Lulla Family

भरत का कैकेयी को उत्तर और कौसल्या से भेंट

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · भरत का कैकेयी को उत्तर और कौसल्या से भेंट

भरत का कैकेयी को उत्तर और कौसल्या से भेंट

कैकेयी का राज्य करने का आग्रह, भरत का असह्य आत्मदोष, मन्थरा को छुड़ाने का क्षण और कौसल्या की गोद में मिली वह गवाही जिसमें राम और भरत का प्रेम एक साथ बोलता है।

कैकेयी पुत्र को समझा रही हैं कि राजा ने जीवन के सारे फल पा लिये, अब शोक छोड़कर राज्य सँभालना चाहिये। भरत के लिये यही बात घाव पर अँगारे जैसी है। जिस राज्य को माता समाधान समझ रही हैं, उसी का नाम उनके भीतर उस विनाश को और गहरा कर देता है जिसमें पिता चले गये और राम वन में हैं। उत्तर देते हुए उनका क्रोध माँ तक पहुँचता है, फिर अपने ही जन्म पर लौट आता है।

तुलसीदास के अयोध्याकाण्ड में इस भेंट के साथ दो और भेंटें जुड़ी हैं। शत्रुघ्न के सामने मन्थरा आती है और क्रोध हिंसा बन जाता है। वहाँ भरत उसे छुड़ाते हैं। फिर दोनों भाई कौसल्या के पास जाते हैं। अपने को प्रियजनों का द्रोही कहनेवाले भरत को वह माता छाती से लगा लेती हैं जिसका अपना पुत्र वन में है। उसके बाद एक लम्बी शपथ और उसका उतना ही दृढ़ उत्तर आता है। इस पूरे प्रसंग में भरत अपने विरुद्ध जितनी कठोर बातें कहते हैं, कौसल्या उनके रामप्रेम पर उतना ही अचल विश्वास रखती हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • भरत पिता और राम के वियोग में व्याकुल पुत्र, जो कैकेयी को उत्तर देते हैं और कौसल्या के सामने अपनी निर्दोषता की शपथ रखते हैं।
  • कैकेयी भरत की जन्मदात्री, जो उन्हें शोक छोड़कर राज्य करने को कहती हैं।
  • शत्रुघ्न भरत के साथ उपस्थित भाई, जिनका क्रोध मन्थरा पर हिंसक प्रहार बन जाता है।
  • मन्थरा वस्त्र और आभूषणों से सजकर आनेवाली स्त्री, जिसे शत्रुघ्न के हाथों से भरत छुड़ाते हैं।
  • कौसल्या राम की माता, जो दोनों भाइयों को अपनाती हैं और भरत के हृदय पर संदेह स्वीकार नहीं करतीं।
  • वामदेव और वसिष्ठ रात बीतने पर आनेवाले ऋषि। वसिष्ठ भरत को धैर्य धरकर समय का आवश्यक कार्य करने को कहते हैं।

जिस सांत्वना से घाव और जलता है

कैकेयी भरत की व्याकुलता देखती हैं और उन्हें समझाने लगती हैं। उनकी बात शुरू होने से पहले ही तुलसी उसके असर की उपमा रख देते हैं: जले हुए स्थान पर नमक लगाया जा रहा है। पुत्र दुःख में है, माता उसे समझा रही हैं, पर दोनों के लिये दुःख का अर्थ एक नहीं है। कैकेयी राजा के जीवन की सफलता गिनाकर शोक का कारण घटाना चाहती हैं। भरत उसी घर के उजड़ जाने को सह रहे हैं जिसमें सफलता के ये सारे नाम अर्थ रखते थे।

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति । मनहुँ जरे पर लोनु लगावति॥
तात राउ नहिं सोचै जोगू । बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥

चौपाई १

कैकेयी कहती हैं कि राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य अर्जित किया, यश पाया और उनका भरपूर भोग किया। जीते हुए जन्म के सारे फल मिले और अन्त में इन्द्र के लोक को चले गये। उनकी समझाइश में राजा का पूरा जीवन और जीवन के बाद की गति साथ रखी गयी है। फिर वे भरत से कहती हैं कि ऐसा विचारकर शोक छोड़ दें और समाज सहित नगर का राज्य करें। पिता की मृत्यु पर सांत्वना देनेवाला वाक्य सीधे पुत्र के राज्य करने के आग्रह तक पहुँच जाता है।

भरत यह सुनकर बहुत सहम जाते हैं। अब उपमा बदलती है। पहले जले पर नमक था, अब पके हुए घाव पर अँगारा है। पीड़ा पहले से है और राज्य की बात उस पर रख दी गयी है। वे धीरज धरते हैं, लम्बी साँस लेते हैं, फिर माँ को उत्तर देते हैं। उस उत्तर में कैकेयी के सुझाये सुख के लिये कोई स्थान नहीं बचता। उन्हें लगता है कि माँ ने हर प्रकार से कुल का नाश कर दिया।

वे पूछते हैं कि यदि ऐसी ही बुरी इच्छा थी तो जन्म लेते ही उन्हें मार क्यों नहीं दिया। अपने लिये किये गये हित का यह परिणाम उनकी समझ में नहीं आता। जिस पुत्र के लिये यह सब किया गया, वही अपने जीवित होने को प्रश्न बना देता है। फिर वे दो ऐसे चित्र रखते हैं जिनमें उपकार करने की इच्छा और उसके साधन एक दूसरे को नष्ट कर रहे हैं। दोनों चित्रों में किसी जीवित वस्तु को बचाने के नाम पर उसके जीने का आधार छीन लिया गया है।

