लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

राम का भरत को समझाना और तीर्थों का जल

इस पृष्ठ पर

रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 34

इन्द्र सबके सिर उचाट डाल देते हैं। लोगों का मन वन और घर के बीच दुविधा में रहता है। राम भरत से कहते हैं कि पिता के बिना गुरुकुल की कृपा ने ही हमारी बात सँभाली है, और अवधि भर भरत को बड़ी कठिनाई है। भरत सेवा के लिये सहारा माँगते हैं और चित्रकूट देखने की अनुमति माँगते हैं। अत्रि पर्वत के पास के सुन्दर कुएँ में तीर्थजल रखने को कहते हैं।

भय और उचाट के वश लोगों का मन स्थिर नहीं। किसी क्षण वन की रुचि होती है, अगले क्षण घर सुहाते हैं। यह दशा देखकर राम हृदय में हँसते हैं। सभा, राजा, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री, सबकी बुद्धि को भरत की भक्ति ने कील दिया है।

अब राम भरत से बोलेंगे। वे पिता की कीर्ति और प्रीति, गुरुकुल की कृपा, और प्रजा और परिवार के सुख की बात करेंगे। वे कहेंगे कि उनकी विपत्ति सबने बाँट ली है, और भरत को अवधि भर बड़ी कठिनाई है। भरत परम सन्तोष पाकर कहेंगे कि उन्हें राम के साथ जाने का सुख मिल गया। वे वह सहारा माँगेंगे जिसकी सेवा करके अवधि पार पा सकें। तीर्थों के जल और चित्रकूट के दर्शन की बात भी होगी, और अत्रि जल के लिये स्थान बतायेंगे।

इन्द्र का कपट और भरत से राम के वचन

  • राम जो लोगों की दुविधा देखकर हृदय में हँसते हैं, और भक्त के हृदय की बात जानकर भरत से बोलते हैं। वे कहते हैं कि पिता के बिना गुरुकुल की कृपा ने ही उनकी बात सँभाली है, और अवधि भर भरत को बड़ी कठिनाई है।
  • भरत जिन्हें परम सन्तोष होता है। वे कहते हैं कि जो आज्ञा हो उसे सिर पर धरकर करें, और ऐसा सहारा माँगते हैं जिसकी सेवा करके अवधि पार पा सकें। वे चित्रकूट देखने की अनुमति भी माँगते हैं।
  • वसिष्ठ जिनके प्रसाद को राम घर और वन में समाज सहित भरत का और अपना रखवाला कहते हैं। राम कहते हैं कि गुरु का प्रभाव सबका पालन करेगा।
  • जनक मिथिलापति, जिनके बारे में राम कहते हैं कि मुनि और उन्होंने सबको बचा लिया। वे पुलकित होकर राम और भरत के गुणों और प्रेम की प्रशंसा करते हैं।
  • अत्रि ऋषियों के नायक, जिनकी आज्ञा राम भरत को सिर पर धरने को कहते हैं। वे भरत को पर्वत के पास का सुन्दर कुआँ बताते हैं।
  • कौसल्या सुख और दुःख को समान जानकर राम के गुण कहकर रानियों को धैर्य देनेवाली माता।
  • इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा, जिन्हें परायी हानि और अपना लाभ प्रिय है। वे बुरा विचार करके कपट बटोरते हैं और सबके सिर उचाट डाल देते हैं।

वन और घर के बीच डोलता मन

इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा हैं। उन्हें परायी हानि और अपना लाभ प्रिय है। उनकी रीति कौए जैसी है। वे छली और मलिन हैं, और उन्हें कहीं विश्वास नहीं। पहले वे बुरा विचार करके कपट बटोरते हैं। वह उचाट वे सबके सिर डाल देते हैं। देवमाया से सब लोग मोहित हो जाते हैं।

राम के प्रेम से लोगों का बहुत बिछोह नहीं होता। पोद्दार की टीका के अनुसार उनका कुछ प्रेम बना रहता है।

भय और उचाट के वश किसी का मन स्थिर नहीं। क्षण में वन की रुचि होती है, क्षण में घर सुहाते हैं। मन की गति दुविधा में है और प्रजा दुखी है, मानो नदी और समुद्र के संगम का जल हो। टीका के अनुसार वह जल कभी इधर आता है, कभी उधर जाता है। दुचित्ते होकर लोग कहीं सन्तोष नहीं पाते।

