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चित्रकूट की कुटी के दिन

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · चित्रकूट की कुटी के दिन

चित्रकूट की कुटी के दिन

वनवासियों का अपनापन, मन्दाकिनी की महिमा और पत्तों के घर का सुख। इसी सुख के बीच राम को अयोध्या की याद आती है और उनकी आँखें भर जाती हैं।

चित्रकूट में राम, सीता और लक्ष्मण के निवास का समाचार फैलता है। देवता आते हैं, मुनि आते हैं, फिर कोल और भील अपने दोने भरकर मिलने चलते हैं। किसी के पास फूल हैं, किसी के पास आशीर्वाद, किसी के पास कन्द, मूल और फल। साथ में अपना अपना मन भी है। देवता अपने दुःख कहते हैं और वनवासी अपने वन की जानकारी लेकर सेवा का अवसर माँगते हैं। पर्णकुटी के आसपास अब परिचय और अपनापे का एक संसार बस रहा है।

तुलसीदास के रामचरितमानस में यह समय वन की शोभा को भरपूर देखने का है। वृक्षों से पक्षियों तक, मन्दाकिनी से विन्ध्य तक, कवि की दृष्टि फैलती जाती है। फिर वही दृष्टि कुटी में लौटती है। लक्ष्मण सेवा में सुखी हैं। सीता को पति का साथ ऐसा प्रिय है कि वन हजारों अयोध्याओं के समान लगता है। राम उनकी प्रसन्नता का ध्यान रखते हैं, पुरानी कथाएँ सुनाते हैं। फिर अयोध्या की स्मृति आती है और राम के नेत्रों में जल भर जाता है। चित्रकूट के इन दिनों में साथ का सुख और दूर छूटे परिवार का दुःख, दोनों के लिये जगह है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम चित्रकूट के निवासी, जो प्रत्येक आगन्तुक का आदर करते हैं और परिवार की याद आने पर स्वयं भी दुःखी होते हैं।
  • सीता जिन्हें राम के साथ वन, पर्णकुटी और वहाँ का जीवन अत्यन्त प्रिय है।
  • लक्ष्मण मन, वचन और कर्म से सेवा में लगे भाई, जिन्हें सीताराम के स्नेह में घर की याद भी नहीं आती।
  • देवता और मुनि दर्शन के लिये आनेवाले अतिथि। देवता अपने दुःख कहते हैं और मुनि अपने साधन सफल मानते हैं।
  • कोल और भील वन के निवासी, जो भेंट लाते हैं और अपने पूरे परिवार की ओर से सेवा का प्रस्ताव रखते हैं।
  • भरत राम की स्मृति में जिनका प्रेम, शील और सेवाभाव विशेष रूप से उभरता है।

दर्शन और आशीर्वाद का स्वागत

सबसे पहले देवताओं का आगमन है। देवता, नाग, किन्नर और दिशाओं के पालक चित्रकूट पहुँचते हैं। राम सबको प्रणाम करते हैं और देवता उन्हें देखकर आनन्दित होते हैं। यह मिलना दोनों ओर का आदर लिये हुए है। दर्शन पानेवाले अपने नेत्रों को सफल समझते हैं, और जिनके दर्शन के लिये आये हैं, वे स्वयं उनका मान करते हैं। वन का निवास यहाँ से अनेक लोकों के आगन्तुकों का मिलनस्थल बन जाता है।

अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला॥
राम प्रनामु कीन्ह सब काहू । मुदित देव लहि लोचन लाहू॥

चौपाई १

देवसमाज फूल बरसाता है। उनके वचनों का भाव है कि हे नाथ, आज हम सनाथ हो गये। इस मिलने में उनके अपने कष्ट भी सामने आते हैं। वे विनती करके अपने असह्य दुःख सुनाते हैं। पोद्दार जी की टीका उनके प्रसन्न होकर लौटने का आशय खोलती है: दुःखों के नाश का आश्वासन पाकर वे हर्षित हुए। फिर सभी अपने अपने स्थान को चले जाते हैं। उनकी कही हुई विनती और उनकी विदाई के बीच भरोसा मिलने का यह सम्बन्ध टीका हमें समझाती है।

अब चित्रकूट में राम के आ बसने का समाचार मुनियों तक पहुँचता है। सुन सुनकर बहुत से मुनि आते हैं। प्रसन्न मुनिमण्डली को आते देखकर राम दण्डवत् प्रणाम करते हैं। मुनि उन्हें हृदय से लगा लेते हैं और सफल होने का आशीर्वाद देते हैं। एक ओर प्रणाम है, दूसरी ओर आलिंगन और आशीष। किसी आगन्तुक का नाम अलग से नहीं बताया जाता। यहाँ पूरी मुनिमण्डली का आनन्द और राम का उसके प्रति आदर सामने है।

मुनि सीता, लक्ष्मण और राम की छवि देखते हैं। इस दर्शन में उन्हें अपने सभी साधनों की सफलता मिलती है। आशीर्वाद वे राम को दे रहे हैं और अपने जीवन की साधना को भी पूर्ण हुआ मान रहे हैं। चौपाई में ये दोनों बातें साथ आती हैं। इससे भेंट का सुख केवल स्वागत के कुछ क्षणों तक सीमित नहीं रहता। योग और तप में लगा उनका जीवन इस दर्शन में अपना फल पहचानता है। तीनों को साथ देखकर उन्हें जो प्रसन्नता होती है, तुलसी उसी को साधन सफल होने की भाषा देते हैं।

