रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · तमसा से शृंगवेरपुर और लक्ष्मण का उपदेश
तमसा से शृंगवेरपुर और लक्ष्मण का उपदेश
तमसा के तट पर सोये हुए नगरवासियों से विदा, गंगा के पास गुह का आतिथ्य, और राम को धरती पर सोते देखकर उठे शोक के बीच लक्ष्मण की ज्ञान और भक्ति से भरी बात।
तमसा के तट पर राम के सामने अपने ही नगर का प्रेम है। लोग उनके साथ चले आये हैं, थके हैं, दुःखी हैं, और समझाने पर भी लौटने को तैयार नहीं होते। राम उनकी पीड़ा को अपने हृदय में पाते हैं। जिन्हें पीछे छोड़ना है, उन्हीं का दुःख उन्हें रोक रहा है। रात में जब वे लोग सो जाते हैं, तब एक कठिन प्रस्थान होता है। उसके बाद अयोध्या में प्रतीक्षा बचती है और आगे गंगा के किनारे एक दूसरा स्नेह राम का स्वागत करता है।
शृंगवेरपुर में निषादराज गुह अपनी भूमि, धन और घर अर्पित करते हैं। पिता की आज्ञा के कारण राम गाँव में निवास स्वीकार नहीं कर सकते, पर गुह की सेवा वन के ठहराव तक पहुँच जाती है। कुश और पत्तों की शय्या तैयार होती है। उसी शय्या पर सीता और राम को सोते देखकर गुह के मन में राजमहल का पूरा वैभव उभरता है। उनका विषाद लक्ष्मण के सामने खुलता है, और लक्ष्मण कर्म से आरम्भ करके माया, विवेक, प्रेम और राम के ब्रह्मस्वरूप तक अपनी बात ले जाते हैं। तुलसीदास के इस प्रसंग में रात की रखवाली के बीच इतना विस्तृत संवाद होता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम प्रजा की पीड़ा से दुःखी, पिता की आज्ञा में वनवासी, और गुह को अपने निकट बैठाने वाले सखा।
- सीता राम और लक्ष्मण के साथ यात्रा करती हुईं जानकी, जिन्हें धरती पर सोते देखकर गुह का हृदय भर आता है।
- लक्ष्मण राम के चरण दबाने और पहरा देने वाले छोटे भाई, जो गुह को ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की बात समझाते हैं।
- सुमन्त्र मन्त्री और सारथि, जो रथ के चिह्न छिपाकर चलाते हैं और गंगातट के विश्राम में भी साथ हैं।
- गुह शृंगवेरपुर के निषादराज, जिनका स्वागत, सेवा और शोक इस रात के संवाद का आधार बनते हैं।
तमसा की रात और लौटने को न मानता प्रेम
राम प्रजा को प्रेम के वश में देखते हैं। उस देखने में लोगों की थकान और दुःख दोनों उनके हृदय तक पहुँचते हैं। तुलसी पहले उनके दयालु हृदय का विशेष दुःख कहते हैं, फिर बताते हैं कि करुणामय रघुनाथ दूसरे की पीड़ा तुरन्त पा जाते हैं। नगरवासियों का साथ चलना उनके लिये केवल भीड़ का बढ़ना नहीं है। जिन लोगों का अनुराग उन्हें यहाँ तक ले आया है, उन्हीं के कष्ट से राम दुःखित हो रहे हैं।
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी । सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी॥
चौपाई १
करुनामय रघुनाथ गोसाँई । बेगि पाइअहिं पीर पराई॥
वे प्रेम सहित कोमल और सुन्दर वचन कहते हैं। लोगों को बहुत प्रकार से समझाते हैं, धर्म के अनेक उपदेश देते हैं। लौटने की बात एक बार कहकर छोड़ नहीं देते। उनके समझाने में जितनी चिन्ता है, लोगों के रुकने में उतना ही प्रेम है। फल यह होता है कि बात सुनी जाती है, पर लौटना नहीं होता। राम जिस हित के लिये उन्हें वापस भेजना चाहते हैं, नगरवासी उस हित को राम के साथ रहने से अलग नहीं कर पाते।
यहीं राम का असमंजस सामने आता है। शील और स्नेह उनसे छोड़े नहीं जाते। कठोर होकर लोगों का प्रेम ठुकरा देना उनके स्वभाव में नहीं है, और इस तरह सबको साथ लिये चलने से उनकी पीड़ा बढ़ती है। तुलसी इस दुविधा को स्वयं कहते हैं। करुणा के जिस परिचय से प्रसंग खुला था, अब वही करुणा निर्णय को कठिन बना रही है। लोगों का अनुराग राम को प्रिय है; उसी अनुराग से उपजा उनका कष्ट राम सह नहीं पा रहे।
शोक और परिश्रम के कारण लोग सो जाते हैं। कवि उनकी निद्रा में कुछ देवमाया का प्रभाव भी बताते हैं, जिससे बुद्धि मोहित हो गयी है। थकान, दुःख और माया, तीनों बातें साथ हैं। उस सो जाने को किसी का प्रेम कम पड़ना नहीं कहा गया। दिन भर साथ चलने वाले लोग अब निद्रा के अधीन हैं, और राम के लिये प्रस्थान का अवसर इसी अवस्था में आता है।
