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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 22
चित्रकूट की यात्रा और गुह से भेंट
सबेरे चलने के निश्चय के बाद अयोध्या चित्रकूट की ओर चल पड़ती है। गंगा के निकट सेना का समाचार सुनकर गुह भरत पर संदेह करते हैं, और एक बुज़ुर्ग शकुन विचारकर भरत से मिल लेने को कहते हैं।
अयोध्या में सबेरे चलने का निश्चय होते ही घरों में तैयारी होने लगती है। जिसे रखवाली के लिये रुकने को कहा जाता है, उसे लगता है मानो उसकी गर्दन मार दी गयी। भरत घर जाकर विचार करते हैं कि नगर, घोड़े, हाथी, महल और खजाना, सारी सम्पत्ति राम की है। उसकी रक्षा का प्रबन्ध किये बिना चल देने में उनकी भलाई नहीं।
समाज शृंगवेरपुर के निकट पहुँचता है, और गुह सेना साथ आने का समाचार सुनकर भरत के उद्देश्य पर सन्देह करते हैं। वे नावें डुबाने और घाट रोकने को कहते हैं, और युद्ध की तैयारी करते हैं। फिर एक बुज़ुर्ग शकुन विचारकर भरत से मिल लेने को कहते हैं। गुह भेंट लेकर मिलने जाते हैं, और राम का सखा सुनकर भरत रथ से उतरते हैं और उन्हें छाती से लगा लेते हैं।
चलता समाज और सशंक निषाद
- भरत नगर और सारी सम्पत्ति को राम की मानकर उसकी रक्षा का प्रबन्ध करते हैं, और फिर भाई के साथ चित्रकूट की ओर चलते हैं।
- शत्रुघ्न भरत के साथ सबसे अन्त में प्रस्थान करते हैं, उनके साथ पैदल चलते हैं और फिर रथ पर चढ़ते हैं।
- कौसल्या माता, जो भरत के पास जाकर उन्हें रथ पर चढ़ने को कहती हैं। वे कहती हैं कि सब लोग शोक से दुबले हैं और पैदल राह के योग्य नहीं।
- वसिष्ठ और अरुन्धती अरुन्धती और अग्नि की सामग्री के साथ वसिष्ठ रथ पर सबसे आगे चलते हैं। गुह के प्रणाम पर वसिष्ठ उन्हें आशीर्वाद देते हैं और भरत को बताते हैं कि ये राम के सखा हैं।
- गुह निषादों के राजा और राम के सखा, जो भरत के आने को संकट समझकर युद्ध की तैयारी करते हैं और फिर मिलने जाते हैं।
- एक बुज़ुर्ग शकुन विचारकर भरत से मिल लेने को कहते हैं, और कहते हैं कि लड़ाई नहीं होगी।
सबेरे चलना है
निर्णय सुनकर सबके मन में बहुत आनन्द होता है, मानो मेघ की गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। पोद्दार की टीका बताती है कि चलना दूसरे दिन प्रातःकाल है। इस सुन्दर निर्णय से भरत सबको प्राणों के समान प्रिय हो जाते हैं।
लोग मुनि वसिष्ठ की वन्दना करके, भरत को सिर नवाकर और विदा लेकर अपने घर चलते हैं। वे भरत के जीवन को जगत् में धन्य कहते हैं और जाते हुए उनके शील और स्नेह की सराहना करते हैं। वे आपस में कहते हैं कि बड़ा काम हुआ, और सब चलने की तैयारी करने लगते हैं।
जिसे घर की रखवाली के लिये रुकने को कहा जाता है, वह समझता है मानो उसकी गर्दन मार दी गयी। कुछ लोग कहते हैं कि किसी को रहने के लिये मत कहिये। जगत् में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता?