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।
करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद॥ १३४॥

दोहा १३४

राम सबका यथायोग्य सम्मान करके मुनियों को विदा करते हैं। अपने आश्रमों में लौटकर वे योग, जप, यज्ञ और तप करने लगते हैं। दोहे का अन्त उनकी इस स्वतन्त्रता पर है कि अब साधना बिना बाधा के चल सकती है। पोद्दार जी इसे राम के आ जाने का फल बताते हैं। दर्शन की निजी प्रसन्नता के साथ आश्रमों के जीवन में भी सुख आया है। अतिथि विदा हुए हैं, उनकी साधना का क्रम आगे चलता है, और चित्रकूट में निवास करनेवाले राम उस निर्बाध क्रम के आश्रय के रूप में दिखाई देते हैं।

देवता दर्शन करके अपने दुःख कहते हैं और आश्वस्त होकर लौटते हैं। मुनि राम को आशीर्वाद देते हैं, तीनों की छवि देखकर अपनी साधना सफल मानते हैं और सम्मानपूर्वक विदा होकर आश्रमों में स्वतन्त्रता से योग, जप, यज्ञ तथा तप करते हैं।

दोने में भेंट लिये वनवासी

यही समाचार जब कोल और भीलों को मिलता है, तो उनकी प्रसन्नता के लिये कवि घर भर जाने की उपमा चुनते हैं। उन्हें लगता है मानो नवों निधियाँ उनके घर आ गयी हों। वे कन्द, मूल और फल दोने में भर भरकर चल पड़ते हैं। वे वन की उपज लेकर चले हैं और मन में दर्शन पाने की उमंग है। तुलसी उनकी इस उत्सुकता को ऐसे दरिद्रों के चलने से मिलाते हैं जिन्हें सोना लूटने का अवसर मिला हो। कितना धन मिलनेवाला है, उसका अनुमान यहाँ आनन्द की मात्रा बताता है।

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई॥
कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना॥

चौपाई २

रास्ते में बातें होती जाती हैं। इन लोगों में कुछ दोनों भाइयों को पहले देख चुके हैं। बाकी उन्हीं से पूछते हैं। राम की सुन्दरता का वर्णन कोई करता है, कोई सुनता है। इस प्रकार मिलने की प्रसन्नता पहुँचने से पहले ही साथ चलने लगती है। जिनके लिये यह पहला दर्शन होनेवाला है, उनके सामने पहले देख चुके लोगों का अनुभव है। फिर सब पहुँचते हैं और स्वयं राम को देखते हैं। कहने सुनने का यह क्रम अन्ततः अपने नेत्रों से दर्शन करने में पूरा होता है।

वे भेंट आगे रखकर जोहार करते हैं। फिर बड़े अनुराग से राम को निहारते हैं। कवि उनकी दशा को चित्र की तरह स्थिर दिखाते हैं। वे जहाँ हैं, वहीं मानो चित्रलिखे खड़े हैं। शरीर पुलकित है और नेत्रों में प्रेम के आँसू उमड़ रहे हैं। चलकर आने की सारी उत्सुकता अब देखने में ठहर गयी है। इस ठहराव को तुलसी स्वयं चित्र की उपमा देते हैं, और उसी के भीतर रोमांच तथा आँसुओं की जीवित गति रखते हैं।

राम पहचानते हैं कि ये सभी प्रेम में मग्न हैं। वे प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान करते हैं। वनवासियों के पास जो भेंट थी, वह सामने रखी जा चुकी है; उनके अनुराग को भी आदर मिल गया है। तब वे बार बार जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनय कहते हैं। उनकी बात किसी एक व्यक्ति की ओर से नहीं आती। वे अपने को सबके साथ जोड़कर बोलते हैं, और आगे चलकर इसी बात में अपने परिवारों को भी शामिल करेंगे।

अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।
भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय॥ १३५॥

दोहा १३५

उनका निवेदन है कि हे नाथ, आपके चरणों के दर्शन से अब हम सब सनाथ हो गये। हे कोसलराज, हमारे भाग्य से आपका यहाँ आगमन हुआ है। आरम्भ में देवताओं ने भी सनाथ होने की बात कही थी। अब वन के निवासी अपने अनुभव को उसी शब्द में व्यक्त करते हैं। अलग अलग भेंट और अलग अलग जीवनों से आये इन समूहों को राम के दर्शन में आश्रय मिलता है। कोल और भील इस मिलन को अपने भाग्य की घटना मानते हैं और अगली ही बात में अपने वन का सौभाग्य भी गिनाने लगते हैं।

कोल और भील कन्द, मूल तथा फल की भेंट लेकर आते हैं। पहले दर्शन कर चुके लोगों से रास्ते में राम की सुन्दरता सुनते हैं, स्वयं दर्शन करके पुलकित होते हैं और राम से आदर पाकर अपने को सनाथ कहते हैं।

