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राजा दशरथ का निश्चय और अवध की तैयारी

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · राजा दशरथ का निश्चय और अवध की तैयारी

राजा दशरथ का निश्चय और अवध की तैयारी

कानों के पास सफेद बाल देखकर राजा के मन में एक अभिलाषा उठती है। अवध राम का राजतिलक सजाती है, और राम का मन अपने भाइयों में लगा है।

राम के विवाह करके घर आने के बाद अवध में हर दिन नया मंगल है। माताओं के मनोरथ पूरे हुए हैं, नगरवासियों को राम का मुख देखकर सुख मिलता है और राजा दशरथ उनके रूप तथा गुणों का आनन्द लेते हैं। इसी भरे हुए सुख के भीतर एक अभिलाषा उठ रही है। सब चाहते हैं कि महाराज अपने जीते जी राम को युवराज बना दें। महादेव से यह प्रार्थना नगर के लोग करते हैं; कुछ आगे चलकर यही इच्छा राजा अपने गुरु के सामने रखेंगे।

तुलसीदास के अयोध्याकाण्ड का द्वार तीन संस्कृत प्रार्थनाओं और गुरु वन्दना से खुलता है। उसके बाद हम राजसभा से गुरु के पास, वहाँ से तैयार होते नगर और फिर राम के घर पहुँचते हैं। बाहर राज्याभिषेक के सामान जुट रहे हैं। भीतर राम और सीता शुभ शकुनों का अर्थ अपने प्रिय भरत से मिलने की आशा में लगा रहे हैं। एक ही उत्सव में पिता की लालसा, नगर का उत्साह, गुरु की मर्यादा और भाइयों का प्रेम अपनी अपनी जगह खुलता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • दशरथ अवध के राजा, जिनकी इच्छा है कि अपने रहते राम को युवराज बना दें और इस उत्सव को देख लें।
  • राम युवराज पद के लिये सर्वप्रिय और योग्य, जिन्हें भाइयों से अलग अकेले अपना अभिषेक होने का खेद है।
  • वसिष्ठ राजगुरु, जो राजा को सहमति देते, अभिषेक की सामग्री बताते और राम को संयम की शिक्षा देने आते हैं।
  • सीता राम के साथ शुभ शकुनों में भरत से भेंट की आशा करती हैं और गुरु का पूजन करती हैं।
  • भरत और लक्ष्मण भरत राम के प्रेमपूर्ण स्मरण में हैं। अन्त में लक्ष्मण स्वयं प्रेम और आनन्द से भरे हुए आते हैं।
  • कौसल्या और सुमित्रा मंगल की तैयारी में लगी माताएँ। सुमित्रा चौक पूरती हैं और कौसल्या दान तथा राम के कल्याण की प्रार्थना करती हैं।
  • सुमन्त्र मन्त्री, जिन्हें सेवकों के साथ बुलाकर दशरथ अपना मंगलमय प्रस्ताव सुनाते हैं।

द्वितीय सोपान की प्रार्थनाएँ

पहली प्रार्थना में शिव का पूरा रूप सामने आता है। उनकी गोद में हिमाचल की पुत्री पार्वती विराजमान हैं, मस्तक पर गंगा हैं और ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा है। कण्ठ में हलाहल विष है, वक्षःस्थल पर सर्पराज शेष सुशोभित हैं। भस्म उनका विभूषण है और वर्ण चन्द्रमा के समान शुभ्र। इन अलग अलग चिह्नों को देखते हुए कवि उन्हीं शंकर से अपनी रक्षा माँगते हैं। गोद, मस्तक, ललाट, कण्ठ और वक्ष, प्रार्थना एक एक स्थान पर दृष्टि ठहराती चलती है।

यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्। सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्॥ १॥

मंगलाचरण, श्लोक १

वे देवताओं में श्रेष्ठ हैं, सबके अधिपति हैं, सर्वव्यापक हैं और स्वयं कल्याणरूप हैं। शर्व के अर्थ में संहारकर्ता का भाव आता है; पोद्दार जी की टीका इसी स्थान पर भक्तों के पापों का नाश करनेवाला अर्थ भी देती है। कवि की विनती में सदा रक्षा करने की माँग है। जिनका रूप इतने विस्तार से देखा गया, उनसे सम्बन्ध इस छोटी प्रार्थना में आकर जुड़ता है कि वे मेरी रक्षा करें। अयोध्या की कथा आरम्भ होने से पहले यह आश्रय लिया गया है।

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा॥ २॥

मंगलाचरण, श्लोक २

दूसरी प्रार्थना रघुकुल को आनन्द देनेवाले राम के मुखकमल की शोभा से है। कवि उस छबि का स्मरण करते हैं जो राज्याभिषेक का समाचार सुनकर अधिक प्रसन्न नहीं हुई और वनवास के दुःख से मलिन भी नहीं पड़ी। वही सुन्दर छबि उनके लिये सदा मंगल देनेवाली हो। यहाँ वनवास कवि के मंगलाचरण में स्मरण हुआ है। कथा का वर्तमान अभी विवाह के बाद की सुखी अवध है, जहाँ युवराज पद का प्रस्ताव उठने जा रहा है। इस प्रार्थना में राम के मुख की स्थिर शोभा को देखकर ही कवि मंगल माँग रहे हैं।

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्। पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥ ३॥