जौं पै कुरुचि रही अति तोही । जनमत काहे न मारे मोही॥
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा । मीन जिअन निति बारि उलीचा॥

चौपाई २

पहले पेड़ काट दिया गया है और फिर उसके पत्ते को सींचा जा रहा है। दूसरे चित्र में मछली को जीवित रखने के लिये उसका पानी उलीचा जा रहा है। पोद्दार की टीका दोनों को भरत के अहित में खुलती हुई उसी चेष्टा के रूप में समझाती है जिसे कैकेयी उनका हित मान रही थीं। पत्ते और मछली को अलग से सुख दे देना सम्भव नहीं। भरत का अपना जीवन भी पिता और भाइयों के सम्बन्ध से जुड़ा है। उस सम्बन्ध को उजाड़कर उन्हें राज्य देना इन दोनों उलटे प्रयत्नों जैसा है।

हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।
जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ॥ १६१॥

दोहा १६१

दोहा उनके मिले हुए सम्बन्धों की गिनती करता है: सूर्यवंश, दशरथ जैसे पिता, राम और लक्ष्मण जैसे भाई। इन सबके बाद जन्म देनेवाली माता का नाम आते ही गिनती विलाप हो जाती है। भरत विधाता के सामने अपना वश न चलने की बात कहते हैं। वही जन्म उन्हें इतना बड़ा परिवार देता है और उसी जन्म का एक सम्बन्ध इस समय असह्य लग रहा है। राज्य का आग्रह सुननेवाला पुत्र अपने अधिकार की ओर बढ़ने के स्थान पर अपने परिवार के हर नाम के साथ बँधता जा रहा है।

कैकेयी राजा के पुण्य, यश और इन्द्रलोक की गति का स्मरण कराकर भरत को राज्य करने को कहती हैं। भरत इसे घाव पर अँगारा अनुभव करते हैं। पेड़ काटकर पत्ता सींचने और मछली के लिये पानी उलीचने की उपमाओं से वे अपने नाम पर किये गये अहित को व्यक्त करते हैं।

क्रोध का आरोप अपने ही जन्म पर लौटता है

भरत का उत्तर अभी समाप्त नहीं हुआ। वे माँ से पूछते हैं कि जब हृदय में यह बुरा निश्चय आया, तभी हृदय के टुकड़े क्यों नहीं हो गये। वर माँगते हुए पीड़ा क्यों नहीं हुई, जीभ क्यों नहीं गल गयी, मुँह में कीड़े क्यों नहीं पड़ गये। इन प्रश्नों की कठोरता में उनके दुःख का संयम टूटता सुनायी देता है। मन में उठी इच्छा, उसे माँगनेवाली जीभ और बोलनेवाला मुँह, सब उनके आक्रोश के भीतर आ जाते हैं।

इसके बाद उनका प्रश्न राजा के विश्वास तक जाता है। दशरथ ने यह भरोसा कैसे किया। भरत को लगता है कि मरने के समय विधाता ने उनकी बुद्धि हर ली थी। वे राजा को सीधे, सुशील और धर्म में लगे हुए कहते हैं। उसी सरलता के सामने वे माँ की कपटपूर्ण इच्छा रखते हैं और पूछते हैं कि ऐसे राजा उसे कैसे जान पाते। विश्वास करनेवाले पिता की याद उन्हें उस विश्वास के टूटने से और व्याकुल करती है।

इसी रोष में भरत कैकेयी के आचरण से आगे बढ़कर समूची स्त्रीजाति के विषय में कठोर सामान्यीकरण भी करते हैं। उनके शब्दों में स्त्री का हृदय ऐसा है जिसकी गति विधाता तक नहीं जान सके; वे उसे कपट, पाप और अवगुणों का भण्डार कहते हैं। यह उस क्रुद्ध पुत्र के आरोप का हिस्सा है। माँ से हुई इस भेंट में उसका शोक इतनी तीव्रता से बोल रहा है कि एक व्यक्ति का दोष उसकी वाणी में सारी स्त्रियों पर फैल जाता है।

फिर भरत राम का नाम लेते हैं। वे पूछते हैं कि संसार में ऐसा कौन जीव या जन्तु है जिसे रघुनाथ प्राणों के समान प्रिय न हों। उन्हीं राम को कैकेयी ने अहितकारी समझ लिया। भरत के लिये यही बात माँ की पहचान को असम्भव बना देती है। वे पूछ उठते हैं कि यह करनेवाली कौन है। जिसके प्रति सबका प्रेम है, उसके प्रति विरोध उन्हें अपने सबसे निकट के सम्बन्ध को भी पहचानने नहीं दे रहा।

उनका अगला वचन कैकेयी को अपनी आँखों से ओझल हो जाने का है। मुँह काला करके दूर जा बैठने को कहना उसी तीखे अपमान का हिस्सा है। यहाँ कोई समझौता नहीं होता, माता की ओर से उत्तर भी नहीं आता। भरत के ही वचन अपना रुख बदल लेते हैं। अभी तक जिस जन्मदात्री को वे कटघरे में रख रहे थे, अब उसी से उत्पन्न अपने जीवन को सबसे बड़ा अपराध मानने लगते हैं।