जिस वन का पग पग देखा है

वनवासियों की वाणी में अब अपनी भूमि के लिये बधाई है। जहाँ जहाँ राम ने चरण रखे हैं, वह धरती, वह वन, वह मार्ग और वे पहाड़ धन्य हैं। वहाँ विचरनेवाले पक्षी और पशु भी धन्य हैं, क्योंकि राम को देखकर उनका जन्म सफल हो गया है। ये लोग अपने मिलने का सुख चारों ओर फैला देते हैं। जिन रास्तों को वे जानते हैं और जिन जीवों के बीच रहते हैं, उन्हें भी इस दर्शन की महिमा में शामिल करते हैं।

फिर वे अपने परिवारों की बात कहते हैं। हम सब परिवार सहित धन्य हैं, क्योंकि नेत्र भरकर आपका दर्शन मिला। आपने विचार करके बहुत अच्छी जगह निवास किया है। यहाँ सभी ऋतुओं में सुख से रह सकेंगे। इस विश्वास में उनके अपने स्थान का परिचय बोलता है। वे इस वन के निवासी हैं, उसकी जगहों को जानते हैं, और राम को उसके अनुकूल होने का भरोसा देते हैं। उनका अगला निवेदन उसी परिचय को सेवा का रूप देता है।

हम सब भाँति करब सेवकाई । करि केहरि अहि बाघ बराई॥
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा । सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥

चौपाई ३

वे कहते हैं कि हम सब प्रकार से सेवा करेंगे। हाथी, सिंह, सर्प और बाघों से बचायेंगे। यहाँ के बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ और खोह हमारे पग पग देखे हुए हैं। खोह का अर्थ पोद्दार जी की टीका दर्रों के रूप में भी स्पष्ट करती है। इस पूरी बात में उनका अपना अनुभव रखा है। सेवा करने की इच्छा के साथ वे यह भी बताते हैं कि किस काम में उनका ज्ञान सहायक होगा। वन में सुरक्षित रहना और उसके कठिन स्थानों को पहचानना, दोनों उनके प्रस्ताव के भीतर आते हैं।

इसके बाद वे शिकार कराने की बात कहते हैं। जिन जिन स्थानों को वे जानते हैं, वहाँ वहाँ राम को शिकार खिलायेंगे और तालाब, झरने तथा पानी की जगहें दिखायेंगे। अभी ये भविष्य के प्रस्ताव हैं। वे अपनी सेवाओं की सम्भावना बता रहे हैं और चाहते हैं कि राम उन्हें काम सौंपें। कुटुम्ब सहित सेवक होने की बात कहकर वे विनती करते हैं कि हे नाथ, हमें आज्ञा देने में संकोच न कीजियेगा। परिवार की ओर से मिला अपनापन अब परिवार की ओर से सेवा के लिये उपलब्ध रहने का वचन बन गया है।

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।
बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥ १३६॥

दोहा १३६

इन बातों को सुनते हुए राम के लिये तुलसी पिता और बच्चों की उपमा लाते हैं। वेदों के वचन जिन तक नहीं पहुँच पाते, मुनियों के मन के लिये भी जो अगम हैं, वही करुणा के धाम इन वनवासियों की बात ऐसे सुन रहे हैं जैसे पिता बच्चों की बातें सुनता है। उपमा सुनने के ढंग का स्नेह बताती है। इनके प्रस्तावों के लिये पूरा ध्यान है। अपना वन दिखाने और सेवा करने की उनकी इच्छा उस आत्मीय सुनवाई में सम्मान पाती है।

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा॥
राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥

चौपाई ४

यहीं कवि स्पष्ट कहते हैं कि राम को केवल प्रेम प्यारा है। जो जानना चाहता हो, वह यह जान ले। इस कथन के साथ राम के उत्तर का स्वभाव भी मिलता है। वे प्रेम से भरे कोमल वचन कहकर सभी वनवासियों को सन्तुष्ट करते हैं। उत्तर का विस्तृत संवाद यहाँ नहीं खुलता, उसका स्नेह और उससे मिली तृप्ति सामने आती है। सबको विदा किया जाता है। वे सिर नवाकर चलते हैं और रास्ते भर राम के गुण कहते सुनते अपने घर पहुँचते हैं।

आते समय भी बातचीत राम की थी और लौटते समय भी उन्हीं की है। आनेवालों में कुछ लोग दूसरों से उनके रूप का वृत्तान्त सुन रहे थे। अब सभी स्वयं दर्शन करके, सम्मान पाकर और अपनी सेवा अर्पित करके लौटे हैं। इस पूरी भेंट के बाद दोनों भाई सीता सहित वन में रहने लगते हैं। तुलसी उन्हें देवताओं और मुनियों को सुख देनेवाला कहते हैं। अभी जिन वनवासियों से भेंट हुई है, उनके सुख का वृत्तान्त भी इस निवास के साथ जुड़ चुका है।

वनवासी भूमि, जीवों और परिवारों को धन्य कहते हैं। वे वन का पग पग जानते हैं और रक्षा, शिकार तथा जलस्थलों का मार्गदर्शन देने का प्रस्ताव रखते हैं। राम पिता की तरह उनकी बातें सुनते हैं, प्रेमपूर्ण उत्तर से सन्तुष्ट करते हैं और उन्हें विदा देते हैं।

