Lulla Family

दशरथ का प्राणांत और भरत का लौटना

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · दशरथ का प्राणांत और भरत का लौटना

दशरथ का प्राणांत और भरत का लौटना

सुमन्त्र की रुकती हुई वाणी, कौसल्या का धीरज, दशरथ की अन्तिम पुकार और एक ऐसे घर में लौटते भरत, जहाँ उन्हें अभी अपने दुःख का कारण भी नहीं मालूम।

सुमन्त्र अभी अपना वृत्तान्त कह रहे हैं। उनके सामने नाव के चल पड़ने का दृश्य है, और सुननेवाले दशरथ के सामने अपने बच्चों की अनुपस्थिति। मन्त्री जितना कह पाते हैं, उतना ही राजा को असह्य होता जाता है। फिर एक जगह सुमन्त्र की वाणी रुक जाती है। जिस समाचार को लेकर वे लौटे हैं, उसके साथ अपना लौट सकना भी उन्हें कचोट रहा है। इसी रुकी हुई बात से तुलसीदास की कथा उस रात में प्रवेश करती है जिसमें कौसल्या अपने शोक को सँभालकर राजा को धीरज देने का प्रयत्न करती हैं।

दशरथ के लिये राम, लक्ष्मण और सीता का पता जानना अभी सबसे बड़ा प्रश्न है। दूर रहे भरत के लिये वही प्रश्न बाद में उठेगा। बीच में पिता का प्राणांत होता है, अयोध्या शोक में डूबती है और वसिष्ठ दोनों भाइयों को बुलवाते हैं। घर की विपत्ति का पूरा समाचार भरत तक एक साथ नहीं पहुँचता। पहले आशंकाएँ हैं, फिर नगर का मौन, फिर माता का उत्तर। उनकी प्रत्येक नयी जानकारी पिछले दुःख को एक और अर्थ देती है। हम यहाँ उस क्रम को उसके पूरे भार के साथ देखते हैं, क्योंकि अन्त में भरत की चुप्पी तक पहुँचने का रास्ता इन्हीं अलग घड़ियों से होकर जाता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • दशरथ अयोध्या के राजा और राम के पिता, जो सुमन्त्र का समाचार सुनकर विरह से अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं।
  • कौसल्या राम की माता, जो राजा की दशा पहचानकर अयोध्या और उसके प्रियजनों के लिये उनसे धीरज रखने की विनती करती हैं।
  • सुमन्त्र लौटकर राम का सन्देश सुनानेवाले मन्त्री और सारथी, जिनकी बात अपने क्लेश पर आकर रुक जाती है।
  • वसिष्ठ गुरु, जो शोकाकुल लोगों को सान्त्वना देते हैं और भरत तथा शत्रुघ्न को बुलाने का प्रबन्ध करते हैं।
  • भरत और शत्रुघ्न गुरु के बुलावे पर लौटनेवाले दोनों भाई। भरत की चिन्ता, प्रश्न और आघात इस यात्रा के साथ खुलते हैं।
  • कैकेयी भरत की माता, जिनका हर्ष दुखी परिवार के बीच अलग दिखाई देता है और जिनके उत्तर से भरत को विपत्ति का पता चलता है।

नाव चली, मन्त्री की वाणी रुक गयी

सुमन्त्र बताते हैं कि राम का रुख पाते ही केवट ने पार जाने के लिये नाव चला दी। यह उस यात्रा का समाचार है जिसे मन्त्री अब राजा को सुना रहे हैं। राम के प्रस्थान और उनके पीछे रह गये सुमन्त्र के बीच तुलसी एक बहुत कठोर बिम्ब रखते हैं। मन्त्री अपनी छाती पर वज्र रखकर देखते रहने की बात कहते हैं। आँखों के सामने से विदा होते प्रियजनों को रोकने की कोई चेष्टा यहाँ नहीं कही गयी। देखने की विवशता ही उस वज्र का भार है।

तेहि अवसर रघुबर रुख पाई । केवट पारहि नाव चलाई॥
रघुकुलतिलक चले एहि भाँती । देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती॥

चौपाई १

इसके बाद सुमन्त्र अपने क्लेश को कहने लगते हैं और उसी में उनकी बात अटक जाती है। राम का सन्देश लेकर जीते लौट आने पर उन्हें ग्लानि है। समाचार पहुँचाना उनका काम था, पर इस क्षण अपना बचा रहना ही उन्हें खल रहा है। वे अपने दुःख को पूरा व्यक्त कैसे करें, यह पूछकर चुप हो जाते हैं। हानि, ग्लानि और सोच ने वाणी को रोक लिया है। सुननेवाले के लिये अब केवल कहे हुए शब्द नहीं बचे, मन्त्री की यह रुकावट भी सामने है।

सारथी की बात सुनते ही दशरथ पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। हृदय में भयानक दाह है, शरीर तड़पता है और मन भीषण मोह से व्याकुल हो जाता है। तुलसी मछली का बिम्ब लाते हैं जिसे माँजा व्याप गया हो। पोद्दार जी की टीका इस शब्द को पहली वर्षा का जल लग जाने से खोलती है। राजा की दशा में उस आकुल जीव की तड़प दिखाई गयी है। मन्त्री के वर्णन में छाती पर वज्र था, राजा की प्रतिक्रिया में जलन और तड़प है। एक ही वियोग दोनों को उनके अपने रूप में असह्य हो रहा है।

