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तमसा से शृंगवेरपुर और लक्ष्मण का उपदेश

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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 11

तमसा के तट पर सोये हुए नगरवासियों से विदा, और गंगा के पास गुह का आतिथ्य। राम को धरती पर सोते देखकर शोक उठता है। उस शोक के बीच लक्ष्मण की ज्ञान और भक्ति से भरी बात।

तमसा के तट पर राम देखते हैं कि प्रजा प्रेम के वश है, और उनके दयालु हृदय में बड़ा दुःख होता है। शृंगवेरपुर में गुह उनसे पुर में पधारने की विनती करते हैं, और राम पिता की आज्ञा से उत्तर देते हैं। सोते हुए राम को देखकर गुह रोते हैं, और लक्ष्मण से अपना दुःख कहते हैं।

इस प्रसंग में लोग सो जाते हैं, और मन्त्री रथ के चिह्न छिपाते हुए रथ ले जाते हैं। सबेरे लोगों को कोई चिह्न नहीं मिलता, और वे अयोध्या लौट आते हैं। गंगा के पास राम उतरकर दण्डवत् करते हैं। गुह फल और मूल लेकर आते हैं, और गाँव के स्त्री पुरुष तीनों को देखते हैं। गुह साथरी बिछाते हैं। लक्ष्मण धनुष लेकर पहरा देते हैं, और गुह उनके पास बैठते हैं। गुह राजमहल की, और सीता और राम के धरती पर सोने की बात कहते हैं। लक्ष्मण कर्म की, स्वप्न और मोह की रात की, और राम के चरणों में प्रेम की बात कहते हैं।

गुह और उनके अतिथि

  • राम प्रजा की पीड़ा से दुःखी, पिता की आज्ञा से वनवासी, और गुह को अपने पास बैठानेवाले सखा।
  • सीता राम और लक्ष्मण के साथ यात्रा करती हुई, जिन्हें धरती पर सोते देखकर गुह का हृदय भर आता है।
  • लक्ष्मण राम के चरण दबानेवाले और पहरा देनेवाले छोटे भाई, जो गुह को ज्ञान, वैराग्य और भक्ति की बात समझाते हैं।
  • सुमन्त्र मन्त्री, जो रथ के चिह्न छिपाकर चलाते हैं और शृंगवेरपुर में भी साथ हैं।
  • गुह निषादराज, जो भेंट लेकर आते हैं और राम से पुर में पधारने की विनती करते हैं। वे साथरी बिछाते हैं, और सोते हुए राम को देखकर लक्ष्मण से अपना दुःख कहते हैं।

तमसा की रात और लौटने को न मानता प्रेम

राम प्रजा को प्रेम के वश में देखते हैं, और उनके दयालु हृदय में बड़ा दुःख होता है। राम करुणामय हैं। दूसरे की पीड़ा वे तुरन्त पा जाते हैं।

वे प्रेम भरे कोमल और सुन्दर वचन कहकर लोगों को बहुत प्रकार से समझाते हैं, धर्म के अनेक उपदेश देते हैं। प्रेम के वश लोग लौटाये नहीं लौटते।

शील और स्नेह छोड़े नहीं जाते। राम असमंजस के वश हो जाते हैं।

शोक और थकान के वश लोग सो जाते हैं, और देवताओं की माया से उनकी बुद्धि कुछ मोहित हो जाती है।

जब दो पहर रात बीत जाती है, राम सुमन्त्र से प्रेम से कहते हैं कि रथ के चिह्न मिटाकर रथ हाँकिये, तात। और किसी उपाय से बात नहीं बनेगी।

राम, लक्ष्मण और सीता रथ पर चढ़कर शिव के चरणों में सिर नवाते हैं। सुमन्त्र तुरन्त रथ चलाते हैं और इधर उधर उसके चिह्न छिपा देते हैं।

जागने पर रथ नहीं मिलता

सबेरा होने पर सब नगरवासी जागते हैं। राम चले गये हैं, और बड़ा शोर उठता है। लोग रथ के चिह्न कहीं नहीं पाते, और “राम राम” पुकारते हुए चारों दिशाओं में दौड़ते हैं।

मानो समुद्र में जहाज डूब गया हो, और व्यापारियों का बड़ा समुदाय व्याकुल हो उठा हो। वे एक दूसरे को उपदेश देते हैं कि हमारा क्लेश जानकर राम ने हमें छोड़ दिया है।

वे अपनी निन्दा करते हैं और मछलियों की सराहना करते हैं। पोद्दार की टीका के अनुसार वे कहते हैं कि राम के बिना जीवन को धिक्कार है। विधाता ने यदि प्रिय का वियोग रचा, तो माँगने पर मृत्यु क्यों नहीं दी?

