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राम का भरत को समझाना और तीर्थों का जल

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · राम का भरत को समझाना और तीर्थों का जल

राम का भरत को समझाना और तीर्थों का जल

इन्द्र की माया से डोलती सभा में राम भरत को साझा धर्म का भरोसा देते हैं। भरत सेवा के लिये सहारा और चित्रकूट के दर्शन की अनुमति माँगते हैं।

चित्रकूट में सबके भीतर एक ही निर्णय की प्रतीक्षा है, पर सबका मन एक जैसी दशा में नहीं है। किसी क्षण वन प्रिय लगता है, अगले क्षण घर बुलाने लगता है। राम के प्रति प्रेम बना हुआ है और उसी के साथ ऐसा उचाट लग गया है कि कहीं सन्तोष नहीं मिलता। तुलसीदास इस उलझन के पीछे इन्द्र का छल दिखाते हैं। सभा के बीच भरत की भक्ति का प्रभाव भी है, जिसके सामने जनक और मुनियों तक की बुद्धि प्रेम में बँध गयी है। राम दोनों बातें देखते हैं, लोगों की व्यथा भी और अपने भाई का हृदय भी।

अब राम बोलेंगे। उनके वचनों में पिता की सत्यप्रतिज्ञा, गुरु का आश्रय, प्रजा का सुख और भाई की कोमलता साथ आएँगे। वन में रहनेवाले राम स्वयं कहेंगे कि चौदह वर्षों तक सबसे बड़ी कठिनाई भरत को होगी। भरत इस उत्तर से ऐसा सन्तोष पाएँगे जैसे साथ चलने का सुख मिल गया हो। फिर भी अवधि बिताने के लिये एक सहारा माँगेंगे, जिसकी सेवा कर सकें। यह माँग अपने नाम से अभी खुलती नहीं। इसके बाद तीर्थों से लाये हुए जल और चित्रकूट की चरणचिह्नोंवाली भूमि के दर्शन की बात होगी। कथा का यह अंश अत्रि मुनि के उस निर्देश पर ठहरता है जो पवित्र जल के लिये स्थान बताता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम भरत का हृदय जानकर धर्म, साझा दायित्व और गुरु के आश्रय का भरोसा देनेवाले बड़े भाई।
  • भरत आज्ञा स्वीकार करके अवधि बिताने का सहारा और चित्रकूट के दर्शन की अनुमति माँगनेवाले भाई।
  • वसिष्ठ जिनके अनुग्रह को राम घर और वन, दोनों समाजों का रक्षक कहते हैं।
  • जनक सबको सँभालने में सहायक मिथिलापति, जो राम और भरत के प्रेम की पुलकित प्रशंसा करते हैं।
  • अत्रि चित्रकूट में भ्रमण और तीर्थजल की स्थापना के लिये राम द्वारा मान्य मार्गदर्शक मुनि।
  • कौसल्या सुख और दुःख को समान जानकर राम के गुणों से दूसरी रानियों को धैर्य देनेवाली माता।
  • इन्द्र अपने स्वार्थ के लिये लोगों के मन में उचाट डालनेवाले देवराज।

वन और घर के बीच डोलता मन

तुलसीदास देवराज का परिचय उनके पद से आगे जाकर उनके आचरण से देते हैं। इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा हैं, जिन्हें अपना लाभ और दूसरे की हानि प्रिय है। कवि उनकी रीति को कौए जैसी कहते हैं, छल से भरी, मलिन और ऐसी कि कहीं किसी पर विश्वास नहीं होता। इसी मन से इन्द्र पहले बुरा विचार करते हैं, फिर अनेक प्रकार के कपट का साज जुटाते हैं। जो उचाट उस कपट से पैदा हुआ, उसे लोगों के सिर पर डाल देते हैं। इस बार देवमाया मनों को सचमुच प्रभावित करती है।

प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥
सुरमायाँ सब लोग बिमोहे । राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥

चौपाई १

फिर भी एक बात बची रहती है। लोगों का राम से प्रेम पूरी तरह छूट नहीं जाता। पोद्दार जी की टीका इस आधी पंक्ति को स्पष्ट करती है: कुछ प्रेम अब भी बना हुआ है। इसी कारण उनकी दशा केवल घर लौटने की इच्छा से समझ में नहीं आएगी। यदि स्नेह सर्वथा मिट गया होता तो द्विविधा भी ऐसी न होती। यहाँ एक ओर राम का आकर्षण है और दूसरी ओर भय तथा उचाट। चित्त स्थिर होने का कोई ठिकाना नहीं पा रहा।

क्षण भर को लगता है कि वन में ही रहें। अगले क्षण घर सुहावना लगने लगता है। प्रजा की इस मनोदशा को कवि नदी और समुद्र के संगम का जल बना देते हैं। टीका के अनुसार वह जल कभी इधर आता है, कभी उधर जाता है। मिलने की जगह ही उसकी अस्थिरता की जगह हो गयी है। ठीक वैसे ही, लोगों के मन में वन की रुचि और घर की रुचि मिलकर उन्हें सन्तोष नहीं देतीं। दोनों ओर आकर्षण है और किसी ओर ठहराव नहीं।