रानियाँ विलाप करके रोने लगती हैं। कवि उस विपत्ति का वर्णन करते हुए दुःख और धीरज को भी जैसे सुननेवालों में सम्मिलित कर देते हैं। ऐसा विलाप है कि दुःख को दुःख लग गया और धीरज का धीरज भाग गया। जिन शब्दों से संकट को सँभालने की आशा की जाती है, उन्हीं को यहाँ असमर्थ दिखाया गया है। इससे कौसल्या का आगे धीरज धरना और भी कठिन दिखाई देता है। उन्हें उसी शोक के बीच राजा से बात करनी है जिसमें सबकी स्थिरता जाती रही है।

भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहु कुलिस कठोरु॥ १५३॥

दोहा १५३

रनिवास का रोना अयोध्या भर में फैल जाता है। तुलसी इसे रात के समय पक्षियों के विशाल वन में वज्र गिरने जैसा कहते हैं। बिम्ब में विशाल वन है, बहुत से पक्षी हैं और रात को पड़ा वज्र का भीषण आघात है। महल की विपत्ति नगर से अलग नहीं रहती। राजा अभी जीवित हैं, पर उनकी दशा पर उठा कोलाहल पूरे अवध को घेर चुका है। इस दोहे को पढ़ते हुए उस पहली घड़ी को पहचानना आवश्यक है। पिता का अन्तिम प्राणांत अभी आगे है, और नगर उससे पहले ही राम के वियोग तथा राजा की विकलता से व्यथित हो उठा है।

सुमन्त्र नाव के चलने और राम का सन्देश लेकर लौटने की बात सुनाकर चुप हो जाते हैं। दशरथ धरती पर गिरते हैं, रानियाँ विलाप करती हैं और रनिवास का शोक अयोध्या भर में कोलाहल बनकर फैल जाता है।

कौसल्या की विनती में पूरी अयोध्या

राजा के प्राण कण्ठ तक आ गये हैं। तुलसी उनकी व्याकुलता को मणि खो चुके साँप से और इन्द्रियों की विकलता को बिना जल के तालाब में मुरझाते कमलों से समझाते हैं। इन दोनों उपमाओं में जीवन को सँभालनेवाली वस्तु चली गयी है। कौसल्या दशरथ को इस दशा में देखती हैं और हृदय में पहचान लेती हैं कि सूर्यकुल का सूर्य अस्त होने को है। उनके सामने संकट की गहराई स्पष्ट है। फिर भी वे हृदय में धीरज रखती हैं और समय के अनुरूप बोलती हैं।

कौसल्या राम की माता हैं। जिस वियोग से राजा टूट रहे हैं, उसी से उनका अपना सम्बन्ध भी उतना ही निकट है। उनकी बात में इसीलिये शोक से बाहर खड़े किसी समझानेवाले की दूरी नहीं आती। वे स्वामी से मन में समझकर विचार करने की विनती करती हैं। उनका आग्रह पहले राजा को यह दिखाता है कि इस दुःख में कौन उनके साथ है और उनके धीरज पर कितने लोगों का सहारा टिका हुआ है।

नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू॥
करनधार तुम्ह अवध जहाजू । चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू॥

चौपाई २

राम का वियोग अपार समुद्र है। अयोध्या उस पर चलनेवाला जहाज है और दशरथ उसके कर्णधार हैं। समस्त प्रियजन उस जहाज पर चढ़े यात्रियों का समुदाय हैं। टीका प्रियजनों में कुटुम्बियों और प्रजा, दोनों को सम्मिलित करती है। कौसल्या के एक रूपक में घर और नगर साथ आ जाते हैं। समुद्र सबके लिये एक है, जहाज भी साझा है, और उसे सँभालनेवाले की दशा सभी यात्रियों तक पहुँचेगी। राजा का धैर्य इस तरह उनके अपने प्राण से आगे बढ़कर पूरे समुदाय का प्रश्न बन जाता है।

विनती का अगला भाग इसी चित्र को पूरा करता है। आप धीरज रखेंगे तो सब पार पहुँचेंगे; उसके छूटने पर पूरा परिवार डूब जायेगा। कौसल्या संकट को छोटा करके नहीं दिखातीं। वे उसे अपार समुद्र कह चुकी हैं। उसी विशालता के भीतर वह उपाय बताती हैं जिसे राजा इस समय अपना सकते हैं। फिर वे अपनी विनती को प्रिय स्वामी के हृदय में स्थान देने की प्रार्थना करती हैं और राम, लक्ष्मण, सीता से फिर मिलन की आशा रखती हैं। जिन तीनों का वियोग है, उन तीनों के नाम उस आशा में भी साथ रहते हैं।

प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि॥ १५४॥

दोहा १५४

प्रिय पत्नी के कोमल वचन सुनकर दशरथ आँखें खोलते हैं। यहाँ तुलसी फिर मछली को याद करते हैं। पहले वह व्याकुल होकर तड़प रही थी; अब उस दीन मछली पर शीतल जल छिड़का जा रहा है। कौसल्या की बात का फल इसी शीतलता में दिखाई देता है। वियोग का कारण दूर नहीं हुआ, पर राजा फिर आँख खोलकर देख सके हैं। धीरज देने की उनकी चेष्टा को कथा यह सीमित, स्पष्ट प्रभाव देती है।

