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राम की साँथरी और गुह का प्रेम

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · राम की साँथरी और गुह का प्रेम

राम की साँथरी और गुह का प्रेम

भरत को राम के सखा मिल गये हैं। अब वे उस स्थान को देखना चाहते हैं जहाँ राम ने विश्राम किया था। कुश की बिछावन, चरणों की धूल और सोने के कुछ कण उनके सामने घर की सारी स्मृतियाँ खोल देते हैं।

भरत और निषादराज गुह का आलिंगन अभी चल रहा है। देखने वाले उसकी रीति पर रीझ रहे हैं, और देवता फूल बरसाते हुए रामनाम की महिमा कहने लगते हैं। उसी मिलन से आगे एक ऐसी यात्रा खुलती है जिसकी मंज़िल बहुत छोटी है: अशोक के वृक्ष के नीचे कुश की बिछावन। भरत वहाँ जाकर अपनी आँखों और मन की जलन कुछ शान्त करना चाहते हैं। पर उस जगह का एक-एक चिह्न उनके भीतर नया दुःख जगा देता है।

तुलसीदास के रामचरितमानस का यह प्रसंग दो सखाओं के साथ चलता है। गुह को भरत के स्नेह में अपना कल्याण दिखाई देता है, और भरत को गुह के पास राम की स्मृति मिलती है। बीच में नगर के लोग हैं, सब माताएँ हैं, उनके ठहरने की व्यवस्था है, गंगा का स्नान और प्रेम की प्रार्थना है। भरत पहले सबकी सुध लेते हैं, माताओं की सेवा करते हैं, तब अपने दुःख की ओर जाते हैं। जिस सखा का हाथ पकड़कर वे वहाँ पहुँचते हैं, अन्त में उसी की बात उन्हें धीरज देने आती है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • भरत राम के छोटे भाई, जो गुह से मिलकर राम के विश्रामस्थल को देखना चाहते हैं और सीता, लक्ष्मण तथा राम की दशा सोचकर व्याकुल होते हैं।
  • गुह निषादराज और राम के सखा, जो सबके ठहरने की व्यवस्था करते हैं, भरत को कुशशय्या तक ले जाते हैं और राम का प्रेम याद दिलाते हैं।
  • शत्रुघ्न भरत के छोटे भाई, जो गुह से मिलते हैं और बाद में माताओं की सेवा के लिये उनके पास रहते हैं।
  • सीता, राम और लक्ष्मण जिनकी स्मृति इस प्रसंग में गंगा के घाट, कुश की बिछावन और भरत के वचनों में आती है।
  • माताएँ और अवध के लोग गुह को अपनाने, गंगा से प्रेम माँगने और साथ पड़ाव करने वाला अयोध्या का समाज।

एक आलिंगन पर देवताओं की वाणी

भरत गुह को बड़े प्रेम से गले लगा रहे हैं। तुलसी इस मिलन को देखने वालों पर भी ध्यान देते हैं। लोग दोनों के प्रेम की रीति की ऐसी प्रशंसा करते हैं जिसमें वैसा सौभाग्य पाने की ललक मिली हुई है। देवताओं की ओर से धन्य कहने की ध्वनि आती है, फूल बरसते हैं। धरती पर दो व्यक्तियों का आलिंगन है और उसके चारों ओर देखने वालों का सुख फैल रहा है। भरत के शरीर का पुलक उस प्रेम को प्रकट कर रहा है जिसके लिये कोई परिचय छोटा नहीं पड़ता।

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती॥
धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला॥

चौपाई १

देवता इस मिलन की बड़ाई कहते हुए उस समय की छुआछूत की धारणा सामने रखते हैं। उनके कथन में निषाद को लोक और वेद की दृष्टि से नीचा माना जाने और उसकी छाया छू जाने पर भी स्नान किये जाने की बात आती है। इसी सामाजिक दूरी के सामने वे राम के छोटे भाई को रखते हैं, जो उसी निषाद को भुजाओं में भरकर मिल रहे हैं। देवताओं का विस्मय भरत के इस खुले स्नेह पर है। जिन दूरियों का वे उल्लेख करते हैं, उस आलिंगन में उनका कोई संकोच दिखाई नहीं देता।

इसके बाद देवता रामनाम का प्रभाव बताते हैं। वे कहते हैं कि जो लोग जँभाई लेते हुए भी राम का नाम ले लेते हैं, उनके सामने पापों के समूह नहीं आते। पोद्दार की टीका जँभाई के इस उदाहरण को आलस्य में हुए नामोच्चार तक खोलती है। फिर गुह की बात कितनी बड़ी है: उन्हें स्वयं राम ने हृदय से लगाया है। देवताओं के अनुसार राम ने उन्हें उनके कुल सहित ऐसा पावन किया है कि वे जगत् को पवित्र करने वाले हो गये हैं। नाम का साधारण उच्चारण और राम का अपना आलिंगन, दोनों को रखकर वे इस मिलन का महत्त्व समझाते हैं।

करमनास जलु सुरसरि परई । तेहि को कहहु सीस नहिं धरई॥
उलटा नामु जपत जगु जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥

चौपाई २

उनके तर्क में पहले नदी का उदाहरण आता है। कर्मनाशा का जल गंगा में मिल जाता है तो कौन उसे सिर पर धारण नहीं करता? मिलने के बाद वही जल गंगा के आदर का भागी हो जाता है। देवता फिर वाल्मीकि का उदाहरण देते हैं: जगत् जानता है कि उलटा नाम जपते हुए वे ब्रह्म के समान हुए। पोद्दार की टीका यहाँ उलटे नाम को मरा-मरा के रूप में समझाती है। इस स्मरण का आशय रामनाम के प्रभाव को सामने रखना है। नाम की महिमा बताने के लिये देवताओं की वाणी में नदी का संगम और वाल्मीकि का जप एक साथ आते हैं।

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात॥ १९४॥

दोहा १९४

दोहा उसी देववाणी को आगे बढ़ाता है। उसमें चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात जैसे समुदायों के नाम तत्कालीन ऊँच-नीच की शब्दावली के साथ लिये गये हैं। देवता इन नामों को गिनाकर कहते हैं कि रामनाम का उच्चारण करने से वे भी परम पवित्र और संसार में प्रसिद्ध हो जाते हैं। इस कथन का पूरा आशय राम द्वारा मिली बड़ाई में है। देवता आगे पूछते हैं कि रघुवीर ने किसे बड़ाई नहीं दी। उनके अनुसार यह रीति युग-युग से चली आती है, इसलिये गुह पर हुई कृपा में आश्चर्य कैसा।

देवताओं की यह सारी चर्चा अवध के लोग सुन रहे हैं और सुख पा रहे हैं। इस तरह कथा में सुनना भी मिलन का हिस्सा हो जाता है। भरत गुह से मिले हैं, और उस मिलन को देखकर नगर का समाज राम के सखा का गौरव सुनता है। प्रशंसा एक आलिंगन से उठी थी और रामनाम की महिमा तक पहुँची। उसके बाद तुलसी फिर उन्हीं दोनों व्यक्तियों के पास लौट आते हैं, जहाँ भरत सखा की कुशल पूछने वाले हैं।

भरत और गुह का आलिंगन देखकर देवता फूल बरसाते हैं। तत्कालीन सामाजिक दूरियों का उल्लेख करते हुए वे रामनाम, कर्मनाशा के गंगा में मिलने और वाल्मीकि के जप का उदाहरण देते हैं। उनकी वाणी राम द्वारा सबको बड़ाई दिये जाने पर पूरी होती है, और अवध के लोग उसे सुनकर आनन्द पाते हैं।

गुह के लिये कुशल का अर्थ

राम के सखा से प्रेमपूर्वक मिलने के बाद भरत उनकी कुशल, मंगल और क्षेम पूछते हैं। इतने साधारण प्रश्न के उत्तर में गुह की दशा असाधारण हो जाती है। भरत का शील और स्नेह देखकर उन्हें अपने शरीर की सुध नहीं रहती। तुलसी इसके लिये विदेह होने का शब्द रखते हैं। पोद्दार की टीका उसका अर्थ प्रेम में देह की स्मृति भूल जाना बताती है। भरत ने उनका हाल पूछा है, और पूछने वाले का अपनापन ही उनके भीतर सबसे बड़ा समाचार बन गया है।

गुह के मन में संकोच, प्रेम और आनन्द बढ़ते जाते हैं। वे खड़े हुए एकटक भरत को देखते रहते हैं। फिर धीरज धरते हैं, उनके चरणों की वन्दना करते हैं और हाथ जोड़कर प्रेम से विनती कहते हैं। यहाँ देखने, धीरज पाने और फिर बोलने का क्रम है। कुशल पूछे जाने के बाद तुरन्त उत्तर नहीं आता। जो सम्मान उन्हें मिला है, उसे सँभालने में भी उन्हें एक क्षण लगता है।

कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी॥
अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें । सहित कोटि कुल मंगल मोरें॥

चौपाई ३

उनका उत्तर बीते, वर्तमान और आने वाले समय को एक साथ समेट लेता है। वे भरत के चरणों को कुशल का मूल बताते हैं और कहते हैं कि उनके दर्शन से तीनों कालों में अपना कुशल जान लिया। आज का मिलना उनके लिये आज भर का मंगल नहीं है। भरत के अनुग्रह से करोड़ों पीढ़ियों सहित अपना कल्याण हुआ मानते हैं। भरत ने पूछा था कि सखा कुशल से हैं या नहीं। गुह उत्तर में अपने पूरे कुल का सौभाग्य सामने रख देते हैं।

समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।
जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ॥ १९५॥

दोहा १९५

फिर वे अपने आचरण और कुल को राम की महिमा के सामने रखकर सोचने को कहते हैं। अपने लिये उनके शब्द बहुत कठोर हैं। वे अपने को कपटी, कायर, कुबुद्धि और सामाजिक मर्यादाओं से बाहर पड़ा हुआ कहते हैं। यह उनकी दीनता भरी विनय है। उसी विनय में वे राम की कृपा का प्रमाण देखते हैं: जिस दिन से राम ने अपनाया, उसी दिन से वे अपने को विश्व का भूषण मानते हैं। अपनाये जाने का यह स्मरण उनके प्रत्येक आत्मधिक्कार के साथ जुड़ा है।

