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लक्ष्मण का क्रोध, राम का विश्वास और भरत का निकट आना

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · लक्ष्मण का क्रोध, राम का विश्वास और भरत का निकट आना

लक्ष्मण का क्रोध, राम का विश्वास और भरत का निकट आना

भरत के साथ बड़ी सेना आने की बात सुनकर लक्ष्मण युद्ध के लिये तैयार हो जाते हैं। राम अपने भाई का स्वभाव जानते हैं, और उधर भरत हर कदम पर मिलने की आशा और अस्वीकार के भय से गुजर रहे हैं।

आश्रम के निकट पहुँचने से पहले ही भरत के आने का समाचार वहाँ पहुँच जाता है। आकाश में धूल है, पशु और पक्षी व्याकुल होकर भागे आ रहे हैं, और राम अभी सीता से एक दुःखभरा स्वप्न सुन चुके हैं। जिस भाई के नाम से उनके नेत्रों में प्रेम का जल उमड़ता है, उसी के साथ बड़ी सेना आने की बात सुनकर लक्ष्मण का मन युद्ध की आशंका से भर जाता है। मिलने में अभी दूरी है, पर उस दूरी के भीतर भाइयों के मन कितने अलग रास्तों से गुजरते हैं।

तुलसीदास के इस प्रसंग में हम लक्ष्मण का पूरा तर्क सुनते हैं और राम का पूरा उत्तर भी। दूसरी ओर भरत अपने ही मन की आशंकाओं से जूझते हुए आगे बढ़ते हैं। फिर वन खुलता है, जिसमें कवि विवेक का राज्य देखते हैं। क्रोध से भर उठे आश्रम और वैर छोड़कर साथ विचरते पशुओं के बीच यह कथा एक गहरी यात्रा करती है। उसका पड़ाव राम के पर्वत की शोभा है, जिसे देखकर भरत का हृदय प्रेम से भर जाता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम भरत की साधुता और आज्ञाकारिता पर विश्वास रखनेवाले भाई, जो लक्ष्मण की शंका का विस्तार से उत्तर देते हैं।
  • सीता स्वप्न में भरत के साथ दुःखी समाज और बदले रूप में सासुओं को देखती हैं।
  • लक्ष्मण राम की रक्षा की उत्कण्ठा में भरत के आने का विपरीत अर्थ लगानेवाले और युद्ध के लिये तैयार हो उठनेवाले भाई।
  • भरत अपनी माता की करनी से संकोच में पड़े, राम के स्वभाव का स्मरण करते हुए आश्रम की ओर आनेवाले।
  • शत्रुघ्न निषादराज के साथ भरत के सहयात्री, जिन्हें लक्ष्मण अपनी आशंका में भरत के साथ जोड़ते हैं।
  • निषादराज भरत के प्रेम से देह की सुध भूलनेवाले सखा, जो मंगल शकुनों का फल बताते हैं।

रात का स्वप्न और उत्तर दिशा की धूल

भरत के साथ चल रहे सभी लोग राम के प्रेम में इतने शिथिल हैं कि सूर्यास्त होने तक दो ही कोस चल पाते हैं। रात बिताने के लिये जल और स्थल की सुविधा देखकर वहीं ठहरते हैं। पोद्दारजी की टीका बताती है कि यह रात बिना खाये और बिना पिये बीतती है। पानी के पास पहुँच जाना और उसे पी लेना अलग बातें हैं; इस पड़ाव में स्थान की सुविधा है, पर प्रेम और विरह में डूबे समाज की भूख प्यास का निराकरण नहीं हुआ। रात बीतती है और राम के प्रेमी भरत आगे बढ़ते हैं।

उधर राम रात शेष रहते ही जाग गये हैं। सीता ने स्वप्न देखा है और उसे सुनाती हैं। मानो भरत पूरे समाज के साथ आये हों, प्रभु के वियोग का ताप उनके शरीर को जला रहा हो। सभी के मन मलिन हैं, सब दीन और दुःखी दिखायी देते हैं। सासुओं को उन्होंने दूसरी ही सूरत में देखा है। उस बदली हुई सूरत का समाचार अभी किसी दूत ने नहीं दिया; वह पहले स्वप्न में सामने आता है और उसका दुःख सीता के कहने से राम तक पहुँचता है।

सीता की बात सुनते ही राम के नेत्र भर आते हैं। जो सबको सोच से छुड़ाते हैं, वे स्वयं सोच के वश हो जाते हैं। लक्ष्मण से कहते हैं कि यह स्वप्न अच्छा नहीं है, कोई बहुत बुरा समाचार सुनायेगा। अभी बुरी खबर की आशंका है, उसका निश्चित विवरण नहीं। इसके बाद दोनों भाई स्नान करते हैं। राम महादेव का पूजन और साधुओं का सम्मान करते हैं। पूजा और वन्दना के बाद वे बैठते हैं और उत्तर दिशा की ओर देखने लगते हैं।

सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए।
नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए॥
तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे॥

