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कौसल्या और सुनयना की भेंट, सीता की दृढ़ता

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · कौसल्या और सुनयना की भेंट, सीता की दृढ़ता

कौसल्या और सुनयना की भेंट, सीता की दृढ़ता

चित्रकूट में साथ रहने की सबकी इच्छा है। माताओं की बातचीत भरत की चिन्ता तक पहुँचती है, और जनक के हृदय में सीता का प्रेम एक अद्भुत रूप धरता है।

चित्रकूट में अयोध्या और मिथिला के लोग साथ हैं। दुःख में डूबी सभा को ऋषि समझा रहे हैं, पर दिन बीत रहा है और सबके शरीर को आहार भी चाहिये। राम की एक बात उस आवश्यकता की ओर ध्यान ले जाती है। उसके बाद वन की उदारता, साथ रहने के मनोरथ और रानियों की भेंट के बीच यह प्रसंग धीरे धीरे अपने सबसे व्याकुल प्रश्न तक पहुँचता है: राम से दूर रहकर भरत कैसे रहेंगे?

कौसल्या यह प्रश्न सुनयना के सामने रखती हैं। उससे पहले दोनों परिवारों की माताएँ अपने दुःख को समझने का प्रयत्न करती हैं। किसी को विधाता की कठोरता दिखती है, किसी को उसकी विचित्र चाल; कौसल्या कर्म और ईश्वर की आज्ञा का स्मरण करती हैं। इन अलग अलग बातों के भीतर एक ही परिवार की पीड़ा बोल रही है। अन्त में सीता माता के साथ अपने कुटुम्बियों से मिलने जाती हैं। जनक उन्हें हृदय से लगाते हैं, और तुलसी उस प्रेम का वर्णन समुद्र, प्रयाग, अक्षयवट और बालक के एक दूसरे में समाये हुए चित्र से करते हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • कौसल्या राम की माता, जिन्हें इस भेंट में भरत के गहरे प्रेम और उनके प्राणों की चिन्ता है।
  • सुनयना सीता की माता, जो कौसल्या की बात सुनती हैं, अपना भरोसा कहती हैं और सीता को साथ ले जाने की अनुमति माँगती हैं।
  • सुमित्रा रानियों के संवाद में विधाता की विचित्र गति का दुःख कहती हैं और फिर रात का समय याद दिलाती हैं।
  • जनक मिथिला के राजा, जो सबके आहार की बात कहते हैं और बाद में सीता को हृदय से लगाते हैं।
  • सीता अपने प्रिय कुटुम्बियों से मिलनेवाली जानकी, जो माता और पिता के प्रेम में विकल होकर फिर धैर्य धरती हैं।
  • राम और ऋषिगण राम सबके आहार की आवश्यकता याद दिलाते हैं। वसिष्ठ, शतानन्द और विश्वामित्र सहित ब्राह्मण समाज को समझाते हैं।

उपदेश के बीच, सबके आहार की बात

अयोध्या के ब्राह्मण और जनकपुर के ब्राह्मण सभा को समझाने लगते हैं। उनके साथ सूर्यवंश के गुरु वसिष्ठ और जनक के पुरोहित शतानन्द हैं। तुलसी इन गुरुओं का परिचय उनके ज्ञान से देते हैं: उन्होंने संसार के अभ्युदय का मार्ग भी परखा है और परमार्थ का मार्ग भी। इसलिये उनकी शिक्षा में धर्म, नीति, वैराग्य और विवेक साथ आते हैं। शोक से भरे समाज के सामने जीवन के व्यवहार और उसके गहरे अर्थ, दोनों की बातें कही जा रही हैं।

विश्वामित्र पुरानी कथाएँ कह कहकर सभा को समझाते हैं। उनकी सुन्दर वाणी और इतिहासों का उल्लेख मिलता है; इस समय कथा का ध्यान उन उपदेशों से सँभलते हुए समाज पर है। ऐसे में राम विश्वामित्र से कहते हैं कि कल सब लोग बिना जल पिये रह गये थे। बड़े दुःख के बीच यह स्मरण शरीर की उस आवश्यकता को सामने लाता है जो बीते दिन से उपेक्षित रह गयी है। पोद्दार की टीका इस कथन का आशय खोलती है कि अब कुछ आहार होना चाहिये।

तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥
मुनि कह उचित कहत रघुराई । गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥

चौपाई १

विश्वामित्र राम की बात को उचित बताते हैं। आज का दिन भी ढाई पहर बीत चुका है। कल बिना जल का रह जाना और आज ढाई पहर का निकल जाना, दोनों समय स्पष्ट हैं। उपदेश सुननेवाले लोगों को भोजन तक पहुँचाने की व्यवस्था अब आवश्यक है। राम का निवेदन उसी सभा में आता है जहाँ धर्म और विवेक की चर्चा हो रही थी; दूसरों के शरीर का ध्यान रखना भी उस चर्चा के बीच अपना स्थान पाता है।

ऋषि का रुख देखकर जनक कहते हैं कि यहाँ अन्न खाना उचित नहीं होगा। उनका कहा सबको अच्छा लगता है और लोग आज्ञा पाकर स्नान करने जाते हैं। जनक का निर्णय इसी स्थान और इस अवसर के आहार के विषय में है। आगे सबको फल, मूल और कन्द मिलनेवाले हैं। इस तरह भोजन की बात केवल प्रस्ताव बनकर नहीं रह जाती; स्नान की अनुमति के साथ उसका क्रम आरम्भ हो जाता है।