गुह की बात का निष्कर्ष भी पूरा सुनना चाहिये। उनके अनुसार जो उनके आचरण और कुल को देखकर, फिर राम की महिमा पर विचार करके भी रघुवीर के चरणों का भजन नहीं करता, वह जगत् में विधाता से ठगा गया है। अपने ऊपर हुई कृपा को वे दूसरों के लिये राम की ओर जाने का कारण बनाते हैं। उनके तर्क में स्वयं की छोटी स्थिति और राम की विशाल कृपा का अन्तर है। इसी अन्तर को देखकर वे मानते हैं कि ऐसा सहारा छोड़ देना जीवन के लाभ से वंचित रह जाना होगा।

भरत के शील और प्रेम से गुह देह की सुध भूल जाते हैं। धीरज धरकर वे दर्शन को तीनों कालों और करोड़ों पीढ़ियों का मंगल बताते हैं। अपनी कठोर आत्मविनय के बीच उनका विश्वास स्पष्ट है: राम ने अपनाया, तभी से जीवन को बड़ाई मिली।

सब माताओं का आशीर्वाद, सबके लिये ठिकाना

गुह की प्रीति देखकर और उनकी सुन्दर विनय सुनकर भरत के छोटे भाई शत्रुघ्न उनसे मिलते हैं। फिर गुह अपना नाम कहते हुए सब रानियों को आदर से जोहार करते हैं। उनकी वाणी नम्र और मधुर है। जिस अपनापे का आरम्भ भरत के आलिंगन से हुआ था, वह अब परिवार के दूसरे सदस्यों तक पहुँचता है। गुह प्रत्येक अभिवादन में अपनी पहचान देते हैं और रानियाँ उन्हें लक्ष्मण के समान जानकर आशीर्वाद देती हैं।

जानि लखन सम देहिं असीसा । जिअहु सुखी सय लाख बरीसा॥
निरखि निषादु नगर नर नारी । भए सुखी जनु लखनु निहारी॥

चौपाई ४

आशीर्वाद सौ लाख वर्षों तक सुखपूर्वक जीने का है। इसे सब रानियाँ देती हैं। नगर के स्त्री-पुरुष भी गुह को देखकर ऐसे सुखी होते हैं मानो लक्ष्मण को देख रहे हों। इस समानता में मिलने का आनन्द है। राम के सखा को देखकर उन्हें अपने प्रिय की निकटता अनुभव होती है। वे कहते हैं कि जीवन का लाभ तो इसी व्यक्ति ने पाया है जिसे राम ने भुजाओं में भरकर गले लगाया। गुह उस सौभाग्य की प्रशंसा सुनकर मन में बहुत आनन्दित होते हैं और सबको साथ लिवा ले चलते हैं।

सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।
घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ॥ १९६॥

दोहा १९६

अब निषादराज की प्रसन्नता अतिथियों की व्यवस्था में लगती है। वे अपने सेवकों को संकेत करते हैं। सेवक स्वामी का आशय समझकर आगे जाते हैं और ठहरने की जगहें बनाते हैं। दोहे में स्थान एक-एक करके आते हैं: घर, वृक्षों के नीचे, तालाबों के पास, बगीचे और वन। इतना बड़ा साथ एक ही आँगन में नहीं ठहरता। गुह के सेवक जहाँ सुविधा है वहाँ निवास तैयार करते हैं, और कथा उन अलग-अलग ठिकानों को गिनकर पूरे समाज के लिये की गयी व्यवस्था दिखाती है।

थोड़ी देर पहले गुह कह रहे थे कि राम ने उन्हें अपनाकर बड़ाई दी। अब उसी अपनापे से वे राम के परिवार और नगर के लोगों की सेवा करते हैं। हाथ जोड़कर कही गयी उनकी विनय के बाद सेवकों को किया गया संकेत आता है। स्वागत की कोमलता ठहरने की ठोस सुविधा तक पहुँचती है। भरत के साथ आये लोगों को घरों, पेड़ों और उद्यानों में आश्रय मिल सके, इसके लिये निषादराज अपने लोगों को काम पर लगा देते हैं।

शत्रुघ्न गुह से मिलते हैं और सब माताएँ उन्हें लक्ष्मण के समान मानकर सौ लाख वर्षों का आशीर्वाद देती हैं। नगर के लोग उनके सौभाग्य पर प्रसन्न हैं। गुह सबको साथ ले चलते हैं और सेवकों से अनेक स्थानों पर ठहरने की व्यवस्था कराते हैं।

गंगा से सहज प्रेम की प्रार्थना

शृंगवेरपुर दिखाई देता है तो भरत के सब अंग प्रेम से शिथिल हो जाते हैं। वे गुह को लाग दिये हुए चल रहे हैं। पोद्दार की टीका इस मुद्रा को निषाद के कन्धे पर हाथ रखकर चलना बताती है। तुलसी उन्हें देखकर कहते हैं, मानो विनय और अनुराग ने शरीर धारण कर लिया हो। शरीर की शिथिलता के साथ सखा की निकटता है। जिस नगर में राम के सखा रहते हैं, उसे देखते ही भरत के भीतर प्रेम इतना बढ़ जाता है कि उनके चलने का यह चित्र बनता है।