इस व्यथा का एक और पहलू है। लोग एक दूसरे से अपना मर्म भी नहीं कह रहे। चित्त दो ओर बँटा हुआ है, पर भीतर की उलझन साझा नहीं हो रही। कृपानिधान राम यह दशा देखकर हृदय में हँसते हैं। उनकी हँसी भीतर की है। वे कुत्ते, इन्द्र और नवयुवक की प्रकृति को एक जैसा कहते हैं। यहाँ नवयुवक का अर्थ टीका कामी पुरुष खोलती है। इन्द्र की अविश्वासी और स्वार्थभरी रीति पर राम की यह टिप्पणी है।

पोद्दार जी इसके साथ व्याकरण का एक संकेत भी देते हैं। उनके अनुसार पाणिनीय व्याकरण में श्वन्, युवन् और मघवन् शब्दों के रूप भी एक जैसे होते हैं। इस प्रकार स्वभाव की तुलना में शब्दों के रूपों का साम्य जुड़ जाता है। चित्त की ऐसी व्यथा को देखकर राम की भीतर की हँसी और उस हँसी में आया यह संकेत, दोनों कवि के चित्र में साथ रहते हैं। पर देवमाया की पहुँच बतानेवाला अगला दोहा कुछ लोगों को उससे स्पष्ट रूप से अलग रखता है।

भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ॥ ३०२॥

दोहा ३०२

भरत, जनक, मुनिजन, मन्त्री और सचेत, ज्ञानी साधु संत इस माया से बचे रहते हैं। शेष लोगों में भी उसका प्रभाव एक जैसा नहीं है। जिसे जिस प्रकृति और दशा का पाया, उसे उसी के अनुरूप उसने प्रभावित किया। इसलिए सभा को एक ही भ्रम में डूबी हुई भीड़ कह देने से वह भेद खो जाएगा जिसे तुलसीदास स्वयं रखते हैं। भरत की स्थिरता और दूसरे लोगों की दुविधा एक ही समय पर मौजूद हैं।

इन्द्र का छल लोगों को उचाट और दुविधा में डालता है, जबकि राम का कुछ प्रेम उनके भीतर बना रहता है। भरत, जनक, मुनि, मन्त्री और ज्ञानी संत देवमाया से अप्रभावित हैं।

भरत का यश और कवि की चकोरी

कृपासिन्धु राम लोगों के दुःख में अपना स्नेह और इन्द्र का भारी छल, दोनों देखते हैं। दूसरी ओर भरत की भक्ति ने सभा की बुद्धि को ऐसा बाँध लिया है कि जनक, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री सभी उसके प्रभाव में हैं। यह भक्ति का प्रेममय प्रभाव है। अभी जिनको देवमाया से अलग रखा गया, वे भी भरत के प्रेम से अभिभूत हैं। जनक और मुनियों की प्रेममग्न दशा को देवमाया की दुर्बलता समझ लेना इस दृश्य का अर्थ बदल देगा।

लोग चित्र में लिखे हुए जैसे राम की ओर देखते हैं। बोलते हैं तो संकोच के साथ, मानो सीखे हुए वचन बोल रहे हों। भरत की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख देती है, पर उसका वर्णन करना कठिन पड़ रहा है। सभा की यह कठिनाई अब कवि की कठिनाई बनती है। जिनकी भक्ति का थोड़ा सा अंश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर प्रेम में मग्न हो गये, उनकी महिमा तुलसीदास किस तरह कहें? भरत का प्रभाव सुननेवालों से बढ़कर कहनेवाले तक पहुँच गया है।

फिर भी भक्ति और सुन्दर भाव से कवि के हृदय में सुबुद्धि हुलसती है। उनमें कहने की रुचि जागती है। कठिनाई प्रेम के अभाव से नहीं आती। बुद्धि को भरत की महिमा बड़ी दिखती है और अपना आकार छोटा। कवियों की परम्परा की मर्यादा का विचार करके वह संकुचित हो जाती है। गुणों में उसकी रुचि बहुत है, किन्तु कह सकने का सामर्थ्य उतना नहीं। तुलसीदास उसकी गति बालक के वचनों जैसी बताते हैं।

इस छोटेपन में रुचि नष्ट नहीं होती। यही बात अगले दोहे के चित्र में बड़ी कोमलता से खुलती है। भरत का निर्मल यश चन्द्रमा है और कवि की सुबुद्धि एक चकोरी। इस चन्द्रमा के लिये आकाश भी कोई दूर की जगह नहीं चुनी गयी। भक्तों के निर्मल हृदय ही उसका आकाश हैं। वहाँ उदित हुए यश को देखकर बुद्धि उसकी ओर एकटक देखती रह जाती है। वर्णन की इच्छा अब देखने में तन्मय हो गयी है।

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।
उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि॥ ३०३॥