लोग एक दूसरे से अपना मर्म नहीं कहते। यह देखकर राम हृदय में हँसते हैं और कहते हैं कि कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक एक-सरीखे हैं। टीका यहाँ नवयुवक का अर्थ कामी पुरुष करती है।

पोद्दार इसके साथ व्याकरण का एक संकेत भी देते हैं कि पाणिनीय व्याकरण में श्वन्, युवन् और मघवन् शब्दों के रूप भी एक-सरीखे होते हैं।

भरत, जनक, मुनिजन, मन्त्री और ज्ञानी साधुओं को छोड़कर देवमाया सब पर लगी, मानो जिसे जैसा योग्य पाया, उस पर वैसी लगी।

भरत का यश और सुबुद्धि की चकोरी

राम देखते हैं कि लोग उनके अपने स्नेह से और इन्द्र के भारी छल से दुखी हैं। सभा, राजा, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री, सबकी बुद्धि को भरत की भक्ति ने कील दिया है।

लोग चित्र में लिखे से राम की ओर देखते हैं, और बोलते हैं तो सकुचाकर, मानो सिखाये हुए वचन बोल रहे हों। भरत की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख देती है, और उसका वर्णन कठिन है। जिनकी भक्ति का लवलेश देखकर मुनि और मिथिला के राजा जनक प्रेम में मग्न हो गये, तुलसी पूछते हैं कि उन भरत की महिमा वे कैसे कहें।

भरत की भक्ति और सुन्दर भाव से हृदय में सुबुद्धि हुलसती है। टीका इस हृदय को कवि का बताती है। अपने को छोटी और भरत की महिमा को बड़ी जानकर, और कवियों की परम्परा की मर्यादा मानकर, वह बुद्धि सकुचा जाती है। वह गुणों को कह नहीं सकती। गुणों में उसकी रुचि बहुत है। बुद्धि की गति बालक के वचनों जैसी है।

भरत का निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है, और सुबुद्धि चकोरी। भक्तों के हृदय के निर्मल आकाश में उदित उस चन्द्रमा को वह एकटक निहारती रह जाती है।

पोद्दार की टीका यहाँ पूछती है कि तब उसका वर्णन कौन करे।

भरत के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिये भी सुगम नहीं। कविगण छोटी बुद्धि की चपलता क्षमा करें। टीका इस बुद्धि को कवि की अपनी बताती है। भरत के सद्भाव को कहते सुनते कौन सीता और राम के चरणों में अनुरक्त न होगा? भरत का स्मरण करके जिसे राम का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम कौन होगा?

भरत के हृदय को जानकर राम बोलते हैं

दयालु और सुजान राम सबकी दशा देखते हैं और अपने भक्त के हृदय की बात जानते हैं। धर्मधुरीण, धीर, नीति में चतुर, सत्य, स्नेह, शील और सुख के सागर, नीति और प्रीति के पालक राम देश, काल, अवसर और समाज को देखकर बोलते हैं।

उनके वचन मानो वाणी का सर्वस्व हैं। वे परिणाम में हितकारी हैं, और सुनने में चन्द्रमा के रस जैसे।

राम भरत को तात कहकर कहते हैं कि वे धर्म की धुरी धारण करनेवाले हैं, लोक और वेद के जाननेवाले हैं और प्रेम में प्रवीण हैं।

राम कहते हैं कि कर्म, वचन और मन से निर्मल भरत के समान भरत ही हैं। गुरु के समाज में और कुसमय में छोटे भाई के गुण कैसे कहे जायँ?

पिता के बिना गुरुकुल की कृपा

राम भरत से कहते हैं कि वे सूर्यकुल की रीति जानते हैं। वे सत्यप्रतिज्ञ पिता की कीर्ति और प्रीति जानते हैं, समय, समाज और गुरुजनों की लाज जानते हैं, और उदासीन, मित्र और शत्रु के मन की बात जानते हैं।

सबके कर्म, और भरत का और राम का परम हितकारी धर्म, भरत को विदित हैं। राम कहते हैं कि उन्हें भरत पर सब प्रकार से भरोसा है, तब भी वे अवसर के अनुसार कहते हैं।

“पिता के बिना हमारी बात केवल गुरुवंश की कृपा ने सँभाल रखी है,” राम कहते हैं। “नहीं तो हम सहित प्रजा, कुटुम्ब और परिवार सब बर्बाद हो जाते।”

