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चित्रकूट की यात्रा और निषादराज से भेंट

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · चित्रकूट की यात्रा और निषादराज से भेंट

चित्रकूट की यात्रा और निषादराज से भेंट

राम को लौटाने की आशा लेकर अयोध्या चल पड़ती है। गंगा के निकट उसी यात्रा को निषादराज युद्ध का संकट समझ लेते हैं, और फिर एक बुज़ुर्ग की बात मिलने का रास्ता खोलती है।

अयोध्या में सबेरे चलने का निश्चय होते ही घरों में तैयारी होने लगती है। राम के दर्शन की आशा ऐसी है कि किसी को रखवाली के लिये रुकना भी भारी दण्ड लगता है। उसी समय भरत के सामने एक काम और है। नगर, महल, हाथी, घोड़े और भण्डार, यह सब राम का है। जिन्हें वन में राम तक पहुँचना है, उन्हें अयोध्या में राम की सम्पत्ति सँभालने का प्रबन्ध भी करना होगा। प्रेम की यात्रा इसी उत्तरदायित्व से आरम्भ होती है।

आगे रास्ते में यह बड़ा समाज किसी और की आँखों से देखा जायगा। गंगा के निकट निषादराज गुह सेना साथ आने का समाचार सुनेंगे और भरत के उद्देश्य पर सन्देह करेंगे। हमें यात्रा की तैयारी में जो राम के अभिषेक की आशा दिखायी देती है, गुह को उसी यात्रा में राम पर आक्रमण का भय दिखता है। तुलसीदास की इस कथा में दोनों पक्षों का राम से लगाव है, पर अभी उन्हें एक दूसरे के मन की ख़बर नहीं। बीच में एक बुज़ुर्ग का विचार आयेगा, भेंट की तैयारी होगी, और अन्त में वही भरत गुह को हृदय से लगा लेंगे जिनके विरुद्ध युद्ध की तैयारी हो रही थी।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • भरत राम की सम्पत्ति की रक्षा का प्रबन्ध करके उन्हें मनाने चित्रकूट की ओर चलनेवाले भाई।
  • शत्रुघ्न भरत के साथ सबसे अन्त में प्रस्थान करते हैं और उनके साथ ही पैदल चलकर फिर रथ पर चढ़ते हैं।
  • कौशल्या यात्रियों की दुर्बलता देखकर भरत को रथ पर चलने के लिये समझानेवाली माता।
  • वसिष्ठ और अरुन्धती अग्निहोत्र की सामग्री के साथ सबसे आगे प्रस्थान करते हैं; वसिष्ठ गुह का परिचय कराते हैं।
  • निषादराज गुह राम के सखा, जो भरत के आने को संकट समझकर युद्ध की तैयारी करते हैं और फिर मिलने जाते हैं।
  • बुज़ुर्ग निषाद शकुन का शान्तिपूर्ण अर्थ बताकर भरत से पहले मिलने की सलाह देते हैं।

सबेरे चलना है

निर्णय सुनकर लोगों के मन में बहुत आनन्द होता है। तुलसी उसकी तुलना मेघ की गर्जना सुनते चातक और मोर से करते हैं। अभी यात्रा आरम्भ नहीं हुई है, फिर भी उसके निश्चय ने मन को बदल दिया है। वर्षा की प्रतीक्षा करनेवाले पक्षियों की तरह अयोध्यावासियों को राम के दर्शन की आशा मिली है। पोद्दार की टीका यहाँ अगले दिन के प्रातःकाल चलने की बात स्पष्ट करती है। उसी सुन्दर निश्चय के कारण भरत सबके प्राणप्रिय हो जाते हैं।

भा सब कें मन मोदु न थोरा । जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥
चलत प्रात लखि निरनउ नीके । भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥

चौपाई १

लोग मुनि वसिष्ठ की वन्दना करते हैं, भरत को सिर नवाते हैं और विदा लेकर अपने घरों को चले जाते हैं। जाते हुए उनके शील और स्नेह की सराहना होती है। लोग भरत के जीवन को धन्य कहते हैं और आपस में यह बात दोहराते हैं कि बड़ा काम बन गया। सभा का निश्चय अब अलग अलग घरों तक पहुँच रहा है। हर घर में चलने का सामान तैयार होने लगता है, और उसी तैयारी में एक कठिनाई सामने आती है।

घर की रखवाली के लिये कोई तो रुके। पर जिसे रुकने को कहा जाता है, वह उसे ऐसा समझता है मानो उसकी गर्दन मारी गयी हो। यह उपमा उस आदमी की पीड़ा बताती है जिसके सामने सब लोग दर्शन की ओर जा रहे हों और उसी को पीछे रह जाना पड़े। कुछ लोग तो कहने लगते हैं कि किसी से रहने के लिये कहिये ही मत। संसार में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता। राम तक पहुँचने की आशा उनके लिये जीवन के लाभ का नाम हो गयी है।

इस उत्सुकता के बीच दोहा एक कठोर बात रखता है। सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता और भाई, सभी सम्बन्ध और साधन गिनाये जाते हैं। जो राम के चरणों की ओर जाने में प्रसन्नतापूर्वक सहायता न करें, उनके लिये जल जाने की बात कही गयी है। राम की ओर बढ़ने की आकांक्षा यहाँ इतनी प्रबल है कि हर प्रिय वस्तु की उपयोगिता उसी से आँकी जा रही है।

