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पादुकाओं का राज्य और नन्दिग्राम की साधना

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · पादुकाओं का राज्य और नन्दिग्राम की साधना

पादुकाओं का राज्य और नन्दिग्राम की साधना

चित्रकूट से लौटता हुआ शोकाकुल समाज, सिंहासन पर राम की पादुकाएँ, और नन्दिग्राम की पर्णकुटी में चौदह वर्ष की अवधि को हृदय में सँभाले भरत।

बिछुड़ने की घड़ी आ गयी है। जिनके प्रेम के सामने जनक और वसिष्ठ की बुद्धि ठहर गयी, उन राम और भरत के अलग होने का वर्णन करते हुए तुलसीदास की वाणी भी सकुचाती है। सेवक यात्रा की तैयारी करेंगे, माताएँ पालकियों में बैठेंगी और दो राजसमाज चित्रकूट से चल पड़ेंगे। किन्तु उस जाने का दुःख विदा लेनेवालों के साथ ही नहीं जायगा। वटवृक्ष के नीचे सीता, राम और लक्ष्मण भी प्रियजनों का वियोग अनुभव करेंगे।

यात्रा अयोध्या पहुँचकर भरत को नन्दिग्राम की पर्णकुटी तक ले जाती है। बीच में राजकाज की व्यवस्था है, माताओं की सेवा है, गुरु से अनुमति है और सिंहासन पर प्रभु की पादुकाओं की स्थापना है। इसी क्रम से उनका तप आकार लेता है। शरीर दुबला होता जाता है, मन उदास नहीं होता; हर दिन प्रेम का प्रण और पुष्ट होता है। अयोध्याकाण्ड का समापन इसी भरतचरित्र को आदर और नियम से सुनने के आमन्त्रण पर होता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम जो सबको यथायोग्य सम्मान देकर विदा करते हैं और भरत के प्रेम का वर्णन सीता तथा लक्ष्मण से करते हैं।
  • भरत जो पादुकाओं को सिंहासन पर प्रतिष्ठित करके नन्दिग्राम में संयमपूर्वक रहते और उनकी आज्ञा से राजकाज सँभालते हैं।
  • शत्रुघ्न जो भरत के साथ लौटते हैं और सभी माताओं की सेवा का दायित्व पाते हैं।
  • सीता और लक्ष्मण जो परिवार को विदा करके राम के साथ चित्रकूट की पर्णकुटी में रहते हैं।
  • जनक और सुनयना जिनसे वन में विदा ली जाती है; जनक अयोध्या की व्यवस्था सँभालकर तिरहुत लौटते हैं।
  • वसिष्ठ और अरुन्धती गुरु और गुरुपत्नी, जिन्हें वन से विदा किया जाता है; वसिष्ठ अयोध्या में भरत की नियमपूर्ण रहनी को आशीर्वाद देते हैं।
  • निषादराज राम के सखा, जो दुःख के साथ विदा होते हैं और लौटते समाज के लिये गंगा पार सुप्रबन्ध करते हैं।

जिस विदाई को कहते हुए वाणी सकुचाये

कथा खुलते ही तुलसीदास हमें उस प्रेम की कठिनाई के सामने रखते हैं जिसे जनक और गुरु वसिष्ठ भी अपनी बुद्धि से पूरा नहीं पा सके। ऐसे दिव्य प्रेम को साधारण लौकिक प्रीति कहना उन्हें बड़ा दोष लगता है। उसी के बाद कवि अपने बारे में सोचते हैं: राम और भरत का वियोग सुनाते हुए लोग उन्हें कठोरहृदय समझेंगे। प्रेम की कथा कहना यहाँ अपने ऊपर उस कठोरता का आरोप लेने जैसा हो गया है। वाणी उस समय और उस स्नेह को याद करती है, और संकोच में पड़ जाती है।

इस संकोच के बीच राम भरत से भेंटकर उन्हें समझाते हैं। फिर हर्षित होकर शत्रुघ्न को हृदय से लगाते हैं। दोनों छोटे भाइयों को विदा देने का अपना समय मिलता है। भरत को समझाने के बाद शत्रुघ्न के लिये बाँहें खुलती हैं। प्रेम की इस भेंट के ठीक बाद सेवकों और मन्त्रियों का काम आरम्भ हो जाता है। भरत का रुख पाते ही वे अपने अपने दायित्वों में लग जाते हैं। जिस यात्रा का होना दुःख देता है, उसी की व्यवस्था उन्हें अब करनी है।

यह समाचार दोनों समाजों में पहुँचता है और दारुण दुःख छा जाता है। अयोध्या तथा जनक के समाज चलने की तैयारी करने लगते हैं। तुलसी तैयारियों के बीच किसी नये संवाद को नहीं फैलाते। वे उस अवस्था को सामने रखते हैं जिसमें काम हो रहा है और हृदय उसके होने से व्याकुल है। सेवक तैयारी कर सकते हैं, सवारियाँ सज सकती हैं, फिर भी विदाई का संकोच उस बाहरी व्यवस्था से छोटा नहीं होता। कवि की सकुचाती वाणी और लोगों के चलते हाथ एक ही समय की दो अवस्थाएँ हैं।

भरत और शत्रुघ्न प्रभु के चरणकमलों की वन्दना करते हैं। राम की आज्ञा सिर पर रखकर दोनों आगे बढ़ते हैं और मुनियों, तपस्वियों तथा वनदेवताओं का बार बार सम्मान करके विनती करते हैं। विदाई की इस परिधि में वन के अपने पूज्य भी सम्मिलित हैं। राजपरिवार के सम्बन्धों से आगे जाकर दोनों भाई उन सबके प्रति आदर प्रकट करते हैं जिनके बीच यह मिलन हुआ। बार बार का सम्मान उनके जाने को धीमा और विनम्र बनाता है।

लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि॥ ३१८॥

दोहा ३१८

फिर दोनों भाई लक्ष्मण से क्रमशः मिलते और प्रणाम करते हैं। सीता के चरणों की धूलि सिर पर रखते हैं तथा प्रेमभरे आशीर्वाद सुनते हैं। दोहे में तुलसी इन आशीर्वादों को समस्त शुभ मंगलों का मूल कहते हैं। विदा होते भाइयों के साथ आज्ञा भी है, चरणधूलि भी और आशीर्वाद भी। शरीर को दूर जाना है, किन्तु जाने से पहले सम्बन्ध आदर के इन छोटे और पूरे कर्मों में सँभाल लिये गये हैं। हमें इस दृश्य में दोनों भाइयों को साथ देखना चाहिये: विनती, भेंट और आशीर्वाद का यह क्रम भरत तथा शत्रुघ्न दोनों का है।

राम भरत को समझाकर शत्रुघ्न को हृदय से लगाते हैं। चलने की तैयारी के बीच दोनों भाई मुनियों, तपस्वियों और वनदेवताओं का सम्मान करते, लक्ष्मण से मिलते और सीता की चरणधूलि तथा आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ते हैं।

जनक की विनय, कैकेयी का संकोच

अब राम छोटे भाई लक्ष्मण के साथ राजा जनक को सिर नवाते हैं। बहुत प्रकार से उनकी विनय और बड़ाई करते हुए वे उनके वन आने में लगी दया को सामने रखते हैं। पोद्दार की टीका इस निवेदन को राम के वचन के रूप में खोलती है: हे देव, दयावश आपने बहुत दुःख उठाया और अपने समाज सहित वन में आये। अब आशीर्वाद देकर नगर पधारिये। इस विदाई में जनक के किये हुए कष्ट का स्वीकार है। राम उन्हें केवल लौटने को नहीं कहते, उस यात्रा की करुणा का आदर करके कहते हैं।

जनक धीरज धारण करते और गमन करते हैं। इसके बाद मुनियों, ब्राह्मणों और साधुओं की विदाई है। राम उन्हें विष्णु और शिव के समान जानकर सम्मान देते हैं। जिन्हें वे अभी सिर नवाकर प्रणाम कर चुके थे, उनसे अगली भेंट की ओर जाते हुए वही आदर बना रहता है। विदाई का क्रम पद और सम्बन्ध के अनुसार बदलता है, किन्तु हर भेंट में सम्मान पूरा है। कवि इसी पूर्णता को नामों और समूहों के माध्यम से हमारे सामने रख रहे हैं।

दोनों भाई सास के पास जाते हैं। टीका यहाँ सुनयना का नाम स्पष्ट करती है। उनके चरणों की वन्दना करते हैं, आशीर्वाद पाते हैं और लौट आते हैं। फिर विश्वामित्र, वामदेव और जाबालि की बारी आती है। शुभ आचरणवाले परिजन, नगरनिवासी और मन्त्री भी इसी क्रम में सम्मिलित हैं। राम लक्ष्मण सहित प्रत्येक को यथायोग्य विनय और प्रणाम से विदा करते हैं। एक ओर मुनियों के नाम अलग अलग सुनायी देते हैं, दूसरी ओर नागरिकों और परिवार का पूरा समाज दृश्य में बना रहता है।

छोटे, मझले और बड़े, स्त्रियाँ और पुरुष, सबका सम्मान करके कृपानिधान उन्हें लौटाते हैं। इस गिनती का अर्थ किसी को विदाई के बाहर न छोड़ना है। बड़े नामों के साथ साधारण जन भी हैं, और अलग आयु तथा स्थानवाले लोगों के लिये उचित आदर भी है। ऐसी व्यापक विदाई के बीच कवि अब एक माता पर अलग से ठहरते हैं। कैकेयी की भेंट को वे अगले दोहे का पूरा स्थान देते हैं।

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।
बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि॥ ३१९॥

दोहा ३१९

राम भरत की माता के चरणों की वन्दना करते हैं और निश्छल प्रेम से उनसे मिलते हैं। उनके सारे संकोच तथा सोच को मिटाकर पालकी सजाते और उन्हें विदा करते हैं। यहाँ कैकेयी की मनःस्थिति को कठोर शब्द से नहीं छुआ गया। राम का पवित्र स्नेह उनके संकोच के पास पहुँचता है और उसे दूर करता है। विदा होने के लिये पालकी की व्यवस्था साथ ही होती है, इसलिये आश्वासन और देखभाल एक ही दृश्य में जुड़े हैं। दोहे का अन्त उस माता को सँभालकर विदा करने पर है जिनके लिये कवि ने अलग से यह ठहराव चुना।

जनक, सुनयना, विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और सभी सम्बन्धियों तथा नागरिकों को यथायोग्य सम्मान मिलता है। कैकेयी से राम निश्छल प्रेमपूर्वक मिलते, उनका संकोच और सोच मिटाते तथा पालकी सजाकर विदा करते हैं।

माताओं की पालकियाँ और दो समाजों का प्रस्थान

सीता अपने नैहर के कुटुम्बियों और माता पिता से मिलकर लौटती हैं। उनके प्राणप्रिय पति के प्रति पवित्र प्रेम का स्मरण इसी भेंट के साथ आता है। फिर वे प्रणाम करके सभी सासुओं के गले मिलती हैं। तुलसीदास इस प्रेम का वर्णन करने में अपने हृदय का उत्साह घटता हुआ पाते हैं। आरम्भ में भाइयों के वियोग को कहते हुए वाणी सकुचायी थी; अब सीता और माताओं की भेंट पर कवि का हृदय भी उस पीड़ा को विस्तार देने के लिये उत्सुक नहीं होता।