मंगलाचरण, श्लोक ३

तीसरे श्लोक में प्रणाम का रूप और निकट दिखाई देता है। राम के अंग नीले कमल के समान श्याम और कोमल हैं। सीता उनके बायें भाग में विराजमान हैं। हाथ में अमोघ बाण और सुन्दर धनुष है। कोमलता, सीता का साथ और अचूक आयुध, तीनों इसी एक छबि में आते हैं। तुलसी उन रघुवंश के स्वामी राम को नमस्कार करते हैं। पहले शिव से रक्षा माँगी गयी, फिर राम की मुखछबि से मंगल, और अब सीता सहित धनुर्धर राम को प्रणाम है।

इसके बाद कवि अपने मन की ओर लौटते हैं। कथा कहने से पहले उसे दर्पण मानकर सँवारते हैं और उसे साफ करने के लिये गुरु के चरणकमलों की रज लेते हैं। इस दर्पण में रघुनाथ का निर्मल यश प्रकट होगा। गुरु की धूल और यश की निर्मलता का यह सम्बन्ध आरम्भ में ही रखा गया है। जो मन कथा कहेगा, उसी की सफाई से वर्णन का काम शुरू होता है।

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

गुरु वन्दना, अनंकित दोहा

रघुनाथ का यह यश चार फल देनेवाला कहा गया है। टीका उन चारों को खोल देती है: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इस तरह वन्दना में केवल कथा आरम्भ करने की अनुमति नहीं माँगी गयी। जिस यश का वर्णन होगा, उसके फल का भी परिचय मिलता है। आगे दशरथ स्वयं कहेंगे कि गुरु की पवित्र चरणरज की पूजा से उन्होंने सब कुछ पाया है। कवि के मन का दर्पण और राजा का अनुभव, दोनों इसी गुरु आश्रय से जुड़ते हैं।

शिव से रक्षा, राम की अचल मुखशोभा से मंगल और सीता सहित धनुर्धर राम को प्रणाम करके तुलसी गुरु की चरणरज से मन का दर्पण साफ करते हैं। वे उस निर्मल यश का वर्णन करेंगे जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देता है।

अवध में उमड़ता सुख और सबकी एक इच्छा

जब से राम विवाह करके घर आये हैं, नित्य नये मंगल हो रहे हैं और आनन्द के बधावे बजते हैं। इस सुख को तुलसी एक विशाल वर्षा के रूप में देखते हैं। चौदहों लोक भारी पर्वत हैं, पुण्य मेघ बन गया है और उससे सुख का जल बरस रहा है। विवाह के बाद घर में आया उल्लास इस उपमा में चौदहों लोकों तक फैलता है। राम का घर आना कथा का पहला संकेत है और उसके साथ ही कवि की दृष्टि सारे भुवनों पर चली जाती है।

अगला चित्र उसी बरसते जल को बहते हुए दिखाता है। ऋद्धि, सिद्धि और सम्पत्ति सुहावनी नदियाँ हैं, जो उमड़कर अवध रूपी समुद्र में आ मिली हैं। समुद्र का वैभव उसके भीतर के रत्नों में भी होता है। यहाँ नगर की स्त्रियाँ और पुरुष उत्तम कोटि की मणियों के समूह हैं, पवित्र, अमूल्य और सब प्रकार से सुन्दर। नगर की विभूति कहते समय तुलसी उसके लोगों को ही मणियों का समूह बना देते हैं। अवध का सुख और अवध के निवासी इस चित्र में एक साथ दमकते हैं।

फिर वर्णन अपनी सीमा स्वीकार करता है। नगर का ऐश्वर्य कहा नहीं जा सकता; ऐसा लगता है मानो ब्रह्मा की सारी कारीगरी यहीं लगी हो। इतने बड़े उपमान के बाद लोगों का सुख बहुत पास की चीज़ में बताया जाता है। वे राम के मुखचन्द्र को देखते हैं और सब प्रकार से सुखी होते हैं। जिन नदियों और समुद्र से अभी नगर की समृद्धि समझी गयी, उनके बीच लोगों की दृष्टि एक ही मुख पर ठहरी है। समृद्धि का यह वर्णन अन्ततः दर्शन के आनन्द तक पहुँचता है।

माताएँ, सखियाँ और सहेलियाँ अपने मनोरथ की बेल को फला हुआ देखकर हर्षित हैं। राजा दशरथ राम का रूप देखते हैं और उनके गुण, शील तथा स्वभाव को देख सुनकर प्रमुदित होते हैं। रूप के साथ आचरण और स्वभाव भी गिने गये हैं। जिस पुत्र को देखने में पिता को सुख मिलता है, उसके विषय में सुनने को भी वही सुख मिलता है। आगे युवराज पद की बात इन्हीं गुणों के बीच से उठेगी, क्योंकि नगर और परिवार के मन में राम के प्रति यह प्रीति पहले से भरी हुई है।

सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।
आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु॥ १॥

दोहा १

सबकी अभिलाषा है कि महाराज अपने रहते राम को युवराज पद दे दें। वे महादेव को मनाकर यही कहते हैं। इस इच्छा में राजा का जीवित रहना साफ रखा गया है। नगर उस दिन को दशरथ के सामने देखना चाहता है। अभी राजा ने सभा में ऐसा प्रस्ताव नहीं सुनाया है, पर नगर के लोगों के हृदय में उसका स्वागत तैयार है। जो प्रार्थना अनेक मनों में उठ रही है, वही कुछ आगे एक पिता की बची हुई लालसा के रूप में सुनाई देगी।

