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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 8
सीता का साथ चलने का आग्रह
राम वन के कष्ट गिनाते हैं। सीता उनके वियोग का दुःख सामने रखती हैं, साथ चलने की अनुमति पाती हैं और माता के आशीर्वाद लेकर विदा होती हैं।
राम को माता के समीप बोलने में संकोच होता है, और वे मन में समय समझकर सीता से बोलते हैं। वे उनसे घर रहने को कहते हैं, और वन का वर्णन करते हैं। जब सीता बोलती हैं, तो पहले सास से बोलती हैं। उनके चरण छूकर वे अपनी बड़ी अविनय की क्षमा माँगती हैं।
रामचरितमानस के इस प्रसंग में सीता राम से साथ ले चलने की विनती करती हैं। वे बताती हैं कि रास्ते में वे उनकी सेवा कैसे करेंगी। उनकी दशा देखकर राम उन्हें साथ चलने को कहते हैं। वे माता के चरण छूते हैं और आशीर्वाद पाते हैं। सीता सास के चरण छूती हैं, और उनके जाने से पहले कौसल्या उन्हें आशीर्वाद देती हैं।
राम, सीता और उनकी माता
- राम सीता को घर रहने की सीख देते हैं। उनकी दशा देखकर वे उन्हें साथ चलने को कहते हैं, और माता के चरण छूकर आशीर्वाद पाते हैं।
- सीता राम के वियोग को सबसे बड़ा दुःख मानकर साथ चलने का आग्रह करती हैं और सास से स्नेह और आशीर्वाद लेकर विदा होती हैं।
- कौसल्या राम की माता और सीता की सास। उनकी सेवा के लिये राम सीता को घर रखना चाहते हैं। उनके आशीर्वाद से विदाई पूरी होती है।
माता के लिये घर रहिये
माता के समीप राम को सीता से कहने में संकोच होता है। वे मन में समय समझकर बोलते हैं, और उन्हें राजकुमारी कहकर पुकारते हैं: सीख सुनिये, और मन में कुछ दूसरी तरह मत समझिये।
वे कहते हैं: यदि आप अपना और मेरा भला चाहती हैं, तो मेरा वचन मानकर घर रहिये। यह मेरी आज्ञा है, और सास की सेवा है। घर रहने में हर तरह भलाई है। आदर से सास और ससुर के चरणों की पूजा से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं।
जब जब माता उन्हें याद करेंगी, प्रेम से व्याकुल होकर उनकी बुद्धि भोली हो जायगी। तब सीता कोमल वाणी में पुरानी कथाएँ सुनाकर उन्हें समझायें।
वे कहते हैं कि यह बात वे स्वभाव से कह रहे हैं, और उन्हें सैकड़ों सौगन्ध हैं। उनका कहना है कि वे सीता को माता के हित के लिये घर रखते हैं।
राम कहते हैं कि गुरु और वेद के माने हुए धर्म का फल बिना क्लेश के मिलता है। हठ के वश गालव और राजा नहुष ने सब संकट सहे। और वे पिता का वचन सत्य करके जल्दी लौटेंगे। दिन बीतते देर नहीं लगेगी।
नंगे पाँव का रास्ता और ऋतु का आहार
वे चेताते हैं कि यदि प्रेम के वश हठ करेंगी, तो अन्त में दुःख पायेंगी। वन कठिन है और बहुत भयानक है। धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा, सब घोर हैं।
रास्ते में कुश, काँटे और तरह तरह के कंकड़ हैं, और उन पर बिना जूतों के पैदल चलना होगा। आपके चरण कोमल और सुन्दर हैं, और रास्ते में बड़े बड़े दुर्गम पर्वत हैं।
पर्वतों की गुफाएँ और खोहें हैं, नदियाँ, नद और नाले हैं। वे अगम और अगाध हैं, उनकी ओर देखा नहीं जाता।
रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी गरजते हैं, और सुनकर धीरज भाग जाता है।
जमीन पर सोना होगा, पेड़ों की छाल पहननी होगी और कन्द, फल और मूल खाने होंगे। क्या ये सदा, हर दिन मिलेंगे? सब कुछ समय के अनुकूल मिलता है।
हंसिनी के लिये खारा समुद्र
राम आगे कहते हैं: वहाँ मनुष्यों को खानेवाले निशाचर घूमते हैं, जो करोड़ों तरह के कपट रूप धर लेते हैं। पहाड़ का पानी बहुत लगता है। वन की विपत्ति का बखान नहीं हो सकता।
वहाँ भीषण साँप हैं, भयानक पक्षी हैं, और स्त्री पुरुषों को चुरा ले जानेवाले राक्षसों के झुंड हैं। घने वन की याद आने पर धीर लोग डर जाते हैं, और मृगलोचनी, आप स्वभाव से भीरु हैं। आप वन के योग्य नहीं। सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे।
वे पूछते हैं: जिस हंसिनी को मानसरोवर के अमृत जैसे जल ने पाला हो, वह खारे समुद्र में कैसे जियेगी?