उसी अवसर पर वनवासी पहुँचते हैं। कोल और किरात लोग अनेक प्रकार के फल, फूल, पत्ते और मूल बहुत मात्रा में लाये हैं। बहँगियाँ और बोझ भरे हुए हैं। दोहा इन वस्तुओं की विविधता के साथ उन्हें भर भरकर लाने का परिश्रम भी दिखाता है। सभा में आहार की आवश्यकता कही गयी थी, और अब वन के लोग उस आवश्यकता को पूरा करने की सामग्री लिये उपस्थित हैं। चित्रकूट के इस आतिथ्य में उनके लाये हुए उपहारों की बड़ी जगह है।

ऋषि धर्म और विवेक का उपदेश देते हैं। राम कल के निर्जल दिन का स्मरण कराते हैं; आज ढाई पहर बीत चुके हैं। जनक यहाँ अन्न न खाने की बात कहते हैं, लोग स्नान को जाते हैं और वनवासी फल, फूल, पत्ते तथा मूल ले आते हैं।

मानो पृथ्वी जनक की अतिथि सेवा कर रही हो

तुलसी राम की कृपा से पर्वतों को मनचाही वस्तु देनेवाले बताते हैं। उन्हें देखते ही विषाद दूर होता है। तालाब, नदियाँ, वन और धरती के अलग अलग भाग मानो आनन्द और अनुराग से उमड़ रहे हैं। अभी समाज के लिये आहार जुटा था; अब पूरे स्थान में स्वागत का भाव फैल जाता है। दुःखी लोगों के चारों ओर ऐसा वन है जिसकी शोभा भी उन्हें सुख देती है और जिसकी उपज भी उनके काम आती है।

बेलें और वृक्ष फल फूल से भरे हैं। पक्षी, पशु और भौंरे अनुकूल बोल रहे हैं। वन का उत्साह बढ़ा हुआ है, और हवा सबको सुख देती है। हवा के तीन गुण टीका स्पष्ट करती है: वह शीतल है, मन्द है और सुगन्धित है। इस छोटे वर्णन में देखने, सुनने और हवा का सुख पाने की बातें एक साथ आती हैं। फल फूल केवल दूर की शोभा नहीं बने रहते; उन्हीं के बीच आगे लोगों के ठहरने और आहार करने की जगह बनती है।

जाइ न बरनि मनोहरताई । जनु महि करति जनक पहुनाई॥
तब सब लोग नहाइ नहाई । राम जनक मुनि आयसु पाई॥
देखि देखि तरुबर अनुरागे । जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥
दल फल मूल कंद बिधि नाना । पावन सुंदर सुधा समाना॥

चौपाई २

वन की मनोहरता पर कवि कहते हैं कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। फिर उसी मनोहरता को एक सम्बन्ध का नाम देते हैं: मानो पृथ्वी जनक की पहुनाई कर रही हो। जनक अतिथि हैं और धरती उनकी मेजबान। वनवासियों के उपहार, फले फूले पेड़, सुखद वायु और रहने की जगह, सब इस एक छवि में जुड़ जाते हैं। जिस भूमि पर इतना बड़ा समाज आया है, वह मानो स्वयं उसके स्वागत में अपनी सम्पदा खोल देती है।

जनकपुर के लोग स्नान करके राम, जनक और मुनि की आज्ञा लेते हैं। सुन्दर वृक्षों को देख देखकर अनुराग में भरते हैं और जहाँ तहाँ उनके नीचे उतरने लगते हैं। उनकी दृष्टि जिस पेड़ पर ठहरती है, उसके साथ रहने की जगह भी मिलती है। पत्ते, फल, मूल और कन्द अनेक प्रकार के हैं, पवित्र और सुन्दर हैं, स्वाद में अमृत के समान हैं। वन की सम्पन्नता का यह वर्णन अब सबके हिस्से पहुँचनेवाले आहार में बदलता है।

सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।
पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार॥ २७९॥

दोहा २७९

वसिष्ठ सबके पास आदर से बोझ भर भरकर सामग्री भेजते हैं। फिर पितरों, देवताओं, अतिथियों और गुरु का पूजन होता है; उसके बाद लोग फलाहार करते हैं। क्रम की यह पूरी कड़ी ध्यान में रखने योग्य है। सामग्री का आना, उसका सबके पास पहुँचना, पूजन और फिर भोजन, इन सबके बाद बीते दिन की आहारहीनता दूर होती है। गुरु के वितरण में सब सम्मिलित हैं, और लोगों के भोजन में अपने से जुड़े हुए पूज्य सम्बन्धों का स्मरण है।

राम की कृपा से वन आनन्द और उपज से भरा है। स्नान और अनुमति के बाद लोग वृक्षों के नीचे ठहरते हैं। वसिष्ठ सबको सामग्री भेजते हैं; पितर, देवता, अतिथि और गुरु के पूजन के बाद फलाहार होता है।

चार दिन, और चौदह वर्षों का मनोरथ

इसी प्रकार चार दिन बीत जाते हैं। राम को देखकर नर और नारी सुखी हैं। अयोध्या और मिथिला, दोनों समाजों के मन में एक इच्छा उठ रही है: सीता और राम के बिना लौटना अच्छा नहीं। यहाँ आकर मिलने का आनन्द उन्हें लौटने की बात से विमुख कर देता है। वन अब वह स्थान है जहाँ उनके प्रिय हैं; घर की आकर्षण शक्ति उसी के सामने छोटी पड़ने लगती है।

