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लक्ष्मण का क्रोध, राम का विश्वास और भरत का निकट आना

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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 26

रात रहते राम सीता का स्वप्न सुनते हैं। भरत के साथ चतुरंगिणी सेना आने का समाचार आता है। लक्ष्मण कहते हैं कि भरत बुरा विचार करके आये हैं, और धनुष और बाण लेकर राम की सौगन्ध खाते हैं। राम भरत का स्वभाव बताते हैं, और सौगन्ध खाकर कहते हैं कि भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई नहीं है। माता की करनी से सकुचाते भरत गुह और शत्रुघ्न के साथ आश्रम की ओर चलते हैं।

आश्रम के निकट पहुँचने से पहले ही भरत के आने का समाचार वहाँ पहुँच जाता है। आकाश में धूल है, पशु और पक्षी व्याकुल होकर भागे आ रहे हैं, और राम अभी सीता का एक दुःख भरा स्वप्न सुन चुके हैं। मंगल वचन सुनकर राम की आँखें प्रेम के जल से भर आती हैं। फिर सेना के समाचार पर राम सोच में पड़ते हैं, और लक्ष्मण उनके हृदय की चिन्ता देखकर अपना नीति का विचार कहने लगते हैं।

इस प्रसंग में लक्ष्मण भरत पर आरोप लगाते हैं, आकाशवाणी उनके बल की प्रशंसा करती है, और राम भरत के स्वभाव से उत्तर देते हैं। भरत मन्दाकिनी में स्नान करके गुह और शत्रुघ्न के साथ आश्रम की ओर चलते हैं। राम के निवास से वन की सम्पदा ऐसी शोभा पाती है मानो अच्छा राजा पाकर प्रजा सुखी हो। वहाँ पशु वैर छोड़कर साथ चरते हैं। यात्रा राम के पर्वत की शोभा पर ठहरती है, जिसे देखकर भरत के हृदय में बहुत प्रेम होता है।

आश्रम में राम, राह पर भरत

  • राम भरत की साधुता और आज्ञाकारिता पर विश्वास रखनेवाले भाई, जो लक्ष्मण की बात का विस्तार से उत्तर देते हैं।
  • सीता जो स्वप्न में भरत के साथ दुखी समाज और बदले रूप में सासुओं को देखती हैं।
  • लक्ष्मण राम के छोटे भाई, जो राम के हृदय की चिन्ता देखकर नीति कहते हैं और भरत पर कुमंत्र का आरोप लगाते हैं। वे युद्ध के लिये तैयार होकर राम की सौगन्ध खाते हैं।
  • भरत अपनी माता की करनी से संकोच में पड़े, राम के स्वभाव को याद करते हुए आश्रम की ओर आनेवाले।
  • शत्रुघ्न गुह के साथ भरत के सहयात्री, जिन्हें लक्ष्मण अपने आरोप में भरत के साथ जोड़ते हैं।
  • गुह निषादों के राजा और राम के सखा। वे भरत का सोच और प्रेम देखकर विदेह हो जाते हैं और मंगल शकुनों का फल बताते हैं।

रात का स्वप्न और उत्तर दिशा की धूल

भरत के साथ चल रहे सब लोग राम के प्रेम में शिथिल हैं, और सूर्यास्त तक दो कोस चलते हैं। जल और स्थल देखकर वे रात को ठहरते हैं, टीका के अनुसार बिना खाये पिये। रात बीतने पर राम के प्रेमी भरत आगे बढ़ते हैं।

उधर राम रात रहते जाग गये हैं। सीता ने ऐसा स्वप्न देखा है, मानो भरत समाज के साथ आये हों, और राम के वियोग का ताप उनके शरीर को तपा रहा हो। सबके मन उदास हैं, सब दीन और दुखी हैं। सासुओं को उन्होंने दूसरी सूरत में देखा है।

सीता का स्वप्न सुनकर राम की आँखों में जल भर आता है, और सोच से छुड़ानेवाले राम सोच के वश हो जाते हैं। वे लक्ष्मण से कहते हैं कि यह स्वप्न अच्छा नहीं, कोई बहुत बुरा समाचार सुनायेगा। ऐसा कहकर वे भाई के साथ स्नान करते हैं, और शिव का पूजन करके साधुओं का सम्मान करते हैं।

