रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · सीता का साथ चलने का आग्रह
सीता का साथ चलने का आग्रह
राम वन के कष्ट गिनाते हैं। सीता उनके वियोग का दुःख सामने रखती हैं, साथ चलने की अनुमति पाती हैं और माता के आशीर्वाद लेकर विदा होती हैं।
राम के सामने सीता हैं और समीप माता। जो बात कहनी है, उसे माता के सामने कहते हुए संकोच होता है। फिर राम समय की आवश्यकता समझकर बोलते हैं। उनका प्रस्ताव है कि सीता घर रहें, उनकी आज्ञा मानें और माता की सेवा करें। सीता का हित समझाते हुए वे वन के इतने कष्ट गिनाते हैं कि वहाँ चलना कठिन ही दिखाई देता है। पर जिन्हें यह सब सुनाया जा रहा है, उनके लिये सबसे कठिन बात उन कष्टों में शामिल ही नहीं है। वह है राम के बिना रहना।
तुलसीदास के रामचरितमानस में यह संवाद दोनों की बात को पूरा सुनने देता है। राम धरती, रास्ते, ऋतु, आहार और भय का विचार रखते हैं। सीता उसी वन में सेवा के अवसर देखती हैं और अपने लिये वियोग की पीड़ा बताती हैं। उनके शब्दों में पेड़ की छाया, चरण धोने का सुख और पत्तों का बिछौना आकार लेते हैं। फिर अनुमति मिलती है, पर विदाई अभी बाकी रहती है। माता को पुत्र और पुत्रवधू को आशीर्वाद देना है, और सीता को उन्हीं माता से सेवा अधूरी छूटने की क्षमा माँगनी है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम सीता को घर रहने की सीख देते हैं, उनका पूरा निवेदन सुनकर साथ चलने की अनुमति देते हैं और माता से आशीर्वाद लेते हैं।
- सीता राम के वियोग को सबसे बड़ा दुःख मानकर साथ चलने का आग्रह करती हैं और सास से स्नेह तथा आशीर्वाद लेकर विदा होती हैं।
- राम की माता राम की माता और सीता की सास, जिनकी सेवा की बात से संवाद खुलता है और जिनके आशीर्वाद से विदाई पूरी होती है।
माता के लिये घर रहिये
राम बोलने से पहले अपने मन में समय का विचार करते हैं। माता निकट हैं, इसलिए सीता से ऐसी बात कहने में संकोच स्वाभाविक है। फिर भी बात टाली नहीं जा सकती। वे उन्हें राजकुमारी कहकर सम्बोधित करते हैं और पहले ही सावधान करते हैं कि उनकी सीख का कोई दूसरा अर्थ न लिया जाय। इसी आरम्भ में उनकी चिन्ता सुनाई देती है। वे सीता से दूर जाने की बात कह रहे हैं, पर चाहते हैं कि सीता उस बात के भीतर उनका हित भी पहचानें।
मातु समीप कहत सकुचाहीं । बोले समउ समुझि मन माहीं॥
चौपाई १
राजकुमारि सिखावनु सुनहू । आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥
वे कहते हैं, अपना और मेरा भला चाहती हैं तो मेरा वचन मानकर घर रहिये। इससे मेरी आज्ञा का पालन होगा और सास की सेवा भी बन पड़ेगी। घर रहने में सब प्रकार से भलाई है। उनके कथन में घर का सुख केवल रहने की सुविधा से नहीं बनता। वहाँ माता हैं, जिनके पास रहना और जिनकी देखभाल करना एक आवश्यक काम है। सीता के रुकने का कारण वे उसी सेवा में रखते हैं और आदरपूर्वक सास तथा ससुर के चरणों की सेवा को सबसे बढ़कर धर्म कहते हैं।
इसके बाद राम माता की उस दशा का विचार करते हैं जो उनके चले जाने पर होगी। जब भी उन्हें पुत्र की याद आयेगी, वे प्रेम से व्याकुल हो उठेंगी। उस व्याकुलता में अपने को भी भूल जायेंगी। ऐसे समय सीता को कोमल वाणी में पुरानी कथाएँ सुनानी हैं और उन्हें समझाना है। इस छोटे से उपाय को ध्यान से देखिये। राम याद आने से रोकने को नहीं कहते। स्मरण तो बार बार उठेगा ही। वे उस घड़ी के लिये किसी अपने की मीठी वाणी माँगते हैं।
उनका आग्रह और स्पष्ट होता है। वे सैकड़ों सौगन्ध कहकर विश्वास दिलाते हैं कि सीता को घर रखने की बात माता के हित के लिये ही कह रहे हैं। संकोच में शुरू हुई वाणी अब अपना कारण पूरा खोल देती है। माता को सान्त्वना देनेवाली पुत्रवधू होगी, और दूर जाते पुत्र को यह विश्वास रहेगा कि उनकी व्याकुलता के समय कोई उनका मन सँभालेगा। राम सीता की अनुपस्थिति में अपनी कठिनाई का बखान यहाँ नहीं करते। वे सीता की उपस्थिति से माता को मिलनेवाला सहारा सामने रखते हैं।
गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।
दोहा ६१
हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥ ६१॥