दोहा ३०३

इस चित्र में चन्द्रमा, आकाश और देखनेवाली चकोरी, तीनों का अपना स्थान है। भरत की महिमा स्वयं चमकती है, भक्तों के हृदय उसे धारण करते हैं और कवि की बुद्धि उसका दर्शन करती है। पोद्दार जी दोहे की टीका में इसी ठहर गयी दृष्टि के साथ प्रश्न रखते हैं कि अब उसका वर्णन कौन करे। कवि की असमर्थता कहकर प्रसंग छोड़ा नहीं गया। उस असमर्थता को भी भरत के यश का एक दृश्य बना दिया गया है।

तुलसीदास आगे कहते हैं कि भरत के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिये भी सुगम नहीं। वे कवियों से अपनी छोटी बुद्धि की चपलता क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं। साथ ही इस कहने और सुनने का फल बताते हैं: भरत के सद्भाव को कहते सुनते मनुष्य सीताराम के चरणों में अनुरक्त होता है। भरत का स्मरण करके भी जिसे राम का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान अभागा कौन होगा, यह कवि का भक्तिपूर्ण कथन है। इस तरह भरत की महिमा का वर्णन राम के प्रेम तक ले जानेवाला हो जाता है।

भरत की भक्ति सभा को प्रेम में बाँधती है और कवि की बुद्धि को भी अभिभूत करती है। तुलसीदास उनके यश को भक्तों के हृदय आकाश में उदित चन्द्रमा और अपनी सुबुद्धि को उसे देखती चकोरी कहते हैं।

भरत के हृदय को जानकर राम बोलते हैं

दयालु राम सबकी दशा देख चुके हैं। वे भरत के हृदय की स्थिति भी जानते हैं। तुलसीदास इस उत्तर से पहले राम के स्वभाव को विस्तार से रखते हैं: वे धर्म की धुरी धारण करनेवाले, धैर्यवान और नीति में चतुर हैं। सत्य, स्नेह, शील और सुख के समुद्र हैं। वे नीति और प्रीति, दोनों का पालन करते हैं। उनके सामने केवल एक माँग का उत्तर देने का काम नहीं है। देश, काल, अवसर और उपस्थित समाज को देखकर उन्हें बोलना है।

वचन आते हैं तो कवि उन्हें वाणी का सर्वस्व कहते हैं। उनके दो गुण साथ बताए गये हैं। सुनने में वे चन्द्रमा के रस, अमृत के समान हैं और परिणाम में हितकारी हैं। सुनते समय की मिठास और आगे चलकर होनेवाला भला, दोनों इस वाणी में रखे गये हैं। जिन लोगों के भीतर स्नेह और उचाट की टक्कर हो रही है, उनके सामने राम की बात इसी संयुक्त गुण के साथ खुलती है।

बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥

चौपाई २

राम भरत को तात कहकर सम्बोधित करते हैं। वे उन्हें धर्म की धुरी धारण करनेवाला, लोक और वेद का जानकार तथा प्रेम में प्रवीण कहते हैं। इस सम्बोधन में भरत की समझ स्वीकार की गयी है। जिन्हें आगे कर्तव्य सौंपा जाएगा, उनकी योग्यता पहले सामने आती है। राम की दृष्टि में भरत संसार के व्यवहार और वेद की रीति से परिचित हैं। प्रेम भी उनके लिये कोई अपरिचित विषय नहीं है।

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात॥ ३०४॥

दोहा ३०४

कर्म, वचन और मन से निर्मल भरत के समान भरत ही हैं, राम कहते हैं। तीनों की निर्मलता साथ आती है, जिससे केवल मधुर बोलने या भीतर अच्छा चाहने तक प्रशंसा सीमित नहीं रहती। फिर राम स्वयं उस प्रशंसा की मर्यादा बताते हैं। गुरुजनों का समाज है, समय ऐसा कठिन है और प्रशंसा छोटे भाई की करनी है। इन सबके बीच उनके गुण कैसे कहे जाएँ? यह संकोच गुणों के प्रति संशय नहीं है। बड़े भाई का सम्मान और सभा की मर्यादा उनके शब्दों को संयत रखती है।

इस आरम्भ को याद रखिये। आगे भरत से कठिन सेवा माँगी जाएगी। राम उस कठिनाई तक पहुँचने से पहले उनकी निर्मलता, ज्ञान और प्रेम का पूरा मान करते हैं। भरत को समझाने की नींव उनके प्रति भरोसे में रखी गयी है। इसीलिए अगली बात में जो कुल की रीति और धर्म का स्मरण आएगा, वह पहले से पहचानी हुई समझ को सम्बोधित करेगा।

राम स्थान, समय, अवसर और समाज देखकर हितकारी वचन कहते हैं। वे भरत को धर्मज्ञ, लोक और वेद का जानकार, प्रेम में प्रवीण तथा मन, वचन और कर्म से निर्मल मानकर अपना उत्तर आरम्भ करते हैं।

पिता के बाद सबको किसने सँभाला

राम भरत को सूर्यकुल की रीति का स्मरण कराते हैं। सत्यप्रतिज्ञ पिता की कीर्ति और प्रीति, समय और समाज, गुरुजनों की मर्यादा, यह सब भरत जानते हैं। फिर बात अपने लोगों से बाहर तक जाती है। उदासीन, मित्र और शत्रु, सबके मन का ज्ञान भी उन्हें है। राम जिस निर्णय की बात कर रहे हैं, उसमें केवल भाइयों की निजी इच्छा का विचार नहीं रखा जा सकता। कुल की प्रतिष्ठा, बड़ों की मर्यादा और भिन्न भिन्न लोगों की दृष्टि भी सामने है।

