रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · पिता का अन्तिम संस्कार और भरत के सामने राजपद
पिता का अन्तिम संस्कार और भरत के सामने राजपद
सरयू के तट पर पिता की अन्त्येष्टि के बाद भरत राजसभा में आते हैं। गुरु, मन्त्री और माता राज्य सँभालने को कहते हैं, और उनके आँसू विरह को फिर सींच देते हैं।
भरत के सामने पहले पिता का अन्तिम संस्कार है। महाराज के शरीर को स्नान कराया जाता है, सरयू के किनारे चिता बनती है और उसके बाद दस दिनों के कृत्य पूरे किये जाते हैं। फिर राजसभा बुलायी जाती है। जिस पुत्र ने अभी पिता के लिये सारे संस्कार किये हैं, उसी से अब पिता का दिया हुआ राजपद सँभालने को कहा जाएगा। शोक के बीच कर्तव्य का यह दूसरा रूप उपस्थित होता है। पहले विदा करने की बारी थी, अब पीछे रह गये परिवार और प्रजा की देखभाल की बात उठती है।
तुलसीदास के रामचरितमानस में यह सभा बहुत ध्यान से सुनने का प्रसंग है। वसिष्ठ पहले स्वयं शोक में डूबते हैं, फिर भरत को धीरज देने लगते हैं। उनके तर्क में भाग्य, आचरण, पिता की आज्ञा और प्रजा का हित साथ आते हैं। मन्त्री उस पर सहमति देते हैं, और कौसल्या उसी आग्रह को माँ की वाणी में कहती हैं। भरत सभी की बात सुनते हैं। उनका अपना उत्तर आने से पहले हम देखेंगे कि सहारा देनेवाली यह कोमल वाणी उनके भीतर विरह के नये अंकुर कैसे जगा देती है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- भरत पिता के संस्कार पूरे करनेवाले पुत्र, जिनसे गुरु, मन्त्री और माता अब राजपद सँभालने का आग्रह करते हैं।
- वसिष्ठ राजगुरु, जो अन्त्येष्टि का मार्ग बताते हैं और सभा में शोक, कर्तव्य तथा उत्तराधिकार पर विस्तृत उपदेश देते हैं।
- कौसल्या माता, जो अपने शोक में धीरज रखकर भरत से परिवार और प्रजा का सहारा बनने को कहती हैं।
- शत्रुघ्न भरत के साथ राजसभा में बुलाये गये भाई, जिनका नाम पिता के चार पवित्र पुत्रों में भी आता है।
- दशरथ दिवंगत महाराज, जिनके धर्म, सत्य और राम के प्रति प्रेम को वसिष्ठ सभा में स्मरण करते हैं।
- राम, सीता और लक्ष्मण वन में गये प्रियजन, जिनके गुण और प्रेम का वर्णन करते हुए गुरु भी शोकमग्न हो जाते हैं।
- मन्त्री गुरु के प्रस्ताव का अनुमोदन करके भरत से उसका पालन करने की विनती करनेवाले सभासद।
सरयू के तट पर पिता की विदाई
महाराज का शरीर वेदों में बतायी हुई विधि के अनुसार स्नान कराया जाता है। उनके लिये एक अत्यन्त सुन्दर विमान तैयार होता है, अन्तिम यात्रा का वह आसन जिस पर राजशरीर ले जाया जाएगा। इसी तैयारी के बीच भरत अपनी सभी माताओं के चरण पकड़ते हैं। पोद्दारजी की टीका स्पष्ट करती है कि वे प्रार्थना करके उन्हें सती होने से रोक लेते हैं। रानियाँ भी राम के दर्शन की अभिलाषा से रह जाती हैं। पिता के साथ विदा हो जाने के विचार के सामने पुत्र की विनती और राम को फिर देखने की इच्छा आ खड़ी होती है।
नृप तनु बेद बिदित अन्हवावा । परम बिचित्र बिमानु बनावा॥
चौपाई १
गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी॥
इस छोटे से दृश्य में भरत का काम केवल पिता का संस्कार पूरा करना नहीं रह जाता। वे माताओं को भी सँभाल रहे हैं। चरण पकड़ने का वर्णन उसी रोकने के साथ आया है, और रानियों के रह जाने का कारण दर्शन की आशा है। हम आगे जब कौसल्या को भरत से सबका सहारा बनने को कहते सुनेंगे, तब उनकी इस पहली करुण चेष्टा की याद रहेगी। जिन माताओं को उन्होंने रोक लिया है, उनका दुःख भी अब इस घर में उनके साथ है।
चन्दन और अगर के बहुत से बोझ आते हैं। अनेक प्रकार की सुगन्धित सामग्री भी आती है, जिसके विस्तार में टीका कपूर, गुग्गुल और केसर का उल्लेख करती है। सरयू के तट पर चिता रची जाती है। तुलसी उसे स्वर्ग की सुन्दर सीढ़ी के समान देखते हैं। सारे वैभव के बीच यह उपमा ऊपर जाती हुई एक सीढ़ी का आकार रखती है। महाराज के अन्तिम संस्कार का दृश्य सुगन्ध और सम्मान से भरा हुआ है। कवि के लिये वह चिता उनके स्वर्ग की ओर प्रस्थान का चित्र बनती है।
