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भरत का कैकेयी को उत्तर और कौसल्या से भेंट

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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 19

कैकेयी का राज्य करने का आग्रह, भरत का असह्य आत्मदोष और मन्थरा को छुड़ाने का क्षण। कौसल्या की वह गवाही कि भरत राम को प्राणों से बढ़कर प्यारे हैं।

कैकेयी पुत्र को व्याकुल देखकर समझाती हैं, मानो जले पर नमक लगा रही हों। भरत उन्हें पापिनी कहकर उत्तर देते हैं कि आपने हर प्रकार से कुल का नाश कर दिया। आगे वे हाथ जोड़कर कौसल्या के सामने शपथ लेते हैं कि यदि इसमें उनका मत हो, तो जो पाप वे गिनाते हैं, वे उन्हें लगें।

इस प्रसंग में शत्रुघ्न कैकेयी की कुटिलता सुनकर क्रोध से जलते हैं, और मन्थरा वस्त्र और गहनों से सजकर वहाँ आती है। वे उसके कूबड़ पर लात मारते हैं, वह चिल्लाती हुई गिरती है, और वे उसे बाल पकड़कर घसीटते हैं। भरत उसे छुड़ा देते हैं। दोनों भाई कौसल्या के पास जाते हैं, जो भरत को देखते ही उठकर दौड़ती हैं और मूर्च्छित होकर गिर पड़ती हैं। भरत उनके चरणों में गिरकर पूछते हैं कि पिता कहाँ हैं, और सीता, राम और लक्ष्मण कहाँ हैं। वे अपने को कुल का कलंक और इस सब अनर्थ का कारण कहते हैं। कौसल्या उन्हें उठाकर छाती से लगाती हैं। फिर गोद में बैठाकर वे उनके आँसू पोंछती हैं, और धीरज रखने और किसी को दोष न देने को कहती हैं। वे बताती हैं कि राम ने वल्कल पहने, सीता और लक्ष्मण उनके साथ गये, और वे स्वयं न साथ गयीं, न अपने प्राण उनके साथ भेजे। भरत सहित रनिवास विलाप करता है। भरत सब माताओं को समझाते हैं। उनकी शपथ सुनकर माता कहती हैं कि राम भरत के प्राणों से बढ़कर प्राण हैं, और भरत राम को प्राणों से बढ़कर प्यारे हैं। रात विलाप में बीतती है। वामदेव और वसिष्ठ आते हैं, और गुरु के वचन सुनकर भरत उठते हैं और सब तैयारी करने को कहते हैं।

दो माताओं के बीच भरत

  • भरत पिता और राम के वियोग में व्याकुल पुत्र। वे कैकेयी को उत्तर देते हैं। कौसल्या के सामने वे शपथ खाते हैं कि यदि इसमें उनका मत हो, तो जो पाप वे गिनाते हैं, वे उन्हें लगें।
  • कैकेयी भरत की माता, जो उन्हें शोक छोड़कर राज्य करने को कहती हैं।
  • शत्रुघ्न भरत के भाई, जो कैकेयी की कुटिलता सुनकर क्रोध से जलते हैं और मन्थरा के कूबड़ पर लात मारते हैं।
  • मन्थरा वस्त्र और आभूषणों से सजकर आनेवाली स्त्री, जिसे शत्रुघ्न के हाथों से भरत छुड़ाते हैं।
  • कौसल्या राम की माता, जो दोनों भाइयों को अपनाती हैं और कहती हैं कि भरत राम के प्रतिकूल न होंगे।
  • वामदेव और वसिष्ठ रात बीतने पर आनेवाले ऋषि। वसिष्ठ भरत को धीरज धरकर समय का आवश्यक कार्य करने को कहते हैं।

कैकेयी की सांत्वना और भरत का उत्तर

कैकेयी भरत को व्याकुल देखकर समझाती हैं, मानो जले पर नमक लगा रही हों।

कैकेयी कहती हैं: बेटा, राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका भोग किया। जीते जी जन्म के सारे फल पाये और अन्त में इन्द्र के घर चले गये। ऐसा विचारकर सोच छोड़ दीजिये और समाज सहित नगर का राज्य कीजिये।

यह सुनकर भरत बहुत सहम जाते हैं, मानो पके घाव पर अँगारा छू गया हो। वे धीरज धरकर लम्बी साँस लेते हैं और माँ को पापिनी कहकर उत्तर देते हैं कि आपने हर प्रकार से कुल का नाश कर दिया।

वे पूछते हैं कि यदि आपकी इच्छा इतनी बुरी थी, तो जन्म लेते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला?