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि॥ १६२॥

दोहा १६२

पोद्दार इस दोहे के दो अर्थ देते हैं। एक अर्थ में भरत कहते हैं कि विधाता ने उन्हें राम का विरोध करनेवाले हृदय से जन्म दिया। दूसरे अर्थ में उनकी व्यथा यह है कि विधाता ने उन्हें ही हृदय से राम का विरोधी प्रकट कर दिया। पहले अर्थ में जन्म का सम्बन्ध उन्हें पीड़ित करता है; दूसरे में संसार के सामने बननेवाली उनकी अपनी पहचान। दोनों अर्थ उसी अन्तिम प्रश्न तक पहुँचते हैं: उनके बराबर पापी कौन है, वे माँ को व्यर्थ ही कुछ कह रहे हैं।

इस मोड़ को भरत की सहमति समझ लेना उनके दुःख को उलट देना होगा। वे राम के विरोध को स्वीकार नहीं कर रहे; उसी विरोध से अपना नाम जुड़ जाने पर अपने को धिक्कार रहे हैं। माँ को दिये गये उत्तर का अन्त अपने बचाव से नहीं हुआ। वह अपनी ही निन्दा पर आकर ठहरता है। आगे कौसल्या के सामने भी यह आत्मदोष उनके साथ जायेगा, और माता का विश्वास इसी से उनका सामना करायेगा।

भरत का आक्रोश कैकेयी के निर्णय, राजा के टूटे विश्वास और राम के प्रति विरोध पर है। उनके तीखे सामान्यीकरण उन्हीं की क्रुद्ध वाणी में आते हैं। दोहा अन्ततः आरोप को अपने जन्म या अपनी दूषित होती पहचान पर लौटा देता है; पोद्दार दोनों अर्थ सँभालकर रखते हैं।

मन्थरा आती है, भरत उसे छुड़ाते हैं

शत्रुघ्न भी माता की कुटिलता सुन रहे हैं। उनके अंग क्रोध से जल रहे हैं और कुछ वश नहीं चल रहा। इसी अवसर पर मन्थरा वहाँ आती है। उसने भाँति-भाँति के वस्त्र और आभूषण पहन रखे हैं। तुलसी उसके आगमन को इसी सजावट के साथ दिखाते हैं। शत्रुघ्न की पहले से भड़कती हुई अवस्था में उसे इस रूप में देखना अग्नि को घी की आहुति मिलने जैसा हो जाता है।

लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई । बरत अनल घृत आहुति पाई॥
हुमगि लात तकि कूबर मारा । परि मुह भर महि करत पुकारा॥

चौपाई ३

शत्रुघ्न उसके कूबड़ को लक्ष्य करके जोर से लात मारते हैं। मन्थरा पुकारती हुई मुँह के बल धरती पर गिरती है। उसके बाद चोट का विवरण आता है: कूबड़ टूट जाता है, कपाल फूटता है, दाँत टूटते हैं और मुँह से रक्त बहता है। प्रहार का उल्लेख भर करके कथा आगे नहीं निकलती। जिस क्रोध को अभी भीतर अंगों में जलते देखा था, अब उसका परिणाम दूसरे शरीर की इन चोटों में दिखाई देता है।

मन्थरा दैव को पुकारती है। वह पूछती है कि उसने क्या बिगाड़ा था, भला करते हुए उसे ऐसा बुरा फल क्यों मिला। अपने आचरण को वह अब भी भलाई ही कह रही है। आरम्भ में कैकेयी भरत को राज्य करने में हित दिखा रही थीं; यहाँ मन्थरा भी अपने किये को अच्छा मानकर उसके फल पर विस्मित है। उस दावे और सामने पड़े विनाश के बीच की दूरी किसी बातचीत से दूर नहीं होती।

मन्थरा की बात सुनकर शत्रुघ्न उसे नख से शिख तक दोषपूर्ण देखते हैं। फिर वे बाल पकड़-पकड़कर उसे घसीटने लगते हैं। उनके प्रहार के बाद यह दूसरा हिंसक व्यवहार है, और इसी के बीच भरत हस्तक्षेप करते हैं। तुलसी यहाँ भरत के लिये दया का नाम रखते हैं। वे मन्थरा को छुड़ा देते हैं। कथा में इस क्रिया के बाद दोनों भाइयों का अगला गन्तव्य कौसल्या का निवास है।

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी । लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ॥
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई । कौसल्या पहिं गे दोउ भाई॥

चौपाई ४

अभी अपनी माँ के लिये अत्यन्त कठोर शब्द कहनेवाले भरत ही मन्थरा को छुड़ाते हैं। उनके दुःख और क्रोध का होना इस हस्तक्षेप को रोकता नहीं। शत्रुघ्न ने उसे घसीटना शुरू किया था, भरत उसे मुक्त करते हैं, फिर दोनों भाई साथ जाते हैं। इस छोटे क्रम में क्रोध, चोट और उसे रोकने का स्पष्ट अन्तर बचा रहता है। मन्थरा के लिये कोई और दण्ड यहाँ नहीं सुनाया जाता।