जब दो पहर रात बीत जाती है, राम सुमन्त्र से प्रेमपूर्वक कहते हैं कि रथ इस तरह चलाया जाय कि पहियों के चिह्नों से जाने की दिशा मालूम न हो। वे मन्त्री को तात कहकर सम्बोधित करते हैं और कहते हैं कि दूसरे उपाय से बात नहीं बनेगी। आदेश में छिपाने की बात स्पष्ट है। जिस मार्ग से लोग उनका पीछा कर सकते थे, उसी का पता अब छिपाना आवश्यक समझा गया है।
राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।
दोहा ८५
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ॥ ८५॥
राम, लक्ष्मण और सीता शंकर के चरणों में सिर नवाकर रथ पर चढ़ते हैं। सुमन्त्र तुरन्त रथ चलाते हैं और इधर उधर उसके चिह्न छिपा देते हैं। यह प्रस्थान रात के दो पहर बीतने के बाद होता है। सोये हुए लोगों से फिर कोई विदा का संवाद नहीं होता; उनके जागने और रथ को न पाने के बीच यही दूरी रह जाती है। राम की कोमल समझाइश से जो वापसी नहीं हो सकी, उसके लिये अब साथ चलने का रास्ता ही अनजान कर दिया गया है।
प्रजा का प्रेम और कष्ट देखकर राम उन्हें बार बार समझाते हैं, पर वे लौटते नहीं। दो पहर रात बीतने पर राम सुमन्त्र को रथ के चिह्न छिपाकर चलने को कहते हैं। शिव को प्रणाम करके राम, लक्ष्मण और सीता रथ पर चढ़ते हैं और प्रस्थान होता है।
जागने पर रथ नहीं मिलता
सबेरा होने पर नगरवासी जागते हैं। राम चले गये, यह जानकर बड़ा शोर उठता है। लोग रथ का चिह्न खोजते हैं, कहीं नहीं पाते, और राम का नाम पुकारते हुए चारों दिशाओं में दौड़ते हैं। रात में छिपाये गये निशानों का परिणाम अब उनके सामने है। जिस रथ के पीछे वे फिर चल पड़ना चाहते, उसका मार्ग पकड़ने के लिये कोई चिह्न नहीं मिलता।
तुलसी उनकी व्याकुलता को समुद्र में जहाज डूब जाने पर व्यापारियों के समुदाय की दशा से कहते हैं। सब एक साथ संकट में पड़ गये हैं। कोई दूसरे को उस रथ का पता नहीं बता सकता। फिर भी वे एक दूसरे को समझाने लगते हैं। वे राम के जाने का कारण अपने क्लेश में खोजते हैं: हमें कष्ट होगा, यह जानकर उन्होंने हमें छोड़ दिया। अपने वियोग के बीच भी राम की करुणा का यह अर्थ उन्हें याद रहता है।
पर समझ लेना और दुःख सह लेना एक साथ नहीं होते। वे अपनी निन्दा करते हैं, मछलियों की सराहना करते हैं और राम के बिना अपने जीवन को धिक्कारते हैं। उनका प्रलाप विधाता तक पहुँचता है: यदि प्रिय का वियोग ही रचा था, तो माँगने पर मृत्यु क्यों नहीं दी। यह वियोग से भरे नगरवासियों की वाणी है। राम ने उनके कष्ट के कारण साथ छोड़ा, ऐसा मानने वाले लोग ही उस बिछोह में अपने जीने को असह्य कह रहे हैं।
इसी प्रकार विलाप करते हुए, सन्ताप से भरे वे अवध लौट आते हैं। कवि उस विषम वियोग को वर्णन के बाहर कहते हैं। फिर एक शब्द में उनके प्राण टिके रहने का आधार आता है, अवधि की आशा। पोद्दार की टीका इस अवधि को चौदह वर्ष बताती है। इस समय उनकी वापसी यात्रा समाप्त होती है, पर राम के लौटने की प्रतीक्षा आरम्भ रहती है। जिस समय को राम को वन में बिताना है, उसी समय के पूरा होने में अवध के लोगों की आशा लगी है।
राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।
दोहा ८६
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि॥ ८६॥
स्त्री और पुरुष राम के दर्शन के लिये नियम और व्रत करने लगते हैं। साथ चलने का प्रयत्न अब नगर के भीतर प्रतीक्षा और नेम का रूप लेता है। दोहे में चकवा, चकवी और कमल सूर्य के बिना दीन हैं। इसी उपमा में लोगों की अवस्था कही गयी है। राम का अभाव केवल राह में नहीं रह गया; लौटे हुए नगरवासियों के दिन भी उसी अभाव में बीतने हैं।
इस लौटने में राम के प्रति उनका स्नेह घटने का कोई संकेत नहीं है। पहले वह प्रेम कदम बढ़ाकर साथ जाता था। अब वही प्रेम दर्शन की अभिलाषा में नियम ग्रहण करता है और अवधि पूरी होने की राह देखता है। जहाज डूबने की उपमा उनके व्याकुल हो उठने को दिखाती है, और सूर्य के बिना दीन चकवा, चकवी, कमल की उपमा उनकी बनी रहने वाली विरह दशा को।
नगरवासी जागकर रथ की खोज करते हैं, विलाप करते हुए अवध लौटते हैं और चौदह वर्ष की अवधि पूरी होने की आशा से प्राण सँभालते हैं। स्त्री पुरुष राम के दर्शन के लिये नियम और व्रत आरम्भ करते हैं।