सीता माताओं की शिक्षा सुनती हैं और मनचाहा आशीर्वाद पाती हैं। वे दोनों ओर की प्रीति में समायी रहती हैं। पोद्दार इस दोनों ओर को माता पिता और सासुओं के प्रेम के रूप में समझाते हैं, जिसमें सीता बहुत देर तक निमग्न हैं। विदाई उन्हें दोनों परिवारों से एक साथ जोड़ती है। शिक्षा और आशीर्वाद सुन लिये गये हैं, फिर भी उस स्नेह से मन का तुरन्त बाहर आ जाना नहीं होता। तुलसी उस रुके हुए प्रेम को स्थान देते हैं।

तब राम सुन्दर पालकियाँ मँगवाते हैं और सभी माताओं को आश्वासन देकर उन पर चढ़ाते हैं। दोनों भाई समान स्नेह से बार बार माताओं से मिलते जुलते और उन्हें पहुँचाते हैं। कैकेयी की पालकी के बाद यहाँ सब माताओं के लिये वही देखभाल फैली हुई है। कवि का समान स्नेह कह देना इस दृश्य को स्पष्ट करता है: विदाई के आचरण में किसी माता को कम प्रेम नहीं मिलता। उनके लिये लौटने की व्यवस्था है और उस व्यवस्था के भीतर बार बार मिलते पुत्र हैं।

घोड़े, हाथी और अनेक प्रकार की सवारियाँ सज जाती हैं। भरत और राजा जनक के दल प्रस्थान करते हैं। अब यात्रा वास्तव में चल पड़ी है। सब लोग सीता तथा लक्ष्मण सहित राम को हृदय में रखे बेसुध से जा रहे हैं। उनके साथ बैल, घोड़े और हाथी भी हैं। तुलसी इन पशुओं को हृदय से हारे हुए, मन मारे और परवश चलते दिखाते हैं। चलना उनके वश का नहीं, और चलने में उत्साह भी नहीं। इसीलिये सजी हुई सवारियों का दृश्य उल्लासपूर्ण यात्रा नहीं बनता।

गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत॥ ३२०॥

दोहा ३२०

सीता और लक्ष्मण सहित राम गुरु तथा गुरुपत्नी के चरणों की वन्दना करके पर्णकुटी की ओर लौटते हैं। टीका गुरु को वसिष्ठ और गुरुपत्नी को अरुन्धती के रूप में पहचानती है। दोहे में हर्ष के साथ बिसमय का शब्द आता है; पोद्दार की व्याख्या इस लौटने को हर्ष और विषाद के साथ रखती है। दोनों में लौटते हुए मन की मिली हुई अवस्था हमारे सामने रहती है। परिवार को विदा किया जा चुका है, प्रणाम पूरे हो गये हैं और राम, सीता तथा लक्ष्मण फिर पत्तों के अपने निवास पर आ गये हैं।

सीता दोनों परिवारों का प्रेम और आशीर्वाद सँभालती हैं। सभी माताएँ पालकियों में बैठती हैं और भरत तथा जनक के दल चल पड़ते हैं। राम, सीता और लक्ष्मण वसिष्ठ तथा अरुन्धती को प्रणाम करके पर्णकुटी लौटते हैं।

वट की छाया में रह गया वियोग

निषादराज को राम सम्मान देकर विदा करते हैं। वे चले तो जाते हैं, किन्तु हृदय में विरह का भारी विषाद लिये। इसके बाद कोल, किरात, भील और वन में रहनेवाले अन्य जनों को लौटाया जाता है। वे बार बार जोहार करते हुए लौटते हैं। दो राजसमाजों के जाने के बाद इन वनवासियों की विदाई भी पूरी होती है। जिनका घर इसी वनप्रदेश में है, उनके लिये भी राम के पास से लौटना स्नेह से भरा कर्म है। कवि जोहार की पुनरावृत्ति से उनके बार बार झुकने को हमारे सामने रखते हैं।

प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥
भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥

चौपाई १

अब तीनों वटवृक्ष की छाया में बैठते हैं। राम, सीता और लक्ष्मण प्रियजनों तथा परिवार के वियोग से दुखी हैं। तुलसी उन्हें बैठा हुआ दिखाते हैं, और उसी बैठे हुए समय में राम भरत के स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणी का बखान करने लगते हैं। सुननेवाले सीता और लक्ष्मण हैं। विदा हो चुके भरत अपनी वाणी और अपने स्वभाव के स्मरण से फिर उनके बीच उपस्थित होते हैं। राम का प्रेम उनके वर्णन में बोलता है।

भरत की प्रीति और प्रतीति, उनका प्रेम और विश्वास, राम अपने मुख से कहते हैं। यह प्रेम वचन में भी है, मन में भी और कर्म में भी। तीनों को साथ गिनने से भरत का पूरा आचरण सामने आता है। जो कहा गया, जो भीतर रखा गया और जो किया गया, राम उसी समग्रता की प्रशंसा कर रहे हैं। यह किसी सभा में दिया गया निर्णय नहीं, प्रिय पत्नी और छोटे भाई के पास बैठकर प्रेमवश किया गया बखान है। वट की छाया में भरत का स्नेह विदाई के बाद भी संवाद का विषय बना रहता है।

