं। उनका कहना है कि ऐसे व्यक्ति के राज्य से सुख की आशा करना मोह का ही परिणाम होगा। इन शब्दों में भरत का स्वयं पर लगाया आरोप है। जिस कारण वे राजगद्दी से पीछे हट रहे हैं, उसी के दुःख में वे अपने समूचे अस्तित्व को दोषपूर्ण कहने लगते हैं। सभा को उनसे सुख की आशा है, और उन्हें अपने राज्य में सबकी पीड़ा ही दिखाई देती है।

भरत पाँच उदाहरणों से बताते हैं कि आवश्यक आधार के बिना मूल्यवान वस्तु भी व्यर्थ हो जाती है। उनके लिये वह आधार राम की सेवा है। वे राम के पास जाने की आज्ञा चाहते हैं और अपने राज्य से सुख की आशा को स्नेहजनित मोह कहते हैं।

जीवित रहने पर भी स्वयं को दोष

भरत अब धर्मशील राजा की आवश्यकता पर आते हैं। वे सबको अपनी बात सत्य मानकर सुनने के लिये कहते हैं। राजा धर्मशील होना चाहिये, और स्वयं को उस योग्य वे नहीं मानते। उनका कथन इतना कठोर हो जाता है कि यदि हठ करके उन्हें राज्य दिया गया तो उसी समय पृथ्वी पाताल में धँस जायेगी। यह भरत की अपने राज्य के प्रति घोर आशंका है। जिस अधिकार को सभा सहारा समझती है, वही अधिकार अपने हाथ में आने की कल्पना उन्हें विनाशकारी लगती है।

वे अपने को पापों का घर कहते हैं। कारण यही रखते हैं कि उनके लिये सीता और राम का वनवास हुआ। पिता ने राम को वन दिया और उनसे बिछुड़ते ही स्वर्ग चले गये। भरत इस घटना के सामने अपने जीवित रहने को रख देते हैं। वे कहते हैं कि मैं, जिसे वे सारे अनर्थ का कारण कहते हैं, होश में बैठा सब बातें सुन रहा हूँ। पिता का रामवियोग और अपने प्राणों का अभी बने रहना, इन दोनों का अन्तर उन्हें स्वयं पर और कठोर बना देता है।

राम से रहित घर देखकर भी प्राण नहीं निकले। संसार का उपहास सहकर भी जीवन बना हुआ है। भरत अपने जीवन के इसी बने रहने की व्याख्या बड़ी निर्दयता से करते हैं। उनके अनुसार ये प्राण रामरूपी पवित्र रस में अनुरक्त नहीं हैं, इन्हें भूमि और भोग की भूख है। इस आत्मनिन्दा में वही राज्य फिर लौट आता है जिसे देने का आग्रह हो रहा है। जिस लोभ को वे अपने लिये सबसे लज्जाजनक मानते हैं, उसी का दोष अपने प्राणों पर लगा रहे हैं।

फिर अपने हृदय की कठोरता कहाँ तक कही जाये, यह पूछते हैं। उन्हें लगता है कि उसने वज्र को भी छोटा कर दिया है। पिता वियोग सह न सके और वे सब सुनते हुए भी बने हैं, इसलिए अपने को पिता के प्रेम की कसौटी पर अयोग्य मान रहे हैं। भरत का दुःख यहाँ किसी दूसरे के अपराध का लेखा बनकर समाप्त नहीं होता। वह उनके भीतर लौटता है और जीवन, हृदय तथा सम्बन्ध, सबको प्रश्नों में घेर लेता है।

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर।
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर॥ १७९॥

दोहा १७९

दोहा इस कठोरता को दो वस्तुओं से समझाता है। कारण से उत्पन्न कार्य उससे भी कठोर हो जाता है, ऐसा भरत कहते हैं। हड्डी से वज्र अधिक कठोर है, पत्थर से लोहा अधिक भयानक और कठोर है। इस तर्क के बीच वे कहते हैं कि इसमें उनका दोष नहीं। अपने पक्ष में कही गयी यह बात भी आत्मनिन्दा को और तीखा करती है। कैकेयी से उत्पन्न होकर स्वयं को उनसे भी कठोर मानने का संकेत इन उदाहरणों में है। कारण और परिणाम की सामान्य बात उनके मुँह से अपने जन्म का कटु हिसाब बन गयी है।

