रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · अवध का दुःख और कौसल्या का स्नेह
अवध का दुःख और कौसल्या का स्नेह
पिता के पास से राम चल देते हैं। अवध में शोक फैलता है, कैकेयी किसी की सीख नहीं सुनतीं, और कौसल्या पुत्र को गोद में लेकर राज्याभिषेक का शुभ समय पूछती हैं।
राम पिता से बोल रहे हैं, और पिता उत्तर नहीं दे पा रहे। पुत्र की वाणी में आज्ञा मानने का उत्साह है, शीघ्र लौट आने का आश्वासन है, माता से विदा लेकर फिर चरणों में प्रणाम करने की बात है। इसके बाद राम वहाँ से चल देते हैं। उसी घर से निकली अप्रिय बात अवध में इतनी तेजी से फैलती है कि तुलसीदास पूरे नगर को बिच्छू का डंक लगने जैसा अनुभव कराते हैं। जहाँ समाचार पहुँचता है, वहीं कोई सिर पीटने लगता है।
आगे हम अनेक आवाजें सुनेंगे। कोई कैकेयी को दोष देता है, कोई राजा को, कोई विधाता को। भरत की सम्मति का सन्देह भी उठता है, और उसी समय उसका ऐसा खण्डन होता है कि चन्द्रमा से आग बरसना सम्भव माना जाता है, भरत का राम के विरुद्ध जाना असम्भव। कैकेयी के पास उनकी अपनी प्रिय स्त्रियाँ समझाने पहुँचती हैं। नगर की पुकार उस घर तक आती है, पर रानी उसे स्वीकार नहीं करतीं।
इस शोक के बीच राम का मुख प्रसन्न है। माता के पास पहुँचकर वे हाथ जोड़ते हैं, और कौसल्या उन्हें हृदय से लगा लेती हैं। पुत्र के लिये कपड़े और आभूषण न्यौछावर होते हैं, माँ की गोद भरती है, और अन्त में उनका प्रश्न सुनायी देता है: राज्याभिषेक का मंगलकारी लग्न कब है। उनके प्रश्न में अभी नगर की वही आशा बसी है जिसे बाहर शोक ने घेर लिया है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम पिता की आज्ञा मानकर माता से विदा लेने जाते हैं; वनगमन को बन्धन से मुक्ति जानकर उनका आनन्द बढ़ता है।
- राजा पुत्र के वचन सुनते हैं, पर शोक के कारण कोई उत्तर नहीं देते।
- कैकेयी जिनके निर्णय से नगर व्याकुल है और जो अपनी प्रिय सखियों की हितकारी सीख भी नहीं सुनतीं।
- भरत नगर की चर्चा में जिनकी सम्मति का सन्देह उठता है और जिनके रामप्रेम का दृढ़ पक्ष भी सामने आता है।
- सखियाँ और बड़ी स्त्रियाँ कैकेयी का पुराना स्नेह याद दिलाकर वनगमन रोकने का उपाय सुझाती हैं।
- कौसल्या पुत्र को गोद में लेकर बार बार चूमती हैं और राज्याभिषेक का शुभ लग्न पूछती हैं।
पिता को प्रणाम करके, माता की ओर
जिस पुत्र का चरित्र सुनकर पिता को प्रसन्नता मिले, राम उसके जन्म को धन्य कहते हैं। सामने पिता का दुःख उनके वचन का सम्बल नहीं तोड़ता। वे पुत्र के जन्म का फल बताते हैं और उसी के भीतर अपना कर्तव्य पहचानते हैं। पृथ्वी पर जन्म लेना सार्थक हुआ या नहीं, इसकी कसौटी इस क्षण पिता के हृदय में होने वाला आनन्द है। राम अपने विषय में कोई बड़ाई नहीं कहते। वे उस सम्बन्ध की महिमा कहते हैं जिसमें पिता पुत्र का चरित्र सुनकर सुखी हों।
धन्य जनमु जगतीतल तासू । पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥
चौपाई १
चारि पदारथ करतल ताकें । प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥
अगली बात माता और पिता दोनों को एक साथ रखती है। जिन्हें अपने माता पिता प्राणों के समान प्रिय हों, उनके हाथ में चारों पदार्थ हैं। पोद्दारजी की टीका इन पदार्थों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष कहकर खोलती है। जीवन के इतने बड़े लाभ राम एक घरेलू स्नेह के भीतर बता देते हैं। पिता की सेवा करके वे किसी कमी में पड़ने की बात नहीं सोच रहे। उनकी वाणी में जन्म का फल मिलने का विश्वास है। इसीलिये आगे आज्ञा पालन करने की बात इतनी सहजता से आती है।
वे पिता से प्रार्थना करते हैं कि आज्ञा दीजिये। आपकी आज्ञा का पालन करके जन्म का फल पाऊँगा और जल्दी लौट आऊँगा। लौटने का आश्वासन उसी वाक्य में है जिसमें जाने की अनुमति माँगी गयी है। पिता के सामने वन की कठिनाइयों की गिनती नहीं रखी जाती। पुत्र उन्हें उस समय का भरोसा देता है जब आज्ञा पूरी करके फिर सामने आ सकेगा। इस छोटे से आश्वासन में बिछुड़ने की घड़ी को सहने योग्य बनाने की कोमल चेष्टा है।
इसके बाद राम अपने जाने का क्रम बताते हैं। पहले माता से विदा माँगकर आयेंगे। फिर पिता के चरणों में प्रणाम करेंगे और वन को चलेंगे। अभी जो प्रस्थान होने वाला है, वह माता के पास जाने का है। अन्तिम बार पिता के पैर लगने की बात आगे के लिये कही गयी है। राम इतना स्पष्ट कहकर चल देते हैं, इसलिए पिता का मौन केवल बातचीत का ठहराव होकर नहीं रह जाता। पुत्र के कदम उठ जाते हैं और उत्तर अनकहा रह जाता है।