दशरथ धीरज धरकर उठ बैठते हैं और सुमन्त्र से फिर पूछते हैं कि कृपालु राम कहाँ हैं। फिर लक्ष्मण का प्रश्न आता है, स्नेही राम का नाम दोबारा आता है और प्यारी पुत्रवधू वैदेही का पता पूछा जाता है। कौसल्या के जहाज में समस्त प्रियजन थे; राजा की वाणी में अब वे प्रियजन एक एक नाम लेकर लौटते हैं जिनके बिना यह रात बीत नहीं रही। प्रश्नों का उत्तर पाने की लालसा बनी है, यद्यपि मन्त्री अपना समाचार कह चुके हैं। हम उस पुनरावृत्ति में किसी नयी सूचना की अपेक्षा के साथ पिता के प्रेम की व्याकुलता भी सुनते हैं।

कौसल्या वियोग को समुद्र, अयोध्या को जहाज और राजा को उसका कर्णधार बताकर धीरज की विनती करती हैं। उनके कोमल वचन सुनकर दशरथ आँखें खोलते और उठ बैठते हैं। फिर वे राम, लक्ष्मण और वैदेही का पता पूछते हैं।

एक स्मृति, और अन्त में छह बार राम

राजा अनेक प्रकार से विलाप करते हैं। रात युग के समान बड़ी हो गयी है, बीतती ही नहीं। इसी व्याकुलता में उन्हें अन्धे तपस्वी के शाप की स्मृति आती है। पोद्दार जी उस तपस्वी की पहचान श्रवणकुमार के पिता के रूप में देते हैं। दशरथ कौसल्या को पूरा इतिहास सुनाते हैं, पर इस स्थान पर कवि उस इतिहास के भीतर की घटनाएँ नहीं खोलते। कथा राजा के उसे याद करने और कहते कहते व्याकुल होने पर ठहरती है। वर्तमान का दुःख अब पुरानी स्मृति के साथ जुड़ गया है।

उस वृत्तान्त का वर्णन करते हुए दशरथ राम के बिना जीवन की आशा को धिक्कारते हैं। वे अपने शरीर से शिकायत करते हैं कि उसने प्रेम का प्रण नहीं निबाहा। यह उस पिता का आत्मभर्त्सना से भरा विलाप है जिसे अपना जीते रहना भी विरह के सामने असह्य लग रहा है। थोड़ी देर पहले मन्त्री ने सन्देश लेकर जीवित लौट आने पर ग्लानि कही थी। राजा के शब्दों में भी बचा हुआ जीवन प्रश्न बन गया है। दोनों के कथन उनके अलग दुःखों को उसी अनुपस्थित प्रिय के पास ले जाते हैं।

हा रघुनंदन प्रान पिरीते । तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥
हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर॥

चौपाई ३

दशरथ रघुकुल को आनन्द देनेवाले अपने प्राणप्रिय राम को पुकारते हैं। उनके बिना बहुत दिन जी लेने का कथन इसी व्याकुल अनुभव का हिस्सा है। फिर जानकी, लक्ष्मण और रघुवर की पुकार आती है। पिता के चित्त को चातक और राम को उसके हितकारी मेघ का रूप मिलता है। कौसल्या की वाणी में वियोग अपार समुद्र था। राजा की लालसा में अब प्रिय पुत्र उस मेघ के रूप में आते हैं जिसका चातक को सहारा है। चातक की ओर से पुकार है और उसे तृप्त करनेवाले की अनुपस्थिति है।

राम को कभी रघुकुल के आनन्द, कभी प्राणप्रिय पुत्र और कभी पिता के चित्त के हितकारी मेघ के रूप में पुकारा जाता है। इन सम्बोधनों में वंश का नाम भी है और दशरथ का निजी स्नेह भी। साथ ही जानकी और लक्ष्मण छूटते नहीं। उनका शोक उस पूरे वियोग को लिये हुए है जिसमें पुत्र, छोटे पुत्र और पुत्रवधू, तीनों आँखों से दूर हैं। प्रश्नों में पूछा गया उनका पता अब पुकारों में बदल गया है।

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥ १५५॥

दोहा १५५

इस दोहे की पहली पंक्ति में राम का नाम छह बार आता है। टीका उसका क्रम भी वैसा ही खोलती है: पहले दो बार, फिर एक बार, फिर दो बार और फिर एक बार। उसके बाद दूसरी पंक्ति में घटना कही जाती है। राजा राम के विरह में शरीर त्यागते हैं और सुरधाम जाते हैं। विलाप के बीच जिसे कौसल्या ने पहचान लिया था, वह प्राणांत अब सचमुच घटता है। पहले के धरती पर गिरने, फिर आँख खोलने और उठ बैठने से इस अन्तिम घड़ी का भेद दोहा स्वयं स्पष्ट कर देता है।

इतनी विस्तृत व्याकुलता के बाद अन्तिम कथन बहुत छोटा है। नये सम्बोधन भी नहीं जुड़ते। राम के नाम की पुनरावृत्ति और शरीर छोड़ने की घटना के बीच ही दोहा पूरा हो जाता है। पुत्र को पुकारते राजा के जीवन का यह अन्त है। इसके आगे जो वाणी सुनाई देगी, वह पीछे रह गयी रानियों, सेवकों और नगर की होगी। कवि उससे पहले दशरथ के जीवन और मरण को अपने भक्तिभाव से देखेंगे।

