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कौसल्या का दुःख और सीता की चिन्ता

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · कौसल्या का दुःख और सीता की चिन्ता

कौसल्या का दुःख और सीता की चिन्ता

वन की आज्ञा माँगते राम, धर्म और ममता के बीच अपना उत्तर खोजती कौसल्या, और सिर झुकाये बैठी सीता, जिनकी ओर से अभी नूपुर ही बोलते हैं।

माता के पास इस समय अपने पुत्र के लिये बहुत सरल बातें हैं। पहले स्नान हो, फिर मन की मिठाई खायी जाय, उसके बाद पिता के पास जाना है। बहुत देर हो चुकी है। इसी स्नेह के बीच राम वन जाने की बात रखते हैं। कौसल्या के लिये अभी तक जिस दिन का अर्थ पुत्र का राज्य था, उसी दिन में अचानक चौदह वर्षों का बिछोह खुल जाता है। राम की वाणी कोमल है, पर उसके सुनने से माता का शरीर काँपने लगता है।

तुलसीदास के रामचरितमानस में यह बातचीत धीरे धीरे एक और चिन्ता तक पहुँचती है। कौसल्या पहले राम को उत्तर देती हैं, फिर उनके लौटने तक अपने समस्त परिवार के जीवित रहने की प्रार्थना करती हैं। उसी समय सीता समाचार सुनकर वहाँ आती हैं। वे सिर झुकाकर बैठ जाती हैं। उनके मन में साथ जाने की व्याकुलता है, आँखों में आँसू हैं, और उनके सामने माता अब उनकी सुकुमारता याद कर रही हैं। एक विदा की अनुमति मिल चुकी है। दूसरी बात अभी कही जानी है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम पिता की आज्ञा पूरी करने के लिये वन जाने की अनुमति माँगते हैं और माता को अपने लौटने का भरोसा देते हैं।
  • कौसल्या राम की माता, जो धर्म, पुत्रप्रेम और परिवार के दुःख को एक साथ सँभालते हुए सीता के लिये भी अपना हृदय खोलती हैं।
  • सीता वनगमन का समाचार सुनकर सास के पास आती हैं और सिर झुकाये मौन बैठी रहती हैं।
  • मन्त्री का पुत्र राम का रुख समझकर कौसल्या को वनगमन का कारण बताता है। उसका नाम यहाँ नहीं दिया गया है।

माता की मिठाई और वन का राज्य

कौसल्या बार बार बलैया ले रही हैं। पुत्र जल्दी नहा लें, जो मिठाई अच्छी लगे वह खा लें, फिर पिता के पास जायँ। उनके वचनों में किसी संकट की आहट नहीं है। पिता के पास जाने से पहले पुत्र का भोजन हो जाय, यही उनकी तत्परता है। वे भैया कहकर बुलाती हैं, फिर देर हो जाने की बात कहती हैं, फिर अपने को बलिहारी करती हैं। एक ही चौपाई में दुलार कई बार लौटता है। सामने राम उस दुलार को पूरा सुनते हैं।

मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला॥
सुख मकरंद भरे श्रियमूला । निरखि राम मनु भवँरु न भूला॥

चौपाई १

तुलसी माता के इन अनुकूल वचनों को स्नेह के कल्पवृक्ष पर लगे फूल देखते हैं। फूलों में सुख का मकरन्द भरा है और उनसे राजलक्ष्मी मिलने वाली है। यह उपमा उस समय माता की आशा को भी दिखाती है। उनके वचन केवल खाने और नहाने की व्यवस्था नहीं कर रहे, वे पुत्र के सुख और राज्य की ओर खिल रहे हैं। ऐसे फूल सामने हों तो मन का भौंरा उन्हीं पर ठहर सकता है। राम का मन उस आकर्षण में भूलता नहीं। वे धर्म की गति जानते हैं।

उत्तर के लिये राम अपनी वाणी और भी कोमल करते हैं। माता का हर्ष जिस राज्य से जुड़ा हुआ है, उसी राज्य शब्द के भीतर वे वन का समाचार रखते हैं। पिता ने उन्हें कानन का राज्य दिया है। वहाँ उनका बड़ा काम बनेगा। यह बात सुनाने में वे पिता की आज्ञा का आदर बनाये रखते हैं और माता को आने वाली यात्रा का परिचय देते हैं। भोजन से पिता के पास जाने की जो सहज राह अभी कही गयी थी, उसके सामने अब बहुत लम्बी राह आ खड़ी होती है।

धरम धुरीन धरम गति जानी । कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥
पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू । जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥

चौपाई २

राम माता से प्रसन्न मन से आज्ञा चाहते हैं। उनकी कृपा से वन जाने में आनन्द और मंगल होगा। वे विनती करते हैं कि स्नेह के कारण मन में भय न आने पाये। माता का आशीर्वाद इस यात्रा में साथ रहेगा, इसलिये वे उसी को सुख का आधार कहते हैं। यहाँ आज्ञा और अनुग्रह दोनों माँगे जा रहे हैं। पिता के वचन का पालन करना है, और उसे करते हुए माता की प्रसन्नता भी चाहिये। राम के इन थोड़े से शब्दों में दोनों सम्बन्ध पूरे आदर के साथ उपस्थित हैं।

बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।
आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥ ५३॥

दोहा ५३

अब वे अवधि बताते हैं, चौदह वर्ष। इतने समय वन में रहकर पिता के वचन को सत्य करेंगे और फिर लौटकर माता के चरणों के दर्शन करेंगे। लौटना उनके कथन में निश्चित है। वे माता से मन उदास न करने को कहते हैं। विदा माँगते समय भी बात चरणों तक वापस पहुँचती है। जहाँ से अनुमति मिलनी है, वहीं फिर दर्शन करने आना है। कौसल्या को जो समाचार दिया गया, उसके साथ यह आश्वासन भी रख दिया गया कि बिछोह की अवधि पूरी होगी और पुत्र फिर सामने होंगे।

कौसल्या स्नान, मिठाई और पिता के पास जाने की बात करती हैं। राम अत्यन्त कोमल वाणी में वन का राज्य मिलने का समाचार देते हैं, प्रसन्न मन से आज्ञा माँगते हैं और चौदह वर्ष बाद लौटकर उनके चरणों का दर्शन करने का भरोसा रखते हैं।

शीतल वाणी का घाव

राम की नम्रता और मिठास कौसल्या तक पहुँचती है, पर उनके हृदय में उन्हीं वचनों की कसक बाण की तरह उठती है। कहने वाले ने वाणी शीतल रखी थी। सुनने वाली सहमकर सूख गयीं। तुलसी इस दशा को बरसात का पानी पड़ने पर सूखते जवासे से जोड़ते हैं। जिस जल के आने से हरियाली की आशा होती है, उसी के पड़ते ही यह पौधा सूख जाता है। पुत्र का इतना कोमल उत्तर भी माता को उसी तरह भीतर से आहत करता है।

बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके॥
सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी॥

चौपाई ३

अगली चौपाई में इस आघात के और रूप खुलते हैं। सिंह की गर्जना सुनती हुई हिरनी जैसी विकलता है। आँखों में जल भर आता है और शरीर थर थर काँपता है। फिर मछली की उपमा आती है। पोद्दार जी की टीका बताती है कि पहली वर्षा का फेन खाकर मछली बदहवास हो गयी हो, ऐसी माता की दशा है। सूखता पौधा, चौंकती हिरनी और अपने ही जल में व्याकुल मछली, तीनों चित्र उस दुःख को शरीर तक ले आते हैं जिसका पूरा वर्णन कवि भी नहीं कर पाते।

कौसल्या धीरज धरती हैं और पुत्र का मुख देखती हैं। बोलते समय गला भर आता है। वे उस प्रेम को याद करती हैं जिसे पिता प्रतिदिन राम के चरित्र देखकर अनुभव करते थे। राम उन्हें प्राणों के समान प्रिय हैं। राज्य देने के लिये शुभ दिन भी पिता ने ही निश्चित कराया था। इसलिए अब वन जाने की आज्ञा सुनकर माता पूछती हैं कि किस अपराध पर ऐसा हुआ। उनके सामने एक ही पिता के स्नेह और आज्ञा के बीच ऐसी दूरी आ गयी है जिसका कारण उन्हें समझना है।

उनका अगला प्रश्न सूर्यकुल तक फैल जाता है। उस कुल को जलाने के लिये आग कौन बन गया। पोद्दार जी की टीका यहाँ सूर्यवंश को वन मानकर अग्नि की उपमा खोलती है। कौसल्या अभी कोई नाम नहीं लेतीं। वे पुत्र से कारण सुनना चाहती हैं। राम का रुख देखकर मन्त्री का पुत्र यह काम करता है। वह पूरी बात समझाकर कह देता है। उसका परिचय इतने ही सम्बन्ध से मिलता है, मन्त्री का पुत्र। घटना के इस मोड़ पर कारण बताने वाला वही है।

निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।
सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ॥ ५४॥

दोहा ५४

कारण सुनते ही कौसल्या चुप रह जाती हैं, मानो वाणी चली गयी हो। अभी तक वे प्रश्न कर पा रही थीं। अब प्रसंग समझ में आ गया है और उसके सामने शब्द रुक गये हैं। तुलसी उनकी दशा को अवर्णनीय कहते हैं। राम का मुख देखकर जुटाया हुआ धीरज इस समाचार को मिटा नहीं सकता। माता के भीतर अब वही बात दो दिशाओं से उठेगी, पुत्र को कैसे जाने दें और जिस आज्ञा की बात सुन ली है उसके पालन को कैसे रोकें।

राम के मधुर वचन कौसल्या के हृदय में बाण की तरह लगते हैं। वे पिता के प्रेम और राज्य देने की तैयारी याद करके वनगमन का कारण पूछती हैं। राम का रुख समझकर मन्त्री का अनाम पुत्र कारण बताता है, और माता निःशब्द रह जाती हैं।