समस्त सेना उनके साथ है। भरत जगत् को पवित्र करने वाली गंगा के दर्शन करते हैं और रामघाट को प्रणाम करते हैं। पोद्दार की टीका बताती है कि राम ने इसी घाट पर स्नान और सन्ध्या की थी। उस स्थान को प्रणाम करके भरत का मन ऐसा आनन्दमग्न होता है मानो स्वयं राम मिल गये हों। अभी दर्शन घाट के हुए हैं, पर उनके सुख का परिमाण राम से मिलने जैसा है। राम जहाँ रहे, वहाँ पहुँचकर भरत उनकी उपस्थिति का आनन्द अनुभव करते हैं।

नगर के स्त्री-पुरुष भी प्रणाम करते हैं। तुलसी गंगा के जल को ब्रह्ममय कहकर उनके आनन्द का वर्णन करते हैं। सब स्नान करते हैं, फिर हाथ जोड़कर एक ही वर माँगते हैं कि राम के चरणों में उनका प्रेम थोड़ा न रहे। प्रार्थना में प्रेम की बहुतायत चाही गयी है। जिन लोगों का साथ इतना बड़ा है, उनका माँगना एक हो जाता है। स्नान के बाद प्रत्येक अपनी अलग वस्तु माँगने के लिये सामने नहीं आता; तुलसी उनकी सम्मिलित इच्छा राम के प्रति बढ़े हुए अनुराग में रखते हैं।

भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू । सकल सुखद सेवक सुरधेनू॥
जोरि पानि बर मागउँ एहू । सीय राम पद सहज सनेहू॥

चौपाई ५

भरत गंगा की रज को सब सुख देने वाली कहते हैं। सेवक के लिये वह कामधेनु के समान है। ऐसी महिमा कहने के बाद उनकी अपनी माँग आती है। हाथ जोड़कर वे सीता और राम के चरणों में सहज स्नेह माँगते हैं। सहज का अर्थ इस प्रार्थना में स्वाभाविक प्रेम है। उनके सामने वह देवी हैं जिनकी धूल को उन्होंने समस्त सुख देने वाली कहा है, और वर के लिये वे अपने हृदय का यही सम्बन्ध चुनते हैं। सीता और राम, दोनों के चरण उनकी प्रार्थना में साथ हैं।

एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।
मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ॥ १९७॥

दोहा १९७

इस प्रकार भरत स्नान करते हैं, गुरु की आज्ञा पाते हैं और यह जान लेते हैं कि सब माताएँ भी स्नान कर चुकी हैं। उसके बाद डेरा उठा ले चलते हैं। फिर जहाँ-तहाँ लोगों के पड़ाव पड़ते हैं। इस छोटे से क्रम में भरत का ध्यान अपने स्नान के साथ गुरु की आज्ञा और माताओं की सुविधा पर भी है। सभी के तैयार हो जाने की सुध लेकर ही वे आगे का प्रबन्ध करते हैं। गंगा से माँगा गया प्रेम अभी शब्दों में है, और साथ आये लोगों की देखभाल में उसका काम भी दिखाई देने लगता है।

भरत रामघाट को प्रणाम करके राम से मिलने जैसा आनन्द पाते हैं। सब लोग स्नान कर राम के चरणों में बहुत प्रेम माँगते हैं; भरत सीताराम के चरणों में सहज स्नेह की प्रार्थना करते हैं। गुरु की आज्ञा और सब माताओं के स्नान की खबर पाकर वे डेरा ले चलते हैं।

माताओं की सेवा से अशोक के नीचे तक

लोग अपने-अपने स्थान पर डेरा डालते हैं और भरत सबकी खोज-खबर लेते हैं। पोद्दार की टीका उनके पूछने का आशय खोलती है: सब लोग आ गये हैं और आराम से टिक गये हैं या नहीं। पहले गुह के सेवकों ने ठिकाने तैयार किये थे; अब भरत स्वयं साथ आये समाज की सुध लेते हैं। व्यवस्था बन जाने के बाद भी प्रत्येक की सुविधा जानना शेष है। भरत यह काम पूरा करते हैं, फिर देवताओं की पूजा करते हैं और आज्ञा पाकर शत्रुघ्न के साथ कौशल्या के पास जाते हैं।

दोनों भाई राम की माता के पास गये हैं, और आगे सेवा का विस्तार सब माताओं तक होता है। भरत उनके चरण दबाते हैं और कोमल बातें कहकर उनका आदर करते हैं। किसी एक माता का सत्कार करके वे इस काम को पूरा नहीं मान लेते। सबकी सेवा करने के बाद उसका दायित्व शत्रुघ्न को सौंपते हैं। तब गुह को बुलाते हैं। राम का विश्रामस्थल देखने की अपनी आकुलता लेकर जाने से पहले वे यह सुनिश्चित करते हैं कि माताओं के पास सेवा करने वाला भाई रहे।