कौसल्या के पास पहुँचकर दृश्य बदल जाता है। वहाँ मैले वस्त्र हैं, चेहरे का बदला हुआ रंग है और दुःख के भार से सूखा हुआ शरीर है। माता व्याकुल हैं। मन्थरा का आगमन वस्त्रों और आभूषणों से सजा हुआ था; कौसल्या की दशा उनके शरीर पर पड़े वियोग को प्रकट करती है। तुलसी इस दशा के लिये सोने की सुन्दर कल्पलता का चित्र चुनते हैं जिसे वन में पाला मार गया हो।

मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥ १६३॥

दोहा १६३

कल्पलता की सुन्दरता और पाले की मार एक साथ रखी गयी हैं। माँ का स्नेहमय स्वरूप नष्ट नहीं हुआ, किन्तु दुःख ने उनकी सारी काया को म्लान कर दिया है। इसी माता के सामने दोनों भाई पहुँचते हैं। भरत अपने को उस अनर्थ का कारण कहनेवाले हैं, और यह कृश, व्याकुल माता उठकर उन्हें अपने हृदय में जगह देनेवाली हैं।

शत्रुघ्न मन्थरा को लात मारते हैं और फिर बाल पकड़कर घसीटते हैं। उसकी चोटें और अपनी भलाई का दावा दोनों सामने आते हैं। भरत उसे छुड़ाते हैं। दोनों भाई कौसल्या के पास जाते हैं, जो दुःख से ऐसी म्लान हैं जैसे पाले से आहत कल्पलता।

कौसल्या की गोद और भरत का आत्मदोष

भरत को देखते ही कौसल्या उठकर दौड़ती हैं। पर चक्कर आ जाता है और वे मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं। भरत यह देखकर बहुत व्याकुल होते हैं। अपने शरीर की सुध भूलकर उनके चरणों में गिर जाते हैं। जिस माता की अवस्था देखकर अभी पाले की मारी हुई लता याद आयी थी, वही उन्हें देखते ही दौड़ पड़ी हैं। मिलन की पहली चेष्टा ही दोनों के लिये फिर से शोक का ऐसा क्षण बन जाती है जिसमें शरीर का सँभलना कठिन है।

भरत माता से पूछते हैं कि पिताजी कहाँ हैं, उन्हें दिखा दें। सीता कहाँ हैं और दोनों भाई राम तथा लक्ष्मण कहाँ हैं। उनके ये प्रश्न उस अनुपस्थिति को नाम देकर पुकारते हैं जिसके बीच वे लौटे हैं। थोड़ी ही आगे वे स्वयं कहेंगे कि पिता स्वर्ग में हैं और राम वन में। अभी माता के चरणों पर उनकी वाणी उन सबको एक बार दिखा देने की माँग कर रही है।

फिर उनके वचन कैकेयी के जन्म पर लौटते हैं। वे पूछते हैं कि वह जगत में क्यों जन्मीं और जन्मीं भी तो निःसन्तान क्यों न रहीं। इस बार भी उस निन्दा का पूरा बोझ अपने ही जन्म पर रख देते हैं। वे अपने को कुल का कलंक, अपयश का पात्र और प्रियजनों का द्रोही कहते हैं। कौसल्या की दशा के लिये अपने को कारण मानकर पूछते हैं कि तीनों लोकों में उनसे बड़ा अभागा कौन होगा।

पिता का स्वर्गवास और राम का वनवास उनके वाक्य में पास-पास आ जाते हैं। इनके बीच वे अपने को केतु के समान अनर्थ का कारण कहते हैं। फिर बाँस के वन में लगी आग की उपमा देते हैं। जिस वन से बाँस जुड़ा है, उसी को उसके भीतर उठी आग जला रही है। भरत अपने जन्म को परिवार के लिये उसी दाह की तरह देख रहे हैं और कठिन दुःख तथा दोष का भागी अपने को मानते हैं।

मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि।
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि॥ १६४॥

दोहा १६४

इन कोमल वचनों को सुनकर कौसल्या फिर सँभलकर उठती हैं। भरत को उठाती हैं, छाती से लगाती हैं और उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं। भरत अपने को द्रोही कह रहे थे; माता का आलिंगन उन्हें ऐसे अपनाता है मानो राम ही लौट आये हों। तुलसी इस उपमा में माता की सहजता रखते हैं। पुत्र का परिचय उसके विरुद्ध लगाये जा रहे दोष से तय नहीं होता। उस क्षण कौसल्या के लिये वह राम के लौट आने जैसा प्रिय मिलन है।

इसके बाद वे शत्रुघ्न को भी हृदय से लगाती हैं। शोक और स्नेह दोनों इतने हैं कि हृदय में समाते नहीं। उपस्थित लोग उनका स्वभाव देखकर कहते हैं कि राम की माता का स्वभाव ऐसा क्यों न हो। फिर कौसल्या भरत को अपनी गोद में बैठाती हैं, उनके आँसू पोंछती हैं और कोमल वचन बोलती हैं। अभी भरत उनके चरणों में गिरे थे; अब वे माता की गोद में हैं। इस पूरी गति में उठाना, लगाना और आँसू पोंछना सब माता की ओर से आता है।

