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चित्रकूट का निवास और भरत के लिये गुरु का प्रस्ताव

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · चित्रकूट का निवास और भरत के लिये गुरु का प्रस्ताव

चित्रकूट का निवास और भरत के लिये गुरु का प्रस्ताव

पिता का शोक, वनवासियों का आतिथ्य और भरत की जागती रात। राम को लौटाने का एक उपाय मिलता है, पर उस उपाय में भी माताओं का वियोग बचा रहता है।

चित्रकूट में साथ हो जाने से दुःख समाप्त नहीं हुआ है। सीता और रानियाँ स्नेह से व्याकुल हैं, और गुरु वसिष्ठ को अभी वह समाचार सुनाना है जिसके सुनते ही सबका शोक नया हो उठेगा। आगे इसी वन में दिन इतने सुख से भी बीतेंगे कि पलक जैसे लगेंगे। फिर भी एक प्रश्न बना रहेगा, राम अयोध्या चलेंगे या नहीं। भरत उसी प्रश्न के साथ पूरी रात जागेंगे।

तुलसीदास के रामचरितमानस का यह प्रसंग शोक से आरम्भ होकर परामर्श तक पहुँचता है। बीच में वनवासियों के भरे हुए दोने हैं, उनकी प्रेमभरी विनती है, सीता की ऐसी सेवा है जिसका रहस्य केवल राम जानते हैं। अन्त में गुरु एक प्रस्ताव रखते हैं, राम, सीता और लक्ष्मण लौटें तो भरत और शत्रुघ्न वन में रहें। भाइयों को इससे आनन्द होता है। माताएँ रो पड़ती हैं। उनकी ओर से देखें तो दो पुत्रों का वियोग फिर भी उनके पास रह जाता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम पिता के निधन का समाचार सुनकर व्याकुल होते हैं और बाद में सबके हित का उपाय गुरु की आज्ञा में खोजते हैं।
  • भरत राम के राज्याभिषेक का उपाय सोचते हैं और उनके लौटने के लिये जीवन भर वन में रहने को तैयार हैं।
  • वसिष्ठ शोक में परिवार को सँभालते हैं, सभा में उपाय पूछते हैं और भरत की भक्ति से अभिभूत होते हैं।
  • सीता हर सास के लिये अलग रूप लेकर समान आदर से सेवा करती हैं।
  • शत्रुघ्न और लक्ष्मण वनवास बदलने के प्रस्ताव में दोनों छोटे भाइयों का स्थान भी बदलने की बात आती है।
  • माताएँ और अवधवासी दर्शन से सुख पाते हैं और राम के लौटने की आशा रखते हैं।
  • कोल, किरात और भील वन की उपज लेकर आते हैं और अतिथियों से दाम के स्थान पर अपना प्रेम स्वीकार करने की विनती करते हैं।

समाचार से फिर नया हुआ शोक

सीता और सब रानियों की व्याकुलता देखकर ज्ञानी गुरु वसिष्ठ सबको बैठने के लिये कहते हैं। पहले वे जगत की गति को माया के अधीन बताते हैं। इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, यह समझाते हुए परमार्थ की कुछ बातें कहते हैं। फिर राजा दशरथ के स्वर्गगमन का समाचार सुनाते हैं। पिता के निधन की बात राम को असह्य दुःख देती है। वे विचारते हैं कि अपने प्रति पिता का स्नेह ही उनके प्राण जाने का कारण हुआ। धैर्य को धारण करनेवाले राम भी उस विचार से अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं।

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा । सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा॥
मरन हेतु निज नेहु बिचारी । भे अति बिकल धीर धुर धारी॥

चौपाई १

यह समाचार सुनने की घड़ी है, और तुलसी इसका आघात वज्र की कठोरता में रखते हैं। लक्ष्मण, सीता और सभी रानियाँ विलाप करती हैं। समूचा समाज शोक में ऐसा डूब जाता है मानो राजा का निधन आज ही हुआ हो। पहले से जाननेवालों के लिये भी दुःख की दूरी मिट जाती है। राम के सामने बात खुलते ही सब एक साथ फिर उसी क्षति को अनुभव करते हैं। पिता के प्रेम को मृत्यु का कारण मानने से राम के अपने दुःख में एक और पीड़ा जुड़ गयी है।

वसिष्ठ फिर राम को समझाते हैं। इसके बाद राम समाज सहित मन्दाकिनी में स्नान करते हैं। उस दिन वे निर्जल व्रत रखते हैं। गुरु के कहने पर भी किसी ने जल ग्रहण नहीं किया। इस एक विवरण से परिवार और समाज का साझा शोक सामने आता है। राम का व्रत अलग बतलाया गया है, और सबके जल न लेने की बात उसके साथ रखी गयी है। गुरु की समझाइश के बीच भी उस पूरे दिन का आहार जल तक नहीं पहुँचता।

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह॥ २४७॥

दोहा २४७

अगली सुबह गुरु जो आज्ञा देते हैं, राम उसे श्रद्धा और भक्ति के साथ आदरपूर्वक पूरा करते हैं। वेद में वर्णित विधि के अनुसार पिता की क्रिया की जाती है। यहाँ पुत्र का कर्तव्य गुरु के निर्देशन में निभता है। पिछला दिन शोक और निर्जल व्रत का था, अगला सबेरा उस कार्य का है जिसे पिता के लिये करना है। तुलसी इन दोनों समयों को स्पष्ट रखते हैं। दुःख के भीतर भी क्रिया का अपना क्रम है, और राम उस क्रम को पूरा सम्मान देते हैं।