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू । आपन मोर परम हित धरमू।
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा । तदपि कहउँ अवसर अनुसारा॥

चौपाई ३

सबके कर्तव्य, अपना धर्म और राम का धर्म, जो परम हितकारी हैं, भरत को विदित हैं। राम कहते हैं कि उन्हें भरत पर हर प्रकार से भरोसा है। फिर भी अवसर के अनुसार कुछ कहना आवश्यक है। इस वाक्य में विश्वास और परामर्श साथ हैं। भरोसा होने से संवाद समाप्त नहीं हो जाता। कठिन समय में जो जानते हुए भी फिर सुनना आवश्यक हो, राम अब वही कहते हैं।

पिताजी की अनुपस्थिति में उनकी बात केवल गुरुवंश की कृपा ने सँभाल रखी है। वह कृपा न होती तो भाइयों सहित प्रजा, कुटुम्ब और परिवार सभी विपन्न हो जाते। राम अपने को उस संकट से बाहर नहीं रखते। जिन लोगों की रक्षा की बात है, उनमें स्वयं वे भी सम्मिलित हैं। इसीलिए गुरु के आश्रय का उनका स्मरण सभा को दिया हुआ दूर का आश्वासन भर नहीं है। यह उस सहारे की पहचान है जिससे सब बचे हुए हैं।

पिता की असामयिक मृत्यु को समझाने के लिये राम सूर्य की उपमा देते हैं। यदि संध्या का समय आये बिना सूर्य अस्त हो जाए, तो जगत में कौन क्लेश से बच सकेगा? पोद्दार जी स्पष्ट करते हैं कि विधाता का ऐसा ही उत्पात पिता के असमय चले जाने में हुआ है। इस चित्र में एक परिवार का शोक पूरे जगत की असमय अँधेरे में पड़ जाने की व्यथा के समान हो उठता है। सूर्यकुल की बात के बाद सूर्य का यह असमय अस्त होना और गहरा लगता है।

पर राम इसी व्यथा में सहारा भी पहचानते हैं। मुनि वसिष्ठ और मिथिलापति जनक ने सबको बचा लिया। यहाँ दोनों का नाम साथ है। गुरु की कृपा और जनक का संरक्षण, दोनों को स्वीकार करके राम आगे के काम के प्रति विश्वास देते हैं। पिता की अनुपस्थिति बताने के साथ उन बड़ों की उपस्थिति भी बतायी जाती है जिन्होंने समाज को सँभाला है।

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।
गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम॥ ३०५॥

दोहा ३०५

राज और उसका काज, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, धरती, धन और धाम, इन सब पर गुरु का प्रभाव रक्षक रहेगा। पोद्दार जी राज्य के सारे कार्य और उसके साथ जुड़ी मर्यादा, प्रतिष्ठा तथा शेष दायित्वों का पालन इसी सामर्थ्य से होना बताते हैं। राम का विश्वास है कि परिणाम शुभ होगा। सूची में सार्वजनिक काम और घर, सम्मान और धन, धर्म और भूमि साथ आते हैं। इसलिए गुरु का आश्रय किसी एक उलझन तक सीमित करके नहीं कहा गया। जो कुछ सँभालने का भार सामने है, वह सब इस भरोसे में समाया है।

राम पिता की असामयिक मृत्यु को समय से पहले सूर्यास्त जैसा संकट कहते हैं। वसिष्ठ और जनक ने सबको बचाया है। राज्य, कामकाज, मर्यादा, प्रतिष्ठा, धर्म, धरती, धन और घर की रक्षा के लिये वे गुरु के प्रभाव पर भरोसा देते हैं।

चौदह वर्षों का सबसे कठिन भार

गुरु का अनुग्रह घर और वन, दोनों जगह समाज सहित भरत और राम का रखवाला है। स्थान अलग हैं, पर आश्रय एक है। इस आश्वासन के बाद राम उस धर्म का आधार बताते हैं जिसे दोनों को निभाना है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा का पालन, ये चार सम्बंध उनके वचन में आते हैं। समस्त धर्मों को वे पृथ्वी के रूप में देखते हैं और आज्ञापालन को उसे धारण करनेवाले शेष के समान कहते हैं।

सहित समाज तुम्हार हमारा । घर बन गुर प्रसाद रखवारा॥
मातु पिता गुर स्वामि निदेसू । सकल धरम धरनीधर सेसू॥

चौपाई ४

शेष की उपमा धारण करने की है। अनेक धर्मों को जिस आधार पर टिकना है, राम की इस शिक्षा में वह इन आज्ञाओं का पालन है। फिर वे भरत से कहते हैं कि आप स्वयं वही करें और हमसे भी कराएँ। केवल दूसरे पर भार रखकर बात पूरी नहीं होती। राम अपने आचरण को भी उसी पालन में सम्मिलित करते हैं और भरत से सूर्यकुल का रक्षक होने को कहते हैं। दो भाइयों के लिये निर्देश एक दूसरे को धर्म में बनाए रखने का है।