उसी समय चित्रकूट के पक्षी, पशु और जल की मछलियाँ उदास हैं। तुलसी पूरे चर अचर जगत् तक उस मलिनता को फैला देते हैं। लौटते दल के पशुओं का मन पहले ही मारा गया था; अब यहाँ रह गये जीवों का दुःख भी दिखता है। जानेवाले और पीछे रहनेवाले, दोनों ओर वियोग है। इस चित्र में जल के भीतर की मछलियों का अलग से आना उस उदासी को और व्यापक बनाता है। चित्रकूट का कोई एक कोना ही दुःखी नहीं रह गया।

राम की दशा देखकर देवता फूल बरसाते हैं और अपने अपने घर का दुखड़ा कहते हैं। राम उन्हें प्रणाम करके भरोसा देते हैं। आश्वासन पाकर वे प्रसन्न मन से चले जाते हैं और उनके भीतर थोड़ा सा भी भय नहीं बचता। प्रियजनों के वियोग के बीच भी राम दूसरों की चिन्ता सुनते और दूर करते हैं। कवि देवताओं के लौटने की मनःस्थिति स्पष्ट करके ही पर्णकुटी का अगला चित्र रखते हैं।

सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥ ३२१॥

दोहा ३२१

पर्णकुटी में सीता और छोटे भाई सहित राम सुशोभित हैं। तुलसी उन्हें देखकर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के शरीर धारण करने की उपमा देते हैं। अभी जिन तीन जनों को हमने वट की छाया में दुःखी बैठे देखा, उन्हीं का निवास इस आध्यात्मिक सुन्दरता से भर उठता है। प्रेम में आया वियोग और भक्ति की यह शोभा एक ही चित्रकूट में हैं। दोनों को साथ देखकर ही इस छोटी सी कुटी का पूरा दृश्य खुलता है।

निषादराज और वनवासियों की विदाई के बाद राम, सीता और लक्ष्मण वट की छाया में बैठते हैं। राम भरत के मन, वचन और कर्म के प्रेम तथा विश्वास का बखान करते हैं, देवताओं को आश्वासन देते हैं और तीनों पर्णकुटी में सुशोभित होते हैं।

चार दिन की यात्रा, फिर जनक के चार दिन

अब हम लौटते हुए समाज के साथ चलते हैं। मुनि, ब्राह्मण, गुरु वसिष्ठ, भरत और राजा जनक, सब राम के विरह में विह्वल हैं। मार्ग में सब चुपचाप जा रहे हैं, प्रभु के गुणसमूहों को मन में गिनते हुए। बाहर की चुप्पी के भीतर स्मरण चल रहा है। राम के पास रह गये सीता और लक्ष्मण उनका भरतप्रेम सुन रहे थे; इधर दूर जा रहे लोग राम के गुणों का मन में चिन्तन कर रहे हैं। दूरी के दोनों सिरों पर एक दूसरे का स्मरण बना हुआ है।

जमुना उतरि पार सबु भयऊ । सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥
उतरि देवसरि दूसर बासू । रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥

चौपाई २

पहले दिन सब यमुना पार करते हैं। वह दिन बिना भोजन के बीत जाता है। फिर गंगा पार करके दूसरा मुकाम होता है। पोद्दार की टीका उस स्थान को शृंगवेरपुर बताती है, जहाँ राम के सखा निषादराज सबके लिये अच्छा प्रबन्ध कर देते हैं। पहले दिन की निराहार यात्रा और दूसरे पड़ाव की व्यवस्था अलग अलग रखी गयी हैं। दुःख से भरे समाज की देखभाल करनेवाले वही निषादराज हैं जिन्हें वन से विदा होते हुए हमने भारी विरह लिये देखा था। उनका सखा से प्रेम अब उसके लौटते सम्बन्धियों की सुविधा में दिखाई देता है।

सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥
जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥

चौपाई ३

आगे सई पार होती है और गोमती में स्नान किया जाता है। चौथे दिन सब अयोध्या पहुँचते हैं। तुलसी इस यात्रा को नदियों और दिन के सहारे संक्षेप में रखते हैं। यमुना का पहला दिन, गंगा के उस पार का दूसरा पड़ाव, फिर सई और गोमती, और चौथे दिन राजधानी। यहाँ गोमती के स्नान को किसी नये अनुष्ठान की लम्बी कथा नहीं दी गयी; वह लौटने के इसी क्रम का अंग है। इतना कहना ही हमें समाज के मार्ग और समय दोनों का पता देता है।

अयोध्या पहुँचने के बाद जनक चार दिन नगर में रहते हैं। राजकाज और समस्त साज सामान सँभालते हैं। फिर मन्त्री, गुरु और भरत को राज्य सौंपकर तथा सब व्यवस्था ठीक करके तिरहुत की ओर चलते हैं। यात्रा के चौथे दिन अयोध्या पहुँचना और जनक का वहाँ चार दिन ठहरना दो अलग बातें हैं। चौपाई ने दोनों को पास रखा है, किन्तु उनका काम अलग है: पहली संख्या रास्ते की अवधि बताती है, दूसरी व्यवस्था सँभालने के लिये जनक के नगर में रहने का समय।

नगर के स्त्री पुरुष गुरु की शिक्षा मानकर राम की राजधानी में सुखपूर्वक रहने लगते हैं। उस व्यवस्थित जीवन के भीतर रामदर्शन की प्रतीक्षा बनी रहती है। अगले दोहे में सब लोग नियम और उपवास करते दिखाई देते हैं। भूषण, भोग और सुख छोड़े जा रहे हैं; जीवन का सहारा अवधि पूरी होने की आशा है। अयोध्या में राजकाज फिर सँभल गया है, पर राम की अनुपस्थिति ने लोगों के अपने रहन सहन को बदल दिया है।

राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस॥ ३२२॥

दोहा ३२२

गुरु की शिक्षा से मिलनेवाला सुख और दर्शन की आस में किया गया संयम यहाँ साथ हैं। प्रजा के रहने की व्यवस्था हो चुकी है, फिर भी प्रतीक्षा केवल मन का भाव नहीं रह जाती। वह गहनों और भोगों के त्याग में उतरती है। भरत की आगे आनेवाली कठोर रहनी से पहले तुलसी पूरे नगर का यह नियमपूर्ण जीवन दिखाते हैं। अवधि की आशा अयोध्या के अनेक घरों को एक ही प्रतीक्षा में बाँधती है।

समाज चौथे दिन अयोध्या पहुँचता है। जनक उसके बाद चार दिन रहकर व्यवस्था सँभालते और तिरहुत लौटते हैं। गुरु की शिक्षा में नगर का जीवन चलता है और लोग रामदर्शन की आशा से नियम, उपवास तथा भोगत्याग करते हैं।

सबका दायित्व सँभालकर सिंहासन पर पादुकाएँ

भरत मन्त्रियों और विश्वासी सेवकों को समझाकर उनके काम में लगाते हैं। प्रत्येक अपनी शिक्षा और अपना दायित्व पाकर उद्यत होता है। इसके बाद वे छोटे भाई शत्रुघ्न को बुलाते हैं और सभी माताओं की सेवा उन्हें सौंपते हैं। यहाँ सभी माताओं का ध्यान रखिये। परिवार की देखभाल किसी एक माता तक सीमित नहीं है। जिन माताओं को वन से समान स्नेह के साथ विदा किया गया था, अयोध्या में उनकी सेवा का दायित्व भी सामूहिक रूप से सँभाला जाता है।

फिर भरत ब्राह्मणों को बुलाते हैं। हाथ जोड़कर प्रणाम करते और अवस्था के अनुसार विनय तथा निहोरा करते हैं। उनकी प्रार्थना है कि कोई भी काम हो, छोटा या बड़ा, अच्छा या मन्दा, उसकी आज्ञा देने में संकोच न किया जाय। सेवा का यह प्रस्ताव काम की प्रतिष्ठा देखकर अपने लिये सीमा नहीं बाँधता। टीका ऊँचा और नीचा को छोटे और बड़े कार्य के रूप में समझाती है। भरत चाहते हैं कि जिन्हें उनसे कुछ कहना है, वे संकोच के कारण चुप न रह जायँ।

कुटुम्बियों, नगरवासियों और अन्य प्रजा को बुलाकर वे उनका समाधान करते तथा सुखपूर्वक बसाते हैं। इस क्रम में मन्त्रालय, माताएँ, ब्राह्मण, परिवार, नागरिक और प्रजा, सबकी ओर ध्यान जाता है। भरत की निजी रहनी का प्रश्न इसके बाद आता है। पहले उन्होंने दूसरों के काम और देखभाल की व्यवस्था की है। इसीलिये गुरु के सामने उनका निवेदन अपने चारों ओर के दायित्वों को अनदेखा करके नहीं उठता। अयोध्या की व्यवस्था उस निवेदन से पहले ही कथा का अंग बन चुकी है।

शत्रुघ्न सहित भरत गुरु के घर जाते हैं। दण्डवत् करते हैं और हाथ जोड़कर कहते हैं कि आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूँ। गुरु वसिष्ठ प्रेम से पुलकित हो उठते हैं। उनका उत्तर भरत के समझने, कहने और करने, तीनों को एक साथ आशीर्वाद देता है: भरत जो समझेंगे, जो कहेंगे और जो करेंगे, वही जगत् में धर्म का सार होगा। यह बड़ी स्वीकृति उनके पूरे आचरण के लिये है। भरत ने अनुमति माँगी थी; गुरु उस अनुमति के साथ उनके विवेक और कर्म को अपना विश्वास देते हैं।

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।
सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि॥ ३२३॥

दोहा ३२३

गुरु की शिक्षा और बड़ा आशीर्वाद पाकर भरत ज्योतिषियों को बुलाते हैं। उचित दिन साधा जाता है और प्रभु की चरणपादुकाएँ निर्विघ्न सिंहासन पर विराजित करायी जाती हैं। यहाँ पादुकाओं की स्थापना वास्तव में हो जाती है। विनय, अनुमति और शुभ समय के बाद राजसिंहासन का यह दृश्य आता है। आगे भरत जब राजकाज करेंगे, उसका सम्बन्ध इसी प्रतिष्ठा से रहेगा। पादुकाएँ राज्य के बीच विराजमान हैं और उनके प्रति भरत की सेवा दैनिक आचरण का रूप लेनेवाली है।

भरत मन्त्रियों, सेवकों, माताओं और प्रजा की व्यवस्था सँभालते हैं। गुरु से नियमपूर्ण जीवन की आज्ञा तथा आशीर्वाद पाकर वे ज्योतिषियों से उचित दिन निर्धारित कराते और राम की पादुकाओं को सिंहासन पर प्रतिष्ठित करते हैं।

नन्दिग्राम की पर्णकुटी और भोगों से विरक्ति

पादुकाओं की स्थापना के बाद भरत राम की माता और गुरु के चरणों में सिर नवाते हैं। पोद्दार राम की माता को कौसल्या के रूप में स्पष्ट करते हैं। फिर प्रभु की चरणपादुकाओं की आज्ञा पाकर नन्दिग्राम में पर्णकुटी बनाते और उसी में निवास करते हैं। राज्य की व्यवस्था सँभालनेवाले भरत का अपना निवास इस तरह बनता है। गुरु का आशीर्वाद, माता को प्रणाम और पादुकाओं की आज्ञा, उनके निर्णय के चारों ओर सम्बन्ध और मर्यादा की यही उपस्थिति है।

