रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · प्रयाग में राम और यमुना के पार
प्रयाग में राम और यमुना के पार
तीर्थराज का राजवैभव, भरद्वाज की पूरी हुई साधना, यमुना तट पर एक अनाम प्रेमी से भेंट और गाँव की छाया में ठहरी हुई यात्रा।
एक पेड़ के नीचे रात बीतती है और अगली सुबह राम तीर्थों के राजा प्रयाग के दर्शन करते हैं। तुलसीदास इस राजा की सभा ऐसी सजाते हैं कि नदी, वृक्ष, श्रद्धा और सत्य, सबको उसका अपना पद मिल जाता है। उस राजवैभव को देखनेवाले राम स्वयं सुख के समुद्र कहे गये हैं, फिर भी प्रयाग देखकर सुख पाते हैं। उनके साथ सीता हैं, लक्ष्मण हैं और सखा गुह हैं। आगे भरद्वाज के आश्रम में इन्हीं चारों के लिये आसन और फल आते हैं, और मुनि अपने सारे तप का फल सामने देखकर चरणों में सहज प्रेम माँगते हैं।
फिर यात्रा लोगों के बीच से होकर चलती है। कोई रास्ता जानता है, कोई साथ पहुँचाने को तैयार है, कोई अपना काम छोड़कर दर्शन के लिये आता है। यमुना के तट पर एक तरुण तपस्वी अपने इष्ट को पहचान लेता है; उसका परिचय अनिश्चित रहता है, उसका प्रेम सबको दिखाई देता है। गुह के घर लौट जाने पर सीता और दोनों भाई आगे बढ़ते हैं। अन्त में एक गाँव की स्त्रियाँ सीता के पास आती हैं और बहुत संकोच के साथ राजकुमारों की सुन्दरता का बखान करती हैं। इस प्रसंग की आखिरी आवाज उन्हीं स्त्रियों की है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम तीर्थराज की महिमा सुनानेवाले, मुनि का आदर स्वीकार करनेवाले और रास्ते के प्रेमियों को अपनी विनय से सुख देनेवाले।
- सीता यात्रा में साथ हैं; राम उनकी थकावट जानकर बड़ की छाया में ठहरते हैं और ग्रामस्त्रियाँ उनके पास आती हैं।
- लक्ष्मण पेड़ के नीचे विश्राम की व्यवस्था करनेवाले भाई, जो राम और सीता के साथ प्रयाग से आगे चलते हैं।
- गुह सखा और सेवक, जो प्रयाग तथा यमुना तक साथ रहते हैं और राम के समझाने पर घर लौट जाते हैं।
- भरद्वाज प्रयाग के मुनि, जिनकी साधना राम के दर्शन से सफल होती है और जो चार ब्रह्मचारियों को मार्ग दिखाने के लिये भेजते हैं।
- अनाम तपस्वी वैरागी वेश में आया तरुण रामप्रेमी, जिसकी निश्चित पहचान तुलसी की पंक्तियाँ नहीं देतीं।
- ग्रामवासी और पथिक दर्शन, साथ चलने की विनती, पानी और विश्राम का आग्रह लेकर यात्रा में मिलनेवाले स्त्री और पुरुष।
पेड़ के नीचे से तीर्थराज की सभा तक
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू । लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥
चौपाई १
प्रात प्रातकृत करि रघुराई । तीरथराजु दीख प्रभु जाई॥
उस दिन निवास पेड़ के नीचे होता है। लक्ष्मण और सखा गुह सारी सुविधा जुटा देते हैं। इस छोटे से उल्लेख में दोनों साथियों का काम स्पष्ट है: यात्रा जहाँ ठहरी है, वहाँ विश्राम सुगम हो। सुबह राम प्रातःकाल की क्रियाएँ पूरी करते हैं और जाकर प्रयाग के दर्शन करते हैं। रात का वृक्ष और सुबह का तीर्थ, दोनों अपनी जगह पूरे हैं। तुलसी यहाँ से प्रयाग को राजा बनाकर उसकी सम्पत्ति, सम्बन्ध और रक्षा का विस्तार खोलते हैं।
इस राजा के मन्त्री सत्य हैं, प्यारी पत्नी श्रद्धा हैं और हितकारी मित्र माधव हैं। पोद्दार की टीका माधव को वेणीमाधव कहती है। भण्डार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पदार्थों से भरा है। पुण्यमय प्रदेश ही उसका सुन्दर देश है। राजा का परिचय देते समय पहले उसके भरोसे के सम्बन्ध आते हैं: किसकी सलाह है, किसका साथ है, कौन हित चाहता है। फिर बताया जाता है कि उसके पास देने को क्या है। प्रयाग के इस चित्र में श्रद्धा और सत्य उसी दरबार का अंग हैं जिसमें चारों पुरुषार्थ सम्पत्ति बने हुए हैं।
प्रयाग का क्षेत्र ही दुर्गम, दृढ़ और सुन्दर किला है। उसके शत्रु स्वप्न में भी उस तक नहीं पहुँच सके। टीका यहाँ शत्रुओं को पाप के रूप में समझाती है। समस्त तीर्थ उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, पाप की सेना को कुचलनेवाले रणधीर। इस राजा की सेना का युद्ध किससे है, यह जान लेने पर किले और सैनिकों की छवि खुलती है। आनेवाला साधु जिस पवित्रता की आशा रखता है, उसे कवि सुरक्षित राज्य की तरह हमारे सामने रखते हैं। पाप सेना बनकर आये हैं और उनके सामने तीर्थों की सेना खड़ी है।
