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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 21
भरत का राजगद्दी से इनकार
राज्य स्वीकार करने की सलाह के सामने भरत अपनी व्यथा कहते हैं। वे राम की सेवा को अपना हित कहते हैं, और प्रातःकाल राम के पास चलने की बात कहते हैं। सभा उनकी सराहना करती है और कहती है कि उन्होंने शोक में डूबे सबको सहारा दिया है।
भरत के सामने राज्य करने की सलाह है। भरत गुरु के उपदेश, प्रजा और मन्त्रियों की सम्मति और माता की आज्ञा का आदर करते हैं। वे जानते हैं कि यह सब उनके हित के लिये कहा गया है। फिर भी हृदय को सन्तोष नहीं मिलता। पिता स्वर्ग में हैं, और सीता और राम वन में हैं।
इस प्रसंग में भरत सभा को उत्तर देते हैं। वे अपने को पापों का घर कहते हैं, कैकेयी का दिया गिनाते हैं, और राम के पास जाने की आज्ञा माँगते हैं। उन्हें भरोसा है कि राम उन्हें अपना जानकर त्यागेंगे नहीं। उनके वचन सुनकर सभा उनकी सराहना करती है और कहती है कि वे वन अवश्य चलें, जहाँ राम हैं।
भरत की विनती सुननेवाली सभा
- भरत राज्य स्वीकार करने की सलाह का उत्तर देनेवाले भाई, जो राम की सेवा को अपना हित कहते हैं।
- राम, सीता और लक्ष्मण वन में गये प्रियजन, जिनकी बात भरत सभा से करते हैं।
- गुरु वसिष्ठ, जिन्हें भरत विवेक का समुद्र कहते हैं, और जो, भरत कहते हैं, उनके तिलक का साज सज रहे हैं।
- राम की माता कौसल्या, जिनकी सरलता और अपने ऊपर विशेष प्रेम को भरत पहचानते हैं।
- कैकेयी जिनकी कुटिलता ने, भरत कहते हैं, उनका हित छीन लिया, और जिनका दिया वे गिनाते हैं।
- मन्त्री और नगरवासी सभा के लोग, जो भरत की बात सुनकर वन जाने का प्रस्ताव स्वीकार करते हैं।
आज्ञा का आदर, हृदय की असन्तुष्टि
भरत कहते हैं कि गुरु ने मुझे अच्छा उपदेश दिया है, प्रजा और मन्त्री सब सहमत हैं, और माता ने उचित समझकर आज्ञा दी है। वे उसे अवश्य सिर चढ़ाकर करना चाहते हैं।
वे कहते हैं कि गुरु, पिता, माता, स्वामी और हितैषी की वाणी सुनकर, उसे भली जानकर प्रसन्न मन से करना चाहिये। उचित और अनुचित का विचार करने से धर्म जाता है और सिर पर पाप का भार चढ़ता है।
वे कहते हैं कि आप मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं जिसके आचरण से मेरा भला हो। यह मैं भलीभाँति समझता हूँ, फिर भी जी को सन्तोष नहीं होता।
वे सबसे अपनी विनती सुन लेने और अपनी योग्यता के अनुसार शिक्षा देने को कहते हैं, और उत्तर देने के अपराध की क्षमा माँगते हैं। साधु पुरुष दुखी के दोष और गुण नहीं गिनते।
भरत कहते हैं कि पिता स्वर्ग में हैं, सीता और राम वन में हैं, और मुझे आप राज्य करने को कह रहे हैं। इससे आप मेरा हित समझते हैं, या अपना कोई बड़ा काम?
