रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · देवताओं का छल और भरत का समर्पण
देवताओं का छल और भरत का समर्पण
सभा भरत की वाणी का आशय पकड़ नहीं पाती, देवता उन्हीं की बुद्धि बदलवाना चाहते हैं, और भरत अपनी सारी प्रार्थना राम की आज्ञा पाने में समेट देते हैं।
भरत की बात सुनकर राजा जनक और उनका समाज सराहना तो करते हैं, उत्तर नहीं दे पाते। वचन सरल हैं और उनका आशय पकड़ना कठिन है। प्रेम उन्हें कोमल करता है, धर्म की माँग कठोर बनाती है। इस उलझन को लेकर सब राम की ओर जाते हैं। उधर देवताओं ने गुरु, राजा और भाई, तीनों का स्नेह देख लिया है। जितना प्रेम सभा में बढ़ता है, उतना ही उनका अपना काम बिगड़ने का भय बढ़ता जाता है। अब वे उस बुद्धि को बदलवाना चाहते हैं जिस पर उन्हें सब कुछ निर्भर दिखाई देता है।
तुलसीदास के अयोध्याकाण्ड का यह प्रसंग भरत की विनती को पूरा सुनने का अवसर देता है। इसमें राम के स्वभाव की प्रशंसा है, अपनी भूलों की स्वीकृति है, शरणागतों का भरोसा है और अन्त में सेवा की एक स्पष्ट इच्छा। भरत उस इच्छा से स्वार्थ, छल और बड़े से बड़े फल तक अलग कर देते हैं। सभा को आदेश की प्रतीक्षा है; भरत अपने लिये उसी आदेश को प्रसाद कहते हैं। उनकी वाणी के आसपास देवताओं की कुचाल भी चलती रहती है, इसलिये यहाँ प्रशंसा करनेवाले हर मन का भाव एक जैसा नहीं है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- भरत जो सभा का संकोच देखकर धैर्य सँभालते हैं और राम से सहज प्रेमपूर्वक सेवा की आज्ञा माँगते हैं।
- श्रीराम जो गुरु और जनक की आज्ञा का मान रखते हैं, भरत की विनती सुनते हैं और उनका हाथ पकड़कर पास बिठाते हैं।
- वसिष्ठ रघुकुल के गुरु, जो जनक और भरत का संवाद सुनाकर निर्णय राम पर छोड़ते हैं।
- जनक मिथिला के राजा, जो भरत की वाणी और उनके भाईपन की महिमा सराहते हैं।
- सरस्वती जो भरत की बुद्धि फेरने की प्रार्थना अस्वीकार करती हैं और बाद में उनके स्मरण करने पर वाणी में आती हैं।
- इन्द्र और देवता जो अपने स्वार्थ के लिये षड्यन्त्र रचते हैं और अन्त तक भीतर की मलिनता नहीं छोड़ते।
हाथ में दर्पण, पकड़ से बाहर प्रतिबिम्ब
राजा जनक भरत के शब्द सुनते हैं और उनके स्वभाव को देखते हैं। दोनों का मिलना ही सराहना का कारण है। केवल कहने का ढंग सुन्दर होता तो प्रशंसा के बाद उत्तर दिया जा सकता था। यहाँ वाणी के पीछे जो निष्ठा है, वही सुननेवालों को रोक लेती है। जनक के साथ समाज भी भरत की सराहना करता है। तुलसी इस वाणी के लिये ऐसे विशेषण एक साथ रखते हैं जो पहली दृष्टि में विपरीत लगते हैं: सुगम और अगम, कोमल और कठोर। फिर उसकी सुन्दरता और संक्षिप्तता को जोड़ते हैं।
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ । सहित समाज सराहत राऊ॥
चौपाई १
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे । अरथु अमित अति आखर थोरे॥
अक्षर बहुत थोड़े हैं और अर्थ अपार है। सुगम होने का अर्थ यह है कि शब्द समझ में आते हैं; अगम होने का अनुभव तब होता है जब उनके अनुसार उत्तर देने की बारी आती है। मृदुता में भरत का स्नेह है, कठोरता में ऐसी बात का भार जिसे टाल देना सहज नहीं। जनक और सभा दोनों इस भार को पहचानते हैं। वाणी की प्रशंसा यहाँ उत्तर का स्थान घेर लेती है, क्योंकि सुननेवाले जो समझ रहे हैं उसे किसी निर्णय में बाँध नहीं पा रहे।
अब दर्पण का चित्र आता है। अपना मुख दर्पण में दिखाई देता है। दर्पण अपने ही हाथ में है। इतने निकट होने पर भी उसके भीतर दिखता मुख हाथ से पकड़ा नहीं जा सकता। पोद्दार जी की टीका साफ़ करती है कि पकड़ से बाहर रहनेवाली वस्तु मुख का प्रतिबिम्ब है। भरत की वाणी भी ऐसी ही है: सुनाई पड़ रही है, उसके शब्द सामने हैं, फिर भी उनका पूरा आशय पकड़ में नहीं आता। निकटता और पहुँच के बीच बची हुई यह दूरी ही उपमा का आश्चर्य है।
ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥
चौपाई २
भूप भरतु मुनि सहित समाजू । गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू॥
किसी से उत्तर देते नहीं बनता, टीका इसी ठहराव को स्पष्ट करती है। तब राजा जनक, भरत और गुरु वसिष्ठ समाज सहित उस ओर जाते हैं जहाँ श्रीराम हैं। कवि राम को देवतारूपी कुमुदों को खिलानेवाला चन्द्रमा कहते हैं। यह उपमा आगे देवताओं के भय के साथ पढ़ने पर विशेष ध्यान खींचती है। जिनसे उनका सुख है, उन्हीं को सबके प्रेम से घिरा देखकर वे घबरा रहे हैं। राम का हितकारी स्वरूप अपनी जगह है; देवताओं की चिन्ता उनके अपने स्वार्थ से उपजती है।