फलते वृक्ष, पक्षियों की बोली और साथ विचरते जीव

जब से राम वन में आकर रहने लगे हैं, तब से वह मंगलदायक हो गया है। तुलसी इस बात को कहकर तुरंत उसके वृक्षों की ओर ले जाते हैं। अनेक प्रकार के वृक्ष फूलते और फलते हैं। उन पर सुन्दर बेलें लिपटी हुई हैं और उनके मण्डप तने हैं। वन की छवि में पेड़ के साथ बेल भी है, फूल के साथ फल भी। यहाँ आकर रहने के सुख को कवि आसपास के बढ़ते, फलते जीवन में दिखाते हैं।

इन वृक्षों का सौन्दर्य स्वाभाविक है। वे कल्पवृक्ष के समान सुहावने जान पड़ते हैं। तुलसी कल्पना करते हैं कि मानो वे देवताओं के वन को छोड़कर यहाँ आये हों। पोद्दार जी उस देववन को नन्दनवन कहते हैं। यह उपमा वन की शोभा का विस्तार करती है। सामने के वृक्षों को देखकर कवि को देवताओं का उद्यान याद आता है, और उपमा में वही उद्यान अपना सौन्दर्य लेकर चित्रकूट में उपस्थित हो जाता है।

भौंरों की पंक्तियाँ सुन्दर गुंजार करती हैं। हवा शीतल है, मन्द है और सुगन्धित है। सुख देनेवाली त्रिविध वायु का अर्थ टीका इन्हीं तीन गुणों से खोलती है। आँख को वृक्ष और बेलें मिली थीं, अब कान को गुंजार और देह को हवा का सुख मिलता है। वन का वर्णन कई इन्द्रियों तक पहुँचता है। तुलसी फिर पक्षियों की ओर जाते हैं और अलग अलग बोलियों को एक दोहे में भर देते हैं।

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर॥ १३७॥

दोहा १३७

नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर बोल रहे हैं। बोलियाँ अनेक प्रकार की हैं, किन्तु उनका सुख साथ सुना जाता है। वे कानों को प्रिय लगती हैं और चित्त को अपनी ओर खींचती हैं। दोहे में पक्षियों के नाम अलग अलग हैं, इसलिये उस संगीत में भिन्नता भी बनी रहती है। कोयल और तोते, पपीहे और चकवे सब इसी वन के प्रसन्न जीवन में शामिल हैं। दृश्य के साथ उसका श्रवण भी पूरा होता है।

करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा॥
फिरत अहेर राम छबि देखी । होहिं मुदित मृगबृंद बिसेषी॥

चौपाई ५

पशुओं के बीच हाथी, सिंह, बन्दर, सूअर और हिरन हैं। वे वैर छोड़कर साथ साथ विचरते हैं। इस चौपाई में आया कोल शब्द पशुओं की सूची में है; पोद्दार जी यहाँ उसका अर्थ सूअर बताते हैं। इसी चौपाई का अगला भाग राम को शिकार के लिये घूमते हुए दिखाता है। उनकी छवि देखकर पशुओं के समूह विशेष रूप से आनन्दित होते हैं। वैर छोड़कर साथ घूमते जीव, शिकार के लिये फिरते राम और उन्हें देखकर प्रसन्न पशु, कवि इन सबको उसी वनचित्र में रखते हैं।

वनवासियों ने पहले शिकार कराने की सेवा प्रस्तुत की थी। अब वर्णन में राम का शिकार के लिये घूमना स्वयं आता है। किसी पशु को मारने का वृत्तान्त यहाँ नहीं है। चौपाई की दृष्टि उनकी छवि देखकर पशुओं के आनन्दित होने पर रुकती है। इस प्रकार कुटी के आसपास की शोभा में चलना फिरना भी है, पक्षियों की ध्वनि भी है और जीवों का साथ भी। वन की मंगलमयता को तुलसी इन्हीं अलग अलग विवरणों से भरते हैं।

चित्रकूट में वृक्ष फलते फूलते हैं, बेलों के मण्डप हैं और शीतल, मन्द, सुगन्धित वायु बहती है। पक्षी मधुर बोलते हैं, पशु वैर छोड़कर साथ विचरते हैं और शिकार के लिये घूमते राम की छवि देखकर आनन्दित होते हैं।

मन्दाकिनी और चित्रकूट की बड़ाई

वन की शोभा अब दूर तक प्रशंसा पाती है। जगत में जितने देवताओं के वन हैं, वे सभी राम के वन को देखकर सिहाते हैं। पहले वृक्ष ऐसे लगे थे मानो देववन छोड़कर आये हों। अब देववन स्वयं इस वन का सुख देखकर उसकी चाह करते जान पड़ते हैं। तुलसी की कल्पना चित्रकूट को देवताओं के उद्यानों के सामने रख देती है और राम के निवास से मिली उसकी महिमा बताती है।

फिर नदियाँ आती हैं। गंगा, सरस्वती, सूर्यकुमारी यमुना, नर्मदा और गोदावरी का नाम लिया जाता है। उनके साथ सारे तालाब, समुद्र, नदियाँ और अनेक नद मन्दाकिनी की बड़ाई करते हैं। यह एक नदी की प्रशंसा में पूरे जलजगत का सम्मिलित होना है। इतनी पुण्यमयी नदियाँ मन्दाकिनी का गुणगान कर रही हैं। चित्रकूट के साथ बहनेवाले इस नाम को अब आसपास के दृश्य से उठाकर कवि बड़ी तीर्थमहिमा में प्रतिष्ठित करते हैं।