राम मातु गुर पद सिरु नाई । प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥
नंदिगावँ करि परन कुटीरा । कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥

चौपाई ४

तुलसी उन्हें धर्म की धुरी धारण करने में धीर कहते हैं। आगे उस धैर्य का रूप भोजन, वस्त्र और विश्राम तक पहुँचता है। सिर पर जटाजूट है और तन पर मुनियों के वस्त्र, जिन्हें टीका वल्कल बताती है। वे पृथ्वी खोदते हैं और उसके भीतर कुश की आसनी बिछाते हैं। यह साधना के निवास का ठोस दृश्य है: पत्तों की कुटी और खोदी हुई भूमि में कुश का बिछावन। शरीर की सुविधा अब उसी अनुशासन के भीतर रखी जाती है जिसे अपनाने की आज्ञा भरत ने माँगी थी।

जटाजूट सिर मुनिपट धारी । महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥
असन बसन बासन ब्रत नेमा । करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥

चौपाई ५

भोजन, वस्त्र, बरतन, व्रत और नियम, सभी में ऋषियों के कठिन धर्म का आचरण होता है। कवि इन वस्तुओं को अलग अलग गिनकर बताते हैं कि तप दिनचर्या के कितने हिस्सों में उतर गया है। साथ ही प्रेमसहित कहना नहीं भूलते। इस कठिन रहनी की प्रेरणा भरत का रामप्रेम है। आभूषण, अच्छे कपड़े और अनेक प्रकार के भोगसुख वे मन, तन और वचन से छोड़ देते हैं। तृण तोड़कर त्याग करने को पोद्दार प्रतिज्ञा करना बताते हैं; त्याग एक स्थिर प्रण के रूप में धारण किया गया है।

इस त्याग के सामने तुलसी अयोध्या का वैभव रखते हैं। उसके राज्य को देवराज इन्द्र भी चाहते थे, और दशरथ की सम्पत्ति सुनकर कुबेर लजा जाते थे। इतने ऐश्वर्य के बीच भरत की अनासक्ति चम्पा के बाग में भौंरे की उपमा से दिखाई जाती है। राज्य उनके दायित्व में है, उसके भोगों में अनुराग नहीं। आगे राम के प्रेमी बड़भागी जनों के लिये लक्ष्मी के विलास को वमन की तरह त्याज्य कहा जाता है। टीका बताती है कि छोड़ देने के बाद वे उसकी ओर फिर ताकते भी नहीं।

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति॥ ३२४॥

दोहा ३२४

और अब कवि अपनी ही प्रशंसा को और गहरा करते हैं। भरत रामप्रेम के पात्र हैं, उनका बड़प्पन इस भोगत्याग से उत्पन्न नहीं हुआ। यह आचरण उनके पहले से विद्यमान प्रेम के अनुकूल है। चातक की टेक और हंस की विवेकशक्ति की सराहना भी होती है। पोद्दार चातक की टेक को पृथ्वी का जल न पीने और हंस के विवेक को नीर तथा क्षीर का भेद करने की शक्ति से समझाते हैं। भरत की ओर लौटकर देखें तो त्याग की कठिनता के पीछे उनके प्रेम की स्वाभाविक दृढ़ता दिखाई देती है।

नन्दिग्राम में भरत पर्णकुटी, जटा, वल्कल और भूमि में कुश के बिछावन के साथ ऋषियों का कठिन धर्म अपनाते हैं। भोगों का तीनों प्रकार से त्याग उनके रामप्रेम की सहज दृढ़ता को प्रकट करता है।

घटता शरीर, प्रसन्न मन और हृदय का आकाश

कठोर रहनी का शरीर पर प्रभाव पड़ता है। भरत दिन पर दिन दुबले होते जाते हैं। किन्तु इस स्थिति को पढ़ते हुए चौपाई के अलग अलग अंशों को ध्यान से सुनना आवश्यक है। पोद्दार की टीका तेज का अर्थ यहाँ अन्न और घृत आदि से उत्पन्न मेद करती है। वही घट रहा है। बल तथा मुख की कान्ति वैसी ही बनी हुई है। शरीर का दुबलापन, घटता मेद और बची हुई शक्ति तथा मुखछबि, इस व्याख्या में सभी का अपना स्पष्ट स्थान है।

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई । घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥
नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥

चौपाई ६

टीका की टिप्पणी इसका कारण भी देती है। संस्कृत कोश में तेज का मेद अर्थ मिलता है। उसे लेने पर घटने की क्रिया का अर्थ खींचना नहीं पड़ता। इसलिये यहाँ तेज को सामान्य अर्थ में चमक मानकर यह कह देना कि भरत की कान्ति भी घट रही थी, पोद्दार के समझाये हुए चित्र को बदल देगा। उनके अनुसार बल और मुख की शोभा उसी तरह हैं। हम दुबले होते शरीर को देख रहे हैं, और साथ ही उस शरीर में बनी हुई शक्ति तथा उज्ज्वलता को भी।

अगली पंक्ति भीतर की दशा बताती है। रामप्रेम का प्रण प्रतिदिन नया और पुष्ट होता है। धर्म का दल बढ़ता है और मन मलिन नहीं होता। पोद्दार इसे प्रसन्न मन के रूप में खोलते हैं। कठिन आचरण का वर्णन यहाँ उदासी पर नहीं रुकता। जिसके शरीर का मेद घट रहा है, उसी के प्रेम की पुष्टि बढ़ रही है। इस साथ साथ घटने और बढ़ने को तुलसी अगले दृश्य में शरद् ऋतु के जल, बेंत और कमल से समझाते हैं।