साधक के लिये यही एक साधना सभी सिद्धियों की देनेवाली बतायी जाती है। राम इसे त्रिवेणी कहते हैं, जिसमें कीर्ति, सद्गति और ऐश्वर्य की धाराएँ मिलती हैं। तीनों फल अलग अलग नाम लेकर आते हैं। संसार में यश, आगे का कल्याण और समृद्धि, आज्ञापालन के इस कथित फल में तीनों का मेल है। शेष की उपमा से उसका आधार रूप स्पष्ट हुआ था, त्रिवेणी की उपमा से उसके फल का विस्तार आता है। यह सब राम के उपदेश का हिस्सा है।

सो बिचारि सहि संकटु भारी । करहु प्रजा परिवारु सुखारी॥
बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई । तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई॥

चौपाई ५

इसे विचारकर भरत को भारी संकट सहना है और प्रजा तथा परिवार को सुखी करना है। अपना दुःख समाप्त होने की प्रतीक्षा किये बिना दूसरों के लिये काम करना इस निर्देश की कठिनाई है। राम स्वयं उसे हलका नहीं बताते। वे कहते हैं कि उनकी विपत्ति सबने बाँट ली है, पर भरत को अवधि भर बड़ी कठिनाई रहेगी। पोद्दार जी यहाँ अवधि को चौदह वर्ष खोलते हैं और भरत के लिये सबसे अधिक दुःख बताते हैं।

यह बड़े भाई के उत्तर का अत्यन्त कोमल स्थान है। राम वन में हैं, फिर भी वे भरत की सेवा को सुख और सुविधा का हिस्सा नहीं मानते। प्रजा और परिवार के सुख का काम अलग है, उस काम में लगे हुए भरत के भीतर का दुःख अलग। राम दोनों को साथ जानते हैं। दूसरों को सुखी करने की आज्ञा देते हुए वे उस व्यक्ति की कठिनाई को पूरा मानते हैं जिसे यह आज्ञा दी जा रही है।

राम भरत को कोमल जानते हुए कठोर बात कह रहे हैं। टीका इस कठोरता को वियोग की बात कहती है। राम का कहना है कि ऐसे बुरे समय में यह उनके लिये अनुचित नहीं। विपत्ति के अवसर पर श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं। इस सहारे को वे शरीर के एक सहज कार्य से समझाते हैं: वज्र का आघात भी हाथ से रोका जाता है। संकट जब सामने हो, तब अपने ही अंग को उस आघात के सामने करना पड़ता है। भरत से माँगा गया सहयोग उसी निकटता का है।

इस उपमा में हाथ को अलग सत्ता बनाकर नहीं देखा गया। वह उसी शरीर की रक्षा के लिये आघात सहता है जिसका अंग है। इसी के साथ राम की बात प्रजा, परिवार और भाइयों की साझी विपत्ति से जुड़ती है। भरत का भार भारी है, यह स्वीकार करके भी उसे निभाने की आवश्यकता कही गयी है। प्रेम उस आवश्यकता को बोलने से रोकता नहीं; वह कठिन शब्दों में भाई के दुःख की पहचान बनाए रखता है।

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ॥ ३०६॥

दोहा ३०६

सेवक हाथ, पैर और नेत्र के समान हो और स्वामी मुख के समान, दोहे में सेवा का यह रूप आता है। सभी अंग एक देह की व्यवस्था में हैं और उनके काम भिन्न हैं। इसी उपमा पर तुलसीदास अपनी बात जोड़ते हैं कि सेवक और स्वामी की ऐसी प्रीति की रीति सुनकर सुन्दर कवि उसकी प्रशंसा करते हैं। भरत के लिये कही गयी आज्ञा का अन्त इस सम्बन्ध में होता है, जहाँ अपना कर्तव्य निभाना पूरे सम्बन्ध को बनाए रखता है।

राम माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा को धर्म का आधार बताते हैं तथा भरत से स्वयं पालन करने और उनसे भी कराने को कहते हैं। वे मानते हैं कि चौदह वर्षों तक सबसे कठिन भार भरत का है, फिर भी प्रजा और परिवार के सुख के लिये उसे निभाना होगा।

सन्तोष मिला, अब सेवा का सहारा चाहिये

रघुनाथ की वाणी सुनकर सारी सभा प्रेम में डूब जाती है। तुलसीदास उसे प्रेम के समुद्र के अमृत में सनी हुई बताते हैं। पोद्दार जी इस चित्र में उस समुद्र के मन्थन से निकले अमृत का अर्थ स्पष्ट करते हैं। समाज शिथिल हो गया है, जैसे सबको प्रेम की समाधि लग गयी हो। इस दशा को देखकर सरस्वती भी चुप साध लेती हैं। जो वाणी अभी अमृत के समान होकर सुनायी दी, उसका प्रभाव अब शब्दों से आगे पहुँच गया है।

भरतहि भयउ परम संतोषू । सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू । भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥

चौपाई ६

भरत को परम सन्तोष होता है। स्वामी अनुकूल हैं, इसलिए दुःख और दोष उनसे विमुख हो गये। उनका मुख प्रसन्न है और मन का विषाद मिट गया है। कवि इसे ऐसे कहते हैं जैसे किसी गूँगे पर वाणी की कृपा हो गयी हो। अभी सरस्वती समाज की प्रेममग्न दशा देखकर मौन हुई थीं। अब भरत की दशा में बोल सकने की कृपा का चित्र आता है। सन्तोष से उनके भीतर का बोझ उतरता है और उत्तर सम्भव होता है।

भरत फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हैं और अपने करकमल जोड़कर बोलते हैं। वे कहते हैं कि नाथ के साथ जाने का सुख उन्हें प्राप्त हो गया है और संसार में जन्म लेने का लाभ मिल गया। इस वाक्य में उनका सन्तोष है। वे उसी सभा में राम के उत्तर को ग्रहण कर रहे हैं; उनका यह कथन अब साथ चल पड़ने की कोई घटना नहीं है। राम की अनुकूलता में साथ का सुख मिल गया है, जबकि अवधि का भार आगे निभाना है।

अब कृपाल जस आयसु होई । करौं सीस धरि सादर सोई॥
सो अवलंब देव मोहि देई । अवधि पारु पावौं जेहि सेई॥

चौपाई ७

भरत आज्ञा को आदरपूर्वक सिर पर रखने का वचन देते हैं। जैसी आज्ञा होगी, वे वैसा ही करेंगे। इसके साथ एक प्रार्थना रखते हैं: उन्हें ऐसा अवलम्बन दिया जाए जिसकी सेवा करके वे अवधि पार कर सकें। पोद्दार जी अवलम्बन का अर्थ कोई सहारा बताते हैं। भरत उस सहारे को अभी नाम नहीं देते। वे यह बताते हैं कि उससे उनका सम्बन्ध कैसा होगा, सेवा का, और उसकी आवश्यकता किसलिये है, अवधि बिताने के लिये।

इस प्रकार सन्तोष और आगे के वियोग की कठिनाई साथ रहते हैं। मन का विषाद मिट गया है, पर चौदह वर्षों का समय सुनकर दिया गया सहारा आवश्यक लगता है। भरत का अनुरोध राम की आज्ञा स्वीकार करने के बाद आता है। पहले पालन की प्रतिज्ञा, फिर उसे निभाते रहने की प्रार्थना। उनके लिये सेवा अब सभा से आगे, पूरी अवधि तक फैलनेवाला सम्बन्ध है।

राम की वाणी से भरत का विषाद मिटता है। वे प्रणाम करके आज्ञा स्वीकार करते हैं और ऐसा अनाम सहारा माँगते हैं जिसकी सेवा करके अवधि बिता सकें।

अभिषेक के लिये लाये हुए जल का प्रश्न

भरत के पास तीर्थों का जल है। वह जल किस भाव से और किस आदेश पर लाया गया, वे दोनों बातें कह देते हैं। गुरुजी की आज्ञा पाकर वे सब तीर्थों का जल राम के अभिषेक के लिये लेकर आये थे। अब उसी के विषय में आदेश पूछते हैं। राम के सामने यह उन वस्तुओं में से एक है जिसका प्रयोजन पहले निर्धारित था और जिसके आगे के उपयोग का निर्णय अभी होना है। भरत अपने पास से उसका कोई नया प्रयोजन घोषित नहीं करते।

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।
आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ॥ ३०७॥

दोहा ३०७

इस प्रश्न में गुरु की आज्ञा का स्मरण उस शिक्षा के ठीक बाद आता है जिसमें राम ने आज्ञापालन को धर्म का आधार कहा था। भरत जल लाने का अपना कारण स्पष्ट करके उसके लिये भी राम की इच्छा पूछते हैं। अभिषेक की बात यहाँ जल के आने का कारण है। अभी कोई अभिषेक नहीं होता। भरत का प्रश्न है कि इस जल के लिये अब क्या आज्ञा है।

फिर वे अपने मन के एक और बड़े मनोरथ की बात करते हैं। भय और संकोच के कारण वह कहने में नहीं आ रहा। राम उन्हें तात कहकर बोलने की अनुमति देते हैं। प्रभु की आज्ञा पाकर भरत स्नेह से भरी सुन्दर वाणी में अपनी इच्छा बताते हैं। सेवा का संकल्प कर लेने पर भी मन में एक चाह बची है, जिसे वे अनुमति के भीतर रखना चाहते हैं। इस छोटी सी बातचीत में पहले संकोच और फिर राम का उसे दूर करके कहने देना, दोनों आते हैं।

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन॥
प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी॥