वे बलैया लेते हुए भरत से कहती हैं कि अब भी धैर्य धरे रहें। समय को बुरा जानकर शोक छोड़ें और काल तथा कर्म की अमिट गति समझकर हानि या ग्लानि को हृदय में न रखें। फिर सीधे कहती हैं कि किसी को दोष न दें। अपना दुःख बताते हुए वे विधाता को हर प्रकार से प्रतिकूल कहती हैं, जो इतने दुःख में भी उन्हें जीवित रखे हुए है। अब भी उसे क्या भा रहा है, यह कौन जानता है।

माता की समझाइश दुःख के बाहर से नहीं आती। वे स्वयं उसकी पीड़ा में हैं और अपने जीवित रहने तक पर प्रश्न कर रही हैं। फिर भी भरत को दोष के चक्र से बाहर बुलाती हैं। आरम्भ में कैकेयी ने राजा के सुख गिनाकर शोक छोड़ने को कहा था। कौसल्या यहाँ पुत्र के आँसू पोंछकर उसके आत्मदोष को सँभाल रही हैं। उनका अगला कथन राम के वन जाते समय की स्मृति है।

भरत को देखकर कौसल्या दौड़ती और मूर्च्छित होती हैं। भरत चरणों में गिरकर अपने जन्म को अनर्थ का कारण कहते हैं। माता सँभलकर दोनों भाइयों को अपनाती हैं, भरत को गोद में बैठाकर आँसू पोंछती हैं और काल, कर्म तथा बुरे समय की बात कहकर किसी को दोष न देने को समझाती हैं।

माता की स्मृति में वन को जाते हुए राम

कौसल्या अब भरत को बताती हैं कि राम ने पिता की आज्ञा मिलने पर क्या किया था। आभूषण और वस्त्र उतार दिये, वल्कल पहन लिये। यह परिवर्तन उनके सामने हुआ था। माता उस क्षण को स्मरण करती हैं तो पहनावे के साथ हृदय की अवस्था भी बताती हैं। उनके कथन में राम के मन में उस समय न विषाद था, न हर्ष।

पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥ १६५॥

दोहा १६५

अगली चौपाई उसी स्मृति में उनका प्रसन्न मुख दिखाती है। मन में आसक्ति और रोष नहीं था। कौसल्या का वर्णन दोनों बातें साथ रखता है: भीतर हर्ष या विषाद का उतार-चढ़ाव नहीं, मुख पर प्रसन्नता। वे सबको हर तरह से सन्तोष देकर वन को चले। माता जिस प्रस्थान को अपने लिये असह्य मानती हैं, उसी में पुत्र का यह संतुलन याद रखती हैं। उन्हें केवल चले जाना याद नहीं, जाते समय सबको सन्तोष देना भी याद है।

राम के वन जाने की बात सुनकर सीता साथ लग गयीं। राम के चरणों में उनका ऐसा अनुराग था कि वे किसी प्रकार रुक न सकीं। लक्ष्मण ने सुना तो वे भी साथ उठ चले। राम ने उन्हें रोकने के बहुत यत्न किये, पर वे नहीं रहे। कौसल्या की स्मृति में दोनों के साथ जाने का अपना आग्रह स्पष्ट है। फिर राम ने सबको सिर नवाया और सीता तथा छोटे भाई को साथ लेकर चले गये।

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा । रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥
तब रघुपति सबही सिरु नाई । चले संग सिय अरु लघु भाई॥

चौपाई ५

इस प्रणाम के बाद माता के वचन उस स्थान पर लौटते हैं जहाँ वे स्वयं रह गयी थीं। राम, लक्ष्मण और सीता वन चले गये। वे उनके साथ न जा सकीं और अपने प्राण भी साथ न भेज सकीं। सब उन्हीं की आँखों के सामने हुआ, फिर भी अभागे जीव ने शरीर नहीं छोड़ा। भरत अपने जन्म को दोष दे रहे थे; कौसल्या अपने बचे हुए जीवन में अपने स्नेह की कमी खोजने लगती हैं।

वे कहती हैं कि अपने स्नेह को देखकर उन्हें लाज भी नहीं आती। राम जैसे पुत्र की वे माता हैं, फिर भी जीवित हैं। दशरथ का स्मरण करके कहती हैं कि जीना और मरना तो राजा ने जाना। अपना हृदय उन्हें सैकड़ों वज्रों के समान कठोर लगता है। यह उनके विलाप की तुलना है, जिसमें राजा का वियोग में प्राण छोड़ना प्रेम की गहराई बनकर आता है और अपना बचा रहना उन्हें कठोरता जैसा लगता है।

उनके ये वचन भरत और समूचे रनिवास को व्याकुल कर देते हैं। सब विलाप करने लगते हैं। तुलसी राजमहल को शोक का निवास कहते हैं। महल का होना यहाँ वैभव से पहचाना नहीं जा रहा। वहाँ रहनेवालों की एक साथ उमड़ी हुई पीड़ा ने उसका परिचय अपने नाम से भर दिया है। कौसल्या की एक स्मृति सुनते-सुनते दुःख फिर पूरे परिवार का हो गया है।

कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु।
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु॥ १६६॥

दोहा १६६

भरत और शत्रुघ्न दोनों व्याकुल होकर रोते हैं। कौसल्या फिर उन्हें हृदय से लगाती हैं। भरत को बहुत प्रकार से समझाती हैं और विवेकभरी बातें सुनाती हैं। उनके अपने विलाप के बाद भी सांत्वना देने की यह चेष्टा जारी रहती है। दुःख सुनाना और दुःखी पुत्र को सँभालना एक ही माता के भीतर साथ चल रहा है। भाई केवल श्रोता नहीं रहेंगे; अब भरत भी सब माताओं को समझाने लगेंगे।