विवाह के बाद अवध नये मंगलों से भरी है। माताओं के मनोरथ फले हैं, दशरथ राम के रूप और गुणों से आनन्दित हैं, और सब लोग शिव से प्रार्थना करते हैं कि राजा अपने जीते जी राम को युवराज बना दें।

दर्पण में मुकुट और सफेद बाल

एक समय दशरथ अपने पूरे समाज सहित राजसभा में विराजमान हैं। राम का सुयश सुनकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हो रहा है। तुलसी राजा को समस्त पुण्यों की मूर्ति कहते हैं। अन्य राजा उनकी कृपा चाहते हैं, लोकपाल उनका रुख रखते हुए प्रीति करते हैं। तीनों भुवनों और तीनों कालों में दशरथ जैसा भाग्यवान कोई नहीं कहा गया। इस सौभाग्य का कारण भी तुरन्त सामने रख दिया जाता है: मंगलों के मूल राम उनके पुत्र हैं। ऐसे पिता की बड़ाई में जो कहा जाय, थोड़ा ही है।

इसी राजसभा में महाराज सहज भाव से हाथ में दर्पण लेते हैं। अपना मुख देखकर मुकुट सीधा करते हैं। यह काम करते हुए कानों के पास के सफेद बाल दिखाई पड़ते हैं। पहले कवि ने मन का दर्पण सँवारा था; अब राजा के हाथ में सचमुच का दर्पण है। उसमें मुकुट का स्थान भी दिखता है और बढ़ती हुई आयु का चिह्न भी। तुलसी इस दूसरे दृश्य को उपदेश की तरह सुनते हैं। बुढ़ापा मानो स्वयं राजा के पास आकर अपनी बात कह रहा है।

श्रवन समीप भए सित केसा । मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥
नृप जुबराजु राम कहुँ देहू । जीवन जनम लाहु किन लेहू॥

चौपाई १

उस उपदेश का आशय है: राम को युवराज पद देकर अपने जीवन और जन्म का लाभ लीजिये। सफेद बाल देखकर जो विचार उठता है, वह राम को पद देने का है। राजा के सामने वही इच्छा आ खड़ी हुई जिसे नगरवासी महादेव से माँगते आये हैं। मुकुट सँभालते हुए उन्हें अपने जीवन में पूरा कर लेने योग्य काम दिखाई पड़ा। तुलसी इस क्षण को इतने पास से रखते हैं कि बड़े निश्चय का जन्म एक छोटे दृश्य में साफ दिखाई देता है।

विचार हृदय में आया, और राजा ने शुभ दिन तथा अच्छा अवसर पाकर उसे गुरु वसिष्ठ के सामने रखा। उनके शरीर में प्रेम का पुलक है, मन आनन्द में मग्न है। इस निश्चय के साथ वे गुरु के पास स्वयं गये हैं। राजसभा में सुना हुआ राम का यश, दर्पण में दिखाई दी आयु और हृदय में उठी अभिलाषा अब निवेदन बनने जा रहे हैं। बात राज्य की है और उसे कहने में राजा की वाणी पर अपने गुरु का पूरा भरोसा है।

राजसभा में मुकुट सीधा करते समय दशरथ कानों के पास सफेद बाल देखते हैं। बुढ़ापा मानो राम को युवराज बनाकर जन्म का लाभ लेने की सीख देता है। राजा प्रसन्न होकर अपना निश्चय वसिष्ठ को सुनाने जाते हैं।

गुरु के सामने बची हुई एक लालसा

दशरथ पहले राम की योग्यता की बात करते हैं। हे मुनिनायक, राम अब सब प्रकार से सब योग्य हो गये हैं। फिर वे उन सबको गिनाते हैं जिनका प्रेम इस बात की पुष्टि करता है: सेवक, मन्त्री, नगरवासी, राजा के शत्रु, मित्र और उदासीन लोग। सभी को राम वैसे ही प्रिय हैं जैसे स्वयं दशरथ को। इस गिनती में केवल राजा के अपने पक्ष के लोग नहीं हैं। शत्रु और उदासीन भी शामिल हैं। पिता का स्नेह जिस व्यक्ति पर है, उसी पर इन भिन्न सम्बन्धों में खड़े लोगों की प्रीति भी है।

इसके बाद राजा उस योग्यता और प्रेम को गुरु के आशीर्वाद से जोड़ते हैं। उन्हें लगता है मानो वसिष्ठ का आशीष शरीर धारण करके राम के रूप में शोभित हो रहा हो। ब्राह्मण अपने परिवार सहित राम पर वैसा ही स्नेह करते हैं जैसा गुरु करते हैं। दशरथ की बात में अपने पुत्र का गौरव है, और उस गौरव के भीतर गुरु की कृपा की पहचान है। वे जो कुछ पा चुके हैं उसे उसी आशीर्वाद का फल मानकर निवेदन करते हैं।

गुरु के चरणों की रज मस्तक पर धारण करनेवाले मानो सारे ऐश्वर्य को अपने वश में कर लेते हैं, राजा कहते हैं। इसका अनुभव अपने जैसा किसी दूसरे को नहीं मानते। पवित्र चरणरज की पूजा से उन्होंने सब कुछ पाया है। फिर इतने बड़े प्राप्त वैभव के बीच एक बची हुई इच्छा बताते हैं। हे नाथ, मन में अब एक ही अभिलाषा है और वह भी आपके अनुग्रह से पूरी होगी। इच्छा अभी कही नहीं गयी है। पहले उसके पूरा होने का आश्रय गुरु के चरणों में रखा गया है।

राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।
फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार॥ ३॥

दोहा ३

राजा का सहज प्रेम देखकर वसिष्ठ प्रसन्न हैं। वे उन्हें अपनी अभिलाषा कहने को कहते हैं और उनके नाम तथा यश की महिमा बताते हैं। उनका नाम और यश ही मनचाही वस्तुएँ देनेवाला है। राजाओं के मुकुटमणि दशरथ के मन की इच्छा फल के पीछे चलती है। टीका इस क्रम को स्पष्ट करती है: इच्छा करने के पहले ही फल उत्पन्न हो जाता है। गुरु का यह उत्तर राजा के संकोच को सहारा देता है। अब वे निश्चिन्त होकर उस एक इच्छा को शब्द देते हैं।

हे नाथ, राम को युवराज कीजिये। कृपा करके आज्ञा दीजिये, तो तैयारी हो। गुरु को प्रसन्न जानकर राजा हर्षित हैं और कोमल वाणी से बोलते हैं। वे चाहते हैं कि यह उत्सव उनके जीते जी हो और सब लोग अपनी आँखों का लाभ पाएँ। अपने सुख के साथ लोगों के देखने का सुख भी उनके निवेदन में आता है। नगर ने राजा के रहते यह उत्सव माँगा था; राजा अब गुरु से वही दिन माँग रहे हैं, ताकि सब मिलकर उसे देख सकें।

दशरथ आगे कहते हैं कि गुरु के प्रसाद से शिव ने सब कुछ निभा दिया है। मन में यही एक लालसा शेष है। यह पूरी हो जाय तो फिर देह रहे या चली जाय, उन्हें सोच नहीं होगा। वे ऐसा करना चाहते हैं जिससे पीछे पछतावा न रहे। जीवन की बात यहाँ बड़ी स्पष्टता से आती है। अभिषेक देखकर अपनी बची हुई लालसा पूरी करने का सुख वे अभी चाहते हैं। वसिष्ठ उनके इन सुन्दर वचनों को सुनकर मन में आनन्दित होते हैं, क्योंकि वे मंगल और मोद के मूल हैं।

गुरु का उत्तर राम के स्वरूप से शुरू होता है। जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन के बिना हृदय की जलन नहीं जाती, वही स्वामी दशरथ के पुत्र हुए हैं। वे राम पवित्र प्रेम के अनुगामी हैं। पोद्दार जी की टीका स्पष्ट करती है कि इसी प्रेम के वश होकर वे राजा के पुत्र हुए हैं। इसलिए दशरथ के पितृस्नेह और राम के सर्वेश्वर स्वरूप को वसिष्ठ साथ रखकर देखते हैं। प्रेम यहाँ भगवान् को अपने पीछे ले चलनेवाला कहा गया है।

बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु॥ ४॥

दोहा ४

अब गुरु शीघ्र तैयारी करने को कहते हैं। देर करने का कोई कारण नहीं रखते। शुभ दिन और सुन्दर मंगल वही है जब राम युवराज हों। टीका इसका अर्थ बताती है कि उनके अभिषेक के लिये सभी दिन शुभ और मंगलमय हैं। दशरथ शुभ अवसर देखकर निवेदन करने आये थे; वसिष्ठ अभिषेक को ही अवसर की शुभता का आधार कहते हैं। गुरु की सहमति मिल गयी है, और उसी उत्तर के साथ कथा विचार से काम की ओर बढ़ती है।

दशरथ राम की सर्वप्रियता और गुरु के अनुग्रह का स्मरण करके युवराज पद की इच्छा कहते हैं। वे अपने रहते उत्सव देखना चाहते हैं। वसिष्ठ राम को पवित्र प्रेम के अनुगामी स्वामी बताते हैं और बिना देर किये तैयारी की आज्ञा देते हैं।

पंचों की सम्मति और तैयारी की आज्ञा

गुरु से मिलकर राजा प्रसन्न भाव से महल आते हैं। सेवक और मन्त्री सुमन्त्र बुलाये जाते हैं। वे राजा के जीवन और विजय की कामना करते हुए सिर नवाते हैं। दशरथ उन्हें राम को युवराज बनाने का मंगलमय प्रस्ताव सुनाते हैं। गुरु की सहमति मिलने के बाद भी यह बात सबके सामने रखी जा रही है। राजा की वाणी में उनसे सम्मति माँगने का स्थान बना हुआ है।

जौं पाँचहि मत लागै नीका । करहु हरषि हियँ रामहि टीका॥

चौपाई २

यदि पंचों को यह मत अच्छा लगे तो हृदय में हर्षित होकर राम का तिलक कीजिये, ऐसा राजा कहते हैं। पोद्दार जी पंचों को यहाँ उपस्थित सब लोगों के अर्थ में समझाते हैं। इस वाक्य में उनकी रुचि पूछी गयी है और काम को हर्षपूर्वक करने की बात भी रखी गयी है। पहले नगर की अभिलाषा सुनायी दी थी, फिर राजा का निवेदन और गुरु की आज्ञा आयी; अब मन्त्री उसी प्रस्ताव का स्वागत करते हैं।

प्रिय वाणी सुनकर मन्त्रियों के मन में ऐसा आनन्द होता है जैसे मनोरथ रूपी पौधे पर पानी पड़ गया हो। वे हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि महाराज करोड़ों वर्ष जियें। उनका कहना है कि यह विचार जगत् भर का मंगल करनेवाला भला काम है। वे भी शीघ्रता चाहते हैं और देर न लगाने का निवेदन करते हैं। राजा के प्रस्ताव को सुनकर वे अपनी अलग बात नहीं खोलते; जिस इच्छा को जल मिला है, उसी के पूरा होने के लिये उत्सुक हैं।

