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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 13
प्रयाग में राम और यमुना के पार
तीर्थों के राजा प्रयाग का राजवैभव, और भरद्वाज की पूरी हुई साधना। यमुना तट पर एक अनाम प्रेमी से भेंट, और गाँव की छाया में ठहरी हुई यात्रा।
एक पेड़ के नीचे रात बीतती है, और अगली सुबह राम तीर्थों के राजा प्रयाग के दर्शन करते हैं। राम के साथ सीता हैं, लक्ष्मण हैं और सखा गुह हैं। भरद्वाज के आश्रम में चारों के लिये आसन और फल आते हैं, और मुनि राम के चरणों में सहज प्रेम का वर माँगते हैं।
फिर यात्रा लोगों के बीच से चलती है। कुछ शिष्य कहते हैं कि मार्ग उनका देखा हुआ है, पथिक साथ चलने को तैयार हैं, और लोग अपना काम भूलकर दर्शन को आते हैं। यमुना के पार एक तरुण तपस्वी अपने इष्टदेव को पहचानकर दण्ड की तरह गिर पड़ता है। गुह के घर लौट जाने पर सीता सहित दोनों भाई आगे चलते हैं। गाँव की स्त्रियाँ सीता के पास जाती हैं, पूछते सकुचाती हैं, और विनती करके दोनों राजकुमारों की सुन्दरता कहती हैं।
मुनि, तपस्वी, पथिक और गाँव
- राम प्रयाग की महिमा सुनानेवाले, मुनि के वचन सुनकर सकुचानेवाले, और पथिकों को विनय भरे कोमल वचन कहकर लौटानेवाले।
- सीता यात्रा में साथ हैं। राम उनकी थकावट जानकर बड़ की छाया में घड़ीभर रुकते हैं, और गाँव की स्त्रियाँ उनके पास जाती हैं।
- लक्ष्मण पेड़ के नीचे सब सुविधा करनेवाले भाई, जो राम और सीता के साथ प्रयाग से आगे चलते हैं।
- गुह सखा, जो प्रयाग और यमुना तक साथ रहते हैं, और राम की आज्ञा सिर पर रखकर घर लौट जाते हैं।
- भरद्वाज प्रयाग के मुनि, जिनकी साधना राम के दर्शन से सफल होती है और जो चार ब्रह्मचारियों को साथ भेजते हैं।
- अनाम तपस्वी वैरागी वेश में आया तरुण, मन, कर्म और वचन से राम का प्रेमी, जिसकी गति कवि नहीं जानते।
- ग्रामवासी और पथिक दर्शन, साथ चलने की विनती, पानी और विश्राम का आग्रह लेकर यात्रा में मिलनेवाले स्त्री और पुरुष।
पेड़ के नीचे से प्रयाग की सभा तक
उस दिन निवास पेड़ के नीचे होता है, और लक्ष्मण और सखा गुह सब सुविधा कर देते हैं। सुबह प्रातःकाल की क्रियाएँ करके राम जाकर तीर्थों के राजा प्रयाग के दर्शन करते हैं।
इस राजा का मन्त्री सत्य है, प्यारी पत्नी श्रद्धा है, और माधव के समान हितकारी मित्र है। पोद्दार की टीका उन माधव को वेणीमाधव कहती है। भण्डार चारों पदार्थों से भरा है, जिन्हें पोद्दार की टीका धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताती है। पुण्यमय प्रदेश उसका अति सुन्दर देश है।
क्षेत्र उसका दुर्गम, दृढ़ और सुन्दर किला है, जिस तक शत्रु स्वप्न में भी नहीं पहुँच सके। पोद्दार की टीका यहाँ शत्रुओं को पाप बताती है। उसकी सेना समस्त तीर्थ हैं, श्रेष्ठ वीर और रणधीर, जो पाप की सेना को कुचलनेवाले हैं।
संगम उसका सिंहासन है, जो बहुत सोहता है। पोद्दार की टीका संगम को गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम बताती है। अक्षयवट उसका छत्र है, जो मुनियों का मन मोह लेता है। यमुना और गंगा की तरंगें उसके चँवर हैं। टीका उनके श्याम और श्वेत रंग भी बताती है। इन्हें देखकर दुःख और दरिद्रता नष्ट होती है।
पुण्यात्मा, पवित्र साधु इस राजा की सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणों के समूह उसके बन्दीजन हैं, जो उसके निर्मल गुणों का बखान करते हैं। प्रयाग का प्रभाव कौन कह सकता है? पापों के समूह रूपी हाथी के लिये प्रयाग सिंह है।