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा । छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा॥
चौपाई २
चवँर जमुन अरु गंग तरंगा । देखि होहिं दुख दारिद भंगा॥
अब उस राजा का सिंहासन दिखाई देता है। संगम ही सिंहासन है और अक्षयवट छत्र। उस छत्र की शोभा मुनियों तक का मन मोह लेती है। पोद्दार की टीका संगम को गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम बताती है। यमुना और गंगा की तरंगें चँवर हैं; टीका उनके श्याम और श्वेत रंग भी खोलती है। जल की तरंग में चँवर का हिलना देखा गया है और वृक्ष में छत्र का फैलाव। इन चँवरों को देखते ही दुःख और दरिद्रता मिटने की बात आती है। राजसभा के प्रत्येक उपकरण के साथ तीर्थ की कृपा का एक अर्थ जुड़ा हुआ है।
सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।
दोहा १०५
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम॥ १०५॥
पुण्यात्मा, पवित्र साधु इस राजा की सेवा करते हैं और अपने मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराण उसके बन्दीजन हैं, निर्मल गुणों का बखान करनेवाले। सभा इस दोहे में पूरी होती है: मन्त्री, पत्नी, मित्र, भण्डार, देश, किला, सेना, सिंहासन, छत्र और चँवर के बाद सेवक और यश गानेवाले भी आ गये। फिर कवि प्रयाग के प्रभाव की सीमा कहना कठिन मानते हैं। पापों का समूह हाथी है और प्रयाग उसको मारनेवाला सिंह। पहले की युद्धमयी उपमा यहाँ फिर आती है, अब पूरे पापसमूह के सामने तीर्थराज की एक समर्थ छवि रखती हुई।
ऐसे सुहावने प्रयाग को देखकर सुखसागर राम सुख पाते हैं। वे अपने मुख से सीता, लक्ष्मण और गुह को उसकी बड़ाई सुनाते हैं। प्रणाम करते हुए, वन और बगीचे देखते हुए, बड़े अनुराग से उसका माहात्म्य कहते हुए वे त्रिवेणी तक आते हैं। त्रिवेणी स्मरण से ही शुभ मंगल देनेवाली कही गयी है। राम प्रसन्न होकर स्नान करते हैं, शिव की सेवा करते हैं और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओं का पूजन करते हैं। प्रयाग की प्रशंसा उनकी वाणी में भी है और प्रणाम, स्नान तथा पूजा में भी। भरद्वाज से भेंट इस सबके बाद होती है।
प्रयाग को तुलसी सत्य, श्रद्धा, माधव, चारों पुरुषार्थ और समस्त तीर्थों से सम्पन्न राजा के रूप में दिखाते हैं। संगम उसका सिंहासन है, अक्षयवट छत्र और नदियों की तरंगें चँवर। राम तीनों साथियों को उसका माहात्म्य सुनाकर त्रिवेणी में स्नान और शिव तथा तीर्थदेवताओं का पूजन करते हैं।
भरद्वाज की साधना का सामने आया फल
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए । करत दंडवत मुनि उर लाए॥
चौपाई ३
मुनि मन मोद न कछु कहि जाई । ब्रह्मानंद रासि जनु पाई॥
राम भरद्वाज के पास पहुँचते हैं। वे दण्डवत् कर ही रहे हैं कि मुनि उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। इस मिलने में प्रणाम और आलिंगन साथ आ गये। मुनि के मन का आनन्द कहा नहीं जाता, मानो ब्रह्मानन्द की राशि पा ली हो। वे आशीर्वाद देते हैं और भीतर ऐसा अनुभव करते हैं कि विधाता ने पुण्यों का फल लाकर आँखों के सामने रख दिया। टीका इस दर्शन में सीता और लक्ष्मण सहित राम को स्पष्ट करती है। साधना का फल आँखों के सामने होने की यह बात थोड़ी देर में मुनि स्वयं अपने वचनों में खोलेंगे।
पहले अतिथियों की कुशल पूछी जाती है और उन्हें आसन मिलते हैं। मुनि प्रेमपूर्वक पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट करते हैं। फिर अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर देते हैं। तुलसी को वे अमृत के बने हुए जैसे लगते हैं। राम, सीता, लक्ष्मण और गुह, चारों उन मूल और फलों को बड़ी रुचि से खाते हैं। साथ आये गुह यहाँ भोजन के वर्णन में भी साथ हैं। राम की थकावट दूर होती है और वे सुख पाते हैं। तब भरद्वाज कोमल वचन कहते हैं। स्वागत पहले उनकी भूख और श्रम तक पहुँचता है, उसके बाद अपने आनन्द को वाणी देता है।
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू । आजु सुफल जप जोग बिरागू॥
चौपाई ४
सफल सकल सुभ साधन साजू । राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥
मुनि कहते हैं कि राम का दर्शन करते ही आज उनका तप सफल हुआ, तीर्थसेवन सफल हुआ और त्याग सफल हुआ। आज जप, योग और वैराग्य भी सफल हुए। फिर वे अपने सम्पूर्ण शुभ साधनों को इसी सफलता में समेट लेते हैं। इस गिनती को सुनिये: शरीर और जीवन से किये गये अभ्यास, यात्रा, त्याग, जप, योग और भीतर की विरक्ति, सबका फल वे एक दर्शन में अनुभव कर रहे हैं। चौपाई में आज बार बार आता है। अपनी साधना का पूरा समुदाय वे इस समय के सामने रख देते हैं और उसे सफल कहते हैं।
इसके आगे भरद्वाज कहते हैं कि लाभ की सीमा और सुख की सीमा दूसरी कोई नहीं। राम के दर्शन से उनकी सारी आशाएँ पूरी हो गयीं। फिर कृपा से एक वर माँगते हैं: प्रभु के चरणकमलों में स्वाभाविक प्रेम रहे। सब आशाएँ पूरी होने के बाद यही माँग बची है। सहज स्नेह, जिसमें अपने को बार बार प्रेम के लिये तैयार न करना पड़े। मुनि जिस दर्शन को साधना की सफलता कहते हैं, उसी से आगे के लिये चरणों का सम्बन्ध माँगते हैं। प्राप्त सुख के साथ उनकी प्रार्थना जुड़ी है कि यह प्रेम स्वभाव बन जाये।
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
दोहा १०७
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥ १०७॥
मुनि की बात इस दोहे में अपनी आवश्यक शर्त तक आती है। जब तक मनुष्य कर्म, वचन और मन से छल छोड़कर राम का सेवक नहीं होता, तब तक करोड़ों उपाय करने पर भी उसे स्वप्न में सुख नहीं मिलता। तीनों को एक साथ कहा गया है, आचरण, बोली और मन। छल किसी एक में बचा रहे तो पूरी सेवकाई की बात अभी अधूरी है। भरद्वाज ने अपने तप और योग को सफल कहा था; अब वे उस सफलता के भीतर की सच्चाई कहते हैं। उपाय कितने हैं, उसकी गिनती करोड़ों तक जा सकती है। सुख के लिये छलरहित होकर प्रभु का जन होना आवश्यक है, ऐसा मुनि का कथन है।
मुनि की भावभक्ति से राम आनन्दित और तृप्त हैं। उनके वचन सुनकर वे सकुचा जाते हैं और भरद्वाज का सुन्दर सुयश अनेक प्रकार से सबको सुनाते हैं। पोद्दार की टीका इस संकोच को लीला और अपना ऐश्वर्य छिपाने के भाव से समझाती है। राम मुनि से कहते हैं कि जिसे आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सारे गुणों का घर है। मुनि अपने पुण्यों की सफलता अतिथि में देखते हैं; राम आदर पानेवाले की बड़ाई मुनि के आदर से जोड़ते हैं। दोनों परस्पर विनम्र होते हैं और ऐसा सुख अनुभव करते हैं जिसे वचन पूरा नहीं कह सकते।
आने का समाचार प्रयाग में फैलता है। ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी, सब दशरथ के सुन्दर पुत्रों को देखने भरद्वाज के आश्रम में आते हैं। राम सभी को प्रणाम करते हैं। दर्शन से नेत्रों का लाभ पाकर वे प्रसन्न होते हैं, आशीर्वाद देते हैं और सुन्दरता की सराहना करते लौटते हैं। राम रात आश्रम में विश्राम करते हैं। सुबह फिर प्रयाग में स्नान होता है। उसके बाद प्रसन्न होकर मुनि को सिर नवाते हैं और सीता, लक्ष्मण तथा सेवक गुह के साथ चलने को तैयार होते हैं। अगला प्रश्न राम स्वयं पूछेंगे, आगे किस मार्ग से जाना है।
राम दण्डवत् करते हैं तो भरद्वाज उन्हें उसी समय गले लगा लेते हैं और चारों यात्रियों का सत्कार करते हैं। वे तप, जप, योग, त्याग और सारे साधनों को सफल कहकर चरणों में सहज प्रेम माँगते हैं। छलरहित सेवकाई को सुख की शर्त कहते हैं। परस्पर विनय, प्रयागवासियों के दर्शन और आश्रम में रात के विश्राम के बाद यात्रा फिर आगे बढ़ती है।
पचास उत्सुक शिष्य और चार पथदर्शी
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं । नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥
चौपाई ५
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं । सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥
चलते समय राम प्रेम से भरद्वाज से पूछते हैं, नाथ, हम किस रास्ते से जायँ। मुनि मन में हँसते हैं और कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं। हँसी उनके मन की है; उत्तर में पूछनेवाले की सामर्थ्य का स्मरण है। अभी जिनके दर्शन को उन्होंने सारे साधनों का फल कहा था, वही उनसे मार्ग पूछ रहे हैं। फिर भी यात्रा के लिये जो सहायता चाहिये, मुनि उसका प्रबन्ध करते हैं। साथ भेजने के लिये अपने शिष्यों को बुलाते हैं।