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा । भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥
चौपाई २
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी । छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥
राजा ने शोक के वश होकर कोई उत्तर नहीं दिया। यहाँ उनके मन की ओर से कोई नया वचन नहीं आता। एक ओर राम की कही हुई बात पूरी सुनायी दी थी, दूसरी ओर राजा की चुप्पी रह गयी। तुलसी उसी चौपाई के अगले चरण में घर से नगर तक पहुँच जाते हैं। जो समाचार भीतर इतना पीड़ादायक था, वह पूरे नगर में फैल गया। उसके फैलने की तेजी समझाने के लिये बिच्छू का विष आता है: डंक लगा और तन में चढ़ गया।
इस उपमा में अवध के लोग अलग अलग सुनने वाले होकर भी एक ही तन जैसे लगते हैं। बात कहीं एक जगह उत्पन्न हुई, किन्तु उसकी पीड़ा वहीं ठहरने वाली नहीं है। राम पिता के पास से निकल चुके हैं और नगर का दुःख अभी फैलना शुरू हुआ है। पुत्र अपने सामने के कर्तव्य को लेकर चल रहा है। नगर उस सम्भावित वियोग के सामने खड़ा हो रहा है जिसके लिये उसके पास कोई धीरज नहीं है।
राम माता पिता के स्नेह और पिता की आज्ञा के पालन को जन्म का फल कहते हैं। माता से विदा लेकर फिर प्रणाम करने की बात कहकर वे पिता के पास से चल देते हैं। राजा शोक में कोई उत्तर नहीं देते और अप्रिय समाचार नगरभर में फैल जाता है।
अवध पर करुणा की सेना
समाचार सुनकर सभी स्त्री पुरुष व्याकुल हो उठते हैं। तुलसी पहले बेल और वृक्षों का दृश्य देते हैं, जिनके सामने वन की आग आ गयी हो। बिच्छू के विष ने समाचार की तेजी दिखायी थी। दावानल के सामने मुरझाती वनस्पति अब उस समाचार का असर दिखाती है। जहाँ कोई सुनता है, वहीं सिर धुनता है। दुःख सुनने और दुःख से भर जाने के बीच धीरज बाँधने की जगह ही नहीं बचती।
मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ।
दोहा ४६
मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ॥ ४६॥
सूखते हुए मुख और बहते हुए नेत्र एक साथ दिखाई देते हैं। आँखों में पानी है, मुँह सूख रहा है, और शोक इतना है कि हृदय में समा नहीं पाता। तब कवि करुण रस की सेना उतार देते हैं। वह डंका बजाती हुई अवध पर आयी है। नगर में किसी एक व्यक्ति का रुदन सुनायी दे, इससे बहुत बड़ा यह चित्र है: करुणा का अपना दल है, अपना आगमन है, और उसने पूरे अवध को घेर लिया है।
अब उसी व्याकुल नगर से शिकायतें उठती हैं। लोगों को लगता है कि सब संयोग ठीक बैठ गये थे और विधाता ने बीच में बात बिगाड़ दी। जहाँ तहाँ कैकेयी को गालियाँ दी जा रही हैं। वे पूछते हैं, इस रानी को ऐसा क्या सूझा कि छाये हुए घर पर आग रख दी। घर बन चुका हो, सिर पर छाया हो और कोई उसी छत को आग दे दे, नगरजन इस निर्णय को वैसा ही देखते हैं। उनकी शिकायत में अपने सुख का उजड़ना भी है और रानी की समझ पर विस्मय भी।
उनके आरोपों की उपमाएँ एक के बाद एक आती हैं। कैकेयी अपने हाथ से आँखें निकालकर देखना चाहती हैं, अमृत फेंककर विष चखना चाहती हैं। वे रघुवंश के बाँसवन को जलाने वाली आग हो गयी हैं। लोग उन्हें कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कहते हैं। आँख, अमृत और वन, तीनों में किसी लाभ को अपने ही हाथ से नष्ट करने की बात है। इसी आक्रोश में अगला चित्र आता है, पत्ते पर बैठकर उसी पेड़ को काट डालना।
पालव बैठि पेड़ एहिं काटा । सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा॥
चौपाई ३
सदा रामु एहि प्रान समाना । कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥
पेड़ कटेगा तो पत्ते पर बैठने का सहारा भी कहाँ बचेगा। नगर के लोगों को कैकेयी का काम इसी कारण और असंगत लगता है। उन्होंने सुख के बीच शोक का पूरा ठाट सजा दिया। फिर वे उसी रानी के पुराने स्नेह को याद करते हैं: राम तो इन्हें सदा प्राणों के समान प्रिय थे। ऐसी प्रीति रहते हुए यह कुटिलता किस कारण ठानी गयी, यह प्रश्न आरोपों के बीच भी बचा रहता है। वे केवल परिणाम से दुखी नहीं हैं, पुराने व्यवहार और आज के निर्णय को मिला नहीं पा रहे।