धर्म और स्नेह के बीच

कौसल्या राम को रोक नहीं पा रहीं, जाने को भी नहीं कह पा रहीं। दोनों ओर हृदय में दारुण दाह है। उनके मन में विधाता की उलटी चाल का विचार आता है। लिखने बैठे थे चन्द्रमा और लिख गया राहु। राजसुख की आशा के स्थान पर आये इस संकट को वे ऐसे देखती हैं। अभी माता के अनुकूल वचनों में कल्पवृक्ष के फूल खिले थे। अब उन्हीं के मन में शुभ आकृति लिखते लिखते अशुभ आकृति बन जाने का चित्र है।

धरम सनेह उभयँ मति घेरी । भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू । धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥

चौपाई ४

धर्म और स्नेह ने उनकी बुद्धि को दोनों ओर से घेर लिया है। तुलसी साँप और छछूँदर की उपमा रखते हैं, उस दशा के लिये जिसमें किसी ओर का निर्णय सहज नहीं बचता। यदि हठ करके पुत्र को रोक लेंगी तो धर्म जाएगा और भाइयों में विरोध होगा। यदि वन जाने को कहेंगी तो बड़ी हानि होगी। माता दोनों परिणाम अपने सामने रखती हैं। अपने पास रख लेने की इच्छा के साथ ही वे उस इच्छा से परिवार में उठने वाले विरोध को भी देख रही हैं।

इसी सोच में रानी विवश हो जाती हैं। फिर अपनी समझ को सँभालती हैं। वे स्त्रीधर्म का विचार करती हैं, जिसे पोद्दार जी की टीका पातिव्रत धर्म कहकर स्पष्ट करती है। राम और भरत दोनों पुत्रों को समान जानती हैं। यह समानता उनके उत्तर का आवश्यक आधार है। राम के बिछोह का दुःख उनके मन में भरत के प्रति भेद नहीं बनाता। जिस भाई के साथ विरोध होने का डर अभी आया था, उसे वे अपने पुत्रप्रेम से बाहर नहीं रखतीं।

अब सरल स्वभाव वाली माता बहुत धैर्य धरकर बोलती हैं। वे राम पर बलिहारी जाती हैं और कहती हैं कि उन्होंने अच्छा किया। पिता की आज्ञा का पालन सब धर्मों का शिरोमणि है। यह वचन उसी माता के मुँह से निकलता है जिसका शरीर अभी काँप रहा था। धैर्य को यहाँ बार बार धारण करना पड़ता है। समाचार सुनने से पहले का सहज हर्ष लौट नहीं आया है। फिर भी पुत्र के निर्णय के भीतर जो धर्म है, माता उसे पहचानकर आदर देती हैं।

राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु॥ ५५॥

दोहा ५५

कौसल्या अपने दुःख का कारण बहुत स्पष्ट कर देती हैं। राज्य देने को कहकर वन दे दिया गया, इसका उन्हें लेश भर दुःख नहीं है। उनके सामने भरत का क्लेश है, महाराज का क्लेश है, प्रजा का क्लेश है। राम के बिना इन सब पर जो बीतेगी, वही उन्हें व्यथित करती है। भरत का नाम सबसे पहले आता है। दोनों पुत्रों को समान जानने की जो बात कवि ने अभी कही थी, वह अब माता की अपनी वाणी में सुनायी देती है।

राम को रोकने की इच्छा, भाइयों में विरोध का भय और भरत के भावी दुःख की चिन्ता, ये बातें एक ही हृदय में साथ रहती हैं। कौसल्या अपने शोक में किसी दूसरे का शोक छोटा नहीं करतीं। वे पुत्र की राजलक्ष्मी का हिसाब पीछे छोड़कर उससे जुड़े जीवित सम्बन्धों को सामने रखती हैं। राम ने चौदह वर्ष बाद चरणदर्शन की बात कही थी। माता अभी उस बीच की अयोध्या देख रही हैं, जिसमें राजा, भरत और प्रजा सबको राम का अभाव सहना होगा।

कौसल्या को दोनों ओर हानि दिखती है। रोकने से धर्म और भाइयों का सम्बन्ध संकट में पड़ेगा, भेजने से बिछोह होगा। राम और भरत को समान जानकर वे पिता की आज्ञा का सम्मान करती हैं और भरत, राजा तथा प्रजा के भावी क्लेश को अपना दुःख बताती हैं।

दो आज्ञाओं का भेद

पिता की आज्ञा का इतना आदर कहने के बाद कौसल्या एक भेद सामने रखती हैं। यदि केवल पिता ने वन जाने को कहा हो, तो राम माता को उनसे बड़ा जानकर वन न जायँ। यदि पिता और माता दोनों ने कहा हो, तो वन सौ अयोध्याओं के समान है। उनके उत्तर की दोनों शर्तें साथ सुननी होंगी। माता अपने सम्बन्ध का अधिकार जानती हैं और दोनों अभिभावकों की सम्मिलित आज्ञा का मान भी जानती हैं। इसी भेद के सहारे वे आगे की बात कहती हैं।