कौसल्या राम का वल्कल धारण करना, प्रसन्न मुख, सबको सन्तोष देना और सीता तथा लक्ष्मण के साथ प्रस्थान याद करती हैं। स्वयं साथ न जा सकने और जीवित रह जाने का दुःख उन्हें सालता है। उनके वचन सुनकर सारा रनिवास विलाप करता है, फिर वे दोनों भाइयों को सँभालती हैं।

भरत की शपथ: यदि इसमें मेरा मत हो

भरत भी सब माताओं को समझाते हैं। वे पुराण और वेदों की सुन्दर कथाएँ कहते हैं। उन कथाओं के नाम यहाँ नहीं दिये गये हैं; उनका काम इस शोक के बीच माताओं को सांत्वना देना है। फिर भरत दोनों हाथ जोड़ते हैं और बोलते हैं। तुलसी उनकी वाणी को छल से रहित, पवित्र और सरल कहते हैं। इसी वाणी में अब वह लम्बी शपथ आती है जिसमें वे अपनी सहमति की सम्भावना को सबसे भारी पापों के साथ बाँधते हैं।

शपथ की शर्त पहले मन में रख लें: यदि इस काम में भरत का मत हो। इसी शर्त के अधीन वे अपने लिये वे सारे फल माँग रहे हैं जिन्हें उनकी धार्मिक दृष्टि अत्यन्त भयावह मानती है। वे अपने किये हुए अपराध नहीं गिना रहे। जिन कर्मों को सबसे बड़ा अपराध मानते हैं, उनके परिणाम अपने ऊपर लेने की बात कहकर यह प्रकट कर रहे हैं कि राम के विरुद्ध इस निर्णय में उनका कोई मत नहीं था।

पहले वे माता, पिता और पुत्र की हत्या से होनेवाले पाप गिनाते हैं। फिर गोशालाएँ और ब्राह्मणों के नगर जलाने के पाप कहते हैं। स्त्री और बालक की हत्या, मित्र तथा राजा को विष देना, ये भी उसी शपथ में आते हैं। परिवार, आश्रय, असहाय जीवन और विश्वास के सम्बन्धों पर आघात, सब भरत की गिनती में एक-एक करके जगह पाते हैं। जिन सम्बन्धों के टूटने से वे व्याकुल हैं, उन्हीं के विरुद्ध किये गये भयानक कर्मों का फल वे शर्त के साथ अपने ऊपर बुलाते हैं।

जे पातक उपपातक अहहीं । करम बचन मन भव कबि कहहीं॥
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता । जौं यहु होइ मोर मत माता॥

चौपाई ६

फिर गिनती केवल उन उदाहरणों तक सीमित नहीं रहती। भरत कर्म, वचन और मन से होनेवाले सभी बड़े और छोटे पापों को समेटते हैं, जिनका कवि लोग वर्णन करते हैं। वे विधाता से कहते हैं कि यदि इस काम में उनका मत हो तो वे सब पाप उन्हें लगें। मन का उल्लेख यहाँ विशेष तीखा है। बाहरी कर्म में भाग लेना ही उनकी शपथ का विषय नहीं; भीतर की सम्मति भी उसी निर्णय के अधीन है।

अगले दोहे में वे उपासना का प्रसंग लाते हैं। श्रीहरि और शंकर के चरण छोड़कर भयानक भूतगणों का भजन करनेवालों की गति वे अपने लिये माँगते हैं, यदि इसमें उनका मत हो। हरि और हर के प्रति भक्ति इस शपथ की धार्मिक भूमि है। जिन मार्गों को भरत विपरीत मानते हैं, उनका भयावह फल वे उसी विश्वास के भीतर अपने ऊपर लेने को कहते हैं।

जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर॥ १६७॥

दोहा १६७

हर बार लौटती हुई शर्त इस कथन का अर्थ बचाये रखती है। माता के सामने वे अपने भीतर की बात को ऐसी प्रतिज्ञा में रख रहे हैं जिसके साथ ये सारे कठोर परिणाम जुड़े हैं। माँ को दोष देनेवाले आरम्भिक वचन अब एक दूसरी दिशा पा चुके हैं। यहाँ कौसल्या के सामने वे साफ़ कर रहे हैं कि उस निर्णय का कोई हिस्सा उनके मन में भी नहीं था।

माताओं को वेद और पुराण की कथाओं से समझाकर भरत हाथ जोड़ते हैं। परिवार की हत्या, आगजनी, स्त्री और बालक का वध, विष देना और मन, वचन, कर्म के सभी पापों का फल वे इस शर्त पर माँगते हैं कि यदि निर्णय में उनका मत हो। हरि-हर से विमुख उपासना की गति भी उसी शर्त में आती है।