इधर यह समाचार पाकर लोग सोच में व्याकुल हो जाते हैं। तुलसी उनकी दशा मछलियों से बताते हैं और साथ में नये जल का संयोग रखते हैं। टीका बताती है कि यह पहली वर्षा का जल है। उपमा में जल आते ही शान्ति का निष्कर्ष नहीं दिया गया; यहाँ उससे मछलियों की व्याकुलता दिखाई गयी है। समाज की दशा भी ऐसी ही अस्थिर है। जनक, गुरु और भरत राम की ओर बढ़ रहे हैं, और पीछे लोगों का मन इस विचार में उलझा हुआ है कि अब क्या निर्णय निकलेगा।
भरत की थोड़े शब्दों में कही गयी बात का अर्थ अपार है। जनक और सभा उसे सराहते हैं, पर उत्तर नहीं दे पाते। हाथ के दर्पण में दिखाई देता किन्तु पकड़ा न जा सकनेवाला प्रतिबिम्ब इस कठिनाई का चित्र है; अन्ततः सब राम के पास जाते हैं।
सरस्वती का स्पष्ट इनकार
देवता पहले कुलगुरु वसिष्ठ की प्रेमविह्वल दशा देखते हैं। फिर जनक का विशेष स्नेह उनके सामने आता है। उसके बाद वे भरत को देखते हैं, जो राम की भक्ति से भरे हुए हैं। यह क्रम उन्हें चारों ओर एक ही भाव दिखाता है। गुरु प्रेम में हैं, विदेह राजा प्रेम में हैं, और जिन भरत पर निर्णय का बहुत कुछ निर्भर है, वे रामभक्तिमय हैं। अन्त में देवता सबको राम के प्रेम में सराबोर देखते हैं और उनकी निराशा इतनी बढ़ जाती है कि कवि उसका कोई हिसाब नहीं बताते।
यहाँ देवताओं को स्वार्थी कहना कवि का अपना मूल्यांकन है। वे दूसरों के स्नेह को देखकर उनके सुख में सम्मिलित नहीं हो पाते। उन्हें अपने काम का डर है। देवराज इन्द्र इसी चिन्ता को शब्द देते हैं: राम स्नेह और संकोच के वश हैं; सब मिलकर प्रपञ्च रचें, नहीं तो काम बिगड़ जाएगा। उनकी दृष्टि में सभा का प्रेम ऐसी शक्ति हो गया है जिसके विरुद्ध अब छल का उपाय करना पड़ेगा।
रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु।
दोहा २९४
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु॥ २९४॥
देवता सरस्वती का स्मरण करते हैं, उनकी स्तुति करते हैं और शरणागत होने की दुहाई देते हैं। प्रार्थना में रक्षा का शब्द है, पर माँगा क्या जा रहा है, इसे वे छिपाते नहीं: अपनी माया से भरत की बुद्धि फेर दीजिये। छल की छाया करके देवताओं के कुल को बचाइये। दूसरे के मन को अपनी आवश्यकता के अनुसार बदलवाने की इच्छा ही इस विनती का केन्द्र है। भरत की दृढ़ता का उत्तर वे भरत से संवाद करके नहीं खोज रहे; वाणी और बुद्धि की देवी से उसे भ्रमित कर देने को कह रहे हैं।
बुद्धिमती सरस्वती देवताओं की विनती सुनती हैं और उन्हें स्वार्थ के वश मूर्ख हुआ जानती हैं। उनका उत्तर इन्द्र की सामर्थ्य पर सीधा प्रश्न रखता है। हजार नेत्र होने पर भी सुमेरु नहीं सूझता। इतनी बड़ी, सामने उपस्थित वस्तु न दिखाई दे, तो देखने के साधन बढ़ जाने से क्या लाभ हुआ? भरत की बुद्धि की ऊँचाई देवताओं के सामने है, और वे उसी को छोटा समझकर फेरने की बात कर रहे हैं। सरस्वती इस भूल को उनके आग्रह की जड़ में पहचानती हैं।
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी । सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥
चौपाई ३
सो मति मोहि कहत करु भोरी । चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥
फिर वे बात को और स्पष्ट करती हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माया अत्यन्त प्रबल है, फिर भी भरत की बुद्धि की ओर देख तक नहीं सकती। उसी बुद्धि को भुलावे में डाल देने के लिये उनसे कहा जा रहा है। चन्द्रमा की चाँदनी क्या प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्य को चुरा सकती है? इस प्रश्न में चाँदनी और सूर्य दोनों प्रकाश हैं, पर उनकी शक्ति एक समान नहीं। देवताओं का प्रस्ताव उस असमानता को अनदेखा करता है जिसे सरस्वती एक ही चित्र में उनके सामने रख देती हैं।
भरत के हृदय में सीता और राम का निवास है। सरस्वती के उत्तर का अन्त इसी विश्वास पर ठहरता है: जहाँ सूर्य का प्रकाश है, वहाँ अँधेरा कैसे रह सकेगा? भरत की बुद्धि को भ्रमित करने की सम्भावना वे स्वीकार ही नहीं करतीं। यह कहकर वे ब्रह्मलोक चली जाती हैं। देवताओं की व्याकुलता अब रात्रि के चकवे जैसी है। जिस सहायता की याचना की थी वह नहीं मिली, और जिस हृदय को बदलवाना चाहते थे उसकी अडिगता का ही प्रमाण सुनना पड़ा।