दशरथ अन्धे तपस्वी का शाप याद करके कौसल्या को इतिहास सुनाते हैं, फिर राम के बिना जीवन पर विलाप करते हैं। राम का नाम छह बार लेते हुए वे विरह में शरीर त्यागकर सुरधाम जाते हैं।

सूर्यकुल का सूर्य अस्त हुआ

जिअन मरन फलु दसरथ पावा । अंड अनेक अमल जसु छावा॥
जिअत राम बिधु बदनु निहारा । राम बिरह करि मरनु सँवारा॥

चौपाई ४

दशरथ के प्राणांत के बाद तुलसी उनके जीवन और मृत्यु, दोनों का फल पाया हुआ कहते हैं। जीते हुए उन्होंने राम का चन्द्रमा के समान मुख देखा; मरते हुए राम के विरह को निमित्त बनाया। कवि इसी भक्तिभाव से उनके निर्मल यश को अनेक ब्रह्माण्डों में छाया हुआ देखते हैं। यह दशरथ के प्रति तुलसी की श्रद्धा का कथन है। राजा की अन्तिम पुकार को वे राम से उनके जीवन भर के सम्बन्ध में रखते हैं और उसी सम्बन्ध से मरण की महिमा कहते हैं।

कवि की इस दृष्टि के साथ पीछे रह गये लोगों का शोक भी पूरा उपस्थित है। रानियाँ राजा के रूप, शील, बल और तेज का बखान करती हुई रोती हैं। प्रत्येक गुण की स्मृति उस व्यक्ति की अनुपस्थिति को और स्पष्ट करती है। अनेक प्रकार का विलाप होता है और वे बार बार पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं। पहले राजा की दशा देखकर उठा रोना अब उनके प्राणांत के बाद का रोना है। बीच में कौसल्या की विनती से मिली वह थोड़ी स्थिरता भी बीत चुकी है।

दास और दासियाँ भी व्याकुल हैं। नगर के लोग घर घर रो रहे हैं और कहते हैं कि धर्म की सीमा, गुण तथा रूप के भण्डार, सूर्यकुल के सूर्य आज अस्त हो गये। कौसल्या ने राजा को म्लान देखकर हृदय में जिस अस्त होते सूर्य को पहचाना था, वही बिम्ब अब नगर की वाणी में आता है। वहाँ सम्भावित अन्त का बोध था, यहाँ घट चुकी मृत्यु का शोक है। एक घर की पहचान पूरे नगर के कथन तक फैल गयी है।

नगर के लोग कैकेयी को दोष देते हैं। उनके क्रोध में यह आरोप है कि उन्होंने सारे संसार को आँखों से रहित कर दिया। यह शोकाकुल अयोध्या की वाणी है, जो राजा के चले जाने को अपने देखने का सहारा खो देना मानती है। सूर्य का अस्त होना और जगत का नेत्रहीन हो जाना, दोनों बिम्ब उसी अभाव को अलग प्रकार से व्यक्त करते हैं। राजपरिवार के साथ दास, दासियाँ और पुरवासी भी इस पीड़ा में दिखाई देते हैं; किसी एक कक्ष का वर्णन उसे समेट नहीं सकता।

इसी तरह विलाप करते हुए रात बीतती है। राजा के लिये जो रात युग के समान लग रही थी, उसके बीतने पर अब वे स्वयं नहीं हैं। प्रातः बड़े ज्ञानी मुनि आते हैं। समय बदलता है और उसके साथ कथा का काम भी बदलता है। शोक के बीच उपस्थित लोगों को सँभालना है, फिर ऐसी व्यवस्था करनी है जिससे दूर रहे पुत्र बुलाये जा सकें। इस क्रम में वसिष्ठ की भूमिका सामने आती है।

तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।
सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥ १५६॥

दोहा १५६

वसिष्ठ समय के अनुकूल अनेक इतिहास कहते हैं और अपने विज्ञान के प्रकाश से सबका शोक दूर करते हैं। किन इतिहासों को उन्होंने सुनाया, दोहा उनका विस्तार नहीं देता। उनके उपदेश का प्रभाव बताया गया है और आगे का प्रबन्ध उसी के बाद आता है। यह सान्त्वना उस समुदाय तक पहुँचती है जिसका विलाप अभी घर घर सुनाई दे रहा था। रानियों के व्यक्तिगत गुणस्मरण से नगर के सामूहिक शोक तक जाने के बाद कथा गुरु की उस समझ पर टिकती है जो इस समय लोगों को सँभाल सके।

तुलसी दशरथ के जीवन और मरण की भक्तिपूर्ण महिमा कहते हैं। रानियाँ, सेवक और पुरवासी शोक करते हैं; कैकेयी को दोष दिया जाता है। रात बीतने पर आये वसिष्ठ समय के अनुरूप इतिहास सुनाकर लोगों को सान्त्वना देते हैं।