जो कोयल नये आम के बाग में विहार करती है, क्या वह करील के जंगल में शोभा पाती है? हृदय में ऐसा विचारकर घर रहिये। चन्द्रमुखी, वन में बहुत दुःख है।
वे कहते हैं: स्वभाव से हितैषी गुरु और स्वामी की सीख जो सिर माथे नहीं रखता, उसे जी भरकर पछताना पड़ता है। उसके हित की हानि होती है।
शीतल सीख से भरे हुए नेत्र
राम के कोमल और मनोहर वचन सुनकर सीता की आँखें भर आती हैं। वह शीतल सीख उन्हें वैसे ही जलाने लगी जैसे शरद की चाँदनी रात चकवी को जलाती है।
उनसे कोई उत्तर नहीं बनता। सीता व्याकुल हैं। पवित्र और स्नेही स्वामी उन्हें छोड़कर जाना चाहते हैं। वे जबरदस्ती आँखों का जल रोकती हैं और हृदय में धीरज धरती हैं।
सीता सास के चरण छूकर हाथ जोड़कर कहती हैं: देवी, मेरी बड़ी अविनय क्षमा कीजिये। प्राणपति ने मुझे वही सीख दी है जिससे मेरा परम हित हो। और मैंने मन में समझकर देख लिया है कि प्रिय के वियोग के समान दुःख संसार में कोई नहीं।

फिर वे राम से कहती हैं: हे प्राणनाथ, आपके बिना स्वर्ग नरक के समान है।
वे कहती हैं: माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रों का समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन, सहायक, और सुन्दर, सुशील, सुख देनेवाला पुत्र। हे नाथ, जहाँ तक स्नेह और नाते हैं, प्रिय के बिना स्त्री को वे सूर्य से भी बढ़कर तपानेवाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पति के बिना सब शोक का समाज है।
वे कहती हैं: भोग रोग के समान हैं, आभूषण भार हैं, और संसार यम की यातना के समान है। हे प्राणनाथ, आपके बिना जगत् में कहीं कुछ मुझे सुख देनेवाला नहीं। जैसे प्राण के बिना देह और जल के बिना नदी, वैसे ही हे नाथ, पुरुष के बिना स्त्री है। हे नाथ, आपके साथ सब सुख हैं, शरद के निर्मल चन्द्रमा रूपी आपका मुख निहारते हुए।
साथ हो तो वन भी नगर
सीता कहती हैं: हे नाथ, आपके साथ पक्षी और पशु परिवार हैं, वन नगर है, और पेड़ों की छाल निर्मल, सुन्दर वस्त्र है। आपके साथ पत्तों की कुटी स्वर्ग के समान सुख की जड़ है।
वे कहती हैं कि उदार वनदेवियाँ और वनदेवता सास ससुर के समान उनकी सार-सँभार करेंगे। कुश और पत्तों का सुहावना बिछौना राम के साथ कामदेव की मनोहर तोशक है।
कन्द, मूल और फल अमृत का आहार हैं, और पहाड़ अयोध्या के सैकड़ों महलों के समान हैं।
वे कहती हैं कि पल पल राम के चरणकमल देखते हुए वे वैसे ही आनन्दित रहेंगी जैसे दिन में चकवी।
वे कहती हैं: हे नाथ, आपने वन के बहुत से दुःख, भय, विषाद और सन्ताप कहे हैं। वे सब मिलकर आपके वियोग के लवलेश के समान नहीं होते। यह जानकर मुझे साथ ले चलिये, मत छोड़िये। हे स्वामी, अधिक विनती क्या करूँ, आप करुणामय और अन्तर्यामी हैं।
वे कहती हैं: यदि अवधि भर मुझे अयोध्या में रखेंगे, तो जान लीजिये, मेरे प्राण नहीं रहेंगे। पोद्दार की टीका इस अवधि को चौदह वर्ष बताती है। वे राम को दीनों का सहारा और शील और स्नेह का भण्डार कहकर पुकारती हैं।
छाया में बैठकर सेवा करूँगी
वे कहती हैं: राह चलते मुझे थकावट नहीं होगी, पल पल आपके चरणकमल निहारते हुए। हे प्रियतम, मैं हर तरह से आपकी सेवा करूँगी, और रास्ते की सारी थकान दूर करूँगी।
वे कहती हैं: आपके पैर धोकर पेड़ की छाया में बैठकर प्रसन्न मन से हवा करूँगी। पसीने की बूँदों से भरा आपका साँवला शरीर देखते हुए, प्राणपति को देखते हुए, दुःख का समय कहाँ रहेगा?