राम के बिना किस वस्तु का मूल्य
भरत कहते हैं कि मेरा हित सीता के पति राम की चाकरी में है, और माता की कुटिलता ने वही छीन ली। उन्होंने मन में विचार करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपाय से उनका कल्याण नहीं।
लक्ष्मण, राम और सीता के चरण देखे बिना यह राज्य किस गिनती में है? भरत उसे शोक का समुदाय कहते हैं।
कपड़ों के बिना गहनों का बोझ व्यर्थ है। वैराग्य के बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है।
रोगी शरीर के लिये बहुत से भोग व्यर्थ हैं। भगवान् की भक्ति के बिना जप और योग व्यर्थ जाते हैं। जीव के बिना सुन्दर देह व्यर्थ जाता है।
भरत कहते हैं कि राम के बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है।
वे आज्ञा माँगते हैं कि राम के पास जायें। निश्चय ही उनका हित इसी में है। वे कहते हैं, मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेह की जड़ता के वश होकर कह रहे हैं।
भरत अपने को कैकेयी का पुत्र, कुटिल बुद्धिवाला, राम से विमुख और निर्लज्ज कहते हैं। वे कहते हैं कि आप मोह के वश होकर मुझ जैसे अधम के राज्य से सुख चाहते हैं।
पापों का घर, और बने रहे प्राण
भरत कहते हैं कि मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें: राजा धर्मशील होना चाहिये। आप मुझे हठ करके ज्यों ही राज्य देंगे, उसी समय पृथ्वी पाताल में धँस जायेगी।
वे पूछते हैं कि मेरे समान पापों का घर कौन है, जिसके कारण सीता और राम का वनवास हुआ? राजा ने राम को वन दिया और उनसे बिछुड़ते ही स्वर्ग चले गये। और मैं दुष्ट, जो सारे अनर्थ का कारण हूँ, होश में बैठा सब बातें सुन रहा हूँ।
राम से रहित घर देखकर और जगत् का उपहास सहकर ये प्राण बने हुए हैं। ये प्राण राम के पवित्र रस से रूखे हैं, और लालची होकर भूमि और भोगों के भूखे हैं। टीका इसे प्राणों के बने रहने का कारण बताती है।
फिर वे पूछते हैं कि अपने हृदय की कठोरता कहाँ तक कहें, जिसने वज्र को नीचा दिखाकर बड़ाई पायी है।
वे कहते हैं कि कारण से कार्य कठिन होता है, और मेरा दोष नहीं। हड्डी से वज्र, और पत्थर से लोहा, भयानक और कठोर होता है।
वे कहते हैं कि कैकेयी से उत्पन्न देह से प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट अभागे हैं। यदि प्रिय के वियोग में प्राण प्यारे लग रहे हैं, तो अभी आगे मैं बहुत कुछ देखूँगा और सुनूँगा।
कैकेयी ने किसे क्या दिया
अब भरत कैकेयी के किये को गिनाते हैं। लक्ष्मण, राम और सीता को वन दिया। पति को स्वर्ग भेजकर उनका हित किया। अपने लिये विधवापन और अपयश लिया। और प्रजा को शोक और सन्ताप दिया।
फिर वे कहते हैं कि मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया। कैकेयी ने सबका काम बना दिया! इससे अच्छा मेरे लिये अब और क्या होगा? उस पर आप लोग मुझे राजतिलक देने को कहते हैं!
वे कहते हैं कि कैकेयी के पेट से जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ अनुचित नहीं। मेरी सारी बात विधाता ने बना दी है। प्रजा और पंच, आप सहायता क्यों कर रहे हैं?
किसी को ग्रह ने पकड़ रखा है। पोद्दार इसे कुग्रह से पीड़ित होना बताते हैं, और पिशाचग्रस्त होने का दूसरा अर्थ भी देते हैं। फिर वह वायु के वश में है, और फिर उसी को बिच्छू डंक मार देता है। उसे मदिरा पिलायी जाती है। भरत पूछते हैं, कहिये, यह कैसा इलाज है?
माता का प्रेम, गुरु का विवेक
भरत कहते हैं कि कैकेयी के पुत्र के लिये संसार में जो योग्य था, चतुर विधाता ने मुझे वही दिया। मुझ दशरथ के पुत्र और राम के छोटे भाई को विधाता ने व्यर्थ बड़ाई दी।
वे कहते हैं कि आप सब मुझे टीका कढ़ाने को कह रहे हैं। राजा की आज्ञा सबके लिये अच्छी है। मैं किसको किस प्रकार उत्तर दूँ? जिसकी जैसी रुचि हो, आप सुखपूर्वक कहिये।
मेरी कुमाता समेत मुझे छोड़कर, कहिये, कौन कहेगा कि यह अच्छा किया गया? जड़ और चेतन जगत् में मेरे सिवा कौन है जिसे सीता और राम प्राणों के समान प्रिय न हों? परम हानि सबके लिये बड़ा लाभ है।
बुरा दिन मेरा है, किसी का दोष नहीं। आप सब संशय, शील और प्रेम के वश हैं। जो कुछ कहते हैं, वह सब उचित है।
राम की माता के बारे में वे कहते हैं कि उनका चित्त बहुत सरल है और मुझ पर उनका विशेष प्रेम है। वे स्वभाव से, स्नेह के वश होकर, मेरी दीनता देखकर कहती हैं।
गुरु के बारे में वे कहते हैं कि वे विवेक के समुद्र हैं, यह जगत् जानता है, और उनके लिये विश्व हथेली पर रखे बेर के समान है। वे भी मेरे तिलक का साज सज रहे हैं। विधाता विमुख हो तो सब विमुख हो जाते हैं।
एक ही दावानल
भरत कहते हैं कि राम और सीता को छोड़कर जगत् में कोई यह नहीं कहेगा कि मेरी सम्मति नहीं थी।
वे कहते हैं, यह मैं सुख मानकर सुनूँगा और सहूँगा। अन्त में कीचड़ वहाँ होता है जहाँ पानी है।
वे कहते हैं कि मुझे इसका डर नहीं कि जगत् मुझे बुरा कहेगा, और न परलोक का सोच है। हृदय में एक ही असह्य दावानल बसता है कि मेरे कारण सीता और राम दुखी हुए।
वे कहते हैं कि जीवन का लाभ लक्ष्मण ने भली प्रकार पाया। उन्होंने सब छोड़कर राम के चरणों में मन लगाया। मेरा जन्म राम के वनवास के लिये हुआ था। मैं अभागा झूठमूठ क्या पछताता हूँ?