लोग कहते हैं कि सीताराम के साथ वन में रहना करोड़ों देवलोकों के निवास जैसा सुखद है। लक्ष्मण, राम और जानकी को छोड़कर जिसे घर अच्छा लगे, उसके प्रति विधाता प्रतिकूल है। और जब दैव सबके अनुकूल हो, तभी राम के पास वन में रहने का सौभाग्य मिल सकता है। उनके कथन में प्रतिकूल और अनुकूल भाग्य की कसौटी यही सान्निध्य है। घर और वन का मूल्य प्रियजनों के साथ से तय हो रहा है।

दाहिन दइउ होइ जब सबही । राम समीप बसिअ बन तबही॥
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला॥

चौपाई ३

इस इच्छा का अपना पूरा दिन है। तीनों समय मन्दाकिनी में स्नान हो; फिर राम का दर्शन मिले, जिसमें आनन्द और मंगल का समूह है। राम के पर्वत, जिसे टीका कामदनाथ कहती है, उसके आसपास घूमना हो, वन में जाना हो और तपस्वियों के स्थानों को देखना हो। भोजन के लिये अमृत जैसे कन्द, मूल और फल हों। समाज एक अस्पष्ट सुख की बात नहीं कर रहा; स्नान, दर्शन, भ्रमण और आहार, सभी को उस साथ रहने के जीवन में रख रहा है।

तब चौदह वर्ष भी सुख से एक पल के समान बीत जायँगे, जाते हुए उनका पता तक न चलेगा। अभी बीते हैं चार दिन; चौदह वर्ष लोगों के मनोरथ में हैं। प्रियजनों का साथ मिल जाय तो वनवास की लम्बी अवधि कैसी लगेगी, वे उसी की कल्पना कर रहे हैं। इस इच्छा में वर्षों का दुःख हलका करनेवाली वस्तु सीताराम का सान्निध्य है। उनके बिना लौटने की कठिनाई ने साथ रहकर बिताये जा सकनेवाले दिन का इतना पूरा चित्र बना दिया है।

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥ २८०॥

दोहा २८०

पर इस सुख की बात करते ही लोग अपनी पात्रता पर संकोच करते हैं। कहते हैं, हम इस योग्य कहाँ, हमारे ऐसे भाग्य कहाँ! इच्छा बहुत बड़ी है, उसे अपना अधिकार कहने का आग्रह उनके वचनों में नहीं है। तुलसी दोनों समाजों के राम चरणों में सहज स्वाभाविक प्रेम को सामने रखते हैं। उन्हीं प्रेम भरी बातों को सुनकर सुननेवालों के मन भी हर लिये जाते हैं। मनोरथ बोलनेवालों तक सीमित नहीं रहता, सुननेवालों को भी अपने में ले लेता है।

चार दिन साथ बीतने पर दोनों समाज सीताराम को छोड़कर लौटना नहीं चाहते। वे स्नान, दर्शन, वन भ्रमण और फलाहार के साथ चौदह वर्ष पल समान बीतने का मनोरथ करते हैं, फिर अपने को उस सुख के अयोग्य मानकर संकोच भी करते हैं।

माताओं की भेंट और विधाता से शिकायत

इन्हीं प्रेम भरे मनोरथों के बीच सुनयना की भेजी हुई दासियाँ लौटती हैं। वे कौसल्या आदि से मिलने का सुन्दर अवसर देखकर आयी हैं। उनसे मालूम होता है कि सीता की सब सासुएँ इस समय अवकाश में हैं। तब जनक का रनिवास मिलने आता है। भेंट का यह आरम्भ दूसरे पक्ष की सुविधा जानने से होता है। कौसल्या आदर से अतिथियों का सम्मान करती हैं और समय के अनुकूल आसन लाकर देती हैं।

दोनों ओर ऐसा शील और ऐसा प्रेम है कि उसे देख सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाय। रानियों के शरीर पुलकित हैं, फिर भी शिथिल हैं; आँखों में आँसू हैं। वे पैरों के नखों से धरती कुरेदती हुई सोच रही हैं। तुलसी के इस दृश्य में शरीर की ये छोटी छोटी क्रियाएँ बहुत कुछ कह देती हैं। सम्मान का व्यवहार पूरा हो चुका है, किन्तु बात करनेवाले हृदय अभी दुःख और प्रेम के आवेग में हैं।

कवि सबको सीताराम के प्रेम की मूर्तियों के समान देखते हैं। मानो करुणा ही अनेक रूप धरकर दुःख कर रही हो। किसी एक का शोक अलग करके दिखाना कठिन है; सीता के मायके और ससुराल की माताएँ एक दूसरे के सामने हैं और करुणा सबमें प्रकट है। फिर सुनयना बोलती हैं। उनकी पहली बात विधाता की बुद्धि पर है, जो उन्हें बड़ी टेढ़ी लगती है।