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ।
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥ १८५॥

दोहा १८५

दोहा पढ़ते हुए उसकी पूरी सूची पर ध्यान दीजिये। घर और धन के साथ अपने लोग भी हैं। प्रस्थान का आनन्द इसीलिये इतना व्यापक है कि अयोध्या के लोग अकेले अपनी राह नहीं ढूँढ़ रहे, सबको उस राह में शामिल देखना चाहते हैं। जो पीछे छूटता है उसे लाभ से वंचित होने का दुःख है। आगे भरत को इसी आकांक्षा के बीच नगर की रक्षा का उपाय करना होगा। सबके प्रेम का सम्मान भी रहे और राम की सम्पत्ति भी असुरक्षित न छूटे।

अगले प्रातःकाल चलने के निश्चय से नगर में आनन्द फैलता है। सब राम के दर्शन को चलना चाहते हैं और रखवाली के लिये रुकना किसी को स्वीकार नहीं होता।

पीछे रह जानेवाली सम्पत्ति का धर्म

घर घर तरह तरह की सवारियाँ सज रही हैं। भरत घर जाकर विचार करते हैं कि नगर, घोड़े, हाथी, भवन और भण्डार, सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथ की है। उसे बिना किसी व्यवस्था के छोड़कर चल देना अन्ततः उनके अपने हित में भी नहीं होगा। उनके विचार में स्वामी के साथ द्रोह सभी पापों में बड़ा है। जिसकी वस्तु है, उसका हित छोड़कर केवल अपने चल देने की सुविधा देखना सेवा को अधूरा कर देगा।

भरत का अगला विचार इस पूरे प्रबन्ध का आधार है। सेवक वही है जो स्वामी का हित करे, भले कोई उसे करोड़ों दोष दे। बाहर प्रशंसा मिले या दोष, अपने उत्तरदायित्व का निर्णय स्वामी के हित से होना चाहिये। नगर की उमंग उन्हें मालूम है, रुकने का दुःख भी सामने है। फिर भी रक्षा की व्यवस्था आवश्यक है। वे ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाते हैं जो स्वप्न में भी अपने धर्म से नहीं डिगे।

करइ स्वामि हित सेवकु सोई । दूषन कोटि देइ किन कोई॥
अस बिचारि सुचि सेवक बोले । जे सपनेहुँ निज धरम न डोले॥

चौपाई २

बुलाकर केवल काम सौंप देना पर्याप्त नहीं माना गया। भरत उन्हें सारी बात समझाते हैं और उनके लिये उचित धर्म बताते हैं। फिर जो जिस काम के योग्य है, उसे उसी पर नियुक्त करते हैं। इस छोटे से क्रम में विश्वास और योग्यता दोनों का ध्यान है। रखवाली किसी संयोग से पीछे रह गये व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ी जाती। लोग चुने जाते हैं, उन्हें प्रयोजन बताया जाता है, फिर उनकी सामर्थ्य के अनुसार दायित्व बाँटे जाते हैं।

सारी व्यवस्था करके और रक्षक रखकर भरत राम की माता कौशल्या के पास जाते हैं। कथा में यह क्रम साफ़ है। नगर का प्रबन्ध पहले पूरा होता है, माताओं की यात्रा की सुविधा का काम उसके बाद सामने आता है। भरत सभी माताओं का दुःख समझते हैं। दोहा उन्हें स्नेह का सुजान कहता है, प्रेम के मर्म को जाननेवाला। इस समय वह मर्म यात्रा में आराम देने की व्यवस्था बनता है।

आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।
कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान॥ १८६॥

दोहा १८६

सब माताओं के लिये पालकियाँ तैयार करने और सुख से बैठनेवाले यान सजाने को कहा जाता है। कौशल्या के पास पहुँचकर भी भरत की चिन्ता में सारी माताएँ आती हैं। किसी एक के लिये व्यवस्था और दूसरों के लिये उपेक्षा का भेद यहाँ नहीं है। सब आर्त हैं, इसलिये सबकी सुविधा सँभालनी है। नगर के पहरे से लेकर पालकियों तक, राम की ओर बढ़ने की उनकी तैयारी में पीछे की रक्षा और साथ चलनेवालों की देखभाल दोनों शामिल हैं।

प्रस्थान की आतुरता में ऐसे काम आसानी से छोटे लग सकते हैं। तुलसी इन्हें अलग चौपाइयों और दोहे में स्थान देते हैं। राम का नगर किसी के भरोसे रखा जायगा और उनकी माताएँ किस प्रकार चलेंगी, इन दोनों प्रश्नों का उत्तर भरत के स्वभाव को सामने लाता है। उनका प्रेम निर्णय करता है, लोग चुनता है और दूसरों की पीड़ा पहचानकर उसके लिये साधन जुटाता है।

भरत राम की सम्पत्ति की रक्षा के लिये योग्य, विश्वासपात्र सेवक नियुक्त करते हैं। फिर सभी दुःखी माताओं के लिये पालकियाँ और आरामदायक यान तैयार कराते हैं।