इसी चर्चा में कुछ लोग स्त्रियों के स्वभाव पर व्यापक, कठोर बातें कहने लगते हैं। कवियों का हवाला देकर वे उसे पकड़ में न आने वाला, अथाह और भेदभरा बताते हैं। उनका कहना है कि अपनी परछाईं पकड़ ली जाय, पर स्त्री की गति नहीं जानी जा सकती। यह उस शोकाकुल नगर की कही हुई धारणा है। कैकेयी के आचरण पर उठी शिकायत यहाँ पूरी स्त्री जाति के विषय में आरोप बन जाती है। आगे वही स्वर आग, समुद्र और काल की शक्ति को साथ रखकर बोलता है।
उस कथन में पूछा जाता है कि आग क्या नहीं जला सकती, समुद्र में क्या नहीं समा सकता, अबला कही जाने वाली प्रबल स्त्री क्या नहीं कर सकती, और काल संसार में किसे नहीं खाता। चारों प्रश्नों में किसी रोक का न बचना सुनायी देता है। नगरजन अपने सामने आयी विपत्ति को ऐसी शक्तियों के सहारे व्यक्त कर रहे हैं जिन्हें वे असीम समझते हैं। उनके आक्रोश और उनकी असहायता दोनों को साथ सुनना पड़ता है; कैकेयी को कोसते हुए भी वे हुए परिवर्तन को समझ नहीं पा रहे।
अवध में मुख सूखते हैं, आँसू बहते हैं और किसी को धीरज नहीं बँधता। नगरजन कैकेयी को अपने ही सुख और सहारे को नष्ट करने वाली कहते हैं। उनकी चर्चा में पुराने रामप्रेम पर आश्चर्य और स्त्रियों के विषय में कठोर सामान्य कथन भी आते हैं।
राजा पर विवाद, भरत पर अटूट विश्वास
विधाता के लिये नगर का प्रश्न बदलकर फिर लौटता है: क्या सुनाया था, अब क्या सुना दिया; क्या दिखाया था, अब क्या दिखाना चाहते हैं। इस पुकार में बीती आशा और सामने के समाचार का पूरा अन्तर है। इसके बाद दोष देने के विषय में लोग एकमत नहीं रहते। कुछ राजा के निर्णय पर आपत्ति करते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने दुर्बुद्धि कैकेयी को विचार करके वर नहीं दिया। वर देने के समय सावधानी नहीं रही, और अब उसे पूरा करने पर हठ करके स्वयं सारे दुःखों के पात्र बन गये।
वे यहाँ तक कहते हैं कि स्त्री के विशेष वश हो जाने से राजा का ज्ञान और गुण मानो जाता रहा। इस आरोप में दो बातें जुड़ी हैं: पहले वर देने की असावधानी, फिर उसके पालन पर अड़े रहने का दुःख। पर नगर में धर्म की मर्यादा पहचानने वाले सयाने भी हैं। वे राजा को दोष नहीं देते। जिसे पहले लोग हठ कह रहे थे, उसे परखने के लिये ये लोग धर्म की मर्यादा सामने रखते हैं। एक ही घटना पर दोनों पक्षों की बातें सुनायी देती हैं।
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी । एक एक सन कहहिं बखानी॥
चौपाई ४
एक भरत कर संमत कहहीं । एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥
राजा को दोष न देने वाले आपस में शिबि, दधीचि और हरिश्चन्द्र की कथाएँ बखानते हैं। यहाँ उन कथाओं के प्रसंग अलग से नहीं खुलते। नाम इतने हैं कि नगर की बहस में धर्म निभाने का पक्ष स्पष्ट हो जाय। वचन और धर्म के लिये दुःख सहने की स्मृति लोग एक दूसरे के सामने रख रहे हैं। राजा का शोक सबको दिखाई देता है; उस शोक तक पहुँचने के निर्णय को कोई अविवेक समझता है और कोई मर्यादा के भीतर देखता है।
इसी चर्चा में एक और बात निकलती है। कुछ लोग कह देते हैं कि इसमें भरत की सम्मति है। यह नगर में उठी हुई बात है, भरत की ओर से दिया गया कोई वचन नहीं। कुछ सुनकर उदासीन रहते हैं, कुछ बोलते ही नहीं। फिर ऐसे लोग सामने आते हैं जो इस आरोप को सुनना भी स्वीकार नहीं करते। वे हाथों से कान ढक लेते हैं और जीभ को दाँतों के नीचे दबाते हैं। असहमति पहले उनके शरीर की चेष्टा में दिखती है, फिर वाणी में।
कान मूदि कर रद गहि जीहा । एक कहहिं यह बात अलीहा॥
चौपाई ५
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे । रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥
वे इसे झूठ कहते हैं। ऐसी बात कहने से पुण्य नष्ट हो जायँगे, यह चेतावनी भी देते हैं। उनका कारण भरत का राम के प्रति प्रेम है: राम उन्हें प्राणों के समान प्यारे हैं। इस उत्तर में कोई नया समाचार लाकर अफवाह का मुकाबला नहीं किया जाता। भरत के स्वभाव और प्रेम पर इतना दृढ़ विश्वास रखा जाता है कि आरोप उसके सामने टिक ही नहीं सकता। अगला दोहा उसी विश्वास को दो असम्भव परिवर्तनों से परखता है।
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।
दोहा ४८
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥ ४८॥