देवताओं का सम्मान और मुनियों की वन्दना करके राम बैठते हैं और उत्तर दिशा की ओर देखने लगते हैं। आकाश में धूल छायी है, और बहुत से पक्षी और पशु व्याकुल होकर भागे हुए आश्रम में आ रहे हैं। यह देखकर राम उठते हैं, और चित्त में चकित रहते हैं कि कारण क्या है। उसी समय किरात और कोल आकर सारा समाचार कहते हैं। टीका के अनुसार राम के उठने की यह बात तुलसीदास कहते हैं।

यह मंगल वचन सुनते ही राम के मन में आनन्द होता है। शरीर पुलक से भर जाता है, और शरद के कमल नेत्र प्रेम के जल से भर जाते हैं। टीका के अनुसार यह बात भी तुलसीदास कहते हैं।

सेना का समाचार, और लक्ष्मण का बोलना

आनन्द के बाद राम फिर सोच में पड़ते हैं कि भरत के आने का क्या कारण है। फिर एक आकर कहता है कि उनके साथ चतुरंगिणी सेना है, और वह थोड़ी नहीं। यह सुनकर राम को बहुत सोच होता है। इधर पिता का वचन है, और इधर भाई का संकोच। भरत का स्वभाव मन में समझकर वे चित्त को ठहराने की जगह नहीं पाते।

तब यह जानकर उन्हें समाधान होता है कि भरत साधु हैं, सयाने हैं और उनके कहे में हैं। लक्ष्मण राम के हृदय की चिन्ता देखते हैं और समय के अनुसार अपना नीति का विचार कहने लगते हैं।

वे कहते हैं: मैं बिना पूछे कुछ कहता हूँ, स्वामी। समय पर सेवक ढिठाई से ढीठ नहीं होता। आप सर्वज्ञों में शिरोमणि हैं। मैं अनुगामी अपनी समझ की बात कहता हूँ।

वे कहते हैं कि नाथ, आप सुहृद् हैं, बहुत सरल चित्त के हैं, और शील और स्नेह के भण्डार हैं। आपको सब पर प्रेम और विश्वास है, और आप हृदय में सबको अपने समान जानते हैं।

फिर वे कहते हैं कि मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोह के वश अपना रूप प्रकट कर देते हैं। वे कहते हैं कि भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं, और राम के चरणों में उनका प्रेम सारा जगत् जानता है।

लक्ष्मण के आरोप और राजमद का कलंक

लक्ष्मण कहते हैं कि वही भरत आज राम का पद पाकर धर्म की मर्यादा मिटाकर चले हैं। उनके अनुसार कुटिल, खोटे भाई ने बुरा अवसर ताका है, और जाना है कि राम वनवास में अकेले हैं।

उनका आरोप है कि मन में बुरा विचार करके और समाज जोड़कर वे राज्य को निष्कण्टक करने आये हैं। उनका यह भी आरोप है कि दोनों भाई करोड़ों प्रकार की कुटिलताएँ रचकर सेना बटोर लाये हैं। यदि मन में कपट और कुचाल न होती, तो रथ, घोड़ों और हाथियों की कतार किसे सुहाती?

फिर वे कहते हैं कि भरत को कौन व्यर्थ दोष दे, राजपद पाकर जगत् बावला हो जाता है। उदाहरण में वे कहते हैं कि चन्द्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, नहुष ब्राह्मणों के वाहन पर चढ़ा, और वेन लोक और वेद से विमुख हुआ, जिसके समान अधम कोई नहीं।

सहस्रबाहु, इन्द्र और त्रिशंकु, वे पूछते हैं, किसे राजमद ने कलंक नहीं दिया? फिर वे कहते हैं कि भरत ने यह उचित उपाय किया है, और शत्रु और ऋण को कभी रत्ती भर शेष नहीं रखना चाहिये।

एक बात, लक्ष्मण कहते हैं, भरत ने अच्छी नहीं की, कि राम को असहाय जानकर उनका निरादर किया। आज संग्राम में राम का क्रोध भरा मुख देखकर यह बात भी उनकी समझ में विशेष रूप से आ जायेगी। इतना कहते कहते लक्ष्मण नीति का रस भूल जाते हैं, और पुलक के बहाने युद्धरस का वृक्ष फूल उठता है।

धनुष हाथ में, फिर आकाशवाणी

लक्ष्मण राम के चरणों की वन्दना करके उनकी चरणरज सिर पर रखते हैं। वे अपना सच्चा और स्वाभाविक बल कहते हुए बोलते हैं: नाथ, मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरत ने हमें कम नहीं छेड़ा है। कब तक सहा जाये और मन मारकर रहा जाये, जब स्वामी साथ हैं और धनुष हमारे हाथ में है?