गंगा की तरंगों के सामने
सीता और मन्त्री सुमन्त्र के साथ दोनों भाई शृंगवेरपुर पहुँचते हैं। गंगा को देखकर राम रथ से उतरते हैं और बड़े हर्ष से दण्डवत् करते हैं। लक्ष्मण, सीता और सुमन्त्र भी प्रणाम करते हैं। चारों की यात्रा यहाँ एक साथ प्रणाम में ठहरती है, और राम सबके साथ सुख पाते हैं। कवि गंगा को समस्त आनन्द और मंगल का मूल कहते हैं, सब सुख देने वाली और सब पीड़ाएँ हरने वाली देवनदी के रूप में उनका गुणगान करते हैं।
राम गंगा की तरंगें देखते हैं और अनेक कथा प्रसंग कहते हैं। वे देवनदी की बड़ी महिमा मन्त्री, छोटे भाई और प्रिया सीता को सुनाते हैं। सुनने वालों के नाम कथा में फिर स्पष्ट आते हैं, जिससे यह यात्रा केवल दोनों भाइयों की यात्रा बनकर नहीं रह जाती। सीता और सुमन्त्र इस सुख में भी उतने ही उपस्थित हैं जितने रथ से उतरने और प्रणाम करने में थे।
कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा । रामु बिलोकहिं गंग तरंगा॥
चौपाई २
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई । बिबुध नदी महिमा अधिकाई॥
गंगा के सामने राम का हर्ष और उनका महिमा सुनाना साथ चलता है। अनेक कथाओं का उल्लेख है, और उनका आशय इसी नदी की महिमा है। तरंगों को देखते हुए कही गयी उन बातों के बाद सब स्नान करते हैं। मार्ग की थकान चली जाती है। पवित्र जल पीकर उनके मन प्रसन्न हो जाते हैं। यात्रा का श्रम उतरने का यह अनुभव कवि बहुत सहज क्रम में रखते हैं: प्रणाम, महिमा का श्रवण, स्नान और जल पीने का सुख।
तभी तुलसी उसी श्रम पर रुककर राम का दूसरा परिचय देते हैं। जिनके स्मरण से श्रम का भारी बोझ मिट जाता है, उन्हें थकान होना लौकिक व्यवहार है। टीका उस बड़े श्रम को बार बार जन्मने और मरने का श्रम कहती है, और राम के इस व्यवहार को नरलीला बताती है। स्नान से थकान दूर होने की घटना बनी रहती है; उसके साथ कवि उस मनुष्य जैसे आचरण का आध्यात्मिक अर्थ भी रखते हैं।
सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।
दोहा ८७
चरित करत नर अनु हरत संसृति सागर सेतु॥ ८७॥
दोहा राम को शुद्ध सच्चिदानन्द का कन्द और सूर्यकुल की ध्वजा कहता है। पोद्दार की टीका शुद्धता में प्रकृति के तीन गुणों से रहित, माया से परे दिव्य स्वरूप का अर्थ खोलती है। ऐसे राम मनुष्यों के समान चरित्र करते हैं, और कवि के अनुसार वे चरित्र संसाररूपी समुद्र से पार उतरने के लिये सेतु हैं। यहाँ सेतु की बात इसी लीला के फल के रूप में आती है। नदी के किनारे विश्राम करती यात्रा के भीतर तुलसी संसार के पार जाने का यह अर्थ जोड़ते हैं।
इसलिये गंगा के पास का ठहराव दो तरह से खुलता है। यात्रियों का श्रम उतरता है, और कवि उनके बीच उपस्थित राम को संसार का श्रम हरने वाला कहते हैं। सुनने वाले तीन साथी हैं, सुनाने वाले राम हैं, और फिर राम के इस व्यवहार का अर्थ बताने वाले तुलसी हैं। महिमा सुनाने की एक घटना के भीतर इन अलग भूमिकाओं को साथ देखने से प्रणाम और स्नान दोनों का स्थान स्पष्ट होता है।
शृंगवेरपुर में राम, सीता, लक्ष्मण और सुमन्त्र गंगा को प्रणाम करते हैं। राम अनेक प्रसंगों से गंगा की महिमा सुनाते हैं; सब स्नान करते और जल पीते हैं। तुलसी राम के श्रम को नरलीला और उनके मनुष्य जैसे चरित्रों को संसार सागर से पार होने का सेतु कहते हैं।
गुह का घर और पिता की आज्ञा
राम के आने का समाचार निषादराज गुह को मिलता है। उनके हर्ष की सीमा नहीं रहती। वे प्रियजनों और भाई बन्धुओं को बुलाते हैं, भेंट देने के लिये फल और मूल लेते हैं और उन्हें भारों में भरकर मिलने चल देते हैं। पोद्दार की टीका इन भारों को बहँगियों के रूप में समझाती है। स्वागत की तैयारी में लोगों का साथ भी है और खाने के लिये लायी गयी सामग्री भी। गुह का आनन्द भेंट लेकर आने के इस प्रयत्न में दिखाई देता है।
करि दंडवत भेंट धरि आगें । प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें॥
चौपाई ३
सहज सनेह बिबस रघुराई । पूँछी कुसल निकट बैठाई॥