ऐसे सुहावने प्रयाग को देखकर सुख के सागर राम सुख पाते हैं। वे अपने श्रीमुख से सीता, लक्ष्मण और सखा गुह को प्रयाग की बड़ाई सुनाते हैं। प्रणाम करके, वन और बगीचे देखते हुए, बड़े प्रेम से उसका माहात्म्य कहते हुए, इस प्रकार आकर वे त्रिवेणी के दर्शन करते हैं। वह स्मरण करने से सब सुन्दर मंगल देनेवाली है। प्रसन्न होकर स्नान करके वे शिव की सेवा करते हैं और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओं का पूजन करते हैं।
भरद्वाज के सुकृत का आँखों के सामने आया फल
तब राम भरद्वाज के पास आते हैं। दण्डवत् करते राम को मुनि हृदय से लगा लेते हैं। मुनि के मन का आनन्द कहा नहीं जाता, मानो ब्रह्मानन्द की राशि मिल गयी हो। मुनीश्वर आशीर्वाद देते हैं। उनके हृदय में यह जानकर अत्यन्त आनन्द है, मानो विधाता ने उनके सुकृत का फल लाकर आँखों के सामने कर दिया हो। टीका कहती है कि यह फल सीता और लक्ष्मण सहित राम का दर्शन है।
मुनि कुशल पूछकर आसन देते हैं और प्रेम से पूजन करके सबको सन्तुष्ट करते हैं। वे अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर देते हैं, मानो अमृत के बने हों। सीता, लक्ष्मण और साथी सहित राम उन सुहावने मूल-फलों को बड़ी रुचि से खाते हैं। थकावट दूर होने से राम सुखी होते हैं। तब भरद्वाज कोमल वचन कहते हैं।
मुनि कहते हैं: आज तप, तीर्थ और त्याग सफल हुए। आज जप, योग और वैराग्य सफल हुए। राम, आज आपके दर्शन करते हुए सारे शुभ साधनों का समूह सफल हुआ।
लाभ की सीमा और सुख की सीमा दूसरी नहीं, वे कहते हैं। आपके दर्शन से सब आशाएँ पूरी हो गयीं। अब कृपा करके यह वर दीजिये: अपने चरणकमलों में सहज स्नेह।
जब तक कोई कर्म, वचन और मन से छल छोड़कर राम का जन नहीं होता, तब तक करोड़ों उपाय करने पर स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता।
मुनि के वचन सुनकर राम सकुचा जाते हैं। वे मुनि की भाव भक्ति से आनन्द में तृप्त हैं। पोद्दार की टीका इस संकोच को लीला की दृष्टि से बताती है। तब राम मुनि का सुन्दर सुयश करोड़ों प्रकार से कहकर सबको सुनाते हैं, और टीका कहती है कि ऐसा करते हुए वे अपना ऐश्वर्य छिपाते हैं। राम कहते हैं: मुनीश्वर, जिसे आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुणों का घर है। मुनि और राम परस्पर विनम्र होते हैं और ऐसा सुख पाते हैं जो कहा नहीं जा सकता।
यह समाचार पाकर प्रयाग के निवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी, सब दशरथ के सुन्दर पुत्रों को देखने भरद्वाज के आश्रम में आते हैं। राम सबको प्रणाम करते हैं। नेत्रों का लाभ पाकर सब प्रसन्न होते हैं, और परम सुख पाकर आशीर्वाद देते हैं। वे सुन्दरता की सराहना करते हुए लौटते हैं। राम रात को विश्राम करते हैं। सुबह प्रयाग में स्नान करके, प्रसन्न होकर, मुनि को सिर नवाकर वे सीता, लक्ष्मण और जन के साथ चल पड़ते हैं।
पचास प्रसन्न शिष्य और साथ जानेवाले चार ब्रह्मचारी
राम प्रेम से मुनि से कहते हैं: नाथ, बताइये, हम किस मार्ग से जायँ? मुनि मन में हँसकर राम से कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं। साथ के लिये मुनि शिष्यों को बुलाते हैं।
सुनकर कोई पचास शिष्य मन में प्रसन्न होकर आते हैं। सबका राम पर अपार प्रेम है, और सब कहते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है।
तब मुनि चार ब्रह्मचारियों को साथ कर देते हैं, जिन्होंने बहुत जन्मों तक सब पुण्य किये थे। ऋषि को प्रणाम करके और उनकी आज्ञा पाकर राम हृदय में बहुत हर्षित होकर चलते हैं। जब वे किसी गाँव के पास से निकलते हैं, तब स्त्री और पुरुष दौड़कर उनके दर्शन करते हैं। जन्म का फल पाकर वे सनाथ होते हैं, और मन को साथ भेजकर दुःखी होकर लौटते हैं। पोद्दार की टीका कहती है कि उनका दुःख इस बात का है कि वे शरीर से साथ नहीं रह पाते।