इसके बाद देवता अपने मलिन मन से बुरी सलाह करते हैं और बुरा षड्यन्त्र रचते हैं। बात केवल योजना में नहीं रहती। वे प्रबल मायाजाल बनाकर भय, भ्रम, अप्रीति और उचाट फैला देते हैं। टीका अप्रीति और उच्चाटन के अर्थ से इस अशान्ति को खोलती है। मन में डर उपजता है, समझ उलझती है, प्रेम के स्थान पर अरुचि आती है और चित्त टिक नहीं पाता। सरस्वती यह कार्य करनेवालों में नहीं हैं; वे अपना इनकार करके जा चुकी हैं।
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।
दोहा २९५
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु॥ २९५॥
सरस्वती भरत की बुद्धि बदलने से इनकार करती हैं। उनके हृदय में सीताराम का प्रकाश है, जहाँ अँधेरा टिक नहीं सकता। देवी के ब्रह्मलोक चले जाने पर देवता स्वयं षड्यन्त्र करके भय, भ्रम, अप्रीति और उचाट का मायाजाल फैलाते हैं।
सभा की दृष्टि फिर भरत पर
कुचाल कर लेने पर भी इन्द्र निश्चिन्त नहीं होते। उनके मन में अब भी यही विचार है कि काम का बनना और बिगड़ना सब भरत के हाथ में है। माया फैला देने से वह व्यक्ति उनकी पकड़ में नहीं आ गया जिसकी बुद्धि बदलवाने के लिये उन्होंने देवी को पुकारा था। इन्द्र की चिन्ता के बाद कथा फिर जनक और उनके साथियों की ओर आती है। वे राम के समीप पहुँचते हैं, और सूर्यकुल के दीपक श्रीराम सबका सम्मान करते हैं।
गुरु वसिष्ठ अब बोलते हैं। तुलसी उनके वचनों को समय, समाज और धर्म के अनुकूल कहते हैं। सामने केवल एक भाई की इच्छा का प्रश्न नहीं है; उपस्थित लोगों की दशा, अवसर की माँग और धर्म की मर्यादा एक साथ विचार में हैं। वसिष्ठ पहले जनक और भरत का संवाद राम को सुनाते हैं, फिर भरत की सुन्दर बातों को रखते हैं। इससे राम के सामने उस चर्चा का पूरा आशय आता है जिसे लेकर सब उनके पास पहुँचे हैं।
इसके बाद गुरु अपना मत बताते हैं। राम जो आज्ञा दें, वही सब करें। इतने लोगों के बीच निर्णय का केन्द्र राम को बनाया जाता है। यह सुनकर राम दोनों हाथ जोड़ते हैं और सत्य, सरल, कोमल वाणी में उत्तर देते हैं। उनके उत्तर की कोमलता उसके आशय को कम दृढ़ नहीं करती। वे गुरु और मिथिलेश्वर की उपस्थिति का स्मरण कराते हैं: आप दोनों के रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकार से अनुचित होगा।
राम गुरु की शपथ करके कहते हैं कि आपकी और महाराज की जो आज्ञा होगी, वही सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी। गुरु ने सबको राम के आदेश पर चलने को कहा था; राम गुरु और जनक के आदेश का सम्मान सामने रख देते हैं। दोनों ओर आज्ञा मानने की ऐसी तत्परता है कि उत्तर देना और कठिन हो जाता है। कोई अपने आदर को पीछे हटाकर दूसरे पर आदेश का भार नहीं डाल पा रहा।
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
दोहा २९६
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥ २९६॥
राम की शपथ सुनकर वसिष्ठ और जनक ही नहीं, पूरी सभा संकोच में पड़ जाती है। किसी से उत्तर नहीं बनता। सब भरत का मुख देखते हैं। इसी प्रसंग के आरम्भ में भरत की वाणी का आशय पकड़ना कठिन था; अब राम के उत्तर के बाद फिर उन्हीं से बात सँभालने की अपेक्षा है। इतने आदर और स्नेह के बीच उनका बोलना सहज कैसे हो? पर उसी स्नेह से शिथिल हुई सभा को अगला वचन भी उन्हीं से चाहिए।
वसिष्ठ जनक और भरत की चर्चा सुनाकर सबको राम की आज्ञा मानने का परामर्श देते हैं। राम दोनों हाथ जोड़कर गुरु और जनक की आज्ञा शिरोधार्य करने की शपथ लेते हैं। संकोच में पड़ी सभा से उत्तर नहीं बनता और सब भरत की ओर देखते हैं।
धैर्य, विवेक और वाणी की हंसिनी
भरत सभा को संकोच के वश देखते हैं। अवसर कठिन है, इसलिये वे भारी धैर्य धारण करते हैं और अपने उमड़ते प्रेम को सँभालते हैं। तुलसी इसके लिये बढ़ते विन्ध्याचल को रोकनेवाले अगस्त्य का रूपक लाते हैं। प्रेम का उमड़ना यहाँ छोटा आवेग नहीं माना गया; उसकी तुलना बढ़ते पर्वत से हुई है। उसे सँभालने के लिये धैर्य भी उसी अनुपात में बड़ा चाहिए। भरत का स्नेह बना रहता है, और उसी के भीतर बोल सकने का संयम आता है।
