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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 1
राजा दशरथ का निश्चय और अवध की तैयारी
कानों के पास सफेद बाल देखकर राजा के मन में एक अभिलाषा उठती है। अवध राम का राजतिलक सजाती है, और राम का मन अपने भाइयों में लगा है।
राम विवाह करके घर लौटे हैं और अवध में हर दिन नया मंगल है। माताओं के मनोरथ पूरे हुए हैं। नगर के लोग राम का मुख देखकर सुखी हैं, और राजा दशरथ उनके रूप और गुणों का आनन्द लेते हैं। इसी सुख के बीच सबके मन में एक इच्छा है कि राजा अपने जीते जी राम को युवराज बना दें। सब लोग शिव को मनाकर यही कहते हैं।
गुरु की आज्ञा से नगर में अभिषेक की तैयारी होती है। राम और सीता शुभ शकुनों को भरत के आने का संकेत मानते हैं। गुरु राम के घर जाकर उन्हें आज संयम करने को कहते हैं।
पिता, गुरु, माताएँ और भाई
- दशरथ अवध के राजा, जो चाहते हैं कि अपने रहते राम को युवराज बना दें, और सब लोग उत्सव देखकर अपनी आँखों का लाभ पाएँ।
- राम सबके प्रिय और युवराज पद के योग्य, जिन्हें खेद है कि भाइयों को छोड़कर अभिषेक अकेले उनका हो रहा है।
- वसिष्ठ राजगुरु, जो राजा को सहमति देते हैं, अभिषेक की सामग्री बताते हैं और राम को संयम की शिक्षा देने आते हैं।
- सीता जो राम के साथ शुभ शकुनों में भरत से भेंट की आशा करती हैं, और उनके साथ गुरु के चरण पकड़ती हैं।
- भरत और लक्ष्मण शुभ शकुनों में राम और सीता भरत के आने की आशा करते हैं। राम को दिन रात भाई का सोच रहता है। लक्ष्मण प्रेम और आनन्द में डूबे हुए आते हैं, और राम प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान करते हैं।
- कौसल्या और सुमित्रा मंगल की तैयारी में लगी माताएँ। सुमित्रा चौक पूरती हैं, और कौसल्या दान देती हैं और राम के कल्याण की प्रार्थना करती हैं।
- सुमन्त्र मन्त्री, जिन्हें सेवकों के साथ बुलाकर दशरथ अपना प्रस्ताव सुनाते हैं।
द्वितीय सोपान की प्रार्थनाएँ
पहली प्रार्थना शिव से है। उनकी गोद में पार्वती हैं, मस्तक पर गंगा, ललाट पर बाल चन्द्रमा, कण्ठ में विष और वक्ष पर सर्पराज। भस्म उनका आभूषण है, और वे चन्द्रमा जैसे हैं। तुलसी इन्हीं शिव से अपनी रक्षा माँगते हैं।
वे देवताओं में श्रेष्ठ, सबके स्वामी, सर्वव्यापक और कल्याणरूप हैं। पोद्दार की टीका शर्व का अर्थ संहार करनेवाला देती है, या भक्तों के पापों का नाश करनेवाला। कवि माँगते हैं कि शिव सदा उनकी रक्षा करें।
राम के मुखकमल की शोभा राज्याभिषेक से प्रसन्न नहीं हुई, और वनवास के दुःख से मलिन नहीं हुई। कवि की कामना है कि वह शोभा उनके लिये सदा सुन्दर मंगल देनेवाली हो।
फिर तुलसी राम को प्रणाम करते हैं। उनके अंग नीले कमल जैसे साँवले और कोमल हैं, सीता उनके बायें भाग में हैं, और हाथ में बड़ा बाण और सुन्दर धनुष है।
फिर गुरु के चरणकमलों की धूल से कवि अपने मन रूपी दर्पण को साफ करते हैं, और राम के निर्मल यश का वर्णन करते हैं।
यह यश चारों फल देनेवाला है। टीका इन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताती है।
अवध में उमड़ता सुख और सबकी एक इच्छा
जब से राम विवाह करके घर आये हैं, नित्य नये मंगल हो रहे हैं और आनन्द के बधावे बजते हैं। चौदहों लोक भारी पर्वत हैं, पुण्य के मेघ हैं, और वे उन पर सुख का जल बरसा रहे हैं।
ऋद्धि, सिद्धि और सम्पत्ति सुहावनी नदियाँ हैं, जो उमड़कर अवध रूपी समुद्र में आ मिली हैं। नगर के स्त्री पुरुष उत्तम जाति की मणियों के समूह हैं, पवित्र, अमूल्य और हर तरह से सुन्दर।