गुह दण्डवत् करके भेंट सामने रखते हैं और अत्यन्त प्रेम से राम को देखते हैं। राम स्वाभाविक स्नेह के वश उन्हें अपने पास बैठाते हैं और कुशल पूछते हैं। भेंट सामने रख देने पर इस मिलन का केन्द्र फल मूल से हटकर कुशल के प्रश्न पर आता है। गुह को राम के निकट स्थान मिला है, और जो समाचार वे अपने बारे में देते हैं, वह भी इन्हीं चरणों के दर्शन से शुरू होता है।
वे कहते हैं कि आपके चरणकमलों का दर्शन होने से ही कुशल है। आज मैं भाग्यवान् लोगों की गिनती में आ गया। आगे अपनी धरती, धन और घर सब राम का बताते हैं। अपने को परिवार सहित उनका सेवक कहते हुए गुह अपने लिये नीच शब्द भी कहते हैं। यह गुह की अपनी दीनता भरी विनय है, जिसमें वे अपना समूचा घराना राम की सेवा में रखते हैं। राम की ओर से उन्हें जो सम्बोधन मिलने वाला है, वह सखा है।
गुह की प्रार्थना है कि राम कृपा करके पुर में पधारें। उनके घर आने से सेवक की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और सब लोग उसके भाग्य की सराहना करेंगे। इस विनती में सेवा का अवसर और अपने भाग्य के प्रकट होने का आनन्द एक साथ है। फल मूल की भेंट वह पहले ही दे चुके हैं; अब अपने निवास को भी इस स्वागत में सम्मिलित करना चाहते हैं।
राम उन्हें सुजान सखा कहकर उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि आपने जो कहा वह सब सत्य है, पर पिता ने मुझे दूसरी आज्ञा दी है। उत्तर में गुह के प्रेम की स्वीकृति पहले आती है, और फिर उस आदेश की सीमा जिसके भीतर राम को रहना है। वे गाँव में चलने की विनती सुनकर उसकी आत्मीयता स्वीकार करते हैं, किन्तु निवास के विषय में पिता की आज्ञा खोलकर बताते हैं।
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।
दोहा ८८
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु॥ ८८॥
चौदह वर्ष वन में बसना है। मुनियों का व्रत और वेष धारण करना है, और मुनियों के योग्य आहार करना है। इसलिए गाँव के भीतर निवास उचित नहीं है। राम अपनी परिस्थिति को केवल स्थान से नहीं बताते; व्रत, पहनावा और भोजन भी उसी आज्ञा में बँधे हैं। गुह के पुर में प्रवेश करके बसने का प्रस्ताव इस वनवास की मर्यादा के भीतर स्वीकार नहीं हो सकता।
यह सुनकर गुह को भारी दुःख होता है। राम पास बैठा चुके हैं, कुशल पूछ चुके हैं और सखा कह चुके हैं, फिर भी अपने घर ठहराने की साध पूरी नहीं होती। आतिथ्य की जो दिशा गुह ने सोची थी, वह रुक गयी है। अब उनकी सेवा के लिये वन के निवास के अनुरूप स्थान खोजना शेष है। इस मिलन में मित्रता बनी रहती है और पिता की आज्ञा की सीमा भी पूरी तरह बनी रहती है।
गुह फल मूल की भेंट लेकर आते हैं, राम उन्हें पास बैठाकर कुशल पूछते हैं। गुह पुर में पधारने की विनती करते हैं। राम सखा कहकर बताते हैं कि पिता की आज्ञा से चौदह वर्ष वन में मुनियों के व्रत, वेष और आहार के साथ रहना है, इसलिए ग्रामवास उचित नहीं है।
वृक्ष के नीचे ठहरने का स्थान
गाँव के स्त्री पुरुष राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखते हैं और प्रेम से उनकी चर्चा करते हैं। उनकी बात एक जैसी नहीं है। कोई माता पिता पर आश्चर्य करता है कि वे कैसे हैं जिन्होंने ऐसे बालकों को वन भेज दिया। टीका उनके लिये सुन्दर और सुकुमार होने का भाव खोलती है। देखने वालों को वन भेजे जाने की कठोरता साल रही है, और उसी दुःख से माता पिता के बारे में यह प्रश्न उठता है।
कुछ दूसरे लोग राजा के किये को अच्छा कहते हैं। उनके अनुसार इसी बहाने विधाता ने हमें भी आँखों का लाभ दिया है। एक ही आगमन पर दोनों प्रतिक्रियाएँ साथ आती हैं: किसी को वन भेजने वालों का व्यवहार खटकता है और किसी को अपने दर्शन मिलने का सौभाग्य दिखता है। राम, लक्ष्मण और सीता के प्रति प्रेम दोनों ओर है, पर गाँव वालों की बातें अपनी अपनी जगह से निकलती हैं।
इसी बीच गुह अपने मन में रहने का स्थान विचारते हैं। उन्हें सिंसुपा का वृक्ष मनोहर लगता है, जिसे पोद्दार की टीका अशोक का पेड़ कहती है। गुह राम को ले जाकर वह स्थान दिखाते हैं। राम उसे सब प्रकार से सुहावना कहते हैं। गाँव में निवास की विनती स्वीकार नहीं हुई थी; इस वृक्ष के पास का ठहराव उनकी स्वीकृति पाता है। गुह की सेवा को अब उपयुक्त स्थान मिल गया है।