साथ जाने की बात सुनते ही लगभग पचास शिष्य प्रसन्न होकर आ जाते हैं। सभी को राम पर अपार प्रेम है। हर कोई कहता है कि रास्ता हमारा देखा हुआ है। एक ही सेवा के लिये इतने उत्सुक लोग हैं और प्रत्येक अपनी जानकारी सामने रखता है। इस कथन में मार्ग बताने की योग्यता भी है और साथ जाने की लालसा भी। शिष्यों की प्रसन्नता तुलसी पहले लिखते हैं, रास्ते की पहचान का दावा उसके बाद आता है। बुलावा सुनकर हर्ष पहले पहुँच चुका है।
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे । जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥
चौपाई ६
करि प्रनामु रिषि आयसु पाई । प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥
भरद्वाज चार ब्रह्मचारियों को साथ कर देते हैं। बहुत जन्मों के पुण्य करनेवाले कहकर तुलसी उन चारों का परिचय देते हैं। जो लगभग पचास आये थे, उनमें से यात्रा पर ये चार ही जाते हैं। राम ऋषि को प्रणाम करके उनकी आज्ञा लेते हैं और हर्षित होकर चल पड़ते हैं। रास्ते में किसी गाँव के पास से निकलते हैं तो स्त्री और पुरुष दौड़कर दर्शन करने आते हैं। जन्म का फल पाकर वे सनाथ होते हैं। फिर लौटना पड़ता है और लौटते हुए दुःख होता है। तुलसी कहते हैं कि शरीर लौटता है, मन को वे प्रभु के साथ भेज देते हैं। टीका इसी साथ न रह पाने में उनके दुःख को समझाती है।
चारों ब्रह्मचारियों की सेवा का भी एक पड़ाव पूरा होता है। राम विनती करके उन्हें विदा करते हैं। वे मनचाही वस्तु पाकर लौटते हैं, जिसे पोद्दार की टीका अनन्य भक्ति कहती है। आरम्भ में सभी शिष्य कहते थे कि रास्ता देखा हुआ है। अन्त में साथ गये चारों को अपने मन का फल मिल गया है। विदा करने की क्रिया में भी राम की विनय है। मुनि की आज्ञा से मिला साथ सेवा पूरी होने पर आदर के साथ लौटाया जाता है।
बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।
दोहा १०९
उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम॥ १०९॥
इसके बाद यमुना का प्रसंग आता है। पोद्दार की टीका स्पष्ट करती है कि यमुना के पार उतरकर सबने उसके जल में स्नान किया। जल राम के शरीर के समान श्याम है। इस रंग के मिलान पर दोहा ठहरता है: जिस रूप को मार्ग के लोग देखने दौड़े थे, उसी की श्यामता नदी के जल में भी दिखाई देती है। चार ब्रह्मचारी लौट चुके हैं। राम, सीता, लक्ष्मण और गुह की यात्रा अब यमुना के उस पार के निवासियों के सामने आती है।
राम मार्ग पूछते हैं। मुनि के बुलाने पर लगभग पचास उत्सुक शिष्य आते हैं और उनमें से चार ब्रह्मचारी साथ भेजे जाते हैं। राम उन्हें विनयपूर्वक विदा करते हैं; टीका उनके प्राप्त मनोरथ को अनन्य भक्ति कहती है। फिर यमुना के पार उतरकर स्नान होता है।
यमुना तट का वह अनाम तपस्वी
यमुना के किनारे रहनेवाले स्त्री और पुरुष समाचार सुनकर अपना अपना काम भूल जाते हैं और दौड़ पड़ते हैं। लक्ष्मण, राम और सीता की सुन्दरता देखकर अपने भाग्य की बड़ाई करते हैं। उनके भीतर परिचय जानने की बड़ी लालसा है, लेकिन नाम और गाँव पूछते संकोच होता है। तब उनमें जो वयोवृद्ध और समझदार हैं, वे युक्ति से राम को पहचान लेते हैं। वे सबको कथा बताते हैं कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन को चले हैं। सुननेवाले दुःखी होकर पछताते हैं और कहते हैं कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं किया। यह उन निवासियों का दुःख से निकला निर्णय है।
तेहि अवसर एक तापसु आवा । तेजपुंज लघुबयस सुहावा॥
चौपाई ७
कबि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी॥
उसी समय एक तपस्वी आता है। छोटी अवस्था, सुन्दर रूप, तेज का पुंज और वैरागी वेश। मन, कर्म और वचन से वह राम का प्रेमी है। परिचय की जगह चौपाई में उसकी अगम गति रखी गयी है। पोद्दार इसकी दो सम्भावित व्याख्याएँ देते हैं: कवि उसकी गति नहीं जानते, अथवा वह ऐसा कवि है जो अपना परिचय देना नहीं चाहता। दोनों अर्थों में उसके विषय में कुछ अनकहा रहता है। इतनी बात स्पष्ट है कि आया हुआ व्यक्ति राम के प्रति पूरे मन और व्यवहार से अनुरक्त है।