मन्त्रियों की सुन्दर वाणी सुनकर राजा का हर्ष बढ़ता है। तुलसी अब बढ़ती हुई बेल का चित्र रखते हैं जिसे एक अच्छी डाली का सहारा मिल गया हो। मन्त्रियों के मन का पौधा सिंचा था, राजा के मनोरथ की बेल को सहारा मिला है। दोनों उपमाओं में इच्छा जीवित और बढ़ती हुई दिखाई देती है। सहमति केवल उत्तर होकर नहीं रह जाती, वह राजा को आगे बढ़ने का आनन्द देती है। अब व्यवस्था का केन्द्र भी साफ कर दिया जाता है।

दशरथ की आज्ञा है कि राम के राज्याभिषेक के लिये मुनिराज वसिष्ठ जो जो कहें, वही सब तुरन्त किया जाय। इस तरह राजाज्ञा काम को गति देती है और अनुष्ठान का विधान गुरु के हाथ रहता है। आगे सामग्री का विस्तृत वर्णन उसी आज्ञा के अनुसार खुलता है। राजा, मन्त्री और सेवक अब एक निर्णय के साथ हैं; जिस तैयारी की अनुमति पहले गुरु से माँगी गयी थी, उसका क्रम आरम्भ हो गया है।

दशरथ सेवकों और सुमन्त्र को प्रस्ताव सुनाकर पंचों की सम्मति माँगते हैं। मन्त्री हर्षपूर्वक सहमत होते हैं, और राजा सबको आदेश देते हैं कि वसिष्ठ अभिषेक के लिये जो कहें, उसे तुरन्त पूरा करें।

तीर्थों के जल से नगर की गलियों तक

वसिष्ठ हर्षित होकर कोमल वाणी में सबसे पहले सभी श्रेष्ठ तीर्थों का जल मँगाते हैं। उसके बाद अनेक मंगल वस्तुओं के नाम गिनाते हैं: औषधियाँ, मूल, फूल, फल और पत्ते। यहाँ अभिषेक की तैयारी वस्तुओं के नाम लेकर कही गयी है। जल कहाँ से आना है और उसके साथ क्या क्या रखना है, मुनि सब बताते हैं। यह वही विस्तार है जिसके लिये राजा ने सबको गुरु की आज्ञा मानने को कहा था।

चँवर और मृगचर्म चाहिये, बहुत प्रकार के वस्त्र चाहिये। असंख्य जातियों के ऊनी और रेशमी कपड़े, मणियाँ और राज्याभिषेक के योग्य अनेक दूसरी मंगल वस्तुएँ भी मँगायी जाती हैं। जल, वनस्पति, वस्त्र और रत्न, तैयारी में इन सबका स्थान आता है। तुलसी सामान गिनाते हुए वेद में बताये विधान का उल्लेख करते हैं। वसिष्ठ उसी विधान को पूरा बताकर अब लोगों की दृष्टि नगर की ओर ले जाते हैं।

अवध में तरह तरह के चँदोवे सजने हैं। गलियों में चारों ओर फल लगे हुए आम, सुपारी और केले के वृक्ष रोपे जाने हैं। फलों सहित वृक्षों की बात साफ कही गयी है। सुन्दर मणियों के मनोहर चौक पुरवाने हैं और बाजार को शीघ्र सजाने के लिये कहना है। अभिषेक का समाचार जिस नगर ने चाहा था, उसकी गलियाँ और बाजार अब उसी मंगल की सजावट में शामिल होंगे। मुनि की आज्ञा सामग्री जुटाने से आगे बढ़कर नगर का रूप सँवारने तक पहुँच गयी है।

इसी क्रम में गणपति, गुरु और कुलदेवता की पूजा आती है। ब्राह्मणों की सब प्रकार से सेवा करनी है। सजावट और पूजा दोनों की आज्ञा साथ चलती है। फिर ध्वजाएँ, पताकाएँ, तोरण और कलश सजाने हैं। घोड़े, रथ और हाथी भी तैयार किये जाने हैं। इतने अलग काम कहने के बाद दोहा उन लोगों पर ठहरता है जिन्हें अब इन्हें पूरा करना है। गुरु के वचन सिर पर रखकर सब अपने अपने काम में लग जाते हैं।

ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।
सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग॥ ६॥

दोहा ६

काम इतनी शीघ्रता से होते हैं कि मुनि ने जिसे जो आज्ञा दी, उसने मानो वह पहले ही पूरा कर रखा था। यह तुलसी का गति दिखाने का ढंग है। आज्ञा और कार्य के बीच का अन्तर बहुत छोटा पड़ गया है। राजा स्वयं ब्राह्मणों, साधुओं और देवताओं की पूजा कर रहे हैं, राम के लिये मंगल कार्य कर रहे हैं। दूसरे लोग सामग्री और नगर की व्यवस्था में लगे हैं; राजा का अपना काम भी उसी मंगल की साधना है।

राम के अभिषेक की सुहावनी खबर सुनते ही अवध में धूम से बधावे बजने लगते हैं। जिन मंगल ध्वनियों से विवाह के बाद की कथा खुली थी, उनमें अब इस नये समाचार का हर्ष है। तैयारियों में लगे लोगों को ऐसा उत्सव मिला है जिसके लिये उनकी इच्छा पहले से थी। अभी यहाँ खबर सुनायी गयी है और अभिषेक के साज सज रहे हैं। नगर का उल्लास उसी आनेवाले उत्सव को लेकर उमड़ता है।