नगर का ऐश्वर्य कहा नहीं जा सकता। मानो ब्रह्मा की कारीगरी बस इतनी ही है। नगर के सब लोग राम के मुखचन्द्र को देखकर हर तरह सुखी हैं।
माताएँ, सखियाँ और सहेलियाँ अपने मनोरथ की बेल को फला हुआ देखकर हर्षित हैं। राजा दशरथ राम का रूप देखते हैं और उनके गुण, शील और स्वभाव को देख सुनकर प्रसन्न होते हैं।
सबकी अभिलाषा है कि राजा अपने रहते राम को युवराज पद दे दें, और वे शिव को मनाकर यही कहते हैं।
दर्पण में मुकुट और सफेद बाल
एक दिन दशरथ अपने पूरे समाज के साथ राजसभा में बैठे हैं और राम का यश सुनकर बहुत प्रसन्न हैं। सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपाल उनका रुख रखते हुए उनसे प्रीति करते हैं। तीनों लोकों और तीनों कालों में दशरथ जैसा भाग्यवान कोई नहीं। मंगलों के मूल राम जिनके पुत्र हैं, उनके लिये जो कुछ कहा जाये, थोड़ा है।
सभा में बैठे बैठे राजा हाथ में दर्पण लेते हैं, अपना मुख देखते हैं और मुकुट सीधा करते हैं। तभी उन्हें कानों के पास सफेद बाल दिखाई देते हैं। मानो बुढ़ापा राजा को सीख दे रहा है।
सीख यह है: राजन्, राम को युवराज पद दीजिये। अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों नहीं लेते?
शुभ दिन और अच्छा अवसर देखकर राजा यह विचार गुरु वसिष्ठ के सामने रखते हैं। उनका शरीर प्रेम से पुलकित है और मन आनन्द में डूबा है।
गुरु के सामने बची हुई एक लालसा
दशरथ कहते हैं: हे मुनि, राम अब हर तरह से योग्य हो गये हैं। सेवक, मन्त्री, नगर के सब लोग, और राजा के शत्रु, मित्र और उदासीन, सबको राम वैसे ही प्रिय हैं जैसे दशरथ को।
राजा कहते हैं कि मानो वसिष्ठ का आशीर्वाद शरीर धारण करके शोभित हो रहा है। ब्राह्मण अपने परिवारों सहित राम से वैसा ही स्नेह करते हैं जैसा गुरु करते हैं।
वे कहते हैं कि जो गुरु के चरणों की धूल सिर पर रखते हैं, वे मानो सारे ऐश्वर्य को वश में कर लेते हैं। उनका कहना है कि यह अनुभव जैसा उन्हें हुआ, वैसा किसी को नहीं। उस पवित्र चरणधूल की पूजा से उन्होंने सब कुछ पाया है। फिर कहते हैं: हे नाथ, अब मन में एक अभिलाषा है, और वह आपकी कृपा से पूरी होगी। इच्छा क्या है, यह वे अभी नहीं कहते।
राजा का सहज प्रेम देखकर वसिष्ठ प्रसन्न होते हैं और कहते हैं: नरेश, आज्ञा दीजिये। वे कहते हैं कि राजा का नाम और यश सब मनचाही वस्तुएँ देनेवाला है, और उनके मन की अभिलाषा फल के पीछे चलती है। टीका इसका अर्थ खोलती है: इच्छा करने से पहले ही फल उत्पन्न हो जाता है।
गुरु को सब प्रकार प्रसन्न जानकर राजा हर्षित होकर कोमल वाणी से कहते हैं: हे नाथ, राम को युवराज कीजिये। कृपा करके कहिये, तो तैयारी की जाये। वे चाहते हैं कि यह उत्सव उनके जीते जी हो, और सब लोग अपनी आँखों का लाभ पाएँ।
दशरथ आगे कहते हैं कि गुरु की कृपा से शिव ने सब कुछ निभा दिया है। उनके मन में यह एक लालसा है। फिर सोच नहीं, देह रहे या चला जाये, जिससे पीछे पछतावा न हो। दशरथ के ये सुहावने वचन मंगल और आनन्द के मूल हैं, और इन्हें सुनकर वसिष्ठ मन में प्रसन्न होते हैं।
वसिष्ठ कहते हैं कि जिनसे मुँह मोड़कर लोग पछताते हैं और जिनके भजन के बिना हृदय की जलन नहीं जाती, वही स्वामी दशरथ के पुत्र हुए हैं। वे पवित्र प्रेम के पीछे चलते हैं। पोद्दार की टीका कहती है कि इसी प्रेम के वश होकर वे राजा के पुत्र बने हैं।