इसी प्रकार विलाप करते हुए, सन्ताप से भरे वे अवध लौट आते हैं। उस विषम वियोग का वर्णन नहीं हो सकता। उनके प्राण अवधि की आशा पर टिके हैं। पोद्दार की टीका इस अवधि को चौदह वर्ष बताती है।

स्त्री और पुरुष राम के दर्शन के लिये नियम और व्रत करने लगते हैं, मानो सूर्य के बिना चकवा, चकवी और कमल दीन हो गये हों।

गंगा की तरंगों के सामने

सीता और मन्त्री सुमन्त्र के साथ दोनों भाई शृंगवेरपुर पहुँचते हैं। गंगा को देखकर राम उतरते हैं और बड़े हर्ष से दण्डवत् करते हैं। लक्ष्मण, सुमन्त्र और सीता प्रणाम करते हैं, और राम सबके साथ सुख पाते हैं। गंगा समस्त आनन्द और मंगल का मूल हैं, सब सुख देनेवाली और सब पीड़ा हरनेवाली।

करोड़ों कथा प्रसंग कह कहकर राम गंगा की तरंगें देखते हैं। वे मन्त्री, छोटे भाई और प्रिया सीता को देवनदी की बड़ी महिमा सुनाते हैं।

फिर सब स्नान करते हैं। मार्ग की थकान चली जाती है, और पवित्र जल पीकर मन प्रसन्न हो जाते हैं।

जिनके स्मरण से भारी श्रम मिट जाता है, उनका यह श्रम लौकिक व्यवहार है। टीका उस भारी श्रम को बार बार जन्मने और मरने का श्रम कहती है, और राम के इस व्यवहार को नरलीला बताती है।

राम शुद्ध और सच्चिदानन्द के कन्द हैं। पोद्दार की टीका शुद्ध का अर्थ प्रकृति के तीन गुणों से रहित, माया से परे दिव्य स्वरूप बताती है। ऐसे राम मनुष्यों के समान चरित्र करते हैं, और वे चरित्र संसार रूपी समुद्र से पार उतरने के लिये सेतु हैं।

गुह का घर और पिता की आज्ञा

यह समाचार पाकर गुह आनन्दित होकर प्रियजनों और भाई बन्धुओं को बुलाते हैं। भेंट के लिये फल और मूल लेकर वे उन्हें भारों में भरते हैं और मिलने चल देते हैं। उनके हृदय में हर्ष की सीमा नहीं रहती। पोद्दार की टीका इन भारों को बहँगियाँ कहती है।

गुह दण्डवत् करके भेंट सामने रखते हैं और अत्यन्त प्रेम से राम को देखते हैं। राम स्वाभाविक स्नेह के वश उन्हें अपने पास बैठाते हैं और कुशल पूछते हैं।

गुह कहते हैं कि आपके चरणकमलों के दर्शन से कुशल है। मैं भाग्यवान् लोगों की गिनती में आ गया। वे अपनी धरती, धन और घर सब राम का बताते हैं, और अपने को परिवार सहित उनका नीच सेवक कहते हैं।

गुह विनती करते हैं कि राम कृपा करके पुर में पधारें और सेवक की प्रतिष्ठा बढ़ायें। सब लोग उसे सिहायें।

राम उन्हें सुजान सखा कहकर उत्तर देते हैं कि आपने जो कहा वह सब सत्य है। पिता ने मुझे दूसरी आज्ञा दी है।

चौदह वर्ष वन में बसना है, मुनियों के व्रत, वेष और आहार के साथ। गाँव के भीतर रहना उचित नहीं है।

यह सुनकर गुह को भारी दुःख होता है।

वृक्ष के नीचे ठहरने का स्थान

गाँव के स्त्री पुरुष राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखते हैं और प्रेम से उनकी चर्चा करते हैं। कोई अपनी सखी से पूछती है कि वे माता पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे बालकों को वन भेज दिया। टीका यहाँ बालकों के सुन्दर और सुकुमार होने का भाव जोड़ती है।

कुछ कहते हैं कि राजा ने अच्छा किया। विधाता ने हमें आँखों का लाभ दिया।

तब गुह हृदय में अनुमान करते हैं, और एक वृक्ष उन्हें मनोहर जान पड़ता है। पोद्दार की टीका उसे अशोक का पेड़ कहती है। गुह राम को ले जाकर वह स्थान दिखाते हैं, और राम उसे सब प्रकार से सुहावना कहते हैं।

पुर के लोग वन्दना करके अपने घरों को लौट जाते हैं, और राम संध्या करने जाते हैं। गुह कुश और कोमल पत्तों की सुन्दर, मुलायम साथरी सजाकर बिछाते हैं। पवित्र, मधुर और कोमल फल मूल जानकर दोने भर भरकर रख देते हैं।