भरत सखा के हाथ से हाथ मिलाकर चलते हैं। उनका शरीर अधिक प्रेम से शिथिल है। वे गुह से वह स्थान दिखाने को कहते हैं जहाँ जाने से आँखों और मन की जलन कुछ ठंडी हो सके। इस चाह में देखने की बड़ी विनय है। राम सामने नहीं हैं, उनकी बितायी हुई रात का स्थान सामने आ सकता है। भरत उसे देखना चाहते हैं और इस छोटी सी निकटता में अपने विरह के लिये कुछ शीतलता खोजते हैं।

जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए । कहत भरे जल लोचन कोए॥
भरत बचन सुनि भयउ बिषादू । तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू॥

चौपाई ६

उनके प्रश्न में सीता, राम और लक्ष्मण तीनों के नाम आते हैं: वह जगह दिखाइये जहाँ वे रात को सोये थे। कहते-कहते आँखों के कोयों में जल भर आता है। गुह यह बात सुनकर विषाद से भर जाते हैं और तुरन्त भरत को वहाँ ले जाते हैं। अभी स्थान तक पहुँचने से पहले ही दोनों की भावदशा बदल गयी है। भरत ने शान्ति पाने की इच्छा कही थी; उस इच्छा को सुनकर सखा को भी दुःख हो आया। फिर भी वही सखा उनके पूछे हुए स्थान तक पहुँचाने वाला है।

जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु॥ १९८॥

दोहा १९८

वह पवित्र अशोक का वृक्ष है जिसके नीचे राम ने विश्राम किया था। भरत वहाँ बहुत प्रेम और आदर से दण्डवत् प्रणाम करते हैं। स्थान का परिचय मिलते ही उनका पहला काम प्रणाम है। गुह ने जिस जगह तक पहुँचाया, वहाँ भरत के लिये राम के विश्राम की स्मृति है। अशोक के नीचे की धरती अब उनके प्रश्न का उत्तर है। आगे इसी धरती पर कुश की साँथरी और चरणों के चिह्न दिखाई देंगे।

सबके पड़ाव की सुध लेकर भरत देवपूजन और माताओं की सेवा करते हैं। शत्रुघ्न को माताओं के पास छोड़कर वे गुह का हाथ पकड़ते हैं और तीनों प्रियजनों के सोने का स्थान पूछते हैं। गुह उन्हें अशोक के नीचे ले जाते हैं, जहाँ भरत दण्डवत् प्रणाम करते हैं।

कुश की साँथरी और सोने के कुछ कण

भरत को कुश की सुन्दर बिछावन दिखाई देती है। वे उसकी प्रदक्षिणा करते हैं, प्रणाम करते हैं और राम के चरणों के चिह्नों की धूल अपनी आँखों से लगाते हैं। तुलसी कहते हैं कि उस प्रेम की अधिकता कही नहीं जाती। अभी आँखों की जलन शान्त करने की इच्छा थी; अब उन्हीं आँखों तक चरणों की रज पहुँचती है। बिछावन के चारों ओर घूमना, प्रणाम करना और चिह्नों की धूल लगाना, भरत के लिये प्रत्येक क्रिया में राम से जुड़ी हुई वस्तु का आदर है।

कुस साँथरी निहारि सुहाई । कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई॥
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई । बनइ न कहत प्रीति अधिकाई॥

चौपाई ७

फिर उन्हें सोने के दो-चार कण दिखाई देते हैं। पोद्दार की टीका उन्हें सीता के गहनों या कपड़ों से गिरे हुए सोने के कण अथवा तारे बताती है। भरत उन कणों को सीता के समान मानकर अपने सिर पर रखते हैं। पहले राम के चरणों की धूल आँखों पर गयी थी, अब सीता से जुड़े स्वर्णकण सिर पर आते हैं। थोड़ी सी धूल और कुछ छोटे कण, इतने में भरत को दोनों प्रियजनों की स्मृति मिल गयी है। इस आदर में वस्तु का छोटा आकार कोई बाधा नहीं बनता।

उनके नेत्र जल से भरे हैं और हृदय में ग्लानि है। वे गुह से कहते हैं कि ये कण भी सीता के वियोग से शोभा और कान्ति खो बैठे हैं, जैसे अवध के स्त्री-पुरुष विरह में क्षीण हो रहे हैं। सोने के कणों की फीकी छवि को देखकर उन्हें अपने नगर का दुःख याद आता है। यह भरत की विरहभरी दृष्टि है, जिसमें सीता से बिछुड़ी छोटी वस्तु भी अयोध्या के शोक का साथी जान पड़ती है। गुह के सामने कही जा रही बात अब बिछावन से बढ़कर सीता के पूरे परिवार तक पहुँचती है।

भरत पहले सीता के पिता जनक को याद करते हैं। वे पूछते हैं कि जिनके हाथ में भोग और योग दोनों हैं, उनकी तुलना किससे की जाय। जनक के परिचय में दोनों सामर्थ्य साथ रखे गये हैं। भरत की दृष्टि में उनकी ऐसी बड़ाई है जिसका समान उदाहरण नहीं मिलता। उसी पिता की पुत्री की बिछावन सामने है। सम्बन्ध का यह स्मरण धीरे-धीरे गहराता है, क्योंकि भरत आगे सीता के ससुर और पति का गौरव भी कहते हैं।