राम कहते हैं कि इस प्रकार गुरु और वेद को मान्य धर्म का फल बिना क्लेश के प्राप्त होगा। इसके साथ वे हठ का परिणाम भी याद दिलाते हैं, गालव मुनि और राजा नहुष ने हठवश संकट सहे। दोनों नाम इसी सीख के उदाहरण बनकर आते हैं। अभी की बात सीता के निर्णय की है, इसलिए राम उसी पर लौटते हैं। वे पिता के वचन को सत्य करके शीघ्र वापस आने का आश्वासन देते हैं। दिन बीतने में देर नहीं लगेगी, इस भरोसे के साथ वे फिर अपनी सीख सुनने को कहते हैं।
यहाँ लौटने का आश्वासन सेवा के आग्रह से जुड़ा है। राम चाहते हैं कि सीता प्रतीक्षा को सम्भाल सकें और माता की प्रतीक्षा भी सँभालें। इसलिए उनके कथन में आज्ञा, धर्म, घर का हित और शीघ्र लौटने का भरोसा एक साथ रखे गये हैं। अभी वन का विस्तृत वर्णन बाकी है। पहले उन्होंने यह बताया है कि घर में रहकर कौन सा काम होगा और उस काम से किसका दुःख कुछ हलका पड़ सकेगा। सीता के लिये यही प्रस्ताव आगे चलकर सबसे कठिन प्रश्न बननेवाला है।
राम सीता को माता की सेवा के लिये घर रहने को कहते हैं। वे पुरानी कथाओं और कोमल वाणी से माता को सँभालने का उपाय बताते हैं, धर्म का फल समझाते हैं और पिता का वचन पूरा करके शीघ्र लौटने का भरोसा देते हैं।
नंगे पाँव का रास्ता और ऋतु का आहार
अब राम उस वन की बात कहते हैं जहाँ वे जा रहे हैं। यदि प्रेमवश हठ करके सीता साथ चलेंगी तो अन्त में उन्हें दुःख होगा, यह उनकी चेतावनी है। वन को वे कठिन, भयानक और बड़ा क्लेश देनेवाला बताते हैं। वहाँ की धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा, चारों का विचार करना होगा। किसी एक सुहावने दिन से वहाँ के निवास का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। वे रहने की पूरी दशा सीता के सामने रख रहे हैं, जिसमें मौसम का सामना भी अपने शरीर से करना है।
कुस कंटक मग काँकर नाना । चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥
चौपाई २
चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे । मारग अगम भूमिधर भारे॥
रास्ते में कुश हैं, काँटे हैं और तरह तरह के कंकड़ हैं। उन्हीं पर बिना जूतों के पैदल चलना होगा। इस बात के साथ राम सीता के कोमल और सुन्दर चरणों का स्मरण करते हैं। धरती की कठोरता और पाँव की कोमलता एक ही विचार में आ जाती है। आगे बड़े बड़े दुर्गम पर्वत हैं। रास्ते का कष्ट किसी एक काँटे को बचाकर निकल जाने से समाप्त नहीं होगा। भूमि ऊँची होगी, चढ़ाई कठिन होगी और उन चरणों को सारा मार्ग स्वयं तय करना होगा।
वे पर्वत की गुफाओं और खोहों का नाम लेते हैं, फिर नदियाँ, नद और नाले गिनाते हैं। उनकी अगमता और गहराई ऐसी है कि उधर देखने तक का साहस नहीं पड़ता। अभी कोई नदी पार नहीं की जा रही है। राम उस यात्रा का अनुमान सीता को दे रहे हैं जिसमें राह की रुकावटें अनेक प्रकार की होंगी। कहीं पाँव के नीचे कंकड़ हैं, कहीं सामने दुर्गम पर्वत, और कहीं गहरी जलधारा। इस क्रम में चलते हुए उनका वर्णन वन का भय सीता के समीप ले आता है।
फिर वन के पशुओं की आवाजें हैं। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे शब्द करते हैं कि सुनते ही धीरज भाग जाय। राम केवल सामने खड़े किसी पशु के आक्रमण की बात नहीं कहते। उनका संकेत उस भय की ओर भी है जो उसकी आवाज सुनने भर से हो सकता है। सीता को साथ ले जाने के विषय में सोचते हुए वे राह की कठिनाई और मन का भय दोनों गिनाते हैं। वे चाहते हैं कि प्रेम के आग्रह में इन बातों का भार कम करके न आँका जाय।
भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।
दोहा ६२
ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल॥ ६२॥
दिन के रास्ते के बाद रात का ठिकाना आता है। जमीन पर सोना होगा, पेड़ों की छाल के वस्त्र पहनने होंगे और कन्द, मूल तथा फल भोजन होंगे। इतना कह देने पर वनजीवन का एक व्यवस्थित चित्र बन सकता था, जैसे यह सब रोज उपलब्ध रहेगा। राम उसी अनुमान को प्रश्न से रोक देते हैं। क्या ये चीजें भी सदा, हर दिन मिलेंगी? जो कुछ मिलेगा, अपने समय के अनुकूल ही मिलेगा। भोजन का प्रकार तय कर लेने से उसके हर दिन मिलने का भरोसा नहीं बन जाता।