क्रिया के बाद कवि कहते हैं कि राम शुद्ध हुए। साथ ही वे राम को पापरूपी अन्धकार मिटानेवाला सूर्य कहते हैं। उनके नाम की तुलना उस अग्नि से होती है जो पापरूपी रूई को जला देती है, और उनका स्मरण सारे शुभ मंगलों का मूल कहा जाता है। इसलिये शुद्ध होने का अर्थ समझाने के लिये अगली चौपाई गंगा का उदाहरण लाती है। साधुओं की सम्मति में यह वैसा ही है जैसे गंगा में तीर्थों का आवाहन करके उन्हें शुद्ध किया जाय।

पोद्दार की टीका इस उपमा का आशय खोलती है। गंगा स्वयं पवित्र हैं। जिन तीर्थों को उनमें बुलाया जाता है, वे उनके सम्पर्क से पवित्र होते हैं। वैसे ही राम नित्य शुद्ध हैं और उनके संसर्ग से कर्म शुद्ध होते हैं। पिता की क्रिया पूरी करने को उनके भीतर किसी पाप का मिटना मान लें तो उपमा का अर्थ खो जाएगा। कथा पुत्र का विधिपूर्वक कर्म दिखाती है, और उसी कर्म के बीच कवि उस पुत्र का दिव्य स्वरूप भी याद रखते हैं। दोनों बातें साथ रखकर ही इस शुद्धि का वर्णन पूरा होता है।

दशरथ के निधन का समाचार सुनकर राम और पूरा समाज शोक में डूबते हैं। उस दिन कोई जल नहीं लेता। अगली सुबह गुरु की आज्ञा से पिता की क्रिया होती है; गंगा की उपमा राम की नित्य शुद्धता और उनके संसर्ग से कर्म की पवित्रता समझाती है।

लौटने की बात और दर्शन के दो दिन

शुद्धि हुए दो दिन बीतते हैं। तब राम प्रेम से गुरु के सामने सब लोगों की कठिनाई रखते हैं। यहाँ सभी बहुत दुःखी हैं, कन्द, मूल, फल और जल पर रहते हैं। शत्रुघ्न सहित भरत, मन्त्री और सभी माताओं को इस दशा में देखकर राम को एक पल युग के समान लगता है। वे अपनी पीड़ा का कारण इन्हीं लोगों को देखते रहने में बताते हैं। जिनके दर्शन के लिये समाज आया है, उन्हीं को समाज की कठिन जीवनचर्या व्याकुल कर रही है।

राम निवेदन करते हैं कि गुरु सबको साथ लेकर अयोध्यापुरी पधारें। गुरु यहाँ हैं और राजा अमरावती में, अर्थात् स्वर्ग में हैं। पोद्दार की टीका इस वाक्य में अयोध्या के सूने रह जाने का आशय बताती है। राम अपनी बात के बाद संकोच भी रखते हैं। बहुत कह दिया, ढिठाई की, अब स्वामी जैसा उचित समझें वैसा करें। लौटने का निवेदन कहकर भी वे अन्तिम निर्णय गुरु के विवेक को सौंपते हैं। उनका आग्रह सबके दुःख से निकला है।

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम॥ २४८॥

दोहा २४८

वसिष्ठ राम को धर्म का सेतु और दया का धाम कहते हैं। ऐसे राम यह बात क्यों न कहें। गुरु उनके करुण भाव को स्वीकार करते हैं और उसी दुःख के लिये एक दूसरा सहारा सामने रखते हैं। लोग दुःखी हैं, दो दिन दर्शन करके शान्ति पा लें। पहले शुद्धि के बाद के दो दिन बीते हैं; अब गुरु दो दिन और दर्शन की अनुमति चाहते हैं। एक अवधि बीत चुकी है और दूसरी अभी माँगी जा रही है। राम के लौटने का फैसला इस उत्तर में नहीं हुआ है।

राम बचन सुनि सभय समाजू । जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू॥
सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला॥

चौपाई २

समाज ने राम का पहला निवेदन सुनकर भय पाया था। तुलसी उसे समुद्र के बीच डगमगाते जहाज जैसा दिखाते हैं। इतनी दूर दर्शन को आये लोगों के सामने विदा की बात उठ गयी थी। गुरु की वाणी सुनकर उसी जहाज के लिये हवा अनुकूल हो जाती है। उपमा में जहाज वहीं रहता है, पर उसकी दशा बदल जाती है। दो और दिन का आश्वासन इस समय पूरे समाज के लिये सँभलने का अवसर बन जाता है। किसी ने अभी राम के लौटने का वचन नहीं पाया, फिर भी उनका साथ कुछ और बना रह सकेगा।

राम सबकी कठिनाई देखकर गुरु को समाज सहित अयोध्या लौटने को कहते हैं। वसिष्ठ दुःखी लोगों के लिये दो दिन और दर्शन का अवकाश माँगते हैं। डगमगाते जहाज जैसे भयभीत समाज को इस उत्तर से सहारा मिलता है।

जिस वन में दिन हलके हो गये

ठहरने का यह समय एक पूरी दिनचर्या में बदल जाता है। सब लोग तीनों समय, सुबह, दोपहर और सायंकाल पवित्र जल में स्नान करते हैं। पोद्दार की टीका यहाँ पयस्विनी नदी अथवा पयस्विनी के पवित्र जल का अर्थ देती है। कवि कहते हैं कि उसके दर्शन से पापों के समूह मिटते हैं। लोग बार-बार दण्डवत् करके मंगलमूर्ति राम को आँखें भरकर देखते हैं। स्नान और दर्शन के बीच उनका दिन बीतता है; जिस शान्ति के लिये गुरु ने अवकाश माँगा था, उसका अनुभव अब होने लगता है।