चन्द्रमा आग की चिनगारियाँ बरसाने लगे, अमृत विष के समान हो जाय, तब भी भरत स्वप्न में कभी राम के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे। पहली उपमा में जिस चन्द्रमा से शीतलता की आशा है, उससे दाह आने लगता है। दूसरी में अमृत का अपना गुण पलट जाता है। भरत के प्रेम का खण्डन करने से पहले ऐसे उलटाव मान लिये जाते हैं। विरोध की सम्भावना स्वप्न तक में नहीं रखी गयी। नगर में कही गयी सम्मति की बात का उत्तर इतना स्पष्ट और इतना पूर्ण है।
फिर कुछ लोग दोष विधाता पर रखते हैं कि उसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। यही अमृत और विष पहले कैकेयी की समझ को कोसने में आये थे। अब वही चित्र भाग्य के बदल जाने की शिकायत बनता है। नगर में खलबली है, सबको चिन्ता घेर चुकी है, हृदय में असह्य जलन है और उत्साह मिट गया है। मत अलग अलग हैं, पर उनके नीचे एक ही अनुभव है: जिस आनन्द की ओर सब देख रहे थे, उसके स्थान पर वियोग की आशंका सामने आ गयी।
कुछ लोग राजा को अविचार से वर देने का दोष देते हैं, कुछ धर्म की मर्यादा पहचानकर उनका पक्ष रखते हैं। भरत की सम्मति की अफवाह का दृढ़ खण्डन होता है: राम उन्हें प्राणों से प्रिय हैं और वे स्वप्न में भी उनका विरोध नहीं करेंगे। नगर का उत्साह शोक में बदल चुका है।
पुराना स्नेह याद दिलाने वाली स्त्रियाँ
अवध की शिकायत के बाद अब कैकेयी के पास पहुँचने वाली स्त्रियाँ आती हैं। इनमें ब्राह्मणों की पत्नियाँ हैं, कुल की माननीय बड़ी बूढ़ियाँ हैं और कैकेयी की अत्यन्त प्रिय स्त्रियाँ हैं। वे रानी के शील की प्रशंसा से बात आरम्भ करती हैं। बाहर गालियाँ दी जा रही थीं; यहाँ अपने सम्बन्ध और पुराने व्यवहार को सामने रखकर समझाया जा रहा है। जिनकी बात सुनने का कारण कैकेयी के पास होना चाहिये, वे ही उनके निकट आयी हैं।
किन्तु उनके वचन कैकेयी को बाण जैसे लगते हैं। कहने वालों की ओर से सीख है, सुनने वाली की ओर चोट का अनुभव। इस छोटे संकेत के बाद उनका पूरा तर्क सुनायी देता है। वे रानी को उनकी अपनी कही हुई बात याद दिलाती हैं। आप तो सदा कहती रही हैं कि राम के समान भरत भी प्रिय नहीं हैं। यह बात कोई गुप्त अनुमान नहीं है, सारे जगत् को मालूम है। इतने परिचित स्नेह के सामने आज का निर्णय समझ में नहीं आता।
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना । सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥
चौपाई ६
करहु राम पर सहज सनेहू । केहिं अपराध आजु बनु देहू॥
वे पूछती हैं, राम पर आपका स्वाभाविक स्नेह रहा है, आज किस अपराध के कारण उन्हें वन दे रही हैं। प्रश्न में राम के किये हुए किसी अपराध की सूचना नहीं है। रानी से उसी कारण का उत्तर माँगा जा रहा है जिसके बिना दण्ड अकारण दिखाई देता है। पहले अपना पुराना वचन याद कीजिये, फिर पुत्र पर सहज प्रेम देखिये, फिर आज के वनगमन का कारण बताइये। उनकी सीख एक एक करके इन्हीं निकट की बातों को सामने रखती है।
इसके बाद वे कौसल्या का नाम लेती हैं। कैकेयी ने कभी सौतियाडाह नहीं किया, उनके प्रेम और विश्वास को सारा देश जानता है। अब कौसल्या ने कौन सा बिगाड़ किया है कि पूरे नगर पर वज्र गिरा दिया गया। प्रश्न माँ से माँ के सम्बन्ध तक पहुँचता है, और उसका परिणाम फिर नगरभर पर रखा जाता है। स्त्रियाँ रानी के भीतर किसी पुरानी ईर्ष्या का इतिहास नहीं गढ़तीं। उलटे वे याद दिलाती हैं कि ऐसा डाह पहले था ही नहीं।
उनके सामने अब अलग अलग सम्बन्धों की कसौटी है। राम वन गये तो केवल एक राजकुमार की जगह खाली होने की बात नहीं होगी। सीता अपने पति का साथ छोड़ देंगी? लक्ष्मण घर में रह सकेंगे? भरत अयोध्या के राज्य का सुख भोग सकेंगे? राजा राम के बिना जीवित रह सकेंगे? एक ही दोहे में चार प्रश्न पूछकर वे रानी के निर्णय का फैलाव दिखाती हैं। कैकेयी जिस राज्य की बात सोच रही हैं, उसके आसपास के लोग और उनके प्राण भी उस निर्णय से बँधे हुए हैं।
सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।
दोहा ४९
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥ ४९॥
इन प्रश्नों में आने वाले दुःख का अनुमान है। यहाँ सीता या लक्ष्मण अपना निर्णय सुनाने नहीं आये हैं। भरत राज्य स्वीकार या अस्वीकार करते हुए सामने नहीं खड़े हैं, और राजा के विषय में भी उनकी आशंका बोली जा रही है। स्त्रियों का आशय है कि इन सम्बन्धों को राम से काटकर शेष सब कुछ यथावत् नहीं रखा जा सकेगा। पोद्दारजी की टीका उनके तर्क का निष्कर्ष यही खोलती है कि सब उजड़ जायगा।