जल के बाद पर्वतों की बारी है। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मन्दराचल और सुमेरु जैसे देवताओं के निवासस्थान, फिर हिमालय आदि सभी पर्वत चित्रकूट का यश गाते हैं। अलग अलग नामों से दृश्य की परिधि बढ़ती जाती है। कहीं देवताओं के उद्यान प्रशंसा कर रहे हैं, कहीं नदियाँ और समुद्र, कहीं बड़े बड़े पर्वत। इस मानवीय गुणगान से भरी कल्पना में समूची प्रकृति चित्रकूट के निवास का उत्सव करती दिखाई देती है।

विन्ध्य की प्रसन्नता विशेष रूप से कही जाती है। उसके मन में सुख समाता नहीं, क्योंकि बिना परिश्रम इतनी बड़ी बड़ाई मिल गयी है। इस उपमा में यश पाने का प्रयत्न नहीं गिनाया गया। राम के निवास के साथ मिला गौरव ही उसके हर्ष का कारण है। चित्रकूट का गुणगान जितना व्यापक होता है, विन्ध्य का यह आनन्द उतना ही आत्मीय लगता है। बड़े बड़े पर्वत प्रशंसा कर रहे हैं और विन्ध्य अपने भाग्य पर प्रसन्न है।

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।
पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति॥ १३८॥

दोहा १३८

देवता दिन रात कहते हैं कि चित्रकूट के पक्षी, पशु, बेलें, वृक्ष और तिनकों की जातियाँ तक पुण्य की राशि हैं, सब धन्य हैं। इस सूची में छोटा तृण भी स्थान पाता है। अभी जिन पर्वतों और नदियों की महिमा थी, वही दृष्टि अब वन के छोटे अंकुर तक जाती है। तुलसी का यह भक्तिभाव समूचे स्थल को छूता है। राम के साथ सम्बन्ध रखनेवाले जीवन को वह उसकी ऊँचाई या आकार के अनुसार सीमित नहीं करता।

आँखोंवाले जीव राम को देखकर जन्म का फल पाते हैं और शोकरहित हो जाते हैं। जो चल नहीं सकते, वे चरणरज का स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। टीका अचर के अन्तर्गत पर्वत, वृक्ष, भूमि और नदी आदि को स्पष्ट करती है। फिर इन सभी के परमपद का अधिकारी होने की बात आती है, जिसे पोद्दार जी मोक्ष कहते हैं। दर्शन और स्पर्श के इन दो रूपों से तुलसी चर और अचर दोनों तक मुक्ति की महिमा पहुँचाते हैं। यह वन की शोभा के साथ जुड़ा हुआ उनका आध्यात्मिक कथन है।

वन और पर्वत स्वभाव से सुन्दर हैं, मंगलमय हैं और पवित्रों को भी पवित्र करनेवाले हैं। उनकी महिमा किस तरह कही जाय, जहाँ सुख के समुद्र राम ने निवास किया है। कवि के इस प्रश्न में अभी तक का विस्तृत वर्णन और अधिक फैल जाता है। वह स्थान स्वयं प्रिय है, और वहाँ सीता, लक्ष्मण तथा राम का आकर रहना उसकी महिमा को ऐसा कर देता है जिसे पूरा कह पाना कठिन है।

पय पयोधि तजि अवध बिहाई । जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥
कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन॥

चौपाई ६

तुलसी क्षीरसागर के त्याग और अयोध्या के छोड़ने को एक साथ स्मरण करते हैं। सीता, लक्ष्मण और राम जहाँ आकर रहे हैं, उस वन की शोभा एक लाख शेष भी पूरी नहीं कह सकते, जिनमें से प्रत्येक के हजार मुख हों। इसी विशाल तुलना के बाद कवि अपनी सामर्थ्य पर आते हैं। वे पूछते हैं कि मैं इसे किस प्रकार कहूँ, क्या पोखरे का छोटा कछुआ मन्दराचल उठा सकता है। पर्वतों के गुणगान के बाद मन्दराचल का भार इस बार वर्णन की कठिनता बताने के लिये आया है। अपने को छोटे कछुए के समान कहकर तुलसी उस सुन्दरता के सामने अपनी विनय रखते हैं।

देववन राम के वन को सिहाते हैं, नदियाँ मन्दाकिनी की और पर्वत चित्रकूट की बड़ाई करते हैं। देवता यहाँ के तृण तक को धन्य कहते हैं। तुलसी चर अचर सबके लिये परमपद की महिमा बताते हैं और अपनी वर्णनशक्ति को मन्दराचल के सामने छोटे कछुए के समान मानते हैं।

लक्ष्मण के लिये सेवा का सुख

इतनी दूर फैली हुई दृष्टि फिर लक्ष्मण पर आती है। वे कर्म से, मन से और वचन से राम की सेवा करते हैं। तुलसी उनके शील और स्नेह का वर्णन भी अपनी सामर्थ्य के बाहर बताते हैं। वन की शोभा कहते कहते जो विनय आयी थी, वही अब भाई की सेवा के सामने है। आसपास की सुन्दरता से लौटकर कथा उस प्रेम को दिखाती है जिसके साथ यह निवास निभ रहा है।

छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु॥ १३९॥

दोहा १३९

लक्ष्मण क्षण क्षण सीता और राम के चरणों को देखते हैं। उन्हें अपने ऊपर दोनों का स्नेह मालूम है। उसी अनुभूति में उन्हें स्वप्न में भी भाइयों, माता पिता और घर की याद नहीं आती। दोहे में सेवा के साथ स्नेह पाने का सुख स्पष्ट रखा है। वे जिस लगन से सेवा करते हैं, उसे सामने से मिला प्रेम भी पोषित करता है। उनके लिये इस वन का वर्तमान इतना भरा हुआ है कि घर की स्मृति भी उनके चित्त को दूसरी ओर नहीं ले जाती।

यह प्रसन्नता उनकी सेवा का अपना अनुभव है। चौपाई सेवा के तीन रूप कहती है और दोहा उनके भीतर के संतोष को खोलता है। मन राम के साथ है, वाणी सेवा में है, कर्म भी उसी अनुराग में लगे हैं। सीता और राम के चरणों को बार बार देखकर लक्ष्मण अपने सम्बन्ध की निकटता अनुभव करते हैं। हम उनके वनवास को इसी समय की इस तृप्ति के साथ देखते हैं। तुलसी ने उनके लिये घर की अनुपस्थिति से अधिक सामने के स्नेह की उपस्थिति कही है।

लक्ष्मण के सुख के तुरन्त बाद सीता का वर्णन आएगा। दोनों के लिये साथ के कारण वन प्रिय है, और दोनों के सुख में राम का स्नेह अलग अलग तरह से प्रकट होता है। अभी लक्ष्मण की ओर से हम यह सुनते हैं कि अपने ऊपर प्रेम जानकर उन्हें स्वप्न में भी घर नहीं याद आता। इस स्मृतिरहित तृप्ति को कवि आगे राम की अपनी स्मृतियों के निकट रखेंगे। कुटी में रहनेवाले तीनों का अपनापा एक है, पर उनके अनुभव की प्रत्येक छाया को तुलसी उसका पूरा स्थान देते हैं।

लक्ष्मण मन, वचन और कर्म से सेवा करते हैं। सीता और राम के चरणों को देखते हुए, अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर, उन्हें स्वप्न में भी भाई, माता पिता या घर याद नहीं आते।

सीता को प्रिय पत्तों का घर

सीता राम के साथ बहुत सुखी रहती हैं। अयोध्यापुरी, परिजन और घर की याद वे भूल गयी हैं। वे क्षण क्षण प्रिय पति के चन्द्रमा जैसे मुख को देखकर प्रसन्न होती हैं। तुलसी इस प्रसन्नता को चन्द्रमा देखकर आनन्दित होनेवाली चकोरी की उपमा देते हैं। पहले वन के पक्षियों में चकोर का नाम आया था। अब उसी पक्षी के साथ बनी छवि सीता के निजी सुख को व्यक्त करती है। वन की सुन्दरता उनके लिये प्रिय के मुख की सुन्दरता में और निकट हो गयी है।

राम का प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता देखकर वे दिन में चकवी की तरह हर्षित रहती हैं। इन दो उपमाओं में देखने का सुख और बढ़ते स्नेह का सुख साथ है। सीता का मन राम के चरणों में अनुरक्त है, इसलिये वन उन्हें हजारों अयोध्याओं के समान प्रिय लगता है। तुलना बहुत बड़ी है। वन के अपने साधन उसी प्रेम के कारण इतनी प्रियता पा गये हैं। अयोध्या का नाम इस समय उनके सुख को मापने की उपमा में आता है।

परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा । प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा॥
सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर । असनु अमिअ सम कंद मूल फर॥

चौपाई ७

प्रियतम के साथ पर्णकुटी प्यारी है। हिरन और पक्षी प्रिय परिवार के समान हैं। मुनियों की पत्नियाँ सास के समान लगती हैं और श्रेष्ठ मुनि ससुर के समान। इन सम्बन्धों की उपमा से वन का जीवन घर का अपनापा पा लेता है। जो आसपास है, उसमें सीता को परिवार जैसा सुख मिलता है। पर्णकुटी, जीव और आश्रमों के लोग अलग अलग विवरण बने नहीं रहते; तुलसी प्रत्येक के साथ कोई आत्मीय सम्बन्ध रखते हैं और उनके सुख का पूरा वातावरण खोलते हैं।

भोजन के लिये कन्द, मूल और फल हैं। वे सीता को अमृत जैसे लगते हैं। स्वामी के साथ कुश और पत्तों की सुन्दर सेज सैकड़ों कामदेव की सेजों के समान सुख देती है। साथरी का यही अर्थ पोद्दार जी स्पष्ट करते हैं। निवास, परिवार जैसी निकटता, आहार और शयन, वन में रहने के इन सभी पक्षों को कवि एक एक कर कहते हैं। सीता की प्रसन्नता किसी एक वस्तु तक सीमित नहीं रहती। पति के साथ का अनुराग इन सबको प्रिय कर देता है।