चंदन अगर भार बहु आए । अमित अनेक सुगंध सुहाए॥
चौपाई २
सरजु तीर रचि चिता बनाई । जनु सुरपुर सोपान सुहाई॥
इस प्रकार दाहक्रिया पूरी होती है। सब लोग विधिपूर्वक स्नान करके तिल और जल की अञ्जलि अर्पित करते हैं। इसके बाद भरत पिता का दशगात्रविधान करते हैं। टीका इस शब्द का अर्थ खोल देती है, दस दिनों के कृत्य। वेद, स्मृति और पुराण का मत निश्चित करके उन्हीं के अनुसार संस्कार किये जाते हैं। कथा इस समय को एक ही वाक्य में पार कर जाती है, फिर भी दस दिन स्पष्ट कहे गये हैं। चिता से सीधे राजसभा तक पहुँच जाने पर शोक के बीच निभाया गया यह पूरा समय हमारी दृष्टि से छूट जाएगा।
वसिष्ठ जहाँ जैसी आज्ञा देते हैं, भरत वहाँ वैसा ही करते हैं। तुलसी उनकी करनी के विस्तार के लिये हजारों प्रकार का संकेत रखते हैं। शुद्ध होने पर वे दान देते हैं। गौएँ, घोड़े, हाथी और अनेक प्रकार की सवारियाँ दी जाती हैं। फिर दोहे में सूची और खुलती है, सिंहासन, आभूषण, वस्त्र, अन्न, भूमि, धन और मकान। दान पानेवाले ब्राह्मणों की सभी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं। पिता के हित में किये गये काम का वर्णन वस्तुओं के इस पूरे विस्तार के साथ आता है।
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।
दोहा १७०
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम॥ १७०॥
कवि कहते हैं कि भरत ने पिता के लिये जो किया, उसका वर्णन लाखों मुख भी नहीं कर सकते। अभी हमने कुछ सामग्री, कुछ संस्कार और दान की सूची सुनी है। इस वाक्य में उस पूरे कर्म के पीछे पुत्र का भाव सामने आ जाता है। भरत की श्रद्धा केवल शोक के शब्दों में व्यक्त नहीं हुई। गुरु की बतायी विधि, दस दिनों के कृत्य और उदार दान, इन सबमें वह निभायी गयी है।
भरत माताओं को सती होने से रोकते हैं; वे रामदर्शन की आशा से रह जाती हैं। सरयू के तट पर दशरथ की अन्त्येष्टि होती है, फिर भरत दस दिनों के कृत्य और गुरु की आज्ञा के अनुसार सभी दान पूरे करते हैं।
राजसभा में शोक से भरे गुरु
संस्कार पूरे होने के बाद वसिष्ठ शुभ दिन देखते हैं। वे मन्त्रियों और सभी महाजनों को बुलवाते हैं। सब राजसभा में जाकर बैठते हैं, तब भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों को बुलाया जाता है। गुरु भरत को अपने निकट बैठा लेते हैं। सभा का विषय अब राज्य है, पर आरम्भ का यह व्यवहार स्नेह से भरा है। जिस व्यक्ति से कठिन कर्तव्य की बात करनी है, उसे अपने पास स्थान देकर वसिष्ठ नीति और धर्म के वचन कहते हैं।
बैठे राजसभाँ सब जाई । पठए बोलि भरत दोउ भाई॥
चौपाई ३
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे । नीति धरममय बचन उचारे॥
पहले वे कैकेयी की सारी करनी का वृत्तान्त कहते हैं। उसे कुटिल कहते हुए पूरा पूर्ववृत्त सामने रखते हैं। फिर महाराज के धर्मव्रत और सत्य की प्रशंसा करते हैं। दशरथ ने शरीर छोड़कर प्रेम निभाया, उनकी स्मृति का यह पक्ष गुरु विशेष रूप से कहते हैं। भरत को राज्य की आज्ञा देने से पहले पिता का परिचय इस रूप में रखा जा रहा है कि उनका वचन, धर्म और प्रेम किस मूल्य पर निभा है। सभा की आगे की बात इसी स्मरण पर टिकेगी।
इसके बाद राम के गुण, शील और स्वभाव का वर्णन आता है। कहते हुए वसिष्ठ की आँखें भर आती हैं और उनका शरीर पुलकित हो उठता है। फिर वे लक्ष्मण और सीता के प्रेम की बड़ाई करते हैं। तुलसी उस घड़ी ज्ञानी मुनि को शोक और स्नेह में मग्न दिखाते हैं। जो भरत को सँभालने आये हैं, वे भी इन नामों का स्मरण करके अपने दुःख से अलग नहीं रह पाते। उपदेश आरम्भ होने से पहले गुरु के आँसू उपस्थित हैं।