वे कहते हैं कि वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता और भाई जल जायें, जो राम के चरणों के सम्मुख होने में हँसते हुए सहायता न करें।
पीछे रह जानेवाली सम्पत्ति का धर्म
घर घर तरह तरह की सवारियाँ सज रही हैं, और सबके मन में हर्ष है कि सबेरे चलना है। भरत घर जाकर विचार करते हैं कि नगर, घोड़े, हाथी, महल और खजाना, सारी सम्पत्ति राम की है। उसकी रक्षा की व्यवस्था किये बिना उसे छोड़कर चल देने में अन्त में उनकी भलाई नहीं। स्वामी से द्रोह पापों का शिरोमणि है।
वे सोचते हैं कि सेवक वही है जो स्वामी का हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। ऐसा विचारकर वे ऐसे शुचि सेवकों को बुलाते हैं जो स्वप्न में भी अपने धर्म से नहीं डिगे।
भरत उन्हें सारा भेद बताकर भला धर्म कहते हैं, और जो जिस काम के योग्य है, उसे उसी पर लगाते हैं।
सारी व्यवस्था करके और रक्षक रखकर भरत राम की माता कौसल्या के पास जाते हैं। स्नेह के सुजान भरत सभी माताओं को दुखी जानते हैं।
वे सब माताओं के लिये पालकियाँ बनाने और सुखासन यान सजाने को कहते हैं।
तिलक का सामान और नगर का प्रस्थान
नगर के नर नारी चकवे और चकवी की तरह हृदय में बहुत आर्त होकर प्रातःकाल की राह देखते हैं। रात भर जागते जागते सबेरा हो जाता है। तब भरत सुजान मन्त्रियों को बुलाकर कहते हैं, तिलक का सारा सामान ले चलिये। मुनि वन में राम को राज्य देंगे। जल्दी चलिये।
आज्ञा सुनकर मन्त्री वन्दना करते हैं और तुरन्त घोड़े, रथ और हाथी सजा देते हैं।
सबसे पहले वसिष्ठ अरुन्धती और अग्नि की सामग्री के साथ रथ पर चढ़कर चलते हैं। टीका इसे अग्निहोत्र की सामग्री बताती है। फिर तप और तेज के भण्डार ब्राह्मणों के समूह अनेक सवारियों पर चलते हैं। नगर के सब लोग सवारियाँ सजाकर चित्रकूट की ओर चल पड़ते हैं।
सब रानियाँ सुन्दर पालकियों पर चढ़कर चलती हैं।
नगर शुचि सेवकों को सौंपकर और सबको आदर से रवाना करके, तब राम और सीता के चरणों का स्मरण करके दोनों भाई, भरत और शत्रुघ्न, चलते हैं।
दो भाइयों के पीछे पैदल होता समाज
राम के दर्शन की लालसा में सब नर नारी ऐसे चलते हैं मानो हाथी और हथिनियाँ जल को तककर चले जा रहे हों। सीता और राम वन में हैं, यह सोचकर भरत छोटे भाई शत्रुघ्न के साथ पैदल चलते हैं। उनका स्नेह देखकर लोग प्रेम में मग्न हो जाते हैं और घोड़े, हाथी और रथ छोड़कर उतरकर पैदल चलने लगते हैं।
कौसल्या भरत के पास जाकर, अपनी पालकी उनके समीप रखकर, कोमल वाणी से बोलती हैं।
माता बलैयाँ लेकर कहती हैं, बेटा, रथ पर चढ़ जाइये। प्रिय परिवार दुखी होगा। आपके पैदल चलने से सब लोग पैदल चलेंगे। सब शोक से दुबले हो गये हैं, और पैदल राह के योग्य नहीं हैं।
दोनों भाई माता के वचन सिर चढ़ाकर, उनके चरणों में सिर नवाकर, रथ पर चढ़कर चलते हैं।
पहले दिन तमसा पर पड़ाव होता है, दूसरा पड़ाव गोमती के तट पर। कोई दूध पीकर रहता है, कोई फल खाता है, और कुछ लोग रात को भोजन करते हैं। गहने और भोग छोड़कर सब राम के लिये नियम और व्रत करते हैं।
फिर सई नदी के तट पर ठहरकर सबेरे सब चलते हैं और शृंगवेरपुर के निकट पहुँच जाते हैं।
सेना की ख़बर और गुह का संदेह
गुह सारे समाचार सुनते हैं और विषाद के साथ हृदय में विचार करने लगते हैं: भरत वन को किस कारण जा रहे हैं? उनके मन में कुछ कपट का भाव है। यदि जी में कुटिलता न होती, तो साथ में सेना क्यों ले चले हैं?