इसके बाद वर्णन सीता के दिव्य स्वरूप की ओर जाता है। तुलसी प्रश्न रखते हैं कि जिनके देखने से ही जीव लोकपाल हो जाते हैं, उन्हें विषयों का विलास कैसे मोहित कर सकता है। टीका इस दृष्टि को कृपापूर्वक देखने के रूप में खोलती है। सीता के वनसुख के साथ उनकी ऐसी महिमा भी कही गयी है जिसमें सांसारिक वैभव का आकर्षण उन पर शासन नहीं करता। कवि की भक्ति में कुटी की प्रियता और सीता की दिव्यता एक ही वर्णन के अंग हैं।

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु॥ १४०॥

दोहा १४०

राम का स्मरण करके भक्तजन भोग विलास को तिनके के समान छोड़ देते हैं। उन्हीं राम की प्रिय पत्नी और जगत की माता सीता के लिये यह त्याग आश्चर्य कैसे हो सकता है। दोहे का तर्क भक्तों के अनुभव से सीता की महिमा की ओर जाता है। रामप्रिया और जगज्जननी, दोनों परिचय साथ दिये गये हैं। सीता राम के साथ प्रसन्न हैं, और तुलसी उनके विषयत्याग को उसी दिव्य परिचय में सहज समझते हैं।

हम इस पूरे वर्णन में बढ़ते हुए प्रेम को बार बार पाते हैं। सीता प्रिय का मुख देखती हैं, अपने प्रति बढ़ता स्नेह देखती हैं, फिर कुटी और वन के जीवन को उसी सुख में अपनाती हैं। मृग पक्षियों को परिवार और मुनिदम्पतियों को सास ससुर के समान प्रिय कहना उनके अनुभव की ठोस छवियाँ हैं। इन्हीं छवियों के बीच अमृत जैसे कन्द मूल फल और सुखद पत्तों की सेज आते हैं। तुलसी उनकी प्रसन्नता को निवास की छोटी छोटी आवश्यकताओं तक पहुँचाते हैं।

राम के साथ सीता को वन हजारों अयोध्याओं के समान प्रिय है। कुटी, वन के जीव, मुनिदम्पति, भोजन और पत्तों की सेज सब आत्मीय सुख देते हैं। तुलसी उन्हें रामप्रिया और जगज्जननी कहकर भोग विलास के प्रति उनकी अनासक्ति का अर्थ खोलते हैं।

अयोध्या की याद से भर आयी आँखें

सीता और लक्ष्मण को जिस प्रकार सुख मिले, राम वही करते हैं और वही कहते हैं। इस बात में उनकी देखभाल का पूरा उद्देश्य बताया गया है। वे पुरानी कथाएँ और कहानियाँ सुनाते हैं, जिन्हें दोनों बड़े सुख से सुनते हैं। कुटी में साथ का समय इस प्रकार बीतता है। जिनके साथ रहने से वन इतना प्रिय हुआ है, वे स्वयं भी दोनों की प्रसन्नता का ध्यान रखते हैं। कहानी कहना उसी ध्यान का एक रूप है।

फिर राम को अयोध्या की याद आती है। जब जब वे उसका स्मरण करते हैं, तब तब उनकी आँखों में जल भर जाता है। लक्ष्मण और सीता के लिये अभी घर की स्मृति भूल जाने का सुख कहा गया था। राम के नेत्रों में वही दूर छूटा घर आँसू बनकर उपस्थित है। तुलसी इन अनुभवों को एक दूसरे के निकट रखते हैं। वन में साथ रहते हुए भी स्मृति किस तरह अपना काम करती है, यह अब राम की दशा में प्रकट होता है।

जब जब रामु अवध सुधि करहीं । तब तब बारि बिलोचन भरहीं॥
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई । भरत सनेहु सीलु सेवकाई॥

चौपाई ८

माता पिता याद आते हैं, परिवार के लोग याद आते हैं, भाई याद आते हैं। फिर भरत के प्रेम, शील और सेवा का विशेष उल्लेख है। भरत का नाम इन गुणों के साथ उभरता है। स्मरण में केवल किसी व्यक्ति का अभाव नहीं, उसके साथ मिले प्रेम और व्यवहार का अनुभव भी है। राम को याद आता है कि भरत का स्नेह कैसा है, उनका शील कैसा है और उनकी सेवा कैसी है। इन्हें स्मरण करके कृपा के समुद्र राम दुःखी हो जाते हैं।

फिर वे कठिन समय का विचार करके धैर्य धारण करते हैं। आँसुओं के बाद यह सँभलना भी कथा का भाग है। दुःख की वास्तविकता और धीरज का प्रयत्न दोनों दिखते हैं। चित्रकूट की शोभा अभी कही जा चुकी है, सीता और लक्ष्मण के सुख को भी हमने देखा है। उसी जीवन में राम अपने परिवार का स्मरण करते हैं और फिर समय की कठिनता समझकर अपने को सँभालते हैं। उनका स्नेह वन तक साथ आया है, जिसमें सामने के प्रियजन और दूर के परिजन दोनों हैं।