वे कहती हैं कि विधाता दूध के फेन को वज्र की टाँकी से फोड़ रहा है। टाँकी की कठोरता और दूध के फेन की कोमलता को साथ रखकर वे विपत्ति की असहनीयता कहती हैं। पोद्दार की टीका इस अर्थ को स्पष्ट करती है: जो अत्यन्त कोमल और निर्दोष हैं, उन्हीं पर विपत्ति के ऊपर विपत्ति पड़ रही है। इस शिकायत में दुर्बल को बचाने की आकांक्षा है; प्रहार और उसे सहनेवाले के बीच की दूरी ही इस उपमा को इतना पीड़ादायक बनाती है।

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल॥ २८१॥

दोहा २८१

सुनयना की बात आगे बढ़ती है। अमृत के विषय में केवल सुनते हैं, विष जहाँ तहाँ दिखाई देता है; विधाता की सब करतूतें भयावनी जान पड़ती हैं। कौए, उल्लू और बगुले हर ओर हैं, हंस तो एक मानसरोवर में मिलता है। अमृत और हंस की दुर्लभता, विष और दूसरे पक्षियों की सर्वत्र उपस्थिति, उनके कथन की दोनों जोड़ियाँ हैं। उन्हें संसार में कठोर वस्तु सहज मिलती हुई और कोमल कल्याणकारी वस्तु दुर्लभ दिखाई दे रही है।

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा॥
जो सृजि पालइ हरइ बहोरी । बालकेलि सम बिधि मति भोरी॥

चौपाई ४

देवी सुमित्रा यह सुनकर शोक के साथ विधाता की चाल को विपरीत और विचित्र कहती हैं। वह सृष्टि को रचता है, पालता है और फिर हर लेता है। उनकी उपमा बालकों के खेल की है: जैसे खेल में बनाने और मिटानेवाले को उसके परिणाम का विवेक न हो। सुनयना को प्रहार की निष्ठुरता चुभ रही थी; सुमित्रा सृजन और पालन के बाद होनेवाले विनाश का दुःख कहती हैं। दोनों अपनी पीड़ा से विधाता के व्यवहार को देख रही हैं।

सम्मानपूर्वक भेंट के बाद रानियों का शोक खुलता है। सुनयना कोमल फेन पर कठोर टाँकी की उपमा से विधाता की निष्ठुरता कहती हैं; सुमित्रा रचने, पालने और फिर मिटाने की गति को बालकों के खेल जैसा विचित्र बताती हैं।

कौसल्या की बात भरत तक पहुँचती है

कौसल्या इस चर्चा में किसी पर दोष रखने से आरम्भ ही नहीं करतीं। उनका कथन है कि दुःख और सुख, हानि और लाभ, सब कर्म के अधीन हैं। कर्म की गति कठिन है; शुभ और अशुभ सभी फलों का देनेवाला विधाता ही उसे जानता है। यह उत्तर सुनयना और सुमित्रा की बातों के बाद आता है। वही दुःख सबके सामने है, और कौसल्या उसे कर्म की दुर्विज्ञेय गति में रखकर समझती हैं।

कौसल्या कह दोसु न काहू । करम बिबस दुख सुख छति लाहू॥
कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता॥

चौपाई ५

वे आगे कहती हैं कि ईश्वर की आज्ञा सभी के सिर पर है। उत्पत्ति, पालन और संहार उसके अधीन हैं; अमृत और विष भी उसी आज्ञा में आते हैं। सुनयना ने अमृत और विष की विषमता कही थी, सुमित्रा ने सृष्टि के रचने और मिटने का आश्चर्य। कौसल्या उन दोनों बातों को अपने उत्तर में समेट लेती हैं। जो विरोध और कठोरता अनुभव में आ रही है, वह भी उनकी दृष्टि में ईश्वर की आज्ञा से बाहर नहीं।

देवी को सम्बोधित करके वे कहती हैं कि मोहवश चिन्ता करना व्यर्थ है। विधाता का यह प्रपंच ऐसा ही अचल और अनादि है। अपने कथन में वे शोक की जड़ भी टटोलती हैं। महाराज के जीने और मरने की बात हृदय में लाकर हम जो सोचते हैं, वह अपने ही हित की हानि देखकर सोचते हैं। दशरथ का वियोग उनके लिये अपने कल्याण और सहारे का खोना है। अपने दुःख को देखते हुए वे उसके भीतर लगी हुई अपनी इच्छा को भी स्वीकार करती हैं।

सुनयना इस वाणी को उत्तम और सत्य कहती हैं। वे कौसल्या को पुण्यात्माओं की सीमा दशरथ की रानी कहकर सम्मान देती हैं। पहले सुनयना ने अपनी शिकायत पूरी कही थी; अब वे दूसरी ओर से आये उत्तर का मान करती हैं। इस भेंट में सुनना भी बोलने जितना स्पष्ट है। कौसल्या के दुःख को केवल उनके विचारों से नहीं मापा जा सकता, क्योंकि वे बात को सँभालते हुए भी दुःखभरे हृदय से ही कह रही हैं।

लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु॥ २८२॥

दोहा २८२

तभी उनकी चिन्ता का सबसे निजी स्थान खुलता है। राम, लक्ष्मण और सीता वन जायँ, इसका परिणाम अच्छा होगा, बुरा नहीं, यह उनका विश्वास है। पर भरत की चिन्ता उन्हें व्याकुल करती है। अभी तक कर्म, ईश्वर और शोक की बात हो रही थी; अब उसी चर्चा में एक पुत्र का नाम आ जाता है। आगे वे बताएँगी कि भरत के स्वभाव को जाननेवाली माता को उनका दूर रहना क्यों भयावना लगता है।