राम विनती करके ब्रह्मचारियों को विदा करते हैं। वे मन की कामना पाकर लौटते हैं, जिसे पोद्दार की टीका अनन्य भक्ति बताती है।
यमुना के पार उतरकर सब उसके जल में स्नान करते हैं, जो राम के शरीर के समान श्याम है।
यमुना तट का वह अनाम तपस्वी
यमुना के किनारे रहनेवाले स्त्री और पुरुष सुनते ही अपना अपना काम भूलकर दौड़ पड़ते हैं। लक्ष्मण, राम और सीता की सुन्दरता देखकर वे अपने भाग्य की बड़ाई करते हैं। उनके मन में बड़ी लालसाएँ हैं। नाम और गाँव पूछते वे सकुचाते हैं। उनमें जो वयोवृद्ध और चतुर हैं, वे युक्ति से राम को पहचान लेते हैं। वे सबको सारी कथा सुनाते हैं कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन को चले हैं। सुनकर सब विषाद के साथ पछताते हैं कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं किया।
उसी समय एक तपस्वी आता है, तेज का पुंज, छोटी अवस्था का और सुन्दर। कवि उसकी गति नहीं जानते। वह वैरागी वेश में है, और मन, कर्म और वचन से राम का प्रेमी है। पोद्दार की टीका इसका दूसरा अर्थ भी देती है कि वह ऐसा कवि है जो अपना परिचय नहीं देना चाहता।
पोद्दार यहाँ एक अलग टिप्पणी भी करते हैं। कुछ टीकाकार इस प्रसंग को क्षेपक मानते हैं, और कुछ लोगों को यह ऊपर से जोड़ा हुआ, प्रसंग से अलग लगता है। पर यह सभी प्राचीन प्रतियों में है, इसलिये वे इसे क्षेपक नहीं मानते। तुलसी अलौकिक अनुभव के पुरुष थे। यहाँ इस प्रसंग को रखने का रहस्य पता नहीं। जिस तपस्वी की गति ही अज्ञात कही गयी हो, उसके बारे में निश्चय से कौन कुछ कह सकता है। अपनी समझ से वे दो सम्भावनाएँ रखते हैं: हनुमान, अथवा ध्यानस्थ तुलसीदास।
आँखों में जल भरे, शरीर पुलकित, अपने इष्टदेव को पहचानकर वह दण्ड की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ता है। उसकी दशा का बखान नहीं हो सकता। राम प्रेम से पुलकित होकर उसे हृदय से लगा लेते हैं। मानो किसी महादरिद्र को पारस मिल गया हो।
सब कोई कहते हैं कि मानो प्रेम और परमार्थ, दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं। टीका परमार्थ को परम तत्त्व कहती है। फिर तपस्वी लक्ष्मण के चरणों लगता है, और लक्ष्मण प्रेम से उमगकर उसे उठा लेते हैं। फिर वह सीता की चरणधूलि सिर पर रखता है, और सीता माता की भाँति उसे बालक जानकर आशीर्वाद देती हैं।
गुह उस तपस्वी को दण्डवत् करते हैं, और वह गुह को राम का प्रेमी जानकर आनन्द से मिलता है। नेत्रों के दोनों से राम के रूप का अमृत पीता हुआ वह ऐसा प्रसन्न है जैसे भूखा अच्छा भोजन पाकर होता है। स्त्रियाँ कहती हैं: सखी, कहिये तो, वे माता और पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे बालकों को वन में भेज दिया? राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखकर स्त्री और पुरुष स्नेह से व्याकुल होते हैं।
गुह की विदाई और पथिकों की विनती
तब राम सखा गुह को अनेक प्रकार से सीख देते हैं। पोद्दार की टीका बताती है कि यह घर लौट जाने के लिये है। राम की आज्ञा सिर पर रखकर गुह अपने घर चले जाते हैं।
फिर सीता, राम और लक्ष्मण हाथ जोड़कर यमुना को फिर प्रणाम करते हैं। सीता सहित दोनों भाई सूर्य की पुत्री की बड़ाई करते हुए प्रसन्न होकर चलते हैं। रास्ते में अनेक पथिक मिलते हैं। वे दोनों भाइयों को देखकर प्रेम से कहते हैं कि आपके सब अंगों में राजचिह्न देखकर हमारे हृदय में बड़ा सोच होता है।