शरद् के विकास से जल घटता है, फिर भी बेंत शोभा पाते हैं और कमल खिलते हैं। जल का घटना पूरे दृश्य के मुरझा जाने का नाम नहीं है। इसी उपमा के बाद भरत का हृदय निर्मल आकाश बन जाता है। शम, दम, संयम, नियम और उपवास उस आकाश के तारागण हैं। अभी भोजन, वस्त्र और बरतन में जो अनुशासन देखा था, अब वही हृदय की सुन्दर व्यवस्था में दिखाई देता है। तप के साधन आकाश में अपनी अपनी प्रकाशित जगह पाते हैं।

ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी । स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥
राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥

चौपाई ७

विश्वास उस आकाश का ध्रुवतारा है। चौदह वर्ष की अवधि का ध्यान पूर्णिमा के समान है, और स्वामी राम की स्मृति प्रकाशित आकाशगंगा के रूप में फैली है। रामप्रेम वहाँ अचल और कलङ्करहित चन्द्रमा है, जो नक्षत्रों के अपने समाज सहित नित्य निर्मल शोभा पाता है। अवधि, विश्वास और स्मृति, तीनों अलग हैं और प्रेम के इस आकाश में साथ हैं। चौदह वर्ष की प्रतीक्षा को कवि केवल गिनती में नहीं रखते; वह भरत के ध्यान में बनी पूर्णिमा का रूप पाती है।

इसके बाद भरत की रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्य गिनाये जाते हैं। इनका वर्णन करते हुए सभी सुकवि सकुचाते हैं। शेष, गणेश और सरस्वती की भी वहाँ पहुँच नहीं बतायी गयी। आरम्भ में वियोग कहती वाणी सकुचायी थी, यहाँ भरत की साधना के सामने वही सीमा फिर आती है। इतने ठोस कर्म और इतने सुन्दर रूपक सामने रखकर भी कवि मानते हैं कि उस आचरण का पूरा विस्तार शब्दों में नहीं समा रहा।

पोद्दार के अनुसार भरत का मेद घटता है, बल और मुखछबि बनी रहती है तथा मन प्रसन्न है। उनका प्रेमप्रण पुष्ट होता है और हृदय के निर्मल आकाश में संयम के तारे, विश्वास का ध्रुव तथा स्मृति की आकाशगंगा सुशोभित हैं।

नित्य पूजा, और हर राजकार्य से पहले आज्ञा

इतनी ऊँची प्रशंसा के बाद तुलसी फिर भरत के दिन में लौट आते हैं। वे प्रतिदिन प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं। हृदय में प्रेम समाता नहीं है। यही प्रेम पूजा में भी उपस्थित है और राज्य के कामों में भी। सिंहासन पर प्रतिष्ठित पादुकाओं का सम्मान एक बार सम्पन्न हुई क्रिया बनकर समाप्त नहीं हुआ। वह प्रतिदिन निभायी जानेवाली सेवा में बदल गया है। नन्दिग्राम के नियम और अयोध्या के दायित्व इसी नित्य सम्बन्ध में जुड़े रहते हैं।

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति॥ ३२५॥

दोहा ३२५

राजकाज अनेक प्रकार का है और भरत उसे पादुकाओं से आज्ञा माँग माँगकर करते हैं। दोहे में माँगने की पुनरावृत्ति उस निरन्तरता को बताती है। राज्य उन्हें सौंपा जा चुका है, मन्त्रियों तथा सेवकों को काम मिल चुके हैं, फिर भी उनकी अपनी भूमिका प्रभु की अनुमति के अधीन बनी रहती है। हर प्रकार का राजकार्य इस सम्बन्ध में रखा जाता है। कवि किसी एक विशेष प्रशासनिक निर्णय का उदाहरण नहीं देते; वे भरत के समूचे काम करने की यह रीति सामने रखते हैं।

उनका शरीर पुलकित है। हृदय में सीता और रघुवीर हैं, जीभ रामनाम का जप कर रही है और आँखों में प्रेम का जल भरा है। तन, हृदय, वाणी और नेत्र, सब अपने अपने ढंग से उसी अनुराग को धारण करते हैं। थोड़ा पहले मन, तन और वचन से भोगों का त्याग बताया गया था। अब देह और इन्द्रियों की यह प्रेमपूर्ण दशा सामने आती है। तप में केवल वर्जनाओं की सूची नहीं है; स्मरण, जप और प्रेम के आँसू भी उसके दैनिक रूप हैं।

लक्ष्मण, राम और सीता वन में बसते हैं, और भरत घर में रहकर तप द्वारा शरीर को कसते हैं। तुलसी इस तुलना में भरत की रहनी की कठिनता रखते हैं। नन्दिग्राम की उनकी पर्णकुटी का निवास पहले स्पष्ट हो चुका है; यहाँ घर कहकर लौटे हुए भरत और वन में रह रहे तीनों की अवस्थाएँ आमने सामने आती हैं। अपने लोगों तथा राज्य के दायित्व के बीच ऐसा तप निभाना ही इस तुलना का ध्यान है। भरत की पूजा और राजकाज दोनों अभी साथ कहे गये हैं।

लोग दोनों ओर की स्थिति समझते हैं और भरत को हर प्रकार से सराहने योग्य कहते हैं। उनके व्रत तथा नियम सुनकर साधु संत भी सकुचाते हैं, उनकी दशा देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं। सुनना और देखना, दोनों का असर कवि ने अलग रखा है। नियमों का वृत्तान्त ही अनुभवी साधकों को संकोच में डाल देता है; उनका प्रत्यक्ष आचरण देखना उस प्रभाव को और पूरा करता है। पर्णकुटी में निवास करनेवाले भरत का कठिन धर्म इसी तरह उन लोगों के लिये भी आदरणीय होता है जो स्वयं तप का जीवन जानते हैं।