वसिष्ठ तीर्थजल, वनस्पतियाँ, चँवर, मृगचर्म, वस्त्र और रत्न मँगाते हैं। नगर में चँदोवे, फलवाले वृक्ष, मणिचौक और बाजार सजते हैं; पूजा, ब्राह्मण सेवा, ध्वज, कलश तथा सवारियों की तैयारी होती है। सब आज्ञा पाते ही अपने काम में लग जाते हैं।

शुभ शकुन और भरत से मिलने की आशा

इसी समय राम और सीता के शरीर में शुभ शकुन प्रकट होते हैं। उनके सुन्दर मंगल अंग फड़कते हैं। अवध में अभिषेक की खबर फैल रही है, पर उन दोनों के बीच इन शकुनों से जो बात उठती है उसका केन्द्र भरत हैं। राम और सीता प्रेम से पुलकित होकर एक दूसरे से कहते हैं कि ये संकेत भरत के आने की सूचना देते हैं। अच्छे समाचार की उनकी आशा प्रिय से मिलने की ओर चली जाती है।

उन्हें भरत से मिले बहुत दिन हो गये हैं और मिलने की इच्छा बार बार मन में आती है। पोद्दार जी की टीका यहाँ बताती है कि भरत को मामा के घर गये बहुत दिन बीत चुके हैं। इसलिए शकुन देखकर दोनों को प्रिय से भेंट का विश्वास होता है। इस विश्वास में उनकी प्रतीक्षा सुनाई देती है। शरीर का फड़कना शुभ है, और उनके लिये उस शुभ का सबसे प्रिय अर्थ भरत का आना है। भरत अभी इस दृश्य में सामने नहीं आये हैं; उनकी भेंट की आशा दोनों के मन में उमड़ रही है।

भरत सरिस प्रिय को जग माहीं । इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥
रामहि बंधु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती॥

चौपाई ३

उनकी बात का आग्रह है कि जगत् में भरत जैसा प्रिय और कौन है। शकुन का फल यही है, दूसरा नहीं। अभिषेक के लिये अवध जितनी उत्सुक है, राम का मन उतनी ही आत्मीयता से अपने भाई में लगा हुआ मिलता है। तुलसी इस प्रेम को फिर एक उपमा से समझाते हैं। जैसे कछुए का हृदय अपने अंडों में लगा रहता है, वैसे ही राम को दिन रात भाई का सोच रहता है। यहाँ सोच में चिन्ता और स्मरण का वही निरन्तर सम्बन्ध है जिसे टीका कछुए के हृदय से खोलती है।

इस उपमा को पढ़कर भरत की अनुपस्थिति का अर्थ अधिक स्पष्ट होता है। वे पास नहीं हैं, फिर भी राम के मन में दिन रात बने हुए हैं। शकुन आते ही उसी स्मरण को भेंट की उम्मीद मिलती है। कुछ आगे गुरु राम को युवराज पद की बात बताएँगे और राम अपने सब भाइयों के साथ बीते जीवन को याद करेंगे। भरत के प्रति यह स्मरण उस भ्रातृप्रेम को पहले ही हमारे सामने रख देता है।

राम और सीता शुभ अंगस्फुरण को भरत के आने का संकेत मानते हैं। बहुत दिन से भेंट की लालसा है। तुलसी राम के दिन रात लगे भ्रातृस्मरण को अंडों में बसे कछुए के हृदय की उपमा देते हैं।

रनिवास के कलश और माता की प्रार्थना

अभिषेक का परम मंगल समाचार सुनकर रनिवास हर्षित हो उठता है। तुलसी बढ़ते हुए चन्द्रमा को देखकर उठती समुद्र की लहरों की उपमा देते हैं। पहले अवध समुद्र थी जिसमें समृद्धि की नदियाँ मिली थीं; अब रनिवास का आनन्द लहरों के उल्लास में दिखाई देता है। खबर पहुँचते ही भीतर का यह सुख बाहर सजते मंगल में भाग लेने लगता है। जो लोग सबसे पहले समाचार सुनाने गये थे, उन्हें बहुत से आभूषण और वस्त्र मिले।

रानियों के शरीर प्रेम से पुलकित हैं और मन अनुराग में मग्न हैं। वे सब मंगल कलश सजाने लगती हैं। सुमित्रा तरह तरह के अत्यन्त सुन्दर मणिमय चौक पूरती हैं। जिन मणियों से चौक बनाने की बात गुरु ने पूरे नगर के लिये कही थी, वही साज यहाँ माता के हाथ से बन रहा है। इस तैयारी में उल्लास के साथ काम भी दिखता है। समाचार सुनना, उपहार देना, कलश सजाना और चौक पूरना, सब एक के बाद एक होता है।

राम की माता आनन्द में मग्न होकर ब्राह्मणों को बुलाती हैं और बहुत दान देती हैं। पोद्दार जी की टीका उन्हें कौसल्या नाम से पहचानती है। वे ग्रामदेवियों, देवताओं और नागों की पूजा करती हैं। साथ ही फिर से भेंट देने की बात कहती हैं। टीका समझाती है कि यह कार्य सिद्ध होने पर दुबारा पूजा करने की मनौती है। वर्तमान पूजा के साथ आगे अर्पण करने का उनका संकल्प भी जुड़ गया है।

पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा । कहेउ बहोरि देन बलिभागा॥
जेहि बिधि होइ राम कल्यानू । देहु दया करि सो बरदानू॥

चौपाई ४

माता की प्रार्थना बड़ी सीधी है: जिस प्रकार राम का कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिये। खबर युवराज पद की आयी है और माता अपने पुत्र का कल्याण माँग रही हैं। उनका मन उसी शुभ के लिये देवियों, देवताओं और नागों की ओर लगा है। दान और मनौती का भाव इस वाक्य में पूरा खुलता है। राम के लिये मंगल हो, यही उनकी पूजा की अभिलाषा है।

स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगती हैं। तुलसी उनकी वाणी को कोयल के समान मधुर, मुख को चन्द्रमा के समान और आँखों को मृगशावक के समान बताते हैं। गीत के साथ गानेवालियों का रूप भी उसी कोमलता से दिखाई देता है। फिर दृष्टि रनिवास से सारे नगर में लौटती है। स्त्रियाँ और पुरुष अभिषेक सुनकर हृदय में हर्षित हैं। सब विधाता को अपने अनुकूल समझ रहे हैं और सुन्दर मंगल साज सजाने में लगे हैं।

समाचार लानेवालों को वस्त्र और आभूषण मिलते हैं। रानियाँ कलश सजाती हैं, सुमित्रा मणिचौक पूरती हैं और कौसल्या दान, पूजा तथा फिर भेंट देने की मनौती के साथ राम का कल्याण माँगती हैं। नगर मंगलगीत और सजावट में लगा है।

राम के द्वार पर गुरु

राजा अब वसिष्ठ को बुलाकर राम के घर भेजते हैं, ताकि उन्हें इस अवसर की शिक्षा दें। गुरु के आने का समाचार पाते ही राम द्वार पर आते हैं और उनके चरणों में मस्तक नवाते हैं। स्वागत द्वार से शुरू हुआ है। वे आदरपूर्वक अर्घ्य देकर गुरु को भीतर ले आते हैं, फिर सोलह प्रकार के उपचारों से पूजा करके उनका सम्मान करते हैं। सीता सहित दुबारा चरण पकड़ते हैं और कमल के समान हाथ जोड़कर बोलते हैं।

सादर अरघ देइ घर आने । सोरह भाँति पूजि सनमाने॥
गहे चरन सिय सहित बहोरी । बोले रामु कमल कर जोरी॥

चौपाई ५

राम स्वयं को सेवक कहते हैं और गुरु को स्वामी। सेवक के घर स्वामी का आना मंगलों का मूल और अमंगलों का नाश करनेवाला है। फिर भी नीति यही होती कि स्वामी प्रेम से सेवक को काम के लिये बुला भेजते। इस बात में गुरु के आने का आनन्द और उनके प्रति विनय एक साथ हैं। राम अपने घर में हुए पूजन के बाद भी अपने को वही सेवक मानकर निवेदन कर रहे हैं जिसे गुरु किसी काम के लिये बुला सकते थे।

वे आगे कहते हैं कि प्रभु ने प्रभुता छोड़कर जो स्नेह किया है, उससे आज यह घर पवित्र हो गया। अब जो आज्ञा हो, वही करेंगे; सेवक का लाभ स्वामी की सेवा में है। बात अभी अभिषेक की सूचना तक नहीं पहुँची है। गुरु सामने आये हैं तो राम का पहला निवेदन काम सौंपने का है। जिनके लिये पूरा नगर उत्सव की तैयारी कर रहा है, वे अपने घर आये गुरु से सेवा की आज्ञा चाहते हैं।

इन प्रेम में सने वचनों को सुनकर वसिष्ठ राम की प्रशंसा करते हैं। वे कहते हैं कि सूर्यवंश के भूषण राम भला ऐसा क्यों न कहें। गुरु उनके गुण, शील और स्वभाव का बखान करते हुए प्रेम से पुलकित हैं। प्रसंग के आरम्भ में दशरथ इन्हीं गुणों को देख सुनकर आनन्दित होते थे। अब वसिष्ठ उन्हें राम की अपनी वाणी और व्यवहार में देखकर बखान रहे हैं। स्वागत पूरा होने पर वे आने का काम बताते हैं।

महाराज ने अभिषेक का साज सजाया है और वे राम को युवराज पद देना चाहते हैं। इसलिए आज राम को सब संयम करने हैं, ताकि विधाता यह काम कुशलता से पूरा करें। पोद्दार जी की टीका इन संयमों में विधिपूर्वक उपवास और हवन आदि का अर्थ देती है। नगर को सजाने की आज्ञा के बाद अब राम के लिये अनुष्ठान और संयम की शिक्षा है। गुरु इसे देकर दशरथ के पास लौट जाते हैं।

राम द्वार पर गुरु को प्रणाम करके अर्घ्य और सोलह उपचारों से पूजते हैं। सीता सहित चरण स्पर्श कर सेवा की आज्ञा माँगते हैं। वसिष्ठ युवराज पद का प्रस्ताव बताते और आज के लिये संयम की शिक्षा देकर राजा के पास लौटते हैं।