राम पूछते हैं कि यदि बिना समय सूर्य अस्त हो जाय, तो कहिये, जगत् में किसे क्लेश न होगा? वे कहते हैं कि विधाता ने वैसा ही उत्पात किया है। पोद्दार इस उत्पात को पिता की असामयिक मृत्यु बताते हैं।

राम कहते हैं कि मुनि वसिष्ठ और मिथिला के राजा जनक ने सबको बचा लिया।

राम कहते हैं कि राज्य का सब काम, लाज, प्रतिष्ठा, धर्म, धरती, धन और घर, इन सबका पालन गुरु का प्रभाव करेगा, और परिणाम भला होगा।

अवधि भर भरत की बड़ी कठिनाई

राम कहते हैं कि घर में और वन में, समाज सहित भरत का और राम का रखवाला गुरु का प्रसाद है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा सारे धर्मरूपी पृथ्वी को धारण करनेवाले शेष के समान है। टीका इसे उस आज्ञा का पालन बताती है।

फिर वे भरत से कहते हैं कि वे वही करें और राम से भी करायें, और सूर्यकुल के पालक बनें।

साधक के लिये यह एक ही सब सिद्धियाँ देनेवाली है, कीर्ति, सद्गति और ऐश्वर्य से बनी त्रिवेणी। टीका इसे आज्ञापालन की साधना बताती है।

राम कहते हैं कि इसे विचारकर, भारी संकट सहकर, भरत प्रजा और परिवार को सुखी करें। उनकी विपत्ति सबने बाँट ली है, और भरत को अवधि भर बड़ी कठिनाई है। पोद्दार यहाँ अवधि को चौदह वर्ष खोलते हैं और भरत का दुःख सबसे अधिक बताते हैं।

राम कहते हैं कि भरत को कोमल जानकर वे कठोर बात कह रहे हैं। टीका इस कठोरता को वियोग की बात कहती है। कुसमय में यह उनके लिये अनुचित नहीं। बुरे ठौर में अच्छे भाई सहायक होते हैं। वज्र के आघात भी हाथ से रोके जाते हैं।

राम कहते हैं कि सेवक हाथ, पैर और नेत्र के समान हो, और स्वामी मुख के समान। प्रीति की यह रीति सुनकर अच्छे कवि उसकी सराहना करते हैं। पोद्दार की टीका यह बात तुलसी की बताती है।

सन्तोष मिला, अब सेवा का सहारा चाहिये

राम की वाणी, जो मानो प्रेम के समुद्र के अमृत में सनी है, सुनकर सारी सभा शिथिल हो जाती है। समाज को प्रेम की समाधि लग जाती है। पोद्दार इसे उस समुद्र के मन्थन से निकला अमृत कहते हैं। यह दशा देखकर सरस्वती चुप साध लेती हैं।

भरत को परम सन्तोष होता है। स्वामी सम्मुख हैं, और दुःख और दोष विमुख हो गये। उनका मुख प्रसन्न है और मन का विषाद मिट गया है, मानो गूँगे पर वाणी का प्रसाद हुआ हो। पोद्दार इसे सरस्वती की कृपा बताते हैं।

भरत फिर प्रेम से प्रणाम करते हैं। वे हाथ जोड़कर कहते हैं कि उन्हें राम के साथ जाने का सुख मिल गया, और जगत् में जन्म लेने का लाभ उन्होंने पा लिया।

भरत कहते हैं कि अब जैसी आज्ञा हो, उसे वे आदर से सिर पर धरकर करें। वे विनती करते हैं कि देव उन्हें वह अवलम्बन दें जिसकी सेवा करके वे अवधि पार पा सकें। पोद्दार अवलम्बन का अर्थ कोई सहारा बताते हैं।

अभिषेक के लिये लाये हुए जल का प्रश्न

भरत कहते हैं कि गुरु की आज्ञा पाकर वे सब तीर्थों का जल राम के अभिषेक के लिये लाये हैं। वे पूछते हैं कि उसके लिये क्या आज्ञा है।

फिर भरत अपने मन के एक बड़े मनोरथ की बात करते हैं, जो भय और संकोच के कारण कहा नहीं जा रहा। राम उन्हें तात कहकर कहने को कहते हैं, और राम की आज्ञा पाकर भरत स्नेह भरी सुन्दर वाणी में अपनी इच्छा बताते हैं।