पोद्दार इस स्थान पर पहचान के विषय में अलग टिप्पणी भी करते हैं। वे बताते हैं कि कुछ टीकाकार इस प्रसंग को क्षेपक मानते हैं और कुछ पाठकों को यह ऊपर से जोड़ा हुआ, प्रसंग से अलग दिखाई देता है। उनके अनुसार यह सभी प्राचीन प्रतियों में है, इसलिये वे इसे क्षेपक नहीं मानते। तुलसी के अलौकिक अनुभव का स्मरण करते हुए भी वे कहते हैं कि यहाँ इस प्रसंग को रखने का रहस्य पता नहीं। तपस्वी की गति ही अज्ञात कही गयी हो तो निश्चयपूर्वक कौन कुछ कह सके। फिर वे अपनी समझ की दो सम्भावनाएँ रखते हैं: श्रीहनुमान, अथवा ध्यानस्थ तुलसीदास। ये पोद्दार की अनिश्चित सम्भावनाएँ हैं। उस तरुण की पहचान उनमें से किसी एक पर तय नहीं होती।
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
दोहा ११०
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि॥ ११०॥
तपस्वी अपने इष्टदेव को पहचान लेता है। आँखों में जल भर आता है, शरीर पुलकित हो जाता है और वह दण्ड की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ता है। उसकी दशा कही नहीं जाती। अपने इष्ट को पहचानने की निश्चितता उसकी है; हमारे लिये उसका अपना परिचय अभी भी अज्ञात है। राम प्रेम से पुलकित होकर उसे हृदय से लगा लेते हैं। इस आनन्द के लिये कवि महादरिद्र को पारस मिल जाने की उपमा लाते हैं। अभाव की चरम अवस्था के सामने ऐसा मिलना रखा गया है जिसमें प्राप्ति का पार नहीं।
राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा॥
चौपाई ८
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ । मिलत धरें तन कह सबु कोऊ॥
देखनेवाले कहते हैं कि मानो प्रेम और परमार्थ, दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हों। टीका परमार्थ को परम तत्त्व कहती है। यह वहाँ उपस्थित लोगों की उपमा है, जो आलिंगन में प्रेम और उसके परम आश्रय को एक साथ देख रहे हैं। फिर तपस्वी लक्ष्मण के चरणों में लगता है। लक्ष्मण अनुराग से उमगकर उसे उठा लेते हैं। इसके बाद वह सीता की चरणधूलि सिर पर रखता है। सीता उसे अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद देती हैं। इस भेंट में राम का आलिंगन, लक्ष्मण का उठाना और सीता का मातृभाव, तीनों का अपना स्थान है।
गुह भी उस तपस्वी को दण्डवत् करते हैं। वह गुह को राम का प्रेमी जानकर आनन्द से मिलता है। जिस प्रेम ने उसे राम के पास पहुँचाया, उसी से वह राम के सखा को भी पहचानता है। अपने नेत्रों से प्रभु के रूप का अमृत पीता हुआ वह ऐसा प्रसन्न है जैसे भूखा सुन्दर भोजन पाकर होता है। इस बीच गाँव की स्त्रियाँ आपस में पूछ रही हैं कि वे माता और पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे सुकुमार बालकों को वन में भेज दिया। राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखकर स्त्री और पुरुष स्नेह से व्याकुल हो रहे हैं। तपस्वी की भेंट के चारों ओर ग्रामवासियों का यह प्रेम भी बना रहता है।
तटवासी वृद्धों से राम का परिचय और वनगमन की बात सुनते हैं। एक अनाम तरुण तपस्वी आता है, राम को पहचानकर दण्डवत् करता है और उनका आलिंगन पाता है। लक्ष्मण उसे उठाते हैं, सीता बच्चे की तरह आशीर्वाद देती हैं और गुह प्रणाम करते हैं। पोद्दार उसके लिये दो अनिश्चित पहचानें सुझाते हैं; कोई एक निश्चित नहीं होती।
गुह की विदाई और पथिकों की विनती
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
दोहा १११
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइँ कीन्ह॥ १११॥
अब राम सखा गुह को अनेक प्रकार से समझाते हैं। टीका उस समझाने का प्रयोजन घर लौटना बताती है। गुह राम की आज्ञा सिर पर रखकर अपने भवन को चले जाते हैं। इस दोहे में विदाई पूरी हो जाती है। जिन गुह ने रात पेड़ के नीचे सुविधा बनायी थी, जो प्रयाग की महिमा सुनने और आश्रम का भोजन पाने में साथ थे, उनका यहाँ तक का साथ समाप्त होता है। उन्हें समझाने के लिये राम की ओर से अनेक विधियाँ लगी हैं; अन्त में सखा आज्ञा मानकर घर जाते हैं।
फिर सीता, राम और लक्ष्मण हाथ जोड़कर यमुना को दोबारा प्रणाम करते हैं। दोनों भाई सीता सहित प्रसन्न होकर आगे बढ़ते हैं और सूर्यकन्या यमुना की बड़ाई करते हैं। यहाँ फिर प्रणाम है; पार उतरकर स्नान पहले हो चुका था। अब रास्ते पर तीनों के सामने नये पथिक आते हैं। वे दोनों भाइयों को देखकर प्रेमपूर्वक कहते हैं कि उनके सब अंगों में राजचिह्न देखकर हमारे हृदय में बड़ी चिन्ता होती है। राजलक्षण दिखाई देते हैं और उन्हीं को धारण करनेवाले मार्ग में पैदल चल रहे हैं।