भरत नित्य पादुकाओं की पूजा करते और उनकी आज्ञा माँगकर सभी राजकार्य सँभालते हैं। जप, स्मरण, प्रेमाश्रु तथा कठोर नियमों से भरी उनकी रहनी सुनकर और देखकर साधु तथा मुनि भी सकुचाते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

अयोध्याकाण्ड की अन्तिम प्रशंसा भरत के आचरण पर केन्द्रित है। तुलसी उसे परम पवित्र, मधुर और सुन्दर कहते हैं। उससे आनन्द और मंगल उपजते हैं, कलियुग के कठिन पाप तथा क्लेश दूर होते हैं। यह अब केवल भरत के अपने जीवन का वर्णन नहीं रहा। कवि उनके चरित्र की ऐसी शक्ति कह रहे हैं जिसका लाभ सुननेवाले तक पहुँचता है। कथा की पूरी हुई घटनाएँ अगले शब्दों में श्रवण का विषय और सहारा बनती हैं।

परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू । महामोह निसि दलन दिनेसू॥

चौपाई ८

महामोह की रात्रि को नष्ट करने के लिये भरत का आचरण सूर्य है। पापों का समूह यदि हाथी है तो उसके लिये यही चरित्र सिंह है। सारे सन्तापों को शान्त करनेवाला, भक्तों को आनन्द देनेवाला और संसार के दुःखभार का भञ्जन करनेवाला भी वही है। अन्त में रामप्रेम के चन्द्रमा का अमृत आता है। सूर्य अन्धकार दूर करता है, सिंह पाप के बल को परास्त करता है और अमृत प्रेम का पोषण करता है। इन उपमाओं में कवि चरित्र के अलग अलग फल कहते हैं, इसलिये प्रत्येक छवि की अपनी आवश्यकता है।

फिर छन्द एक प्रश्न उठाता है। यदि सीता और राम के प्रेमामृत से परिपूर्ण भरत का जन्म न हुआ होता तो ऐसा आचरण कौन करता? यम, नियम, शम और दम के कठिन व्रत मुनियों के मन की पहुँच से भी परे कहे गये हैं। यहाँ वही भरत स्मरण आते हैं जो हर वस्तु और हर दिन में ऋषिधर्म का आचरण कर रहे थे। उनके चरित्र की प्रशंसा पहले देखे गये कर्मों पर टिकती है। कठोर साधना की बात अब अपने उदाहरण सहित सामने है।

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।
मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को।
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥

छन्द, भरतचरित्र की समापन स्तुति

छन्द का अगला प्रश्न दुःख, सन्ताप, दरिद्रता, दम्भ और दोषों को हरने के बारे में है। भरत अपने सुयश के बहाने यह सब कौन हरता, कवि पूछते हैं। यश का फैलना यहाँ केवल किसी महान व्यक्ति की प्रतिष्ठा बढ़ना नहीं है; उसका चरित्र दूसरों के लिये सहारा बनता है। और अन्तिम पंक्ति में तुलसी स्वयं आ जाते हैं। इस कलिकाल में उनके जैसे शठों को हठपूर्वक राम के सम्मुख कौन करता? कवि अपनी प्रशंसा के बाहर खड़े नहीं रहते। वे अपने को भी उस चरित्र की आवश्यकता रखनेवालों में रखते हैं।

अब वही आमन्त्रण हमारे लिये है। सुनने का ढंग भी कहा गया है: नियम से और आदरपूर्वक। भरत के चरित्र को ऐसी निरन्तरता से सुनने का फल तुलसी सीता तथा राम के चरणों में प्रेम और सांसारिक विषयों के रस से वैराग्य बताते हैं। इसे कवि का भक्तिपूर्ण आश्वासन सुनिये। जिस प्रेम और विरक्ति को नन्दिग्राम में आकार लेते देखा, वही इस चरित्र के श्रवण का फल बनकर अन्तिम सोरठे में आता है।

भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।
सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥ ३२६॥

सोरठा ३२६

तुलसी भरतचरित्र को पाप, मोह और सन्ताप हरनेवाला तथा रामप्रेम को पुष्ट करनेवाला कहते हैं। अन्तिम सोरठा नियमपूर्वक आदर से इसे सुनने पर सीताराम के चरणों में प्रेम और संसार के विषयों से वैराग्य का आश्वासन देता है।

हम इस अन्त तक पहुँचते हुए विदाई की अनेक छोटी क्रियाएँ साथ लाये हैं: चरणों को प्रणाम, सीता की धूलि सिर पर रखना, माताओं की पालकियाँ, प्रजा का समाधान और गुरु से अनुमति। भरत की साधना इन्हीं सम्बन्धों से होकर आती है। उन्होंने जिन्हें सँभालना था, उनकी व्यवस्था की; फिर अपने दिन को नियम में रखा। पादुकाओं की नित्य पूजा और उनसे आज्ञा माँगकर किया गया राजकार्य उस प्रेम को बराबर कर्म में उतारते हैं।

अन्त में नन्दिग्राम का निर्मल हृदयाकाश रह जाता है। उसमें विश्वास स्थिर है, राम की स्मृति प्रकाशित है और चौदह वर्ष की अवधि ध्यान में बनी है। शरीर दुबला होता जाता है, किन्तु प्रेम का प्रण पुष्ट होता और मन प्रसन्न रहता है। इसी भरत को आदर से सुनते रहने का निवेदन करके तुलसी अयोध्याकाण्ड पूरा करते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ३१८ से ३२६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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