यह प्रश्न उनके वनवर्णन को और कठोर करता है। कोमल शय्या के स्थान पर भूमि और अच्छे वस्त्रों के स्थान पर छाल स्वीकार कर लेना एक बात है। भोजन की उपलब्धता भी समय पर निर्भर हो, तो जीवन की कठिनाई और बढ़ती है। राम सीता के सामने इस अनिश्चितता को भी रहने देते हैं। उनके आश्वासन में पिता का वचन पूरा करके लौटना है, पर बीच के निवास को सहज कहकर वे छिपाते नहीं। जिस राह से जाना है, उसके प्रति उनकी वाणी पूरी सावधानी बरतती है।
राम धूप, शीत, वर्षा, हवा, नंगे पाँव के काँटों और कंकड़ों, दुर्गम पर्वतों, गहरी जलधाराओं तथा पशुओं की भयानक आवाजों का वर्णन करते हैं। भूमि पर शयन, छाल के वस्त्र और कन्द मूल फल का भोजन होगा, जिसकी उपलब्धता भी समय पर निर्भर रहेगी।
हंसिनी के लिये खारा समुद्र
वन का वर्णन अभी पूरा नहीं हुआ। राम मनुष्यों को खानेवाले निशाचरों का भय बताते हैं। वे घूमते रहते हैं और करोड़ों प्रकार के कपट रूप धारण कर सकते हैं। इसलिए दिखाई देनेवाला रूप भी भरोसे का आधार नहीं होगा। पहाड़ के पानी के बारे में भी वे चेताते हैं कि वह बहुत लगता है। वन की विपत्ति का पूरा बखान करना कठिन है। राह, ऋतु और भोजन की कठिनाइयों के बाद उनके कथन में ऐसे संकट आते हैं जिनसे सावधान रहना भी सहज नहीं है।
भीषण साँप, भयानक पक्षी और स्त्री पुरुषों को चुरा ले जानेवाले राक्षसों के झुंड वहाँ रहते हैं। वन का स्मरण मात्र धीर व्यक्तियों को डरा देता है। फिर राम सीता को मृगलोचनी कहकर उनके स्वभाव की भीरुता याद दिलाते हैं। इस सम्बोधन में वही कोमलता है जिसे वे संकट के बीच ले जाने से हिचक रहे हैं। वे सीता को वन के योग्य नहीं मानते और कहते हैं कि उनके वन जाने की बात सुनकर लोग उन्हें अपयश देंगे। सीता की कठिनाई के साथ अपने ऊपर आनेवाला लोक का उलाहना भी उनकी चिन्ता में है।
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू । सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥
चौपाई ३
मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥
यहाँ हंसिनी की उपमा आती है। जिसे मानसरोवर के अमृत जैसे जल ने पाला हो, वह खारे समुद्र में कैसे जी सकेगी? पानी दोनों जगह है, पर उस हंसिनी के लिये दोनों के जल में बड़ा भेद है। राम की दृष्टि सीता की कोमलता पर है। उन्हें साथ चलने की इच्छा दिखाई दे रही है, फिर भी उनकी चिन्ता बनी हुई है कि जिन कठिन दशाओं में रहना होगा, वे उस कोमलता के प्रतिकूल हैं। हंसगामिनी कहकर उन्होंने चाल का सौन्दर्य याद किया था, अब हंसिनी के जीवन की दशा सामने रखते हैं।
इसके बाद दूसरी उपमा है। नये आम्रवन में विहार करनेवाली कोयल करील के जंगल में कहाँ शोभा पायेगी? कोयल वही रहेगी, किन्तु उसका परिचित वन बदल जायेगा। दोनों उपमाओं में राम उस अन्तर पर बल देते हैं जो सीता के अब तक के सुख और आगे के कठिन निवास के बीच है। वे चन्द्रमुखी कहकर फिर घर रहने को कहते हैं। इतना सब हृदय में विचार लीजिये, वन में भारी दुःख है। बात घूमकर उसी निर्णय पर लौट आयी है जिससे उन्होंने आरम्भ किया था।
सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।
दोहा ६३
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥ ६३॥
राम अपनी सीख को हित चाहनेवाले की सीख कहकर समाप्त करते हैं। स्वभाव से हितैषी गुरु और स्वामी की बात जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, उसे हृदय भरकर पछताना पड़ता है और उसके हित की हानि होती है। यह बात वे सीता से कह रहे हैं, जिन्हें कष्ट से बचाना चाहते हैं। उनकी वाणी में आग्रह भी है और स्नेह भी। वे वन के भय, घर के धर्म और माता के सहारे, सब ओर से सीता को रुकने का कारण दे चुके हैं। अब उत्तर देने की बारी सीता की है।
राम राक्षसों के कपट रूप, पहाड़ी पानी, सर्पों, पक्षियों और अपहरण करनेवाले निशाचरों का भय भी बताते हैं। हंसिनी और कोयल की उपमाओं से सीता की कोमलता समझाकर वे हितैषी की सीख मानने का आग्रह करते हैं।
शीतल सीख से भरे हुए नेत्र