वन में अभिषेक की आशा

नगर के नर नारी रात बीतने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। तुलसी उन्हें चकवे और चकवी के समान बताते हैं, जिनके हृदय में प्रातःकाल के लिये गहरी आकुलता है। रात भर जागते जागते सबेरा हो जाता है। अब भरत चतुर मन्त्रियों को बुलाते हैं। उनकी आज्ञा यात्रा का उद्देश्य और स्पष्ट करती है। राज्याभिषेक की सारी सामग्री साथ ले चलनी है। मुनि वसिष्ठ वन में ही राम को राज्य देंगे। जल्दी चलने की बात भी उसी आज्ञा में जुड़ी है।

कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू । बनहिं देब मुनि रामहि राजू॥
बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे । तुरत तुरग रथ नाग सँवारे॥

चौपाई ३

यह अभिषेक की आशा और उसके लिये तैयारी है। अभी राम को राज्य दिया नहीं गया है। अयोध्या से वह सारा सामान इस प्रयोजन से जा रहा है कि गुरु वन में उनका अभिषेक कर सकें। मन्त्रियों ने आज्ञा सुनकर वन्दना की और तत्काल घोड़े, रथ तथा हाथी सजवा दिये। जिस बड़े दल को आगे देखकर गुह सन्देह करेंगे, उसके भीतर इस समय यही घोषित उद्देश्य है, राम को उनका राज्य देना।

प्रस्थान में सबसे आगे वसिष्ठ हैं। वे अरुन्धती और अग्निहोत्र की सारी सामग्री सहित रथ पर चढ़कर चलते हैं। यात्रा में गुरु के साथ उनका नियमित धार्मिक कर्म भी जा रहा है। फिर ब्राह्मणों के समूह विभिन्न सवारियों पर चलते हैं। कवि उन्हें तप और तेज का भण्डार कहते हैं। उसके बाद नगर के लोग अपने यान सजाकर चित्रकूट की ओर प्रस्थान करते हैं।

सभी रानियाँ सुन्दर पालकियों पर चढ़ती हैं। उन पालकियों की शोभा के विषय में तुलसी कहते हैं कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। अभी जो व्यवस्था भरत ने करायी थी, वह अब चलनेवाले समाज में दिखाई देती है। गुरु, ब्राह्मण, नगरवासी और माताएँ, सबका प्रस्थान होता है। भरत ने स्वयं पहले चलकर दूसरों को पीछे आने के लिये नहीं छोड़ दिया। नगर विश्वासपात्र सेवकों को सौंपा जाता है और सबको आदर से रवाना किया जाता है।

सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ॥ १८७॥

दोहा १८७

तब दोनों भाई, भरत और शत्रुघ्न, सीता और राम के चरणों का स्मरण करके चलते हैं। दोहे का यह अन्त याद रखने योग्य है। तैयारी भरत के नाम से चलती रही, पर प्रस्थान के क्षण में दोनों भाई साथ हैं। और स्मरण में राम के साथ सीता भी हैं। बड़े समाज के चल पड़ने के बाद दोनों का चलना बताता है कि जिनके ऊपर व्यवस्था थी, उन्होंने उसे दूसरों के निकल जाने तक सँभाला।

अयोध्या अब यात्रा पर है। रात की प्रतीक्षा बीत चुकी है, सवारियाँ चल चुकी हैं और वन में अभिषेक की सामग्री साथ है। पर इन सवारियों के बीच भरत और शत्रुघ्न अपने लिये कौन सा मार्ग चुनते हैं, यह अगली चौपाई में खुलता है। मन में वनवासी सीताराम का विचार आते ही दोनों पैदल चलने लगते हैं।

भरत वन में राम के अभिषेक के लिये सामग्री साथ रखने की आज्ञा देते हैं। वसिष्ठ, अरुन्धती और अग्निहोत्र की सामग्री सबसे आगे जाते हैं; सबको विदा करके दोनों भाई अन्त में चलते हैं।

दो भाइयों के पीछे पैदल होता समाज

राम के दर्शन की लालसा में चले नर नारियों के लिये तुलसी प्यासे हाथियों और हथिनियों का चित्र लाते हैं। जैसे वे जल की ओर आकृष्ट होकर बढ़ते हैं, वैसे ही ये लोग दर्शन की ओर जा रहे हैं। भरत के मन में यह विचार है कि सीता और राम वन में हैं। उनके साथ शत्रुघ्न भी पैदल चलते हैं। दोनों भाइयों का स्नेह देखकर यात्रियों में प्रेम और बढ़ता है। लोग अपने घोड़े, हाथी और रथ छोड़कर उतर आते हैं और पैदल चलने लगते हैं।

भरत का व्यक्तिगत आचरण पूरे दल की चाल बदल देता है। सवारियाँ थीं, पर अब सब उनके पीछे उन्हीं की तरह चलना चाहते हैं। कौशल्या इस दृश्य का परिणाम देखती हैं। वे भरत के समीप जाती हैं, अपनी पालकी उनके पास रुकवाती हैं और कोमल वाणी से समझाती हैं। उनके शब्दों में बेटे के लिये स्नेह है और परिवार की अवस्था का ध्यान भी।