छन्द, सोरठा २२६ से पूर्व

उत्तर की ओर आकाश में धूल छायी है। बहुत से पक्षी और पशु व्याकुल होकर भाग रहे हैं और आश्रम में आ रहे हैं। राम यह देखकर उठते हैं। कारण क्या है, यह विचार उनके मन को चकित कर रहा है। उसी समय कोल और भील आकर पूरा समाचार कहते हैं। छन्द में बैठने, देखने और उठने का क्रम साफ़ है। पहले सीता का कहा हुआ स्वप्न था, फिर अपनी आँखों से दिखती धूल और भागते जीव हैं, और तब मनुष्यों के मुख से समाचार मिलता है।

सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल॥ २२६॥

सोरठा २२६

भरत के आने की मंगल बात सुनते ही राम के मन में बड़ा आनन्द होता है। शरीर पुलक से भर जाता है और शरद के कमल जैसे नेत्रों में प्रेमाश्रु आ जाते हैं। सुबह स्वप्न सुनकर भी इन्हीं आँखों में जल आया था। अब भरत का समाचार सुनकर उसमें स्नेह उमड़ रहा है। जो अभी दूर हैं, उनका नाम ही निकटता का ऐसा अनुभव दे रहा है। इसी हर्ष के भीतर अगला प्रश्न उठेगा कि भरत आये किस कारण हैं।

भरत का समाज सूर्यास्त तक दो कोस चलकर बिना खाये पिये रात बिताता है। आश्रम में सीता का दुःखभरा स्वप्न सुनने के बाद राम पूजा करते हैं, उत्तर की ओर धूल और व्याकुल जीव देखते हैं, और कोल भीलों से भरत के आने का समाचार पाकर आनन्दित हो जाते हैं।

एक समाचार, दो समझ

आनन्द के बाद राम फिर सोच में पड़ते हैं। भरत के आने का क्या कारण है? इसी बीच कोई आकर बताता है कि उनके साथ छोटी सेना नहीं, बड़ी भारी चतुरङ्गिणी सेना है। यह सुनकर राम की चिन्ता बढ़ती है। एक ओर पिता के वचन हैं, दूसरी ओर भाई भरत का संकोच। वे भरत के स्वभाव को मन में समझते हैं तो चित्त को ठहराने की जगह नहीं मिलती। भाई का स्नेह उनके लिये ऐसा विषय है जिसे किसी साधारण निर्णय से निपटाया नहीं जा सकता।

फिर उन्हें समाधान भी भरत के स्वभाव से मिलता है। भरत साधु हैं, सयाने हैं और उनकी बात माननेवाले हैं। राम अपने भीतर इस विश्वास पर पहुँच चुके हैं। लक्ष्मण प्रभु के हृदय की चिन्ता देखते हैं और अवसर के अनुसार नीति का विचार कहने लगते हैं। आगे आनेवाले दोनों भाइयों के संवाद में यह क्रम याद रखना चाहिये: राम भरत को आज्ञाकारी जानकर आश्वस्त हुए हैं, और लक्ष्मण अभी उनके आने की दूसरी सम्भावना पर विचार कर रहे हैं।

लक्ष्मण आरम्भ में अपने बोलने का कारण स्पष्ट करते हैं। स्वामी ने पूछा नहीं है, फिर भी सेवक कुछ कहना चाहता है। समय पर बिना पूछे बोल देना ढिठाई नहीं माना जाता। अवसर ऐसा है कि प्रश्न की प्रतीक्षा में चुप रहना उचित नहीं लगता। वे राम को सर्वज्ञों में शिरोमणि कहते हैं और अपनी बात को एक अनुगामी की समझ तक सीमित रखते हैं। इस विनय के बाद ही वह सलाह आती है जिसमें राम की सरलता को चिन्ता का कारण बनाया जाता है।

नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान॥ २२७॥

दोहा २२७

आप सबके सुहृद् हैं, लक्ष्मण का आशय है, बिना किसी कारण के भी हित करनेवाले। हृदय अत्यन्त सरल है, शील और स्नेह का भण्डार है। सभी पर प्रेम और सभी पर विश्वास होने से आप अपने मन में सबको अपने समान जानते हैं। इस कथन में प्रभु की प्रशंसा के साथ एक चेतावनी रखी गयी है। लक्ष्मण को लगता है कि राम की अपनी निष्कपटता दूसरों को समझने में भी उतर आती है, जबकि संसार का हर मन उसी सरलता से काम नहीं करता।

अब लक्ष्मण विषयी और मूढ़ जीवों का स्वभाव बताते हैं। प्रभुता पाते ही वे मोह में पड़कर अपना असली रूप दिखाने लगते हैं। साथ ही वे यह भी स्वीकारते हैं कि भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर माने जाते हैं और राम के चरणों में उनका प्रेम सारा जगत् जानता है। इसी स्वीकृति के बाद उनका संशय तीखा हो जाता है: क्या अधिकार मिल जाने पर ऐसा व्यक्ति भी बदल सकता है? लक्ष्मण आगे जो आरोप लगाते हैं, वे उनके इसी भय से निकलते हैं।