राम के वचन कोमल और मनोहर हैं। सुनकर सीता के सुन्दर नेत्र जल से भर जाते हैं। तुलसी उस सीख को शीतल कहते हैं, और फिर बताते हैं कि वही सीता को जलाने लगी। उपमा शरद की चाँदनी रात और चकवी की है। जो शीतलता बाहर से पहचानी जाती है, वही वियोग की दशा में दाह देती है। सीता के सामने यही कठिनाई है। प्रियतम उन्हें दुःख से बचाने के लिये कह रहे हैं, और बचाने की उस बात में उनसे बिछुड़ने का दुःख सुनाई पड़ रहा है।
पहले उनसे कोई उत्तर बनता ही नहीं। वे इस विचार से व्याकुल हैं कि पवित्र और स्नेही स्वामी उन्हें छोड़कर जाना चाहते हैं। फिर वे जबरदस्ती आँसू रोकती हैं, हृदय में धीरज धारण करती हैं और बोलने का प्रयत्न करती हैं। इतना लम्बा उत्तर उसी क्षण निकलना शुरू होता है जब रोने को रोकने के लिये बल लगाना पड़ा है। उनके धीरज में दुःख की कमी नहीं हुई। वह दुःख अब ऐसे शब्द माँग रहा है जिन्हें सामने दोनों अपने सुन सकें।
लागि सासु पग कह कर जोरी । छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी॥
चौपाई ४
दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई । जेहि बिधि मोर परम हित होई॥
सीता पहले सास के चरण लगती हैं, हाथ जोड़ती हैं और अपनी बड़ी अविनय की क्षमा माँगती हैं। राम से उत्तर का सम्बन्ध है, पर बोलने की विनय माता के सामने रखी जाती है। वे स्वीकार करती हैं कि प्राणपति ने वही शिक्षा दी है जिसमें उनका परम हित हो। इसके बाद अपनी समझ कहती हैं: मन में विचार करके उन्होंने देख लिया है कि प्रिय के वियोग जैसा दुःख संसार में कोई नहीं है। उनकी बात राम के स्नेह पर अविश्वास से नहीं उठती। वे उसी हित की अपनी अनुभूति कहने लगी हैं।
प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।
दोहा ६४
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥ ६४॥
अब सम्बोधन राम की ओर है। प्राणनाथ, करुणा के धाम, सुन्दर, सुख देनेवाले, सुजान और रघुकुल रूपी कुमुद को खिलानेवाले चन्द्रमा कहकर वे बोलती हैं। आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नरक के समान है। सुख की सबसे ऊँची कल्पना तक उनके लिये वियोग को हलका नहीं कर सकती। इसलिए घर में मिलनेवाली सुविधा का आश्वासन उनके प्रश्न को नहीं सुलझाता। जिसे वे सुख कहती हैं, उसमें राम का साथ होना आवश्यक है। उनके कथन की आगे की सारी उपमाएँ इसी अनुभव को खोलती हैं।
सीता स्नेह के नातों को गिनाती हैं। माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्रिय परिवार, मित्रों का समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन और सहायक, फिर सुन्दर, सुशील और सुख देनेवाले पुत्र तक का सम्बन्ध। यह नातों का व्यापक विचार है। वे कहती हैं कि पति के बिना स्त्री को स्नेह और सम्बन्ध भी सूर्य से अधिक तपानेवाले लगते हैं। इसी क्रम में शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य का नाम आता है। सीता के कहे में पति से वंचित होने पर ये सब शोक का समुदाय बन जाते हैं।
वे भोगों को रोग के समान, आभूषणों को भार और संसार को यम की यातना जैसा बताती हैं। हे प्राणनाथ, आपके बिना जगत में कहीं कुछ भी मुझे सुख देनेवाला नहीं है। फिर उपमा और निकट आती है: प्राण के बिना देह और जल के बिना नदी। वे राम से अपने सम्बन्ध को इसी अनिवार्यता के साथ रखती हैं। उनका शरद के निर्मल चन्द्रमा जैसा मुख देखती रहें, तो साथ में सारे सुख होंगे। पहले चाँदनी वियोग के कारण जलाती थी, अब वही निर्मल चन्द्रमा जैसा मुख साथ के सुख का रूप हो जाता है।
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥
चौपाई ५
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें । सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥
सीता आँसू रोककर पहले सास से बोलने की क्षमा माँगती हैं। राम के हितकारी भाव को स्वीकार करते हुए वे कहती हैं कि उनके लिये प्रिय का वियोग सबसे बड़ा दुःख है, जिसके सामने स्वर्ग, सम्बन्ध, सम्पत्ति और भोग कोई सुख नहीं दे सकते।
साथ हो तो वन भी नगर
