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देवताओं का छल और भरत का समर्पण

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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 33

जनक और उनका समाज भरत की वाणी सराहते हैं, जो दर्पण में मुख की तरह पकड़ में नहीं आती। सरस्वती देवताओं की विनती अस्वीकार करती हैं, और स्वार्थी देवता भय, भ्रम, अप्रीति और उचाट का प्रपंच रचते हैं। राम गुरु की शपथ लेकर कहते हैं कि गुरु और जनक की आज्ञा उनके सिर पर है। भरत राम से आज्ञा माँगते हैं, और राम उनका हाथ पकड़कर उन्हें पास बिठाते हैं।

दर्पण अपने ही हाथ में हो, पर उसमें मुख पकड़ा नहीं जाता। भरत की अद्भुत वाणी ऐसी ही है, और राजा जनक समाज सहित उसकी सराहना करते हैं। देवता सरस्वती से भरत की बुद्धि फेरने की विनती करते हैं, और सरस्वती उन्हें मना कर देती हैं। मलिन मन के स्वार्थी देवता भय, भ्रम, अप्रीति और उचाट का प्रपंच रचते हैं। गुरु और जनक के सामने राम शपथ लेकर कहते हैं कि उनकी जो आज्ञा होगी, वह उनके सिर पर है। सब भरत का मुँह देखते हैं।

अयोध्याकाण्ड के इस प्रसंग में भरत हृदय में सरस्वती का स्मरण करके राम से अपनी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि मोह के वश उन्होंने राम के और पिता के वचनों का उल्लंघन किया, और राम ने उस ढिठाई को स्नेह और सेवा मान लिया। वे कहते हैं कि राम एक बार प्रणाम करने पर शरण में आये लोगों को अपना लेते हैं। वे राम से आज्ञा माँगते हैं, और कहते हैं कि उनकी रुचि सहज प्रेम से स्वामी की सेवा है। देवता मलिन मन से फूल बरसाते हैं, और इन्द्र मरे हुओं को मारकर मंगल चाहते हैं।

सभा में विनती, आकाश में षड्यन्त्र

  • भरत जो सभा को संकोच के वश देखकर भारी धीरज धरते हैं और प्रेम सँभालते हैं। वे राम से आज्ञा माँगते हैं, और कहते हैं कि उनकी रुचि सहज प्रेम से स्वामी की सेवा है।
  • राम जो गुरु और जनक की आज्ञा का मान रखते हैं, भरत की विनती सुनते हैं और उनका हाथ पकड़कर पास बिठाते हैं।
  • वसिष्ठ रघुकुल के गुरु, जो जनक और भरत का संवाद सुनाते हैं और अपना मत कहते हैं कि राम जो आज्ञा दें, वही सब करें।
  • जनक मिथिला के राजा, जो भरत की वाणी और उनके भाईपन की महिमा सराहते हैं।
  • सरस्वती जो भरत की बुद्धि फेरने की प्रार्थना अस्वीकार करती हैं और बाद में उनके स्मरण करने पर वाणी में आती हैं।
  • इन्द्र और देवता जो स्वार्थी हैं, और मलिन मन से बुरी सलाह करके बुरा षड्यन्त्र रचते हैं। इन्द्र मरे हुओं को मारकर मंगल चाहते हैं।

हाथ में दर्पण, पकड़ से बाहर मुख

राजा जनक भरत के वचन सुनते हैं और उनका स्वभाव देखते हैं, और समाज सहित सराहना करते हैं। भरत के वचन सुगम और अगम, कोमल, सुन्दर और कठोर हैं।

उनमें अर्थ अपार है, और अक्षर बहुत थोड़े।

जैसे अपने हाथ के दर्पण में मुख पकड़ा नहीं जाता, वैसे ही भरत की यह अद्भुत वाणी पकड़ में नहीं आती। पोद्दार की टीका के अनुसार पकड़ से बाहर रहनेवाला मुख का प्रतिबिम्ब है, और शब्दों से वाणी का आशय समझ में नहीं आता।

टीका के अनुसार किसी से कुछ उत्तर देते नहीं बना। तब राजा जनक, भरत और गुरु वसिष्ठ समाज सहित वहाँ जाते हैं जहाँ देवताओं के कुमुदों के चन्द्रमा हैं। टीका इस चन्द्रमा को राम बताती है।

यह समाचार सुनकर सब लोग सोच से व्याकुल हो जाते हैं, मानो नये जल के संयोग से मछलियाँ व्याकुल हों। टीका बताती है कि यह पहली वर्षा का जल है।