आगे वे कैकेयी से उत्पन्न शरीर में प्रेम रखनेवाले अपने प्राणों को पूरी तरह अभागा कहते हैं। प्रिय के वियोग में भी यदि प्राण प्यारे बने हुए हैं तो अभी आगे बहुत कुछ देखना और सुनना पड़ेगा। वे किसी नयी घटना की सूचना नहीं देते। वर्तमान दुःख के बीच अपने जीवित रहने को ही आनेवाले दुःखों की सम्भावना से भर देते हैं। उनके लिये यह विचार भी सान्त्वना नहीं बनता कि वे अभी राम से मिलने का उपाय कर सकते हैं। उस उपाय तक पहुँचने से पहले विनती में उनकी सारी आत्मग्लानि खुलती है।

धर्मशील राजा की आवश्यकता कहते हुए भरत स्वयं को अयोग्य ठहराते हैं। पिता के वियोगजनित प्राणत्याग के सामने अपना जीवित रहना उन्हें कठोरता लगता है। हड्डी और वज्र, पत्थर और लोहे के उदाहरण भी वे अपनी आत्मनिन्दा में रखते हैं।

कैकेयी ने किसे क्या दिया

भरत अब माता के किये को एक बँटवारे की तरह सामने रखते हैं। उस बँटवारे में हर किसी को कुछ मिला है, पर एक भी प्राप्ति ऐसी नहीं जिसे सुनकर सुख हो। लक्ष्मण, राम और सीता को वन दिया गया। पति को स्वर्ग भेजकर उनका हित कर दिया गया। अपने लिये कैकेयी ने विधवापन और अपयश लिया, और प्रजा के भाग में शोक तथा सन्ताप रख दिया। परिवार और नगर का समूचा दुःख भरत एक ही क्रम में गिना देते हैं।

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा । पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू । दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥

चौपाई ४

पति का हित करने की बात इस दुःखभरी गिनती में व्यंग्य से आती है। स्वर्ग भेज देना दशरथ के चले जाने का उल्लेख है, और उसके साथ कैकेयी के विधवापन का नाम भी है। एक सम्बन्ध टूटा है तो उसकी पीड़ा दोनों ओर दर्ज है। वन पानेवालों में भी तीनों के नाम लिये जाते हैं। भरत की विनती सीताराम के दर्शन पर केन्द्रित है, पर माता के किये का लेखा देते समय वे लक्ष्मण को अलग नहीं छोड़ते। प्रजा भी इस पारिवारिक विपत्ति से बाहर नहीं है।

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू । कीन्ह कैकईं सब कर काजू॥
एहि तें मोर काह अब नीका । तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥

चौपाई ५

अब भरत अपना भाग बताते हैं, उन्हें सुख मिला, सुन्दर यश मिला और उत्तम राज्य मिला। सबका काम कैकेयी ने बना दिया। इतने दुःखों की सूची के बाद अपने सुख की यह घोषणा सुनते ही उसका कटु आशय स्पष्ट हो जाता है। भरत उस उपलब्धि का उपहास कर रहे हैं जिसे उनके लिये लाभ बताया जा रहा है। वे पूछते हैं कि इससे अच्छा उनके लिये और क्या होगा, और फिर भी आप सब ऊपर से राजतिलक देना चाहते हैं। उनके कथन में तिलक इस दुःखभरे बँटवारे को और पक्का कर देनेवाली बात हो गया है।

वे कहते हैं कि कैकेयी के गर्भ से जन्म लेने पर उनके लिये यह सब अनुचित भी क्या है। विधाता ने उनकी सारी बात बना दी है, फिर प्रजा और पंच उसमें सहायता क्यों कर रहे हैं। यही व्यंग्य सभा की सलाह तक पहुँचता है। भरत को लगता है कि जो अनर्थ उनके लिये पहले ही पर्याप्त है, उसे दूर करने के नाम पर और बढ़ाया जा रहा है। इसी भाव के बाद वे उपचार का एक विचित्र उदाहरण रखते हैं। उसमें एक कष्ट के ऊपर दूसरा कष्ट पड़ता जाता है।