सीता अब उसी वन का उत्तर देती हैं जिसका भय राम ने बताया था। उनके कथन में वन की वस्तुएँ बनी रहती हैं, पर राम के साथ उनका अनुभव बदल जाता है। पक्षी और पशु उनके परिजन होंगे, वन उनका नगर होगा और पेड़ों की छाल निर्मल, सुन्दर वस्त्र होगी। पत्तों की कुटी स्वर्ग के समान सुख देनेवाली होगी। यह अभी सीता की कही हुई सम्भावना है। वे बता रही हैं कि साथ चलने की अनुमति मिलने पर उस कठिन जीवन को किस भाव से अपनायेंगी।
खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।
दोहा ६५
नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल॥ ६५॥
राम ने घर में माता की सेवा का धर्म रखा था। सीता के वनविचार में वनदेवी और वनदेवता उदार होकर सास ससुर की तरह उनकी सार सँभार करेंगे। जहाँ परिचित सम्बन्ध छूटते दिखाई दे रहे हैं, वे वहाँ भी अपनापन देखती हैं। कुश और पत्तों का बिछौना राम के साथ उन्हें कामदेव की मनोहर तोशक के समान लगेगा। जमीन पर सोने का कष्ट उन्होंने सुना है। अब वे उसी बिछौने का अपना अनुभव बताती हैं, जिसमें साथ होने से उसका कठोरपन दुःख का माप नहीं रह जाता।
कन्द, मूल और फल उन्हें अमृत के समान आहार लगेंगे। वन के पर्वत अयोध्या के सैकड़ों महलों के बराबर होंगे। जिन पर्वतों को राम ने कठिन मार्ग के रूप में सामने रखा था, सीता उन्हीं के लिये यह उपमा कहती हैं। उनके कथन में वैभव की तुलना बार बार आती है, किन्तु हर बार उसकी पूर्ति किसी साधारण वनवस्तु में हो जाती है। छाल से वस्त्र का सुख, पत्तों से शय्या का सुख, फल से अमृत का स्वाद और पर्वतों से महलों का सुख मिल सकता है, क्योंकि प्रिय साथ होंगे।
उनकी प्रसन्नता का कारण अगले वचन में और साफ होता है। वे क्षण क्षण प्रभु के चरणकमल देखती रहेंगी और दिन की चकवी की तरह आनन्दित रहेंगी। चकवी का चित्र फिर आया है। पहले शरद की रात में उसकी पीड़ा सीता की दशा समझा रही थी। अब दिन में उसका आनन्द सीता की आशा समझाता है। राम के मुख और चरणों का दर्शन उनके उत्तर में बार बार लौटता है। वन में क्या मिलेगा, इस प्रश्न के साथ उनके मन में यह विश्वास है कि जिन्हें देखना चाहती हैं वे सामने रहेंगे।
सीता राम के गिनाये हुए कष्टों को याद करती हैं। आपने अनेक दुःख, भय, विषाद और सन्ताप कहे हैं, वे कहती हैं। पर वे सब एक साथ मिलकर भी आपके वियोग के दुःख के छोटे से अंश के समान नहीं होंगे। यह उनका निर्णय है। वे सुजानशिरोमणि से निवेदन करती हैं कि इस बात को मन में जानकर उन्हें साथ ले लिया जाय, यहाँ छोड़ न दिया जाय। अधिक विनय क्या करें, जिनसे कह रही हैं वे करुणामय हैं और हृदय के भीतर की बात जानते हैं।
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।
दोहा ६६
दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान॥ ६६॥
दोहा इस निवेदन को प्राणों तक ले आता है। सीता कहती हैं कि अवधि भर अयोध्या में रखेंगे तो जान लीजिये, प्राण नहीं रहेंगे। पोद्दार की टीका इस अवधि को चौदह वर्ष कहकर स्पष्ट करती है। राम ने दिन शीघ्र बीतने का भरोसा दिया था। सीता अपनी दशा बताती हैं कि इतना वियोग उनके जीवन से नहीं निभेगा। वे उन्हें दीनबन्धु, सुन्दर, सुख देनेवाले तथा शील और स्नेह के भण्डार कहकर पुकारती हैं। अभी भी निवेदन उसी करुणा को सम्बोधित है जिससे राम उनका हित चाहते हैं।
सीता राम के साथ वन को नगर, पशु पक्षियों को परिवार, छाल को सुन्दर वस्त्र और पर्णकुटी को स्वर्ग के समान मानती हैं। उनके लिये वन के सारे दुःख मिलकर भी वियोग का थोड़ा सा अंश नहीं हैं, और चौदह वर्ष अलग रहने पर प्राण नहीं बचेंगे।
छाया में बैठकर सेवा करूँगी
सीता की बात केवल वन के सुखद अनुभव की कल्पना पर नहीं रुकती। वे बताती हैं कि साथ जाकर क्या करेंगी। राह चलते क्षण क्षण राम के चरणकमल देखती रहेंगी, इसलिए उन्हें थकावट नहीं होगी। फिर प्रियतम की सब प्रकार से सेवा करके मार्ग की सारी थकान दूर करेंगी। राम ने उनके कोमल चरणों के लिये कठिन पथ का विचार किया था। अब वे राम के श्रम का विचार रखती हैं और उसी रास्ते पर अपने लिये सेवा का काम माँगती हैं।
पाय पखारि बैठि तरु छाहीं । करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं॥