अगला रूपक सभा की बुद्धि की दशा बताता है। शोक हिरण्याक्ष है और बुद्धि पृथ्वी। उस पृथ्वी से निर्मल गुणों का संसार उत्पन्न होता है, पर शोक ने उसे हर लिया है। केवल निर्णय अटका है, इतना कहने से बात पूरी नहीं होती। वह आधार ही संकट में है जिससे अच्छे गुणों का आचरण सम्भव होता है। इसलिए भरत के विवेक को विशाल वराह कहा गया है, जो उसी समय बिना परिश्रम इस बुद्धिरूपी पृथ्वी का उद्धार कर देता है।
सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी॥
चौपाई ४
भरत बिबेक बराहँ बिसाला । अनायास उधरी तेहि काला॥
दोनों चित्रों को साथ रखिये तो भरत के भीतर और सभा के भीतर हो रहा काम अलग दिखाई देता है। अपने प्रेम को सँभालना उनके धैर्य का काम है; शोक से घिरी बुद्धि को उबारना उनके विवेक का। पोद्दार जी की टीका शोक के रूप में हिरण्याक्ष और विवेक के रूप में वराह को पहचानकर यह आशय स्पष्ट करती है। इसी उद्धार में वह शोकरूपी हिरण्याक्ष का नाश भी बताती है। ये तुलनाएँ वर्तमान सभा की स्थिति खोलती हैं। इनके सहारे हम भरत के संयम का आकार देखते हैं, जो आगे की विनती को सम्भव बनाता है।
भरत सबको प्रणाम करके हाथ जोड़ते हैं। राम, राजा जनक, गुरु वसिष्ठ और साधु संत, सभी से विनती करते हैं कि आज उनके अत्यन्त अनुचित बर्ताव को क्षमा करें। वे कहते हैं कि कोमल मुख से कठोर वचन कह रहे हैं। टीका इस कोमलता को छोटे मुख और कठोरता को धृष्टतापूर्ण बात कहने के अर्थ से खोलती है। बड़े और पूज्य जनों के सामने अपनी सीमा का बोध पहले है, अपनी बात रखने का आग्रह उसके बाद।
फिर भरत अपने हृदय में सरस्वती का स्मरण करते हैं। देवी उनके मनरूपी मानसरोवर से मुख के कमल पर आती हैं। अभी देवताओं ने भी इन्हीं देवी को पुकारा था। वहाँ आग्रह भरत की बुद्धि को भ्रमित करने का था, और देवी ने उसे अस्वीकार किया। अब स्वयं भरत स्मरण करते हैं, और उनकी वाणी में देवी का आगमन होता है। दोनों प्रसंगों में माँग का स्वभाव अलग है, इसलिये देवी की इन दो भूमिकाओं को अलग पहचानना आवश्यक है।
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई । मानस तें मुख पंकज आई॥
चौपाई ५
बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली॥
भरत की वाणी सुन्दर हंसिनी है। उसमें निर्मल विवेक, धर्म और नीति हैं। टीका हंसिनी की उपमा को गुण और दोष का विवेचन करनेवाली वाणी के रूप में समझाती है। मन का मानसरोवर, मुख का कमल और वाणी की हंसिनी, तीनों चित्र मिलकर बताते हैं कि भाव से निकलनेवाली बात विवेक सहित कैसे सामने आती है। भरत के प्रेम की गहराई अभी बनी हुई है; उसके साथ उचित और अनुचित को पहचानने की क्षमता भी बोल रही है।
भरत विवेक की दृष्टि से पूरे समाज को देखते हैं। सब प्रेम के कारण शिथिल हैं। वे प्रणाम करते हैं, सीता और रघुनाथ का स्मरण करते हैं और तब अपना निवेदन आरम्भ करते हैं। दोहा दो सौ सत्तानवे यही क्रम रखता है। सभा की दशा पहचानना, प्रणाम करना, सीताराम का स्मरण और फिर बोलना, इन सबके बाद जो वाणी आती है वह पहले से अधिक सँभली हुई है। उसकी विनम्रता में भरत का पूरा उत्तरदायित्व भी है।
भरत भारी धैर्य से प्रेम सँभालते हैं और विवेक से शोकग्रस्त सभा की बुद्धि उबारते हैं। सबको प्रणाम कर क्षमा माँगने के बाद वे सरस्वती का स्मरण करते हैं। निर्मल विवेक, धर्म और नीति से युक्त उनकी वाणी हंसिनी के समान सामने आती है।
जिसने दूषण को भूषण कर दिया
भरत राम को प्रभु कहकर सम्बोधित करते हैं और अपने सारे आश्रय उन्हीं में गिनाते हैं। आप पिता हैं, माता हैं, सुहृद हैं, गुरु और स्वामी हैं। आप पूज्य हैं, परम हित करनेवाले हैं और अन्तर्यामी हैं। हर सम्बन्ध में एक अलग भरोसा है: अपनापन, हित, मार्गदर्शन, अधिकार और हृदय की बात जान लेना। भरत इन भरोसों को एक साथ सामने रखते हैं। जिसके सामने उन्हें अपना दोष कहना है, वही उनके लिये इन सब सम्बन्धों का स्थान है।
प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी । पूज्य परम हित अंतरजामी॥
चौपाई ६
सरल सुसाहिबु सील निधानू । प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥
प्रशंसा यहीं पूरी नहीं होती। भरत उन्हें सरलहृदय श्रेष्ठ स्वामी कहते हैं, शील का भण्डार, प्रणतों की रक्षा करनेवाला, सर्वज्ञ और सुजान कहते हैं। राम समर्थ हैं और शरणागतों का हित करते हैं। वे गुणों का आदर करते हैं तथा अवगुण और पाप हर लेते हैं। इस पूरी पहचान में सामर्थ्य के साथ उसके उपयोग का स्वरूप भी है। सब कुछ जाननेवाले के सामने दोष छिप नहीं सकता; फिर भी उनकी शरण ली जा सकती है, क्योंकि वे उसी दोष को हरनेवाले हैं।