गुह सोचते हैं कि भरत समझते हैं, छोटे भाई सहित राम को मारकर वे सुख से निष्कण्टक राज्य करेंगे। भरत ने राजनीति को हृदय में स्थान नहीं दिया। तब कलंक लगा था, अब जीवन की हानि है।
वे सोचते हैं कि सारे देवता और दैत्य योद्धा भी जुट जायें, तो भी राम को रण में कोई नहीं जीत सकता। भरत ऐसा करें तो आश्चर्य क्या है? विष की बेल पर अमृत के फल नहीं लगते।
ऐसा विचारकर गुह अपनी जाति के लोगों को सावधान होने को कहते हैं: नावें कब्जे में कर ली जायें, फिर डुबा दी जायें, और सब घाट रोक दिये जायें।
राम के लिये प्राण देने का निश्चय
गुह लोगों से कहते हैं कि सब सुसज्जित होकर घाट रोक लें और मरने की तैयारी कर लें। वे स्वयं भरत से सामने लोहा लेंगे और जीते जी उन्हें गंगा के पार नहीं उतरने देंगे।
वे कहते हैं: युद्ध में मरण, और फिर गंगा का तट, राम का काम, और क्षणभंगुर शरीर। भरत भाई और राजा हैं, और मैं नीच सेवक। बड़े भाग्य से ऐसी मृत्यु मिलती है। अपने को नीच सेवक कहना गुह का अपना आत्मवर्णन है।
आगे वे कहते हैं कि स्वामी के काम के लिये रण में लड़कर चौदहों लोकों को यश से उज्ज्वल कर देंगे, और राम के निमित्त प्राण त्याग देंगे। उनके दोनों हाथों में आनन्द के लड्डू हैं।
पोद्दार की टीका दोनों हाथों का अर्थ खोलती है: जीत गये तो राम के सेवक का यश मिलेगा, मारे गये तो राम की नित्य सेवा मिलेगी।
फिर वे कहते हैं कि जिसकी साधुओं के समाज में गिनती नहीं और राम के भक्तों में स्थान नहीं, जगत् में उसका जीना व्यर्थ जाता है। वह पृथ्वी का भार है, और माता के यौवन रूपी वृक्ष को काटनेवाली कुल्हाड़ी है। यह कठोर बात गुह की अपनी है।
गुह का विषाद चला जाता है। वे सबका उत्साह बढ़ाकर और राम का स्मरण करके तुरन्त तरकस, धनुष और कवच माँगते हैं।
शस्त्र सजते हैं, वीरों का उत्साह बढ़ता है
गुह अपने भाइयों से जल्दी सामान सजाने को कहते हैं। आज्ञा सुनकर कोई कायर न बने। सब हर्ष से कहते हैं, हे नाथ, बहुत अच्छा, और एक दूसरे का जोश बढ़ाते हैं। निषाद बार बार जोहार करते हुए चलते हैं। सभी बड़े शूरवीर हैं, जिन्हें रण में लड़ना प्रिय है, और वे राम के चरणों की जूतियों का स्मरण करते हैं।
उस स्मरण के बाद वे छोटे तरकस बाँधते हैं और अपने छोटे धनुषों पर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं। कवच पहने जाते हैं, सिर पर लोहे के टोप रखे जाते हैं, और फरसे, भाले और बरछे सीधे किये जाते हैं। कोई तलवार का वार रोकने में बहुत कुशल है।
वे ऐसे उछलते हैं मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद रहे हों। अपना अपना साज और दल तैयार करके वे गुह के पास जाकर जोहार करते हैं। गुह योद्धाओं को देखकर सबको योग्य पाते हैं और नाम ले लेकर सबका सम्मान करते हैं।
गुह उन्हें सावधान करते हैं: धोखा न हो, आज मेरा बहुत बड़ा काम है। टीका इसका अर्थ मृत्यु से न घबराना बताती है। यह सुनकर योद्धा रोष से उत्तर देते हैं, हे वीर, अधीर न होइये। वे कहते हैं कि राम के प्रताप और स्वामी के बल से वे सेना को वीरों और घोड़ों से खाली कर देंगे।
वे कहते हैं कि जीते जी पीछे पाँव नहीं रखेंगे और धरती को सिरों और धड़ों से पाट देंगे।
दल को अच्छा देखकर गुह लड़ाई का ढोल बजाने को कहते हैं। इतना कहते ही बायीं ओर छींक होती है। शकुन विचारनेवाले कहते हैं कि खेत सुन्दर है। टीका इसे जीत पढ़ती है।
पहले मिलकर मन की बात जान लें