राम भरत को साधु, सयाना और आज्ञाकारी जानकर समाधान पाते हैं। लक्ष्मण उनकी चिन्ता देखकर बिना पूछे सलाह देते हैं। उनके अनुसार राम सबको अपनी सरलता के समान समझते हैं, जबकि राजसत्ता मिलने पर मनुष्य का व्यवहार बदल सकता है।

लक्ष्मण की आशंका और राजमद के उदाहरण

लक्ष्मण कहते हैं कि आज वे ही भरत राम का पद पाकर धर्म की मर्यादा मिटाते चले आ रहे हैं। उनके कथन में भरत को कुटिल भाई कहा जाता है, जिसने बुरा अवसर देखकर और राम को वन में अकेला, असहाय मानकर यह उपाय किया है। यह भरत के मन का वास्तविक वृत्तान्त नहीं, लक्ष्मण की आशंका है। प्रेम से व्याकुल यात्री के आने को वे राज्य से बाधा हटाने की चाल समझ रहे हैं। उसी भय में शत्रुघ्न भी भरत के साथ दोषी ठहरते हैं।

करि कुमंत्रु मन साजि समाजू । आए करै अकंटक राजू॥
कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई । आए दल बटोरि दोउ भाई॥

चौपाई १

उनका आरोप है कि मन में बुरा विचार करके समाज इकट्ठा किया गया है, जिससे राज्य निष्कण्टक हो जाये। दोनों भाई अनेक प्रकार की कुटिलताएँ रचकर और सेना बटोरकर आये हैं। यदि कपट और कुचाल न हो तो ऐसे अवसर पर रथ, घोड़े और हाथियों की कतार किसे सुहायेगी? सेना की उपस्थिति लक्ष्मण के लिये मन की नीयत का प्रमाण बन रही है। उन्होंने भरत के आने का समाचार सुना है; उससे आगे की योजना वे स्वयं अनुमान में जोड़ रहे हैं।

फिर वे भरत को अकेला दोष देने की बात से आगे बढ़ते हैं। राजपद पाकर तो पूरा जगत् ही मतवाला हो जाता है। इस सामान्य कथन को समझाने के लिये वे चन्द्रमा, नहुष और वेन का उदाहरण रखते हैं। चन्द्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ। नहुष ब्राह्मणों की पालकी पर चढ़ा। वेन लोक और वेद दोनों से विमुख हुआ, और लक्ष्मण उसके समान अधम किसी को नहीं मानते। प्रत्येक नाम सत्ता के मद का उदाहरण बनकर आता है; यहाँ उनके जीवन की अलग कथा नहीं कही जाती।

ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान॥ २२८॥

दोहा २२८

सहस्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु को जोड़कर लक्ष्मण पूछते हैं कि राजमद ने किसे कलंक नहीं दिया। बड़े और प्रतिष्ठित नामों पर भी जब वह प्रभाव पड़ा, तो भरत के विषय में निश्चिन्त रहना उन्हें उचित नहीं लगता। इसी तर्क में वे भरत के कथित उपाय को राजनीति की दृष्टि से सही भी कहते हैं: शत्रु और ऋण को थोड़ा भी शेष नहीं रखना चाहिये। वह कठोर नीति उनके आरोप का हिस्सा है। वे मान बैठे हैं कि भरत राम को बाधा समझकर हटाने आये हैं।

पर एक बात, लक्ष्मण के अनुसार, भरत ने अच्छी नहीं की। राम को असहाय जानकर उनका निरादर किया है। संग्राम में राम का क्रोधपूर्ण मुख देखकर इस भूल का फल समझ में आ जायेगा। अभी कोई युद्ध नहीं हुआ, राम ने युद्ध का आदेश भी नहीं दिया; लक्ष्मण की वाणी उस सम्भावित संग्राम तक पहुँच गयी है। बोलते बोलते वे नीति का रस भूल जाते हैं। तुलसी उनके रोमांच को युद्धरस के वृक्ष में फूल आने जैसा कहते हैं। विचार अब शरीर में वीरता के आवेग के रूप में प्रकट हो रहा है।

लक्ष्मण दोनों भाइयों पर सेना लाकर राज्य से बाधा हटाने की योजना का आरोप लगाते हैं। राजमद समझाने के लिये चन्द्रमा, नहुष, वेन, सहस्रबाहु, इन्द्र और त्रिशंकु के उदाहरण देते हैं। उनका कथन भरत की वास्तविक मंशा से अलग है, और नीति कहते कहते वे युद्ध के आवेग में भर जाते हैं।

धनुष हाथ में, फिर आकाश से रोक

लक्ष्मण राम के चरणों की वन्दना करते हैं और उनकी चरणरज सिर पर रखते हैं। फिर अपना सच्चा और स्वाभाविक बल कहते हुए आग्रह करते हैं कि नाथ उनकी बात अनुचित न मानें। उन्हें लगता है कि भरत ने उनके साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है। आखिर कब तक मन मारे सहा जाये, जबकि स्वामी साथ हैं और धनुष उनके हाथ में है? रक्षा की इच्छा अब अपनी क्षमता की घोषणा में बदल रही है। जिस अपमान की बात वे कर रहे हैं, वह भी भरत के आने के उनके अनुमान से जुड़ा है।

छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान॥ २२९॥

दोहा २२९

क्षत्रिय जाति, रघुकुल में जन्म और राम के अनुगामी होने की जगत् में पहचान, लक्ष्मण इन तीनों को अपने न सह सकने का आधार बनाते हैं। फिर धूल की उपमा देते हैं। उससे नीचा क्या होगा, पर उसे लात मारी जाये तो वह भी सिर पर चढ़ती है। इस तुलना में अपने को पददलित मानने का रोष है। लक्ष्मण को अपमान के सामने चुप रहना अपने कुल और सेवा के प्रतिकूल लगता है, और वे आज्ञा माँगते हैं।

उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा॥
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा॥

चौपाई २

वे उठते हैं, हाथ जोड़ते हैं और राम से अनुमति माँगते हैं। तुलसी कहते हैं मानो सोया हुआ वीररस जाग उठा हो। लक्ष्मण सिर पर जटा बाँधते हैं, कमर में तरकस कसते हैं, धनुष सजाते हैं और बाण हाथ में लेते हैं। यह तैयारी वास्तव में हो रही है। इसके बाद कही जानेवाली रणभूमि की बातें अभी उनकी प्रतिज्ञाएँ और धमकियाँ हैं। धनुष सँभल गया है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच युद्ध आरम्भ नहीं हुआ है।

आज राम का सेवक होने का यश लेना है, वे कहते हैं, और भरत को संग्राम में शिक्षा देनी है। राम के निरादर का फल पाकर भरत और शत्रुघ्न दोनों रणशय्या पर सोयें। सारा समाज इकट्ठा आ गया, इसे वे अपने पिछले क्रोध को प्रकट करने का अच्छा अवसर मानते हैं। जैसे सिंह हाथियों के झुंड को कुचलता है, जैसे बाज लवा पक्षी को अपनी लपेट में लेता है, वैसे ही वे दोनों भाइयों और सेना को परास्त करने का संकल्प कहते हैं।

तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता॥
जौं सहाय कर संकरु आई । तौ मारउँ रन राम दोहाई॥

चौपाई ३

उनकी प्रतिज्ञा और कठोर हो जाती है: छोटे भाई और सेना सहित भरत को मैदान में पछाड़ देंगे। शंकर भी सहायता करने आ जायें तो राम की सौगन्ध, उन्हें युद्ध में छोड़ेंगे नहीं। शिव का आना यहाँ एक परिकल्पना है, जिसके सहारे लक्ष्मण अपने निश्चय की सीमा बता रहे हैं। लक्ष्मण का तमतमाया हुआ रूप और ऐसी प्रामाणिक सौगन्ध सुनकर सब लोग भयभीत होते हैं। लोकपाल घबरा कर भागना चाहते हैं और जगत् भय में डूब जाता है।

इसी समय आकाशवाणी होती है। वह पहले लक्ष्मण के अपार बाहुबल की प्रशंसा करती है। उनके प्रताप और प्रभाव को कौन कह सकता है, कौन पूरा जान सकता है? फिर उसी बलवान से विचार करने को कहती है। काम कोई भी हो, उचित और अनुचित को समझकर करना अच्छा माना जाता है। वेद और विद्वान् उन लोगों को बुद्धिमान् नहीं कहते जो उतावली में काम कर बैठते हैं और बाद में पछताते हैं। बल के साथ निर्णय की माँग रखी गयी है।

अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ॥
सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥

चौपाई ४

लक्ष्मण चरणरज सिर पर रखकर, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगते हैं और शस्त्र सँभालते हैं। दोनों भाइयों और सेना के विरुद्ध उनकी प्रतिज्ञा सबको भयभीत करती है। आकाशवाणी उनका बल स्वीकारते हुए उचित और अनुचित पर विचार करने की सीख देती है।

भरत पर राम का अडिग विश्वास

देववाणी सुनकर लक्ष्मण सकुचा जाते हैं। राम और सीता उनका आदरपूर्वक सम्मान करते हैं। इस संकोच के बाद उन्हें अपनापन मिलता है, और राम उनके तर्क को ध्यान में रखकर उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि नीति सुन्दर कही गयी है, राजमद सचमुच सबसे कठिन मद है। इस स्वीकृति से लक्ष्मण की कही हुई हर आशंका सत्य नहीं हो जाती। राम अब उसी सामान्य नीति के भीतर वह अन्तर खोलते हैं जिससे भरत को पहचाना जा सकता है।

वे राजा राजमद की मदिरा पीते ही मतवाले हो जाते हैं जिन्होंने साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया। सत्संग का अभाव यहाँ निर्णायक है। राम लक्ष्मण को सुनने के लिये कहते हैं: भरत के समान उत्तम पुरुष ब्रह्मा की सृष्टि में न कहीं सुना गया है, न देखा गया है। लक्ष्मण जिन उदाहरणों से सत्ता के प्रभाव को सब पर लागू कर रहे थे, राम उनके सामने भरत के अपने गुण और संगति की पहचान रखते हैं। पद का प्रभाव समझने के लिये पद पानेवाले का स्वभाव भी जानना होगा।

भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ॥ २३१॥

दोहा २३१

राम का निश्चय अयोध्या के राज्य तक सीमित नहीं है। भरत ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का पद भी पा लें तो उन्हें राज्य का मद नहीं होगा। क्या काँजी की कुछ बूँदें क्षीरसागर को फाड़ सकती हैं? दूध के समुद्र के सामने उन बूँदों का परिमाण रखकर वे भरत के शील की विशालता कहते हैं। जिस पद को लक्ष्मण परिवर्तन का कारण मान रहे थे, उसका प्रभाव यहाँ उस विशाल स्वभाव के सामने अत्यन्त छोटा पड़ जाता है।

फिर राम पाँच असम्भव तुलनाओं से अपनी बात दृढ़ करते हैं। चाहे अन्धकार दोपहर के प्रखर सूर्य को निगल जाये। चाहे आकाश बादलों में समा जाये। चाहे अगस्त्य गाय के खुर जितने जल में डूब जायें। चाहे पृथ्वी अपनी सहज क्षमा और सहनशीलता छोड़ दे। चाहे मच्छर की फूँक से सुमेरु उड़ जाये। इनमें जो बात कल्पना में भी उलटी लगती है, राम उसे सम्भव मान लेने की छूट देकर भी भरत में राजमद की सम्भावना स्वीकार नहीं करते।

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई । होइ न नृपमदु भरतहि भाई॥
लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना॥

चौपाई ५

उनका कथन यहीं शपथ तक पहुँचता है। लक्ष्मण की शपथ और पिता की सौगन्ध लेकर राम कहते हैं कि भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई कोई नहीं है। थोड़ी देर पहले लक्ष्मण ने राम की सौगन्ध खाकर युद्ध का निश्चय कहा था। अब राम लक्ष्मण और पिता की सौगन्ध लेकर भरत की पवित्रता कहते हैं। एक ही परिवार के ये नाम वचन को दृढ़ करते हैं, पर राम का वचन उस भाई की रक्षा कर रहा है जिसे लक्ष्मण शत्रु समझ बैठे थे।

सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता॥
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा॥

चौपाई ६

अन्त में दूध और जल की दूसरी छवि आती है। विधाता गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जल को मिलाकर संसार रचते हैं। सूर्यवंश एक तालाब है और उसमें जन्मे भरत हंस हैं। उन्होंने गुण और दोष को अलग कर दिया है, दूध को ग्रहण किया है और जल को छोड़ दिया है। इसी गुणग्रहण से उनके यश ने जगत् में उजाला फैलाया है। भरत का शील केवल दोष न होने से नहीं समझाया गया; उसमें गुण पहचानने और उन्हें अपनाने की सामर्थ्य भी है।

भरत के गुण, शील और स्वभाव कहते कहते राम प्रेम के समुद्र में मग्न हो जाते हैं। उनका उत्तर तर्क से आरम्भ होकर भाई के प्रेम में भर गया है। अभी भरत सामने नहीं पहुँचे हैं, फिर भी राम उन्हें इतने पूरे विश्वास से जानते हैं। लक्ष्मण ने सेना देखे बिना उसके समाचार से युद्ध की सम्भावना निकाली थी; राम भाई के स्वभाव से उस आशंका का समाधान करते हैं। दोनों के शब्द सुन लेने पर हमें दिखता है कि निर्णय में किसी व्यक्ति की पहचान कितनी बड़ी जगह रखती है।

राम राजमद की कठिनाई मानते हैं, फिर सत्संग और भरत के अनुपम स्वभाव का अन्तर बताते हैं। क्षीरसागर, पाँच असम्भव घटनाओं, अपनी शपथ और गुण ग्रहण करनेवाले हंस की छवि से वे भरत की पवित्रता का विश्वास प्रकट करते हैं।

देवताओं की प्रशंसा और भरत की आशंका

राम की वाणी सुनकर और भरत पर उनका प्रेम देखकर देवता उनकी सराहना करते हैं। राम के समान कृपा का धाम दूसरा स्वामी कौन है? उनकी प्रशंसा फिर भरत की ओर जाती है। यदि भरत का जन्म न हुआ होता तो पृथ्वी पर सम्पूर्ण धर्मों की धुरी कौन सँभालता? देवता कहते हैं कि भरत के गुणों की कथा कवियों की पहुँच से भी बाहर है, उसे राम के सिवा कौन जान सकता है। भरत के विषय में यह महिमा उन्हीं के वचनों में आती है।

लक्ष्मण, राम और सीता देवताओं की बात सुनकर ऐसा सुख पाते हैं जिसका वर्णन नहीं हो सकता। उस ओर भरत अब अपने सारे समाज के साथ पवित्र मन्दाकिनी में स्नान कर चुके हैं। वे सब लोगों को नदी के पास ठहराते हैं। माता, गुरु और मन्त्री की आज्ञा माँगकर उस ओर चल पड़ते हैं जहाँ सीता और राम हैं। निषादराज उनके साथ हैं और छोटे भाई शत्रुघ्न भी। विशाल समाज पीछे नदी के समीप रहता है; आश्रम की ओर बढ़ती इस यात्रा में ये तीन साथ हैं।