इस दोहे में कौसल्या का आश्वासन और उनका भय साथ हैं। वन जानेवालों के विषय में वे अच्छे परिणाम की आशा रखती हैं, और भरत के मन की दशा उन्हें असुरक्षित लगती है। उनका प्रश्न केवल वन के कष्ट का नहीं रह जाता। जिस पुत्र का प्रेम भीतर बहुत गहरा है, उसके लिये वियोग का भार कितना होगा, यह सोच अब संवाद को आगे ले जाती है।

कौसल्या सुख दुःख को कर्म और ईश्वर की आज्ञा के अधीन मानती हैं। अपने शोक में निजी हित की हानि भी पहचानती हैं। राम, लक्ष्मण और सीता के वनवास का अच्छा परिणाम मानते हुए वे भरत की चिन्ता प्रकट करती हैं।

राम की सौगन्ध और भरत के आठ गुण

कौसल्या पहले अपने परिवार की पवित्रता कहती हैं। ईश्वर के अनुग्रह और सुनयना के आशीर्वाद से उनके पुत्र और पुत्रवधुएँ गंगा के जल के समान हैं। पोद्दार की टीका स्पष्ट करती है कि यहाँ चारों पुत्र और चारों बहुएँ सम्मिलित हैं। भरत के विषय में विशेष बात कहने से पहले कौसल्या पूरे परिवार को इस निर्मल उपमा में रखती हैं। उनके स्नेह का यह विस्तार सुन लेने पर आगे भरत की बड़ाई का भाव और ठीक समझ में आता है।

फिर वे सखी से कहती हैं कि उन्होंने कभी राम की सौगन्ध नहीं की। आज वही सौगन्ध करके सत्य भाव से कह रही हैं। जिस नाम की शपथ अब तक नहीं ली गयी, उसे आज लेना उनके कथन का भार बढ़ाता है। शोक और स्नेह से भरी इस भेंट में वे भरत के विषय में अपनी बात की सच्चाई का भरोसा देना चाहती हैं। राम का नाम यहाँ भरत के चरित्र की गवाही के साथ आता है।

भरत सील गुन बिनय बड़ाई । भायप भगति भरोस भलाई॥
कहत सारदहु कर मति हीचे । सागर सीप कि जाहिं उलीचे॥

चौपाई ६

भरत के आठ गुण गिनाये जाते हैं: शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसा और भलाई। शील से उनके व्यवहार का सौन्दर्य सामने आता है, भाईपन से उनका पारिवारिक सम्बन्ध, भक्ति और भरोसे से प्रेम की दृढ़ता। सभी को कह चुकने का दावा कौसल्या स्वयं नहीं करतीं। वे कहती हैं कि इनका वर्णन करने में सरस्वती की बुद्धि भी हिचकती है। इतने गुणों को वाणी में भरने का प्रयत्न सीप से समुद्र उलीचने जैसा है।

सीप और समुद्र की यह उपमा वर्णन की सीमा दिखाती है। गुणों का समुद्र सामने है, उसे कहने का साधन छोटा पड़ रहा है। आठ नामों की स्पष्ट गिनती के बाद भी कौसल्या को लगता है कि भरत का पूरा स्वभाव कहा नहीं जा सकता। इसी के साथ वे अपना पुराना विश्वास रखती हैं: वे भरत को सदा कुल का दीपक जानती रही हैं। महाराज दशरथ भी उनसे बार बार यही कहते थे। आज की चिन्ता के पीछे बहुत पहले से पहचाना हुआ चरित्र है।

फिर परख की तीन बातें आती हैं। सोना कसौटी पर कसे जाने से पहचाना जाता है; रत्न को जानने के लिये पारखी चाहिये। मनुष्य की परीक्षा समय आने पर उसके स्वभाव और आचरण से हो जाती है। सोने का कसना, रत्न का पारखी को मिलना और व्यक्ति के सामने परिस्थिति का आना, इन तीनों में भीतर का मूल्य प्रकट होता है। कौसल्या भरत को जानने की बात कहकर उसकी कसौटी भी बता देती हैं: समय पड़ने पर उनका आचरण देखा जा सकता है।

इतनी दृढ़ गवाही के बाद भी वे अपने कहने पर संकोच करती हैं। आज इस तरह बोलना उन्हें अनुचित लगता है, क्योंकि शोक और स्नेह में विवेक कम हो जाता है। टीका उनके संकोच का आशय बताती है कि लोग इसे स्नेहवश की गयी बड़ाई समझ सकते हैं। वे भरत के गुणों पर विश्वास रखती हैं और अपने दुःखी, स्नेही मन की सीमा भी पहचानती हैं। सुननेवाली रानियों पर उनकी गंगा जैसी पवित्र वाणी का प्रभाव पड़ता है; सब प्रेम से विकल हो जाती हैं।

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि॥ २८३॥

दोहा २८३

कौसल्या फिर धीरज धरती हैं और मिथिलेश्वरी को सम्बोधित करती हैं। विवेक के भण्डार जनक की प्रिया को कौन उपदेश दे सकता है, वे पूछती हैं। आगे की बात इसी आदर से कही जानेवाली है। अभी वे कोई निर्णय सुना नहीं रही हैं। वे सुनयना के विवेक और जनक के ज्ञान का मान रखते हुए उनके सामने अपने मन की चिन्ता से उपजा एक विचार रखने जा रही हैं।