चौपाई ६
श्रम कन सहित स्याम तनु देखें । कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥
वे कहती हैं कि पैर धोकर पेड़ की छाया में बैठेंगी और प्रसन्न मन से हवा करेंगी। राम के साँवले शरीर पर पसीने की बूँदें होंगी और वे उन्हें देखती रहेंगी। प्राणपति के दर्शन करते हुए दुःख का अवकाश ही कहाँ रहेगा? इस प्रश्न में वन की गर्मी से होनेवाला श्रम मिटा नहीं दिया गया है। पसीने की बूँदें उसी श्रम का संकेत हैं। सीता उसके पास अपनी सेवा रखती हैं। उन्हें प्रिय की थकान हटाने में प्रसन्नता दिखाई देती है, और वह प्रसन्नता साथ चलने के आग्रह को और निकट कर देती है।
रात के लिये भी उनका विचार है। समतल भूमि पर घास और पेड़ों के पत्ते बिछायेंगी और दासी की तरह सारी रात चरण दबायेंगी। बार बार राम की कोमल मूर्ति देखती रहेंगी, तो गरम हवा भी उन्हें नहीं लगेगी। राम ने भूमि पर सोने की बात कही थी, सीता उसी भूमि पर बिछौना बनाना चाहती हैं। घास, पत्ते और समतल धरती, उनके वचन में सेवा की तैयारी के हिस्से हैं। अभी यह सब उनके आगे के जीवन का निवेदन है, जिसमें श्रम सहने के साथ श्रम हरने की इच्छा भी है।
भय के विषय में भी उनका उत्तर आता है। प्रभु साथ हों तो उनकी ओर देखनेवाला कौन है? सिंहनी को खरगोश और सियार जैसे आँख उठाकर नहीं देख सकते, वैसे ही वे अपने को सुरक्षित मानती हैं। राम ने उन्हें मृगलोचनी और स्वभाव से भीरु कहकर वन के भय से सावधान किया था। सीता अपने भरोसे की उपमा सिंहनी से देती हैं। उसका आधार राम का साथ है। इसीलिए उनके उत्तर में भय की गणना लौटकर उसी एक बात पर ठहरती है कि साथ रहना उनके लिये क्या अर्थ रखता है।
इसके बाद वे प्रश्न रखती हैं कि मैं ही सुकुमारी हूँ और नाथ वन के योग्य हैं? आपके लिये तपस्या उचित है और मेरे लिये विषय भोग? यह प्रश्न राम की कही हुई कोमलता को उनके सामने लौटा देता है। सीता भी उनकी कोमल मूर्ति देखने की बात कह चुकी हैं। प्रिय को कठिन जीवन के लिये जाते देखकर अपने लिये सुख का अलग भाग स्वीकार करना उन्हें उचित नहीं लगता। उनके स्वर में अब उस बँटवारे की पीड़ा सुनाई देती है जिसमें राम को तप और उन्हें घर का भोग मिलेगा।
ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान।
दोहा ६७
तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान॥ ६७॥
अन्त में उनकी वाणी फिर अपने हृदय पर लौटती है। इतने कठोर वचन सुनकर भी जब हृदय नहीं फटा तो ये पामर प्राण प्रभु के भीषण वियोग का दुःख भी सहेंगे, वे कहती हैं। अभी कुछ पहले उन्होंने अवधि भर अलग रहकर जीवित न बचने की बात कही थी। अब वह पीड़ा अपने ही जीवित बने रहने पर उलाहना देती है। यह सह लेने का आश्वासन नहीं है। सीता उस दशा को कह रही हैं जिसमें अलग किये जाने का वचन भी उनके लिये असह्य हो गया है।
सीता भावी यात्रा में चरण धोने, छाया में हवा करने, घास पत्तों का बिछौना बनाने और रातभर चरण दबाने की सेवा चाहती हैं। राम के साथ उन्हें सुरक्षा का भरोसा है। वे उनके तप और अपने भोग के भेद पर प्रश्न करती हैं, फिर वियोग की बात से अत्यन्त व्याकुल हो उठती हैं।
अनुमति के बाद माता का आशीर्वाद
इतना कहकर सीता बहुत व्याकुल हो जाती हैं। वे वियोग की बात को भी सँभाल नहीं सकीं। शरीर से बिछुड़ना तो अभी हुआ नहीं, केवल वचन में उसका आना उन्हें इस दशा तक ले आया है। राम उनकी दशा देखते हैं और अपने हृदय में जान लेते हैं कि हठपूर्वक यहाँ रोकने से वे प्राण नहीं रखेंगी। जिस संकट से बचाने के लिये वे घर रहने को कह रहे थे, अब उसी घर में रह जाना सीता के लिये प्राणों का संकट दिखाई देता है।
कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा । परिहरि सोचु चलहु बन साथा॥
चौपाई ७
नहिं बिषाद कर अवसरु आजू । बेगि करहु बन गवन समाजू॥
कृपालु राम कहते हैं कि चिन्ता छोड़कर मेरे साथ वन चलिये। आज विषाद करने का अवसर नहीं है, शीघ्र वनगमन की तैयारी कीजिये। इतने लम्बे संवाद का उत्तर अब स्पष्ट अनुमति है। वे सीता को प्रिय वचन कहकर समझाते हैं। उनके कथन में साथ चलने की स्वीकृति के साथ तैयारी करने की तत्परता आती है। जो बात अब तक रुकी हुई थी, उसके लिये व्यवस्था करनी है। किन्तु इस अनुमति के तुरन्त बाद कथा माता के चरणों की ओर जाती है, क्योंकि घर से निकलने में उनका आशीर्वाद भी लेना है।