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥ १८०॥

दोहा १८०

पहले किसी व्यक्ति को ग्रह ने पकड़ रखा है। पोद्दार जी इसकी व्याख्या कुग्रह से पीड़ित होने के रूप में करते हैं और पिशाचग्रस्त होने का दूसरा अर्थ भी देते हैं। फिर वह वायुरोग से पीड़ित है। उसी को बिच्छू डंक मार देता है। इन सबके ऊपर यदि उसे मदिरा पिलायी जाये तो यह कैसा उपचार कहलायेगा, भरत पूछते हैं। उदाहरण अपने समय की रोग और बाधा सम्बन्धी भाषा में है। उसमें दिये गये कष्टों को एक-एक करके जोड़ने पर ही प्रश्न की पूरी तीव्रता बनती है।

राजतिलक की सलाह को भरत इसी अन्तिम उपचार के स्थान पर रखते हैं। जिन विपत्तियों से वे पहले ही घिरे अनुभव करते हैं, उनके रहते यह नया सम्मान कैसे चैन देगा। पहले का व्यंग्य यहाँ उपमा में पूरा हो जाता है। सबका काम बना देने की बात और उपचार की बात, दोनों में एक ही वेदना है, जिसे सभा लाभ कह रही है वह भरत के लिये कष्ट बढ़ानेवाली वस्तु है। इसलिए उनकी विनती में राजगद्दी का इनकार केवल पद छोड़ देने की घोषणा नहीं, उस कथित लाभ का अर्थ खोलना भी है।

भरत कैकेयी के किये को कटु व्यंग्य में गिनाते हैं, वनवास, दशरथ का स्वर्गगमन, विधवापन, अपयश और प्रजा का सन्ताप। अपने लिये सुख, यश और राज्य मिलने की बात भी उसी व्यंग्य का हिस्सा है। राजतिलक उन्हें अनेक कष्टों पर और कष्ट जोड़ने जैसा लगता है।

माता का प्रेम, गुरु का विवेक

भरत फिर अपने जन्म और सम्बन्धों की ओर लौटते हैं। वे कहते हैं कि कैकेयी के पुत्र के लिये संसार में जो योग्य था, चतुर विधाता ने वही उन्हें दिया। लेकिन दशरथ का पुत्र और राम का छोटा भाई कहलाने की बड़ाई व्यर्थ दे दी। वे इन दोनों सम्बन्धों से अपने को अलग घोषित नहीं करते। उनकी कसक यह है कि इनके गौरव के योग्य जीवन अपने भीतर नहीं देख पाते। माता के पुत्र होने का दोष वे पूरा स्वीकार करते हैं और पिता तथा भाई से मिलनेवाले मान को अपने लिये निष्फल बताते हैं।

सभा अब भी तिलक कराने को कह रही है। भरत मानते हैं कि राजा की आज्ञा सबके लिये भली है। फिर पूछते हैं कि किसे किस प्रकार उत्तर दिया जाये। जिसकी जैसी रुचि है वह सुखपूर्वक अपनी बात कहे। अनेक हितैषियों की सम्मति के बीच अपने मन की बात कहने की कठिनाई इसमें सुनाई देती है। वे किसी एक व्यक्ति से विवाद नहीं कर रहे, सब ओर से आये स्नेह और सलाह के सामने अपना असमर्थ हृदय रख रहे हैं।

वे पूछते हैं कि उनकी कुमाता और उन्हें छोड़कर और कौन कहेगा कि यह अच्छा किया गया। जड़ और चेतन जगत में उनके सिवा कौन है जिसे सीताराम प्राणों के समान प्रिय न हों। अपनी निन्दा का यह विस्तार भी भरत की वाणी का ही है। वे अपने को समस्त जगत से अलग, प्रेम में सबसे पीछे मान रहे हैं। इसलिए जहाँ सबको बड़ा लाभ दिखता है, वहाँ उन्हें परम हानि दिखती है। वही राज्य दो दृष्टियों में कितना अलग हो गया है।