भरत चित्रकूट के पवित्र स्थान, तीर्थ और वन देखना चाहते हैं: पक्षी और पशु, तालाब और नदियाँ, झरने और पर्वतों के समूह। और विशेष रूप से वह भूमि जो प्रभु के चरणों से अंकित है।

भरत कहते हैं कि आज्ञा हो तो यह सब देख आयें।

अत्रि की आज्ञा और मंगल देनेवाला वन

राम भरत से कहते हैं कि अत्रि ऋषि की आज्ञा अवश्य सिर पर धारण करें। पोद्दार इसका अर्थ खोलते हैं कि उनसे पूछकर वे जैसा कहें, वैसा करें। फिर राम उन्हें निर्भय होकर वन में विचरने की अनुमति देते हैं।

राम भाई से कहते हैं कि अत्रि मुनि के प्रसाद से वन मंगल देनेवाला, परम पवित्र और सुहावना है।

राम कहते हैं कि ऋषियों के नायक जहाँ आज्ञा दें, उसी स्थान पर तीर्थों का जल रखें। प्रभु के वचन सुनकर भरत सुख पाते हैं और आनन्दित होकर अत्रि मुनि के चरणों में सिर नवाते हैं।

भरत और राम का संवाद सब सुन्दर मंगलों का मूल है। उसे सुनकर स्वार्थी देवता कुल की सराहना करके कल्पवृक्ष के फूल बरसाते हैं।

दोनों समाजों में हर्ष भी, विषाद भी

देवता “भरत धन्य हैं, स्वामी राम की जय हो” कहते हुए बरबस हर्षित होते हैं। भरत के वचन सुनकर मुनि, मिथिला के राजा जनक और सभा में सबको उत्साह होता है। टीका इन मुनि को वसिष्ठ बताती है। जनक पुलकित होकर भरत और राम के गुणसमूह और प्रेम की प्रशंसा करते हैं।

सेवक और स्वामी का स्वभाव सुहावना है, और उनके नियम और प्रेम पवित्र से अधिक पवित्र हैं। मन्त्री और सभासद सब अनुराग से भरकर अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करने लगते हैं।

राम और भरत का संवाद सुन सुनकर दोनों समाजों के हृदय में हर्ष और विषाद होते हैं। पोद्दार दोनों का कारण अलग खोलते हैं: भरत के सेवाधर्म को देखकर हर्ष, और राम से वियोग की सम्भावना से विषाद।

राम की माता कौसल्या सुख और दुःख को समान जानकर राम के गुण कहकर रानियों को धैर्य बँधाती हैं। समाज में कोई राम की बड़ाई की चर्चा करता है, कोई भरत के अच्छेपन की सराहना।

तब अत्रि भरत से कहते हैं कि पर्वत के पास एक सुन्दर कुआँ है। तीर्थों का पावन, अमृत जैसा और अनुपम जल वहाँ रख दीजिये।

अवधि का सहारा, पर्वत के पास का कुआँ

इन्द्र बुरा विचार करके कपट बटोरते हैं और सबके सिर उचाट डाल देते हैं। लोगों का मन वन और घर के बीच दुविधा में रहता है, और यह देखकर राम हृदय में हँसते हैं। भरत की भक्ति सभा में सबकी बुद्धि कील देती है। राम भरत से कहते हैं कि पिता के बिना गुरुकुल की कृपा ने ही सब सँभाला है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा को वे धर्मरूपी पृथ्वी को धारण करनेवाले शेष के समान कहते हैं। वे भरत से भारी संकट सहकर प्रजा और परिवार को सुखी करने को कहते हैं। वे कहते हैं कि अवधि भर भरत को बड़ी कठिनाई है।

भरत को परम सन्तोष होता है। वे राम के साथ जाने का सुख पाने की बात कहते हैं, और सेवा के लिये सहारा माँगते हैं। वे अभिषेक के लिये लाये तीर्थजल के लिये आज्ञा पूछते हैं, और चित्रकूट देखने की अनुमति माँगते हैं। राम उन्हें अत्रि की आज्ञा सिर पर धरने को कहते हैं। देवता फूल बरसाते हैं, जनक दोनों भाइयों की प्रशंसा करते हैं, और दोनों समाजों में हर्ष और विषाद होता है। कौसल्या रानियों को धैर्य बँधाती हैं, और अत्रि पर्वत के पास के सुन्दर कुएँ में जल रखने को कहते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 302 से 309, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।