पोद्दार की टीका इसके दो अर्थ देती है। एक अर्थ में गुह दोने भर भरकर फल मूल और पानी रखते हैं। दूसरे अर्थ में वे अपने हाथ से फल मूल के दोने भरकर रख देते हैं।

राम, सीता, सुमन्त्र और भाई लक्ष्मण, चारों कन्द मूल फल खाते हैं। भोजन के बाद राम लेट जाते हैं, और लक्ष्मण उनके पैर दबाने लगते हैं।

जब लक्ष्मण राम को सोया जानते हैं, वे उठते हैं और कोमल वाणी से सुमन्त्र को सोने के लिये कहते हैं। फिर कुछ दूर जाकर धनुष बाण से सजते हैं और वीरासन में बैठकर पहरा देने लगते हैं।

गुह के सामने साथरी, मन में राजमहल

गुह विश्वासपात्र पहरेदारों को बुलाकर बड़े प्रेम से अलग अलग स्थानों पर लगाते हैं। फिर स्वयं कमर में तरकस बाँधकर, धनुष पर बाण चढ़ाकर लक्ष्मण के पास जा बैठते हैं।

सोते हुए राम को देखकर गुह के हृदय में प्रेम के वश विषाद होता है। शरीर पुलकित हो उठता है, आँखों से आँसू बहने लगते हैं, और वे प्रेम से लक्ष्मण से अपनी बात कहते हैं।

पेड़ के नीचे घास और पत्तों की साथरी पर राम और सीता सो रहे हैं। धनुष बाण लिये लक्ष्मण पहरा दे रहे हैं, और पास बैठे गुह की आँखों से आँसू बह रहे हैं। दोनों में फल रखे हैं।

गुह कहते हैं कि राजा का महल स्वभाव से सुन्दर है। इन्द्र का भवन उसकी बराबरी नहीं कर सकता। उसमें मणियों के सुन्दर चौबारे हैं, मानो कामदेव ने उन्हें अपने हाथों सजाया हो। पोद्दार की टीका चौबारों को छत के ऊपर बने बँगले कहती है।

वे चौबारे पवित्र हैं, विलक्षण हैं, सुन्दर भोग सामग्री से भरे हैं और फूलों की सुगन्ध से महकते हैं। वहाँ सुन्दर पलँग हैं, मणियों के दीपक हैं और हर प्रकार का पूरा आराम है।

वहाँ अनेक वस्त्र, तकिये और गद्दे हैं, दूध के फेन जैसे कोमल, उज्ज्वल और सुन्दर। टीका वस्त्रों में ओढ़ने और बिछाने की सामग्री गिनती है। गुह कहते हैं कि वहाँ सीता और राम रात को सोते थे और अपनी शोभा से रति और कामदेव का गर्व हरते थे।

और वही सीता और राम घास की साथरी पर थके हुए, बिना ओढ़ने बिछाने के वस्त्रों के सो रहे हैं। यह देखा नहीं जाता। फिर गुह उन सबको गिनते हैं जो राम को अपने प्राणों की तरह सँभालते थे: माता, पिता, परिजन, पुरवासी, मित्र, अच्छे स्वभाव के दास और दासियाँ। वही राम पृथ्वी पर सो रहे हैं।

सीता के लिये गुह उनके सम्बन्ध गिनाते हैं। पिता जनक हैं, जिनका प्रभाव जगत् में प्रसिद्ध है। ससुर दशरथ हैं, जो इन्द्र के मित्र हैं। पति राम हैं। वही सीता जमीन पर सो रही हैं। गुह कहते हैं, विधाता किसके प्रतिकूल नहीं होता? क्या सीता और राम वन के योग्य हैं? लोग सच कहते हैं कि कर्म प्रधान है, जिसे टीका यहाँ भाग्य कहती है।

फिर गुह कैकेयी की बात करते हैं। वे उन्हें मन्दबुद्धि कहते हैं, जिन्होंने कठोर कुटिलता की, और सुख के अवसर पर राम और सीता को दुःख दिया। गुह उन्हें सूर्यकुल रूपी वृक्ष के लिये कुल्हाड़ी कहते हैं, और कहते हैं कि उनकी कुबुद्धि ने सारे विश्व को दुःखी कर दिया। ये गुह के अपने कठोर शब्द हैं। सीता और राम को जमीन पर सोते देखकर गुह को भारी विषाद होता है।

लक्ष्मण की बात, कर्म और स्वप्न

लक्ष्मण मीठी और कोमल वाणी में बोलते हैं, जो ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस में सनी हुई है। वे गुह को भाई कहकर सुख और दुःख के कारण पर बात आरम्भ करते हैं।

लक्ष्मण कहते हैं कि कोई किसी को सुख दुःख देनेवाला नहीं है। सब अपने किये कर्म भोगते हैं।

फिर वे गिनाते हैं: मिलना और बिछुड़ना, अच्छे और बुरे भोग, मित्र, शत्रु और उदासीन, ये भ्रम के फन्दे हैं।