इतनी पीड़ा कहने पर भी वे दूसरों पर दोष नहीं रखते। उनका कहना है कि बुरा दिन उनका है, किसी और का दोष नहीं। सभा के लोग संशय, शील और प्रेम के वश हैं, इसलिए जो कह रहे हैं वह उचित ही है। आरम्भ में स्वीकार किये गये सद्भाव का मान यहाँ फिर बना रहता है। अपना विरोध स्पष्ट करने के लिये भरत को बड़ों की बुद्धि या उनकी भावना का अपमान करना आवश्यक नहीं लगता। वे प्रत्येक सम्बन्ध को उसकी अपनी कोमलता में समझते हैं।

राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि॥ १८१॥

दोहा १८१

राम की माता के लिये वे विशेष रूप से कहते हैं कि उनका चित्त बहुत सरल है और भरत पर उनका प्रेम विशेष है। भरत की दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेह से ऐसा कह रही हैं। जिस सलाह को स्वीकार नहीं कर पा रहे, उसके भीतर माता का दुःख और उनका वात्सल्य पहचानते हैं। माता उन्हें राज्य लेने को कहती हैं तो उसमें भरत अपने प्रति उनका सच्चा प्रेम देखते हैं। अपने को सर्वथा दोषपूर्ण कहनेवाले भरत दूसरे के प्रेम को समझने में इतने उदार बने हुए हैं।

गुरु के विषय में भी वे पहले उनका परिचय आदर से देते हैं। गुरु विवेक के समुद्र हैं, संसार यह जानता है। उनके लिये विश्व हाथ पर रखे बेर की तरह है, इतना स्पष्ट और जाना हुआ। फिर भी वही गुरु भरत के तिलक का साज सजा रहे हैं। भरत इस बात का कारण गुरु के ज्ञान में कमी को नहीं बताते। उनका निष्कर्ष अपने प्रतिकूल विधाता की ओर जाता है, जब विधाता विमुख होता है तो सभी विमुख हो जाते हैं।

माता की सरलता और गुरु का विवेक, दोनों का पूरा सम्मान इस उत्तर में बचा है। माँ के वचन की जड़ प्रेम है, गुरु की महिमा ज्ञान है। भरत अपनी कठिन दशा को इनके सामने रखते हुए भी इन्हें तुच्छ नहीं करते। उन्हें अपना भाग्य प्रतिकूल लगता है, और उसी के भीतर सबकी अच्छी भावना भी ऐसा परिणाम देने लगती है जो उनके लिये सहनीय नहीं। यह सम्बन्धों से घिरी हुई विनती है, जिसमें असहमति कहते समय भी प्रत्येक बड़े के लिये स्थान सुरक्षित रहता है।

भरत अपने पिता और भाई के गौरव को अपने लिये व्यर्थ बताते हैं, पर हितैषियों के प्रेम का मान रखते हैं। राम की माता की सरलता और गुरु के विवेक को स्वीकार करके वे अपनी पीड़ा को प्रतिकूल भाग्य की दशा में समझाते हैं।

एक ही दावानल

अब भरत उस आरोप की बात करते हैं जो संसार उनके ऊपर लगा सकता है। उनका मानना है कि राम और सीता के सिवा कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थ में भरत की सम्मति नहीं थी। इतने लोगों के बीच वे केवल उन्हीं दोनों से अपने मन के समझे जाने का भरोसा रखते हैं। जिनका वनवास उन्हें सबसे अधिक जला रहा है, उन्हीं से यह आशा है कि वे उनकी इच्छा को पहचानेंगे। यह भरोसा आगे राम के पास जाने के निश्चय का आधार बनेगा।

संसार यदि उन्हें सम्मतिदाता कहे तो वह सुनने और सहने को तैयार हैं। वे इसे सुख मानकर सहने की बात कहते हैं और पानी के स्थान पर अन्ततः कीचड़ होने का उदाहरण देते हैं। अपयश की सम्भावना उन्हें अचरज नहीं लगती। उन्होंने अपने जन्म, प्राण और हृदय तक पर आरोप लगा लिये हैं। इसलिए दूसरों की निन्दा उनके मन की सबसे बड़ी चिन्ता नहीं रह गयी है। अब वे उस एक चिन्ता को साफ़ नाम देते हैं जिसके सामने बाकी सब छोटा पड़ता है।

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू । परलोकहु कर नाहिन सोचू॥
एकइ उर बस दुसह दवारी । मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥

चौपाई ६

न संसार के बुरा कहने का डर है, न परलोक का सोच। हृदय में एक असह्य दावानल धधक रहा है कि उनके कारण सीताराम दुखी हुए। भरत के लिये पीड़ा का केन्द्र यही है। वे अपने यश को बचाने के लिये वन जाने की बात नहीं कर रहे। उनके शब्द बार-बार उन्हीं दो लोगों के दुःख पर लौटते हैं जिन्हें वे अपना सर्वस्व मानते हैं। राजतिलक उस दुःख को मिटा नहीं सकता, इसलिए अपने नाम के साथ राजा जुड़ जाने से भी उन्हें कोई सान्त्वना नहीं मिलती।

लक्ष्मण का स्मरण आते ही वे जीवन के लाभ का एक दूसरा रूप देखते हैं। लक्ष्मण ने सब छोड़कर राम के चरणों में मन लगा दिया और जीवन का उत्तम लाभ पा लिया। भरत की दृष्टि में सेवा से जुड़ा वह जीवन सफल है। अपने जन्म के बारे में वे फिर कठोर बात कहते हैं कि वह तो रघुवर को वन भेजने के लिये हुआ, अब अभागा व्यर्थ पछताकर क्या करे। दोनों भाइयों की तुलना में अपने प्रति उनकी निर्ममता और सेवा के प्रति उनका अनुराग, साथ प्रकट होते हैं।

आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ॥ १८२॥

दोहा १८२

सबको सिर नवाकर वे अपनी दारुण दीनता निवेदित करते हैं। अब पूरी बात एक वाक्य में आ जाती है, रघुनाथ के चरणों को देखे बिना हृदय की जलन नहीं जायेगी। जिस दर्शन के बिना आरम्भ में राज्य व्यर्थ कहा था, वही दर्शन यहाँ उपचार बनकर सामने है। भरत अपनी पीड़ा का विस्तार बहुत कह चुके हैं। इस दोहे में वे उसकी निवृत्ति की एकमात्र आशा रखते हैं, राम के चरणों तक पहुँच सकना।

इसलिए यहाँ दर्शन की इच्छा केवल मिलने का सुख पाने की इच्छा नहीं रह गयी है। भरत उसे अपने भीतर की जलन से जोड़ते हैं। सामने पूरी सभा है, फिर भी मन की बात पूरी जानने का भरोसा राम पर है। अपनी दीनता का निवेदन सभी से करते हैं और शरण की आशा उन्हीं से रखते हैं। इन्हीं दोनों बातों को साथ लेकर अब वे सभा से एक निश्चित प्रस्ताव पर आज्ञा माँगेंगे।

भरत संसार के आरोप और परलोक की चिन्ता सहने को तैयार हैं। उनकी असह्य पीड़ा सीताराम का दुःख है। लक्ष्मण की सेवा को जीवन का लाभ कहकर वे सबके सामने निवेदन करते हैं कि राम के चरणों का दर्शन ही उनके हृदय की जलन मिटा सकेगा।

प्रातःकाल प्रभु के पास चलने का निश्चय

भरत को दूसरा उपाय नहीं सूझता। रघुवर के बिना उनके जी की बात कौन समझेगा। इस प्रश्न से वे अपना निश्चय स्पष्ट करते हैं, प्रातःकाल प्रभु के पास चलेंगे। अभी बात सभा में कही जा रही है, और चलने का समय अगली सुबह रखा गया है। इतना दुःख कह लेने के बाद उनके उत्तर को एक दिशा मिलती है। जिस सेवा को आरम्भ में अपना हित कहा था, उसी तक लौटने के लिये वे अब जाने का प्रस्ताव रखते हैं।

आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥
एकहिं आँक इहइ मन माहीं । प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥

चौपाई ७

इस निश्चय के साथ भरत स्वयं को निर्दोष बताने की शर्त नहीं जोड़ते। वे कहते हैं कि यद्यपि वे बुरे और अपराधी हैं तथा उनके कारण सब उपद्रव हुआ है, फिर भी राम उन्हें शरण में सम्मुख आया देखकर सब क्षमा कर देंगे और विशेष कृपा करेंगे। अपने विषय में कही गयी कठोर बात अभी बनी है। लेकिन उसके साथ राम के व्यवहार का भरोसा आ गया है। अपने दोष गिनते हुए जहाँ वे निराश हो जाते हैं, वहीं राम की करुणा स्मरण करके आगे का कदम सम्भव देखते हैं।