वे कहते हैं: क्षत्रिय जाति, रघुकुल में जन्म, और राम का अनुगामी, यह जगत् जानता है। लात मारने पर भी धूल सिर पर चढ़ती है, और धूल के समान नीच कौन है?

वे उठते हैं और हाथ जोड़कर आज्ञा माँगते हैं, मानो सोया हुआ वीररस जाग उठा हो। वे सिर पर जटा बाँधते हैं, कमर में तरकस कसते हैं, धनुष सजाते हैं और बाण हाथ में लेते हैं।

वे कहते हैं कि आज मैं राम का सेवक होने का यश लूँ और भरत को संग्राम में शिक्षा दूँ। राम के निरादर का फल पाकर दोनों भाई रणशय्या पर सोयें। अच्छा हुआ कि सारा समाज इकट्ठा आ गया। आज मैं पिछला सारा क्रोध प्रकट करूँगा। जैसे सिंह हाथियों के झुंड को कुचलता है और बाज लवा को लपेट लेता है। वैसे ही मैं सेना और छोटे भाई सहित भरत का तिरस्कार करके उन्हें मैदान में पछाड़ूँगा।

वे कहते हैं कि यदि शिव आकर उनकी सहायता करें, तो, राम की सौगन्ध, मैं उन्हें युद्ध में मारूँगा। लक्ष्मण को अत्यन्त क्रोध से तमतमाया देखकर और उनकी सत्य सौगन्ध सुनकर सब लोग भयभीत हो जाते हैं, और लोकपाल घबराकर भागना चाहते हैं। जगत् भय में डूब जाता है।

लक्ष्मण के अपार बाहुबल की प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी होती है। तात, आपके प्रताप और प्रभाव को कौन कह सकता है, और कौन जान सकता है? काम अनुचित हो या उचित, उसे समझकर किया जाये तो सब अच्छा कहते हैं। जो जल्दी में काम करके पीछे पछताते हैं, वेद और विद्वान् कहते हैं कि वे बुद्धिमान् नहीं।

भरत पर राम का अडिग विश्वास

देववाणी सुनकर लक्ष्मण सकुचा जाते हैं, और राम और सीता आदर से उनका सम्मान करते हैं। राम कहते हैं: तात, आपने सुन्दर नीति कही। भाई, राज्य का मद सबसे कठिन है।

वे राजा राजमद को चखते ही मतवाले हो जाते हैं, जिन्होंने साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया। सुनिये, लक्ष्मण, भरत जैसा उत्तम पुरुष विधाता के प्रपंच में न कहीं सुना गया, न देखा गया।

राम कहते हैं कि भरत विधि, हरि और हर का पद पा लें, तब भी उन्हें राजमद नहीं होगा। क्या कभी काँजी की बूँदों से क्षीरसागर फट सकता है? टीका इन तीनों को ब्रह्मा, विष्णु और महादेव बताती है, और जोड़ती है कि अयोध्या के राज्य की तो बात ही क्या।

फिर राम कहते हैं कि अन्धकार चाहे तरुण सूर्य को निगल जाये, और आकाश चाहे बादलों में समाकर मिल जाये। घड़े से जन्मे मुनि चाहे गाय के खुर भर जल में डूब जायें, और पृथ्वी चाहे अपनी सहज क्षमा छोड़ दे। मच्छर की फूँक से चाहे मेरु उड़ जाये। भाई, भरत को राजमद नहीं होगा। टीका घड़े से जन्मे मुनि को अगस्त्य बताती है।

और वे लक्ष्मण की शपथ और पिता की सौगन्ध खाकर कहते हैं कि भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई नहीं है।

वे कहते हैं कि गुण दूध है और अवगुण जल है, तात। विधाता इन्हें मिलाकर प्रपंच रचता है। भरत सूर्यवंश के तालाब के हंस हैं, जिन्होंने जन्म लेकर गुण और दोष को अलग कर दिया। उन्होंने गुण का दूध ग्रहण किया, अवगुण का जल छोड़ दिया, और अपने यश से जगत् में उजाला कर दिया।