इसलिये वे कैकेयी से कहती हैं कि हृदय में यह सब विचारकर क्रोध छोड़ दीजिये। अपने को शोक और कलंक की कोठी मत बनाइये। कोठी में कोई वस्तु भरकर रखी जाती है। यहाँ वे उस रानी को रोकना चाहती हैं जिसके निर्णय में इतना शोक और कलंक जमा हो रहा है। उनकी सीख में अब उपाय आने वाला है। वे केवल अनिष्ट गिनाकर नहीं लौटतीं, भरत के युवराज होने की इच्छा के भीतर भी राम को वन से बचाने का रास्ता खोजती हैं।
कैकेयी की प्रिय और माननीय स्त्रियाँ उनका पुराना रामप्रेम, भरत से भी अधिक राम को चाहने की बात और कौसल्या के प्रति ईर्ष्यारहित व्यवहार याद दिलाती हैं। सीता, लक्ष्मण, भरत और राजा से जुड़े प्रश्न रखकर वे इस निर्णय के दुःखद परिणामों पर विचार करने को कहती हैं।
भरत को राज्य, राम को गुरु का घर
भरत को अवश्य युवराजपद दीजिये, स्त्रियाँ कहती हैं, पर राम का वन में क्या काम है। यह उनकी सलाह का स्पष्ट मोड़ है। भरत के लिये माँगा गया राज्य रहने दिया जा रहा है और राम के वनगमन पर प्रश्न रखा जा रहा है। कैकेयी की इच्छा को पूरा सुनकर उसके भीतर से दुःख घटाने की राह निकाली गयी है। दोनों बातों को एक ही कठोर निर्णय में बाँधकर रखना आवश्यक क्यों है, वे रानी से यही समझने को कहती हैं।
नाहिन रामु राज के भूखे । धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥
चौपाई ७
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू । नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥
राम राज्य के भूखे नहीं हैं। वे धर्म की धुरी धारण करने वाले हैं और विषयों के रस में आसक्त नहीं हैं। यह कहकर स्त्रियाँ उस सम्भावित शंका का आधार हटाती हैं कि राम की उपस्थिति से भरत के राज्य को बाधा होगी। पोद्दारजी की टीका इस आशय को स्पष्ट करती है: राम वन न गये तो भरत के राज्य में विघ्न करेंगे, ऐसा सन्देह करने का कारण नहीं है। राज्य के प्रति उनकी अनासक्ति ही इस भरोसे का आधार है।
फिर एक और निश्चित प्रस्ताव सामने रखा जाता है। यदि घर छोड़ना ही आवश्यक माना जा रहा है तो राम गुरु के घर रहें। राजा से दूसरा वर इस प्रकार माँग लीजिये। इसमें भरत का युवराजपद भी रहता है और राम का निवास वन के स्थान पर गुरु के यहाँ हो जाता है। स्त्रियों की सीख इतनी व्यावहारिक है कि वह बदलने योग्य बात को ठीक ठीक बताती है। वे किसी अस्पष्ट कृपा की प्रतीक्षा नहीं करातीं, रानी के हाथ में एक बोलने योग्य प्रस्ताव रख देती हैं।
वे चेताती हैं कि हमारे कहे पर न चलने से हाथ कुछ भी नहीं लगेगा। जिस लाभ के लिये रानी अड़ी हैं, उसी का निष्फल हो जाना उन्हें दिखाया जाता है। इसके बाद वे लौटने का एक और अवसर देती हैं: यदि यह कुछ हँसी में कहा गया हो तो खुलकर बता दीजिये। इस वाक्य में रानी की ओर से कोई स्वीकृति नहीं है कि बात हँसी की थी। सखियाँ स्वयं एक सम्भव रास्ता खोल रही हैं जिससे निर्णय वापस लिया जा सके और सामने खड़ा शोक हट सके।
फिर प्रश्न उसी पुत्र पर लौटता है जिसके लिये यह सब कहा जा रहा है। राम जैसा पुत्र वन में भेजने योग्य है? लोग सुनकर क्या कहेंगे? वे जल्दी उठकर ऐसा उपाय करने को कहती हैं जिससे शोक और कलंक मिटे। उनकी विनती में गति बढ़ गयी है। पहले पुराना शील याद दिलाया गया था, फिर सम्बन्धों की हानि समझायी गयी, फिर गुरु के घर रहने का प्रस्ताव मिला। अब आग्रह है कि इस समझ को किसी काम में बदला जाय।
जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।
छन्द, सोरठा ५० से पहले
हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥
जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।
तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी॥
छन्द में यही आग्रह और सघन होकर आता है। जिस तरह नगर का शोक और अपना कलंक दूर हो सके, वही उपाय करके कुल की रक्षा कीजिये। वन को जाते हुए राम को हठ करके लौटा लीजिये और दूसरी बात मत चलाइये। अब सखियों की इच्छा रानी की ओर से दृढ़ता चाहती है। जिस हठ से अनिष्ट आया, राम को रोकने के लिये भी उतनी ही तत्परता माँगी जा रही है। बात के केन्द्र में पुत्र को लौटा लेना है।