भरत राम के स्वभाव के कई गुण साथ कहते हैं। शील है, संकोच है, अत्यन्त सरल स्वभाव है, कृपा और स्नेह है। रघुराज इन सबके घर हैं। भरत को जिस क्षमा की आशा है, वह उसी स्वभाव से निकलती है। वे अपने लिये कोई अपवाद बनाये जाने की माँग नहीं कर रहे। जिस राम को वे जानते हैं, उनकी सहज करुणा पर भरोसा करके उनके सामने जाने की बात कह रहे हैं।

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ । कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥
अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा । मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥

चौपाई ८

भरत का तर्क है कि राम ने कभी शत्रु का भी अनिष्ट नहीं किया। वे यद्यपि अपने को टेढ़ा कहते हैं, फिर भी राम के बच्चे और सेवक हैं। शत्रु के प्रति अहित न चाहनेवाले स्वामी का स्वभाव अपने बच्चे और सेवक के सामने कैसा होगा, आशा इसी तुलना से बनती है। भाई का सम्बन्ध यहाँ सेवा और आश्रय की भाषा में आता है। भरत को अपने अधिकार का प्रमाण देने से अधिक राम के अपनेपन का भरोसा है।

अब वे पंचों से अपना कल्याण इसी में मानने को कहते हैं। सुन्दर वाणी से आज्ञा और आशीर्वाद मिले। उनकी चाह है कि राम विनती सुनें, उन्हें अपना दास जानें और फिर राजधानी लौट आयें। इस प्रार्थना में केवल भरत के निजी दर्शन का सुख नहीं है। जिसके अभाव में राज्य शोक का समुदाय लग रहा था, उन्हें राजधानी में वापस पाने की आशा भी है। इसलिए सभा से माँगा गया आशीर्वाद राम की वापसी की कामना को अपने भीतर रखता है।

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस॥ १८३॥

दोहा १८३

अन्तिम विश्वास कहते समय भी भरत अपने जन्म और दोषों को नहीं छिपाते। कुमाता से जन्म हुआ, वे अपने को दुष्ट और सदा दोषयुक्त कहते हैं। फिर भी रघुवीर पर भरोसा है कि अपना जानकर उन्हें छोड़ेंगे नहीं। पहले अपने प्राणों की कठोरता देखकर वे स्वयं को सर्वथा अयोग्य कह रहे थे। अब उसी अयोग्यता को लेकर शरण में जाने का साहस मिलता है। राम की कृपा पर भरोसा उनकी विनती को एक निश्चित अन्त देता है।

भरत अगली सुबह राम के पास जाने का प्रस्ताव रखते हैं। उन्हें विश्वास है कि शरण में आया देखकर राम क्षमा करेंगे। वे सभा से आज्ञा और आशीर्वाद चाहते हैं कि उनकी विनती सुनकर राम राजधानी लौट आयें।

भरत के वचनों से सभा को सहारा

भरत के वचन सबको प्रिय लगते हैं। तुलसी उन्हें राम के प्रेमरूपी अमृत में पगे हुए कहते हैं। जिन लोगों को रामवियोग के भीषण विष ने जला रखा था, वे मानो बीजसहित मन्त्र सुनकर जाग उठे। भरत के दुःखभरे उत्तर का परिणाम इस तरह जीवन की आशा में प्रकट होता है। अपने मन की जलन कहते-कहते उन्होंने दूसरों के लिये भी वह बात कह दी है जिससे उनकी व्याकुलता को अवलम्ब मिले।

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे । राम सनेह सुधाँ जनु पागे॥
लोग बियोग बिषम बिष दागे । मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥

चौपाई ९

माताएँ, मन्त्री, गुरु और नगर के स्त्री-पुरुष, सभी स्नेह से अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं। वे भरत को बार-बार सराहते हैं और उनके शरीर को राम के प्रेम की साक्षात् मूर्ति कहते हैं। भरत ने अपने शरीर और प्राणों को कठोर कहा था। सभा उसी भरत में रामप्रेम का प्रत्यक्ष रूप देखती है। एक ही व्यक्ति के विषय में उसके दुःख से निकला आत्मनिर्णय और प्रियजनों की पहचान कितने अलग हैं, यह उनके उत्तर से स्पष्ट होता है।