पथिक अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं: ऐसे राजचिह्न होते हुए पैदल यात्रा करनी पड़ रही है, इसलिये हमारी समझ में ज्योतिष ही झूठा लगता है। यह शंका उन्हीं के मन की है। लक्षण जो आशा जगाते हैं, सामने की यात्रा उससे मेल नहीं खाती। उनकी चिन्ता फिर मार्ग पर आती है। भारी वन हैं, बड़े पर्वत हैं, रास्ता दुर्गम है और साथ में सुकुमारी स्त्री है। उनके लिये दोनों कुमारों की दशा और सीता की कोमलता एक ही चिन्ता में जुड़ गये हैं। वे केवल रूप की सराहना करके अपनी बात समाप्त नहीं करते।
वे कहते हैं कि हाथियों और सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। आज्ञा हो तो हम साथ चलें। जहाँ तक आप जायँगे, वहाँ तक पहुँचाकर प्रणाम करेंगे और फिर लौट आयेंगे। प्रस्ताव में साथ चलने की अनुमति भी माँगी गयी है और लौटने की बात भी कही गयी है। वे पूरी यात्रा को अपने प्रेम से सुगम करना चाहते हैं। किसी ने इनके राजलक्षण पहचाने हैं, फिर भी सहायता माँगने की प्रतीक्षा किये बिना अपनी सेवा सामने रख दी है।
एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
दोहा ११२
कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन॥ ११२॥
पूछते समय पथिकों का शरीर पुलकित है और आँखों में जल है। उनका आग्रह प्रेम के वश होकर आया है। कृपासागर राम विनययुक्त कोमल वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं। उनके उत्तर के पूरे शब्द यहाँ नहीं दिये गये; उसका गुण दिया गया है, कोमलता और विनय। साथ जाने की इच्छा रखनेवाले अनेक हैं और विदा करने में आदर हर बार बना रहता है। चार ब्रह्मचारी अपनी सेवा का फल पाकर लौटे थे, गुह आज्ञा मानकर घर गये, और अब मार्ग के प्रेमी राम के मृदु वचनों से लौटते हैं।
राम के अनेक प्रकार से समझाने पर गुह सचमुच घर लौट जाते हैं। सीता और दोनों भाई यमुना को फिर प्रणाम करके चलते हैं। राजचिह्न और पैदल यात्रा देखकर चिन्तित पथिक दुर्गम वन में साथ पहुँचाने का प्रस्ताव देते हैं। राम उन्हें कोमल, विनीत वचन कहकर लौटा देते हैं।
जिन राहों पर चरण पड़ते हैं
यात्रा के मार्ग में बसे गाँव और पुरवे अब कवि की दृष्टि में धन्य हो गये हैं। नागों और देवताओं के नगर उन्हें देखकर प्रशंसा से भरी ईर्ष्या करते हैं। वे पूछते हैं कि किस पुण्यवान ने किस शुभ घड़ी में इन बस्तियों को बसाया होगा, जो आज इतनी पुण्यमय और सुन्दर हो रही हैं। बसने का वह पुराना क्षण आज के दर्शन से सौभाग्यवान माना जा रहा है। जिन स्थानों में राम के चरण जाते हैं, उनके समान अमरावती भी नहीं। टीका अमरावती को इन्द्र की पुरी बताती है। स्वर्ग का नगर मार्ग के गाँवों को सिहाता है।
रास्ते के समीप रहनेवाले भी पुण्य के पुंज कहे गये हैं, क्योंकि वे सीता और लक्ष्मण सहित घनश्याम राम को नेत्र भरकर देखते हैं। स्वर्गवासी उनकी सराहना करते हैं। जिन तालाबों और नदियों में राम स्नान करते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ उनकी प्रशंसा करती हैं। जिस वृक्ष के नीचे वे बैठते हैं, कल्पवृक्ष उसकी बड़ाई करते हैं। चरणकमलों की धूलि छूकर पृथ्वी अपना बड़ा भाग्य मानती है। बस्ती, निवासी, जल, वृक्ष और धरती, यात्रा में सम्पर्क की हर जगह को तुलसी अलग अलग याद करते हैं।
छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं ।
दोहा ११३
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं॥ ११३॥
बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते हुए इस सौभाग्य को सिहाते हैं। राम पर्वत, वन, पक्षी और पशु देखते हुए चले जा रहे हैं। कविता में दोनों ओर देखना है: मार्ग के लोग राम के दर्शन कर रहे हैं और राम उस मार्ग के पर्वत तथा जीवों को देख रहे हैं। आगे जब एक बड़ की छाया में वे विश्राम करेंगे, तो वृक्ष के सौभाग्य की अभी कही हुई बात को हम एक ठहराव के रूप में देखेंगे। यहाँ कवि ने उसे पूरी यात्रा पर फैला दिया है।
राम के मार्ग की बस्तियाँ, वहाँ के निवासी, स्नान के जल, विश्राम के वृक्ष और चरणरज पानेवाली पृथ्वी धन्य कहे गये हैं। देवताओं के नगर, नदियाँ और कल्पवृक्ष उनकी बड़ाई करते हैं। बादलों की छाया और देवताओं के फूलों के बीच यात्रा आगे बढ़ती है।
बड़ की छाया में घड़ीभर