इसके बाद तीन उपमाएँ पूरी सुनायी देती हैं। सूर्य के बिना दिन कैसा होगा, प्राणों के बिना शरीर कैसा होगा, चन्द्रमा के बिना रात कैसी होगी। दिन का प्रकाश, शरीर का जीवन और रात की शोभा, तीनों अपने आधार से वंचित हो जाते हैं। तुलसीदास अवध को राम के बिना वैसा ही कहते हैं। छन्द रानी को सम्बोधित करता है कि यह बात हृदय में समझकर देखिये। नगर के भवन गिने बिना नगर का जीता हुआ सहारा बता दिया गया है।
इन तीनों चित्रों को एक साथ रखने से सीख का आखिरी आग्रह समझ आता है। राम के बिना जो बचेगा, उसके नाम तो वही रहेंगे: दिन, शरीर, रात, अवध। किन्तु जिनसे उनमें प्रकाश, प्राण और शोभा है, वे साथ न होंगे। रानी से इसी अभाव को पहले से देखने की प्रार्थना की गयी है। उनका अपना कुल और अपना नगर इस विचार के भीतर हैं। इतनी बातों के बाद अब उत्तर सुनने की बारी कैकेयी की है।
सखियाँ भरत का युवराजपद स्वीकार करते हुए राम के लिये गुरु के घर रहने का प्रस्ताव देती हैं। हँसी की बात हो तो उसे स्पष्ट करने और शीघ्र वनगमन रोकने को कहती हैं। छन्द में रामविहीन अवध को सूर्यहीन दिन, प्राणहीन देह और चन्द्रहीन रात के समान बताया गया है।
सीख अनसुनी रह गयी
सखियों की सीख सुनने में मधुर है और उसका परिणाम हितकारी है। तुलसी दोनों गुण साथ कहते हैं। केवल मीठी लगने वाली बात हो, उसका भरोसा पर्याप्त नहीं होता; यहाँ मिठास के साथ भलाई का फल भी है। पर कैकेयी इन बातों पर तनिक भी कान नहीं देतीं। कुबरी की सिखायी हुई रानी तक यह दूसरी सीख पहुँचकर भी प्रभाव नहीं डाल पाती। सखियों के पास इतना विस्तृत तर्क है, किन्तु रानी उसे सुनने को तैयार नहीं हैं।
सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।
सोरठा ५०
तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥ ५०॥
कैकेयी कोई उत्तर नहीं देतीं। असह्य क्रोध के कारण उनका व्यवहार रूखा हो गया है। वे सामने की स्त्रियों को इस प्रकार देखती हैं जैसे भूखी बाघिन हिरनियों को देख रही हो। समझाने आयी प्रिय स्त्रियों और उन्हें देखती हुई रानी के बीच इस दृष्टि ने कैसी दूरी बना दी है। अपनेपन से कही गयी सीख के उत्तर में कोई परिचित स्नेह नहीं मिलता। बाण जैसे लगने वाले वचनों की बात आरम्भ में थी; अन्त में रानी की यह कठोर दृष्टि है।
सखियाँ रोग को असाध्य जानकर उन्हें छोड़ देती हैं। वे कैकेयी को मन्दबुद्धि और अभागिनी कहती हुई चल पड़ती हैं। बात शुरू करते समय उन्होंने रानी के शील की सराहना की थी। अब उनके पास आगे समझाने का विश्वास नहीं बचा। कोई प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ, कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। रोग की उपमा उनके लौटने का कारण बताती है: उन्होंने उपचार की सारी बात कही, पर रोग ऐसा पाया जिस पर उसका असर नहीं होता।
नगर का विलाप फिर सुनायी देता है। लोग कहते हैं कि राज्य करते हुए कैकेयी को दैव ने नष्ट कर दिया, उन्होंने ऐसा काम किया है जैसा कोई और न करेगा। स्त्री पुरुष उन्हें करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं। दुःख की तीखी जलन विषम ज्वर जैसी है। लम्बी साँसें निकलती हैं और प्रश्न उठता है कि राम के बिना जीवन की आशा ही क्या है। सखियों के उपाय के अनसुना रह जाने के बाद नगर की असहायता और स्पष्ट हो गयी है।
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा । कवनि राम बिनु जीवन आसा॥
चौपाई ८
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी । जनु जलचर गन सूखत पानी॥
तुलसी प्रजा को जल सूखते समय व्याकुल हुए जलचरों के समुदाय जैसा दिखाते हैं। अभी वियोग की आशंका है, और उसी आशंका में जीवन का आधार घटता हुआ लग रहा है। जलचर जल को दूर से चाहने वाला प्राणी नहीं है; उसी में उसका जीना है। नगर का राम से सम्बन्ध इस चित्र में इतना निकट हो जाता है। विषम ज्वर का दाह और सूखते पानी के बीच छटपटाहट, दोनों एक साथ इस दुःख को देह का अनुभव बना देते हैं।
कैकेयी हितकारी सीख पर कान नहीं देतीं और कोई उत्तर नहीं देतीं। सखियाँ उन्हें असाध्य रोगी समझकर लौट जाती हैं। नगर का विलाप बना रहता है और रामवियोग की आशंका में प्रजा सूखते पानी के जलचरों की तरह व्याकुल होती है।
राम के मन की बेड़ी खुली
सभी स्त्री पुरुष अत्यन्त विषाद में हैं। इसी कथन के साथ तुलसी राम को माता के पास पहुँचा देते हैं। पिता से चलने के बाद बीच में पूरा नगर और कैकेयी को दी गयी सीख सुनायी गयी थी। अब फिर उन्हीं राम के मुख की ओर देखने की बारी है। उनका मुख प्रसन्न है और चित्त में चौगुना चाव है। नगर के आँसुओं के बाद यह प्रसन्नता चौंकाती है, और अगली ही बात उसका कारण बताती है।