भरत के गुण, शील और स्वभाव कहते कहते राम प्रेम के समुद्र में मग्न हो जाते हैं।

देवताओं की प्रशंसा और भरत के कुतर्क

राम की वाणी सुनकर और भरत पर उनका प्रेम देखकर सब देवता उनकी सराहना करते हैं कि राम के समान कृपा के धाम स्वामी और कौन है। वे कहते हैं कि यदि जगत् में भरत का जन्म न होता, तो पृथ्वी पर सब धर्मों की धुरी कौन धारण करता? और वे राम से कहते हैं कि कवियों की पहुँच से बाहर भरत के गुणों की कथा आपके सिवा कौन जान सकता है।

देवताओं की वाणी सुनकर लक्ष्मण, राम और सीता बहुत सुख पाते हैं, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। इधर भरत सारे समाज के साथ पवित्र मन्दाकिनी में स्नान करते हैं। वे सब लोगों को नदी के पास ठहराते हैं, और माता, गुरु और मन्त्री की आज्ञा माँगते हैं। फिर गुह और छोटे भाई शत्रुघ्न को साथ लेकर वे उधर चलते हैं जहाँ सीता और राम हैं।

रास्ते में माता कैकेयी की करनी समझकर भरत सकुचाते हैं। वे मन में करोड़ों कुतर्क करते हैं। कहीं ऐसा न हो कि मेरा नाम सुनकर राम, लक्ष्मण और सीता यह स्थान छोड़कर उठकर कहीं और चले जायें।

वे सोचते हैं कि मुझे माता के मत में मानकर वे जो कुछ भी करें, थोड़ा है। मेरे पाप और अवगुण क्षमा करके वे मेरा आदर करेंगे, अपनी ओर समझकर। टीका अपनी ओर का अर्थ उनका विरद और सम्बन्ध बताती है।

भरत की शरण, वे जो भी करें

भरत मन में सोचते हैं कि चाहे राम उन्हें मलिन मन का जानकर त्याग दें, चाहे सेवक मानकर सम्मान दें, उनकी शरण राम की जूतियाँ हैं। राम अच्छे स्वामी हैं, दोष सब दास का है।

वे सोचते हैं कि जगत् में यश के पात्र चातक और मछली हैं, जो अपने नेम और प्रेम को नया रखने में निपुण हैं। ऐसा मन में गुनते हुए वे मार्ग में चले जाते हैं। संकोच और प्रेम से उनके सब अंग शिथिल हैं। माता की की हुई बुराई मानो उन्हें पीछे लौटाती है, और धीरज की धुरी धारण किये वे भक्ति के बल से चलते हैं। जब वे राम का स्वभाव समझते हैं, तो रास्ते पर उनके पैर जल्दी जल्दी पड़ने लगते हैं।

उस समय भरत की दशा कैसी है? जैसी जल के प्रवाह में जलभौंरे की गति होती है।

भरत का सोच और प्रेम देखकर गुह उस समय विदेह हो जाते हैं, और टीका के अनुसार देह की सुध भूल जाते हैं। मंगल शकुन होने लगते हैं, और उन्हें सुनकर और विचारकर गुह कहते हैं: सोच मिटेगा, हर्ष होगा, और फिर अन्त में विषाद होगा।

भरत अपने सेवक गुह के सब वचन सत्य जानते हैं और आश्रम के निकट पहुँच जाते हैं। वहाँ के वन और पर्वतों के समाज को देखकर उन्हें ऐसा आनन्द होता है मानो भूखे को अच्छा अन्न मिल गया हो।

विवेक का राज्य और उसके योद्धा

ईति के भय से दुखी, तीनों तापों से पीड़ित और क्रूर ग्रहों और महामारियों से सतायी कोई प्रजा हो। मानो वह किसी अच्छे राज्य और अच्छे देश में पहुँचकर सुखी हो जाये, भरत की दशा वैसी है। टीका तीन ताप बताती है: आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक।

पोद्दार ईति के छह उपद्रव गिनाते हैं जो खेती में बाधा देते हैं: बहुत वर्षा, वर्षा न होना, चूहों का उत्पात, टिड्डियाँ, तोते और दूसरे राजा की चढ़ाई।