एक बुलावा, जिसका पूरा कारण नहीं बताया गया

वसिष्ठ नाव में तेल भरवाकर राजा का शरीर उसमें रखवाते हैं। इसके बाद दूत बुलाये जाते हैं। शोक के बीच किया गया यह प्रबन्ध कथा में बहुत संक्षेप से आता है, पर इससे भरत को बुलाने तक की स्थिति स्पष्ट होती है। राजा का शरीर रखा गया है और दूर रहे पुत्रों को शीघ्र बुलाना है। अभी अन्त्येष्टि का वर्णन नहीं है। आगे का ध्यान उन दूतों पर है जिन्हें गुरु एक अत्यन्त सीमित सन्देश देकर भेजते हैं।

तेल नावँ भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा॥
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू । नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू ॥

चौपाई ५

दूतों को आज्ञा है कि जल्दी भरत के पास जायें और राजा की मृत्यु का समाचार कहीं किसी से न कहें। भरत से केवल इतना कहना है कि गुरु ने दोनों भाइयों को बुलाया है। बुलावा भरत और शत्रुघ्न, दोनों के लिये है। जो बात दूत जानते हैं और जो बात उन्हें कहनी है, वे अलग रखी गयी हैं। भरत के आगे के प्रश्नों को समझने के लिये यह भेद महत्त्वपूर्ण है। वे लौटेंगे तो गुरु की आज्ञा पर; मृत्यु का समाचार उन्हें अभी नहीं दिया गया है।

आज्ञा सुनते ही दूत दौड़ते हैं। तुलसी उनके वेग को उत्तम घोड़ों को भी लजानेवाला कहते हैं। इस शीघ्रता के बीच कथा भरत के मन की ओर जाती है। जब से अयोध्या में अनर्थ आरम्भ हुआ, तभी से उन्हें अपशकुन हो रहे हैं। रातों में भयानक स्वप्न आते हैं और जागने पर उनसे अनेक बुरी कल्पनाएँ उठती हैं। जिस विपत्ति का स्पष्ट समाचार छिपाया गया है, उसकी आशंका भरत के अनुभव में पहले से मौजूद है।

बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना । सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥
मागहिं हृदयँ महेस मनाई । कुसल मातु पितु परिजन भाई॥

चौपाई ६

भरत प्रतिदिन ब्राह्मणों को भोजन कराते और दान देते हैं। अनेक विधियों से शिव का अभिषेक करते हैं, जिसे टीका रुद्राभिषेक कहती है। उनके मन की प्रार्थना माता, पिता, कुटुम्बियों और भाइयों के कुशल की है। इस चिन्ता में अपनी कोई उपलब्धि नहीं माँगी जाती। जिन लोगों से वे दूर हैं, उन्हीं के कल्याण के लिये महादेव को हृदय में मनाते हैं। स्वप्नों से उठी आशंकाएँ उनके दिन के इन कार्यों में दिखाई देती हैं।

यह विवरण भरत की वापसी को उसका अपना आरम्भ देता है। घर की विपत्ति से अनजान होना उनके लिये निश्चिन्त होना नहीं है। भयावह सपनों के बाद बुरी सम्भावनाएँ मन में आती रही हैं; पूजा और दान के साथ परिवार का कुशल माँगा जाता रहा है। फिर भी किस घटना ने घर को घेरा है, यह उन्हें मालूम नहीं। इसीलिये दूतों का पहुँचना उनकी चिन्ता का उत्तर नहीं बनता। उसमें केवल शीघ्र लौटने की आज्ञा है।

एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ॥ १५७॥

दोहा १५७

भरत इसी प्रकार सोच रहे हैं कि दूत पहुँचते हैं। गुरु का आदेश सुनते ही वे गणेश को मनाकर चल पड़ते हैं। यहाँ महादेव से परिवार का कुशल माँगने और प्रस्थान पर गणेश का स्मरण करने, दोनों बातों का अपना स्थान है। एक उनकी चलती हुई चिन्ता के दिनों में है, दूसरी यात्रा आरम्भ करने की घड़ी में। कथा उनकी गति को अब अयोध्या की ओर मोड़ती है। उधर का शोक हम देख चुके हैं; इधर लौटनेवाले पुत्र को उसका पूरा कारण जानना अभी शेष है।

वसिष्ठ राजा का शरीर तेल भरी नाव में रखवाकर दूत भेजते हैं। मृत्यु का समाचार छिपाते हुए दोनों भाइयों को गुरु के नाम से बुलाया जाता है। पहले से आशंकित भरत परिवार का कुशल माँगते रहे हैं; आदेश सुनकर वे गणेश का स्मरण करते हुए चल पड़ते हैं।

नगर पास आया, उत्तर नहीं मिला

भरत वायु के समान वेगवाले घोड़ों को हाँकते हुए चले हैं। विकट नदियाँ, पहाड़ और वन यात्रा में पीछे छूटते जाते हैं। फिर भी हृदय का सोच इतना बड़ा है कि कुछ सुहाता नहीं। मन में आता है कि उड़कर पहुँच जायें। यात्रा की गति और मन की बेचैनी एक साथ रखी गयी हैं। घोड़े कितनी भी तेजी से बढ़ें, घर पहुँचने की इच्छा के आगे वह वेग अपर्याप्त लगता है।