जौं केवल पितु आयसु ताता । तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता॥
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना । तौ कानन सत अवध समाना॥

चौपाई ५

जिस वन को वे अब सौ अयोध्याओं के समान कह रही हैं, उसमें पुत्र को अकेला सोचकर नहीं छोड़तीं। वहाँ वनदेव पिता होंगे और वनदेवियाँ माता होंगी। पशु और पक्षी उनके चरणकमलों की सेवा करेंगे। घर के सम्बन्धों के नाम वन तक पहुँचा दिये जाते हैं। जिस पुत्र के लिये अभी तक वे स्नान और मिठाई का ध्यान रख रही थीं, उसके आगे का जीवन सोचते हुए अब उसकी देखभाल वन के देवताओं को सौंप रही हैं। अनुमति देने के साथ यह मातृभाव भी चलता है।

कौसल्या यह भी कहती हैं कि राजा के लिये अन्त में वनवास उचित है। उनके हृदय में दुःख राम की अवस्था देखकर होता है। वन में रहने के विचार को वे अपने आप में अनुचित नहीं कहतीं। पुत्र की सुकुमार आयु उनके सामने है। समय की यही बात उनके शोक को आकार देती है। जिस वनवास का जीवन के अन्त में स्थान हो सकता है, वह इस कोमल अवस्था में आया है। वन को भाग्यवान् और राम को छोड़ती अयोध्या को अभागी कहते समय उनके शब्दों में वही पीड़ा रहती है।

एक और इच्छा उनके भीतर उठती है, वे भी साथ चलें। पर उसे आग्रह बनाकर रखने से पहले ही वे राम के मन में सम्भव सन्देह सोच लेती हैं। पोद्दार जी की टीका इस सन्देह को खोलती है: पुत्र को लग सकता है कि माता साथ चलने का बहाना करके उन्हें रोकना चाहती हैं। इसलिए कौसल्या उस इच्छा को आगे नहीं बढ़ातीं। वे पुत्र के मार्ग में अपने दुःख का नया बन्धन खड़ा कर देने से अपने को रोक रही हैं।

फिर उनकी वाणी सबके प्रेम को एकत्र कर लेती है। राम सबके परम प्रिय हैं, प्राणों के प्राण हैं और हृदय का जीवन हैं। वही पुत्र कह रहे हैं कि वे वन जाएँगे, और माता यह सुनकर बैठी पछता रही हैं। इस बात में कोई नया तर्क नहीं जुड़ता। जो अनुमति की ओर बढ़ रही हैं, वे अपने बिछोह को भी नाम दे रही हैं। राम के जाने से केवल उनका निकट रहना नहीं छूटेगा। जिनमें परिवार अपना जीवन रखता है, वे दूर होंगे।

यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।
मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ॥ ५६॥

दोहा ५६

कौसल्या कहती हैं कि यही सोचकर वे झूठा स्नेह बढ़ाकर हठ नहीं करतीं। उनका आग्रह अब इतना रह जाता है कि माता का नाता मानकर उनकी सुध भूल न जाय। यह प्रार्थना रोकने की शक्ति छोड़ने के बाद आती है। वे बलैया लेती हैं और स्मरण चाहती हैं। राम जहाँ भी रहें, वहाँ माता का यह सम्बन्ध बना रहे। वन के लिये पिता और माता के नए आश्रय बता देने के बाद भी अपने मातृत्व की सुध वे पुत्र को सौंपती हैं।

कौसल्या केवल पिता की आज्ञा और माता पिता दोनों की आज्ञा में स्पष्ट भेद करती हैं। वन के देवताओं को राम के अभिभावक मानती हैं, उनकी कोमल अवस्था पर दुखी होती हैं और साथ चलने का आग्रह रोक लेती हैं। अन्त में वे अपनी सुध बनाये रखने की प्रार्थना करती हैं।

चौदह वर्ष का जल

अब कौसल्या देवताओं और पितरों से पुत्र की रक्षा चाहती हैं। उपमा बहुत निकट की है, जैसे पलकें आँखों की रखवाली करती हैं। इतनी सावधानी, इतनी निकटता और ऐसा निरन्तर संरक्षण उन्हें राम के लिये चाहिये। माता अपने हाथों से जो देखभाल नहीं कर पाएँगी, उसे इस आशीष में रखती हैं। पुत्र वन की ओर चलेंगे, पर देवताओं और पूर्वजों का आश्रय उनके साथ रहे। पहले वनदेव और वनदेवियाँ आये थे, अब सब देव और पितर पुकारे जाते हैं।

देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं । राखहुँ पलक नयन की नाईं॥
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना । तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥

चौपाई ६

इसी चौपाई का दूसरा चित्र प्रतीक्षा को जीवन की आवश्यकता बना देता है। वनवास की अवधि जल है और प्रिय परिजन मछलियाँ हैं। राम ने चौदह वर्ष कहे थे। माता उसी निश्चित अवधि के सहारे परिवार को जीवित रहने की आशा देती हैं। जल के बिना मछली नहीं रह सकती, इसलिए लौटने का समय उनके लिये साधारण गिनती नहीं है। उस अवधि का भरोसा परिवार के प्राणों से जुड़ा है। राम को वे करुणा की खान और धर्म की धुरी धारण करने वाला कहकर पुकारती हैं।

इसलिए उनका अगला निवेदन है कि ऐसा उपाय हो जिससे राम सबके जीते जी आ मिलें। पिता का वचन पूरा हो और पुत्र लौटे तो प्रियजन जीवित मिलें। माता की दृष्टि अब विदा से लौटने की घड़ी तक पहुँच गयी है। केवल समय पूरा करने से उनकी माँग पूरी नहीं होगी, मिलन भी होना है। जिस अवधि को अभी जल कहा गया, उसी के भीतर सबका जीवन बचा रहे। कौसल्या अपनी प्रार्थना राम की करुणा और धर्मबुद्धि के सामने रखती हैं।

वे सुखपूर्वक वन जाने की आज्ञा देती हैं और उसी वाक्य में सेवकों, परिवार तथा नगर के अनाथ हो जाने का दुःख कहती हैं। आशीर्वाद और विलाप एक साथ निकलते हैं। आज सबके पुण्य का फल समाप्त हो गया है, कठोर काल विपरीत हो गया है, ऐसी उनकी पुकार है। पुत्र को सुख मिले, यह इच्छा अडिग है। अपने पीछे रह जाने वाले लोगों की दशा भी उनसे छिपती नहीं। अनुमति बोल देने के बाद उनका हृदय तत्काल शान्त हो सके, ऐसा यहाँ नहीं होता।

कौसल्या अपने को परम अभागिनी मानती हुई बहुत प्रकार से विलाप करती हैं और राम के चरणों में लिपट जाती हैं। यह वही माता हैं जिनसे राम ने लौटकर चरणदर्शन करने की बात कही थी। अभी वे पुत्र के चरण पकड़े हुए हैं। हृदय में दुःसह सन्ताप भर गया है। तुलसी फिर कहते हैं कि उस विलाप का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। शब्दों से अनुमति मिल गयी है, शरीर का स्नेह अभी चरणों को छोड़ नहीं पा रहा।

दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा॥
राम उठाइ मातु उर लाई । कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई॥

चौपाई ७

राम माता को उठाते हैं और हृदय से लगा लेते हैं। फिर कोमल वचनों से समझाते हैं। यहाँ उनके समझाने के विस्तृत शब्द नहीं दिये गये हैं। उनका उठाना, हृदय से लगाना और मृदु वाणी कहना ही सामने रहता है। माँ का शोक देखकर पुत्र का व्यवहार उसी कोमलता में बना रहता है जिसमें वन का समाचार कहा गया था। इस बार कोमल वाणी के साथ आलिंगन है। उसी समय सीता तक समाचार पहुँचता है और प्रसंग में एक दूसरा व्याकुल हृदय प्रवेश करता है।

कौसल्या देवताओं और पितरों से राम की रक्षा माँगती हैं। चौदह वर्ष की अवधि को परिवार के जीवन का जल कहकर सबके जीते जी लौटने की प्रार्थना करती हैं। अनुमति देने के बाद वे विलाप करती हुई चरण पकड़ लेती हैं। राम उन्हें उठाकर हृदय से लगाते और समझाते हैं।

सिर झुकाये बैठी सीता

समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।
जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ॥ ५७॥

दोहा ५७

समाचार सुनकर सीता अकुला उठती हैं। वे सास के पास पहुँचती हैं, दोनों चरणकमलों की वन्दना करती हैं और सिर नीचा करके बैठ जाती हैं। जिस शोक के बीच वे आयी हैं, उसमें उनका प्रवेश प्रणाम से होता है। वे अभी कोई बात नहीं कहतीं। कौसल्या कोमल वाणी में आशीष देती हैं। इतनी सुकुमारी सीता को सामने देखकर माता फिर व्याकुल हो उठती हैं। अभी पुत्र के वनवास की बात सँभाली थी, अब पुत्रवधू का मुख और उसकी कोमलता सामने है।

तुलसी सीता को रूप की राशि और पति के प्रति पवित्र प्रेम वाली कहते हैं। सिर झुका हुआ है और भीतर विचार चल रहा है। जीवननाथ वन जाने को हैं। उनका साथ किस पुण्यवान् को मिलेगा। यह प्रश्न सीता अपने मन में करती हैं। इसका उत्तर किसी सहयात्री के नाम में नहीं खोजतीं। उनके मन में अपने ही शरीर और प्राण सामने आते हैं। दोनों साथ जाएँगे, या केवल प्राणों को ही पति का साथ मिलेगा।

चलन चहत बन जीवननाथू । केहि सुकृती सन होइहि साथू॥
की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना॥