चारों पुत्रों और चारों बहुओं की पवित्रता कहकर कौसल्या पहली बार राम की सौगन्ध लेती हैं। वे भरत के आठ गुण, दशरथ की पुरानी प्रशंसा और समय पर आचरण की परीक्षा बताती हैं, फिर विनय से सुनयना के सामने अपनी बात रखती हैं।

भरत की चिन्ता से उपजा एक प्रस्ताव

कौसल्या सुनयना से निवेदन करती हैं कि अवसर पाकर राजा से अपनी ओर से समझाकर कहें। उनका विचार है कि लक्ष्मण को घर रखा जाय और भरत वन जायँ। इसी के साथ वे शर्त कहती हैं: यदि यह मत राजा के मन को उचित लगे। पहले सुनयना से कहना है, फिर जनक को उसका औचित्य देखना है। कौसल्या की चिन्ता गहरी है, फिर भी उनके निवेदन में दूसरे के विवेक को निर्णय का स्थान मिला हुआ है।

रानि राय सन अवसरु पाई । अपनी भाँति कहब समुझाई॥
रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन । जौं यह मत मानै महीप मन॥

चौपाई ७

यदि जनक को बात ठीक लगे, तो खूब विचारकर उसके लिये यत्न करें। कौसल्या भरत के विषय में अपने भारी सोच का कारण कहती हैं। उनके मन में गूढ़ प्रेम है; उनका घर रहना कौसल्या को भला नहीं लगता। पोद्दार की टीका इस आशंका को प्राणों के भय तक खोलती है। जिस पुत्र का प्रेम भीतर इतना गहरा है, राम से दूर रहने पर उसकी क्या दशा होगी, माता उसी से भयभीत हैं।

अभी कही गयी भरत की प्रशंसा अब इस निवेदन का कारण बन जाती है। भाईपन, भक्ति और भरोसा गिनाते समय कौसल्या उनके मन का परिचय दे रही थीं; अब उसी मन के वियोग का विचार कर रही हैं। वन में भरत को भेजने की उनकी इच्छा उनके प्रेम को समझने से उठी है। इस समय प्रस्ताव ही रखा गया है। उसके साथ लगा जनक की सम्मति का आग्रह बना रहता है, और किसी भाई के स्थान बदलने की घटना अभी नहीं होती।

कौसल्या का स्वभाव और उनकी सरल, उत्तम वाणी सुनकर रानियाँ करुण रस में मग्न हो जाती हैं। आकाश से फूल बरसते हैं और धन्य धन्य की ध्वनि होती है। सिद्ध, योगी और मुनि भी प्रेम से शिथिल हो जाते हैं। तुलसी माताओं के इस संवाद का प्रभाव रनिवास से आगे तक दिखाते हैं। भरत के प्राणों की चिन्ता कहनेवाली माता की सहज बात सुनकर साधना और धैर्य में प्रतिष्ठित लोगों का शरीर भी प्रेम से ढीला पड़ जाता है।

सारा रनिवास निस्तब्ध रह जाता है। तब सुमित्रा धीरज धरकर समय याद दिलाती हैं: दो घड़ी रात बीत गयी है। इससे पहले दिन का समय आहार के प्रसंग में आया था; अब भेंट के बीच रात की दो घड़ियाँ बीतने का पता चलता है। यह सुनकर कौसल्या प्रेमपूर्वक उठती हैं। उनका उठना बात को विदा की ओर ले जाता है, यद्यपि अभी सुनयना का उत्तर शेष है।

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।
हमरें तौ अब ईस गति कै मिथिलेस सहाय॥ २८४॥

दोहा २८४

कौसल्या प्रेम और सद्भाव से कहती हैं कि अब आप शीघ्र अपने डेरे को पधारें। हमारे लिये अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर सहायक हैं। जिन जनक के विवेक पर उन्होंने अपने प्रस्ताव को छोड़ा था, उन्हीं का सहारा विदा के इन वचनों में भी आता है। अपने मन की चिन्ता सामने रखने के बाद वे अतिथियों के लौटने का ध्यान करती हैं। व्याकुलता के भीतर उनका आदर और विनय निरन्तर बना हुआ है।

कौसल्या जनक की सम्मति होने पर लक्ष्मण को घर और भरत को वन भेजने का विचार रखती हैं। भरत के गहरे प्रेम से उन्हें उनके प्राणों की चिन्ता है। दो घड़ी रात बीतने पर कौसल्या उठकर अतिथियों से डेरे को लौटने का निवेदन करती हैं।

सुनयना का उत्तर और सीता के लिये अनुमति

कौसल्या का स्नेह देखकर और उनके विनीत वचन सुनकर सुनयना उनके पवित्र चरण पकड़ लेती हैं। वे कहती हैं कि आप दशरथ की रानी और राम की माता हैं; ऐसा विनय आपके लिये उचित है। कौसल्या ने अपने लिये सहायता का उल्लेख किया था। सुनयना उत्तर में उनके पद और सम्बन्ध की महिमा याद करती हैं। उनका आदर उन्हें बड़ा मानकर उनके चरणों तक ले आता है।

प्रभु अपने नीचहु आदरहीं । अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं॥
सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी॥