मार्ग में भरत को अपनी माता कैकेयी की करनी याद आती है और वे सकुचाते हैं। मन में अनेक कुतर्क उठते हैं। कहीं उनका नाम सुनकर राम, लक्ष्मण और सीता यह स्थान छोड़कर किसी दूसरी जगह न चले जायें। यह उनका भय है, आश्रम में घट रही कोई घटना नहीं। उधर राम भरत के शील की इतनी दृढ़ प्रशंसा कर चुके हैं, और इधर भरत सोच रहे हैं कि अपने नाम से कहीं प्रियजनों को और दूर न कर दें।

मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर॥ २३३॥

दोहा २३३

अपने को माता के मत में शामिल समझे जाने की आशंका से भरत कहते हैं कि राम जो भी व्यवहार करें, कम है। फिर राम के अपने स्वभाव और सम्बन्ध का विचार आता है: वे मेरे पाप और अवगुण क्षमा करके आदर ही करेंगे। मन एक ओर दोष की सम्भावना को स्वीकारता है, दूसरी ओर स्वामी की उदारता को याद करता है। भरत अपने लिये निर्दोष होने का दावा करके मार्ग नहीं खोलते। उन्हें भरोसा उस ओर के प्रेम और क्षमा से मिलता है।

देवता राम की कृपा और भरत की धर्मधारण शक्ति की प्रशंसा करते हैं। मन्दाकिनी में स्नान के बाद भरत समाज को नदी के पास छोड़कर आज्ञा लेते हैं और निषादराज तथा शत्रुघ्न के साथ चलते हैं। उन्हें भय है कि उनका नाम सुनकर राम कहीं चले न जायें, फिर राम की क्षमा का भरोसा आता है।

जिस शरण को हर दशा में थामे रहना है

भरत अपने मन में दोनों सम्भावनाएँ रख लेते हैं। राम उन्हें मलिन मनवाला समझकर त्याग दें, अथवा सेवक जानकर सम्मान दें। दोनों दशाओं में उनका आश्रय राम की पनही है। स्वामी अच्छे हैं, दोष सारे दास के हैं। इस कथन में कोई वस्तु दी या ली नहीं जा रही। पनही का नाम भरत की शरण के रूप में आता है, जिसे सम्मान मिलने पर भी थामना है और अस्वीकार का भय होते हुए भी। उनका सम्बन्ध किसी अनुकूल उत्तर की शर्त पर नहीं रखा गया।

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौं सनमानहिं सेवकु मानी॥
मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥

चौपाई ७

वे चातक और मछली को जगत् में यश का पात्र मानते हैं। अपने नेम और प्रेम को सदा नया बनाये रखने में दोनों निपुण हैं। यह स्मरण करते हुए भरत चलते जाते हैं। संकोच और स्नेह से उनके सारे अंग शिथिल हैं। माता की की हुई बुराई मानो उन्हें पीछे लौटाती है; धैर्य की धुरी सँभाले वे भक्ति के बल पर आगे बढ़ते हैं। फिर जैसे ही राम का स्वभाव याद आता है, उनके पाँव रास्ते पर जल्दी जल्दी पड़ने लगते हैं।

तुलसी इस गति को जल के प्रवाह में जलभौंरे की गति जैसा कहते हैं। रास्ता केवल भूमि पर तय नहीं हो रहा; स्मरण के साथ उसकी चाल भी बदल रही है। माता की करनी का विचार रोकता है और राम के स्वभाव का विचार गति देता है। यहाँ पीछे लौटाने को कवि की उपमा में कहा गया है, जबकि आगे बढ़ते कदम वास्तव में वर्णित हैं। भरत का मन जिस धारा से जूझ रहा है, उसी के बीच भक्ति उन्हें चलाये रखती है।

निषादराज भरत का सोच और स्नेह देखकर देह की सुध भूल जाते हैं। तभी मंगल शकुन होने लगते हैं। उन्हें सुनकर और विचारकर वे उनका फल बताते हैं। उनकी बात में तीन अवस्थाएँ हैं और तीनों को साथ सुनना आवश्यक है: सोच मिटेगा, हर्ष होगा, फिर अन्त में विषाद होगा। शुभ शकुन मिलने का अर्थ यह नहीं कि आगे का हर दुःख मिट गया। निषादराज आनेवाले आनन्द के साथ उसके बाद की वेदना का भी संकेत देते हैं।

लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु॥ २३४॥

दोहा २३४

भरत सेवक गुह के इन सभी वचनों को सत्य जानते हैं। वे आश्रम के निकट पहुँचते हैं और वन तथा पर्वतों का समूह देखते हैं। उसे देखकर उन्हें ऐसा आनन्द होता है जैसे भूखे को अच्छा अन्न मिल गया हो। जिन अंगों में संकोच और प्रेम की शिथिलता थी, उसी यात्री के सामने अब प्रिय के निवास की भूमि खुल रही है। अभी उस आनन्द का विषय वन और पर्वत हैं, राम से प्रत्यक्ष मिलन आगे है।