सबको सिर नवाकर वे अपनी दारुण दीनता कहते हैं। वे कहते हैं कि राम के चरणों के दर्शन किये बिना मेरे जी की जलन नहीं जायेगी।
प्रातःकाल राम के पास चलने का निश्चय
भरत कहते हैं कि मुझे दूसरा उपाय नहीं सूझता। राम के बिना मेरे हृदय की बात कौन समझता है? मन में एक ही निश्चय है, प्रातःकाल राम के पास चलूँगा।
वे कहते हैं, मैं बुरा और अपराधी हूँ, और मेरे कारण यह सारा उपद्रव हुआ है। फिर भी राम मुझे शरण में सम्मुख आया देखकर सब क्षमा करके विशेष कृपा करेंगे।
भरत कहते हैं कि राम शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और स्नेह के घर हैं।
वे कहते हैं कि राम ने शत्रु का भी अनिष्ट नहीं किया। मैं यद्यपि टेढ़ा हूँ, फिर भी उनका बच्चा और सेवक हूँ।
वे पंचों से कहते हैं कि आप इसे मेरा भला मानकर सुन्दर वाणी से आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये। इससे मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर राम राजधानी लौट आयें।
वे कहते हैं, मेरा जन्म कुमाता से हुआ है, और मैं दुष्ट और सदा दोषयुक्त हूँ। फिर भी मुझे राम का भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।
भरत के वचनों से सभा को सहारा
भरत के वचन सबको प्यारे लगते हैं, मानो वे राम के प्रेम रूपी अमृत में पगे हों। राम के वियोग के भीषण विष से जले हुए लोग मानो बीजसहित मन्त्र सुनकर जाग उठे।
माताएँ, मन्त्री, गुरु और नगर के स्त्री और पुरुष, सभी स्नेह से बहुत व्याकुल हो जाते हैं। वे भरत को बार बार सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर राम के प्रेम की मूर्ति है।
सब कहते हैं, तात भरत, आप ऐसा क्यों न कहें, आप राम को प्राणों के समान प्यारे हैं। वे कहते हैं, जो नीच अपनी मूर्खता से आपकी माता की कुटिलता को लेकर आप पर सन्देह करे, वह मूर्ख करोड़ पुरखों सहित सौ कल्प नरक के घर में बसेगा।
साँप के पाप और अवगुण मणि ग्रहण नहीं करती। वह विष हरती है और दुःख और दरिद्रता को भस्म कर देती है।
सब कहते हैं कि अवश्य वन चलिये, जहाँ राम हैं। भरत ने अच्छी सलाह विचारी है। शोक के समुद्र में डूबते सब लोगों को आपने सहारा दे दिया है।
प्रसंग का क्रम
भरत सभा से कहते हैं कि वे आज्ञा अवश्य सिर चढ़ाना चाहते हैं, और उनके हृदय को सन्तोष नहीं होता। वे पूछते हैं कि इससे सभा उनका हित समझती है या अपना कोई बड़ा काम। वे राम की सेवा को अपना हित कहते हैं और राम के पास जाने की आज्ञा माँगते हैं। वे अपने को कैकेयी का पुत्र और अधम कहते हैं, और कहते हैं कि हठ से राज्य दिया गया तो पृथ्वी धँस जायेगी।
वे अपने को सारे अनर्थ का कारण कहते हैं, जो बैठकर सब सुन रहा है। वे गिनाते हैं कि कैकेयी ने किसे क्या दिया, और कहते हैं कि उस पर सभा तिलक की बात करती है। वे कहते हैं कि बुरा दिन उनका है, किसी का दोष नहीं। कौसल्या के बारे में वे कहते हैं कि वे स्नेह के वश कहती हैं, और गुरु भी तिलक का साज सज रहे हैं। वे अपने हृदय के दावानल की और लक्ष्मण के पाये लाभ की बात करते हैं। वे कहते हैं कि प्रातःकाल राम के पास जायेंगे, और पंचों से आज्ञा और आशीर्वाद माँगते हैं। उन्हें भरोसा है कि राम उन्हें अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।
उनके वचन सबको प्रिय लगते हैं। माताएँ, मन्त्री, गुरु और नगर के लोग स्नेह से व्याकुल होकर उनकी सराहना करते हैं। वे कहते हैं कि जो कैकेयी की कुटिलता को लेकर भरत पर सन्देह करेगा, वह नरक में बसेगा। वे भरत से कहते हैं कि अवश्य वन चलिये, जहाँ राम हैं, और कहते हैं कि उन्होंने सबको सहारा दिया है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 177 से 184, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।