एक निमेष वर्ष के समान बीतता है। राजा के विलाप में रात युग जैसी हुई थी; लौटते पुत्र के लिये अब क्षण वर्ष जैसा हो गया है। दोनों के अनुभव में प्रियजनों की दूरी समय को असह्य ढंग से बढ़ाती है। इसी चिन्ता में भरत नगर के निकट पहुँचते हैं। कथा किसी निश्चित यात्रा अवधि का हिसाब नहीं देती। वह उस अधीर मन को दिखाती है जिसके लिये छोटी से छोटी प्रतीक्षा भी लम्बी है।

नगर में प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगते हैं। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरह काँव काँव करते हैं। गदहों और सियारों का बोलना भी प्रतिकूल है। भरत उन्हें सुनते हैं और मन में पीड़ा होती है। पहले सपनों और कल्पनाओं ने आशंका जगायी थी, अब पहुँचने के मार्ग पर सुनी गयी ध्वनियाँ उसी चिन्ता को बढ़ाती हैं। किसी ने अभी उनका प्रश्न नहीं सुना, किसी ने उत्तर नहीं दिया, पर नगर का अनुभव उन्हें पहले से और भयभीत कर रहा है।

खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला॥
श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा॥

चौपाई ७

तालाब, नदी, वन और बगीचे शोभाहीन लगते हैं। नगर विशेष रूप से भयावह है। तुलसी पक्षियों, पशुओं, घोड़ों और हाथियों को भी राम के वियोगरूपी बुरे रोग से सताया हुआ कहते हैं। उनकी दशा देखी नहीं जाती। अयोध्या की पीड़ा का यह फैलाव उस कोलाहल से जुड़ता है जो पहले महल से नगर तक पहुँचा था। अब उसकी छाप नगर के जीवों और परिवेश के वर्णन में भी है। भरत जिस घर की कुशल चाहते आये हैं, उसके चारों ओर दुख का यही दृश्य मिलता है।

स्त्री और पुरुष ऐसे दुखी हैं मानो सबने अपनी सारी सम्पत्ति खो दी हो। इस उपमा में हानि का हिस्सा बाँटा नहीं गया। प्रत्येक व्यक्ति सब कुछ हारा हुआ जान पड़ता है। राजपरिवार की विपत्ति नगर के प्रत्येक जीवन को छूती हुई कही गयी है। फिर भी भरत से मिलनेवाले लोगों के पास कोई विस्तृत कथन नहीं आता। उनकी दशा बहुत कुछ जताती है, उनका अभिवादन हुआ जाता है और शब्द अनुपस्थित रहते हैं।

पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं॥ १५८॥

दोहा १५८

पुरवासी मिलते हैं, चुपके से वन्दना करते हैं और चले जाते हैं। भरत भी उनसे कुशल नहीं पूछ पाते। उनके मन में भय और विषाद इतना छा गया है कि प्रश्न उठने पर भी पूछा नहीं जा सकता। इस मौन के दोनों ओर दुःख है, पर जानकारी एक सी नहीं। नगर शोक का कारण जानता है; भरत अभी उस कारण तक नहीं पहुँचे। दोहे में यही असमानता एक बहुत छोटी भेंट के भीतर समा जाती है।

बाजार और रास्तों की दशा भी देखी नहीं जाती। मानो नगर की दसों दिशाओं में दावाग्नि लग गयी हो। यह उपमा उस व्यापक व्यथा को सामने रखती है जिसके बीच भरत आगे बढ़ते हैं। चारों ओर की उदासी के बाद अब घर की ओर से स्वागत आनेवाला है। वहाँ कैकेयी का हर्ष मिलेगा, और उसी हर्ष के बीच वह समाचार कहा जायेगा जिसके लिये भरत की सारी आशंकाएँ भी उन्हें तैयार नहीं कर सकी हैं।

भरत शीघ्र अयोध्या पहुँचने को व्याकुल हैं। नगर के पास अपशकुन, शोभाहीन परिवेश और दुखी लोगों को देखते हैं। पुरवासी मौन अभिवादन करके चले जाते हैं; भय और विषाद के कारण भरत भी कुशल नहीं पूछ पाते।

माता का हर्ष और पुत्र का प्रश्न

पुत्र के आने का समाचार सुनकर कैकेयी हर्षित होती हैं। तुलसी उन्हें सूर्यकुलरूपी कमल के लिये चाँदनी कहते हैं। इस छवि के तुरन्त बाद उनका उत्साह क्रिया में दिखाई देता है। वे आरती सजाती हैं, आनन्द से उठ दौड़ती हैं और द्वार पर ही मिलकर दोनों भाइयों को भवन में ले आती हैं। पोद्दार जी की टीका यहाँ भरत और शत्रुघ्न, दोनों का नाम स्पष्ट करती है। जिस बुलावे में दोनों को लौटने का आदेश था, उसी यात्रा के बाद स्वागत में भी दोनों उपस्थित हैं।

भरत परिवार को अत्यन्त दुखी देखते हैं। तुलसी कहते हैं मानो कमलों के वन को पाला मार गया हो। राजा की विकल इन्द्रियों के लिये पहले जलहीन तालाब के कमल आये थे; परिवार की दशा में अब पाले से मारा हुआ कमलवन है। इन बिम्बों में दुख की मार अलग स्थानों पर दिखाई गयी है। भरत के लिये घर पहुँचकर भी आश्वस्त हो पाने का अवसर नहीं बनता। वहाँ वही व्यथा है जिसकी छाप नगर में मिली थी।