चौपाई ८

भरत चित्रकूट के पवित्र स्थान, तीर्थ और वन देखना चाहते हैं। पक्षी और पशु, तालाब और नदियाँ, झरने और पर्वतों के समूह, उनकी इच्छा में सब सम्मिलित हैं। उस सूची में मनुष्य के बसाये स्थान भर नहीं आते। जल, धरती और वन के जीव भी दर्शन के इस मनोरथ में हैं। फिर वे विशेष इच्छा बताते हैं: वह भूमि जो राम के चरणचिह्नों से अंकित है। चित्रकूट का समूचा सौन्दर्य प्रिय है और चरणों के चिह्नोंवाली धरती विशेष प्रिय है।

भरत कहते हैं कि आज्ञा हो तो यह सब देखकर आएँ। इस इच्छा का सम्बन्ध अभी भविष्य के भ्रमण से है। वे किसी देखी हुई यात्रा का वर्णन नहीं कर रहे। जिन स्थानों और जीवों के नाम आये हैं, वे उनके मनोरथ का विस्तार हैं। राम के उत्तर से ही अगला मार्ग खुलेगा, और वह उत्तर वन के भीतर चलने के लिये एक मुनि का मार्गदर्शन सामने रखेगा।

भरत अभिषेक के लिये गुरु की आज्ञा से लाये तीर्थजल का उपयोग पूछते हैं। फिर राम की अनुमति पाकर चित्रकूट के स्थानों, जलों, वन और जीवों, विशेषकर चरणचिह्नोंवाली भूमि के दर्शन की इच्छा कहते हैं।

अत्रि की आज्ञा से चित्रकूट का दर्शन

राम भरत को अत्रि ऋषि की आज्ञा सिर पर धारण करने को कहते हैं। पोद्दार जी इसका अर्थ स्पष्ट करते हैं: उनसे पूछकर वे जैसा कहें, वैसा किया जाए। फिर राम निर्भय होकर वन में विचरने की अनुमति देते हैं। भरत की इच्छा स्वीकार हुई है और उसके साथ मार्गदर्शक भी बताया गया है। वन में कहाँ और कैसे जाना है, यह अत्रि के निर्देश से जुड़ता है।

राम भाई को बताते हैं कि मुनि के प्रसाद से यह वन मंगल देनेवाला, अत्यन्त पवित्र और बहुत सुन्दर है। इन गुणों का आधार वे अत्रि के अनुग्रह में कहते हैं। अभी भरत ने वन, तीर्थ, पशु पक्षी और जलस्थलों के दर्शन की इच्छा रखी थी। राम उसी वन को निर्भय भ्रमण का स्थान बताकर उनके भय और संकोच के बाद अनुमति का स्पष्ट आश्वासन देते हैं।

रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं । राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥
सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥

चौपाई ९

तीर्थजल का उत्तर भी इसी निर्देश के साथ मिलता है। ऋषियों के प्रमुख अत्रि जहाँ आज्ञा दें, वहीं जल स्थापित करना है। चित्रकूट दर्शन और जल की स्थापना, दोनों प्रश्न अत्रि के मार्गदर्शन में सौंप दिये गये हैं। राम का वचन सुनकर भरत सुख पाते हैं। वे आनन्दित होकर अत्रि मुनि के चरणकमलों में सिर नवाते हैं। इस प्रणाम के बाद अभी स्थान का आदेश सुनना शेष है।

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल॥ ३०८॥

दोहा ३०८

राम और भरत का संवाद सभी सुन्दर मंगलों का मूल कहा गया है। उसे सुनकर देवता रघुकुल की सराहना करते हुए कल्पवृक्ष के फूल बरसाते हैं। तुलसीदास उन्हें यहाँ भी स्वार्थी कहते हैं। उनके उत्सव का वर्णन करते समय कवि वह विशेषण छोड़ते नहीं, जिससे आरम्भ की देवमाया और इस प्रशंसा के बीच उनके स्वभाव की पहचान बनी रहती है। संवाद मंगलमय है, फूल बरस रहे हैं और देवताओं का स्वार्थ भी उसी दोहे में याद रखा गया है।

राम दर्शन और जल की स्थापना के लिये अत्रि का निर्देश मानने को कहते हैं। भरत प्रसन्न होकर मुनि को प्रणाम करते हैं। संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुल की प्रशंसा करते हुए कल्पवृक्ष के फूल बरसाते हैं।

दोनों समाजों में हर्ष भी, विषाद भी

भरत धन्य हैं और स्वामी राम की जय हो, यह कहते हुए देवता बहुत हर्षित होते हैं। भरत के वचन सुनकर मुनि वसिष्ठ, मिथिलापति जनक और सभा के सभी लोगों को उत्साह होता है। राम की आज्ञा और भरत की स्वीकृति से जो बात बनी है, उसकी प्रसन्नता व्यापक है। फिर तुलसीदास जनक की प्रतिक्रिया पर ठहरते हैं। वे पुलकित होकर राम और भरत के गुणों तथा उनके प्रेम की प्रशंसा करते हैं।

जनक सेवक और स्वामी, दोनों का सुहावना स्वभाव देखते हैं। इनके नियम और प्रेम पवित्र को भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले कहे जाते हैं। भरत का पालन और राम का प्रेम, एक दूसरे के सामने रखकर देखे गये हैं। मन्त्री और सभासद भी अनुराग से भरकर अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करने लगते हैं। पहले भरत की भक्ति ने बुद्धियों को बाँध लिया था; अब राम और भरत का संवाद सुनकर वही समाज अपनी समझ भर प्रशंसा करता है।