वे कहती हैं: समतल भूमि पर घास और पेड़ों के पत्ते बिछाकर दासी सारी रात आपके चरण दबायेगी। बार बार आपकी कोमल मूर्ति निहारते हुए मुझे गरम हवा नहीं लगेगी।
वे कहती हैं: आपके साथ मेरी ओर कौन देखनेवाला है, जैसे सिंहनी की ओर खरगोश और सियार?
फिर वे पूछती हैं: क्या मैं सुकुमारी हूँ और आप वन के योग्य हैं? आपके लिये तप उचित है और मेरे लिये भोग?
अन्त में वे कहती हैं: ऐसे कठोर वचन सुनकर भी यदि हृदय नहीं फटा, तो हे प्रभु, ये पामर प्राण आपके वियोग का भीषण दुःख सहेंगे।
राम का साथ चलने को कहना, और माता के वचन
ऐसा कहकर सीता बहुत व्याकुल हो जाती हैं। वचन से कहा गया वियोग वे नहीं सँभाल पातीं। राम उनकी दशा देखकर मन में जान लेते हैं कि हठ से रखने पर वे प्राण नहीं रखेंगी।
राम कहते हैं: चिन्ता छोड़कर साथ वन चलिये। आज विषाद का अवसर नहीं है। जल्दी वन चलने की तैयारी कीजिये। वे प्रिय वचन कहकर सीता को समझाते हैं।
राम माता के चरण छूते हैं और आशीर्वाद पाते हैं। टीका के अनुसार माता कहती हैं: जल्दी लौटकर प्रजा का दुःख मिटाइये, और निठुर माता को भूल न जाइये।
वे विधाता से पूछती हैं: क्या मेरी दशा फिर बदलेगी? क्या मैं आँखों से मनोहर जोड़ी देख पाऊँगी? फिर कहती हैं: हे तात, वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी, जब माता जीते जी आपका मुखचन्द्र देखेगी?
वे कहती हैं: हे तात, फिर कब वत्स कहकर, लाल कहकर, रघुपति और रघुवर कहकर आपको बुलाऊँगी? कब हृदय से लगाकर प्रसन्न मन से आपके अंग निहारूँगी?
माता स्नेह से अधीर हैं। उनसे बोल नहीं निकलता, और वे बहुत व्याकुल हैं। उन्हें ऐसा देखकर राम बहुत तरह से समझाते हैं। उस समय और उस स्नेह का वर्णन नहीं हो सकता।
सेवा अधूरी रही, स्नेह बना रहे
तब सीता सास के चरण छूती हैं और कहती हैं: माता, सुनिये, मैं बहुत अभागिनी हूँ। सेवा के समय दैव ने वन दे दिया, और मेरा मनोरथ सफल नहीं किया।
वे कहती हैं: आप क्षोभ छोड़ दीजिये, स्नेह मत छोड़िये। कर्म कठिन है, मेरा भी कुछ दोष नहीं।
सीता की बात सुनकर सास व्याकुल हो उठती हैं। उनकी दशा कैसे कही जाये? वे सीता को बार बार हृदय से लगाती हैं, और धीरज धरकर सीख और आशीर्वाद देती हैं।
उनका आशीर्वाद है: जब तक गंगा और यमुना में जल की धारा बहे, तब तक आपका सुहाग अचल रहे।
सास सीता को अनेक प्रकार से आशीर्वाद और सीख देती हैं।
सीता बड़े प्रेम से बार बार सास के चरणकमलों में सिर नवाती हैं और चल पड़ती हैं।
प्रसंग का क्रम
माता के समीप राम सीता को सीख देते हैं। वे माता के हित के लिये घर रहें, यह बात वे सैकड़ों सौगन्ध खाकर कहते हैं। वे वन की धूप, जाड़े, वर्षा और हवा की, रास्तों, पशुओं, भोजन और निशाचरों की बात कहते हैं। सीता की आँखें भर आती हैं, और उनसे उत्तर नहीं बनता। वे सास से क्षमा माँगती हैं, और उनसे कहती हैं कि प्रिय के वियोग के समान दुःख संसार में कोई नहीं। वे राम से कहती हैं कि वन के सब दुःख मिलकर उनके वियोग के लवलेश के समान नहीं। वे विनती करती हैं कि मुझे मत छोड़िये, और कहती हैं कि अवधि भर अयोध्या में रखने पर उनके प्राण नहीं रहेंगे। राम उन्हें साथ वन चलने और जल्दी तैयारी करने को कहते हैं। वे प्रिय वचनों से उन्हें समझाते हैं, और माता के चरण छूते हैं। राम माता को बहुत तरह से समझाते हैं। सीता सास से विनती करती हैं कि स्नेह मत छोड़िये। कौसल्या उन्हें बार बार हृदय से लगाती हैं, सीख देती हैं, और अचल सुहाग का आशीर्वाद देती हैं। सीता चल पड़ती हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 61 से 69, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।