फिर वे दो चित्र रखते हैं: पेड़ काटकर पत्ते को सींचा गया है, और मछली को जिलाने के लिये उसका पानी उलीच दिया गया है। पोद्दार की टीका दोनों का अर्थ बताती है: भरत का हित करने चलीं और उलटा उनका अहित कर डाला।

भरत कहते हैं: सूर्यवंश, दशरथ पिता, राम और लक्ष्मण जैसे भाई। माता, जन्म देनेवाली माता आप हुईं! विधाता के आगे कुछ वश नहीं चलता।

भरत के आरोप, और राम से विरोध रखनेवाला हृदय

भरत कहते हैं कि जब आपने भीतर बुरा निश्चय ठाना, तब आपके हृदय के टुकड़े टुकड़े न हुए। वर माँगते समय मन में पीड़ा न हुई। जीभ न गली, मुँह में कीड़े न पड़े।

फिर वे पूछते हैं कि राजा ने उनका भरोसा कैसे कर लिया। विधाता ने मरने के समय उनकी बुद्धि हर ली।

स्त्री के हृदय की गति विधाता भी नहीं जान सके, वह सारे कपट, पाप और अवगुणों की खान है। राजा सीधे, सुशील और धर्म में लगे हुए थे, वे स्त्री का स्वभाव कैसे जानते? यह क्रुद्ध पुत्र का अपना आरोप है।

फिर वे राम का नाम लेते हैं: जगत् में ऐसा कौन जीव जन्तु है जिसे राम प्राणों के समान प्यारे न हों? वही राम आपको वैरी लगे! भरत पूछ उठते हैं: आप कौन हैं, सच कहिये।

फिर वे कहते हैं कि आप जो हैं सो हैं। मुँह पर स्याही लगाकर उठिये और मेरी आँखों की ओट में जा बैठिये। माता की ओर से कोई उत्तर नहीं आता।

पोद्दार भरत की अगली बात के दो अर्थ देते हैं। एक अर्थ में भरत कहते हैं कि विधाता ने उन्हें राम का विरोध करनेवाले हृदय से जन्म दिया। दूसरे अर्थ में, कि विधाता ने उन्हें हृदय से राम का विरोधी प्रकट कर दिया। फिर वे कहते हैं: मेरे बराबर पापी कौन है? मैं व्यर्थ आपको कुछ कह रहा हूँ।

मन्थरा आती है, भरत उसे छुड़ाते हैं

शत्रुघ्न भी कैकेयी की कुटिलता सुन रहे हैं। उनके अंग क्रोध से जल रहे हैं, और कुछ वश नहीं चलता। उसी समय मन्थरा भाँति भाँति के कपड़ों और गहनों से सजकर वहाँ आती है।

उसे सजी देखकर शत्रुघ्न क्रोध से भर जाते हैं। जलती आग को घी की आहुति मिल गयी, टीका इसे उपमा के रूप में पढ़ती है। वे उछलकर, तककर उसके कूबड़ पर लात मारते हैं। मन्थरा चिल्लाती हुई मुँह के बल धरती पर गिरती है। उसका कूबड़ टूट जाता है, कपाल फूट जाता है, दाँत टूट जाते हैं और मुँह से खून बहने लगता है।

वह कहती है: आह दैव, मैंने क्या बिगाड़ा? भला करते हुए बुरा फल पाया।

यह सुनकर, और उसे नख से शिख तक दुष्ट जानकर, शत्रुघ्न उसके बाल पकड़ पकड़कर उसे घसीटने लगते हैं। दया के भण्डार भरत उसे छुड़ा देते हैं, और दोनों भाई कौसल्या के पास जाते हैं।

मन्थरा के लिये कोई और दण्ड यहाँ नहीं कहा गया।

कौसल्या मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरे का रंग उड़ गया है, वे व्याकुल हैं, और दुःख के भार से शरीर दुबला हो गया है।

यह मानो सोने की श्रेष्ठ कल्पलता है, जिसे वन में पाला मार गया हो।

कौसल्या के चरणों में, और उनकी गोद में

भरत को देखते ही कौसल्या उठकर दौड़ती हैं और मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़ती हैं, उन्हें चक्कर आ जाता है। यह देखकर भरत बहुत व्याकुल हो जाते हैं और शरीर की सुध भूलकर उनके चरणों में गिर पड़ते हैं।

वे कहते हैं: माता, पिताजी कहाँ हैं? उन्हें दिखा दीजिये। सीता कहाँ हैं, और दोनों भाई राम और लक्ष्मण कहाँ हैं?