तात चढ़हु रथ बलि महतारी । होइहि प्रिय परिवारु दुखारी॥
तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू । सकल सोक कृस नहिं मग जोगू॥

चौपाई ४

माता बलैयाँ लेकर कहती हैं कि बेटा रथ पर चढ़ जाय, नहीं तो सारा प्रिय परिवार दुःख पायेगा। भरत के पैदल चलने से सब पैदल चलेंगे, जबकि शोक ने सबको कृश कर दिया है। वे पैदल यात्रा के योग्य नहीं हैं। कौशल्या का तर्क यात्रियों की वास्तविक दशा से निकलता है। इस समाज में उत्साह बहुत है, पर शरीर शोक से दुर्बल हैं। नेता जिस कठिनाई को अपने लिये स्वीकार कर लेता है, उसके पीछे चलनेवाले भी उसे अपनाने लगते हैं। माता भरत को उसी व्यापक असर का ध्यान दिलाती हैं।

दोनों भाई उनकी आज्ञा सिर पर रखते हैं। माता के चरणों में सिर नवाकर रथ पर चढ़ते हैं और आगे चलते हैं। पैदल चलने का अपना संकल्प माता की बात सुनकर बदल जाता है। भरत और शत्रुघ्न दोनों के लिये यह आज्ञा स्वीकार करने का क्षण है। उनके रथ पर चढ़ने में उस पूरे परिवार की शक्ति का ध्यान समाया है जिसे साथ लेकर चित्रकूट पहुँचना है।

पहले दिन तमसा पर निवास होता है। दूसरा पड़ाव गोमती के तट पर है। साथ चलते लोगों के नियम भी एक जैसे नहीं हैं। कोई केवल दूध लेता है, कोई फलाहार करता है और कुछ लोग रात को एक बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग छोड़कर सब राम के लिये नियम और व्रत करते हैं। एक उद्देश्य में जुड़े लोगों की साधना अपने अपने रूप में चलती है।

पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग॥ १८८॥

दोहा १८८

इसके बाद सई नदी के किनारे रात बितायी जाती है। सबेरे वहाँ से चलकर सब शृंगवेरपुर के निकट पहुँचते हैं। तमसा का पहला निवास, गोमती का दूसरा मुकाम, फिर सई के तट की रात और अगली सुबह का प्रस्थान, यह यात्रा की स्पष्ट लय है। इसी समाज के निकट आने की ख़बर अब निषादराज तक पहुँचती है। अयोध्या से चली आशा गंगा के क्षेत्र में पहुँचकर एक नये मन की शंका से मिलेगी।

कौशल्या यात्रियों की दुर्बलता बताकर दोनों भाइयों को रथ पर चढ़ाती हैं। तमसा, गोमती और सई के पड़ावों से होकर समाज शृंगवेरपुर के निकट पहुँचता है। सब अपने अपने नियम राम के लिये निभा रहे हैं।

सेना की ख़बर और गुह का संदेह

निषादराज सारे समाचार सुनते हैं और दुःखी होकर विचार करने लगते हैं। उनके सामने पहला प्रश्न है कि भरत वन की ओर किस कारण जा रहे हैं। सेना साथ होने की ख़बर उन्हें कपट की आशंका देती है। वे मन में सोचते हैं कि यदि कुटिलता न होती तो साथ में सेना ले जाने का प्रयोजन क्या था। अभी भरत से उनकी भेंट नहीं हुई है। अपनी शंका के आधार पर वे आनेवाले दल का अर्थ निकाल रहे हैं।

कारन कवन भरतु बन जाहीं । है कछु कपट भाउ मन माहीं॥
जौं पै जियँ न होति कुटिलाई । तौ कत लीन्ह संग कटकाई॥

चौपाई ५

गुह का अनुमान और कठोर होता जाता है। उन्हें लगता है कि भरत लक्ष्मण सहित राम को मारकर निष्कण्टक राज्य करने की सोच रहे हैं। वे इसे राजनीति न समझने की भूल मानते हैं। उनके विचार में पहले तो भरत पर कलंक लगा था, अब जीवन भी चला जायगा। यह पूरा अभियोग गुह के चिन्तित मन में है। भरत के लिये अभिषेक की सामग्री ले चलने का जो आदेश हमने सुना, उसके साथ इस आशंका की दूरी स्पष्ट है। राम को मनाने की यात्रा को उनके सखा आक्रमण समझ रहे हैं।

गुह को राम की अजेयता का पूरा विश्वास है। सब देवता और दैत्य योद्धा एकत्र हो जायँ, तब भी राम को संग्राम में जीतनेवाला कोई नहीं हो सकता। इस विश्वास से भरत का अनुमानित प्रयोजन उन्हें और अविवेकी लगता है। फिर वे विष की बेल और अमृत के फल का रूपक लाते हैं। उनके मन की कटुता कहती है कि विष की बेल से अमृतफल की आशा ही क्यों हो। यह सन्देह अब भरत के स्वभाव पर निर्णय बनने लगा है, जबकि उनके उद्देश्य का प्रत्यक्ष परिचय अभी मिला नहीं है।