इसी दशा में वसिष्ठ बिलखकर भरत से होनहार के बल की बात कहते हैं। हानि और लाभ, जीवन और मरण, यश और अपयश, सब विधाता के हाथ में हैं। दोहे में छह शब्द तीन जोड़ियों में आते हैं। जो घटता और बढ़ता है, जो रहता और छूट जाता है, जो सम्मान और कलंक बनकर मिलता है, मुनि इन सबको भाग्य की व्यापक सीमा में रखते हैं। वे भरत के सामने उस दुःख को भी इसी विचार के भीतर देखने का आग्रह कर रहे हैं जिसका अनुभव उन्हें स्वयं हो रहा है।
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
दोहा १७१
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥ १७१॥
इसके आगे गुरु पूछते हैं कि ऐसा विचार करने पर किसे दोष दिया जाए और किस पर व्यर्थ रोष किया जाए। भरत से मन में विचार करने को कहते हैं। फिर उनकी बात एक विशेष निष्कर्ष पर पहुँचती है, राजा दशरथ सोच के योग्य नहीं हैं। यह वाक्य सुनते समय सभा के पहले आँसू याद रखने चाहिये। मुनि अपने प्रिय राजा के लिये रो चुके हैं। अब वे भरत का ध्यान इस बात की ओर ले जाते हैं कि किस प्रकार का जीवन वास्तव में खेद का विषय कहा जाए।
दोनों भाई सभा में बुलाये जाते हैं और भरत गुरु के पास बैठते हैं। वसिष्ठ दशरथ, राम, लक्ष्मण और सीता का स्मरण करते हुए स्वयं शोकमग्न होते हैं। फिर होनहार की प्रबलता बताकर भरत को दशरथ के जीवन का मूल्य समझने को कहते हैं।
वसिष्ठ की दृष्टि में किसका जीवन सोचनीय है
गुरु अब बार बार सोच करने योग्य व्यक्ति का लक्षण गिनाते हैं। उनका उपदेश अपने समय की वर्ण, परिवार और आश्रम सम्बन्धी मान्यताओं के भीतर चलता है। ब्राह्मण, राजा, वैश्य, शूद्र, पत्नी, विद्यार्थी, गृहस्थ और संन्यासी, सबके लिये वे अलग मर्यादा बताते हैं। इन कठोर निर्णयों का वक्ता सभा में भरत को समझा रहा वसिष्ठ है। हर अगली श्रेणी उस निष्कर्ष की तैयारी करती है कि दशरथ को इन विफलताओं में नहीं रखा जा सकता।
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥
चौपाई ४
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥
सबसे पहले वे उस ब्राह्मण का खेद करने को कहते हैं जो वेद नहीं जानता, अपना धर्म छोड़ चुका है और विषयभोग में लीन रहता है। फिर उस राजा का नाम लेते हैं जो नीति नहीं जानता और जिसे अपनी प्रजा प्राणों के समान प्रिय नहीं है। राजा का यह लक्षण सुनते हुए सभा के वर्तमान प्रश्न का ध्यान रहता है। भरत से आगे जिस प्रजापालन की अपेक्षा की जाएगी, उसकी कसौटी गुरु यहाँ पहले ही रख देते हैं। राजपद के साथ प्रजा के प्रति प्राणों जैसा प्रेम जोड़ा गया है।
अगली चौपाई में वसिष्ठ धनवान होकर भी कृपण रहनेवाले वैश्य की बात कहते हैं। अतिथि के सत्कार और शिव की भक्ति में कुशल न होना भी उसी वर्णन का अंग है। उसके बाद उनके समय की सामाजिक मर्यादा के अनुसार शूद्र के लिये ब्राह्मण का अपमान करना, बहुत बोलना, अपनी मान बड़ाई चाहना और ज्ञान का घमंड रखना सोचनीय बताया जाता है। गुरु की इस श्रेणी में अपमान, मुखरता, मान की चाह और ज्ञान के अभिमान, चारों बातें आती हैं। उनकी कही हुई सामाजिक धारणा उसी वक्ता के उपदेश में सामने है।
फिर वे पति को छलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और अपनी इच्छा के अनुसार चलनेवाली स्त्री का उल्लेख करते हैं। उसके साथ ब्रह्मचारी विद्यार्थी की बारी आती है, जो अपना व्रत छोड़ देता है और गुरु की आज्ञा पर नहीं चलता। इस क्रम में वसिष्ठ सम्बन्धों और स्वीकारे हुए व्रतों के प्रति व्यवहार का हिसाब ले रहे हैं। पत्नी और विद्यार्थी के लिये अलग अलग कही गयी उनकी कसौटियाँ उस सभा के उपदेश में पूरी कठोरता के साथ रखी हैं।
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
दोहा १७२
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥ १७२॥
दोहा गृहस्थ और संन्यासी को साथ रखता है। मुनि के अनुसार मोह के कारण कर्म का मार्ग छोड़ देनेवाला गृहस्थ सोचनीय है। संन्यासी का खेद तब है जब वह संसार के प्रपञ्च में रमा हो और विवेक तथा वैराग्य से खाली हो। दोनों के लिये बात अपने अपनाये हुए जीवन के अनुरूप आचरण की है। गृहस्थ अपने कर्म से हट गया है; त्याग का आश्रम ग्रहण करनेवाला फिर उन्हीं प्रपञ्चों में उलझा है। वसिष्ठ दोनों को उनके अपने कर्तव्य के सामने रखते हैं।