भरत कहते हैं कि आपके समान स्वामी आप ही हैं। फिर उसी वाक्य की दिशा अपनी ओर मोड़ते हैं: स्वामी के साथ द्रोह करने में मेरे समान मैं ही हूँ। राम की अनुपमता और अपना दोष, दोनों को वे पूरी तीव्रता से रखते हैं। यह उनके अपने विषय में कही हुई बात है। अभी जिस भरत की बुद्धि को सरस्वती ने अजेय कहा था, वही स्वयं को द्रोह में अनुपम कह रहे हैं। उनके आत्मनिवेदन का भार इसी विनय में है कि वे अपने पक्ष की प्रशंसा लेकर नहीं बोलते।
वे अपने यहाँ आने को मोह का परिणाम बताते हैं। प्रभु और पिता के वचनों का उल्लंघन किया, समाज इकट्ठा किया और यहाँ चला आया। वे इस आगमन को अपनी ओर से उचित ठहराने का प्रयत्न नहीं करते। इसके बाद जगत् के भले और बुरे, ऊँचे और नीचे, अमृत और देवताओं का पद, विष और मृत्यु, सबको एक साथ गिनाते हैं। पोद्दार जी की टीका अमरपद को देवताओं का पद बताती है। भरत कहते हैं कि कहीं किसी को ऐसा देखा या सुना नहीं जो मन में भी राम की आज्ञा मिटा दे।
इतनी व्यापक बात कहकर भरत फिर अपनी ढिठाई पर आते हैं। वही काम उन्होंने सब प्रकार से किया, और राम ने उसे स्नेह और सेवा मान लिया। यहाँ उनके लिये आश्चर्य अपने आगमन की सफलता में नहीं, राम की दृष्टि में है। जिस बात को वे अपना दोष कह रहे हैं, स्वामी ने उसी में सेवक का प्रेम देखा। अपने आचरण का नाम वे ढिठाई रखते हैं और राम द्वारा उसे ग्रहण करने का नाम कृपा। दोनों अर्थ साथ सुनने पर उनकी कृतज्ञता का कारण खुलता है।
कृपाँ भलाईं आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
दोहा २९८
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर॥ २९८॥
हे नाथ, आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया। भरत के लिये चारों ओर फैला अपना सुन्दर यश भी राम के ही स्वभाव का फल है। दूषण भूषण के समान हो गये। दो शब्दों की निकटता में पूरा परिवर्तन आ जाता है: जिस चीज़ से लज्जित होना चाहिए था, वही आदर का कारण बन गयी। भरत उस आदर को अपनी कमाई नहीं कहते। उनके कथन में उसका स्रोत लगातार राम की कृपा है, और इसी से आगे शरणागतों पर राम के व्यवहार का वर्णन निकलता है।
भरत राम को अपने सभी आश्रयों का स्थान और गुणों का आदर करनेवाला स्वामी कहते हैं। वे समाज सहित आने को अपना आज्ञाभंग मानते हैं और राम की कृपा का आश्चर्य बताते हैं: जिस ढिठाई को उन्होंने दोष माना, राम ने उसे स्नेह और सेवा बनाकर सम्मान दिया।
एक प्रणाम पर अपना लेनेवाला स्वामी
अब भरत अपने अनुभव के साथ राम की उस रीति को रखते हैं जिसकी बड़ाई जगत् में प्रसिद्ध है और जिसे वेद तथा शास्त्र गाते हैं। शरण में आनेवाला पहले कैसा रहा हो, यह बताने के लिये वे कठोर विशेषणों की पूरी पंक्ति कहते हैं। उनके वर्णन में क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी और निःशंक व्यक्ति भी आते हैं। पोद्दार जी निरीश्वरवादी का अर्थ नास्तिक और निःशंक का अर्थ निडर करते हैं। ये भरत के कथन में आये नौ परिचय हैं, जिनसे वे राम के आश्रय की व्यापकता समझाते हैं।
ऐसे लोगों के भी शरण में सम्मुख आने की बात सुनकर राम ने उन्हें अपना लिया। कितना लम्बा परिचय देना पड़ा, कितनी बार विनय करनी पड़ी, भरत उस ओर कोई कठिन शर्त नहीं रखते। एक बार प्रणाम करते ही स्वीकार कर लिया। इतने कड़े विशेषणों के बाद यह एक प्रणाम आता है, और पूरा वाक्य उसी पर बदल जाता है। शरण लेने की उस एक क्रिया को स्वामी ने अपना बना लेने के लिये पर्याप्त माना।
तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए॥
चौपाई ७
देखि दोष कबहुँ न उर आने । सुनि गुन साधु समाज बखाने॥
स्वीकार करने के बाद भी व्यवहार का वर्णन बाकी है। भरत कहते हैं कि आपने उनके दोष देखे, पर कभी हृदय में नहीं रखे। उनके गुण सुने और साधुओं के समाज में उनका बखान किया। देखे हुए दोष भीतर नहीं सँजोये गये; सुने हुए गुण दूसरों के सामने कहे गये। दोनों अर्धालियों का क्रम ध्यान देने योग्य है। स्वामी की जानकारी पूर्ण है, फिर भी वह जानकारी सेवक के दोष को स्थायी पहचान नहीं बना देती। उसी सेवक का गुण समाज के सामने सम्मान पाता है।