उन्हें जो चिन्ता थी कि राजा कहीं रोक न लें, वह मिट गयी है। यहाँ वनगमन सुनकर केवल गम्भीर धैर्य रखने का वर्णन नहीं है। भीतर उत्साह बढ़ने और चिन्ता दूर होने की बात स्पष्ट कही गयी है। पिता का शोक उन्हें आज्ञा मानने से विमुख नहीं करता। वे जिस मार्ग पर चलने को तैयार हुए हैं, उसके रुक जाने की आशंका से अब मुक्त अनुभव करते हैं। माता के पास जाने वाले पुत्र के मुख पर उसी का आनन्द है।
पोद्दारजी की टीका इस प्रसन्नता की पृष्ठभूमि और खोलती है। राजतिलक की बात सुनकर राम को यह विषाद हुआ था कि सब भाइयों को छोड़कर केवल बड़े भाई का ही तिलक क्यों हो। कैकेयी की आज्ञा और पिता की मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया। यह कारण टीका में बताया गया है। भाइयों के बीच अकेले अपने राज्याभिषेक का प्रश्न उनके मन पर था; वनगमन का निर्णय आते ही उस प्रश्न का भार हट गया।
नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।
दोहा ५१
छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान॥ ५१॥
दोहा राम के मन को नया पकड़ा गया हाथी कहता है। राज्य उस हाथी को बाँधने वाली बेड़ी है। टीका इसे काँटेदार लोहे की बेड़ी के रूप में स्पष्ट करती है। अब वन जाने की बात सुनकर हाथी अपने को बन्धन से छूटा जानता है और उसका आनन्द बढ़ता है। जिस राज्य को पाने की इच्छा कोई बड़ी उपलब्धि समझ सकती है, उसी का राम के मन पर बन्धन जैसा अनुभव इस उपमा में दिखाई देता है।
नये पकड़े गये हाथी का चित्र इस भाव को और निकट लाता है। बँध जाने का अनुभव अभी ताजा है और छूटने का समाचार मिल गया है। राम की प्रसन्नता का कारण वन का कोई नया वर्णन करके नहीं बताया गया। राज्य की बेड़ी और उससे छूटने का अनुभव पर्याप्त है। अब वे कौसल्या के सामने आने वाले हैं। वे अपने भीतर आनन्द लिये हुए हैं, और माता अपने पुत्र को देखने के आनन्द से उन्हें ग्रहण करेंगी।
राम का मुख प्रसन्न है, चित्त में चौगुना उत्साह है और पिता के रोक लेने की चिन्ता मिट गयी है। टीका अकेले उनके राज्याभिषेक को लेकर हुए विषाद का कारण बताती है। दोहे में उनका मन नया पकड़ा हाथी है और राज्य लोहे की बेड़ी, जिससे वनगमन का समाचार उन्हें मुक्त करता है।
माँ की गोद और लग्न का प्रश्न
रघुकुल के तिलक राम दोनों हाथ जोड़ते हैं और आनन्दपूर्वक माता के चरणों में सिर नवाते हैं। कौसल्या आशीर्वाद देती हैं, उन्हें हृदय से लगा लेती हैं और गहने तथा वस्त्र न्यौछावर करती हैं। स्वागत का क्रम पूरा है: पुत्र का प्रणाम, माँ का आशीष, आलिंगन और न्यौछावर। अब तक नगर में जिसे खो देने का भय फैला था, वही पुत्र माता के सामने उपस्थित है। कौसल्या का स्नेह उसी उपस्थिति में भर उठता है।
वे बार बार पुत्र का मुख चूमती हैं। उनके नेत्र प्रेम के जल से भर गये हैं और शरीर पुलकित हो गया है। फिर राम को अपनी गोद में रखती हैं और दुबारा हृदय से लगाती हैं। पहले आलिंगन हुआ था, पर उससे माँ का स्नेह पूरा होकर ठहर नहीं गया। मुख चूमना, आँखें भरना, गोद में लेना और फिर हृदय से लगाना, प्रत्येक चेष्टा प्रेम को एक बार और व्यक्त करती है।
बार बार मुख चुंबति माता । नयन नेह जलु पुलकित गाता॥
चौपाई ९
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए । स्रवत प्रेमरस पयद सुहाए॥
उनके स्तनों से दूध बहने लगता है। तुलसी उसे प्रेम का रस कहते हैं और पोद्दारजी की टीका दूध का अर्थ स्पष्ट करती है। माँ के वात्सल्य का यह दृश्य केवल भावना के कथन में नहीं रहता। शरीर स्वयं उस प्रेम को व्यक्त कर रहा है। पुत्र गोद में है, नेत्रों में स्नेह का जल है और स्तनों से दूध बह रहा है। कौसल्या के स्वागत की पूर्णता इन कोमल, प्रत्यक्ष चेष्टाओं में है।
उनका प्रेम और महान् आनन्द कहा नहीं जाता। इस अकथनीय सुख के लिये कवि एक और उपमा देते हैं: मानो किसी कंगाल को कुबेर का पद मिल गया हो। यहाँ पाने की अनुभूति अपनी सीमा पर पहुँचती है। कौसल्या पुत्र को देखकर ऐसे समृद्ध अनुभव करती हैं। वे आदर के साथ उनके सुन्दर मुख को निहारती हैं, फिर मधुर वचन बोलती हैं। जिस मुख को अभी बार बार चूमा गया था, उसी की ओर देखकर प्रश्न किया जाता है।