भरत सम्मान और त्याग, दोनों सम्भावनाओं में राम की पनही को शरण मानते हैं। माता की करनी का संकोच उन्हें रोकता है, राम का स्वभाव कदम तेज करता है। निषादराज सोच के मिटने, हर्ष होने और फिर विषाद आने का संकेत देते हैं। भरत वन और पर्वत देखकर आनन्दित होते हैं।

विवेक का राज्य और उसके योद्धा

भरत की दशा समझाने के लिये तुलसी एक और बड़ा चित्र खोलते हैं। ईति के भय से दुःखी प्रजा हो, तीनों तापों से पीड़ित हो, क्रूर ग्रह और महामारियाँ उसे सताती हों, फिर वह अच्छे देश और अच्छे राज्य में पहुँचकर सुख पाये। भरत को भी वैसा ही सुख मिल रहा है। टीका तीन तापों को आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक कहती है। उस पीड़ा का विस्तार बताकर कवि सुरक्षित देश पहुँचने के सुख का परिमाण देते हैं। यह भरत की वर्तमान राहत की उपमा है।

ईति भी केवल एक अनजाना संकटसूचक शब्द नहीं रह जाता। पोद्दारजी छह उपद्रव बताते हैं जो खेतों में बाधा डालते हैं: अत्यधिक वर्षा, वर्षा का न होना, चूहों का उत्पात, टिड्डियाँ, तोते और दूसरे राजा की चढ़ाई। खेती और जीवन को चारों ओर से घेरनेवाली इन विपत्तियों के बाद अच्छे राज्य का सुख समझ में आता है। इन सबके वास्तव में भरत के मार्ग में घटने का वर्णन नहीं है; पीड़ित प्रजा की यह पूरी छवि उनके मन की दशा बताती है।

अब वन स्वयं एक राज्य बनकर दिखायी देता है। राम के निवास से उसकी सम्पदा ऐसी शोभा पा रही है जैसे अच्छा राजा मिलने पर प्रजा सुखी हो। सुहावना वन उसका पवित्र देश है, विवेक राजा है और वैराग्य मन्त्री। निर्णय करने की शक्ति और आसक्ति से दूरी, दोनों के नाम शासन के केन्द्र में रखे गये हैं। इस राज्य की राजधानी पर्वत है। थोड़ी देर पहले राजमद पर इतनी तीखी चर्चा हुई थी; अब हमारे सामने राम के आश्रय से प्रसन्न एक और राजव्यवस्था खुल रही है।

भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी॥
सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ॥

चौपाई ८

इस राज्य के योद्धा यम और नियम हैं। टीका उनके दस नाम पूरे खोलती है। यम हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। नियम हैं शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान। इन सबको साथ रखने पर रूपक का सैन्यबल स्पष्ट होता है। आचरण और साधना की ये शक्तियाँ विवेक के राज्य की रक्षा में हैं। जहाँ युद्ध की चर्चा में अभी धनुष और बाण सजाये गये थे, वहाँ इस राज्य के वर्णन में कवि संयम के इन साधनों को योद्धा कहते हैं।

शान्ति और सुबुद्धि दो सुन्दर, पवित्र रानियाँ हैं। राजा राज्य के सभी अंगों से पूर्ण है। पोद्दारजी इन सात अंगों का परिचय भी देते हैं: स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना। इस प्रकार रूपक में राजा अकेला नहीं रखा गया। मन्त्री और सुहृद् से लेकर धन, देश, दुर्ग और सेना तक राज्य की सम्पूर्ण व्यवस्था का संकेत है। उस राजा के चित्त में चाव है, आनन्द और उत्साह है, क्योंकि वह राम के चरणों का आश्रित है।

जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु॥ २३५॥

दोहा २३५

विवेकरूपी राजा ने मोह नाम के राजा को उसकी सेना सहित जीत लिया है और निष्कण्टक राज्य कर रहा है। नगर में सुख, सम्पत्ति और सुकाल है। लक्ष्मण ने भरत पर निष्कण्टक राज्य करने के लिये राम को हटाने आने का अनुमान लगाया था। यहाँ वही राज्यसुख मोह की पराजय से आता है। तुलसी के रूपक में जीत का विषय साफ़ है: विवेक का विरोधी मोह है। वन की शोभा को समझानेवाला यह राज्य भीतर की शक्तियों और उनके संघर्ष के नाम भी सामने रख देता है।

वन विवेक का राज्य है, वैराग्य उसका मन्त्री, यम और नियम योद्धा, पर्वत राजधानी, शान्ति और सुबुद्धि रानियाँ हैं। राज्य के सातों अंग पूर्ण हैं। राम के चरणों का आश्रय लिये विवेक ने मोह को सेना सहित जीत लिया है और नगर सुख, सम्पत्ति तथा सुकाल से भरा है।