सरस्वती का स्पष्ट इनकार

देवता पहले कुलगुरु वसिष्ठ की दशा देखते हैं। जनक का विशेष स्नेह निरखकर वे राम की भक्ति से भरे भरत को निहारते हैं। स्वार्थी देवता घबराकर हृदय में हार जाते हैं।

वे सबको राम के प्रेम से भरा देखते हैं, और अपार सोच के वश हो जाते हैं। देवराज इन्द्र सोच में भरकर कहते हैं, “राम स्नेह और संकोच के वश हैं। सब मिलकर कोई प्रपंच रचिये, नहीं तो काम बिगड़ गया।”

देवता सरस्वती का स्मरण करके उनकी सराहना करते हैं: “हे देवि, शरण में आये देवताओं की रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरत की बुद्धि फेर दीजिये, और छल की छाया करके देवताओं के कुल का पालन कीजिये।”

देवताओं की विनती सुनकर सयानी सरस्वती, उन्हें स्वार्थ से जड़ जानकर, बोलती हैं: “आप मुझसे कहते हैं कि भरत की मति पलट दूँ! हजार नेत्रों से सुमेरु नहीं सूझता?”

वे कहती हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव की माया बड़ी भारी है। वह भी भरत की बुद्धि की ओर ताक नहीं सकती। उसी बुद्धि को भोली करने को उनसे कहा जा रहा है। क्या चाँदनी प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्य को चुरा सकती है?

भरत के हृदय में सीता और राम का निवास है, और जहाँ सूर्य का प्रकाश है, वहाँ अँधेरा कैसे रहेगा? यह कहकर सरस्वती ब्रह्मलोक चली जाती हैं। देवता ऐसे व्याकुल हो जाते हैं मानो रात में चकवे हों।

मलिन मन के स्वार्थी देवता बुरी सलाह करके बुरा षड्यन्त्र रचते हैं। वे माया का प्रबल प्रपंच रचते हैं: भय, भ्रम, अप्रीति और उचाट। टीका उचाट को उच्चाटन कहती है।

राम की शपथ, और सब भरत का मुँह देखते हैं

कुचाल करके इन्द्र सोचते हैं कि काम का बनना बिगड़ना सब भरत के हाथ है। जनक राम के पास जाते हैं, और राम सबका सम्मान करते हैं।

तब गुरु वसिष्ठ ऐसे वचन बोलते हैं जो समय, समाज और धर्म के विरुद्ध नहीं हैं। वे जनक और भरत का संवाद सुनाते हैं, और भरत की कही सुन्दर बात कहते हैं।

फिर गुरु अपना मत बताते हैं: राम जो आज्ञा दें, वही सब करें। यह सुनकर राम दोनों हाथ जोड़कर सत्य, सरल और कोमल वाणी बोलते हैं। वे कहते हैं कि गुरु और मिथिला के राजा जनक के रहते उनका कुछ कहना सब प्रकार से भद्दा है।

राम गुरु की शपथ लेकर कहते हैं कि गुरु और राजा जनक की जो आज्ञा होगी, वह सचमुच उनके सिर पर है।

राम की शपथ सुनकर मुनि और जनक सभा समेत सकुचा जाते हैं। सब भरत का मुँह देखते हैं, और उत्तर देते नहीं बनता।

धैर्य, विवेक और वाणी की हंसिनी

भरत सभा को संकोच के वश देखते हैं। राम के भाई भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपना प्रेम सँभालते हैं, जैसे बढ़ते हुए विन्ध्य को घटज मुनि ने रोका था। टीका घटज मुनि को अगस्त्य बताती है।

शोकरूपी हिरण्याक्ष ने बुद्धिरूपी पृथ्वी को हर लिया था, जो निर्मल गुणों के समूह रूपी जगत् की जननी है। भरत का विवेक विशाल वराह है, जो उसी समय बिना परिश्रम उसका उद्धार कर देता है।

भरत सबको प्रणाम करके हाथ जोड़ते हैं। वे राम, राजा जनक, गुरु वसिष्ठ और साधु संतों से विनती करते हैं कि आज उनकी अत्यन्त अनुचित बात क्षमा करें। वे कोमल मुख से कठोर वचन कह रहे हैं। टीका कोमल मुख को छोटा मुख और कठोर वचन को धृष्टता भरी बात कहकर खोलती है।