गुरु कहते हैं, देर मत कीजिये, सारा साज जल्दी सजाइये। शुभ दिन और मंगल वही है जब राम युवराज हों। टीका का अर्थ है कि उनके अभिषेक के लिये सभी दिन शुभ हैं।
पंचों की सम्मति और तैयारी की आज्ञा
गुरु से मिलकर राजा प्रसन्न मन से महल लौटते हैं और सेवकों तथा मन्त्री सुमन्त्र को बुलाते हैं। वे राजा के जीवन और विजय की कामना करते हुए सिर नवाते हैं। दशरथ उन्हें राम को युवराज बनाने का प्रस्ताव सुनाते हैं, और उनकी सम्मति माँगते हैं।
राजा कहते हैं: यदि पंचों को यह मत अच्छा लगे, तो हृदय में हर्षित होकर राम का तिलक कीजिये। पोद्दार पंचों का अर्थ यहाँ उपस्थित सब लोग बताते हैं।
यह प्रिय वाणी सुनकर मन्त्री आनन्दित होते हैं, मानो उनके मनोरथ के पौधे पर पानी पड़ गया हो। वे हाथ जोड़कर विनती करते हैं: हे जगत्पति, आप करोड़ वर्ष जियें। आपने जगत् का मंगल करनेवाला भला काम सोचा है। हे नाथ, जल्दी कीजिये, देर न लगाइये।
मन्त्रियों की सुन्दर वाणी सुनकर राजा को आनन्द होता है, मानो बढ़ती हुई बेल को सुन्दर डाली का सहारा मिल गया हो।
दशरथ आज्ञा देते हैं कि राम के राज्याभिषेक के लिये वसिष्ठ की जो जो आज्ञा हो, वह सब तुरन्त किया जाये।
तीर्थों के जल से नगर की गलियों तक
वसिष्ठ हर्षित होकर कोमल वाणी में सबसे पहले सब श्रेष्ठ तीर्थों का जल मँगाते हैं। और बहुत सी मंगल वस्तुओं के नाम गिनकर बताते हैं: औषधियाँ, मूल, फूल, फल और पत्ते।
वे चँवर, मृगचर्म और बहुत प्रकार के वस्त्र गिनाते हैं। असंख्य किस्मों के ऊनी और रेशमी कपड़े, मणियाँ, और जगत् में राज्याभिषेक के योग्य अनेक मंगल वस्तुएँ, ये सब वे गिनाते हैं। वसिष्ठ वेद में जो विधान है, वह सब बताते हैं।
अवध में तरह तरह के चँदोवे सजाने हैं। गलियों में चारों ओर फलों से लदे आम, सुपारी और केले के पेड़ लगाने हैं। सुन्दर मणियों के चौक पुरवाने हैं और बाजार जल्दी सजाना है।
गणेश, गुरु और कुलदेवता की पूजा करनी है और ब्राह्मणों की हर तरह सेवा करनी है। ध्वजा, पताका, तोरण और कलश सजाने हैं, और घोड़े, रथ और हाथी तैयार करने हैं। मुनि के वचन सिर पर रखकर सब अपने अपने काम में लग जाते हैं।
मुनि ने जिसे जो आज्ञा दी, उसने वह काम मानो पहले से कर रखा हो। राजा ब्राह्मणों, साधुओं और देवताओं की पूजा कर रहे हैं और राम के लिये मंगल कार्य कर रहे हैं।
राम के अभिषेक की खबर सुनते ही अवध में धूम से बधावे बजने लगते हैं।
शुभ शकुन और भरत से मिलने की आशा
राम और सीता के शरीर में शुभ शकुन होते हैं। उनके मंगल अंग फड़कते हैं। दोनों प्रेम से पुलकित होकर एक दूसरे से कहते हैं कि ये संकेत भरत के आने की सूचना हैं।
भरत से मिले बहुत दिन हो गये हैं और मिलने की इच्छा बार बार उठती है। पोद्दार की टीका बताती है कि भरत को मामा के घर गये बहुत दिन बीत गये हैं। शकुनों से दोनों को भरोसा होता है कि प्रिय भाई से भेंट होगी।
वे कहते हैं: जगत् में भरत जैसा प्रिय और कौन है? शकुन का फल यही है, दूसरा नहीं। राम को दिन रात भाई का सोच रहता है, जैसे कछुए का हृदय अंडों में लगा रहता है।
रनिवास के कलश और माता की प्रार्थना
अभिषेक का मंगल समाचार सुनकर रनिवास हर्षित हो उठता है, मानो बढ़ते चन्द्रमा को देखकर समुद्र में लहरों का विलास शोभा पा रहा हो। जो लोग सबसे पहले यह समाचार सुनाने गये थे, उन्हें बहुत से आभूषण और वस्त्र मिले।
स्त्रियों के शरीर प्रेम से पुलकित हैं और मन अनुराग में मग्न हैं। वे सब मंगल कलश सजाने लगती हैं। पोद्दार की टीका इन्हें रानियाँ बताती है। सुमित्रा तरह तरह के सुन्दर मणियों के चौक पूरती हैं।