आप पैदल चल रहे हैं। हमारी समझ में ज्योतिष झूठा है। रास्ता दुर्गम है, पहाड़ और जंगल भारी हैं, और उसमें आपके साथ सुकुमारी स्त्री है।
हाथियों और सिंहों का वन देखा नहीं जाता। आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहाँ तक जायेंगे, वहाँ तक पहुँचाकर, फिर आपको सिर नवाकर हम लौट आयेंगे।
इस प्रकार प्रेम के वश वे पूछते हैं, उनके शरीर पुलकित हैं और आँखों में जल है। कृपा के सागर राम विनय भरे कोमल वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।
जिन राहों पर चरण पड़ते हैं
नागों और देवताओं के नगर रास्ते में बसे गाँवों और पुरवों पर सिहाते हैं। पोद्दार की टीका के अनुसार वे पूछते हैं कि किस पुण्यवान ने किस घड़ी में इन्हें बसाया था। ये धन्य, पुण्यमय और परम सुन्दर हैं। जहाँ जहाँ राम के चरण चले जाते हैं, उनके समान अमरावती नहीं है। पोद्दार की टीका अमरावती को इन्द्र की पुरी बताती है।
रास्ते के पास रहनेवाले पुण्य के पुंज हैं, और स्वर्गवासी उनकी सराहना करते हैं, जो सीता और लक्ष्मण सहित घनश्याम राम को नेत्र भरकर देखते हैं। जिन तालाबों और नदियों में राम स्नान करते हैं, देवताओं के सरोवर और नदियाँ उनकी सराहना करती हैं। जिस वृक्ष के नीचे राम जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष उसकी बड़ाई करता है। राम के चरणकमलों का पराग छूकर पृथ्वी अपना बड़ा भाग्य मानती है।
बादल छाया करते हैं, और देवता फूल बरसाते और सिहाते हैं। राम पर्वत, वन, पक्षी और पशु देखते हुए रास्ते पर चले जा रहे हैं।
बड़ की छाया में घड़ीभर
सीता और लक्ष्मण सहित राम जब किसी गाँव के पास से निकलते हैं, तब सुनते ही बच्चे और बूढ़े, स्त्री और पुरुष, सब तुरन्त चल देते हैं। वे घर का काम भूल जाते हैं। राम, लक्ष्मण और सीता का रूप देखकर, नेत्रों का फल पाकर वे सुखी होते हैं। आँखों में जल भर आता है, शरीर पुलकित होते हैं, और दोनों वीरों को देखकर सब मग्न हो जाते हैं। उनकी दशा कही नहीं जाती, मानो दरिद्रों ने सुरमणियों की ढेरी पा ली हो। पोद्दार सुरमणि का अर्थ चिन्तामणि बताते हैं।
वे एक दूसरे को पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रों का लाभ ले लीजिये। कोई राम को देखकर प्रेम में भर जाते हैं, और उन्हें निहारते हुए साथ लगे चले जाते हैं। कोई नेत्रों के मार्ग से छवि को हृदय में लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणी से शिथिल हो जाते हैं। पोद्दार इसे इन तीनों का व्यवहार बन्द हो जाना बताते हैं।
कोई बड़ की अच्छी छाया देखकर कोमल घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं: क्षणभर थकावट मिटा लीजिये। अभी जाइयेगा या सबेरे? कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणी से कहते हैं: नाथ, आचमन कीजिये।
उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर, दयालु और परम सुशील राम मन में सीता को थकी हुई जानकर बड़ की छाया में घड़ीभर रुकते हैं। स्त्री और पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूप उनके नेत्रों और मन को लुभा लेता है।
सब लोग टकटकी लगाये चारों ओर सुशोभित हैं, राम के मुखचन्द्र के चकोर। राम का शरीर नवीन तमाल वृक्ष के रंग का है और शोभा दे रहा है। उसे देखते ही करोड़ों कामदेवों के मन मोहित हो जाते हैं। बिजली के रंग के लक्ष्मण बहुत ही भले हैं, नख से शिख तक सुन्दर और मन को भानेवाले। दोनों मुनियों के वस्त्र पहने हैं, जिन्हें टीका वल्कल आदि कहती है। कमर में तरकस कसे हैं, और करकमलों में धनुष और बाण शोभित हैं।