भरत हृदय में सुहावनी सरस्वती का स्मरण करते हैं, और वे मानस से उनके मुखकमल पर आती हैं। टीका इस मानस को भरत का मनरूपी मानसरोवर बताती है।

भरत की वाणी सुन्दर हंसिनी है, निर्मल विवेक, धर्म और नीति से भरी। टीका हंसिनी को गुण और दोष का विवेचन करनेवाली वाणी बताती है।

विवेक के नेत्रों से समाज को प्रेम से शिथिल देखकर और प्रणाम करके, भरत सीता और राम का स्मरण करते हुए बोलते हैं।

दूषण भूषण के समान हुए

भरत राम से कहते हैं कि वे उनके पिता, माता, सुहृद, गुरु और स्वामी हैं, पूज्य हैं, परम हितैषी हैं और मन की जाननेवाले हैं।

फिर वे राम के स्वभाव को गिनाते हैं: सरल, श्रेष्ठ स्वामी, शील के भण्डार, प्रणतपाल, सर्वज्ञ, सुजान और समर्थ। वे शरणागतों का हित करनेवाले हैं, गुणों का आदर करते हैं, और अवगुण और पाप हर लेते हैं।

भरत कहते हैं कि स्वामी के समान स्वामी ही हैं, और स्वामी से द्रोह करने में मेरे समान मैं ही हूँ। यह अर्थ टीका के अनुसार है।

वे कहते हैं कि मोह के वश उन्होंने राम के और पिता के वचनों का उल्लंघन किया, और समाज बटोरकर यहाँ चले आये। फिर वे जगत् के भले और बुरे, ऊँचे और नीचे, अमृत और अमरपद, विष और मृत्यु गिनाते हैं। पोद्दार की टीका अमरपद को देवताओं का पद बताती है। भरत कहते हैं कि उन्होंने कहीं किसी को ऐसा नहीं देखा सुना जो मन में राम की आज्ञा मिटा दे।

वही ढिठाई उन्होंने सब प्रकार से की, और राम ने उसे स्नेह और सेवा मान लिया।

नाथ, आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया, भरत कहते हैं। मेरे दूषण भूषण के समान हो गये, और चारों ओर सुन्दर यश है।

एक प्रणाम पर अपना लेनेवाला स्वामी

भरत कहते हैं कि राम की रीति और सुन्दर स्वभाव की बड़ाई जगत् में प्रसिद्ध है, और वेद और आगम उसे गाते हैं।

जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी और निःशंक हैं, उन्हें भी शरण में सामने आया सुनकर राम ने एक बार प्रणाम करने पर अपना लिया। पोद्दार निरीश्वरवादी का अर्थ नास्तिक और निःशंक का अर्थ निडर करते हैं।

भरत कहते हैं कि राम ने उनके दोष देखकर कभी हृदय में नहीं लाये, और उनके गुण सुनकर साधुओं के समाज में उनका बखान किया।

भरत पूछते हैं कि सेवक पर ऐसी कृपा करनेवाला स्वामी और कौन है। ऐसा और कौन है जो सेवक का सारा साज सामान स्वयं सजा दे और स्वप्न में भी उसे अपनी करनी न समझे? पोद्दार इस साज को सेवक की सब आवश्यकताओं की पूर्ति कहते हैं।

और कौन सेवक के संकोच का सोच अपने हृदय में रखता है? भरत भुजा उठाकर, प्रण रोपकर कहते हैं कि ऐसा स्वामी दूसरा कोई नहीं।

पशु नाचता है और तोता पाठ में प्रवीण होता है। उनका गुण और गति नट और पढ़ानेवाले के अधीन है। टीका तोते के गुण को पढ़ानेवाले से और पशु की गति को नचानेवाले से जोड़ती है।

भरत कहते हैं कि इस प्रकार राम ने सेवकों को सुधारकर और सम्मान देकर साधुओं का शिरोमणि बना दिया। कृपालु के बिना विरदावली का जबर्दस्ती पालन और कौन करेगा?