सीता और लक्ष्मण सहित राम किसी गाँव के पास आते हैं तो समाचार सुनते ही सब घर का काम छोड़कर चल देते हैं। बच्चे और बूढ़े, स्त्री और पुरुष, सब इस आने में शामिल हैं। तीनों का रूप देखकर उन्हें नेत्रों का फल मिलता है। आँखें भर आती हैं, शरीर पुलकित होते हैं और दोनों भाइयों को देखकर सब प्रेमानन्द में मग्न हो जाते हैं। कवि उनकी दशा के लिये दरिद्रों को चिन्तामणियों की ढेरी मिल जाने का चित्र देते हैं; पोद्दार सुरमणि का अर्थ चिन्तामणि खोलते हैं। तपस्वी के लिये अभी पारस की उपमा आयी थी, यहाँ पूरे गाँव की प्राप्ति के लिये बहुमूल्य मणियों की ढेरी है।
लोग एक दूसरे को पुकारकर कहते हैं कि इसी क्षण नेत्रों का लाभ ले लीजिये। दर्शन का अवसर सामने है और वे उसे दूसरों के साथ बाँटना चाहते हैं। कोई राम को देखते हुए अनुराग में उनके साथ लगकर चलने लगता है। कोई आँखों के मार्ग से उनकी छवि हृदय में उतार लेता है और उसका शरीर, मन तथा वाणी शिथिल हो जाते हैं। पोद्दार इसे उन तीनों के व्यवहार का बन्द हो जाना समझाते हैं। एक ओर साथ चलते हुए देखनेवाले हैं, दूसरी ओर छवि भीतर लेकर निश्चेष्ट हो गये लोग। दोनों की दशा उसी दर्शन से उपजी है।
एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।
दोहा ११४
कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात॥ ११४ ॥
कोई बड़ की अच्छी छाया देखता है और वहाँ कोमल घास तथा पत्ते बिछा देता है। फिर विनती करता है कि क्षणभर बैठकर थकावट मिटा लीजिये। आगे जाना चाहे अभी हो, चाहे सुबह हो। उनके प्रस्ताव में दोनों सम्भावनाएँ खुली हैं। किसी और के हाथ से पानी का भरा घड़ा आता है और कोमल आग्रह सुनाई देता है, नाथ, आचमन कर लीजिये। छाया, बिछावन और पानी, ग्रामवासियों के प्रेम ने यात्रियों के लिये उपयोग की चीजें जुटा दी हैं। देखने की उमंग सेवा में भी उतर आयी है।
राम उन प्यारे वचनों को सुनते हैं और लोगों का अत्यन्त प्रेम देखते हैं। दयालु और विशेष सुशील प्रभु मन में जान लेते हैं कि सीता थकी हुई हैं। तब बड़ की छाया में घड़ीभर ठहरकर विश्राम करते हैं। आग्रह सबेरे तक रुकने का भी था; कथा में लिया गया विश्राम थोड़ी देर का है। सीता का श्रम पहचानने का उल्लेख इसी निर्णय के साथ रखा गया है। गाँववालों को अब ठहरे हुए राम, सीता और लक्ष्मण की शोभा देखने का अवसर मिलता है। उनका अनुपम रूप आँखों और मन को लुभा लेता है।
चारों ओर लोग टकटकी लगाये हैं। राम का मुख चन्द्रमा है और देखनेवाले चकोरों के समान उसके सामने तन्मय हैं। राम का शरीर नवीन तमाल वृक्ष के रंग जैसा श्याम है। तुलसी कहते हैं कि उसे देखकर करोड़ों कामदेवों के मन मोहित हो जाते हैं। लक्ष्मण बिजली के रंग के हैं, नख से शिख तक सुन्दर और मन को भानेवाले। श्याम और गौर की इस जोड़ी के साथ उनका यात्रावेश भी दिखाई देता है। दोनों मुनियों के वस्त्र पहने हैं, जिन्हें टीका वल्कल आदि कहती है। कमर में तरकस कसे हैं और कमल जैसे हाथों में धनुष तथा बाण शोभित हैं।
जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।
दोहा ११५
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥ ११५॥
सिर पर जटाओं के सुन्दर मुकुट हैं। वक्षःस्थल, भुजाएँ और नेत्र विशाल हैं। शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे मुखों पर पसीने की बूँदें चमक रही हैं। श्रम के इस चिह्न को भी कवि रूपवर्णन में स्थान देते हैं। अभी राम ने सीता की थकावट जानी थी; अब दोनों भाइयों के मुखों पर स्वेदकण देखे गये हैं। इस विश्राम की शोभा में यात्रा का श्रम उपस्थित है। तुलसी कहते हैं कि मनोहर जोड़ी की शोभा बहुत है और अपनी बुद्धि थोड़ी, इसलिये पूरा वर्णन बन नहीं पड़ता। सभी लोग राम, लक्ष्मण और सीता की सुन्दरता मन, चित्त और बुद्धि लगाकर देख रहे हैं।
गाँव के सब लोग काम छोड़कर दर्शन को आते हैं। कोई साथ चलने लगता है, कोई छवि हृदय में लेकर शिथिल हो जाता है। लोग बड़ की छाया में घास और पत्ते बिछाते हैं तथा पानी लाते हैं। सीता का श्रम जानकर राम घड़ीभर विश्राम करते हैं। ग्रामवासी तीनों का रूप, भाइयों का मुनिवेश और मुखों पर पसीने की बूँदें देखते हैं।
राजकुमारी के पास गाँव की स्त्रियाँ