लोग राम के पर्वत और वन को देखने भी जाते हैं। टीका उस पर्वत को कामदगिरि बताती है। तुलसी वहाँ भरपूर सुख और सभी दुःखों के अभाव का चित्र बनाते हैं। झरनों से अमृत जैसा जल बहता है। तीन प्रकार की हवा तीन प्रकार के ताप हरती है। टीका हवा के तीन गुण शीतलता, मन्द गति और सुगन्ध बताती है, और तापों को आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक कहती है। एक ओर जल और हवा का सुख है, दूसरी ओर उसी सुख में दुःख के शान्त होने की धार्मिक अनुभूति रखी गयी है।

असंख्य जातियों के वृक्ष, लताएँ और तृण हैं। फल, फूल और पत्तों के बहुत रूप हैं। सुन्दर शिलाएँ हैं और वृक्षों की छाया सुख देती है। वन की शोभा किससे कही जा सके, यह प्रश्न स्वयं कवि उठाते हैं। इतनी वस्तुएँ गिनाने के बाद भी वर्णन समाप्त होने का दावा नहीं आता। आँख के लिये रंग और आकार हैं, विश्राम के लिये छाया है, और झरते जल के साथ बहती हवा है। इस वन को देखने जाते लोगों के सुख में ये सभी अलग-अलग विवरण भाग लेते हैं।

सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥ २४९॥

दोहा २४९

तालाबों में कमल हैं। जल के पक्षी कूजते हैं और भौंरे गुंजार करते हैं। बहुत रंगों के पशु-पक्षी वन में वैर भूलकर विचरते हैं। दोहे का अन्त इसी वैर के अभाव पर होता है। दृश्य में अनेक जीव हैं, सबकी अपनी गति और ध्वनि है, और उस भिन्नता के बीच परस्पर भय या विरोध का चित्र नहीं रखा गया। अवधवासियों की शोकभरी सभा के बाद यह वन एक अलग अनुभव देता है। दुःख की बात आगे फिर उठेगी, पर यहाँ उनके लिये देखने और सुख पाने का पूरा अवकाश है।

तीनों समय स्नान, राम के दर्शन और कामदगिरि के वन में घूमना लोगों की दिनचर्या बनते हैं। झरने, शीतल हवा, विविध वनस्पतियाँ और वैररहित पशु-पक्षी उस निवास के सुख को भरते हैं।

वन के दोने और प्रेम स्वीकार करने की विनती

वन में रहनेवाले कोल, किरात और भील अपने अतिथियों के लिये उपज लाते हैं। सुन्दर पत्तों के दोने बनाकर उनमें पवित्र, सुन्दर और अमृत जैसा स्वादिष्ट शहद भरते हैं। कन्द, मूल, फल और अंकुर की अँटियाँ बाँधते हैं। फिर विनय और प्रणाम के साथ सबको देते हैं। देते समय हर वस्तु का स्वाद, उसका प्रकार, गुण और नाम समझाते हैं। भेंट के साथ वन की अपनी पहचान भी आती है। जो फल या अंकुर अतिथि के लिये अपरिचित होगा, उसे देनेवाला उसका परिचय भी करा रहा है।

सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा॥
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं । फेरत राम दोहाई देहीं॥

चौपाई ३

अवधवासी बहुत मूल्य देना चाहते हैं। वनवासी उसे स्वीकार नहीं करते। कोई वस्तु लौटाने लगे तो वे राम की दुहाई देते हैं। उनके लिये यह व्यवहार प्रेम का है, और वे उसी रूप में उसे ग्रहण किये जाने की प्रार्थना करते हैं। प्रेम में मग्न उनकी कोमल वाणी कहती है कि साधु प्रेम को पहचानकर उसका मान रखते हैं। पोद्दार की टीका आशय स्पष्ट करती है, दाम देकर या वस्तु लौटाकर हमारे प्रेम का तिरस्कार न कीजिये। अतिथि सम्मानपूर्वक मूल्य देना चाहता है और देनेवाला सम्मानपूर्वक मूल्य रोकता है। बात अब वस्तु से आगे, उसे देने के भाव तक पहुँच गयी है।

अपने को नीच निषाद और अतिथियों को पुण्यात्मा कहते हुए वे बताते हैं कि राम की कृपा से ही यह दर्शन मिला। यह उन्हीं का आत्मवर्णन है। दर्शन की दुर्लभता के लिये वे मरुभूमि में गंगा की धारा का उदाहरण देते हैं। कृपालु राम ने निषाद पर कृपा की है, और जैसी उदारता राजा की हो, वैसी ही उनके परिवार और प्रजा की होनी चाहिये। राम का नाम वे अभी वस्तु लौटाने से रोकने के लिये ले चुके हैं। अब उन्हीं के आचरण को अपने निवेदन का आधार बनाते हैं।

यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु॥ २५०॥

दोहा २५०

वे चाहते हैं कि अतिथि संकोच छोड़ें, उनका स्नेह देखकर कृपा करें और उन्हें कृतार्थ करने के लिये फल, तृण तथा अंकुर ले लें। आग्रह में यह भी है कि इतने प्रिय पाहुने वन में पधारे हैं, पर उनकी सेवा योग्य भाग्य अपने पास कहाँ। स्वामी को क्या दे सकते हैं। भीलों की मित्रता का साधन बस ईंधन और पत्ते हैं। उनके पास जो है, उसी से मित्रता प्रकट होती है। अभी जिन वस्तुओं के अलग-अलग स्वाद और गुण बताये गये थे, उसी भेंट को अब वे विनय से बहुत छोटा करके कहते हैं।

आगे उनकी वाणी और कठोर आत्मनिन्दा में उतरती है। वे अपनी बड़ी सेवा यही बताते हैं कि अतिथियों के बर्तन और कपड़े न चुरा लें। स्वयं को जड़, जीवों की हिंसा करनेवाला, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति कहते हैं। तुलसी ने ये शब्द वनवासियों की अपनी विनती में रखे हैं; इनमें उस वाणी का विनय और उसके समय का सामाजिक आत्मवर्णन दोनों सुनाई देते हैं। वे कहते हैं कि दिन-रात पाप करने में बीतते हैं, फिर भी कमर के लिये वस्त्र नहीं और पेट भरने को अन्न नहीं मिलता।

ऐसी अपनी दशा बताकर वे पूछते हैं कि उनमें सपने में भी धर्मबुद्धि कहाँ से आ सकती थी। जो परिवर्तन हुआ, उसे राम के दर्शन का प्रभाव मानते हैं। प्रभु के चरणकमल देखने के बाद से उनके असह्य दुःख और दोष मिट गये। अतिथियों के सामने वे अपने जीवन की इस बदली हुई दशा को रख रहे हैं। बात सुनकर अयोध्यावासी प्रेम से भर जाते हैं और उनके भाग्य की प्रशंसा करने लगते हैं। जिनके दर्शन को वे अपना सौभाग्य कहते थे, वही अतिथि अब उनका सौभाग्य सराह रहे हैं।

लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।
बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं॥
नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।
तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा॥

सोरठा २५१ से पहले का छन्द

पूरा छन्द इसी पारस्परिक आनन्द को आगे बढ़ाता है। अवधवासी उनकी सराहना करते हैं और प्रेम के वचन कहते हैं। वनवासियों के बोलने, मिलने और सीताराम के चरणों में उनके स्नेह को देखकर सुख पाते हैं। कोल और भीलों की वाणी सुनकर स्त्री-पुरुष अपने ही प्रेम को कम मानते हैं। पहले वनवासी अपने को छोटा कह रहे थे। अब सुननेवाले अपने स्नेह को अपर्याप्त मान रहे हैं। किसी के पास दूसरे के प्रेम को तौलकर छोटा करने की इच्छा नहीं बचती।

छन्द की अन्तिम छवि में तुलसी दिखाते हैं कि राम की कृपा से लोहा नौका को अपने ऊपर लेकर तैर रहा है। इस उलटे दृश्य में कवि उस परिवर्तन को रखते हैं जिसके कारण अवधवासी वनवासियों का स्नेह देखकर अपने प्रेम को कम मानते हैं। कृपा का प्रभाव कवि सामान्य सामर्थ्य की सीमा से बाहर रख देते हैं। इसके बाद सोरठे में सभी लोगों का दिन-प्रतिदिन आनन्दित होकर वन में चारों ओर विचरना आता है। वे पहली वर्षा का जल पाकर हृष्ट हुए मेढकों और मोरों जैसे हैं। शोकग्रस्त समाज को वन में यह नया सुख मिल रहा है।

वनवासी दाम लेने से इनकार करके अपना स्नेह स्वीकार करवाते हैं। वे अपने परिवर्तन को राम के दर्शन का फल कहते हैं। उनकी वाणी से अवधवासी इतने प्रभावित होते हैं कि अपने प्रेम को कम मानते हैं; कवि इसे राम की कृपा का अद्भुत प्रभाव कहते हैं।

सीता की सेवा और कैकेयी का पछतावा

अयोध्या के पुरुष और स्त्रियाँ प्रेम में ऐसे मग्न हैं कि दिन पलक के समान निकल जाते हैं। इसी समय सीता सभी सासुओं की सेवा करती हैं। जितनी सासुएँ हैं, उतने ही रूप बना लेती हैं, और हर एक की समान आदर से सेवकाई करती हैं। हर माता को उसी आदर से सेवा मिल रही है। इस अनोखी सेवकाई का रहस्य सबके बीच होकर भी छिपा रहता है। राम के अतिरिक्त कोई नहीं जानता कि सीता ने इतने रूप लिये हैं।

लखा न मरमु राम बिनु काहूँ । माया सब सिय माया माहूँ॥
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं । तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं॥

चौपाई ४

तुलसी इस रहस्य के साथ सीता की दिव्य सत्ता बताते हैं। सभी मायाएँ सीता की माया के भीतर हैं। पोद्दार की टीका उन्हें पराशक्ति महामाया कहकर इस आशय को खोलती है। ऐसी सीता की शक्ति यहाँ सासुओं की सेवा में प्रकट होती है। वे सेवा से सभी का मन अपने वश में कर लेती हैं। माताएँ सुख पाकर सीख और आशीर्वाद देती हैं। उनके अनुभव में बहू की आदरभरी सेवा है; उस सेवा में अनेक रूपों का छिपा हुआ रहस्य केवल राम जानते हैं।