बड़ी चूक, और स्वामी का अनुराग

भरत कहते हैं कि शोक से, स्नेह से या बालक के स्वभाव से वे आज्ञा को बायें करके चले आये। तब भी कृपालु ने अपनी ओर देखकर सब प्रकार से उनका भला माना।

भरत कहते हैं कि उन्होंने सुन्दर मंगलों के मूल राम के चरणों का दर्शन किया और जान लिया कि स्वामी स्वभाव से अनुकूल हैं। इस बड़े समाज में उन्होंने अपना भाग्य देखा: बड़ी चूक, और स्वामी का अनुराग।

वे कहते हैं कि राम ने उन पर भरपूर, सर्वांगपूर्ण कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं। पोद्दार की टीका खोलती है कि जितने के वे जरा भी योग्य नहीं थे, उससे कहीं अधिक। राम ने अपने शील, स्वभाव और भलाई से उनका दुलार रखा।

भरत कहते हैं, “नाथ, स्वामी और समाज का संकोच छोड़कर, अविनय हो या विनय, जैसी रुचि हुई वैसी वाणी कहकर मैंने पूरी ढिठाई की है। देव मेरी अत्यन्त आतुरता जानकर क्षमा करेंगे।”

भरत कहते हैं कि सुहृद, सुजान और श्रेष्ठ स्वामी से बहुत कहना बड़ा अपराध है। टीका सुहृद को बिना कारण हित करनेवाला बताती है। वे कहते हैं, “देव, अब आज्ञा दीजिये। आपने मेरी सब बात सुधार दी है।”

सेवा की इच्छा और आज्ञा का प्रसाद

भरत राम के चरणकमलों के पराग की दुहाई देते हैं, जो सत्य, पुण्य और सुख की सुहावनी सीमा है। फिर वे अपने हृदय की वह रुचि कहते हैं जो जागते, सोते और स्वप्न में बनी रहती है।

वह चाह है स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा, स्वार्थ, छल और चारों फल छोड़कर। पोद्दार की टीका इन फलों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष बताती है।

फिर भरत कहते हैं कि श्रेष्ठ स्वामी की आज्ञा के समान कोई सेवा नहीं। देव, वही प्रसाद इस सेवक को मिल जाय।

यह कहकर भरत प्रेम के बहुत विवश हो जाते हैं। शरीर पुलकित होता है, आँखों में जल भर आता है, और वे अकुलाकर राम के चरण पकड़ लेते हैं। उस समय को और उस स्नेह को कहा नहीं जा सकता।

राम सुन्दर वाणी से भरत का सम्मान करके उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने पास बिठा लेते हैं। भरत की विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सभा और राम स्नेह से शिथिल हो जाते हैं।

मलिन मन से बरसे फूल

राम, साधुओं का समाज, मुनि वसिष्ठ और मिथिला के राजा जनक स्नेह से शिथिल हैं। सब मन ही मन भरत के भाईपन और उनकी भक्ति की बड़ी महिमा सराहते हैं।

देवता मलिन मन से भरत की प्रशंसा करते हुए फूल बरसाते हैं।

सब लोग सुनकर व्याकुल हो जाते हैं, और ऐसे सकुचा जाते हैं जैसे रात आने पर कमल। टीका यह बात तुलसीदास की बताती है।

दोनों समाजों के सब नर नारी दीन और दुखी हैं। उन्हें देखकर महामलिन इन्द्र मरे हुओं को मारकर मंगल चाहते हैं।

थामा हुआ हाथ

जनक और उनका समाज भरत की वाणी सराहते हैं, जो अपने हाथ के दर्पण में मुख की तरह पकड़ में नहीं आती। गुरु की दशा, जनक का स्नेह और भरत की भक्ति देखकर स्वार्थी देवता हार मान लेते हैं। सरस्वती उनकी विनती पर भरत की बुद्धि फेरने से मना करके विधाता के लोक चली जाती हैं। देवता भय, भ्रम, अप्रीति और उचाट का प्रपंच रचते हैं। गुरु अपना मत कहते हैं, और राम शपथ लेकर कहते हैं कि गुरु और जनक की आज्ञा उनके सिर पर है। सब भरत का मुँह देखते हैं।

भरत अपना प्रेम सँभालते हैं और हृदय में सरस्वती का स्मरण करते हैं। वे कहते हैं कि मोह के वश वे राम और पिता के वचनों का उल्लंघन करके आये, और राम ने उस ढिठाई को स्नेह और सेवा माना। वे राम से आज्ञा माँगते हैं, और कहते हैं कि उनकी रुचि सहज प्रेम से स्वामी की सेवा है। वे राम के चरण पकड़ते हैं, और राम उनका हाथ पकड़कर उन्हें पास बिठाते हैं। देवता मलिन मन से फूल बरसाते हैं, और इन्द्र मरे हुओं को मारकर मंगल चाहते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 294 से सोरठा 301 तक का प्रसंग, सम्बद्ध चौपाइयाँ और छन्द, तथा हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।