वे पूछते हैं कि कैकेयी जगत् में क्यों जन्मीं, और जन्मीं तो बाँझ क्यों न रहीं, जिन्होंने मुझे जन्म दिया? भरत अपने को कुल का कलंक, अपयश का पात्र और प्रियजनों का द्रोही कहते हैं। वे पूछते हैं कि तीनों लोकों में मुझ जैसा अभागा कौन है, जिसके कारण आपकी ऐसी दशा हुई, माता।

पिताजी स्वर्ग में हैं और राम वन में। केवल मैं, केतु, इन सब अनर्थों का कारण हूँ। मुझे धिक्कार है। मैं बाँस के वन में उठी आग बनकर जन्मा, और दुःसह दाह, दुःख और दोषों का भागी बना। टीका इसे केतु के समान पढ़ती है।

भरत के कोमल वचन सुनकर कौसल्या फिर सँभलकर उठती हैं। वे भरत को उठाकर छाती से लगा लेती हैं, और उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं। सरल स्वभाव की माता बड़े प्रेम से उन्हें हृदय से लगाती हैं, मानो राम लौट आये हों।

फिर वे शत्रुघ्न को भी हृदय से लगाती हैं। शोक और स्नेह हृदय में समाते नहीं। उनका स्वभाव देखकर सब कहते हैं कि राम की माता का ऐसा स्वभाव क्यों न हो। फिर कौसल्या भरत को अपनी गोद में बैठाती हैं, उनके आँसू पोंछती हैं और कोमल वचन कहती हैं।

अब भी, बेटा, मैं बलैया लेती हूँ, धीरज रखिये। बुरा समय जानकर शोक छोड़ दीजिये, और काल और कर्म की गति अमिट जानकर हृदय में हानि और ग्लानि न मानिये। किसी को दोष मत दीजिये, बेटा। विधाता मेरे लिये सब प्रकार से उलटा हो गया है, जो इतने दुःख पर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जाने उसे क्या भा रहा है।

माता की स्मृति में वन को जाते हुए राम

कौसल्या भरत को बताती हैं कि पिता की आज्ञा पाकर राम ने आभूषण और वस्त्र उतार दिये और वल्कल पहन लिये। उनके हृदय में न विषाद था, न हर्ष।

उनका मुख प्रसन्न था। मन में न आसक्ति थी, न रोष। सबको हर तरह से सन्तोष देकर वे वन को चले।

यह सुनकर सीता उनके साथ लग गयीं। राम के चरणों की अनुरागिणी वे न रुकीं। सुनते ही लक्ष्मण उठकर साथ चले। वे न रुके, राम के यत्न करने पर भी। तब राम सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई के साथ चले गये।

कौसल्या कहती हैं: राम, लक्ष्मण और सीता वन चले गये। मैं न साथ गयी, न अपने प्राण उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखों के सामने हुआ, फिर भी अभागे जीव ने शरीर नहीं छोड़ा।

मुझे लाज नहीं आती, अपने स्नेह को देखकर। राम जैसे पुत्र की मैं माता! राजा ने जीना और मरना भली भाँति जाना। मेरा हृदय सौ वज्रों के समान है।

कौसल्या के ये वचन सुनकर भरत सहित रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगता है। राजमहल मानो शोक का निवास है।

भरत और शत्रुघ्न दोनों व्याकुल होकर रोते हैं। कौसल्या फिर उन्हें हृदय से लगाती हैं, और भरत को बहुत प्रकार से समझाकर विवेक भरी बातें सुनाती हैं।

भरत की शपथ: यदि इसमें मेरा मत हो

भरत भी सब माताओं को पुराण और वेदों की सुन्दर कथाएँ कहकर समझाते हैं। फिर वे छल से रहित, पवित्र, सरल और सुन्दर वाणी में दोनों हाथ जोड़कर बोलते हैं।

माता, पिता और पुत्र को मारने के पाप, गोशाला और ब्राह्मणों के नगर जलाने के पाप। स्त्री और बालक की हत्या के पाप, और मित्र और राजा को विष देने के पाप।

कर्म, वचन और मन से होनेवाले जितने बड़े और छोटे पाप कवि बताते हैं, वे पाप मुझे लगें, हे विधाता, यदि इसमें मेरा मत हो, माता।

जो लोग हरि और हर के चरण छोड़कर भयानक भूतगणों को भजते हैं, विधाता मुझे उनकी गति दे, यदि, माता, इसमें मेरा मत हो।

यदि इस भेद को जानता होऊँ

फिर शपथ में वे लोग आते हैं जो वेद बेचते हैं और धर्म को दुह लेते हैं, जो चुगलखोर हैं और दूसरों के पाप कह देते हैं।

जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, जो वेदों की निन्दा करते हैं और विश्व से विरोध रखते हैं। जो लोभी, लम्पट और लालची आचरणवाले हैं, और पराये धन और परायी स्त्री की ताक में रहते हैं। मैं उनकी भयानक गति पाऊँ, यदि, माता, इसमें मेरी सम्मति हो।