इसी सोच के बाद गुह अपने समुदाय के लोगों को सावधान करते हैं। आज्ञा पहले नावों पर अधिकार करने की है। उन्हें कब्जे में लेकर फिर डुबा दिया जाय और घाटों को रोका जाय। नदी यहाँ केवल यात्रा का पड़ाव नहीं रह गयी। गुह की योजना में वही वह स्थान है जहाँ आनेवाली सेना को पार होने से रोका जा सकता है। नाव और घाट दोनों पर नियन्त्रण रखने का आदेश इसी उद्देश्य से है।

अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।
हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु॥ १८९॥

दोहा १८९

आज्ञाओं का क्रम ध्यान में रखिये। पहले नावों को हाथ में करना है, फिर डुबाने का आदेश है, साथ ही घाट बन्द करने हैं। यह गुह का सैन्य प्रबन्ध है, भरत से युद्ध हो जाने का वर्णन नहीं। अभी प्रतिरोध की तैयारी चल रही है। भरत दूसरी ओर अपनी यात्रा पर हैं और यहाँ उनके विरुद्ध रक्षा की योजना बन गयी है। एक ही राम के प्रति प्रेम रखनेवाले लोग परस्पर अपरिचित उद्देश्य के कारण आमने सामने आ सकते हैं।

गुह अपनी शंका को हलका भय मानकर छोड़ते नहीं। वे उसके आधार पर आगे की लड़ाई के लिये स्वयं को तैयार करते हैं। उनके लिये राम का काम इतना प्रिय है कि उसमें मृत्यु का विचार भी उत्साह देने लगता है। अब उनकी बात में घाट रोकने की योजना से आगे प्राण देने का निश्चय आता है।

सेना के समाचार से गुह भरत का उद्देश्य गलत समझ लेते हैं। वे राम पर आक्रमण की आशंका में नावों को कब्जे में लेकर डुबाने और घाट रोकने की आज्ञा देते हैं।

राम के लिये प्राण देने का निश्चय

गुह लोगों को सुसज्जित होकर घाट रोकने को कहते हैं। लड़ाई में मरने की तैयारी रखने का आदेश है। वे स्वयं भरत से सामने लोहा लेने और जीते जी उन्हें गंगा के पार न उतरने देने का निश्चय करते हैं। अपने को सुरक्षित रखकर केवल दूसरों को आगे भेजने की बात उनके वचन में नहीं है। इस संकल्प में वे अपना प्राण भी रखते हैं और अपने साथियों से उसी तत्परता की आशा करते हैं।

वे मृत्यु के ऐसे अवसर के पक्ष में एक एक कारण गिनाते हैं। संग्राम में मरण हो, गंगा का तट हो, राम का काम हो, और शरीर तो क्षणभंगुर है ही। फिर जिनसे लड़ना है वे राम के भाई और राजा हैं। गुह अपने को नीच सेवक कहकर ऐसी मृत्यु को बड़ा भाग्य मानते हैं। यह सामाजिक आत्मवर्णन गुह का अपना कहा हुआ है। सामनेवाले के लिये राजा और अपने लिये नीच सेवक, इस भेद के भीतर वे राम के लिये प्राण देने की महिमा देख रहे हैं।

अगले विचार में मृत्यु के साथ यश भी जुड़ता है। स्वामी के काम के लिये रण में लड़कर चौदहों लोकों को अपने यश से उज्ज्वल कर देंगे। राम के निमित्त प्राण छोड़ने का निश्चय उन्हें ऐसा लगता है मानो दोनों हाथों में आनन्द के लड्डू हों। दोनों सम्भावनाएँ उन्हें लाभ देती दिखती हैं।

स्वामि काज करिहउँ रन रारी । जस धवलिहउँ भुवन दस चारी॥
तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें । दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें॥

चौपाई ६

पोद्दार की टीका इस उपमा के दोनों पक्ष खोलती है। विजय हुई तो राम के सेवक का यश मिलेगा, मृत्यु हुई तो राम की नित्य सेवा मिलेगी। इसलिये गुह के विचार में किसी भी परिणाम से राम से सम्बन्ध बना रहता है। जीवन की रक्षा को ही अकेला लाभ माननेवाले मन की तुलना में उनका निर्णय अलग दिशा में जा रहा है। वे जिस उद्देश्य के लिये जीवित हैं, उसी के लिये प्राण देना भी सार्थक मान रहे हैं।

इसी क्रम में उनकी बात भक्त के जीवन का कठोर मूल्यांकन करती है। जिसकी साधुओं के समाज में गिनती न हो और राम के भक्तों में स्थान न हो, ऐसे जीवन को पृथ्वी का व्यर्थ भार कहा जाता है। फिर माता के यौवनरूपी वृक्ष को काटनेवाली कुल्हाड़ी की तीखी उपमा आती है। यह गुह के प्राणसमर्पण वाले विचार का धार्मिक मूल्यनिर्णय है। वे अपने जीवन की सार्थकता साधु समाज और राम की सेवा में खोज रहे हैं, और उससे विमुख जीवन के लिये इतनी कठोर भाषा रखते हैं।