सीता के ससुर राजा दशरथ हैं, जिन्हें भरत सूर्यकुल का सूर्य कहते हैं। अमरावती के स्वामी इन्द्र भी उनका वैभव और प्रताप पाना चाहते थे। फिर सीता के प्राणनाथ राम हैं। उनकी बड़ाई ऐसी है कि जिसे भी बड़ाई मिलती है, राम की दी हुई मिलती है। पिता, ससुर और पति, तीन सम्बन्धों के साथ भरत तीन तरह का गौरव याद करते हैं। जनक का भोग और योग, दशरथ का ऐश्वर्य और प्रताप, राम की बड़ाई देने वाली महिमा। और इन्हीं सबके बीच सीता की कुशशय्या है।

पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।
बिहरत हृदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि॥ १९९॥

दोहा १९९

सीता को वे श्रेष्ठ पतिव्रता स्त्रियों का शिरोमणि कहते हैं। उनकी साँथरी देखकर अपने हृदय पर विस्मित हैं कि वह दहलकर फट क्यों नहीं जाता। शंकर को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि यह हृदय वज्र से भी अधिक कठोर है। बाहर की बिछावन कोमल जीवन की कठिन दशा दिखा रही है, और भरत दोष अपनी छाती की कठोरता में देख रहे हैं। किसी प्रिय के लिये दुःख सहना भी उन्हें अपने प्रेम की कमी लगता है, क्योंकि मन में यह प्रश्न उठता है कि इतना देखने के बाद जीवन कैसे बना हुआ है।

यह विलाप गुह के सामने हो रहा है। भरत सीता की बड़ाई गिनते हुए बार-बार अपने हृदय तक लौट आते हैं। जिन कणों को सिर पर रखा, उनके लिये पहले सीता के वियोग का दुःख कहा; फिर सीता का घर, सम्बन्ध और गौरव स्मरण किया; अन्त में अपनी छाती को कठोर पाया। किसी वस्तु को देखकर उससे जुड़े व्यक्ति का पूरा जीवन याद आ जाने की यह गति उनकी बात में साफ़ दिखाई देती है। कुश की साँथरी पर से उठी स्मृति अब लक्ष्मण और राम की ओर जाने वाली है।

भरत कुशशय्या की प्रदक्षिणा करते हैं, चरणचिह्नों की धूल आँखों में लगाते हैं और स्वर्णकणों को सीता के समान मानकर सिर पर रखते हैं। जनक, दशरथ और राम का गौरव याद करके वे सीता की वनशय्या पर व्याकुल होते हैं और अपने न फटने वाले हृदय को वज्र से भी कठोर कहते हैं।

दो भाइयों की स्मृति और भरत का आत्मधिक्कार

सीता के बाद भरत छोटे भाई लक्ष्मण की बात कहते हैं। उनकी दृष्टि में लक्ष्मण बहुत सुन्दर और लाड़ करने योग्य हैं। ऐसे भाई कभी हुए नहीं, अभी हैं नहीं और आगे होंगे भी नहीं। यह भाई के प्रति भरत का प्रेम बोल रहा है। वे लक्ष्मण के लिये केवल अपनी निकटता नहीं गिनते। अवध के लोग उन्हें चाहते हैं, माता-पिता के वे दुलारे हैं, सीता और राम के प्राणप्यारे हैं। लक्ष्मण का नाम लेते ही भरत उन सबको साथ याद करते हैं जिनके लिये उनका जीवन प्रिय है।

मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ । तात बाउ तन लाग न काऊ॥
ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती॥

चौपाई ८

उनकी मूर्ति कोमल है और स्वभाव सुकुमार। भरत कहते हैं कि उनके शरीर को कभी गरम हवा भी नहीं लगी थी। वही लक्ष्मण अब वन में सब प्रकार की विपत्तियाँ सह रहे हैं। यह सोचते हुए भरत फिर अपनी छाती को धिक्कारते हैं। उन्हें वह करोड़ों वज्रों से अधिक कठोर लगती है। सीता की साँथरी पर उठा हुआ प्रश्न यहाँ छोटे भाई के लिये लौटता है: इतने प्रिय और इतने सुकुमार के कष्ट की बात सोचकर भी छाती फटती क्यों नहीं। प्रियजनों की कोमलता जितनी सामने आती है, भरत अपने भीतर उतनी ही कठोरता अनुभव करते हैं।

फिर वे राम का स्मरण करते हैं। राम ने जन्म लेकर जगत् को प्रकाशित किया है; वे रूप, शील, सुख और समस्त गुणों के समुद्र हैं। उनके स्वभाव से नगरवासी, परिवार के लोग, गुरु, पिता और माता, सबको सुख मिलता है। भरत इस सुख को केवल राजपरिवार में नहीं बाँधते। राम का बोलना, उनका मिलना और उनकी विनय लोगों के मन हर लेते हैं। शत्रु भी उनकी बड़ाई करते हैं। जिनके साथ निकट का सम्बन्ध है, वे तो प्रसन्न हैं ही, उनके विरोधी भी प्रशंसा से रह नहीं पाते।