यदि इस भेद को जानता भी होऊँ

भरत की शपथ में अब वे लोग आते हैं जो वेद बेचते हैं और धर्म को दुहते हैं। जिस धर्म में आस्था होनी चाहिये, उसी को अपना लाभ निकालने का साधन बना लेना उनकी गिनती में दोष है। इसके साथ चुगली करनेवाले और दूसरों के पाप कह देनेवाले आते हैं। ज्ञान तथा धार्मिक आचरण का व्यापार और दूसरों की बुराई फैलाने की प्रवृत्ति, दोनों को वे उस भयावह गति से जोड़ते हैं जिसे अपनी सहमति होने पर स्वीकार करते हैं।

अगले नाम कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी लोगों के हैं। वेदों की निन्दा करनेवाले और सारे संसार से विरोध रखनेवाले भी इसी क्रम में हैं। फिर लोभी, लम्पट और लालच का आचरण करनेवाले आते हैं, जो पराये धन और परायी स्त्री की ताक में रहते हैं। इन सबकी भयानक गति पाने की बात कहकर भरत फिर माता के सामने वही शर्त दोहराते हैं: यदि इस काम में उनकी सम्मति हो।

यहाँ शपथ जिन दोषों को गिनाती है, उनमें केवल प्रकट हिंसा नहीं है। वाणी की चुगली, धर्म का स्वार्थपूर्ण उपयोग, मन की कुटिलता और दूसरे के अधिकार पर लगी हुई दृष्टि भी आती है। भरत की निर्दोषता का दावा केवल इतना नहीं कि उन्होंने स्वयं कोई प्रहार नहीं किया। वे अपनी सम्मति को मन और व्यवहार की उस पूरी श्रेणी के सामने रख रहे हैं जिसे वे दूषित मानते हैं।

फिर वे सत्संग से प्रेम न रखनेवालों और परमार्थ के मार्ग से विमुख लोगों का उल्लेख करते हैं। मनुष्य का शरीर पाकर भी हरि का भजन न करना और हरि तथा हर का सुयश अच्छा न लगना भी उनके कथन में आता है। ये भक्ति के प्रति उनकी अपनी निष्ठा से निकलनेवाले निर्णय हैं। शपथ में सामाजिक दोषों के साथ उस उपासना और परमार्थ का स्थान भी बना रहता है जिसे वे जीवन का कल्याण समझते हैं।

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं । बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं॥
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥

चौपाई ७

अन्त में वे वेद के मार्ग को छोड़कर उसके प्रतिकूल चलनेवालों तथा वेष बनाकर संसार को छलनेवाले ठगों की गति माँगते हैं। इस बार प्रार्थना शंकर से है। और यहीं शर्त पहले से भी सूक्ष्म हो जाती है: यदि वे इस भेद को जानते भी हों, तो उन्हें उन लोगों की गति मिले। पहले अपनी सम्मति की बात थी; अब पूर्वज्ञान तक को वे उसी शपथ में ले आये हैं।

सहमत होना और जानना एक बात नहीं है। भरत दोनों से अपना सम्बन्ध अस्वीकार करते हैं। हाथ जोड़कर शुरू किये गये इस कथन में उनकी वाणी को तुलसी पहले ही पवित्र और सरल कह चुके हैं। इतने विस्तार के बाद वह कथन उसी भीतरी निर्दोषता पर पूरा होता है। कौसल्या को अब उत्तर देना है। वे भरत को राम के प्रेम में पहचानती हैं, और उनकी पहचान इन आशंकाओं से अधिक दृढ़ है।

भरत की शपथ धर्म के व्यापार, चुगली, कपट, कलह, क्रोध, लोभ, पराये धन और स्त्री पर दृष्टि तथा भक्ति और परमार्थ से विमुखता तक जाती है। अन्तिम शर्त केवल सम्मति की नहीं रहती: यदि उन्हें इस भेद का ज्ञान भी रहा हो तो शंकर उन्हें उन लोगों की गति दें।

माता का विश्वास और रात के बाद का कार्य

कौसल्या भरत के स्वभाव से सच्चे और सरल वचन सुनती हैं। उनका उत्तर उन्हें राम का प्रिय कहने से शुरू होता है। मन, वचन और शरीर, तीनों से वे सदा राम के प्रिय हैं। भरत की शपथ ने इन्हीं तीन स्तरों पर पाप का फल माँगा था। माता का कथन उन्हीं के पूरे व्यक्तित्व को राम के प्रेम में रख देता है।

मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।
कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ॥ १६८॥

दोहा १६८

वे कहती हैं कि राम भरत को प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं और भरत भी राम को प्राणों से अधिक प्यारे हैं। इस आश्वासन में प्रेम दोनों दिशाओं से आता है। भरत का राम के प्रति हृदय और राम का भरत के प्रति हृदय, दोनों माता के वचन में एक साथ सुरक्षित हैं। भरत जिस विरोधी पहचान से अपने को धिक्कार रहे थे, वहाँ कौसल्या परस्पर प्रेम की गवाही देती हैं।

फिर वे असम्भव घटनाओं की शृंखला रखती हैं। चन्द्रमा विष चुआने लगे, पाला आग बरसाने लगे, जल में रहनेवाला जीव जल से विरक्त हो जाये। जिनके स्वभाव में ही विपरीत बात है, उन्हें भी एक क्षण के लिये सम्भव मान लेती हैं। शीतलता का विष या अग्नि में बदलना और जलचर का अपने जीवन के आधार से उचटना, प्रत्येक चित्र अपनी प्रकृति के उलट जाने का है।

भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू । तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं । सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं॥