इस निश्चय का उनके मन पर तत्काल असर होता है। विषाद चला जाता है। वे सबका उत्साह बढ़ाते हैं, राम का स्मरण करते हैं और तुरन्त तरकस, धनुष तथा कवच माँगते हैं। जिस सूचना ने उन्हें दुःखी किया था, उसी के बीच अब सेवा का अवसर दिख रहा है। उद्देश्य के बारे में उनकी भूल अभी बनी हुई है, पर राम के लिये अपनी तैयारी में वे पूरी तरह लग गये हैं।

बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु॥ १९०॥

दोहा १९०

यहाँ भक्ति की तीव्रता और दूसरे व्यक्ति को समझने की आवश्यकता साथ दिखाई देती हैं। गुह का समर्पण इतना प्रबल है कि वे मृत्यु से भी नहीं घबराते। आगे एक बुज़ुर्ग उन्हें याद दिलायेंगे कि पहले यह जानना आवश्यक है कि भरत करने क्या आये हैं। जो साहस अभी युद्ध में लगने को तैयार है, उसे अपनी दिशा के लिये उस जानकारी की आवश्यकता पड़ेगी।

गुह गंगा के तट पर राम के काम में मृत्यु को अपना सौभाग्य मानते हैं। यश और नित्य सेवा की दोनों सम्भावनाओं से उत्साहित होकर वे अपने शस्त्र माँगते हैं।

शस्त्र सजते हैं, वीरों का उत्साह बढ़ता है

निषादराज अपने लोगों से शीघ्र सामान सजाने को कहते हैं। उनकी आज्ञा सुनकर कोई कायरता मन में न लाये। सब हर्ष से हामी भरते हैं और एक दूसरे का जोश बढ़ाते हैं। गुह को जोहार करके निषाद निकलते हैं। तुलसी उन्हें शूरवीर कहते हैं, ऐसे लोग जिन्हें संग्राम में लड़ना प्रिय है। उनकी तैयारी में हथियारों के साथ स्मरण भी आता है, राम के चरणकमलों की जूतियों का स्मरण।

उस स्मरण के बाद वे छोटे तरकस बाँधते हैं और अपने छोटे धनुषों पर प्रत्यंचा चढ़ाते हैं। कवच पहने जाते हैं, सिर पर लोहे के टोप रखे जाते हैं। फरसों, भालों और बरछों को ठीक किया जाता है। किसी की विशेष कुशलता तलवार का वार रोकने में है। दल केवल उत्साह में एकत्र नहीं हुआ है, उसमें अपने अपने हथियार और लड़ाई की अलग अलग दक्षताएँ भी हैं।

अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं । फरसा बाँस सेल सम करहीं॥
एक कुसल अति ओड़न खाँड़े । कूदहिं गगन मनहुँ छिति छाँड़े॥

चौपाई ७

वीरों की उमंग के लिये कवि कहते हैं कि वे मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद रहे हों। यह उत्साह की उपमा है। अपना अपना साज और दल तैयार करके वे गुह के पास जाते हैं और उन्हें जोहार करते हैं। निषादराज योद्धाओं को देखते हैं, उन्हें योग्य पाते हैं और नाम ले लेकर सबका सम्मान करते हैं। बड़े समूह के भीतर हर योद्धा की अपनी पहचान है। सेनापति का उत्साहवर्धन उस पहचान को स्वीकार करता है।

गुह फिर उन्हें सावधान करते हैं कि आज बहुत बड़ा काम है, धोखा न हो। टीका इस बात को मरने से न घबराने के अर्थ में खोलती है। योद्धा बड़े जोश से उत्तर देते हैं और निषादराज को अधीर न होने को कहते हैं। उनके उत्तर में राम का प्रताप और अपने स्वामी का बल, दोनों आधार हैं। इसी भरोसे वे आनेवाली सेना को वीरों और घोड़ों से रहित कर देने की प्रतिज्ञा करते हैं।

उनकी भाषा उग्र है। वे कहते हैं कि जीते जी पीछे पाँव नहीं रखेंगे और धरती सिरों तथा धड़ों से भर देंगे। हर सैनिक और हर घोड़े को मार डालने की बात उनका युद्धपूर्व दावा है। तुलसी अभी किसी की मृत्यु नहीं दिखा रहे। हमें तैयार होते दल का उत्साह और उसके शब्दों की तीव्रता सुनाई देती है। आनेवाले भरत को वे शत्रु मान बैठे हैं, इसलिये उनकी प्रतिज्ञाओं में इतना संहार है।

गुह दल को अच्छा देखकर युद्ध का ढोल बजाने की आज्ञा देते हैं। बस इसी समय बायीं ओर छींक होती है। शकुन समझनेवाले उसे युद्ध में विजय का संकेत बताते हैं। तैयार योद्धाओं के बीच ऐसा अर्थ उत्साह को और अनुकूल लगता है। पर उसी घटना का एक दूसरा अर्थ भी सामने आनेवाला है। एक बुज़ुर्ग उसे देखकर भेंट की सलाह देते हैं, और उनका विचार इस पूरी तैयारी को नई दिशा देगा।