राम माता के चरण लगते हैं और आशीर्वाद पाते हैं। माता उनसे शीघ्र लौटकर प्रजा का दुःख मिटाने को कहती हैं। अपनी याद भी दिलाती हैं कि इस निठुर माता को भूल न जाना। पुत्र को विदा करने की घड़ी में उनका मन लौटने की ओर लगा है। राम के आने से प्रजा का दुःख मिटेगा, यह बात पहले कहती हैं, फिर अपने लिये स्मरण का सहारा चाहती हैं। सीता ने साथ चलने की अनुमति पा ली है। माता को अब उस मनोहर जोड़ी के लौटने की प्रतीक्षा सँभालनी है।
वे विधाता से पूछती हैं कि क्या उनकी दशा फिर बदलेगी, क्या वे अपनी आँखों से इस मनोहर जोड़ी को फिर देख सकेंगी? फिर पुत्र से पूछती हैं कि वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब आयेगी जब जननी जीते जी उनका चन्द्रमा जैसा मुख फिर देखेगी। लौटने के आश्वासन को माता अपने जीवन की आशा में रखती हैं। उनका प्रश्न केवल समय का नहीं रह जाता। उसमें यह व्याकुलता भी है कि उस समय तक वे जीवित रहकर फिर दर्शन कर पायें।
बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।
दोहा ६८
कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात॥ ६८॥
माता फिर से पुकारने के शब्द गिनाती हैं। वत्स कहकर, लाल कहकर, रघुपति कहकर, रघुवर कहकर, हे तात, फिर कब बुलायेंगी? कब हृदय से लगाकर प्रसन्न मन से अंगों को देखेंगी? उन नामों के साथ मातृत्व के छोटे छोटे सुख जुड़े हैं। अपने पास बुलाना, छाती से लगाना और देखकर प्रसन्न होना, यही उनके लिये लौटने का पूरा अनुभव है। जिसे अभी आशीर्वाद दिया है, उसे फिर अपनी ओर बुलाने की कल्पना उनकी वाणी को भर देती है।
स्नेह से माता इतनी अधीर हो जाती हैं कि वचन नहीं निकलता। राम उनकी दशा देखकर अनेक प्रकार से समझाते हैं। तुलसी कहते हैं कि उस समय और स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता। पहले सीता उत्तर नहीं दे पा रही थीं, अब माता बोल नहीं पातीं। दोनों बार प्रेम की व्याकुलता वाणी रोकती है और राम उसे समझते हैं। सीता को उन्होंने साथ चलने का भरोसा दिया है। माता के सामने उनकी सान्त्वना उस विदाई को सहने का सहारा बनती है जो अब निकट आ गयी है।
सीता की दशा देखकर राम समझते हैं कि उन्हें हठ से रोकना उनके प्राणों के लिये संकट होगा। वे साथ चलने की अनुमति देते हैं, फिर माता का आशीर्वाद लेते हैं। माता शीघ्र लौटने और फिर मनोहर जोड़ी के दर्शन पाने की आशा कहती हैं।
सेवा अधूरी रही, स्नेह बना रहे
अब जानकी सास के चरण लगती हैं। साथ चलने की अनुमति मिल जाने पर भी उनकी बात पूरी नहीं हुई है। राम ने आरम्भ में माता की सेवा का जो आग्रह किया था, वह सीता के मन से गया नहीं है। वे माता से कहती हैं कि मैं बहुत अभागिनी हूँ। आपकी सेवा का समय आया तो दैव ने वन दे दिया, मेरा मनोरथ सफल नहीं किया। उनका दुःख यह है कि जिस अवसर पर पास रहकर सेवा करनी थी, उसी अवसर पर जाना पड़ रहा है।
इस निवेदन में वन जाने का सुख और पीछे छूटनेवाले कर्तव्य का दुःख साथ उपस्थित हैं। वे अपने लिये माँगी हुई अनुमति को माता के सामने किसी जीत की तरह नहीं रखतीं। सेवा की इच्छा अधूरी रह जाने का क्षोभ कहती हैं। फिर विनती करती हैं कि माता अपना क्षोभ छोड़ दें, किन्तु स्नेह और कृपा न छोड़ें। कर्म की गति कठिन है, उनका भी दोष नहीं है। जाते हुए उन्हें यह भरोसा चाहिये कि शरीर की दूरी सास के मन में प्रेम की दूरी न बन जाय।
सीता की बात सुनकर सास व्याकुल हो उठती हैं। तुलसी फिर कहते हैं कि उनकी दशा किस प्रकार कही जाय। अभी पुत्र को देखती हुई उनकी वाणी रुक गयी थी, अब पुत्रवधू का निवेदन उन्हें आकुल करता है। सीता ने सेवा न कर पाने की बात कही है और उत्तर में उन्हें हृदय से लगाया जाता है। यह आलिंगन बार बार होता है। विदा के पहले माता उन्हें अपने समीप रखती हैं, फिर धीरज धारण करके शिक्षा और आशीर्वाद देती हैं।