राम के निवास से वन की सम्पदा ऐसी शोभा पा रही है मानो अच्छा राजा पाकर प्रजा सुखी हो। वैराग्य मन्त्री है, विवेक राजा है, और सुहावना वन पवित्र देश है।

इस राज्य के योद्धा यम और नियम हैं, और पर्वत उसकी राजधानी है। टीका यम और नियम गिनाती है: यम हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, और नियम हैं शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान।

शान्ति और सुबुद्धि उसकी दो सुन्दर, पवित्र रानियाँ हैं। राजा राज्य के सब अंगों से पूर्ण है। पोद्दार सात अंग गिनाते हैं: स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना। राम के चरणों के आश्रित उस राजा के चित्त में चाव है।

विवेक रूपी राजा ने मोह रूपी राजा को उसकी सेना सहित जीत लिया है और निष्कण्टक राज्य कर रहा है। उसके नगर में सुख, सम्पत्ति और सुकाल है।

वैर छोड़कर साथ चरते पशु

वन के प्रदेशों में मुनियों के बहुत से निवास हैं, जो मानो इस राज्य के शहर, नगर, गाँव और खेड़े हैं। बहुत से विचित्र पक्षी और अनेक पशु उसकी प्रजा हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता।

गैंडे, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे और बैल देखकर राजा के साज की सराहना करते ही बनता है। ये सब वैर छोड़कर जहाँ तहाँ एक साथ चरते हैं, मानो उस राज्य की चतुरंगिणी सेना हो।

झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हैं, मानो अनेक प्रकार के नगाड़े बज रहे हों। चकवे, चकोर, पपीहे, तोते और कोयलों के समूह और सुन्दर हंस प्रसन्न मन से कूज रहे हैं। भौंरे गुंजार करते हैं और मोर नाचते हैं, मानो उस अच्छे राज्य में चारों ओर मंगल हो रहा हो। बेलें, पेड़ और तृण, सब फल और फूल से भरे हैं, और सारा समाज आनन्द और मंगल का मूल बना है।

राम के पर्वत की यह शोभा देखकर भरत के हृदय में बहुत प्रेम होता है, जैसे तपस्वी अपना नियम पूरा होने पर तप का फल पाकर सुखी होता है।

प्रसंग का क्रम

भरत का समाज दो कोस चलकर रात को ठहरता है, और रात बीतने पर भरत आगे चलते हैं। रात रहते जागकर राम सीता का स्वप्न सुनते हैं और लक्ष्मण से कहते हैं कि यह अच्छा नहीं। स्नान और पूजन के बाद वे उत्तर की ओर देखते हैं, और आकाश में धूल है। किरात और कोल समाचार लाते हैं। एक आकर चतुरंगिणी सेना की बात कहता है, और राम सोच में पड़ते हैं, और तब उन्हें समाधान होता है।

राम के हृदय की चिन्ता देखकर लक्ष्मण नीति कहते हैं। वे भरत पर कुमंत्र का आरोप लगाते हैं और पूछते हैं कि राजमद ने किसे कलंक नहीं दिया। वे अपना बल कहते हैं, आज्ञा माँगते हैं, शस्त्र सजाते हैं और राम की सौगन्ध खाते हैं। सब लोग भयभीत होते हैं, और आकाशवाणी उनके बल की प्रशंसा करती है। लक्ष्मण सकुचाते हैं, और राम और सीता उनका सम्मान करते हैं।

राम कहते हैं कि भरत को राजमद नहीं होगा, और लक्ष्मण और पिता की सौगन्ध खाते हैं। देवता राम की सराहना करते हैं। भरत मन्दाकिनी में स्नान करके गुह और शत्रुघ्न के साथ चलते हैं। माता की करनी समझकर वे सकुचाते हैं, कुतर्क करते हैं, और राम की जूतियों को अपनी शरण मानते हैं।

भरत का सोच और प्रेम देखकर गुह विदेह हो जाते हैं, और शकुनों पर विचार करके बोलते हैं। भरत आश्रम के निकट पहुँचकर वन और पर्वत देखते हैं। राम के निवास से वन की सम्पदा शोभा पाती है, पशु वैर छोड़कर साथ चरते हैं, और पक्षी कूजते हैं। राम के पर्वत को निहारकर भरत के हृदय में बहुत प्रेम होता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, सोरठा 226 से दोहा 236 और इनसे सम्बद्ध चौपाइयाँ तथा छन्द, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।