भरत फिर पूछते हैं कि ऐसा कृपा करनेवाला स्वामी और कौन है। सेवक की सारी आवश्यकता पूरी करने का प्रबन्ध वह स्वयं करे, उसका साज सामान सजाये और स्वप्न में भी उसे अपनी करनी न समझे। पोद्दार जी इस साज को सेवक की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति के अर्थ में खोलते हैं। भरत की प्रशंसा में देने के साथ एक और बात जुड़ी है: देनेवाला अपने दान का बोध सामने नहीं रखता। अपने किये का हिसाब भी वह मन में नहीं बनाता।
उलटे स्वामी को यह सोच है कि कहीं सेवक को संकोच न हो। जिस पर कृपा हुई है, वह उस कृपा के भार से दब न जाए, यह चिन्ता कृपा करनेवाले के हृदय में है। भरत अब भुजा उठाकर दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ कहते हैं कि आपके सिवा ऐसा दूसरा स्वामी कोई नहीं है। विनय में अपने को छोटा कहनेवाले भरत, राम के इस स्वभाव की गवाही पूरे निश्चय से देते हैं।
सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी । भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी॥
चौपाई ८
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना॥
इसके तुरन्त बाद नाचते पशु और पाठ में प्रवीण तोते की उपमा आती है। पशु की नृत्यगतियाँ नचानेवाले के अधीन हैं और तोते की पाठकुशलता पढ़ानेवाले के अधीन है। टीका इन दोनों को उनके अपने प्रशिक्षक से जोड़कर अर्थ स्पष्ट करती है। सेवक में दिखाई पड़नेवाले गुण के पीछे स्वामी की कृपा और सुधार का काम है। भरत अपना सम्मान इसी सम्बन्ध में देखते हैं। जो अच्छा दिखाई देता है, उसकी उत्पत्ति का श्रेय भी वे राम को लौटाते हैं।
दोहा दो सौ निन्यानवे में यही बात पूरी होती है। राम ने सेवकों की बिगड़ी बात सुधारी, उन्हें सम्मान दिया और साधुओं का शिरोमणि बना दिया। भरत पूछते हैं कि कृपालु स्वामी के सिवा अपनी विरदावली का ऐसा दृढ़ पालन कौन करेगा। जिस रीति की प्रसिद्धि वेद और जगत् में है, राम अपने व्यवहार से उसे निभाते हैं। भरत के अपने दूषण भूषण हुए थे; अब वही कृपा हर उस सेवक की कथा में दिखाई गयी है जिसे स्वामी सुधारकर आदर देते हैं।
भरत के कथन में कठिन दोषोंवाला शरणागत भी एक प्रणाम पर अपना लिया जाता है। राम दोष हृदय में नहीं रखते, गुणों की प्रशंसा करते हैं, सेवक की आवश्यकताएँ पूरी करते हैं और उसके संकोच की भी चिन्ता करते हैं। सेवक के गुण और सम्मान को भरत स्वामी की कृपा का फल कहते हैं।
भूल बड़ी थी, दुलार उससे अधिक
शरणागतों पर कृपा का वर्णन करने के बाद भरत फिर अपने आने की बात पर लौटते हैं। वे उसके पीछे तीन सम्भावनाएँ रखते हैं: शोक से, स्नेह से या बालक के स्वभाव से आज्ञा न मानकर यहाँ चले आये। किसी एक कारण को चुनकर बाकी हटा नहीं देते। उनके लिये तीनों दशाओं में किया हुआ काम स्वामी की आज्ञा से हटना ही था। फिर भी कृपालु राम ने अपनी ओर देखकर सब प्रकार से उनका भला माना। सेवक की भूल के सामने स्वामी का अपना स्वभाव निर्णायक हुआ।
भरत कहते हैं कि उन्होंने सुन्दर मंगलों के मूल चरणों का दर्शन किया और जान लिया कि स्वामी सहज ही अनुकूल हैं। बड़े समाज में अपना भाग्य देखने का उनका अर्थ यही है: इतनी बड़ी चूक होने पर भी राम का अनुराग उन्हें मिला। सभा की उपस्थिति इस अनुभव को और स्पष्ट करती है। भरत जिस भूल को अपना मान रहे हैं, उसी के साथ उन्हें सबके बीच स्वामी का प्रेम दिखाई पड़ा है। उनका आश्वासन कोई अनुमान नहीं रहा; उस कृपा का अनुभव वे कर चुके हैं।
वे कृपा और अनुग्रह को भरपूर, सर्वांगपूर्ण और अपनी योग्यता से बहुत अधिक कहते हैं। पोद्दार जी की टीका इस अधिकता को खोलती है: जितने के वे तनिक भी योग्य नहीं मानते अपने को, उससे बहुत अधिक मिला। राम ने अपने शील, स्वभाव और भलाई से उनका दुलार रखा। बात केवल दोष क्षमा हो जाने तक सीमित नहीं है। भरत को अपनापन भी वैसा ही मिला है, और उसी का उल्लेख वे बार बार अपने निवेदन में करते हैं।
फिर वे अपनी अभी की वाणी के लिये भी क्षमा माँगते हैं। स्वामी और समाज का संकोच छोड़कर जैसी रुचि हुई वैसी बात कही, उसमें अविनय रहा हो या विनय। वे यह अधिकार अपने लिये नहीं लेते कि उनकी हर कही बात को विनम्र ही माना जाए। वे अपने आर्तभाव का सहारा रखते हैं: हे देव, मेरी आतुरता जानकर क्षमा कीजियेगा। पहले यहाँ आने का दोष कहा था; अब बोलने की सम्भावित ढिठाई भी उसी कृपा के सामने रख दी।
सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।
दोहा ३००
आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि॥ ३००॥