बारहिं बार लाइ उर लीन्ही । धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही॥
चौपाई ८
अचल होउ अहिवातु तुम्हारा । जब लगि गंग जमुन जल धारा॥
उनका आशीर्वाद है कि जब तक गंगा और यमुना में जल की धारा बहे, तब तक सीता का सुहाग अचल रहे। विदा की अस्थिर घड़ी में यह अचल रहने की कामना है। सीता राम से अलग रहना नहीं चाहती थीं। माता उनके विवाहित सौभाग्य की निरन्तरता का आशीर्वाद देती हैं। नदियों की बहती धाराएँ उस आशीष की अवधि बताती हैं। अभी माँ का मन यह पूछ रहा था कि वह शुभ घड़ी कब आयेगी जब फिर जोड़ी को देखेंगी। अब वही मन उस जोड़ी के सुख के लिये इतना दीर्घ आशीर्वाद कहता है।
माता अनेक प्रकार से सीता को सीख देती हैं और आशीष देती हैं। इस सीख की पूरी सूची यहाँ नहीं खोली जाती। उसके साथ बार बार हृदय से लगाने का स्नेह अवश्य दिखाई देता है। सीता ने कृपा न छोड़ने की प्रार्थना की थी, और विदाई की इन क्रियाओं में वह कृपा बनी रहती है। सास का धीरज और पुत्रवधू का प्रणाम, दोनों मिलकर इस विदा को पूरा करते हैं। अलग होने का दुःख रहते हुए भी आशीर्वाद रुकता नहीं।
सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।
दोहा ६९
चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार॥ ६९॥
सीता बड़े प्रेम से बार बार चरणकमलों में सिर नवाती हैं और चल पड़ती हैं। दोहे में यह जाना सचमुच हो जाता है। अब तक वन की बातें भविष्य की थीं, सेवा के दृश्य उनके निवेदन में थे और साथ चलना अनुमति का विषय था। यहाँ माता से विदा लेने की क्रिया पूरी होती है। जिस पन्ने का पहला प्रश्न था कि माता की सेवा के लिये घर रहिये, उसका अन्त माता के चरणों में बार बार झुककर निकलने से होता है। सेवा की इच्छा पीछे नहीं छूटी, उसी का दुःख और माता का स्नेह विदाई में समाये हैं।
सीता सास से सेवा का अवसर खोने का दुःख कहती हैं और निरन्तर स्नेह माँगती हैं। माता उन्हें बार बार गले लगाती हैं, गंगा यमुना की धारा रहने तक अचल सुहाग का आशीर्वाद देती हैं। सीता बार बार चरणों में सिर नवाकर विदा होती हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
राम और सीता की पूरी बात सुनने पर वन के एक ही बिछौने के दो अनुभव हमारे सामने रह जाते हैं। राम उसमें कठोर भूमि और कोमल शरीर का कष्ट देखते हैं। सीता उसमें पत्ते बिछाने और प्रिय के चरण दबाने की सेवा देखती हैं। दोनों ने उसी भूमि, उसी यात्रा और उसी शरीर की बात की है। राम के लिये साथ चलनेवाली का कष्ट विचारणीय है, और सीता के लिये साथ न रहने का कष्ट। उनकी बात पूरी सुनने के बाद ही राम अपना निर्णय कहते हैं।
इस संवाद में चकवी भी दो बार दिखाई देती है। एक बार रात की शीतल चाँदनी उसे जलाती है, दूसरी बार दिन में वह प्रसन्न रहती है। सीता की पीड़ा और उनकी आशा को ये दोनों चित्र अलग अलग खोलते हैं। वे अपने लिये जिस सुख का निवेदन कर रही हैं, उसे हम उन्हीं दोनों दशाओं के बीच पहचानते हैं। राम का साथ उनके कल्पित वन को रहने योग्य बना देता है। उसी साथ के बिना सुख का सबसे बड़ा आश्वासन भी उनके लिये निष्फल है।
और विदाई के अन्त में माता का स्नेह इस निवेदन को अपने आशीर्वाद में स्थान देता है। सीता वन जाने का आग्रह कर चुकी हैं, फिर भी सेवा छूटने का दुःख खुलकर कहती हैं। माता व्याकुल हैं, फिर भी उन्हें गले लगाकर अचल सुहाग की कामना देती हैं। इसीलिए अनुमति मिलते ही कथा समाप्त नहीं होती। बार बार का आलिंगन और बार बार का प्रणाम बाकी रहता है। जिनके पास से जाना है, उनके स्नेह में अपना स्थान बनाये रखकर ही सीता चलती हैं।
गंगा और यमुना की धारा तक रहनेवाला आशीर्वाद सुनकर सीता माता के चरणों में झुकती हैं। राम के साथ जाने की इच्छा स्वीकार हुई है और माता की कृपा भी मिली है। अपने निवेदन में वे वन के देवताओं से सास ससुर जैसी सँभार की आशा कर रही थीं। अब विदा होते समय उनके पास सास का दिया हुआ स्नेह है, और सेवा न कर पाने का वह दुःख भी, जिसे उन्होंने छिपाया नहीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ६१ से ६९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।