उस दुखी परिवार में कैकेयी अकेली हर्षित दिखाई देती हैं। कवि उनके हर्ष के लिये जंगल में आग लगाकर प्रसन्न हुई भीलनी का कठोर बिम्ब देते हैं। यह कैकेयी के व्यवहार पर तुलसी का आरोप है: जिस अनर्थ से परिवार दुखी है, उसी के बीच उनका अपना हर्ष बना हुआ है। भरत को सोचग्रस्त और मनमारा देखकर वे अपने नैहर की कुशल पूछती हैं। उनकी चिन्ता का प्रश्न उधर जाता है जहाँ से पुत्र लौटे हैं; पुत्र की चिन्ता इस घर पर है जिसमें वे आ पहुँचे हैं।

सकल कुसल कहि भरत सुनाई । पूँछी निज कुल कुसल भलाई॥
कहु कहँ तात कहाँ सब माता । कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता॥

चौपाई ८

भरत नैहर की सब कुशल कह सुनाते हैं। इसके बाद वे अपने कुल की कुशल पूछते हैं। पिता कहाँ हैं, सब माताएँ कहाँ हैं, सीता और प्रिय भाई राम तथा लक्ष्मण कहाँ हैं? उनके प्रश्न में पूरा परिवार आता है। कुछ समय पहले यही तीन वनगामी नाम दशरथ की वाणी में थे; अब पिता के नाम के साथ वे भरत की वाणी में हैं। प्रश्न पूछते समय भरत को अभी पिता की मृत्यु भी नहीं मालूम। उनका स्नेह प्रत्येक सम्बन्ध का पता चाहता है।

पुत्र के स्नेहमय वचन सुनकर कैकेयी आँखों में आँसू भरती हैं। तुलसी इन्हें कपट का जल कहते हैं। अगले वचन भरत के कान और मन में शूल की तरह चुभनेवाले हैं, यह दोहा पहले ही बता देता है। आँसू और शूल एक ही उत्तर की भूमिका बनते हैं। कैकेयी अपनी बात जिस अर्थ में कह रही हैं, भरत को उसका आघात उससे कहीं बड़ा मिलनेवाला है।

तात बात मैं सकल सँवारी । भै मंथरा सहाय बिचारी॥
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ॥

चौपाई ९

कैकेयी पुत्र से कहती हैं कि उन्होंने सारी बात सँवार ली थी। मन्थरा को बेचारी कहती हैं और अपनी सहायक बताती हैं। फिर विधाता की ओर दोष जाता है: बीच में थोड़ा सा काम बिगड़ गया, राजा देवलोक को चले गये। पिता का प्राणांत उनके कथन में इसी थोड़े से बिगड़े काम के रूप में आता है। यह उनके अपने प्रयत्नों का मूल्यांकन है, और उसके साथ रखी गयी मृत्यु की सूचना है। भरत के लिये सुनने की अगली घड़ी इसी सूचना पर रुक जाती है।

कैकेयी आरती लेकर दोनों भाइयों का स्वागत करती हैं। दुखी परिवार देखकर भरत पहले नैहर की कुशल बताते हैं, फिर पिता और सभी प्रियजनों का पता पूछते हैं। कैकेयी अपने कार्य सँवार लेने और मन्थरा की सहायता का उल्लेख करके राजा की मृत्यु का समाचार देती हैं।

पहले पिता का शोक, फिर राम के वन जाने का समाचार

पिता की मृत्यु सुनते ही भरत विषाद से विवश हो जाते हैं। तुलसी उनकी दशा को सिंह की गर्जना सुनकर सहमे हाथी से समझाते हैं। माता के मुख से आया यह समाचार उन्हें पूरी तरह व्याकुल कर देता है। वे पिता को पुकारते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। नगर का मौन और घर की उदासी जिस अनर्थ का संकेत दे रहे थे, उसका एक कारण अब सामने है। पर इस पहचान के साथ और भी निजी वंचना उठती है: अन्तिम समय में पिता का दर्शन नहीं हुआ।

चलत न देखन पायउँ तोही । तात न रामहि सौंपेहु मोही॥
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी । कहु पितु मरन हेतु महतारी॥

चौपाई १०

भरत के विलाप में दो बातें आती हैं। पिता को जाते समय वे देख न सके, और पिता उन्हें राम को सौंपकर भी नहीं गये। पहली बात अन्तिम दर्शन से वंचित रह जाने का दुःख है। दूसरी में बड़े भाई के आश्रय की लालसा है। जिस क्षण पिता की अनुपस्थिति खुलती है, भरत उसी क्षण राम के पास अपने लिये सहारा देखते हैं। उन्हें राम के वन जाने का समाचार अभी नहीं मिला है। इसीलिये पिता से राम को सौंपे जाने की उनकी बात को हम पहले शोक के भीतर ही सुनते हैं।

फिर भरत धीरज धरते हैं, सँभलकर उठते हैं और माता से पिता की मृत्यु का कारण पूछते हैं। नगर में वे कुशल पूछ नहीं पाये थे। घर में स्नेह से सबका पता पूछा, तो मृत्यु का समाचार मिला। अब प्रश्न और निकट आ गया है: ऐसा क्यों हुआ? पिता के लिये किये विलाप के बाद ही यह प्रश्न आता है। उसके उत्तर में कैकेयी अपने सारे कार्य बतायेंगी, और उसी से भरत को उस विपत्ति का पता चलेगा जिसने इस घर को घेरा है।