भरत कहते हैं कि सुहृद, सुजान और श्रेष्ठ स्वामी से बहुत कहना बड़ा अपराध है। टीका सुहृद को बिना कारण हित करनेवाले के अर्थ से स्पष्ट करती है। ऐसे स्वामी के सामने अपने हित के लिये बार बार आग्रह करना उन्हें अनुचित लगता है। इसलिये वे वाणी को एक सीधी माँग में समेटते हैं: अब आज्ञा दीजिये। राम उनकी सारी बात सुधार चुके हैं; अब वे उसी कृपा से अपने आगे के आचरण का आदेश चाहते हैं।
भरत शोक, स्नेह और बालकस्वभाव, तीनों को अपने आज्ञाभंग के सम्भव कारण कहते हैं। बड़ी भूल के बाद भी मिले दुलार के लिये कृतज्ञ होकर वे अपनी वाणी की धृष्टता की क्षमा माँगते हैं और अन्ततः राम से आज्ञा चाहते हैं।
सेवा की इच्छा और आज्ञा का प्रसाद
भरत अब प्रभु के चरणकमलों की रज की दुहाई देते हैं। वह रज उनके लिये सत्य, पुण्य और सुख की सुहावनी सीमा है। इतनी पवित्र साक्षी देकर वे अपने हृदय की रुचि कहते हैं, वह इच्छा जो जागते, सोते और स्वप्न में भी बनी रहती है। तीनों अवस्थाएँ गिनाने से इच्छा का स्थायित्व सामने आता है। यह सभा के संकोच में निकला क्षणिक प्रस्ताव नहीं कहा गया; भरत इसे अपने भीतर सदा रहनेवाली चाह के रूप में रखते हैं।
उस चाह में स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा है। साथ ही भरत बताते हैं कि वे उससे क्या हटाना चाहते हैं: स्वार्थ, छल और चारों फल। पोद्दार जी की टीका इन फलों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष कहकर पहचानती है। सेवा से कोई निजी लाभ मिले, इच्छाएँ पूरी हों, पुण्य का फल मिले या मुक्ति प्राप्त हो, इस प्रकार की फलकामना तक वे अलग रख देते हैं। उनकी कही हुई रुचि अपने सहज स्नेह में ही पूरी है।
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥
चौपाई ९
अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा॥
अब उसी रुचि का व्यवहार सामने आता है। श्रेष्ठ स्वामी की आज्ञा मानने के समान कोई सेवा नहीं, भरत कहते हैं। इसलिये आज्ञारूपी प्रसाद सेवक को मिल जाए। प्रसाद का यह अर्थ उनके निवेदन को बहुत स्पष्ट कर देता है। वे अपने लिये कृपा चाहते हैं, और उस कृपा का रूप आदेश है। सेवा करने की उत्कट इच्छा को वे स्वामी के निर्णय से जोड़ते हैं; जो आदेश मिले, उसके अनुसार चलना ही उस प्रेम को निभाने का मार्ग है।
यह कहकर भरत प्रेम के अत्यन्त विवश हो जाते हैं। उनका शरीर पुलकित होता है, नेत्रों में जल भर आता है और वे अकुलाकर राम के चरणकमल पकड़ लेते हैं। जो धैर्य सभा को देखकर सँभाला था, उसके बाद पूरी बात कही जा चुकी है। अब प्रार्थना का भाव शरीर में प्रकट होता है। तुलसी उस समय और स्नेह को कह सकने की सीमा स्वीकार करते हैं। रोमांच, आँसू और चरण पकड़ना बता देने पर भी उस क्षण की सम्पूर्णता वर्णन में नहीं समाती।
कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी॥
चौपाई १०
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ । सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ॥
कृपासिन्धु राम सुन्दर वाणी से भरत का सम्मान करते हैं। फिर उनका हाथ पकड़कर अपने समीप बिठाते हैं। पहले भरत ने चरण पकड़े थे, अब राम उनका हाथ पकड़ते हैं। यह सम्बन्ध क्रियाओं में स्पष्ट दिखाई देता है: विनती करते हुए सेवक का समर्पण और स्वामी का उसे पास स्थान देना। भरत का स्वभाव देखकर तथा उनकी प्रार्थना सुनकर राम और पूरी सभा स्नेह से शिथिल हो जाते हैं। जिस सभा की दशा सँभालकर भरत ने वाणी आरम्भ की थी, वह अब उस वाणी को पूरा सुनकर फिर प्रेम में भर गयी है।
भरत की स्थायी इच्छा स्वार्थ, छल और अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के फलों से रहित सहज प्रेम की सेवा है। वे आज्ञापालन को श्रेष्ठ सेवा मानकर आदेश का प्रसाद माँगते हैं। प्रेमविवश होकर चरण पकड़ने पर राम उनका हाथ पकड़ते हैं और अपने पास बिठाते हैं।
फूल बरसे, मन की मलिनता बनी रही
छन्द में तुलसी सबकी प्रतिक्रिया को एक साथ सामने लाते हैं। राम, साधुओं का समाज, मुनि वसिष्ठ और मिथिलापति जनक स्नेह से शिथिल हैं। मन ही मन वे भरत के भाईपन और उनकी भक्ति की अतिशय महिमा सराहते हैं। सभा ने उनके शब्दों के साथ उनका स्वभाव भी देखा है। आरम्भ में जनक और समाज ने इसी स्वभाव की प्रशंसा की थी; अब राम सहित सभी उसके प्रेम में भीग गये हैं।
रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी।
छन्द, सोरठा ३०१ से पहले
मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी॥
भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से।
तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से॥
देवता भी भरत की प्रशंसा करते हैं और उन पर फूल बरसाते हैं। पर छन्द इसी के साथ उनके मन की मलिनता कह देता है। बाहर दिखाई देनेवाली पुष्पवृष्टि से उनके भीतर का भाव समझ लिया जाए, तो कथा का आवश्यक भेद छूट जाएगा। भरत के प्रेम को सुनकर सभा द्रवित है; देवताओं की प्रशंसा के साथ भी उनका स्वार्थ बना हुआ है। जिनसे पहले भय और भ्रम का जाल रचा गया था, उनके मन के विषय में कवि अब भी वही चेतना रखते हैं।
भरत का भाषण सुनकर सब व्याकुल हैं और संकोच से ऐसे सिमट गये हैं जैसे रात्रि आने पर कमल। यह उपमा किसी नयी रात्रि का समय नहीं बताती; लोगों की दशा को सामने लाती है। भरत अपनी प्रार्थना पूरी करके राम के समीप बैठ गये हैं, पर समाज की कठिनाई अभी हल नहीं हुई। प्रेम ने सबको भर दिया है और उसी प्रेम से उत्तर देने का संकोच भी बढ़ा है।
देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।
सोरठा ३०१
मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत॥ ३०१॥
अन्तिम सोरठे में दोनों समाजों के सभी नर नारी दीन और दुःखी दिखाई देते हैं। इन्द्र उन्हें इस दशा में देखकर भी अपना मंगल चाहते हैं। कवि की कठोर उक्ति का आशय पहले से टूटे हुए लोगों को और चोट पहुँचाना है। उस पीड़ा का चित्र मरे हुओं को मारने की भाषा में दिया गया है। इन्द्र के लिये दूसरों की यह विवशता भी अपने हित का अवसर बनी हुई है, और इसीलिये उनके मन को यहाँ अत्यन्त मलिन कहा गया है।
राम, गुरु, जनक और साधु भरत के भाईपन तथा भक्ति की महिमा हृदय से सराहते हैं। देवताओं की प्रशंसा और पुष्पवृष्टि के भीतर मलिनता बनी रहती है। दोनों समाज दुःखी हैं, और इन्द्र उनकी विवशता में भी अपना हित खोजते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में भरत की वाणी का अपना क्रम है। पहले वे स्वामी का स्वभाव कहते हैं, फिर अपना दोष। इसके बाद शरणागतों पर कृपा का विस्तार रखते हैं और दोबारा अपने अनुभव पर लौटते हैं। इसी रास्ते से उनकी माँग का अर्थ खुलता है। जिसे स्वामी की सहज अनुकूलता का इतना विश्वास है, वह अपनी भूल भी पूरी कह सकता है। विनती में हर लौटना राम के उसी स्वभाव को और निकट से पहचानने का अवसर बनता है।
हम भरत के वचनों में कृपा की एक बहुत कोमल पहचान देख सकते हैं। स्वामी सेवक की आवश्यकता पूरी करके अपने किये का बोध भी नहीं रखते और उलटे सेवक के संकोच की चिन्ता करते हैं। भरत को मिला सम्मान इसी संवेदना के भीतर समझ आता है। दोष बतानेवाला हृदय अपमानित नहीं हुआ; उसे सुन्दर वाणी से सम्मान मिला और हाथ पकड़कर समीप बिठाया गया। सेवा की उनकी इच्छा इस भरोसे के साथ कही गयी है।
सरस्वती के दो प्रसंग भी देर तक साथ रहते हैं। देवता किसी दूसरे की बुद्धि फेरने को कहते हैं; भरत अपने निवेदन के समय देवी का स्मरण करते हैं। पहली माँग अस्वीकार होती है, दूसरी बार निर्मल विवेक, धर्म और नीति की वाणी सामने आती है। अन्त में बरसते फूलों को देखते हुए भी हमें कवि का बताया मन याद रहता है। प्रेम का परिचय केवल प्रशंसा में नहीं मिल जाता; यहाँ भरत की आज्ञा पाने की इच्छा और इन्द्र की अपने मंगल की इच्छा उसका अन्तर खोल देती हैं।
भरत ने अपनी रुचि कह दी है: जागते, सोते और स्वप्न में सहज प्रेम से सेवा। उस सेवा का रूप जानने के लिये वे राम के आदेश की प्रतीक्षा करते हैं। उनके हाथ ने चरण पकड़े थे; राम ने उसी विनती को सुनकर उनका हाथ थामा और पास बिठाया। सभा के बीच इस निकटता में पूरा स्नेह दिखाई देता है।
सोरठा समाप्त होते समय दोनों समाजों का दुःख बना हुआ है। भरत की विनती पूरी हुई, पर निर्णय अभी सामने नहीं आया। एक ओर उनकी भक्ति की महिमा मन में सराहते राम, गुरु, जनक और साधु हैं; दूसरी ओर दूसरों की व्यथा में अपना हित खोजते इन्द्र। इसी अधूरे निर्णय और पूर्ण कही गयी प्रार्थना पर यह प्रसंग ठहरता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २९४ से सोरठा ३०१ तक का प्रसंग, सम्बद्ध चौपाइयाँ और छन्द, तथा हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।