सिरों पर जटाओं के सुन्दर मुकुट हैं। वक्ष, भुजाएँ और नेत्र विशाल हैं। शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा रूपी सुन्दर मुखों पर पसीने की बूँदों का जाल शोभित है। उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता। शोभा बहुत है, और कहनेवाले की बुद्धि थोड़ी है। सब लोग राम, लक्ष्मण और सीता की सुन्दरता को चित्त, मन और बुद्धि लगाकर देखते हैं।
सीता के पास गाँव की स्त्रियाँ
प्रेम के प्यासे स्त्री और पुरुष थकित रह जाते हैं, मानो हिरनी और हिरन दीपक को देख रहे हों। गाँव की स्त्रियाँ सीता के पास जाती हैं। अत्यन्त स्नेह से वे पूछते सकुचाती हैं। सब बार बार उनके पाँव लगती हैं और स्वभाव से कोमल, सरल वचन कहती हैं।
वे कहती हैं: राजकुमारी, हम विनती करती हैं। स्त्री स्वभाव से हम कुछ पूछते डरती हैं। स्वामिनी, हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा, और हमें गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा।
वे कहती हैं कि ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही परम सुन्दर हैं। मरकतमणि और सोने ने कान्ति इनसे पायी है। पोद्दार समझाते हैं कि पन्ने की हरी और सोने की सुनहरी आभा इनकी कान्ति के एक कण के बराबर भी नहीं।
श्याम और गौर, श्रेष्ठ किशोर, सुन्दर, शोभा के धाम। मुख शरद् की रात के स्वामी चन्द्रमा हैं, और नेत्र शरद् ऋतु के कमल हैं।
प्रसंग का क्रम
पेड़ के नीचे निवास होता है, और लक्ष्मण और गुह सब सुविधा कर देते हैं। सुबह राम प्रयाग के दर्शन करके सुख पाते हैं और तीनों को उसकी बड़ाई सुनाते हैं। वे त्रिवेणी के दर्शन करते हैं, स्नान करते हैं, शिव की सेवा करते हैं और तीर्थदेवताओं का पूजन करते हैं। भरद्वाज उन्हें हृदय से लगाकर आशीर्वाद देते हैं, आसन देते हैं, पूजन करते हैं और भोजन कराते हैं। मुनि कहते हैं कि राम के दर्शन से सारे शुभ साधन सफल हुए, और चरणों में सहज प्रेम का वर माँगते हैं। वे सुख की शर्त कहते हैं। राम सकुचाकर मुनि का सुयश सुनाते हैं। प्रयाग के निवासी आते हैं, प्रणाम पाते हैं और सराहना करते लौटते हैं। राम रात को विश्राम करके सुबह चलते हैं। वे मार्ग पूछते हैं, और मुनि कहते हैं कि सभी मार्ग सुगम हैं। कोई पचास शिष्य आते हैं, और चार ब्रह्मचारी साथ जाते हैं। राम विनती करके ब्रह्मचारियों को विदा करते हैं, और सब यमुना पार उतरकर स्नान करते हैं। तट के वयोवृद्ध और चतुर लोग राम को पहचानते हैं, और सब पछताते हैं कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं किया। एक तपस्वी आकर अपने इष्टदेव को पहचानता है और दण्ड की तरह गिर पड़ता है। राम उसे हृदय से लगाते हैं, लक्ष्मण उसे उठाते हैं, सीता उसे आशीर्वाद देती हैं, और गुह उसे दण्डवत् करते हैं। स्त्रियाँ पूछती हैं कि ऐसे बालकों को वन भेजनेवाले माता-पिता कैसे हैं। राम गुह को सीख देते हैं, और गुह घर जाते हैं। तीनों यमुना को फिर प्रणाम करते हैं। पथिक साथ चलने को कहते हैं, और राम उन्हें लौटा देते हैं। नागों और देवताओं के नगर रास्ते के गाँवों पर सिहाते हैं। गाँव के लोग सुनते ही चल देते हैं। कोई बड़ की छाया में घास बिछाते हैं, और कोई पानी लाते हैं। सीता को थकी जानकर राम वहाँ घड़ीभर रुकते हैं। लोग राम, लक्ष्मण और सीता की सुन्दरता देखते हैं। गाँव की स्त्रियाँ सीता के पास जाकर उनके पाँव लगती हैं और विनती करती हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 105 से 116, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।