उधर कैकेयी सीता सहित दोनों भाइयों, राम और लक्ष्मण, का सरल स्वभाव देखती हैं। यह सरलता उन्हें भरपूर पछतावे में डाल देती है। वे पृथ्वी और यमराज से याचना करती हैं। धरती समा जाने का रास्ता नहीं देती और विधाता मृत्यु नहीं देता। पश्चात्ताप के इस वर्णन के बाद कवि लोक, वेद और कवियों में कही जानेवाली धारणा रखते हैं कि राम से विमुख को नरक में भी स्थान नहीं मिलता। यह कैकेयी की दशा के साथ जुड़ा तुलसी का धार्मिक कथन है।

वनवासियों और नगरवासियों का सुख, माताओं की सेवा तथा कैकेयी का पछतावा साथ चल रहे हैं। इन्हीं के बीच सबके मन में एक संशय है। विधाता राम का अयोध्या जाना कराएँगे या नहीं। साथ रहना अभी सुन्दर है, पर लौटने का प्रश्न उससे हल नहीं हुआ। दिन पलक जैसे बीतने का सुख अपनी जगह है और उस सुख के समाप्त हो जाने का डर अपनी जगह। भरत के भीतर यही अनिश्चितता सबसे तीव्र रूप में उतरती है।

सीता अलग-अलग रूप लेकर सभी सासुओं की समान सेवा करती हैं; केवल राम इसका भेद जानते हैं। राम, लक्ष्मण और सीता की सरलता कैकेयी का पछतावा बढ़ाती है। सबके मन में राम के लौटने का संशय बना रहता है।

भरत की रात में कोई उपाय नहीं ठहरता

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच॥ २५२॥

दोहा २५२

भरत को रात में नींद नहीं आती और दिन में भूख नहीं लगती। तुलसी उनके सोच को पवित्र कहते हैं। उसकी व्याकुलता समझाने के लिये तल के कीचड़ में डूबी मछली का चित्र लाते हैं जिसे जल घटने का संकट है। वन में सबके आनन्द की बात अभी हुई है, पर भरत का मन उस आनन्द में स्थिर नहीं हो पा रहा। वे राम के राज्याभिषेक का उपाय चाहते हैं और कोई रास्ता नहीं मिलता। बाहर साथ रहने का अवसर है, भीतर उसके बाद का संकट लगातार बना हुआ है।

भरत विचारते हैं कि माता के बहाने काल ने कुचाल चली है। पके हुए धान पर विपत्ति के भय जैसा यह संकट आया। राम का अभिषेक किस प्रकार हो, इसका एक भी उपाय उन्हें नहीं सूझता। वे जिन लोगों की बात राम मान सकते हैं, उनका विचार करते हैं। गुरु की आज्ञा होगी तो राम अवश्य अयोध्या लौटेंगे। पर गुरु राम की रुचि को जाने बिना ऐसी आज्ञा नहीं देंगे। उपाय की सामर्थ्य दिखाई देती है और उसी के साथ उसके प्रयोग की मर्यादा भी सामने आ जाती है।

दूसरा आश्रय माता कौशल्या का है। उनके कहने से भी रघुनाथ लौट सकते हैं। फिर भरत का अपना मन प्रश्न करता है, राम को जन्म देनेवाली माता कभी हठ करेंगी क्या। इस विचार में माता के प्रभाव का विश्वास और उनके स्वभाव का विश्वास साथ हैं। जिस प्रेम के कारण राम उनकी बात मानेंगे, वही प्रेम उन्हें आग्रह में कठोर नहीं होने देगा। भरत किसी से अभी यह निवेदन कर नहीं रहे हैं। ये पूरी रात उनके भीतर उठते हुए विकल्प हैं।

मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता॥
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू । हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥

चौपाई ५

अपने विषय में सोचते हैं तो स्वयं को केवल सेवक पाते हैं। ऐसे सेवक की बात ही कितनी है, और उसमें भी समय बुरा तथा विधाता प्रतिकूल है। हठ करें तो वह घोर कुकर्म होगा। सेवक का धर्म शिव के पर्वत कैलास से भी भारी है। यहाँ भारी होने का आशय पोद्दार की टीका निभाने की कठिनाई से समझाती है। जिस इच्छा में राम को राज्य मिले, उसी को पूरा करने के लिये राम पर हठ करना भरत को असह्य लगता है। वे अपनी अभिलाषा और अपनी सेवकाई को एक-दूसरे से अलग नहीं कर पा रहे।

किसी युक्ति पर मन नहीं ठहरता और सोचते-सोचते पूरी रात बीत जाती है। सुबह भरत स्नान करते हैं, राम को सिर नवाते हैं और बैठे ही हैं कि वसिष्ठ का बुलावा आ जाता है। वे गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करते हैं और आज्ञा पाकर बैठते हैं। ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री और दूसरे सभासद भी आकर जुटते हैं। रात की अकेली चिन्ता अब सभा के प्रश्न से मिलनेवाली है। भरत अपने उपाय के साथ नहीं आये हैं; रात ने उन्हें कोई उपाय नहीं दिया।

भरत गुरु, कौशल्या और अपने आग्रह, तीनों सम्भावनाओं पर विचार करते हैं। हर सम्भावना राम की रुचि और सेवा की मर्यादा पर आकर रुक जाती है। रात बिना उपाय के बीतती है और अगली सुबह गुरु उन्हें सभा में बुलाते हैं।