चौपाई ८

सुनयना की उपमाएँ ऊँचे का आश्रित को आदर देना दिखाती हैं। वे कहती हैं कि प्रभु अपने छोटे जनों का भी सम्मान करते हैं, जैसे अग्नि धुएँ को और पर्वत घास को अपने सिर पर धारण करते हैं। इस कथन में अपने पक्ष को छोटा मानने की उनकी विनम्रता बोलती है। धुएँ और तृण को ऊपर स्थान देनेवाली अग्नि और पर्वत की छवि से वे कौसल्या के सम्मान का उत्तर देती हैं।

फिर वे जनक का सम्बन्ध स्पष्ट करती हैं: हमारे राजा तो कर्म, मन और वाणी से आपके सेवक हैं। सदा के सहायक महादेव और भवानी हैं। तीनों प्रकार की सेवा को कहने के बाद भी वे असली आश्रय के रूप में शिव और पार्वती का नाम रखती हैं। कौसल्या ने ईश्वर की गति और मिथिलेश की सहायता कही थी; सुनयना उसी विनय का उत्तर अपने राजा को सेवक कहकर देती हैं।

वे पूछती हैं कि जगत में कौन आपके सहायक होने योग्य है। दीपक सूर्य की सहायता करने जाय तो क्या शोभा पायेगा? इस उपमा में भी अपने बल का छोटापन स्वीकार है। सूर्य के सामने दीपक रखने से कौसल्या के प्रति उनका आदर स्पष्ट होता है। उसके बाद वे राम के भविष्य के विषय में भरोसा कहती हैं: राम वन जाकर देवताओं का कार्य करेंगे और अयोध्या में अचल राज्य करेंगे।

यह भरोसा आगे देवताओं, नागों और मनुष्यों तक फैलता है। सब राम की भुजाओं के बल पर अपने अपने स्थानों में सुख से बसेंगे। सुनयना बताती हैं कि यह सब याज्ञवल्क्य मुनि पहले ही कह चुके हैं, और मुनि की वाणी व्यर्थ नहीं हो सकती। उनका कथन एक पूर्व कही गयी भविष्यवाणी का स्मरण है। अभी देवकार्य और अयोध्या का वह राज्य भविष्य में हैं; सुनयना दुःखी माता को उसी आश्वासन की ओर ले जा रही हैं।

इस उत्तर का विस्तार कौसल्या की चिन्ता को सम्मानपूर्वक ग्रहण करता है। पहले उनकी नम्रता का मान है, फिर जनक की सेवा का कथन, शिव और पार्वती का आश्रय, और अन्त में याज्ञवल्क्य की वाणी पर विश्वास। सुनयना अपनी ओर से लक्ष्मण और भरत के स्थान बदलने का निर्णय नहीं सुनातीं। वे राम के विषय में अपना भरोसा कह चुकने के बाद सीता के लिये एक विनती करती हैं।

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ॥ २८५॥

दोहा २८५

बड़े प्रेम से चरणों में पड़कर वे सीता को साथ भेजने का निवेदन करती हैं। सुन्दर आज्ञा मिलती है, और तब सीता की माता सीता सहित डेरे को चलती हैं। भेंट का आरम्भ कौसल्या के अवकाश का समाचार पाकर हुआ था; विदा में भी अनुमति का वही आदर है। अब सीता अपने प्रिय कुटुम्बियों से मिलेंगी। माताओं की बातचीत से कथा उनके उस मिलन की ओर बढ़ती है जिसमें जनक का वात्सल्य प्रकट होनेवाला है।

सुनयना कौसल्या का आदर करती हैं, जनक की सेवा और शिव पार्वती का आश्रय कहती हैं। याज्ञवल्क्य की पूर्ववाणी से राम के भविष्य का भरोसा दिलाकर वे सीता को साथ ले जाने की अनुमति माँगती हैं और अनुमति पाकर चलती हैं।

जनक के हृदय में समुद्र और अक्षयवट

वैदेही अपने प्यारे परिजनों से मिलती हैं। जो जिस योग्य है, उससे उसी प्रकार भेंट करती हैं। उनके तपस्विनी के वेष को देखकर सभी शोक से बहुत व्याकुल हो जाते हैं। मिलने का सुख सीता की वेशभूषा देखते ही उनके वनजीवन के दुःख से भर उठता है। सम्बन्ध के अनुसार मिलने की रीति बनी हुई है, और उसे निभाते हुए हर ओर जानकी के प्रति प्रेम जागता है।

जनक राम के गुरु वसिष्ठ की आज्ञा लेकर डेरे को लौटते हैं। वहाँ सीता को देखते हैं और हृदय से लगा लेते हैं। तुलसी जानकी को उनके पवित्र प्रेम और प्राणों की पाहुनी कहते हैं। इस सम्बोधन में बेटी का आगमन पिता के अन्तरतम में अतिथि के आगमन जैसा हो जाता है। अब कवि का वर्णन बाहरी मिलन से जनक के भीतर उमड़ते हुए भाव की ओर जाता है।

उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू । भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू॥
सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा । ता पर राम पेम सिसु सोहा॥

चौपाई ९

जनक के हृदय में अनुराग का समुद्र उमड़ पड़ता है। पोद्दार की टीका इसे वात्सल्य का प्रेम बताती है। उनका मन मानो प्रयाग हो गया है। उसी समुद्र में सीता के अलौकिक स्नेह का अक्षयवट बढ़ता हुआ दिखाई देता है। टीका सीता को आदिशक्ति मानकर इस स्नेह का अर्थ खोलती है। पिता के हृदय का प्रेम, मन का तीर्थ और उसमें बढ़ता हुआ सीता का स्नेह, ये चित्र एक दूसरे के भीतर रखे गये हैं।