पुर के लोग वन्दना करके अपने घरों को लौट जाते हैं। राम संध्या करने पधारते हैं। गुह कुश और कोमल पत्तों की सुन्दर, मृदुल साथरी सजाकर बिछाते हैं। पवित्र, मधुर और कोमल फल मूल चुनते हैं और दोने भरकर रख देते हैं। फल चुनने में स्वाद और कोमलता का ध्यान है, शय्या बनाने में कुश और नये पत्तों का। जिन साधनों से वन में ठहरना है, गुह उन्हीं को यत्न से सँवारते हैं।
इस तैयारी का अर्थ पोद्दार की टीका दो प्रकार से खोलती है। एक अर्थ में गुह दोने भर भरकर फल मूल और पानी रखते हैं। दूसरा अर्थ यह है कि वे अपने हाथ से फल मूल के दोने भरकर रख देते हैं। दोनों अर्थों में अपने अतिथियों के लिये गुह की तत्पर व्यवस्था सामने रहती है। गाँव के घर की सुविधा यहाँ साथरी और दोने के रूप में सेवा का अवसर पा रही है।
सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।
दोहा ८९
सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ॥ ८९॥
भोजन करने वालों को दोहा नाम लेकर साथ रखता है। राम, सीता, सुमन्त्र और भाई लक्ष्मण, चारों कन्द मूल फल खाते हैं। भोजन के बाद राम लेट जाते हैं, और लक्ष्मण उनके पैर दबाने लगते हैं। गुह के लाये फल केवल सामने रखी हुई भेंट होकर नहीं रह जाते; इस ठहराव में उनका भोजन होता है। सुमन्त्र भी उसमें सम्मिलित हैं और लक्ष्मण भी, जो उसके बाद सेवा में लगते हैं।
जब लक्ष्मण राम को सोया जानते हैं, वे उठते हैं। कोमल वाणी से सुमन्त्र को सोने के लिये कहते हैं। फिर कुछ दूर जाकर धनुष बाण से सज्जित होते हैं और वीरासन में बैठकर जागने लगते हैं। सेवा का क्रम स्पष्ट है: पहले भोजन, फिर चरण दबाना, फिर राम के सो जाने पर पहरा। रात के विश्राम में सीता, राम और सुमन्त्र सोते हैं, और लक्ष्मण की जागृति उनकी रखवाली में लग जाती है।
गाँव वालों में कोई वन भेजने वाले माता पिता को दोष देता है, कोई दर्शन मिलने को अपना सौभाग्य मानता है। गुह चुने हुए वृक्ष के पास कुश पत्तों की साथरी और फल मूल की व्यवस्था करते हैं। चारों भोजन करते हैं। राम के सो जाने पर लक्ष्मण सुमन्त्र को विश्राम देकर पहरे पर बैठते हैं।
गुह के सामने साथरी, मन में राजमहल
गुह भी पहरे की व्यवस्था करते हैं। वे विश्वासपात्र पहरेदारों को बुलाकर प्रेम से अलग अलग स्थानों पर नियुक्त करते हैं। स्वयं कमर में तरकस बाँधते हैं, धनुष पर बाण चढ़ाते हैं और लक्ष्मण के पास जाकर बैठते हैं। दोनों की जागृति में रक्षा का काम है। गुह ने अतिथियों के भोजन और शयन की व्यवस्था की थी; अब उनके विश्राम की रक्षा में भी वे उपस्थित हैं।
गुहँ बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठावँ राखे अति प्रीती॥
चौपाई ४
आपु लखन पहिं बैठेउ जाई । कटि भाथी सर चाप चढ़ाई॥
सोते हुए राम को देखकर गुह के हृदय में प्रेमवश विषाद होता है। शरीर पुलकित हो उठता है और आँखों से जल बहने लगता है। वे प्रेम सहित लक्ष्मण से अपनी बात कहते हैं। गुह का यह दुःख उस शय्या को देखकर उपजता है जिसे उन्होंने स्वयं सँवारकर बिछाया है। सेवा का पूरा यत्न करने पर भी राम को पृथ्वी पर सोते देखना उनसे सहा नहीं जाता। उनकी वाणी में अब अयोध्या के महल का चित्र आने लगता है।
गुह महाराज दशरथ के भवन को स्वभाव से ही सुहावना बताते हैं। उनके वर्णन में इन्द्र का भवन भी उसकी बराबरी नहीं पा सकता। मणियों से बने सुन्दर चौबारे ऐसे हैं जैसे कामदेव ने स्वयं अपने हाथों सजाये हों। पोद्दार की टीका चौबारों को छत के ऊपर बने बँगले कहती है। गुह जिस भवन का स्मरण करा रहे हैं, उसकी सुन्दरता और सुख का विस्तार इस रात की साथरी के सामने रखा जा रहा है।
सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।
दोहा ९०
पलँग मंजु मनि दीप जहँ सब बिधि सकल सुपास॥ ९०॥
वे चौबारे पवित्र हैं, विलक्षण हैं, सुन्दर भोग सामग्री से भरे हैं। फूलों की सुगन्ध वहाँ बसी हुई है। सुन्दर पलँग हैं, मणियों के दीपक हैं और हर प्रकार का पूरा आराम है। गुह केवल भवन की ऊँचाई या धन का नाम नहीं लेते। वे उस स्थान की सुगन्ध, शय्या, प्रकाश और सुख सामग्री तक गिनाते हैं, जहाँ सीता और राम रात को विश्राम करते थे।