सभा में पूछा गया वही प्रश्न

वसिष्ठ समय के अनुरूप बात आरम्भ करते हैं। सभासदों और सुजान भरत को सम्बोधित करके राम को सूर्यवंश का सूर्य, धर्म की धुरी सँभालनेवाला और स्वतन्त्र भगवान् कहते हैं। उनकी सत्यप्रतिज्ञता और वेद की मर्यादा की रक्षा का स्मरण कराते हैं। उनका जन्म जगत के मंगल के लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माता के वचनों का पालन करते हैं, दुष्टों के दल का नाश करते हैं और देवताओं के हितकारी हैं। सभा जिस राम को लौटाना चाहती है, गुरु पहले उनकी प्रकृति और उनके अवतार का प्रयोजन सामने रखते हैं।

नीति, प्रेम, परमार्थ और लौकिक हित को राम के समान यथार्थ जाननेवाला कोई नहीं, वसिष्ठ कहते हैं। फिर उनके अधीन आनेवाली शक्तियों का विस्तार बताते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्रमा, सूर्य और दिक्पाल; माया, जीव, समस्त कर्म और काल; शेष तथा जहाँ तक राजाओं की प्रभुता है; वेदों और शास्त्रों में कही गयी योग की सिद्धियाँ, सबके सिर पर राम की आज्ञा है। टीका राजाओं के उल्लेख में पृथ्वी और पाताल के राजाओं को भी समझाती है। यह गुरु द्वारा घोषित राम की सर्वोच्च सत्ता का वर्णन है।

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ॥ २५४॥

दोहा २५४

इतनी प्रभुता गिनाने के बाद वसिष्ठ निष्कर्ष रखते हैं कि राम की आज्ञा और उनका रुख रखने में ही सबका हित है। सयाने लोग मिलकर ऐसी सम्मति करें जो सबको मान्य हो। राम का राज्याभिषेक सभी को सुख देनेवाला है, मंगल और आनन्द का यही एक मूल मार्ग है। अब प्रश्न यह है कि राम अयोध्या किस प्रकार चलें। जो उपाय समझ में आये, वही किया जाय। सभा को इच्छा भी स्पष्ट मिलती है और उस इच्छा को पूरा करने की मर्यादा भी, राम का रुख सँभाला जाए।

सब गुरु की वाणी आदर से सुनते हैं। उसमें नीति, परमार्थ और लौकिक हित एक साथ हैं। पर किसी को उत्तर नहीं आता। लोग मानो विचारशक्ति खो बैठे हैं। तब भरत सिर नवाकर हाथ जोड़ते हैं। वे सूर्यवंश के उन अनेक राजाओं का स्मरण करते हैं जो एक से एक बड़े हुए। सभी के जन्म के कारण माता-पिता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मों के फल विधाता देते हैं। इस सामान्य क्रम को रखने के बाद वे गुरु की आशिष की असाधारण सामर्थ्य बताते हैं।

गुरु का आशीर्वाद दुःख दबाकर सारे कल्याण सजा देता है, यह संसार जानता है। भरत कहते हैं कि आप वही स्वामी हैं जिन्होंने विधाता की गति तक रोक दी। आप कोई निश्चय कर लें तो उसे कौन टाल सकता है। उनके तर्क में माता-पिता जन्म देते हैं, विधाता कर्मफल देते हैं और गुरु की कृपा दुःख मिटाकर कल्याण कर सकती है। इसलिये जिस उपाय को सभा उनसे सुनना चाहती है, उसका सामर्थ्य भरत गुरु में ही देखते हैं। अपनी जागती रात का असहाय भाव अब इस विनती में प्रकट होता है।

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु॥ २५५॥

दोहा २५५

अब मुझसे उपाय पूछा जा रहा है, यह सब मेरा अभाग्य है, भरत कहते हैं। यह गुरु पर कोई आरोप नहीं है। वे अपने को उस स्थान पर देखकर व्याकुल हैं जहाँ उन्हें उस व्यक्ति को उपाय बताना है जिसकी आशिष को वे विधाता के विधान से भी प्रबल मानते हैं। प्रेम से भरे ये वचन सुनकर गुरु के हृदय में अनुराग उमड़ता है। सभा को अभी उत्तर नहीं मिला है, लेकिन गुरु और भरत का यह संवाद एक नया प्रस्ताव जन्म देनेवाला है।

वसिष्ठ राम की सर्वोच्च सत्ता और उनकी रुचि रखने का धर्म बताकर लौटने का उपाय पूछते हैं। भरत गुरु की आशिष को दुःख मिटाने और विधाता की गति रोकने में समर्थ कहते हैं। उनसे उपाय पूछे जाने को वे अपना अभाग्य मानते हैं।

दो भाई वन में रहें तो

वसिष्ठ भरत की बात सत्य मानते हैं और उसका आधार राम की कृपा बताते हैं। राम से विमुख को सपने में भी सिद्धि नहीं मिलती। फिर कहते हैं कि एक बात कहने में संकोच होता है। बुद्धिमान लोग जब सर्वस्व जाता देखते हैं तो आधा छोड़ देते हैं, जिससे आधा बच सके। इस कहावत के सहारे गुरु एक सम्भावना रखते हैं। उनके सामने सबको साथ लौटा ले जाने की इच्छा है और उसके लिये स्थान बदलने का एक प्रस्ताव आता है।

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई । फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥

चौपाई ६

भरत और शत्रुघ्न वन को जाएँ, और लक्ष्मण, सीता तथा राम को लौटा लिया जाए। यह सुनते ही दोनों भाई हर्षित हो उठते हैं। उनके अंग आनन्द से भर जाते हैं, मन प्रसन्न होते हैं और शरीर पर तेज दिखाई देता है। तुलसी इस प्रसन्नता को ऐसा बताते हैं मानो दशरथ जी उठे हों और राम राजा बन गये हों। तुलसी इस उपमा में दो आनन्द इकट्ठे करते हैं, पिता का जी उठना और राम का राजा बनना। इतना तीव्र सुख दोनों भाइयों को केवल प्रस्ताव सुनने से हुआ है।