उस अक्षयवट पर राम के प्रेम का बालक शोभित है। अब तक समुद्र, प्रयाग और वट आये थे; बालक के आने से उस पूरे दृश्य में सहारे का स्थान बनता है। टीका इस बालक को रामप्रेमरूपी बालरूपधारी भगवान् कहती है। सीता को हृदय से लगाये हुए जनक के भीतर राम का प्रेम भी उपस्थित है। इसी बालक का सहारा अगले चरण में उनके ज्ञान को मिलनेवाला है।

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु । बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु॥
मोह मगन मति नहिं बिदेह की । महिमा सिय रघुबर सनेह की॥

चौपाई १०

जनक का ज्ञान चिरंजीवी मुनि के समान व्याकुल है। पोद्दार की टीका उस मुनि को मार्कण्डेय के रूप में पहचानती है। वह डूबते डूबते रामप्रेमरूपी बालक का अवलम्ब पाकर बच जाता है। पूरे चित्र का सम्बन्ध ध्यान में रखिये: उमड़ता समुद्र पिता का वात्सल्य है, प्रयाग उनका मन है, अक्षयवट सीता का अलौकिक स्नेह है, उस पर बालक राम का प्रेम है, और डूबने से सँभलता मुनि जनक का ज्ञान है।

तुलसी तुरन्त स्पष्ट करते हैं कि विदेह की बुद्धि मोह में मग्न नहीं है। यह सीता और रघुवर के प्रेम की महिमा है। इतने बड़े ज्ञानी का विकल होना अज्ञान का प्रमाण मान लेने से चित्र का आशय बदल जायगा। कवि उस भूल को वहीं रोकते हैं। जनक के ज्ञान को भी जिस प्रेम ने व्याकुल कर दिया है, उसी के भीतर रामप्रेम का अवलम्ब मिलता है। इस प्रकार पिता का आलिंगन दिव्य प्रेम की महिमा तक पहुँचता है।

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।
धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि॥ २८६॥

दोहा २८६

माता और पिता के प्रेम से सीता भी इतनी व्याकुल हो जाती हैं कि अपने को सँभाल नहीं पातीं। फिर पृथ्वी की कन्या समय और उचित धर्म का विचार करके धैर्य धरती हैं। अन्तिम दोहे का यह पूरा क्रम है: प्रेम का आवेग, अपने को न सँभाल पाना, फिर समय और धर्म पर विचार, और साहस का लौटना। इसी धैर्य पर यह प्रसंग ठहरता है। माता और पिता का प्रेम अपनी जगह बना है, और सीता उस प्रेम के बीच अपने को सँभाल लेती हैं।

सीता को तपस्विनी के वेष में देखकर परिजन दुःखी होते हैं। जनक उन्हें हृदय से लगाते हैं; उनके भीतर सीता और राम के प्रेम का पूरा रूपक प्रकट होता है। माता पिता के स्नेह में विकल सीता समय और धर्म का विचार करके धैर्य धारण करती हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इन भेंटों में हम दूसरे का दुःख सुनने के कई ढंग देखते हैं। राम कल बिना जल रहे लोगों की आवश्यकता याद रखते हैं। कौसल्या भरत के स्वभाव को पहचानकर उनके वियोग की चिन्ता करती हैं। सुनयना उस चिन्ता के सामने आदर और विश्वास रखती हैं। किसी की आवश्यकता शरीर में है, किसी की पीड़ा उसके गहरे प्रेम में। हर बार ध्यान उसी व्यक्ति की दशा पर जाता है जिसके लिये कुछ कहना या करना आवश्यक है।

कौसल्या का प्रस्ताव भी इसी ध्यान से उपजता है। उन्हें भरत का गूढ़ प्रेम मालूम है, इसलिये उनके घर रहने में भय दिखाई देता है। फिर भी वे सुनयना से अवसर देखकर कहने और जनक को उचित लगने पर ही विचार करने की प्रार्थना करती हैं। अपने दुःख को स्पष्ट कहना और दूसरे के विवेक के लिये स्थान रखना, दोनों उनके एक ही निवेदन में निभते हैं।

जनक और सीता के मिलन में प्रेम तथा धैर्य का सम्बन्ध और कोमल रूप लेता है। जनक के ज्ञान को प्रेम का सहारा मिलता है; सीता प्रेम से विकल होकर समय और धर्म के विचार से सँभलती हैं। भावों की तीव्रता को तुलसी पूरा स्थान देते हैं। उसी के बीच सँभलने का क्षण भी दिखाते हैं, ताकि हम अन्तिम दोहे में सीता के धैर्य का अर्थ उनके अभी अभी अनुभव किये गये प्रेम के साथ समझ सकें।

इस प्रसंग के अन्त में सीता का धैर्य सामने रह जाता है। कौसल्या की आज्ञा पाकर वे अपनी माता के साथ चली थीं। फिर परिजनों से मिलीं और जनक ने उन्हें हृदय से लगाया। इन सभी सम्बन्धों के प्रेम से भरकर वे विकल हुई हैं, और उसी घड़ी समय तथा धर्म का विचार करके साहस धरती हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २७८ से २८६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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