उस शयन की वस्तुएँ भी अलग अलग कही जाती हैं। अनेक वस्त्र, तकिये और गद्दे, दूध के फेन जैसे कोमल, उज्ज्वल और सुन्दर। टीका वस्त्रों में ओढ़ने और बिछाने की सामग्री का अर्थ बताती है। गुह कहते हैं कि वहाँ सीता और राम अपनी शोभा से रति और कामदेव का गर्व हरते हुए सोते थे। महल के सौन्दर्य का वर्णन अन्ततः वहाँ सोने वाले दोनों के सौन्दर्य तक पहुँचता है।
और अब वही सीता और राम साथरी पर सो रहे हैं। गुह उन्हें थका हुआ देखते हैं, राजमहल की ओढ़ने बिछाने की वस्त्र सुविधा से रहित इस दशा को उनसे देखा नहीं जाता। उनका अगला स्मरण उन सब लोगों का है जो राम को अपने प्राणों की तरह सँभालते थे: माता, पिता, परिजन, पुरवासी, मित्र, सुशील दास और दासियाँ। इतने लोगों की सार सँभाल के बीच रहने वाले राम आज पृथ्वी पर सो रहे हैं, यह बात गुह के विषाद को और भर देती है।
रामचंदु पति सो बैदेही । सोवत महि बिधि बाम न केही॥
चौपाई ५
सिय रघुबीर कि कानन जोगू । करम प्रधान सत्य कह लोगू॥
सीता के लिये गुह उनके सम्बन्धों का पूरा परिचय रखते हैं। पिता जनक हैं, जिनका प्रभाव जगत में प्रसिद्ध है। ससुर रघुराज दशरथ हैं, जो इन्द्र के मित्र हैं। पति रामचन्द्र हैं। वही जानकी आज जमीन पर सो रही हैं। गुह पूछते हैं कि विधाता किसके प्रतिकूल नहीं होता, और क्या सीता तथा राम वन के योग्य हैं। फिर लोगों की कही बात स्वीकार करते हैं कि कर्म, जिसे टीका यहाँ भाग्य कहती है, प्रधान है।
कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।
दोहा ९१
जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥ ९१॥
इसके बाद गुह का रोष कैकेयी पर आता है। वे कैकयराज की पुत्री को मन्दबुद्धि कहते हुए आरोप लगाते हैं कि उन्होंने ऐसी कठोर कुटिलता की जिससे सुख के अवसर पर राम और जानकी को दुःख मिला। गुह उन्हें सूर्यकुल रूपी वृक्ष के लिये कुल्हाड़ी कहते हैं और उनके कुमति भरे काम से पूरे विश्व के दुःखी होने की बात कहते हैं। यह गुह का शोक से भरा अभियोग है। सीता और राम को जमीन पर सोते देखकर उनका भारी विषाद इन कठोर शब्दों में निकल रहा है।
गुह पहरेदार नियुक्त करके लक्ष्मण के पास बैठते हैं। धरती पर सोते राम और सीता को देखकर वे महल के चौबारे, सुगन्ध, पलँग, दीपक, कोमल वस्त्र और परिवार की सार सँभाल याद करते हैं। जानकी के पिता, ससुर और पति का स्मरण करते हुए उनका शोक कैकेयी पर रोष बनकर व्यक्त होता है।
लक्ष्मण की बात, कर्म और स्वप्न
गुह की पीड़ा के उत्तर में लक्ष्मण मीठी और कोमल वाणी बोलते हैं। तुलसी उस वाणी को ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस में सनी हुई कहते हैं। ये तीनों बातें आगे के पूरे उत्तर में खुलेंगी। अभी सामने एक सखा का शोक है, जो राम और सीता की दशा देखकर कैकेयी को दोष दे रहा है। लक्ष्मण उसे भाई कहकर सम्बोधित करते हैं और सुख दुःख के कारण पर अपनी बात आरम्भ करते हैं।
बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥
चौपाई ६
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥
लक्ष्मण कहते हैं कि कोई किसी को सुख दुःख देने वाला नहीं है; सब अपने किये कर्मों का फल भोगते हैं। उनका उत्तर गुह के उस रोष के ठीक बाद आता है जिसमें कैकेयी सारी पीड़ा का कारण कही गयी हैं। लक्ष्मण इस कारण की चर्चा को अपने किये कर्मों और उनके फल की ओर ले जाते हैं। उनकी वाणी का प्रयोजन दुःखी गुह को समझाना है, और कर्म का यह कथन आगे आने वाली माया तथा परमार्थ की उनकी व्याख्या के साथ जुड़ा हुआ है।
वे पहले मिलने और बिछुड़ने को लेते हैं, फिर अच्छे बुरे भोगों को। शत्रु, मित्र और उदासीन, तीनों प्रकार के सम्बन्ध भी उनकी सूची में आते हैं। वे इन सबको भ्रम के फन्दे कहते हैं। इस सूची में वही वियोग भी है जिसका दुख अवध के लोगों ने पाया, और वही सम्बन्ध भी जिनकी सार सँभाल अभी गुह गिना रहे थे। लक्ष्मण की चर्चा सुख और दुःख दोनों अवस्थाओं तक जाती है; अच्छे और बुरे भोग साथ कहे गये हैं।