अन्य लोगों को इस व्यवस्था में बहुत लाभ और थोड़ी हानि लगती है। रानियों के लिये दुःख और सुख बराबर हैं, और वे सब रोने लगती हैं। पोद्दार की टीका कारण बताती है, राम और लक्ष्मण वन में रहें अथवा भरत और शत्रुघ्न, दो पुत्रों का वियोग बना रहेगा। समाज के अधिक लाभ की गणना माताओं की आँखों से बदल जाती है। जिन दो पुत्रों के लौटने पर प्रसन्नता होगी, उन्हीं के स्थान पर दूसरे दो चले जाएँगे। गुरु के प्रस्ताव में उनकी यह पीड़ा भी पूरी स्पष्टता से सामने आती है।

भरत कहते हैं कि मुनि की बात मान ली जाए तो संसार के जीवों को उनकी इच्छित वस्तु देने का फल होगा। अपने लिये वे जीवन भर वन में रहने को तैयार हैं। इससे बढ़कर उन्हें कोई सुख नहीं चाहिए। उनकी स्वीकृति किसी निर्धारित अवधि तक सीमित नहीं रखी गयी। जिस राम के अभिषेक के लिये रात भर उपाय खोजते रहे, उनके लौटने की सम्भावना में अपना पूरा जीवन अर्पित कर सकते हैं। यह उनकी पेशकश है, अभी उसका कार्यान्वयन नहीं हुआ है।

अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान॥ २५६॥

दोहा २५६

भरत राम और सीता को अन्तर्यामी, तथा गुरु को सर्वज्ञ और सुजान कहकर निवेदन करते हैं। यदि गुरु यह बात सत्य कह रहे हैं तो अपने वचन को प्रमाण करें, उसके अनुसार व्यवस्था करें। उनके वचन और स्नेह देखकर पूरी सभा सहित वसिष्ठ को देह की सुधि नहीं रहती। इस दशा को तुलसी विदेह होना कहते हैं। गुरु के भीतर भरत के प्रेम के प्रति जो अनुराग उमड़ा था, वह अब विचार और वर्णन की सीमा तक पहुँच गया है।

भरत की महान महिमा समुद्र है और मुनि की बुद्धि उसके तट पर खड़ी अबला स्त्री जैसी है। वह पार जाना चाहती है, हृदय में उपाय खोजती है, पर नाव, जहाज या बेड़ा कुछ नहीं मिलता। फिर कवि पूछते हैं कि भरत की बड़ाई दूसरा कौन करे। छोटी तलैया की सीपी में समुद्र कैसे समाए। इतने समर्थ गुरु भी जिस स्नेह का पार नहीं पा रहे, उसे वाणी में समेटने की अपनी कठिनाई कवि उसी चित्र में रख देते हैं।

गुरु भरत और शत्रुघ्न के वन में रहने तथा राम, सीता और लक्ष्मण के लौटने का प्रस्ताव रखते हैं। भाई आनन्दित हैं, माताओं का दो पुत्रों से वियोग फिर भी रहेगा। भरत आजीवन वनवास चाहते हैं और उनका प्रेम सभा सहित गुरु को अभिभूत करता है।

पहले भरत के हृदय की बात सुनी जाए

भरत मुनि के अन्तरात्मा को बहुत प्रिय लगते हैं। वसिष्ठ समाज को साथ लेकर राम के पास आते हैं। राम प्रणाम करके उत्तम आसन देते हैं। गुरु की आज्ञा से सभी बैठ जाते हैं। फिर वसिष्ठ देश, काल और अवसर को देखकर बोलते हैं। राम को सर्वज्ञ, सुजान तथा धर्म, नीति, गुण और ज्ञान का भण्डार कहते हैं। वे सबके हृदय में रहते हैं और अच्छे-बुरे सभी भाव जानते हैं, इसलिये वही उपाय बताएँ जिसमें नगरवासियों, माताओं और भरत का हित हो।

अपने निवेदन के साथ गुरु एक कठिन बात भी स्वीकार करते हैं। दुःखी लोग हमेशा विचार करके नहीं कहते; जुआरी को अपना ही दाँव सूझता है। यह कथन वसिष्ठ के बोलने का हिस्सा है। दूसरों के हित की बात करते हुए भी वे आर्त मन की उस सीमा को पहचानते हैं जिसमें अपना चाहा हुआ परिणाम सबसे आगे दिखाई देता है। अब उपाय राम के सामने है, जिनके लिये अभी कहा गया कि वे सबके भीतर के भाव जानते हैं।

सब कर हित रुख राउरि राखें । आयसु किएँ मुदित फुर भाषें॥
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई । माथें मानि करौं सिख सोई॥

चौपाई ७

राम उत्तर देते हैं कि उपाय गुरु के ही हाथ है। उनका रुख रखने और उनकी आज्ञा को सत्य मानकर प्रसन्नता से पालन करने में सबका हित है। पहले राम को जो आदेश मिले, वे उसे सिर पर रखकर करेंगे। फिर गुरु जिसे जो कहेंगे, वह उसी प्रकार सेवा में लगेगा। राम स्वयं को इस आज्ञापालन से बाहर नहीं रखते। पहले अपना कर्तव्य माँगते हैं और उसके बाद दूसरे लोगों की सेवा का क्रम कहते हैं। उपाय पूछे जाने पर वे गुरु के निर्देशन में उसे पूरा करने की तत्परता दिखाते हैं।