पर दोनों समाजों के हृदयों में केवल हर्ष नहीं है। संवाद सुन सुनकर उनमें हर्ष और विषाद साथ उठते हैं। पोद्दार जी दोनों का कारण अलग खोलते हैं। भरत के सेवाधर्म को देखकर हर्ष है और राम से वियोग की सम्भावना से विषाद। जो धर्म की दृष्टि से सुन्दर है, वह निकट रहने की इच्छा के लिये कठिन भी है। इसी कारण प्रशंसा और दुःख एक ही हृदय में साथ रह सकते हैं।

राम की माता कौसल्या सुख और दुःख को समान जानती हैं। वे राम के गुण कहकर दूसरी रानियों को धैर्य देती हैं। इस समय उनकी सान्त्वना का विषय राम के गुण हैं, और जिन्हें धैर्य बँधाया जा रहा है वे दूसरी रानियाँ हैं। समाज में कोई राम की बड़ाई की चर्चा करता है, कोई भरत के अच्छेपन की सराहना करता है। दोनों भाइयों के लिये आदर है, जबकि आनेवाले वियोग की सम्भावना अभी मनों को छू रही है।

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥ ३०९॥

दोहा ३०९

इसी बीच अत्रि भरत से कहते हैं कि इस पर्वत के समीप एक सुन्दर कुआँ है। पवित्र, अनुपम और अमृत के समान तीर्थजल को उसी में स्थापित कर दिया जाए। राम ने जिसके निर्देश को मानने को कहा था, अब उसी मुनि ने स्थान बता दिया है। जल की महिमा के तीनों विशेषण उसके साथ रहते हैं और स्थापना का स्थान निकट का कुआँ है। यहाँ कथा आदेश सुनाये जाने तक पहुँचती है। जल का उसमें रखा जाना और वन के दर्शनों के लिये निकलना अभी शेष है।

दोनों समाज भरत के सेवाधर्म से हर्षित हैं और रामवियोग की सम्भावना से दुखी भी। कौसल्या दूसरी रानियों को धैर्य देती हैं। अत्रि पर्वत के पास के सुन्दर कुएँ में तीर्थजल स्थापित करने की आज्ञा देते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

राम भरत को समझाते हुए बार बार उन्हीं पर भरोसा रखते हैं जिनसे कठिन काम कह रहे हैं। पहले ज्ञान और निर्मलता का मान, फिर पिता और गुरु का स्मरण, उसके बाद प्रजा और परिवार की सेवा। इस क्रम में भरत की कोमलता कहीं भुलाई नहीं जाती। सबसे कठिन अवधि उन्हीं की है, यह बात स्वयं राम कहते हैं। हम इस उत्तर में दायित्व सौंपने के साथ उसके भीतर के दुःख को पहचानने का ढंग देख सकते हैं।

भरत का सन्तोष भी इसीलिए ध्यान खींचता है। उन्हें ऐसा लगता है जैसे साथ जाने का सुख मिल गया। फिर भी वे अवधि बिताने का अवलम्बन चाहते हैं। सेवा का निश्चय और सेवा में टिके रहने का सहारा, दोनों माँगें अलग स्पष्ट हैं। आगे की लम्बी कठिनाई को स्वीकार करते हुए अपनी आवश्यकता कहना उनके विनय में समाया है।

और समाज की मिली हुई भावनाएँ हमें निर्णय का पूरा भार दिखाती हैं। जिस सेवाधर्म की प्रशंसा सब करते हैं, उसी के साथ वियोग की सम्भावना दुखाती है। कौसल्या इस बीच राम के गुण सुनाकर धैर्य देती हैं। अत्रि तीर्थजल के लिये निकट का स्थान बताते हैं। बड़ी सभा के प्रेम और धर्मविचार के बीच अब करने योग्य एक काम सामने आ गया है, जिसकी शुरुआत मुनि की आज्ञा से होगी।

इस अंश की शुरुआत ऐसे मनों से हुई थी जिन्हें कहीं सन्तोष नहीं था और जो अपना मर्म एक दूसरे से कह भी नहीं रहे थे। अन्त तक भरत को परम सन्तोष मिला है, उनकी दोनों जिज्ञासाओं को मार्ग मिला है और समाज अपने हर्ष तथा विषाद को राम और भरत की प्रशंसा के बीच व्यक्त कर रहा है। राम की वाणी ने कठिनाई मिट जाने का वचन नहीं दिया। उसने उस कठिनाई में आश्रय, धर्म और साझा सहयोग की पहचान दी है।

भरत के लिये अत्रि का निर्देश स्पष्ट है। पर्वत के पास के सुन्दर कुएँ में पवित्र तीर्थजल स्थापित करना है। चित्रकूट के दर्शन की अनुमति भी मिल चुकी है। अब हम उन्हें इसी आज्ञा के साथ छोड़ते हैं, उस क्षण पर जब सुन लिया गया है कि सेवा का अगला काम क्या होगा।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ३०२ से ३०९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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