जन्म और मृत्यु, जहाँ तक जगत् का जंजाल है, सम्पत्ति और विपत्ति, कर्म और काल। धरती, घर, धन, नगर और परिवार, स्वर्ग और नरक, जहाँ तक व्यवहार है।

जो कुछ देखा जाता है, सुना जाता है और मन में विचारा जाता है, लक्ष्मण कहते हैं, उन सबका मूल मोह है। टीका मोह को अज्ञान कहती है। यह परमार्थ नहीं है।

स्वप्न में राजा भिखारी हो जाये या कंगाल इन्द्र बन जाये, तो जागने पर न कुछ लाभ रहता है, न हानि। इसी प्रकार प्रपंच को हृदय में देखना चाहिये।

ऐसा विचारकर, लक्ष्मण कहते हैं, रोष नहीं करना चाहिये और किसी को व्यर्थ दोष नहीं देना चाहिये।

मोह की रात से राम के चरणों तक

लक्ष्मण कहते हैं कि सब लोग मोह की रात में सोनेवाले हैं, और सोते हुए उन्हें अनेक प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं।

इस जगत् रूपी रात में योगी जागते हैं, जो परमार्थ में लगे हैं और प्रपंच से छूट चुके हैं। जीव को जागा हुआ तभी समझना चाहिये जब समस्त विषय विलास से वैराग्य हो जाये।

विवेक होने पर मोह का भ्रम भाग जाता है, और तब राम के चरणों में अनुराग होता है।

लक्ष्मण गुह को सखा कहकर सबसे ऊँचा परमार्थ बताते हैं: मन, कर्म और वचन से राम के चरणों में प्रेम होना।

फिर वे कहते हैं कि राम परमार्थरूप ब्रह्म हैं। वे अविगत, अलख, अनादि और अनुपम हैं। पोद्दार की टीका अविगत को जानने में न आनेवाला और अलख को स्थूल दृष्टि से न दिखनेवाला बताती है। वे समस्त विकारों से रहित और भेदशून्य हैं।

वेद नित्य नेति नेति कहकर उनका वर्णन करते हैं।

भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओं के हित के लिये, लक्ष्मण कहते हैं, कृपालु राम मनुष्य शरीर धारण करके चरित्र करते हैं। उन चरित्रों को सुनने से जगत् के जंजाल मिट जाते हैं।

प्रसंग का क्रम

राम प्रजा का प्रेम देखकर दुःखी होते हैं। वे लोगों को समझाते हैं और धर्म का उपदेश देते हैं, और लोग नहीं लौटते। शोक और थकान के वश वे सो जाते हैं। दो पहर बीतने पर राम मन्त्री से रथ के चिह्न मिटाते हुए रथ हाँकने को कहते हैं। तीनों रथ पर चढ़कर शिव को सिर नवाते हैं, और मन्त्री रथ चला देते हैं। सबेरे लोग जागते हैं, कोई चिह्न नहीं पाते, राम राम पुकारते हुए दौड़ते हैं, और अयोध्या लौट आते हैं। वहाँ स्त्री पुरुष राम के दर्शन के लिये नियम और व्रत करने लगते हैं। चारों शृंगवेरपुर पहुँचते हैं, और राम गंगा को दण्डवत् करते हैं, उनकी महिमा सुनाते हैं, और सबके साथ स्नान करते हैं। गुह भेंट लेकर आते हैं और राम से पुर में पधारने की विनती करते हैं। राम उन्हें पिता की आज्ञा बताते हैं, और गुह दुःखी होते हैं। गाँव के लोग प्रेम से तीनों की चर्चा करते हैं। गुह राम को स्थान दिखाते हैं, साथरी सजाते हैं, और फल, मूल और जल रखते हैं। भोजन के बाद राम लेट जाते हैं। लक्ष्मण उनके पैर दबाते हैं, फिर उठकर मन्त्री को सोने के लिये कहते हैं, और पहरा देते हैं। गुह पहरेदार लगाकर उनके पास बैठते हैं। वे रोते हैं और लक्ष्मण से राजमहल की बात कहते हैं। दोनों को धरती पर सोते देखकर उन्हें भारी विषाद होता है। लक्ष्मण उनसे कहते हैं कि कोई किसी को सुख दुःख देनेवाला नहीं है। वे जगत् को स्वप्न की तरह देखने को कहते हैं। वे मोह की रात में सोनेवालों की, और जागनेवाले योगियों की बात कहते हैं। राम के चरणों में प्रेम, वे कहते हैं, सबसे ऊँचा परमार्थ है। राम, वे कहते हैं, ब्रह्म हैं, और भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओं के हित के लिये मनुष्य शरीर धारण करके चरित्र करते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 85 से 93, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।