कहहु तात जननी बलिहारी । कबहिं लगन मुद मंगलकारी॥
चौपाई १०
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई । जनम लाभ कइ अवधि अघाई॥
हे तात, माता बलिहारी जाती है, वह आनन्द और मंगल देने वाला लग्न कब है। कौसल्या राज्याभिषेक का शुभ समय जानना चाहती हैं। अपने प्रश्न के साथ वे उस समय का अर्थ भी कहती हैं। वह उनके पुण्य, शील और सुख की सुन्दर सीमा है, जन्म का लाभ पाने की पूर्णतम घड़ी है। आने वाले उत्सव में माँ अपने जीवन की सार्थकता देख रही हैं। राम के सामने अभी तक यही आशा उनके शब्दों में खुलती है।
आरम्भ में राम ने पिता को आनन्द देने वाले चरित्र से जन्म की धन्यता जोड़ी थी। यहाँ माँ उसी पुत्र के राज्याभिषेक के लग्न को अपने जन्म के लाभ की पूर्णता कह रही हैं। दोनों कथनों में पुत्र और माता पिता का सम्बन्ध है, पर इस क्षण उनकी दृष्टि अलग बातों पर है। राम आज्ञा मानकर वन जाने से जन्म का फल पाने को तैयार हैं। कौसल्या उस शुभ समय की प्रतीक्षा में हैं जब उनका अभिषेक होगा।
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
दोहा ५२
जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति॥ ५२॥
कौसल्या कहती हैं कि उस लग्न को सभी स्त्री पुरुष बड़ी व्याकुलता से चाहते हैं। इस चाह की उपमा प्यासे चातक और चातकी हैं जो शरद ऋतु में स्वाति की वर्षा की बाट देखते हैं। प्रश्न माँ का है, पर उसमें नगर की चाह भी समायी हुई है। प्यास और प्रतीक्षित वर्षा का सम्बन्ध राज्याभिषेक के उस समय को कितना अभीष्ट बना देता है। माता को वह लग्न अपने लिये भी मंगलकारी लगता है और सबके लिये भी।
यहीं यह प्रसंग रुकता है। कौसल्या का स्वागत पूरा हो चुका है, उनका स्नेह देह और वचन दोनों से व्यक्त हुआ है, और अब उनका प्रश्न राम के सामने है। राम ने अभी माता को वनगमन का नया निर्णय नहीं सुनाया है। माँ की आँखों में आभूषण न्यौछावर करने वाला उत्सव है, गोद में पुत्र है और वाणी में लग्न की प्रतीक्षा। बाहर जिसके बिना जीवन की आशा घट रही है, उसी पुत्र का अभिषेक माँ अभी सारे नगर की प्यास का उत्तर समझ रही हैं।
कौसल्या राम को आशीर्वाद और आलिंगन देती हैं, कपड़े तथा गहने न्यौछावर करती हैं, मुख चूमती हैं और गोद में बैठाती हैं। वात्सल्य से दूध बहता है। वे राज्याभिषेक का मंगलकारी लग्न पूछती हैं, जिसकी सबको प्यासे चातक चातकी जैसी प्रतीक्षा है। राम का वनगमन का समाचार उन्हें सुनाना अभी शेष है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में सुनने की कई स्थितियाँ हमारे सामने रहती हैं। पिता राम की बात सुनते हैं, पर शोक से उत्तर नहीं दे पाते। नगरजन समाचार सुनकर अलग अलग अर्थ लगाते हैं; भरत पर दोष रखने वाली बात को कुछ लोग तत्काल रोक देते हैं। सखियाँ कैकेयी से पूरी बात कहती हैं, पर वे कान नहीं देतीं। अन्त में माँ प्रश्न करती हैं और कथा उत्तर से ठीक पहले ठहर जाती है। किसने क्या सुना और कहाँ उत्तर नहीं आया, इसी से इन सम्बन्धों की दशा खुलती है।
नगर की व्याकुलता में सबसे दृढ़ कथन भरत के प्रेम का है। चारों ओर दोष बाँटे जा रहे हैं, फिर भी कुछ लोग अफवाह को बिना रोके आगे नहीं बढ़ने देते। वे भरत की ओर से कोई भाषण नहीं गढ़ते। इतना कहते हैं कि राम उनके प्राणप्रिय हैं और स्वप्न में भी विरोध सम्भव नहीं। शोक के बीच यह विश्वास अपने पूरे बल के साथ बचा रहता है।
सखियों की सीख भी देर तक याद रहती है क्योंकि उसमें उपाय है। वे भरत को युवराज बनाने से मना नहीं करतीं, राम के गुरु के घर रहने का रास्ता बताती हैं और रानी को लौटने का अवसर देती हैं। इतनी स्पष्ट भलाई का अनसुना रह जाना उनके बाघिन और हिरनियों वाले दृश्य को और दुःखद बना देता है। सम्बन्ध अपना हो तो भी बात सुन लेने का काम सुनने वाले को ही करना पड़ता है।
अन्त में कौसल्या की गोद रह जाती है। पूरे नगर का दुःख सुन लेने के बाद हम उस माँ को देखते हैं जिसके लिये पुत्र का आना अभी शुद्ध आनन्द है। वे उन्हें चूमती हैं, हृदय से लगाती हैं और शुभ लग्न पूछती हैं। राम की प्रसन्नता का कारण हमें सुनाया जा चुका है; माता की प्रसन्नता उनके अपने प्रश्न में सामने है। उसी प्रश्न पर रुककर तुलसी अगले उत्तर से पहले इस स्नेह को पूरा समय देते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ४६ से ५२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।