वैर छोड़कर साथ विचरती सेना

वन के अलग अलग प्रदेशों में मुनियों के अनेक निवास हैं। वे इस राज्य के शहर, नगर, गाँव और खेड़े जैसे हैं। तरह तरह के बहुत से पक्षी और पशु उसकी प्रजा का समाज हैं। कवि उस विस्तार को पूरा गिन पाने की कठिनाई कहते हैं, फिर भी उसके कुछ रूप हमारे सामने रखते हैं। आश्रम की शान्ति इस वर्णन में अकेली कुटी तक सीमित नहीं रहती; आसपास के निवास और समस्त जीव एक ही सुशासित देश के अंग दिखाई देते हैं।

गैंडे, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे और बैल दिखायी देते हैं। उन्हें देखकर राज्य के साज की सराहना होती है। ये सब परस्पर वैर छोड़कर जहाँ तहाँ एक साथ विचर रहे हैं। यही उस राज्य की चतुरङ्गिणी सेना है। प्रसंग के आरम्भ में बड़ी सेना के समाचार ने लक्ष्मण को युद्ध की आशंका से भर दिया था। यहाँ सेना की उपमा उन पशुओं के लिये आयी है जिनका आपसी वैर छूट गया है। एक साथ उनका विचरना इस वनराज्य का सुख दिखाता है।

झरनों से पानी झर रहा है और मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे हैं। वे मानो अनेक प्रकार के नगाड़े हैं। चकवे, चकोर, पपीहे, तोते और कोयलों के समूह हैं; सुन्दर हंस भी प्रसन्न मन से कूज रहे हैं। भौंरे गुंजार करते हैं और मोर नाचते हैं। अच्छे राज्य में चारों ओर होनेवाले मंगल की तरह ये ध्वनियाँ और गतियाँ दिखाई देती हैं। बेल, वृक्ष और तृण सब फल और फूल से भरे हैं। सारा समाज आनन्द और मंगल का मूल बना हुआ है।

राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु॥ २३६॥

दोहा २३६

राम के पर्वत की यह शोभा देखकर भरत के हृदय में अत्यन्त प्रेम होता है। उनकी प्रसन्नता के लिये अन्तिम उपमा तपस्वी की आती है, जिसका नियम समाप्त हुआ हो और जिसे तपस्या का फल मिल गया हो। इतने निकट आने का आनन्द इस तरह पूरा अनुभव बनकर सामने है। हम अभी किसी आलिंगन या भेंट पर नहीं पहुँचे। दृश्य में वन है, पर्वत है और उन्हें निहारते भरत का प्रेम है। इसी पर दोहा ठहरता है।

मुनियों के निवास नगर और गाँव हैं, पशु पक्षी प्रजा हैं, वैर छोड़कर साथ विचरते जीव सेना हैं। झरनों और हाथियों की ध्वनि नगाड़े बनती है, पक्षियों और भौंरों का स्वर मंगल। राम के पर्वत को देखकर भरत नियम पूरा करके तप का फल पाये तपस्वी जैसे सुखी होते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

लक्ष्मण की वाणी और भरत के मन को साथ सुनने पर इस प्रसंग की करुणा बढ़ जाती है। लक्ष्मण समझ रहे हैं कि भरत राम को असहाय जानकर उनका निरादर करने आये हैं। भरत सोच रहे हैं कि उनके आने का नाम सुनकर ही राम कहीं दूसरी जगह न चले जायें। एक ओर रक्षा का आवेग अनुमान को कठोर बना रहा है, दूसरी ओर अपराध की आशंका प्रेम को संकोच से भर रही है। राम का भरोसा भरत के स्वभाव की पहचान पर टिका है।

आकाशवाणी की सीख इसी उलझन में काम की बात बनती है। सामर्थ्य का सम्मान करते हुए भी वह उचित और अनुचित को समझने के लिये ठहरने को कहती है। लक्ष्मण के सकुचाने पर राम और सीता उनका आदर करते हैं। फिर उत्तर में भरत के गुण सामने आते हैं। इस संवाद में सुधार का अवसर अपमान से नहीं घिरता; जिसे सोचना है, उसे अपना सम्मान बचाये हुए सुनने की जगह मिलती है।

वन में प्रवेश करते समय रूपक हमें फिर विवेक के पास ले आता है। वहाँ उसके साथ वैराग्य, यम, नियम, शान्ति और सुबुद्धि हैं। यह पूरा समाज राम के आश्रय से प्रसन्न है। कथा में जिस मोह ने आशंका बढ़ायी थी, वन के इस राज्य में वही पराजित राजा है। भरत उस शोभा को देखकर सुख पाते हैं और हम उनके साथ ऐसे प्रदेश में आते हैं जहाँ पशुओं का वैर भी छूट गया है।

भरत अभी राम से मिले नहीं हैं। सामने वह पर्वत है जहाँ राम रहते हैं, और उसके दर्शन ने ही मन में ऐसा प्रेम भर दिया है जैसा नियम पूरा होने और तप का फल मिलने पर तपस्वी अनुभव करता है। मुलाकात से पहले की इस तृप्ति में रास्ते का सारा संकोच और सारी अभिलाषा साथ उपस्थित हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, सोरठा २२६ से दोहा २३६ और इनसे सम्बद्ध चौपाइयाँ तथा छन्द; हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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