सब भाई साथ थे, अभिषेक अकेले का

गुरु के जाने के बाद राम के हृदय में एक खेद उठता है। उसकी वजह उन्हीं की स्मृति में खुलती है। हम सब भाई एक साथ जन्मे थे। भोजन, सोना और लड़कपन के खेल सब साथ हुए थे। फिर कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह, ये उत्सव भी साथ साथ हुए। राम अपने जीवन को इस साझा क्रम में देखते हैं। रोज़ के काम और बड़े संस्कार, दोनों में भाइयों का साथ रहा है। इस स्मृति में किसी एक दिन को अलग करके नहीं देखा गया।

जनमे एक संग सब भाई । भोजन सयन केलि लरिकाई॥
करनबेध उपबीत बिआहा । संग संग सब भए उछाहा॥

चौपाई ६

राम की गिनती को धीरे पढ़िये। भोजन और शयन जितनी साधारण बातें हैं, कर्णवेध और उपवीत उतने ही निश्चित संस्कार हैं। विवाह भी इसी साथ में आता है। चारों भाइयों का जीवन उनके मन में एक ऐसे अनुभव की तरह है जिसमें आनन्द साझे रहे हैं। इसी कारण अब केवल बड़े भाई का अभिषेक होने की बात उन्हें अनुचित लगती है। निर्मल वंश में यह एक बात उन्हें खटकती है कि दूसरे भाइयों को छोड़कर केवल सबसे बड़े को यह पद मिले।

बिमल बंस यहु अनुचित एकू । बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई । हरउ भगत मन कै कुटिलाई॥

चौपाई ७

यह खेद राम स्वयं अपने लिये मिले विशेष स्थान पर कर रहे हैं। जिन भाइयों के साथ सब उत्सव हुए, उनसे अलग अकेले उनका अभिषेक होना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा। उनकी बात में भाइयों का नाम लेकर कोई प्रतिस्पर्धा नहीं खोली गयी है। प्रेम पूरे साथ को याद करता है और उस साथ से अलग मिलनेवाले सम्मान पर ठिठकता है। थोड़ी पहले भरत के मिलने की आशा में जो हृदय व्याकुल था, अब वही हृदय सभी भाइयों की साझी स्मृतियों में है।

तुलसी इस प्रेमपूर्ण पछतावे को सुहावना कहते हैं और उससे भक्तों के मन की कुटिलता हरने की प्रार्थना करते हैं। चौपाई के पहले भाग में राम का अपना खेद है, दूसरे भाग में कवि की विनती। इस प्रकार राम की भावना को कथा में उसका पूरा स्थान मिला है। जिस निश्चय से राजा, मन्त्री और अवध हर्षित हैं, उसी के विषय में राम के भीतर यह स्नेहभरा खेद भी है। कवि उसे भक्त के हृदय को सरल करनेवाला मानकर स्मरण करते हैं।

तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।
सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद॥ १०॥

दोहा १०

उसी समय लक्ष्मण आते हैं। वे प्रेम और आनन्द में मग्न हैं। राम प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान करते हैं। तुलसी राम को रघुकुल रूपी कुमुद का चन्द्रमा कहते हैं, जिसके आने से कुमुद खिलता है। भाइयों के साथ की स्मृति के बाद सामने आये भाई का यह स्वागत प्रसंग को पूरा करता है। अन्तिम दृश्य में लक्ष्मण का आनन्द और राम की मधुर वाणी है। कथा यहीं ठहरती है, घर के भीतर हुए इस प्रेमपूर्ण सम्मान पर।

राम को खेद है कि जन्म, भोजन, शयन, खेल और सभी संस्कार साथ होने पर भी अभिषेक केवल बड़े भाई का होगा। तुलसी इस प्रेमपूर्ण पछतावे से भक्तों की कुटिलता मिटने की प्रार्थना करते हैं। तभी आनन्दित लक्ष्मण आते हैं और राम उनका प्रेम से सम्मान करते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग में इच्छा बार बार आती है और हर बार अपना सम्बन्ध साथ लाती है। नगर चाहता है कि दशरथ अपने रहते राम को युवराज बनाएँ। पिता चाहते हैं कि सब लोग उस उत्सव को देखकर नेत्रों का लाभ लें। राम और सीता शुभ संकेतों में भरत से भेंट चाहते हैं। माता की प्रार्थना राम के कल्याण की है। इन इच्छाओं को साथ पढ़ें तो अवध का उल्लास घर के भीतर के स्नेह से अलग दिखाई नहीं देता। जो बात राजसभा में तय हो रही है, उसकी धड़कन इन्हीं सम्बन्धों में सुनाई पड़ती है।

और राम की दृष्टि हमें उसी उत्सव को भाइयों की ओर से भी देखने देती है। उनके लिये साथ खाया हुआ भोजन, साथ खेले हुए खेल और साथ हुए संस्कार अभी जीवित हैं। अकेले मिलनेवाले पद का समाचार इन्हीं स्मृतियों को जगाता है। तुलसी इस पछतावे से हमारे मन की कुटिलता दूर होने की प्रार्थना करते हैं। अपने आनन्द में दूसरे के हिस्से का स्मरण बना रहे, इस प्रसंग में वह भाव राम के हृदय से निकलकर लक्ष्मण के स्वागत में दिखाई देता है।

अवध में अभिषेक की तैयारियाँ हैं, पिता की लालसा को गुरु और मन्त्रियों की सहमति मिली है, और रनिवास मंगल से भरा है। राम के घर में इस समय प्रिय वचन सुनकर लक्ष्मण सम्मान पा रहे हैं। अभिषेक की तैयारी का यह प्रसंग दो भाइयों के स्नेह पर पूरा होता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १ से १०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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