राम के गुणों का लेखा पूरा करना किसके बस में है? भरत कहते हैं कि करोड़ों सरस्वती और अरबों शेष भी उन्हें गिन नहीं सकते। यह गुणों की अगणितता का उनका वर्णन है। अभी लक्ष्मण के प्रेम का विस्तार नगर और परिवार में था, अब राम के स्वभाव की प्रशंसा शत्रुओं तक जाती है और फिर उसकी गणना से भी बाहर हो जाती है। भरत की स्मृति में राम ऐसे हैं जो दूसरों को सुख देते हैं और जिनकी अपनी दशा सोचकर वे इस समय व्याकुल हो रहे हैं।

सुखस्वरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान॥ २००॥

दोहा २००

जो स्वयं सुखस्वरूप हैं, रघुवंश के शिरोमणि हैं और मंगल तथा आनन्द के भण्डार हैं, वे धरती पर कुश बिछाकर सोते हैं। भरत इस दशा को देखकर विधाता की गति को बहुत बलवान कहते हैं। दोहे के पहले भाग में राम का सुख और मंगल है, दूसरे में उसी राम की पृथ्वी पर बिछी शय्या। दोनों को एक साथ सोच पाना भरत के लिये कठिन है। सामने की साँथरी उन्हें बार-बार उनके प्रिय के जीवन की उस दशा तक पहुँचा रही है जिसे वे सह नहीं पा रहे।

राम ने तो दुःख का नाम भी कानों से नहीं सुना था, भरत कहते हैं। राजा उनकी सार-सँभाल अपने जीवन-वृक्ष की तरह करते थे। सब माताएँ भी रात-दिन रक्षा करती थीं। भरत इसके लिये दो चित्र देते हैं: पलक जैसे आँख की रक्षा करती है, और साँप जैसे अपनी मणि की। हर चित्र में कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु है जिसकी रखवाली निरन्तर की जाती है। पिता की देखभाल के साथ वे सब माताओं की देखभाल याद करते हैं। राम के जीवन के चारों ओर उनका प्रेम रात-दिन बना रहता था।

वही राम अब वन में पैदल फिरते हैं और कन्द, मूल, फल तथा फूलों का आहार करते हैं। यह अन्तर कहते हुए भरत कैकेयी को धिक्कारते हैं। उन्हें अमंगल की जड़ कहते हैं, जो अपने प्राणप्रिय पति के भी प्रतिकूल हो गयीं। उनकी बात यहाँ माता के आचरण पर कठोर हो जाती है। पर वह कठोरता अगले ही क्षण अपने ऊपर लौट आती है। वे स्वयं को अभागा और पापों का समुद्र कहकर बार-बार धिक्कारते हैं और सब उत्पातों का कारण अपने को मानने लगते हैं।

भरत के आत्मधिक्कार की तीव्रता बढ़ती है। वे कहते हैं कि विधाता ने उन्हें कुल का कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाता ने उन्हें स्वामी का द्रोही बना दिया। यह उनकी ग्लानि का कथन है। जिस राम का स्वभाव वे सबको सुख देने वाला बता रहे थे, उसी के दुःख का भार वे अपने ऊपर ले रहे हैं। गुह उनकी पूरी बात सुनते हैं। अब सखा का उत्तर उसी जगह से उठेगा जहाँ भरत का मन सबसे अधिक घायल है: राम के प्रेम में अपने स्थान को लेकर।

भरत लक्ष्मण की कोमलता और सबके प्रेम को, फिर राम के रूप, शील और सुखद स्वभाव को याद करते हैं। माता-पिता की निरन्तर देखभाल के सामने वन का पैदल जीवन और कुशशय्या देखकर वे कैकेयी को धिक्कारते हैं और फिर गहरी ग्लानि में अपने को सारे दुःख का कारण कहने लगते हैं।

गुह को उस रात की राम की बात याद है

गुह भरत की बात सुनकर प्रेम से समझाते हैं। उनका पहला प्रश्न है कि नाथ ऐसा व्यर्थ विषाद क्यों करते हैं। फिर वे वह बात सामने रखते हैं जिसे निचोड़ मानते हैं: राम भरत को प्रिय हैं और भरत राम को प्रिय हैं। दोनों ओर का प्रेम साथ कहकर वे भरत की उस ग्लानि का उत्तर देते हैं जिसमें अपने को स्वामी का द्रोही कहा गया था। भरत अभी सीता, लक्ष्मण और राम के लिये अपना स्नेह बता चुके हैं। गुह उन्हें दूसरी ओर से मिला हुआ स्नेह याद दिलाते हैं।

सुनि सप्रेम समुझाव निषादू । नाथ करिअ कत बादि बिषादू॥
राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि॥

चौपाई ९

गुह दोष प्रतिकूल विधाता को देते हैं। उनकी दृष्टि में उसी की कठोर करनी ने माता कैकेयी की मति फेर दी। वे भरत की पीड़ा को सुन चुके हैं और उन्हें भाग्य की इस विपरीत दशा के बीच राम के प्रेम में निश्चय रखने को कहते हैं। भरत की बात अपने को दोषी मानने पर आकर रुकी थी। सखा का उत्तर उस आत्मधिक्कार को राम के सम्बन्ध की निश्चितता से सँभालता है। वे जिस निचोड़ की बात कर रहे हैं, उसके समर्थन में उनके पास उस रात की स्मृति भी है।

बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी।
तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥
तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहें किएँ।
परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥

सोरठा २०१ से पूर्व का छन्द

गुह बताते हैं कि उस रात प्रभु बार-बार आदर से भरत की सराहना करते रहे। यह वही स्थान है जहाँ भरत राम की कठिन शय्या देखकर अपने को धिक्कार रहे हैं, और गुह उसी रात की बातचीत का समाचार देते हैं। राम के वचनों में भरत के लिये आदर था, उनकी प्रशंसा फिर-फिर आती थी। गुह इस बात को कहकर भरत के सामने वह स्मृति रखते हैं जो बिछावन देखकर अकेले नहीं मिल सकती थी। स्थान राम के विश्राम का चिह्न रखता है; सखा राम की कही हुई बात याद रखता है।

गुह आगे सौगन्ध खाकर कहते हैं कि राम को भरत के समान प्रिय कोई नहीं है। छन्द में तुलसी इस आश्वासन को गुह के कथन के भीतर रखते हैं। उसकी अन्तिम बात भविष्य के प्रति धीरज है: परिणाम मंगलमय होगा, ऐसा जानकर हृदय में धैर्य लाइये। भरत के लिये गुह का पूरा उत्तर चार बातों से बनता है। प्रतिकूल विधाता की कठोर करनी, उस रात राम की बार-बार की सराहना, सौगन्ध के साथ उनके अतिशय प्रेम का भरोसा और अन्त में अच्छे परिणाम की आशा। इनमें से हर बात भरत की ग्लानि के पास पहुँचती है।

अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन।
चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन॥ २०१॥

सोरठा २०१

अन्त में गुह राम को अन्तर्यामी कहते हैं, जो हृदय का भाव जानते हैं। वे संकोच, प्रेम और कृपा के धाम हैं। यही विचार मन में दृढ़ करके वे भरत से चलने और विश्राम करने का आग्रह करते हैं। उनकी बात अन्त में शरीर की आवश्यकता तक लौटती है। प्रेम से शिथिल होकर आये भरत, रोते हुए अपने को धिक्कारते भरत, अब सखा से विश्राम का निमन्त्रण पाते हैं। इस निमन्त्रण के साथ प्रसंग ठहरता है। गुह ने राम के प्रेम का विश्वास भरत के सामने रख दिया है।

गुह राम और भरत के परस्पर प्रेम को निश्चित बात कहते हैं। उस रात राम द्वारा बार-बार की गयी भरत की सराहना याद दिलाते हैं, सौगन्ध से उनके अतिशय प्रिय होने का भरोसा देते हैं और मंगलमय परिणाम जानकर धैर्य रखने को कहते हैं। राम को अन्तर्यामी और कृपालु मानकर विश्राम करने का उनका आग्रह अन्तिम वचन है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में दो बार किसी दूसरे की कही हुई बात से गुह और भरत के मन को सहारा मिलता है। पहले गुह अपने जीवन का सौभाग्य सुनते हैं: राम ने उन्हें अपनाया है, भरत गले मिले हैं, माताएँ आशीर्वाद दे रही हैं। बाद में भरत अपने प्रति राम का प्रेम सुनते हैं। जिस सखा को आरम्भ में वे इतना आदर देते हैं, वही अन्त में उनके लिये राम की सराहना लेकर आता है। दोनों की भेंट में मिला हुआ स्नेह एक-दूसरे तक लौटता है।

भरत का दुःख बहुत बड़ा है, फिर भी वे उसके लिये अकेले निकलने से पहले सबके ठहरने की सुध लेते हैं और माताओं के चरण दबाते हैं। हम उस क्रम पर ठहर सकते हैं। अपनी व्याकुलता के भीतर भी दूसरे की सुविधा का स्थान बचा हुआ है। शत्रुघ्न को माताओं के पास छोड़ना उसी देखभाल का अगला काम है। गुह भी प्रेम को ठहरने के स्थान बनवाने और भरत को उनके पूछे हुए वृक्ष तक पहुँचाने में लगाते हैं। दोनों की विनय उनके किये हुए कामों में दिखाई देती है।

कुश की साँथरी पर भरत को राम की कठिन दशा दिखती है। गुह को उस रात राम के मुख से निकला हुआ भरत का आदर भी याद है। एक ही रात की ये दोनों स्मृतियाँ साथ रखे जाने पर सखा का उत्तर पूरा समझ में आता है। वे भरत के देखे हुए कष्ट को सुनते हैं और फिर वह बात बताते हैं जो भरत ने सुनी नहीं थी। कभी अपने ही दुःख में किसी सम्बन्ध पर सन्देह गहरा जाये, तो उस सम्बन्ध को जानने वाले की ऐसी स्पष्ट बात मन के लिये बहुत सहारा हो सकती है।

अशोक के नीचे राम के चरणों की धूल है, सीता से जुड़े सोने के कण हैं और कुश की बिछावन है। भरत ने उन्हें प्रणाम, प्रदक्षिणा और सिर पर धारण करने के आदर से देखा। गुह ने उनके सामने उस रात के राम का एक और परिचय रखा: वे भरत की बार-बार प्रशंसा कर रहे थे। विश्राम के लिये कहा गया उनका आखिरी आग्रह उसी भरोसे को साथ लिये हुए है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १९४ से २०१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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