चौपाई ८

इसके साथ ज्ञान और मोह का उदाहरण आता है। ज्ञान हो जाने पर भी चाहे मोह न मिटे, पर भरत राम के प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। कौसल्या के कथन की दृढ़ता यही है कि संसार के स्वभाव और ज्ञान के फल तक बदल जायें, भरत के इस प्रेम में विरोध की गुंजाइश नहीं है। वे फिर उन लोगों के विषय में कहती हैं जो इसमें भरत की सम्मति बताते हैं: ऐसे लोग स्वप्न में भी सुख और शुभ गति नहीं पायेंगे।

भरत ने अपने लिये सशर्त भयानक गतियाँ माँगी थीं। माता उनकी सम्मति का आरोप लगानेवालों के विषय में अपना कठोर निर्णय देती हैं। अपने पुत्र राम के वियोग में व्याकुल होने पर भी वे भरत के विरुद्ध संदेह स्वीकार नहीं करतीं। यही वह आश्रय है जिसमें उनकी लम्बी शपथ का उत्तर मिलता है। कैकेयी की योजना से जुड़ा नाम कौसल्या के लिये भरत के हृदय का प्रमाण नहीं बनता।

ऐसा कहकर वे भरत को फिर हृदय से लगा लेती हैं। उनके स्तनों से दूध बहने लगता है और नेत्रों में आँसू छा जाते हैं। माता का स्नेह अब केवल बोले हुए आश्वासन में नहीं है; उसका यह शारीरिक चिह्न भी तुलसी सँभालकर रखते हैं। बहुत प्रकार से विलाप करते हुए बैठे-बैठे पूरी रात बीत जाती है। विश्वास मिल जाने से वियोग का दुःख तुरन्त समाप्त नहीं हुआ। रात उसी शोक और स्नेह में कटती है।

तब वामदेव और वसिष्ठ आते हैं। सब मन्त्री और महाजन बुलाये जाते हैं। वसिष्ठ परमार्थ के सुन्दर, समय के अनुकूल वचन कहकर भरत को अनेक प्रकार से समझाते हैं। रात में माता ने हृदय को सँभाला था; अब गुरु उस कार्य की ओर बुलाते हैं जिसका समय आ पहुँचा है। उनका उपदेश भरत की शोकमग्न अवस्था को पहचानते हुए आज के कर्तव्य तक पहुँचता है।

तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥ १६९॥

दोहा १६९

गुरु कहते हैं कि हृदय में धैर्य धरें और आज जिस काम का अवसर है, उसे करें। भरत गुरु के वचन सुनकर उठते हैं और सब तैयारी करने को कहते हैं। यह प्रसंग इसी आदेश पर पूरा होता है। पिता के अन्तिम संस्कार की तैयारी का समय आ गया है; संस्कार सम्पन्न होने का दृश्य अभी नहीं आया। पूरी रात बैठे रहने के बाद उठना यहाँ एक साफ़ घटना है, जिसके साथ शोक के बीच आवश्यक कार्य आरम्भ करने का संकल्प जुड़ता है।

कौसल्या भरत और राम का परस्पर प्रेम प्राणों से अधिक बताती हैं और सभी असम्भव उपमाओं के बाद भी भरत के रामविरोध को अस्वीकार करती हैं। स्नेह और विलाप में पूरी रात बीतती है। वामदेव तथा वसिष्ठ के आने पर गुरु धैर्य और समय का कार्य याद दिलाते हैं; भरत उठकर तैयारी का आदेश देते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस भेंट में अपने को दोषी मानने की भरत की तीव्रता और कौसल्या का उन पर विश्वास साथ पढ़ने योग्य हैं। वे अपने नाम पर हुए अनर्थ से इतने आहत हैं कि जन्म तक को अपराध कह देते हैं। माता उसी पुत्र को गोद में बैठाकर उसके आँसू पोंछती हैं। उनका विश्वास किसी घटना को झुठलाता नहीं। पिता चले गये हैं, राम वन में हैं और महल शोक से भरा है। इतने दुःख के बीच भी वे भरत के हृदय को पहचानती हैं।

मन्थरा को छुड़ाने का क्षण भी इसी प्रसंग में रहता है। भरत का अपना आक्रोश बहुत तीखा है, फिर भी शत्रुघ्न के हाथों होनेवाली हिंसा को वे रोकते हैं। और अन्त में गुरु की बात सुनकर उठते हैं। इन दो क्रियाओं के बीच माँ की गोद, राम की स्मृति और अपनी सम्मति से इनकार करनेवाली शपथ है। दुःख उन्हें भर देता है, किन्तु उसी दुःख के बीच दया और आवश्यक कार्य के लिये जगह भी बची रहती है।

कौसल्या का सबसे दृढ़ वचन यह है कि राम और भरत दोनों एक दूसरे को प्राणों से अधिक प्रिय हैं। भरत की लम्बी शपथ के बाद माता उन्हें उसी सम्बन्ध में लौटा देती हैं जिसे वे अपने जन्म के कारण खोया हुआ मान रहे हैं। रात फिर भी आँसुओं में बीतती है। सुबह के कार्य की तैयारी करते हुए यह प्रेम उनके साथ है, और पिता के लिये जो करना है उसकी ओर वे गुरु के कहने पर उठते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १६१ से १६९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English