इसके बाद वानप्रस्थ आता है। टीका इस नाम से उस आश्रम को पहचानती है जिसके लिये वसिष्ठ कहते हैं कि तप छोड़कर भोग प्रिय लगने लगे तो जीवन सोच के योग्य है। फिर उनकी सूची वर्ण और आश्रम के नामों से आगे व्यवहार की ओर फैलती है। चुगली करनेवाला, बिना कारण क्रोध करनेवाला और माता, पिता, गुरु तथा भाई बन्धुओं से विरोध रखनेवाला व्यक्ति भी उनके खेद का विषय है। इस पंक्ति में घर और सम्बन्धों के सभी ये नाम अलग अलग आते हैं।
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी । निज तनु पोषक निरदय भारी॥
चौपाई ५
सोचनीय सबहीं बिधि सोई । जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥
अन्तिम चौपाई उस व्यक्ति की बात करती है जो दूसरों का अनिष्ट करता है, केवल अपने शरीर का पोषण करता है और अत्यन्त निर्दयी है। फिर मुनि अपनी भक्तिपरक कसौटी रखते हैं, छल छोड़कर हरि का भक्त न होनेवाला सभी प्रकार से सोचनीय है। उनके पूरे उपदेश का यह अन्त आचरण से भक्ति तक पहुँचता है। केवल अपनी देह की चिन्ता और दूसरों के प्रति निर्दयता का उल्लेख करने के बाद वे छल छोड़ने और भगवान् की ओर होने की बात कहते हैं।
इतनी लम्बी सूची के बाद वसिष्ठ फिर कोसलराज पर लौटेंगे। उनके तर्क में सोचनीय जीवन का अर्थ सामने आ चुका है। राजा की मृत्यु पर उठे दुःख के बीच वे भरत को पिता का धर्म और प्रेम याद दिलाना चाहते हैं। उस प्रयोजन से कही गयी इन सभी श्रेणियों को सुनने पर ही आगे की दशरथ प्रशंसा का आधार पूरा समझ में आता है।
वसिष्ठ अपने समय की सामाजिक और आश्रम सम्बन्धी धारणाओं के अनुसार कर्तव्य, सम्बन्ध, संयम और भक्ति से च्युत जीवनों की सूची कहते हैं। वे हर श्रेणी गिनाकर भरत को यह समझाने की भूमिका बनाते हैं कि दशरथ का धर्ममय जीवन खेद का विषय नहीं है।
जिनके ऐसे चार पुत्र हैं
कोसल के महाराज सोचनीय नहीं हैं, वसिष्ठ फिर स्पष्ट कहते हैं। उनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है। भरत के पिता के समान राजा न पहले हुआ, न वर्तमान में है, न आगे होगा। गुरु की प्रशंसा इस समय बहुत ऊँचे स्वरूप में आती है। वे दशरथ को किसी एक उपलब्धि से नहीं पहचानते; उनके पूरे जीवन की ऐसी अनुपम महिमा बताते हैं जिसके आगे शोक में डूबे पुत्र को पिता का गौरव भी दिखाई दे।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिशाओं के अधिपति, सभी दशरथ के गुणों की कथाएँ कहते हैं। इस देवसम्मान के तुरन्त बाद मुनि घर के चार नाम लेते हैं। राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे पवित्र पुत्र जिसके हों, उसकी बड़ाई कौन और किस प्रकार कर सकेगा। भरत स्वयं इस प्रशंसा के भीतर आ जाते हैं। पिता की महिमा कहते हुए गुरु उन दोनों भाइयों को भी स्मरण करते हैं जो सभा में बुलाये गये हैं।
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।
दोहा १७३
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु॥ १७३॥
यहाँ पिता और पुत्रों का सम्बन्ध गुरु के तर्क का हिस्सा है। भरत जिस पिता के लिये व्याकुल हैं, उन्हीं की बड़ाई में उनका अपना नाम भी रखा गया है। दशरथ की अनुपम महिमा का प्रमाण केवल देवताओं का कथन नहीं रह जाता। उनके चार पुत्रों की पवित्रता भी उसी गौरव में शामिल है। इस स्मरण के बाद वसिष्ठ कहते हैं कि महाराज सभी प्रकार से बड़े भाग्यवान थे, उनके लिये विषाद करते रहना व्यर्थ है। भरत से सुनकर और समझकर सोच छोड़ने को कहते हैं।
अब वही बात राजाज्ञा तक पहुँचती है। वसिष्ठ भरत को महाराज की आज्ञा आदर से स्वीकार करके उसके अनुसार करने को कहते हैं। राजा ने राजपद भरत को दिया है, इसलिए गुरु के अनुसार पिता के वचन को सत्य करना उनका कर्तव्य है। सभा का वह व्यावहारिक आग्रह अब साफ़ हो जाता है जिसकी ओर इतने विस्तार से शोक और जीवन का मूल्य समझानेवाली बात चली थी। भरत को राजपद ग्रहण करना चाहिये, मुनि यह प्रस्ताव सामने रखते हैं।
रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥
चौपाई ६
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी । तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥
इसके समर्थन में दशरथ के वचन का मूल्य याद दिलाया जाता है। उन्होंने वचन के लिये राम को त्याग दिया और राम के विरह की अग्नि में शरीर की आहुति दे दी। उन्हें अपने प्राणों से भी प्रिय वचन था। पिता ने जिस वचन के लिये यह सब सहा, उसी को भरत सत्य करें, गुरु का आग्रह यही है। वे इसे भरत की सभी प्रकार की भलाई कहते हैं। राज्य के लाभ गिनाने से पहले उस राजाज्ञा को पिता के पूरे त्याग से जोड़ा गया है।
ध्यान दीजिये कि अभी भरत की सहमति नहीं आयी है। हम वसिष्ठ की पूरी दलील सुन रहे हैं। उसमें पिता का गौरव, पुत्रों की पवित्रता और वचन की रक्षा एक के बाद एक आते हैं। यही क्रम भरत के सामने राजपद को उत्तरदायित्व के रूप में रखता है। गुरु जिस काम की आज्ञा देंगे, उसका आधार इस समय उनके अपने तर्क के भीतर तैयार हो रहा है।
वसिष्ठ दशरथ की चौदहों लोकों में प्रसिद्ध महिमा और चारों पवित्र पुत्रों का स्मरण करते हैं। फिर भरत से पिता का दिया राजपद स्वीकार करके उस वचन को सत्य करने का आग्रह करते हैं जिसके लिये महाराज ने राम को त्यागा और विरह में प्राण छोड़ दिये।
पिता के वचन के पक्ष में दो दृष्टान्त
राजा की आज्ञा मानने के आग्रह को वसिष्ठ दो कथाओं के संक्षिप्त दृष्टान्त से पुष्ट करते हैं। पहला परशुराम का है। उन्होंने पिता की आज्ञा रखकर अपनी माता को मार डाला, और मुनि कहते हैं कि सारी दुनिया इसकी साक्षी है। दूसरा राजा ययाति के पुत्र का है, जिन्होंने अपने पिता को अपनी जवानी दे दी। यहाँ पुत्र का नाम नहीं कहा गया है। दो अलग घटनाएँ पिता की आज्ञा के पालन की एक ही दलील में साथ रखी जाती हैं।
परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी॥
चौपाई ७
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥
पहले दृष्टान्त में माता की हत्या का कठोर तथ्य है। दूसरे में पुत्र अपनी युवावस्था पिता को देता है। वसिष्ठ इन्हें कहते हुए यह निष्कर्ष रखते हैं कि पितृआज्ञा के कारण उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ। ये उसी प्राचीन कथा की सभा में गुरु के दिये हुए उदाहरण और उन्हीं का निर्णय हैं। उनकी बात की तीव्रता समझने के लिये दोनों घटनाएँ पूरी सुननी पड़ती हैं। इस तर्क में आज्ञा की शक्ति इतनी बढ़ाकर रखी गयी है कि इन कठिन कर्मों पर निर्णय भी उसी के आधार पर किया जाता है।
दृष्टान्तों की कथा यहाँ और नहीं खुलती। परशुराम के पिता की ओर से आयी आज्ञा, माता का मारा जाना, ययाति के पुत्र का यौवन देना और गुरु का पाप तथा अपयश विषयक निष्कर्ष, इतने में उनका कथन पूरा है। भरत से राजपद स्वीकार करवाने के लिये वसिष्ठ पितृवचन के पालन की महिमा दिखा रहे हैं। अभी कही गयी दशरथ की वचननिष्ठा के साथ इन दो उदाहरणों को रखने से उनके आग्रह का बल और बढ़ जाता है।
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
दोहा १७४
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥ १७४॥
दोहा उसी बात को सामान्य कथन का रूप देता है। वसिष्ठ कहते हैं कि उचित और अनुचित का विचार छोड़कर पिता के वचन का पालन करनेवाले सुख और सुयश के पात्र होते हैं, और अन्त में इन्द्रपुरी में निवास पाते हैं। इस कथन में आज्ञा के प्रति उनका आग्रह अपनी चरम सीमा पर आता है। उसका वक्ता और प्रसंग ध्यान में रहें, मुनि शोकग्रस्त भरत से दिवंगत राजा का निर्णय निभाने को कह रहे हैं। सुख, यश और स्वर्ग का फल भी उन्हीं के उपदेश का भाग है।