निषाद राम की जूतियों का स्मरण करके शस्त्र और कवच सजाते हैं। गुह नाम लेकर योद्धाओं का सम्मान करते हैं। युद्ध की उग्र प्रतिज्ञाओं के बीच बायीं ओर छींक का शकुन आता है।

पहले मिलकर मन की बात जान लें

बुज़ुर्ग निषाद शकुन का विचार करके कहते हैं कि भरत से मिल लेना चाहिये। लड़ाई नहीं होगी। उनके अनुसार भरत राम को मनाने जा रहे हैं और शकुन में विरोध दिखाई नहीं देता। वही छींक, जिसे अभी विजय का सूचक माना गया, अब शान्तिपूर्ण भेंट का संकेत बनती है। पहले अर्थ में युद्ध मान लिया गया था और उसका फल सोचा गया। बुज़ुर्ग पहले युद्ध की सम्भावना पर ही प्रश्न रखते हैं।

बूढ़ एकु कह सगुन बिचारी । भरतहि मिलिअ न होइहि रारी॥
रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं॥

चौपाई ८

गुह उनकी बात सुनते हैं और उसे उचित कहते हैं। अभी जो व्यक्ति मरने की तैयारी कर रहा था, वह अपने निर्णय पर दोबारा विचार करने को तैयार है। वे कहते हैं कि बिना विचारे अचानक काम कर डालनेवाले मूर्ख लोग बाद में पछताते हैं। भरत के शील और स्वभाव को समझे बिना, उन्हें जाने बिना युद्ध करने से अपने हित की बड़ी हानि होगी। यह स्वीकार उनके निर्णय में वास्तविक बदलाव लाता है।

फिर भी घाटों की चौकसी तुरन्त हटायी नहीं जाती। गुह योद्धाओं से कहते हैं कि सब एकत्र होकर घाटों को रोके रखें। वे स्वयं भरत से मिलकर उनका मर्म जानेंगे। भाव मित्र का है, शत्रु का है या उदासीन का, यह समझकर लौटेंगे और उसी के अनुसार आगे प्रबन्ध करेंगे। भेंट का निर्णय सावधानी के साथ लिया गया है। सुनने और जानने के लिये वे स्वयं आगे जाते हैं, जबकि साथी अभी अपने स्थानों की रक्षा करेंगे।

गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।
बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ॥ १९२॥

दोहा १९२

मित्र, शत्रु और उदासीन, ये तीन सम्भावनाएँ गुह स्वयं कहते हैं। थोड़ी देर पहले उनके विचार में कपट ही निश्चित था। अब सामनेवाले की स्थिति को अलग अलग सम्भावनाओं में देखने का स्थान बना है। वे भरत के सुन्दर स्वभाव से स्नेह पहचान लेने की बात कहते हैं। उनके अनुसार वैर और प्रेम छिपाने पर भी छिपते नहीं। इस भरोसे के साथ वे अब भेंट का सामान सँजोने लगते हैं।

बुज़ुर्ग की बात का फल केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहा। शस्त्र माँगनेवाले निषादराज अब उपहार मँगवा रहे हैं। चौकसी बनी है, पर मिलने का रास्ता खुल गया है। जिस मन ने सेना देखकर उद्देश्य का अनुमान लगा लिया था, वही मन अब व्यक्ति से मिलकर उसे समझना चाहता है। इस छोटे से विराम के कारण दोनों पक्ष एक दूसरे तक ऐसे पहुँच सकेंगे कि तलवार से पहले परिचय हो।

बुज़ुर्ग भरत के राम को मनाने जाने की बात कहते हैं। गुह उनकी सलाह स्वीकार करके स्वयं मिलने जाते हैं, और तब तक योद्धाओं को घाटों की रक्षा पर रहने देते हैं।

राम का सखा सुनते ही

गुह कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाते हैं। कहार बड़ी और पुरानी मछलियों के भार भर भरकर लाते हैं। चौपाई उन्हें पाठीन कहती है। इस भेंट की तैयारी में वन और नदी की वस्तुएँ साथ हैं। जिन्हें अभी घाट रोकने की चिन्ता थी, वे आनेवाले से मिलने के लिये पूरा साज जुटाते हैं। फिर मिलने की सामग्री सजाकर निकलते हैं और मंगलकारी शुभ शकुन पाते हैं।

गुह मिलने की तैयारी में उन वस्तुओं को सँजोते हैं जो उनके वन और नदी से आती हैं। भरत के भाव को जानने का जो विचार उन्होंने कहा था, उसका आधार सामनेवाले का स्वभाव है। उसी को समझने के लिये अब वे स्वयं चल पड़े हैं। आगे भरत का आचरण उन्हें इस परिचय का अवसर देगा।

दूर से वसिष्ठ दिखाई देते हैं। गुह अपना नाम बताकर मुनि को दण्डवत् प्रणाम करते हैं। वसिष्ठ उन्हें राम का प्रिय जानकर आशीर्वाद देते हैं और भरत से उनका परिचय कराते हैं। पोद्दार की टीका इस परिचय को राम के मित्र के रूप में स्पष्ट करती है। जिस समुदाय की सेना आने से गुह विचलित हुए थे, उसके गुरु अब उन्हीं को राम के स्नेह से पहचान रहे हैं।