जिनका सत्संग में प्रेम नहीं, जो अभागे परमार्थ के मार्ग से विमुख हैं। जो मनुष्य शरीर पाकर हरि का भजन नहीं करते, और जिन्हें हरि और हर का सुयश नहीं सुहाता। टीका यहाँ हरि और हर को विष्णु और शिव पढ़ती है।

और जो वेद का मार्ग छोड़कर वाम मार्ग पर चलते हैं, जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत् को छलते हैं। शिव मुझे उन लोगों की गति दें, माता, यदि मैं इस भेद को जानता होऊँ।

माता का विश्वास और रात के बाद का कार्य

कौसल्या भरत के स्वभाव से सच्चे और सरल वचन सुनती हैं। वे कहती हैं: आप, बेटा, सदा वचन, मन और शरीर से राम के प्यारे हैं।

राम आपके प्राणों से बढ़कर प्राण हैं, और आप राम को प्राणों से बढ़कर प्यारे हैं।

फिर वे कहती हैं: चन्द्रमा विष चुआये, पाला आग बरसाये, जलचर जल से विरक्त हो जाये।

ज्ञान होने पर भले ही मोह न मिटे। आप राम के प्रतिकूल न होंगे। जगत् में जो लोग कहते हैं कि इसमें आपका मत है, वे स्वप्न में भी सुख और शुभ गति नहीं पायेंगे।

ऐसा कहकर वे भरत को फिर हृदय से लगा लेती हैं। उनके स्तनों से दूध बहने लगता है और आँखों में आँसू छा जाते हैं। इसी प्रकार बहुत विलाप करते हुए बैठे बैठे सारी रात बीत जाती है।

तब वामदेव और वसिष्ठ आते हैं, और सब मन्त्रियों और महाजनों को बुलाते हैं। वसिष्ठ परमार्थ के समय के अनुकूल वचन कहकर भरत को बहुत प्रकार से उपदेश देते हैं।

गुरु कहते हैं: बेटा, हृदय में धीरज धरिये, और आज जिस काम का अवसर है, उसे कीजिये। गुरु के वचन सुनकर भरत उठते हैं और सब तैयारी करने को कहते हैं।

प्रसंग का क्रम

कैकेयी भरत को समझाती हैं और राज्य करने को कहती हैं। भरत उन्हें पापिनी कहते हैं और पूछते हैं कि जन्म लेते ही उन्हें मार क्यों नहीं डाला। वे अपने कुल, पिता और भाइयों का नाम लेते हैं, और कैकेयी को जन्म देनेवाली माता कहते हैं। वे उन्हें मुँह पर स्याही लगाकर आँखों की ओट में जा बैठने को कहते हैं, और पूछते हैं कि उनके समान पापी कौन है।

कैकेयी की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्न के अंग क्रोध से जलते हैं। सजकर आयी मन्थरा के कूबड़ पर वे लात मारते हैं और उसे बाल पकड़कर घसीटते हैं, और भरत उसे छुड़ा देते हैं। फिर दोनों भाई कौसल्या के पास जाते हैं। भरत को देखकर वे मूर्च्छित हो जाती हैं, और भरत उनके चरणों में गिरकर पिता, सीता, राम और लक्ष्मण के बारे में पूछते हैं। वे कहते हैं कि इस सब अनर्थ का कारण केवल वे हैं, और अपने को धिक्कारते हैं। उनके कोमल वचन सुनकर कौसल्या फिर उठती हैं, उन्हें छाती से लगाती हैं और गोद में बैठाती हैं। वे किसी को दोष न देने को कहती हैं, और राम के वन जाने की, और साथ गये सीता और लक्ष्मण की बात बताती हैं। भरत सहित रनिवास विलाप करता है।

कौसल्या दोनों भाइयों को हृदय से लगाकर भरत को समझाती हैं। भरत सब माताओं को समझाते हैं। हाथ जोड़कर वे शपथ लेते हैं कि यदि इसमें उनका मत हो, तो जो पाप वे गिनाते हैं, वे उन्हें लगें। जिन पापियों को वे गिनाते हैं, उनकी गति भी वे अपने लिये माँगते हैं, यदि इसमें उनका मत, उनकी सम्मति या इस भेद का ज्ञान हो। कौसल्या कहती हैं कि भरत सदा राम के प्यारे हैं और राम के प्रतिकूल न होंगे। सारी रात विलाप में बीतती है। वामदेव और वसिष्ठ आते हैं, और गुरु भरत को उपदेश देते हैं। गुरु की बात सुनकर भरत उठते हैं और तैयारी के लिये कह देते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 161 से 169, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।