राम की माता कौसल्या आनन्द में डूबकर ब्राह्मणों को बुलाती हैं और बहुत दान देती हैं। वे ग्रामदेवियों, देवताओं और नागों की पूजा करती हैं और फिर से भेंट चढ़ाने की बात कहती हैं। टीका इसे मनौती बताती है। उसके अनुसार काम पूरा होने पर वे दुबारा पूजा करेंगी।
माता प्रार्थना करती हैं: जिस तरह राम का कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिये।
कोयल जैसी मीठी वाणी, चन्द्रमा जैसे मुख और हिरन के बच्चे जैसी आँखोंवाली स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगती हैं। राम के अभिषेक की बात सुनकर स्त्री पुरुष हृदय में हर्षित हैं, और विधाता को अनुकूल समझकर सब सुन्दर मंगल साज सजाने लगते हैं।
राम के द्वार पर गुरु
तब राजा वसिष्ठ को बुलाकर राम को शिक्षा देने के लिये उनके घर भेजते हैं। गुरु के आने की खबर पाते ही राम द्वार पर आते हैं और उनके चरणों में सिर नवाते हैं। आदर से अर्घ्य देकर वे गुरु को घर में लाते हैं और सोलह प्रकार से पूजा करके उनका सम्मान करते हैं। फिर सीता सहित उनके चरण पकड़ते हैं और हाथ जोड़कर बोलते हैं।
राम कहते हैं: सेवक के घर स्वामी का आना मंगलों का मूल है और अमंगलों का नाश करता है। फिर भी नीति तो यह थी कि स्वामी प्रेम से सेवक को काम के लिये बुलवा लेते।
वे कहते हैं: आपने प्रभुता छोड़कर जो स्नेह किया, उससे आज यह घर पवित्र हो गया। हे गोसाईं, जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ। सेवक का लाभ स्वामी की सेवा में है।
प्रेम में सने ये वचन सुनकर वसिष्ठ राम की प्रशंसा करते हैं: हे राम, आप ऐसा क्यों न कहें, हे सूर्यवंश के भूषण? राम के गुण, शील और स्वभाव का बखान करके गुरु प्रेम से पुलकित होकर बोलते हैं।
राजा ने अभिषेक का साज सजाया है और वे राम को युवराज पद देना चाहते हैं। आज राम सब संयम करें, अगर विधाता को यह काम कुशल से निबाहना है। पोद्दार की टीका इन संयमों का अर्थ विधि से उपवास और हवन आदि बताती है। यह शिक्षा देकर गुरु दशरथ के पास लौट जाते हैं।
सब भाई साथ थे, अभिषेक अकेले का
गुरु के जाने के बाद राम के मन में एक खेद उठता है। वे सोचते हैं: सब भाई एक साथ जन्मे थे। खाना, सोना और बचपन के खेल, सब साथ हुए। कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह, ये उत्सव भी साथ साथ हुए।
इस निर्मल वंश में यही एक बात उन्हें अनुचित लगती है कि भाइयों को छोड़कर अभिषेक अकेले बड़े का हो।
राम का प्रेम भरा सुहावना पछतावा भक्तों के मन की कुटिलता हर ले। पोद्दार की टीका इस कामना को तुलसीदास की बताती है।
उसी समय लक्ष्मण आते हैं, प्रेम और आनन्द में डूबे हुए। राम प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान करते हैं।
हर इच्छा के साथ एक नाता
सबके मन में यही अभिलाषा है कि दशरथ अपने रहते राम को युवराज पद दें। पिता चाहते हैं कि सब लोग वह उत्सव देखकर आँखों का लाभ लें। राम और सीता शुभ शकुनों में भरत से भेंट चाहते हैं। माता राम का कल्याण माँगती हैं।
राम के मन में भाइयों का साथ है: साथ जन्म, साथ भोजन, साथ खेल और साथ साथ हुए सब उत्सव। उनका प्रेम भरा पछतावा भक्तों के मन की कुटिलता दूर करे, यह कामना टीका तुलसीदास की बताती है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 1 से 10, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।