राम को दुःखी देखकर सीता और लक्ष्मण व्याकुल हो जाते हैं। तुलसी इस दशा को मनुष्य और उसकी परछाईं की उपमा से समझाते हैं। जैसे परछाईं मनुष्य की चेष्टा का अनुसरण करती है, वैसे ही राम का दुःख दोनों में प्रतिबिम्बित होता है। यह पहले कही हुई उनकी प्रसन्नता के भीतर आया परिवर्तन है। वे राम के साथ सुखी हैं; उन्हीं को व्यथित देखकर उनका मन भी व्यथित होता है। साथ की निकटता में दूसरे का दुःख भी इतना पास अनुभव होता है।

प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु । धीर कृपाल भगत उर चंदनु॥
लगे कहन कछु कथा पुनीता । सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता॥

चौपाई ९

अब राम पत्नी और भाई की दशा देखते हैं। तुलसी उन्हें धीर, कृपालु और भक्तों के हृदय को शीतल करनेवाला चन्दन कहते हैं। वे कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं। उन्हें सुनकर लक्ष्मण और सीता फिर सुख पाते हैं। पहले प्राचीन कहानियाँ सुनाने की बात थी। यहाँ व्याकुल प्रियजनों की दशा देखकर कथा कहने का प्रसंग आया है। कौन सी कहानियाँ कही गयीं, उनके नाम या वृत्तान्त नहीं खुलते। सामने उनका सुना जाना और उससे प्राप्त सुख है।

स्मृति से आँसू आते हैं, धैर्य से राम सँभलते हैं, और दोनों को व्याकुल देखकर फिर उनका मन सुखी करते हैं। इस क्रम में कुटी का सुख किसी स्थिर चित्र की तरह अचल नहीं रहता। उसे प्रेम से निभाया जाता है। राम की अपनी पीड़ा भी कही गयी है और प्रियजनों के लिये उनका करुणामय ध्यान भी। कथा सुनकर सीता और लक्ष्मण को मिला सुख इसी पूरे क्रम के बाद आता है।

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत॥ १४१॥

दोहा १४१

अन्त में पर्णकुटी में सीता और लक्ष्मण सहित राम की शोभा है। तुलसी इसकी उपमा अमरावती में शची और जयन्त सहित निवास करनेवाले इन्द्र से देते हैं। टीका शची को इन्द्र की पत्नी और जयन्त को उनका पुत्र बताती है। यह साथ सहित शोभा की तुलना है। यहाँ राम के साथ पत्नी और भाई हैं, उपमा में इन्द्र के साथ पत्नी और पुत्र। तीनों की कुटी अपने इस साथ में इतनी सुन्दर लगती है कि कवि अमरपुर का चित्र सामने रख देते हैं।

अयोध्या, माता पिता, परिवार, भाइयों और भरत के प्रेम तथा सेवाभाव को याद करके राम दुःखी होते हैं। उन्हें देखकर सीता और लक्ष्मण भी व्याकुल हो जाते हैं। राम पवित्र कथाएँ सुनाकर उन्हें सुख देते हैं। अन्त में कुटी में तीनों की शोभा की तुलना शची और जयन्त सहित इन्द्र के निवास से होती है।

और अन्त में, अपनी ओर

चित्रकूट के इन दिनों को पढ़कर वनवासियों का अपना वन बताना देर तक याद रहता है। वे पहाड़, गुफाएँ, बीहड़ और जलस्थल जानते हैं। इसी जानकारी के साथ सेवा का अवसर माँगते हैं। वेद और मुनिमन के लिये अगम राम उनकी बातें पिता की तरह सुनते हैं। तुलसी का प्रेम वाला कथन इसी भेंट के बीच आता है, जहाँ किसी का अनुभव, उसके परिवार का अपनापन और सेवा की इच्छा आदर पाती है।

फिर वह वन है जिसके पक्षी, पशु, वृक्ष और तिनके तक धन्य कहे गये। सीता के लिये उन्हीं जीवों में प्रिय परिवार दिखाई देता है। बड़े दृश्य का सुख पर्णकुटी के जीवन में उतर आया है। भोजन अमृत जैसा प्रिय है, मुनिदम्पति सास ससुर जैसे लगते हैं और पत्तों की सेज में साथ का सुख है। हम वन की महिमा को इन आत्मीय सम्बन्धों में भी पहचानते हैं।

राम की आँखों का जल इस प्रसन्नता में परिवार की स्मृति जोड़ता है। भरत का प्रेम और सेवा याद आते हैं, और सामने सीता तथा लक्ष्मण का मन राम की दशा देखकर व्याकुल होता है। तब राम उनके लिये कथा कहते हैं। जिस पन्ने में इतने लोगों ने राम के सामने अपना प्रेम रखा था, उसका अन्त राम के अपने प्रेम और देखभाल पर होता है। पर्णकुटी की सुन्दरता में यह ध्यान भी शामिल है कि साथ रहनेवाले का मन कैसा है।

चित्रकूट की कुटी में इस समय तीनों साथ हैं। देवताओं की विनती, मुनियों का आशीर्वाद और वनवासियों की आत्मीयता इस निवास से जुड़ चुके हैं। बाहर फलते वृक्ष और मन्दाकिनी की महिमा है। भीतर सीता और लक्ष्मण का संतोष, राम की स्मृतियाँ और उन्हें फिर सुख देनेवाली कथाएँ हैं। दोहा इसी पर्णकुटी की शोभा पर ठहरता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १३४ से १४१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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