अब तक गुरु ने होनहार के बल से शुरुआत की थी। वहाँ उन्होंने हानि लाभ और जीवन मरण को विधाता के हाथ में बताया। यहाँ वे भरत के करने योग्य कर्म पर पूरा जोर देते हैं। उनके कथन में घट चुकी मृत्यु के सामने धीरज रखना और अभी निभाये जानेवाले वचन का पालन करना साथ उपस्थित हैं। राजसभा अतीत के दुःख को सुन चुकी है; अब गुरु भरत को उस कार्य की ओर ला रहे हैं जिसे वे उनके हित का मानते हैं।
परशुराम और ययाति के अनाम पुत्र के दृष्टान्त देकर वसिष्ठ पिता की आज्ञा के पालन की महिमा कहते हैं। पाप, अपयश, सुख, सुयश और स्वर्ग के विषय में सभी निष्कर्ष उन्हीं के उपदेश में आते हैं, जो भरत से महाराज का निर्णय निभाने को कहा जा रहा है।
राज्य सँभालना और राम को लौटाना
वसिष्ठ अब भरत से सीधे कहते हैं कि राजा का वचन अवश्य सत्य करें, शोक छोड़ें और प्रजा का पालन करें। ऐसा करने पर स्वर्ग में महाराज को सन्तोष होगा, और भरत को पुण्य तथा सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा। इस आश्वासन का प्रत्येक भाग उनके प्रस्ताव को सँभालता है। पिता की प्रसन्नता, पुत्र की भलाई और प्रजा की रक्षा, तीनों को गुरु एक ही काम के फल में रख रहे हैं।
फिर वे उत्तराधिकार का विधान बताते हैं। उनके कथन के अनुसार पिता जिसे राजपद दे, वही तिलक पाता है। इसे वे वेद में प्रसिद्ध और सभी के द्वारा मान्य कहते हैं; टीका इस सम्मति का विस्तार स्मृति और पुराण आदि शास्त्रों तक करती है। इसी आधार पर वे भरत से राज्य करने, ग्लानि छोड़ने और अपने वचन को हितकारी जानकर मानने का आग्रह करते हैं। गुरु के तर्क में अधिकार और कर्तव्य दोनों उस पितृआज्ञा से निकलते हैं।
राम और जानकी भी यह सुनकर सुख पाएँगे, वे आगे कहते हैं। कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्या आदि सारी माताएँ प्रजा का सुख देखकर सुखी होंगी। यहाँ गुरु केवल भरत के मन की गाँठ खोलने का प्रयास नहीं कर रहे; वे उन प्रियजनों की प्रसन्नता का आश्वासन भी देते हैं जिनके नाम इस सभा को बार बार व्याकुल करते हैं। माताओं का सुख प्रजा के सुख से जोड़ा गया है, इसलिए राजकाज में उनके दुःख को सँभालने का उपाय भी गुरु देखते हैं।
इसके बाद राम और भरत के श्रेष्ठ सम्बन्ध की बात आती है। जो इस सम्बन्ध को जानेगा, वह सभी प्रकार से भरत के लिये भला ही मानेगा। वसिष्ठ उस सम्बन्ध को राज्य स्वीकार करने की बात से अलग नहीं करते। उनका अगला वचन राम के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंपने का है। साथ ही भरत से सुन्दर स्नेह के साथ उनकी सेवा करने को कहते हैं। इस प्रस्ताव में अभी प्रजा की देखभाल और आगे राम की सेवा, दोनों का स्थान है।
परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि॥
चौपाई ८
सौंपेहु राजु राम के आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ॥
यहीं पूरे आग्रह का समयक्रम खुल जाता है। गुरु चाहते हैं कि भरत वर्तमान में राज्य सँभालें। राम के लौटने पर उसे राम को सौंप दें। अभी की आज्ञा और आगे का समर्पण, दोनों एक ही चौपाई में हैं। भरत और राम के सम्बन्ध की महिमा कहने के बाद सेवा का यह रूप सामने रखकर वसिष्ठ अपनी बात पूरी करते हैं। सभा में अभी जो समझौता प्रस्तुत हुआ है, वह गुरु की ओर से दिया गया मार्ग है।
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
दोहा १७५
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥ १७५॥
मन्त्री हाथ जोड़कर गुरु की आज्ञा के पालन की विनती करते हैं। रघुनाथ के आने पर जैसा उचित हो, तब वैसा कर लिया जाए, वे कहते हैं। उनकी सहमति वसिष्ठ के प्रस्ताव को सभा के व्यावहारिक आग्रह में बदल देती है। तत्काल गुरु की बात मानने को कहा जा रहा है, और राम के लौट आने पर उचित निर्णय का स्थान रखा गया है। हाथ जोड़े मन्त्रियों की यह संक्षिप्त बात लम्बे उपदेश के बाद आती है। अब कौसल्या अपने पुत्र को इसी विषय में सम्बोधित करेंगी।
वसिष्ठ राजपद ग्रहण करने को पिता की सन्तुष्टि, भरत के पुण्य और प्रजा के सुख से जोड़ते हैं। राम के लौटने पर राज्य उन्हें सौंपकर सेवा करने का प्रस्ताव देते हैं। मन्त्री हाथ जोड़कर गुरु की आज्ञा मानने की विनती करते हैं।