चौपाई ८

सीता का यह विचार बिछोह की आशंका को बहुत तीव्र कर देता है। शरीर और प्राण दोनों साथ रहें, इसमें उनके अपने चलने की सम्भावना है। केवल प्राण साथ रहें, इसमें देह पीछे रह जाने का भय है। विधाता की करनी कुछ जानी नहीं जाती, इतना सोचकर उनकी चिन्ता खुली रह जाती है। माता के मन में भी विधाता की उलटी चाल का विचार आया था। अब सीता उसी अज्ञात परिणाम के सामने बैठी हैं। किसी निर्णय का भरोसा अभी उन्हें नहीं मिला है।

बाहर उनके सुन्दर चरणों के नख धरती कुरेद रहे हैं। यह बहुत छोटी चेष्टा है, पर उसी के साथ नूपुरों का मधुर स्वर उठता है। सीता का मुख मौन है और कवि उस स्वर को विनती का रूप देते हैं। मानो नूपुर प्रेम के वश कह रहे हों कि सीता के चरण कभी उनका त्याग न करें। साथ न छूटने की बात अब आभूषणों तक आ गयी है। चरणों से लगे रहने वाले नूपुर भी उस सम्भावित बिछोह के भय में सहभागी दिखाई देते हैं।

चारु चरन नख लेखति धरनी । नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी॥
मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं । हमहि सीय पद जनि परिहरहीं॥

चौपाई ९

यह विनती नूपुरों की कल्पित वाणी है। सीता अपनी ओर से अभी कुछ नहीं कहतीं। उनके मन का विचार हमें सुनाया गया है, पर सामने राम और कौसल्या को उसका कोई कथन नहीं मिलता। सुन्दर नेत्रों से आँसू निकल रहे हैं। सिर का झुकना, नखों का धरती पर चलना और आँखों का भर आना, इन्हीं से उनका दुःख दिखाई देता है। माता यह दशा देखती हैं और राम से सीता के विषय में बोलने लगती हैं।

कौसल्या की पहली बात सुकुमारता की है। सीता सास, ससुर और परिवार में सभी को प्यारी हैं। इस वाक्य में माता अपना स्नेह अकेला नहीं रखतीं। सीता के चारों ओर पूरे घर का प्रेम याद आता है। राम के लिये वे पहले भरत, राजा और प्रजा के क्लेश की बात कर चुकी हैं। अब सीता की चिन्ता कहते हुए भी सम्बन्धों का ऐसा ही घेरा बनता है। उनके सामने बैठी पुत्रवधू उस घर की प्रिय जानकी हैं, जिनकी देखभाल में उनका अपना जीवन लगा हुआ है।

सीता सास को प्रणाम करके सिर झुकाये मौन बैठ जाती हैं। भीतर सोचती हैं कि पति के साथ शरीर और प्राण दोनों चलेंगे या केवल प्राण। नख धरती कुरेदते हैं, नूपुरों को कवि विनती करते सुनते हैं और आँखों से आँसू बहते हैं। यह देखकर कौसल्या राम से उनकी चिन्ता कहती हैं।

आँख की पुतली जैसी जानकी

कौसल्या सीता के पिता, ससुर और पति को एक साथ स्मरण करती हैं। पिता जनक राजाओं के शिरोमणि हैं। ससुर सूर्यकुल के सूर्य हैं। पति उसी सूर्यकुल रूपी कुमुदवन को खिलाने वाले चन्द्रमा और गुण तथा रूप के भण्डार हैं। इन उपमाओं में जानकी का मायका और ससुराल दोनों जगमगाते हैं। अब वन की बात उसी प्रिय पुत्रवधू के लिये उठ रही है जिसके जीवन को माता ऐसे सम्बन्धों के बीच देखती हैं।

फिर कौसल्या अपनी बात जोड़ती हैं। उन्हें रूप, गुण और सुन्दर शील वाली प्यारी पुत्रवधू मिली है। उन्होंने जानकी को आँख की पुतली बनाकर प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण उनमें लगा रखे हैं। अभी राम की रक्षा के लिये पलकों और आँखों की उपमा आयी थी। अब सीता स्वयं माता की आँख की पुतली हैं। उन्हें बचाये रखने की इच्छा इतनी अपनी है कि पुत्रवधू की सुरक्षा कहते हुए कौसल्या अपने ही जीवन की रखवाली का भाव व्यक्त करती हैं।

वे सीता को कल्पलता की तरह पालने की बात करती हैं। बहुत प्रकार से लाड़ किया, स्नेह के जल से सींचा। अब उसके फूलने और फलने का समय आया तो विधाता विपरीत हो गये। इसका क्या परिणाम होगा, जाना नहीं जाता। सीता भी सिर झुकाये यही सोच रही थीं कि विधाता की करनी समझ में नहीं आती। दोनों की चिन्ता एक ही अनिश्चित घड़ी में है। एक ओर साथ जाने की इच्छा है, दूसरी ओर उस सुकुमारी के सामने पड़ने वाले जीवन का भय।

पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा । सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥
जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ । दीप बाति नहिं टारन कहऊँ॥

चौपाई १०

कौसल्या का स्मरण अब घर की बहुत छोटी बातों में उतरता है। पलंग, गोद और हिंडोले को छोड़कर सीता ने कठोर धरती पर पाँव नहीं रखा। माता उन्हें जीवन देने वाली जड़ी की तरह सावधानी से सँभालती रही हैं। पोद्दार जी की टीका उस जड़ी को सञ्जीवनी कहती है। देखभाल कितनी सावधान थी, यह अगले कथन से मालूम होता है: कौसल्या कभी दीपक की बत्ती हटाने को भी नहीं कहती थीं। पुत्रवधू के लिये उनके मन में ऐसा सहेजना रहा है।

वही सीता अब राम के साथ वन जाना चाहती हैं। कौसल्या रघुनाथ से पूछती हैं कि उनके लिये क्या आज्ञा है। प्रश्न के साथ ही चकोरी की उपमा आती है। चन्द्रकिरणों के रस की रसिक चकोरी सूर्य की ओर आँख कैसे मिला सकेगी। सुकुमार जीवन और वन के कष्ट की दूरी को माता इस तरह देखती हैं। घर की पलंग और गोद वाली स्मृतियों के बाद चन्द्रमा की शीतलता याद आती है, फिर सूर्य की ओर न देख सकने की असमर्थता।

करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि॥ ५९॥

दोहा ५९

वन का चित्र कौसल्या की वाणी में भय से भर उठता है। वहाँ हाथी, सिंह, राक्षस और अनेक दुष्ट जीव विचरते हैं। वे पुत्र से पूछती हैं कि विष की वाटिका में सुन्दर सञ्जीवनी बूटी कैसे शोभा पाएगी। जिस जड़ी की तरह उन्होंने सीता की रक्षा की थी, उसी जड़ी को अब विष की बगिया में रखकर देखती हैं। परवरिश और वनवास के दो चित्र इस एक प्रश्न में आमने सामने आ जाते हैं। माता को उस कोमल जीवन के लिये उपयुक्त आश्रय चाहिये।

उनके प्रश्नों में सीता के रूप के साथ गुण और शील भी याद हैं। पुत्रवधू को आँख की पुतली कहने से लेकर दीपक की बत्ती का काम तक न देने की बात कहने तक, कौसल्या अपने स्नेह की निकटता बताती जाती हैं। वन के हाथी और सिंह उनके लिये उसी रखवाली का संकट हैं। वे राम से निर्णय पूछ रही हैं, इसलिए इस विस्तृत स्मरण में हर बात उस निर्णय तक जाती है कि ऐसी सीता वन में कैसे रह पाएँगी।

कौसल्या सीता के गुण, शील और प्रिय सम्बन्ध याद करती हैं। उन्हें आँख की पुतली, स्नेह से सींची कल्पलता और जीवनदायिनी जड़ी की तरह पाला है। पलंग, गोद और हिंडोले में पली सीता के लिये वन सोचते हुए वे चकोरी, सूर्य और विषवाटिका की उपमाओं से अपनी चिन्ता कहती हैं।

माता का सहारा और राम की सीख

कौसल्या अपनी बात में अब वन में रहने वाली स्त्रियों की तुलना लाती हैं। उनके कथन में कोल और भील युवतियाँ आती हैं। वे कहती हैं कि ब्रह्मा ने उन्हें वन के लिये रचा है, वे विषयसुख से अपरिचित हैं और उनका स्वभाव पत्थर के कीड़े जैसा कठोर है, इसलिए उन्हें वन में क्लेश नहीं होता। यह समुदायों के विषय में कौसल्या की कही हुई तुलना है। उनकी चिन्ता का अगला कदम इसी धारणा से निकलता है कि जानकी का पालन उन परिस्थितियों में हुआ ही नहीं है।

फिर वे तपस्वियों की पत्नियों का उदाहरण देती हैं, जिन्होंने तपस्या के लिये सब भोग छोड़ दिये हैं। माता उन्हें भी वन में रहने के योग्य मानती हैं। इसके बाद सीता की ओर लौटकर पुत्र से पूछती हैं कि जो चित्र में बना बन्दर देखकर डर जाती हैं, वे वन में किस तरह रह सकेंगी। इस स्मरण में भय का कारण कोई सामने खड़ा जीव भी नहीं है, उसका चित्र ही पर्याप्त है। कौसल्या के मन में वन के जीवों का विचार इससे और कठिन हो उठता है।

एक अन्तिम तुलना हंसिनी की है। देवसरोवर के सुन्दर कमलवन में विचरने वाली हंसिनी छोटी तलैयों के योग्य कैसे होगी। माता के लिये सीता का परिचित जीवन उस कमलवन की तरह है। वे अपनी सारी चिन्ता राम के विचार के लिये रखती हैं और कहती हैं कि जैसी उनकी आज्ञा होगी, वैसी ही सीख वे जानकी को देंगी। इस वाक्य तक पहुँचते पहुँचते उनकी बात में स्मृतियाँ भी आ चुकी हैं, आशंकाएँ भी और निर्णय की विनती भी।