भरत ने राम का सखा सुना और रथ त्याग दिया। वे उतरकर उमड़ते हुए अनुराग के साथ चलते हैं। यह सुनने और करने का बहुत निकट रखा गया क्रम है। गुह ने अभी अपने संदेह की पूरी बात भरत को नहीं कही, फिर भी राम से उनका सम्बन्ध सुनते ही भरत की ओर से प्रेम का रास्ता खुल जाता है। जिसके दर्शन के लिये यह बड़ी यात्रा चली है, उसके मित्र का मिलना भी उनके लिये प्रिय हो उठता है।

राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा॥
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई । कीन्ह जोहारु माथ महि लाई॥

चौपाई ९

गुह अपना गाँव, अपनी जाति और अपना नाम बताते हैं। फिर पृथ्वी पर माथा लगाकर जोहार करते हैं। उनके परिचय में अपनी सारी सामाजिक पहचान आती है। वसिष्ठ ने राम का सखा कहा था; गुह अपना ठिकाना और समुदाय भी बताते हैं। पर भरत दण्डवत् करते हुए उन्हें देखकर उठाते हैं और छाती से लगा लेते हैं। प्रणाम का उत्तर आलिंगन से मिलता है।

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।
मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ॥ १९३॥

दोहा १९३

दोहा इस भेंट की तुलना लक्ष्मण से मिलने के साथ करता है। भरत के हृदय में प्रेम समाता नहीं। जिन राम तक वे जा रहे हैं, उनके सखा को पाकर मानो छोटे भाई से ही भेंट हो गयी हो। उपमा गुह की निकटता को बहुत दूर तक ले जाती है। राम का मित्र होने का परिचय उन्हें भरत के पारिवारिक स्नेह तक पहुँचा देता है।

यही इस प्रसंग का अन्तिम दृश्य है। राम पर आक्रमण का भय लेकर शुरू हुई गुह की तैयारी भरत के वास्तविक आलिंगन तक आ पहुँची है। अभी आगे की बातचीत नहीं खुलती। यहाँ इतना पूरा हो गया है कि जिस भरत को लेकर युद्ध की आशंका थी, उन्हीं का हृदय राम के सखा को भाई जैसी आत्मीयता देता दिखायी पड़ता है। शंका के उत्तर में भरत का यह आचरण सामने है।

गुह उपहार लेकर मिलने आते हैं। वसिष्ठ उन्हें राम का सखा बताते हैं। भरत रथ से उतरते हैं और प्रणाम करते गुह को उठाकर ऐसे हृदय से लगाते हैं मानो लक्ष्मण से भेंट हुई हो।

और अन्त में, अपनी ओर

इस यात्रा में भरत का प्रेम बार बार किसी और के हित का ध्यान बनता है। अयोध्या छोड़ने से पहले राम की सम्पत्ति सुरक्षित की जाती है। माताओं के दुःख के कारण पालकियाँ सजती हैं। दोनों भाइयों का पैदल चलना सबके लिये कठिनाई बन सकता है, तो कौशल्या की सलाह स्वीकार करके वे रथ पर चढ़ते हैं। हमें हर बार प्रेम का कोई ठोस काम दिखता है, किसी वस्तु की रक्षा, किसी की सुविधा या साथ चलनेवालों की शक्ति का विचार।

गुह की ओर देखें तो समर्पण और विवेक के बीच का सम्बन्ध सामने आता है। वे राम के लिये प्राण देने को तैयार हैं। फिर भी भरत के विषय में उनका पहला निष्कर्ष गलत है। बुज़ुर्ग की बात सुनकर वे उस निष्कर्ष को जाँचने का अवसर देते हैं। भेंट से पहले यह मान लेना कि किसी का स्वभाव अभी जानना बाकी है, उसी समर्पण को सही दिशा देता है। युद्ध की तैयारी कर चुके व्यक्ति में भी नया विचार सुनने का स्थान रह सकता है।

और अन्त में भरत के लिये राम का सखा सुनना पर्याप्त होता है कि वे रथ से उतर आयें। पूरे रास्ते राम का स्मरण करनेवाले भाई को यहाँ उनके मित्र में आत्मीयता मिलती है। यह भेंट हमें सामनेवाले के सम्बन्ध को पहचानने का वह क्षण दिखाती है जहाँ पहले की दूरी घट जाती है। गुह का माथा धरती पर है, भरत उन्हें उठाकर हृदय से लगा रहे हैं, और कवि उस प्रेम को लक्ष्मण से मिलने की उपमा देता है।

अयोध्या से चले समाज का उद्देश्य अब गुह के सामने एक जीवित आचरण में दिखाई देता है। जिस भरत के बारे में उन्होंने शंका की थी, उन्हीं से इतना प्रेम मिलता है कि भेंट का अर्थ बदल जाता है। राम की ओर बढ़ती यात्रा में उनके दो प्रेमियों का परिचय हो गया है।

दोहा इस आलिंगन को भरत के हृदय में न समानेवाले प्रेम पर छोड़ता है। राम से मिलना अभी आगे है। यहाँ उनके सखा से मिलने का आनन्द इतना है कि भरत को मानो लक्ष्मण मिल गये हों।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १८५ से १९३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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