कौसल्या का आग्रह, सबका सहारा बनें
कौसल्या धीरज रखकर बोलती हैं। वे भरत को पुत्र कहती हैं और गुरु की आज्ञा को पथ्य बताती हैं। रोग के समय जो आहार अनुकूल और हितकारी हो, पथ्य का संकेत वैसा है। उनकी दृष्टि में गुरु की सलाह इस दुःख में सँभलने योग्य मार्ग है। इसलिए उसका आदर किया जाए, उसे अपने हित का समझकर पालन किया जाए और काल की गति जानकर विषाद छोड़ा जाए। माँ की बात आरम्भ से पुत्र के हित में कही गयी है।
फिर कौसल्या घर की वर्तमान दशा भरत के सामने रखती हैं। राम वन में हैं, महाराज स्वर्ग चले गये हैं और भरत इस प्रकार कातर हो रहे हैं। इतने में अनुपस्थित प्रियजन और उपस्थित पुत्र की पीड़ा दोनों कह दी जाती हैं। आगे वे कुटुम्ब, प्रजा, मन्त्री और सभी माताओं का नाम लेती हैं। इन सबका सहारा अब भरत ही हैं। जिस व्यक्ति को सहारे की आवश्यकता है, उसी को माँ इतने लोगों का अवलम्ब पुकारती हैं।
बन रघुपति सुरपुर नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥
चौपाई ९
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा । तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा॥
कौसल्या का आग्रह अपने भीतर पूरे घर और राज्य को समेटता है। परिवार का दुख उनके सामने है, पर प्रजा और मन्त्री भी उसी वाक्य में आते हैं। माताओं के लिये उन्होंने सभी कहा है। भरत को केवल अपने पास रख लेने की बात इस वाणी में नहीं है। उन्हें सबके जीवन की ओर ध्यान देकर अपने धैर्य का सहारा बढ़ाने को कहा जा रहा है। सभा में गुरु ने प्रजापालन को कर्तव्य बताया था; माँ उसके पीछे आश्रित लोगों की पूरी गिनती रख देती हैं।
विधाता प्रतिकूल है और समय कठोर है, यह देखकर धैर्य रखिये, वे कहती हैं। साथ ही माँ अपने पुत्र की बलिहारी जाती हैं। उस स्नेह के बीच गुरु की आज्ञा आदर से ग्रहण करके उसी के अनुसार काम करने की विनती फिर आती है। प्रजा का पालन करें और अपने कुटुम्बियों का दुःख हरें। यह कौसल्या की बात का पूरा व्यावहारिक उद्देश्य है। अपने शोक में भी वे भरत को उन लोगों की ओर बुलाती हैं जिन्हें उनकी देखभाल चाहिये।
इस प्रकार भरत के सामने तीन ओर से बात आ चुकी है। गुरु ने धर्म और नीति का विस्तार किया, मन्त्रियों ने उसका अनुमोदन किया और कौसल्या ने स्नेह के साथ सबका सहारा बनने को कहा। तुलसी अब सुननेवाले भरत के हृदय की ओर जाते हैं। गुरु के वचन और मन्त्रियों की सहमति उन्हें हितकारी चन्दन के समान लगे। फिर उन्होंने माता की कोमल वाणी सुनी, जिसमें शील, स्नेह और सरलता का रस भरा था। उसी कोमलता का प्रभाव अगले छन्द में बहुत करुण होकर खुलता है।
कौसल्या गुरु की आज्ञा को पथ्य कहती हैं। राम के वन में और दशरथ के स्वर्ग में होने पर परिवार, प्रजा, मन्त्री और सभी माताओं का सहारा भरत को बताती हैं। वे उनसे धैर्य रखकर गुरु का आदेश मानने और सबका दुःख हरने को कहती हैं।
आँसुओं से सींचा हुआ विरह
सरल रस में सनी माँ की वाणी सुनकर भरत व्याकुल हो जाते हैं। जिस बात में इतना स्नेह है, उसी के सुनने से उनकी पीड़ा बढ़ती है। तुलसी इस अवस्था को एक पूरे छन्द में रखते हैं। नेत्र कमल हैं, उनसे आँसू बह रहे हैं और वे हृदय में विरह के नये अंकुर सींच रहे हैं। आँसू यहाँ दुःख बहाकर कम करने का चित्र नहीं बनाते। छन्द के भीतर उनसे वियोग की नयी हरियाली निकल रही है, और टीका स्पष्ट कहती है कि वियोग का दुःख बहुत बढ़ गया।
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए।
छन्द, सोरठा १७६ से पूर्व
लोचन सरोरुह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥
इस चित्र की करुणा माँ और पुत्र के बीच के स्नेह से आती है। कौसल्या ने उन्हें सहारा कहा है, और अपने प्रियजनों से वियोग उस स्नेह को सुनकर फिर गहरा हो गया है। थोड़ी देर पहले गुरु और मन्त्रियों की बात हृदय के लिये चन्दन जैसी कही गयी थी। अब आँखों का जल भीतर के अंकुर सींच रहा है। तुलसी दोनों प्रभावों को उनके क्रम में कहते हैं। भरत की व्याकुलता सुननेवाले की पूरी अवस्था है; उनकी ओर से अभी कोई निर्णय घोषित नहीं हुआ है।
भरत की वह दशा देखकर उस समय सभी को अपने शरीर की सुध भूल जाती है। छन्द केवल एक व्यक्ति के आँसुओं पर नहीं रुकता, पूरी सभा का अनुभव भी कहता है। लोग भरत को स्वाभाविक स्नेह की सीमा जानकर आदर से सराहते हैं। पहले वसिष्ठ दशरथ की बड़ाई करते हुए उनके चार पवित्र पुत्रों का नाम ले चुके हैं। अब उनमें से भरत का सहज प्रेम सभा की आँखों के सामने है।
इसके बाद भरत धीरज रखते हैं। तुलसी उन्हें धैर्य की धुरी सँभालनेवाला कहते हैं। वे कमल के समान हाथ जोड़ते हैं, और मानो अमृत में डुबोये हुए वचनों से सभी को उचित उत्तर देने लगते हैं। व्याकुलता के बाद उत्तर आरम्भ करने के लिये यह धैर्य आता है। जिनके लिये सभा देह की सुध भूल गयी थी, वही भरत अब बोलने के लिये स्वयं को सँभालते हैं।
भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि।
सोरठा १७६
बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि॥ १७६॥
यहाँ प्रसंग भरत के उत्तर की शुरुआत पर ठहरता है। उनके वचनों की मधुरता और हाथ जोड़ने का विनय सामने आ गया है। वे गुरु, मन्त्री और माता को किस प्रकार उत्तर देंगे, उसकी बात अभी खुलनी शेष है। राजपद की स्वीकृति या अस्वीकृति इस सोरठे में नहीं कही गयी। हमारे सामने इस क्षण इतना है कि भरत सबको उचित उत्तर देना आरम्भ कर रहे हैं।
माता की कोमल वाणी सुनकर भरत के आँसू विरह को और बढ़ाते हैं। उनकी दशा देखकर सब देह की सुध भूल जाते हैं और उनके सहज स्नेह की सराहना करते हैं। फिर भरत धैर्य रखकर हाथ जोड़ते हैं और सबको उत्तर देना आरम्भ करते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पूरे प्रसंग में हम भरत को पहले कर्म करते हुए, फिर सुनते हुए पाते हैं। पिता के लिये दस दिनों के संस्कार पूरे किये जाते हैं। उसके बाद गुरु, मन्त्रियों और माँ की बात उनके सामने आती है। अन्त में उनका उत्तर आरम्भ होता है। इस क्रम के कारण उनके मौन को खाली जगह नहीं समझा जा सकता। वे पहले ही पुत्र का कर्तव्य निभा चुके हैं, और राजपद विषयक सभी आग्रह भी ध्यान से सुन चुके हैं। बोलने से पहले यह पूरा भार उनके पास है।
वसिष्ठ के आँसू और कौसल्या का धीरज भी साथ याद रहते हैं। ज्ञानी गुरु राम के गुण और सीता लक्ष्मण का प्रेम कहते हुए शोक में डूब जाते हैं। माता कठोर समय पहचानकर पुत्र को सबका सहारा बनने को कहती हैं। दोनों का स्नेह सलाह के भीतर बना रहता है। इसीलिए सभा की बात केवल राजपद के अधिकार पर समाप्त नहीं होती; उसमें पिता की स्मृति, राम से सम्बन्ध और पीछे रह गये लोगों की देखभाल बार बार लौटते हैं।
भरत के आँसुओं की उपमा पढ़ते हुए हमें दुःख की वह अवस्था मिलती है जिसमें किसी प्रिय की कोमल बात और अधिक रुला देती है। माँ का स्नेह सुनकर विरह के अंकुर सींचे गये हैं। उसी व्याकुलता के बाद उनका धैर्य सामने आता है। दोनों को एक साथ देखने पर अन्त का हाथ जोड़ना कितना अर्थपूर्ण लगता है। वे अपने भीतर की पीड़ा सँभालकर उन सभी को सम्बोधित करने लगते हैं जो उनका हित चाहते हैं।
सरयू की चिता से राजसभा तक भरत के सामने पिता का प्रेम और उनकी आज्ञा दोनों आये। गुरु ने राम के लौटने पर राज्य उन्हें सौंप देने का मार्ग सुझाया, मन्त्रियों ने सहमति दी और कौसल्या ने सबकी देखभाल का आग्रह रखा। अब सुनने की बारी सभा की होगी।
सोरठे का अन्त भरत के वचनों को अमृत में डूबे हुए बताता है। वे धैर्य रख चुके हैं, हाथ जुड़ गये हैं और उत्तर आरम्भ हो रहा है। उसी विनयपूर्ण क्षण पर हम इस प्रसंग से आगे बढ़ते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १७० से १७६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।