एक बुज़ुर्ग शकुन का विचार करके कहते हैं कि भरत से मिल लीजिये, लड़ाई नहीं होगी। भरत राम को मनाने जा रहे हैं, और शकुन कहता है कि विरोध नहीं है।
यह सुनकर गुह कहते हैं कि बूढ़ा ठीक कह रहा है। मूर्ख लोग जल्दी में काम करके पछताते हैं। भरत का स्वभाव और शील समझे बिना, बिना जाने युद्ध करने में हित की बड़ी हानि है।
गुह योद्धाओं से कहते हैं कि सब इकट्ठे होकर घाट रोके रहें। मैं जाकर भरत से मिलकर उनका भेद लूँगा। उनका भाव मित्र का है, शत्रु का या उदासीन का, यह जानकर तब लौटकर वैसा करूँगा।
वे कहते हैं कि भरत के सुन्दर स्वभाव से वे उनका स्नेह पहचान लेंगे। वैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। ऐसा कहकर वे भेंट का सामान सजाने लगते हैं।
राम का सखा सुनते ही
गुह कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाते हैं। कहार पुरानी और मोटी पहिना मछलियों के भार भर भरकर लाते हैं। भेंट का सामान सजाकर वे मिलने चलते हैं, और उन्हें मंगल के मूल शुभ शकुन मिलते हैं।
वसिष्ठ को देखकर गुह अपना नाम बताते हैं और दूर से ही मुनि को दण्डवत् प्रणाम करते हैं। वसिष्ठ उन्हें राम का प्रिय जानकर आशीर्वाद देते हैं और भरत को समझाकर बताते हैं कि ये राम के सखा हैं।
राम का सखा सुनते ही भरत रथ छोड़ देते हैं और उतरकर उमड़ते प्रेम के साथ चलते हैं।
गुह अपना गाँव, अपनी जाति और अपना नाम बताकर धरती पर माथा टेककर जोहार करते हैं। उन्हें दण्डवत् करते देखकर भरत उन्हें छाती से लगा लेते हैं।
ऐसा लगता है मानो लक्ष्मण से भेंट हुई हो। भरत के हृदय में प्रेम नहीं समाता।
प्रसंग का क्रम
सबेरे चलने का निर्णय देखकर भरत सबको प्राणों के समान प्रिय हो जाते हैं, और लोग उनकी सराहना करते हुए घर जाते हैं। कुछ लोग चाहते हैं कि किसी को रुकने को न कहा जाये। घर पर भरत सम्पत्ति को राम की मानते हैं। वे शुचि सेवकों को भेद बताकर काम पर लगाते हैं और रक्षक रखते हैं। फिर वे कौसल्या के पास जाते हैं, और माताओं को दुखी जानकर उनके लिये पालकियाँ बनवाने को कहते हैं।
नगर रात भर जागकर सबेरे की राह देखता है। सबेरे भरत मन्त्रियों से तिलक के सामान की बात कहते हैं, और मन्त्री घोड़े, रथ और हाथी सजाते हैं। वसिष्ठ अरुन्धती के साथ सबसे आगे चलते हैं, फिर ब्राह्मण, और फिर नगर के लोग और रानियाँ। नगर सौंपकर दोनों भाई चलते हैं। वे पैदल चलते हैं, और लोग भी पैदल चलने लगते हैं। कौसल्या के कोमल वचन पर वे रथ पर चढ़ते हैं। तमसा और गोमती पर भाइयों के पड़ाव होते हैं, लोग व्रत करते हैं, और सई के तट से सब शृंगवेरपुर के निकट पहुँचते हैं।
गुह समाचार सुनकर विषाद के साथ विचार करते हैं। कपट का संदेह करके वे अपनी जाति के लोगों से नावें डुबाने और घाट रोकने को कहते हैं। वे कहते हैं कि भरत से लड़ेंगे और राम के लिये प्राण देंगे। वे शस्त्र माँगते हैं, और निषाद सजकर जोहार करते हैं। गुह नाम ले लेकर सबका सम्मान करते हैं और लड़ाई का ढोल बजाने को कहते हैं, और बायीं ओर छींक होती है। एक बुज़ुर्ग मिल लेने की सलाह देते हैं, और गुह योद्धाओं से घाट रोके रहने को कहते हैं। वे भरत का भेद लेने भेंट लेकर जाते हैं। वे वसिष्ठ को अपना नाम बताते हैं, और वसिष्ठ आशीर्वाद देकर भरत को बताते हैं कि ये राम के सखा हैं। राम का सखा सुनकर भरत रथ से उतरते हैं, और गुह को दण्डवत् करते देखकर उन्हें छाती से लगा लेते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 185 से 193, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।