वसिष्ठ कहते हैं कि राम ने सत्य कहा, पर भरत के प्रेम ने उनके विचार को रहने ही नहीं दिया। इसी से वे बार-बार निवेदन कर रहे हैं। उनकी बुद्धि भरत की भक्ति के वश हो गयी है। शिव को साक्षी करके अपनी समझ बताते हैं कि भरत की रुचि रखते हुए जो किया जाएगा वह शुभ होगा। गुरु अपनी भावना छिपाते नहीं। जिस बुद्धि को अभी कवि समुद्र के किनारे असमर्थ दिखा चुके हैं, उसी की दशा वसिष्ठ स्वयं राम से कह देते हैं।

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥ २५८॥

दोहा २५८

गुरु का निर्देश है कि पहले भरत की विनती आदर से सुनी जाए, फिर विचार हो। उसके बाद साधुओं की सम्मति, लोक की सम्मति, राजधर्म की नीति और वेद, इन चारों का सार लेकर कार्य किया जाए। प्रेम के वश हुई अपनी बुद्धि स्वीकार करने के बाद भी वे विचार का स्थान बनाए रखते हैं। भरत की इच्छा सुने बिना निर्णय नहीं होगा, और उसे सुन लेने के बाद भी सब पक्षों का सार ग्रहण करना होगा। इस परामर्श में सुनना, विचारना और करना, तीनों का क्रम स्पष्ट है।

भरत पर गुरु का अनुराग देखकर राम के हृदय में विशेष आनन्द होता है। वे भरत को धर्म की धुरी सँभालनेवाला और तन, मन तथा वाणी से अपना सेवक जानते हैं। गुरु की आज्ञा के अनुकूल उनके वचन मनोहर, कोमल और मंगलमय निकलते हैं। वे गुरु की सौगन्ध और पिता के चरणों की दुहाई देकर कहते हैं कि संसार में भरत जैसा भाई हुआ ही नहीं। पिता के शोक से आरम्भ हुई इस कथा में पिता के चरण अब इस प्रशंसा की सत्यता के साक्षी बनते हैं।

राम आगे कहते हैं कि गुरु के चरणों से अनुराग रखनेवाले लोक और वेद, दोनों की दृष्टि से बड़े भाग्यवान होते हैं। फिर भरत पर तो स्वयं गुरु का इतना प्रेम है, उनका भाग्य कौन कह सकता है। छोटे भाई के सामने उनकी प्रशंसा करते हुए राम की बुद्धि सकुचाती है। फिर भी वे अपना मत कह देते हैं, भरत जो कहें, उसे करने में भलाई है। इतना कहकर राम चुप हो जाते हैं। यह मौन भरत की बात के लिये स्थान बनाता है।

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात॥ २५९॥

दोहा २५९

तब गुरु भरत से कहते हैं कि सारा संकोच छोड़कर कृपा के समुद्र अपने प्यारे भाई के सामने हृदय की बात रखें। पूरी रात जिस मन में कोई उपाय नहीं ठहरा था, उसे अब अपनी बात कहने का निमन्त्रण मिला है। अभी भरत का वह कथन आरम्भ नहीं हुआ। प्रसंग इस खुले हुए अवसर पर ठहरता है, गुरु ने सुनने का क्रम बना दिया है और राम ने भाई की बात को शुभ मानकर अपनी सम्मति प्रकट की है।

राम के पास जाकर गुरु सबके हित का उपाय माँगते हैं। राम आज्ञापालन को तैयार हैं। वसिष्ठ पहले भरत को सुनने, फिर साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेद का सार लेकर विचार करने को कहते हैं। अन्त में भरत को हृदय की बात कहने का निमन्त्रण मिलता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में दूसरों के सुख की इच्छा कई रूपों में सामने आती है। राम समाज का कष्ट देखकर उसे लौटाना चाहते हैं। गुरु उसी समाज को दर्शन के दो और दिन देना चाहते हैं। वनवासी अपनी भेंट स्वीकार करवाकर कृतार्थ होना चाहते हैं। भरत राम को लौटाने के लिये जीवन भर वन में रह सकते हैं। हर इच्छा में किसी प्रिय का हित है, पर सभी इच्छाओं से एक ही निर्णय अपने-आप नहीं निकलता। इसीलिये कथा में इतना स्थान परामर्श को मिलता है।

माताओं का रोना हमें उस प्रस्ताव को फिर देखने के लिये रोकता है जिससे भाइयों के शरीर में आनन्द भर गया था। एक ओर राम के लौटने का लाभ है, दूसरी ओर भरत और शत्रुघ्न के चले जाने का वियोग। जब हम गुरु का अन्तिम निर्देश सुनते हैं कि पहले भरत की बात सुनी जाए और फिर सब पक्षों का सार लेकर विचार हो, तो उस सुनने के भीतर माताओं की यह पीड़ा भी बनी रहती है। प्रेम बहुत कुछ देने को तैयार है। विचार को यह भी देखना है कि उस देने से किसके पास कौन-सा दुःख रह जाएगा।

दोहा २५९ पर भरत को बोलने का अवसर मिलता है। वनवास बदलने का प्रस्ताव अभी प्रस्ताव ही है। उनके हृदय की बात सुनना शेष है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २४७ से २५९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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