तब कौसल्या अपनी आवश्यकता कहती हैं। यदि सीता भवन में रहें तो उन्हें बहुत सहारा होगा। यह निवेदन उन सारी तुलनाओं के बाद आता है जिनमें वे सीता की रक्षा की बात कर रही थीं। अब वही पुत्रवधू माता को सँभालने का आधार हो सकती है। जिनमें कौसल्या ने अपने प्राण लगा रखे हैं, उनके घर में रहने से बिछोह के दिनों में उन्हें अवलम्ब मिलेगा। इस बात को कहते समय भी सीता सामने सिर झुकाये बैठी हैं।

राम माता की प्रिय वाणी सुनते हैं। तुलसी उसे शील और स्नेह के अमृत में सनी हुई देखते हैं। आरम्भ में भी माता के वचन फूलों के भीतर सुख का मकरन्द लिये थे। अब उनमें राज्य का हर्ष बीत चुका है और शोक के भीतर से यह स्नेह बोल रहा है। पुत्र के लिये वन की अनुमति देकर माँ पुत्रवधू का आश्रय चाह रही हैं। राम उस पूरे भाव को सुनकर विवेक से भरे प्रिय वचन कहते हैं और माता को सन्तुष्ट करते हैं।

कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष॥ ६०॥

दोहा ६०

इसके बाद वे जानकी को समझाना आरम्भ करते हैं। वन के गुण और दोष प्रकट करके सीख देना शुरू होता है। इसी आरम्भ पर यह प्रसंग ठहरता है। माता को सन्तोष दिया जा चुका है, पर राम के समझाने की विस्तृत बात अभी सामने नहीं आयी। सीता को साथ चलने की अनुमति भी अभी नहीं मिली है। उनके भीतर उठी शरीर और प्राण की चिन्ता का निर्णय बाकी है। जो मौन राम सुन रहे थे, अब उनकी वाणी उसी की ओर मुड़ती है।

कौसल्या अपनी तुलना में वनवासी युवतियों और तपस्वियों की पत्नियों का उल्लेख करती हैं, फिर चित्र के बन्दर से डरने वाली सीता की चिन्ता कहती हैं। वे राम की आज्ञा के अनुसार जानकी को सीख देने और उनके घर में रहने से सहारा पाने की बात रखती हैं। राम माता को सन्तुष्ट करके सीता को वन के गुण दोष समझाने लगते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

कौसल्या की बात सुनते हुए हम देख सकते हैं कि अनुमति तक पहुँचने में कितने सम्बन्धों को साथ रखना पड़ा। पिता की आज्ञा है, माता का अपना अधिकार है, भरत के प्रति समान प्रेम है, राजा और प्रजा का क्लेश है। वन जाने को कहने के बाद भी आँसू और चरणों से लिपट जाना बाकी रहता है। उनके धैर्य को समझने के लिये इस पूरे क्रम को याद रखना होगा। धर्म का सम्मान करते हुए वे दुःख की कोई परत छिपा नहीं पातीं।

दो उपमाएँ देर तक साथ रहती हैं। राम के लिये माता ऐसी रक्षा चाहती हैं जैसी पलक आँख की करती है। सीता को वे अपनी आँख की पुतली कहती हैं। एक को देवताओं और पितरों की रखवाली में सौंपना है, दूसरी को अपने पास रखकर सहारा पाना है। दोनों के लिये उनकी चिन्ता अत्यन्त निकट की है। इसी निकटता से चौदह वर्ष की अवधि भी जल बन जाती है। उस जल के भरोसे परिवार को पुत्र के लौटने तक जीवित रहना है।

सीता का मौन हमें इस बातचीत में सुनने की एक और जगह देता है। उनकी इच्छा भीतर शरीर और प्राण के प्रश्न में उठती है। बाहर नख धरती पर चलते हैं, नूपुर बजते हैं और आँसू गिरते हैं। माता उन चेष्टाओं को देखकर बोलती हैं, फिर राम उन्हें समझाने लगते हैं। अपनी बात कहने से पहले ही सीता इस पूरे संवाद के केन्द्र में आ गयी हैं। उनकी चिन्ता का उत्तर खुलना अभी शेष है।

आरम्भ में कौसल्या चाहती थीं कि पुत्र कुछ मीठा खाकर पिता के पास जायँ। अन्त तक वे वन की आज्ञा दे चुकी हैं, लौटने की अवधि में परिवार के जीवन की प्रार्थना कर चुकी हैं और सीता का सहारा चाह चुकी हैं। राम की कोमलता दोनों ओर बनी रहती है, माता को उठाकर हृदय से लगाने में भी और जानकी को समझाना आरम्भ करने में भी। सीता सिर झुकाये उस नयी बात के सामने बैठी हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ५३ से ६०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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