पुत्र का प्रश्न सुनकर कैकेयी अपनी करनी आरम्भ से सुनाती हैं। तुलसी उन्हें कुटिल और कठोर कहते हैं तथा बताते हैं कि वे प्रसन्न मन से सबका वर्णन करती हैं। उस कथन की चोट के लिये कवि मर्मस्थान को चीरकर उसमें विष भरने का बिम्ब लाते हैं। पिता की मृत्यु ने भरत को पहले ही विदीर्ण किया है। अब उसी दुःख के भीतर माता का अगला समाचार उतरता है। उनके वर्णन के शब्द यहाँ विस्तार से नहीं दिये गये; उसकी कठोरता और उसे सुननेवाले पर पड़ा प्रभाव कहा गया है।

भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु॥ १६०॥

दोहा १६०

राम के वन जाने का समाचार सुनते ही भरत को पिता की मृत्यु भूल जाती है। अभी जिस शोक में वे धरती पर गिरकर विलाप कर रहे थे, उसके ऊपर यह नया आघात आ पड़ता है। इस विस्मृति में पिता के प्रति स्नेह कम होने की बात नहीं है। कथा नये दुःख की तीव्रता दिखाती है: जिस राम के आश्रय में सौंपे जाने की चाह अभी कही गयी थी, उनके वन जाने का समाचार अब मिला है। दोहे की पहली पंक्ति इन दोनों घड़ियों को जोड़ती है।

इसके साथ भरत अपने हृदय में स्वयं को सारे अनर्थ का कारण समझते हैं। यह उनका अपने प्रति उठता बोध है। वे कैकेयी के कथन का कोई उत्तर नहीं देते। मौन धारण किये, स्तम्भित रह जाते हैं। टीका उस दशा को वाणी बन्द हो जाना और सन्न रह जाना कहती है। अभी उनका कोई निर्णय सुनाई नहीं देता, कोई आगे की घोषणा नहीं होती। पिता की मृत्यु जानने से आरम्भ हुआ संवाद राम के वनगमन का समाचार सुनकर इसी निःशब्द आघात पर पहुँचता है।

भरत पहले पिता के लिये विलाप करते हैं और अन्तिम दर्शन न मिलने तथा राम को न सौंपे जाने का दुःख कहते हैं। सँभलकर मृत्यु का कारण पूछते हैं। कैकेयी का वृत्तान्त सुनकर राम के वनगमन का पता चलता है; भरत स्वयं को कारण मानकर स्तब्ध मौन में रह जाते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में हम समाचार के अलग अलग रूप देखते हैं। सुमन्त्र जो देख चुके हैं, उसे कहने का प्रयास करते हैं और अपने क्लेश पर चुप हो जाते हैं। वसिष्ठ दूतों को उतना ही कहने की आज्ञा देते हैं जितना दोनों भाइयों को बुलाने के लिये आवश्यक है। पुरवासी भरत का अभिवादन करके मौन चले जाते हैं। फिर कैकेयी बोलती हैं, और उनके कहे से भरत को वे तथ्य मिलते हैं जो अब तक छिपे थे। अन्त में चुप्पी भरत की है। प्रत्येक मौन का कारण और उसके पास पहुँचा हुआ ज्ञान अलग है।

कौसल्या की विनती भी इसी बीच अपनी पूरी जगह रखती है। वे राजा की मरणासन्न दशा पहचानकर अयोध्या के यात्रियों की बात करती हैं। भरत घर पहुँचकर पिता, माताओं, सीता और भाइयों का पता पूछते हैं। दोनों की वाणी अपने दुःख के बीच सम्बन्धों को गिनती है। कौसल्या उन्हें जहाज में साथ देखती हैं; भरत उन्हें नाम लेकर खोजते हैं। उन्हीं सम्बन्धों में राम की अनुपस्थिति सब ओर फैलती दिखाई देती है।

और भरत की अन्तिम चुप्पी तक पहुँचते हुए पहले किया गया उनका विलाप याद रहता है। पिता उन्हें राम को सौंपकर नहीं गये, यह बात कहने के बाद ही उन्हें राम के वन जाने का पता चला। इस क्रम से उस नये शोक का भार समझ में आता है। जिनके आश्रय का नाम लिया गया, उन्हीं की दूरी अगले उत्तर में खुली। शब्दों से भरा माता का वृत्तान्त पूरा होता है, और सुननेवाले के पास अभी शब्द नहीं बचते।

आरम्भ में सुमन्त्र राम का सन्देश लिये सामने हैं। अन्त में भरत उसी राम के वन जाने का समाचार लिये मौन हैं। बीच में दशरथ की छह पुकारें, कौसल्या की विनती और अयोध्या का विलाप है। इस छोटे से क्रम में वियोग अनेक लोगों तक पहुँचता है, और प्रत्येक के लिये उसका अपना घाव खुलता है।

भरत अब घर आ चुके हैं। पिता के प्राणांत और राम के वनगमन, दोनों का पता मिल गया है। उनके भीतर स्वयं को कारण मानने का आघात है, पर मुख से अभी कोई उत्तर नहीं निकला। दोहा इसी स्तब्धता पर ठहरता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १५३ से १६०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English