सब कहते हैं कि भरत ऐसा क्यों न कहें, वे राम को प्राणों के समान प्रिय हैं। फिर माता कैकेयी की कुटिलता के आधार पर भरत पर सन्देह करनेवाले के लिये वे अत्यन्त कठोर निन्दा कहते हैं। उनके कथन में ऐसा मूर्ख व्यक्ति करोड़ों पुरखों सहित सौ कल्प तक नरक में रहेगा। यह भरत के पक्ष में बोलती सभा की तीखी घोषणा है। माँ के किये को पुत्र की सम्मति मान लेने के विरुद्ध उनका आक्रोश इन शब्दों में आता है।

इसी बात को वे साँप और मणि के उदाहरण से समझाते हैं। साँप के पाप और अवगुण मणि ग्रहण नहीं करती। उनके कथन में मणि विष हरती है, दुःख और दरिद्रता को नष्ट करती है। पास होने और उससे उत्पन्न होने के सम्बन्ध में जिस दोष को भरत अपने ऊपर ले रहे थे, सभा इस उदाहरण से उसे अलग करती है। उसके लिये भरत का प्रेम अपना प्रकाश रखता है। कैकेयी की कुटिलता भरत के मन की पहचान का प्रमाण नहीं बन सकती।

अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह॥ १८४॥

दोहा १८४

अन्त में सब वन चलने की बात स्वीकार करते हैं, वहीं जहाँ राम हैं। वे भरत की सलाह को अच्छा कहते हैं। शोक के समुद्र में डूबते हुए सभी लोगों को भरत ने सहारा दिया है। अपने लिये कही गयी राजतिलक की सलाह का उत्तर देनेवाले भरत अब पूरे समाज को एक साझा प्रस्ताव दे चुके हैं। सभा उनके साथ उस प्रस्ताव को अपना लेती है। इस प्रसंग का अन्त इसी सम्मति और कृतज्ञता में होता है।

सभा भरत के वचनों में रामप्रेम पहचानती है, माता के दोष से उन्हें अलग मानती है और वन जाने की सलाह स्वीकार करती है। सब कहते हैं कि शोक में डूबे लोगों को भरत ने बड़ा सहारा दिया है।

और अन्त में, अपनी ओर

भरत की विनती में सम्मान और स्पष्टता का साथ देर तक याद रहता है। वे गुरु का विवेक, माता का प्रेम और सभा की हितकारी भावना स्वीकार करते हैं। फिर भी अपने हृदय की असहमति पूरी कहते हैं। किसी सम्बन्ध को छोटा किये बिना वे बता पाते हैं कि उनके लिये कौन-सा जीवन सार्थक होगा। राम की सेवा का नाम शुरू में आता है और राम के पास चलने का प्रस्ताव अन्त में। बीच के सारे प्रश्न उसी एक चाह को खोलते हैं।

सभा का उत्तर भी उतना ही ध्यान माँगता है। भरत स्वयं को जिन दोषों से घेर लेते हैं, लोग उनके भीतर उसी समय प्रेम पहचानते हैं। वे कैकेयी के किये के कारण भरत का मन दोषी मान लेने से इनकार करते हैं। इस पहचान के बाद ही यात्रा का प्रस्ताव सबका सहारा बनता है। अपने दुःख में अकेला पड़ता हुआ व्यक्ति जब अपनी बात पूरी कह पाता है, तब यहाँ सुननेवाले भी उसके साथ एक नये निश्चय तक पहुँचते हैं।

अगली सुबह राम के पास चलने की बात स्वीकृत हो गयी है। भरत क्षमा और कृपा की आशा लेकर जाना चाहते हैं, सभा राम को वापस पाने की कामना में उनके साथ है। अभी कथा इसी प्रस्ताव पर ठहरती है। भरत का अन्तिम भरोसा उनके अपने गुणों का नहीं, रघुवीर के अपनेपन का है, वे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १७७ से १८४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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