प्रेम के प्यासे स्त्री और पुरुष उस छवि को देखकर ठगे रह गये हैं। तुलसी उन्हें दीपक देखकर निस्तब्ध हुए हिरन और हिरनी के समान दिखाते हैं। इसी तन्मयता के बीच गाँव की स्त्रियाँ सीता के पास जाती हैं। उनके स्नेह में निकट आने की इच्छा है और पूछने में संकोच भी है। वे बार बार सीता के पाँव लगती हैं। उनके वचन सहज, सीधे और कोमल हैं। इस निकट आने को कवि अलग से समय देते हैं, क्योंकि जो कुछ वे कहना चाहती हैं, वह आदर और झिझक के बीच से निकलता है।
वे सीता को राजकुमारी कहकर विनती करती हैं। कुछ निवेदन करना चाहती हैं, लेकिन पूछने से डरती हैं; इस डर का कारण वे स्वयं स्त्रीस्वभाव को कहती हैं। फिर स्वामिनी कहकर अपने अविनय की क्षमा माँगती हैं। उनका निवेदन है कि हमें गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये उनकी अपनी विनम्र अभिव्यक्तियाँ हैं। सामने राजकुमारी हैं और बोलनेवाली ग्रामस्त्रियाँ अपने प्रश्न का अधिकार माँग रही हैं। चरणों में प्रणाम के बाद वाणी में भी उसी आदर को रखती हैं।
वे दोनों राजकुमारों को स्वभाव से ही सलोना कहती हैं। मरकतमणि और सोने ने अपनी कान्ति इन्हीं से पायी है, ऐसा उनका कहना है। उपमा में सुन्दरता का स्रोत उलट गया है: मणि और स्वर्ण स्वयं राजकुमारों के रंग से आभा पाते हैं। पोद्दार समझाते हैं कि पन्ने और सोने में दिखाई देनेवाली हरित तथा सुवर्ण आभा इनकी कान्ति के एक कण के बराबर भी नहीं मानी गयी है। स्त्रियों की प्रशंसा में बाहरी आभूषणों का मूल्य भी सामने दिखाई दे रहे रूप से ठहरता है।
स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।
दोहा ११६
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन॥ ११६॥
एक श्याम हैं, दूसरे गौर। दोनों सुन्दर किशोर हैं और शोभा के धाम हैं। उनके मुख शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे हैं और नेत्र शरद् ऋतु के कमल जैसे। स्त्रियों का कथन इसी प्रशंसा तक आता है। पहले गाँव ने रूप देखकर काम छोड़ा, फिर सेवा जुटायी और अब उसके लिये शब्द पाये हैं। सीता के निकट आयी स्त्रियों की विनती में क्षमा की प्रार्थना और राजकुमारों के प्रति स्नेह साथ सुनाई देते हैं। यहाँ उनके नेत्रों का आनन्द मुख और नेत्र की इन्हीं उपमाओं में व्यक्त हुआ है।
ग्रामस्त्रियाँ सीता के पास जाकर पाँव लगती हैं और संकोचपूर्वक विनय करती हैं। वे अविनय क्षमा करने को कहती हैं, दोनों राजकुमारों को स्वभाव से सलोना बताती हैं और मरकत तथा सोने की कान्ति का मूल उन्हीं में देखती हैं। प्रसंग उनके श्याम और गौर रूप, चन्द्रमा जैसे मुख तथा कमल जैसे नेत्रों की प्रशंसा पर ठहरता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस यात्रा में विश्राम की दो छायाएँ याद रह जाती हैं। शुरुआत के पेड़ के नीचे लक्ष्मण और गुह सुविधा बनाते हैं। अन्त के बड़ के नीचे ग्रामवासी नरम घास और पत्ते बिछाते हैं, पानी लाते हैं, और राम सीता की थकावट जानकर रुकते हैं। बीच में भरद्वाज का आश्रम है, जहाँ कन्द, मूल, फल और अंकुर से यात्रियों का श्रम दूर होता है। इन तीन पड़ावों में प्रेम का अपना ठोस काम है। जिसको अतिथि मिला है, वह उसके बैठने, खाने और थकावट मिटने की चिन्ता करता है।
भरद्वाज की बात और तरुण तपस्वी की भेंट को साथ रखें तो मन, वचन और कर्म तीनों फिर दिखाई देते हैं। मुनि इन्हीं तीनों से छल छोड़कर सेवक होने की बात कहते हैं। तपस्वी इन्हीं तीनों से राम का अनुरागी कहा गया है। एक जगह पूरी प्रार्थना सुनाई देती है, दूसरी जगह पहचानते ही अश्रु, पुलक और दण्डवत् दिखाई देते हैं। दोनों को राम का प्रेम मिलता है। उसके लिये मुनि की साधना का परिचय भी उपस्थित है और अनाम व्यक्ति का ऐसा प्रेम भी, जिसका परिचय अब तक निश्चित नहीं हुआ।
प्रयाग में वेद और पुराण राजा के गुण गानेवाले बने थे। इस पड़ाव पर गाँव की स्त्रियाँ अपने सहज वचनों में दोनों कुमारों की सुन्दरता कह रही हैं। बीच की राह में मुनि, शिष्य, पथिक और तपस्वी, सभी को अपना अपना मिलना मिला। अब बड़ की छाया है, सीता के पास संकोच से आयी स्त्रियाँ हैं और उनकी वाणी में श्याम तथा गौर किशोरों की प्रशंसा है। यात्रा इसी थोड़ी देर के विश्राम में अपना यह पड़ाव पूरा करती है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १०५ से ११६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।