इसके आगे जन्म और मृत्यु हैं, सम्पत्ति और विपत्ति हैं, कर्म और काल हैं। लक्ष्मण इन्हें जहाँ तक जगत का जंजाल है, उस पूरे विस्तार में रखते हैं। फिर धरती, घर, धन, नगर और परिवार का नाम लेते हैं। स्वर्ग और नरक तक जितना व्यवहार है, वह भी इसी चर्चा में आता है। गुह ने महल और जमीन की शय्या को सामने रखकर अपनी पीड़ा कही थी। लक्ष्मण उस तुलना से आगे जगत के समूचे व्यवहार का स्वरूप बताते हैं।
उनके कथन में कसौटी यह है कि जो कुछ देखा जाता है, सुना जाता है और मन के भीतर विचारा जाता है, उन सबका मूल मोह है। टीका मोह को अज्ञान के अर्थ में खोलती है। लक्ष्मण कहते हैं कि परमार्थ में इनका अस्तित्व नहीं है। इस तरह उनकी बात बाहरी भोग सामग्री के साथ मन में बनने वाले विचार तक पहुँचती है। दृश्य, श्रव्य और मन में विचारा हुआ, कोई भी इस कथन के दायरे से बाहर नहीं रखा गया।
सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ।
दोहा ९२
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ॥ ९२॥
इस बात को वे स्वप्न से समझाते हैं। स्वप्न में राजा भिखारी हो सकता है और कंगाल इन्द्र बन सकता है। एक ओर अत्यन्त हानि का अनुभव है, दूसरी ओर सबसे बड़ा वैभव मिल जाने का। जागने पर दोनों में से कुछ भी वास्तविक लाभ या हानि बनकर नहीं रहता। लक्ष्मण गुह से इस दृश्य प्रपंच को भी उसी प्रकार हृदय में देखने को कहते हैं। उपमा के दोनों पक्ष आवश्यक हैं: केवल दुःख वाला स्वप्न नहीं मिटता, सुख और ऊँचे पद वाला स्वप्न भी जागने पर वैसा ही मिट जाता है।
अब लक्ष्मण उसी विचार से क्रोध की बात पर लौटते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा समझकर रोष नहीं करना चाहिये और किसी को व्यर्थ दोष नहीं देना चाहिये। गुह की जिस शिकायत से उत्तर आरम्भ हुआ था, उसके लिये यह सीधी सीख है। कर्म और स्वप्न का वर्णन उनके शोक से अलग कोई विषय बनकर नहीं रह गया। लक्ष्मण उस दुखी सखा को रोष में उलझे रहने से हटाकर अपने बताये परमार्थ की ओर ले जा रहे हैं।
लक्ष्मण गुह को अपने किये कर्मों का फल समझाते हैं। संयोग वियोग, भोग, सम्बन्ध, जन्म मृत्यु, सम्पत्ति विपत्ति और मन में विचारे जाने तक के व्यवहार को वे मोह से उत्पन्न कहते हैं। स्वप्न में राजा का भिखारी या निर्धन का इन्द्र होना जागने पर लाभ हानि नहीं रहता; इसी विचार से वे रोष और व्यर्थ दोषारोपण छोड़ने को कहते हैं।
मोह की रात से राम के चरणों तक
स्वप्न की उपमा अब लक्ष्मण की वाणी में एक पूरी रात का रूप लेती है। सब लोग मोह की रात में सोने वाले हैं और उन्हें अनेक प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं। यहाँ सोने और जागने का अर्थ उस शारीरिक विश्राम से आगे जाता है जिसकी रखवाली लक्ष्मण और गुह कर रहे हैं। उनकी चर्चा अब मोह के अधीन रहने और उससे विवेक के द्वारा छूटने की है।
लक्ष्मण कहते हैं कि इस जगत रूपी रात्रि में योगी जागते हैं। वे परमार्थ में लगे हैं और प्रपंच से वियोग पा चुके हैं। जीव को जागा हुआ कब समझा जाय, इसका लक्षण भी वे देते हैं: जब समस्त विषय विलास से वैराग्य हो जाये। उनकी व्याख्या में जागने की पहचान भोगों से विरक्ति है। रात में आँख खुली होने और इस आध्यात्मिक जागृति के बीच का अर्थ उनके इसी लक्षण से स्पष्ट होता है।
इसके बाद विवेक आता है। लक्ष्मण के अनुसार विवेक होने पर मोह का भ्रम भागता है, और तब रघुनाथ के चरणों में अनुराग होता है। वैराग्य की बात प्रेम तक पहुँचती है। वे जिस जागृति को समझा रहे हैं उसमें विषय विलास का आकर्षण छूटता है और राम के चरणों का प्रेम प्रकट होता है। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से सनी वाणी का जो परिचय तुलसी ने पहले दिया था, उसका पूरा क्रम यहाँ सामने आता है।
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा॥
चौपाई ७
सखा परम परमारथु एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू॥
सखा कहकर लक्ष्मण गुह के सामने सबसे ऊँचा परमार्थ रखते हैं: मन, कर्म और वचन से राम के चरणों में प्रेम होना। प्रेम का उल्लेख केवल मन तक सीमित नहीं है। आचरण और वाणी भी उसमें सम्मिलित हैं। गुह के स्वागत, सेवा और शोक के बीच कही गयी यह बात उसी राम की ओर लौटती है जिन्हें देखकर उनका हृदय भरा था। लक्ष्मण अब उन्हीं राम के परमार्थस्वरूप का परिचय देते हैं।
राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अलख अनादि अनूपा॥
चौपाई ८
सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥
वे कहते हैं कि राम परमार्थरूप परब्रह्म हैं। अविगत हैं, अर्थात् जानने की पकड़ में नहीं आते; अलख हैं, अर्थात् स्थूल दृष्टि से देखे नहीं जा सकते। अनादि हैं, जिनका कोई आरम्भ नहीं, और अनुपम हैं, जिनकी बराबर की उपमा नहीं। वे समस्त विकारों से रहित और भेदशून्य हैं। लक्ष्मण प्रत्येक विशेषण से उस स्वरूप का परिचय देते हैं जो बदलते भोग, पद और परिस्थिति की सीमा में नहीं बँधता।
उनके अनुसार वेद नित्य नेति नेति कहकर उसी का निरूपण करते हैं। जिसे गुह ने थका और धरती पर सोता देखकर दुःख पाया, लक्ष्मण उसी राम को इस ब्रह्मस्वरूप में बता रहे हैं। फिर प्रश्न का अगला भाग भी उनकी बात में आता है: ऐसे कृपालु राम मनुष्य का शरीर धारण करके चरित्र क्यों करते हैं। उत्तर में हित पाने वालों के नाम स्पष्ट रखे गये हैं।
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
दोहा ९३
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल॥ ९३॥
भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओं के हित के लिये, लक्ष्मण कहते हैं, कृपालु राम मनुष्य शरीर धारण करके लीलाएँ करते हैं। इन लीलाओं को सुनने से जगत के जंजाल मिट जाते हैं। उनके उत्तर का अन्त इसी फल पर है। गुह ने राम के मनुष्य जीवन का कष्ट देखा था; लक्ष्मण उसी मनुष्यरूप और उसके चरित्रों का कल्याणकारी प्रयोजन बताते हैं। गंगातट पर कवि ने जिन चरित्रों को संसार से पार जाने का सेतु कहा था, यहाँ लक्ष्मण उनके श्रवण से संसार का जंजाल मिटने की बात कहते हैं।
लक्ष्मण मोह को रात और विषय विलास से वैराग्य को जागने का लक्षण कहते हैं। विवेक से भ्रम मिटता है और राम के चरणों में प्रेम होता है। वे मन, कर्म और वचन का यही प्रेम सर्वोच्च परमार्थ बताते हैं, तथा राम को विकार और भेद से रहित ब्रह्म कहते हैं, जो भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओं के हित में मनुष्यलीला करते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में प्रेम कई रूपों में सामने आया है। नगरवासी लौटना नहीं चाहते, राम उनकी पीड़ा से दुःखी हैं, गुह अपने घर पधारने की विनती करते हैं और फिर वन के अनुकूल सेवा सँवारते हैं। प्रत्येक जगह किसी प्रिय के सुख की चिन्ता है, और प्रत्येक जगह उस चिन्ता को एक कठिन सीमा मिलती है। लोगों को पीछे रहना पड़ता है। गुह को अपने घर ठहराने का अवसर नहीं मिलता। फिर भी उनके प्रेम के काम बने रहते हैं: अवध में नियम और व्रत, गंगातट पर भोजन, शय्या और पहरा।
गुह का महल स्मरण जितना विस्तार पाता है, लक्ष्मण का उत्तर भी उतनी ही पूरी बात कहता है। महल के सुख, परिवार की सार सँभाल और जानकी के सम्बन्धों के बाद गुह का दुःख कैकेयी पर आरोप तक गया था। लक्ष्मण कर्म से आरम्भ करके उस रोष पर लौटते हैं, फिर विवेक और भक्ति तक जाते हैं। हम दोनों की बातें साथ सुनें तो दुःख की तीव्रता और उसे समझाने का प्रयत्न दोनों पूरे दिखाई देते हैं।
रात की रखवाली इस संवाद की जगह है। गुह अपने पहरेदार नियुक्त करके आये हैं, लक्ष्मण धनुष बाण सहित जाग रहे हैं, और उनके सामने राम तथा सीता विश्राम कर रहे हैं। इसी सेवा के बीच लक्ष्मण मन, कर्म और वचन से राम के चरणों में प्रेम को सर्वोच्च परमार्थ कहते हैं। जिस राम का विश्राम सँभाला जा रहा है, उनका ब्रह्मस्वरूप और मनुष्यलीला का प्रयोजन भी इसी बातचीत में खुलता है।
गुह की वाणी पृथ्वी पर सोते सीता और राम के दुःख से भरी थी। लक्ष्मण का उत्तर उसी दृश्य के भीतर कर्म, मोह, विवेक और प्रेम का अर्थ रखता है। अन्त में उनके कथन का आश्रय कृपालु राम की मनुष्यलीला है: भक्तों और जगत के हित के लिये किये जाने वाले वे चरित्र, जिनके सुनने से जगत के जंजाल मिटते हैं। इस रात की बातचीत यहीं, राम के स्वरूप और उनकी लीला के श्रवण पर ठहरती है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ८५ से ९३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।