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भरत की विनती और राम का वचन

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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 29

भरत सभा में खड़े होते हैं। वे उस भाई की बात कहते हैं, जो खेल में हारने पर भी उन्हें जिता देते थे। राम कहते हैं कि भरत जो कहेंगे, वे आज वही करेंगे। भरत तीन प्रस्ताव रखते हैं और वही माँगते हैं जिससे प्रभु का मन प्रसन्न हो। राम संकोच से चुप रहते हैं, और जनक के दूत आते हैं।

मुनि के वचन सुनकर और राम का रुख पाकर भरत गुरु और स्वामी को पूरी तरह अनुकूल पाते हैं। वे सारा भार अपने सिर देखते हैं। वे सभा में खड़े होते हैं। शरीर पुलकित है, आँखों में प्रेम का जल बढ़ आया है। राम का उत्तर यह है कि भरत जो कहेंगे, वे आज वही करेंगे। भरत तीन प्रस्ताव रखते हैं, और प्रभु के चरणों की शपथ लेकर कहते हैं कि जगत् के मंगल का एक उपाय है।

इस प्रसंग में भरत कहते हैं कि खेल में हारने पर भी राम उन्हें जिता देते थे। वे कहते हैं कि विधाता ने नीच माता के बहाने बीच डाल दिया, और आज यह कहना भी उन्हें शोभा नहीं देता। अपने अभाग्य को वे अथाह समुद्र कहते हैं, और अपने को सारे अनर्थों का मूल। राम के वन जाने के बारे में जो उन्होंने सुना था, वह अब आँखों से देख लिया है। राम कहते हैं कि भरत की ग्लानि व्यर्थ है, और भरत का नाम स्मरण करते ही सब पाप मिट जायेंगे। इन्द्र और देवता भयभीत होकर मन ही मन राम की शरण जाते हैं। देवगुरु भरत के चरणों के अनुराग को सब मंगलों का मूल कहते हैं। भरत मन में निश्चय करते हैं कि राम की आज्ञा में उनका भला है।

दोबारा बोलते हुए भरत सूर्य और भूली हुई दिशा की, और उस वृक्ष की बात कहते हैं जिसकी छाया सब सोच मिटा देती है। वे तिलक की सारी सामग्री की बात कहते हैं, और राम का मन माने तो उसे सफल करने की विनती करते हैं। वे विनती करते हैं कि उन्हें छोटे भाई सहित वन भेज दिया जाय। नहीं तो दोनों भाई लौटा दिये जायँ और वे राम के साथ चलें, या तीनों भाई वन जायँ और राम सीता सहित लौटें। देवता फूल बरसाते हैं, राम चुप रहते हैं, और जनक के दूत वसिष्ठ से कहते हैं कि कुशल राजा के साथ चली गयी।

सभा में भरत, भयभीत देवता

  • भरत राम के छोटे भाई, जो सभा में खड़े होकर कहते हैं कि मुनिनाथ ने उनका कहना निबाह दिया। वे अपने अभाग्य को अथाह समुद्र और अपने को सब अनर्थों का मूल कहते हैं। दोबारा बोलकर वे तीन प्रस्ताव रखते हैं, और कहते हैं कि प्रभु प्रसन्न मन से जिसे जो आज्ञा देंगे, सब उसे सिर पर रखकर करेंगे।
  • राम जो कहते हैं कि भरत व्यर्थ ग्लानि करते हैं, और माता को वही जड़ दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया। वे अपने मन के असमंजस में पिता के वचन, भरत के संकोच और गुरु की आज्ञा की बात कहते हैं। वे कहते हैं कि भरत जो कहेंगे, वे आज वही करेंगे, और भरत के दोबारा बोलने के बाद संकोच से चुप रह जाते हैं।
  • वसिष्ठ सभा के गुरु, जो भरत को समझाते हैं और अन्त में मिथिला से आये दूतों को बुलाते हैं।
  • इन्द्र और देवगण भयभीत देवता, जो सोचते हैं कि उनका काम बिगड़ना चाहता है, और मन ही मन राम की शरण जाते हैं। वे एक दूसरे से कहते हैं कि अब देवताओं का काम भरत के हाथ है, और भरत का प्रेम से स्मरण करें।
  • देवगुरु देवताओं के गुरु, जो भरत के चरणों के अनुराग को मंगल का मूल और भरत को राम की छाया बताते हैं।
  • जनक के दूत जो उस अवसर पर आते हैं और राम का वेष देखकर बहुत दुखी होते हैं। वसिष्ठ के पूछने पर वे कहते हैं कि कुशल राजा के साथ चली गयी।

खेल में हारने पर भी जो जिता देते थे

वसिष्ठ के वचन सुनकर और राम का रुख पाकर भरत समझ गये कि गुरु और स्वामी दोनों पूरी तरह उनके अनुकूल हैं। सारा बोझ अपने सिर देखकर वे कुछ कह नहीं पाते, भीतर विचार करते रहते हैं। फिर पुलकित शरीर से सभा में खड़े होते हैं, आँखों में प्रेम के आँसुओं की बाढ़ है। वे कहते हैं कि उनका कहना मुनिनाथ ने निबाह दिया। इससे अधिक वे क्या कहें?

फिर भरत राम का स्वभाव बताते हैं। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते, और भरत पर उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। खेल में भी भरत ने राम की अप्रसन्नता कभी नहीं देखी।

बचपन से भरत ने राम का साथ नहीं छोड़ा, और राम ने कभी उनका मन नहीं तोड़ा। भरत ने हृदय में प्रभु की कृपा की रीति देखी है। खेल में हारने पर भी राम उन्हें जिता देते थे।

भरत कहते हैं कि वे भी प्रेम और संकोच के वश राम के सामने कभी कुछ नहीं बोले।

प्रेम की प्यासी उनकी आँखें आज तक राम के दर्शन से तृप्त नहीं हुईं।

माता का बहाना, और अपना अभाग्य

भरत कहते हैं कि विधाता उनका दुलार सह न सका, और उसने नीच माता के बहाने बीच डाल दिया। फिर वे कहते हैं कि आज यह कहना भी उन्हें शोभा नहीं देता। अपनी समझ से कौन साधु और पवित्र हुआ है?

वे कहते हैं कि माता को नीच और अपने को साधु और सदाचारी मन में लाना करोड़ों कुचालें हैं। क्या कोदों की बाली में उत्तम धान फलता है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न करती है?

अब भरत कहते हैं कि स्वप्न में भी किसी में दोष का लेश नहीं है। उनका अभाग्य अथाह समुद्र है।

अपने पापों का परिणाम समझे बिना उन्होंने कटु वचन कहकर माता को व्यर्थ जलाया। वे अपने हृदय में सब ओर खोजकर हार गये हैं। एक ही प्रकार से उनका भला निश्चित है।

गुरु उनके स्वामी हैं, सीता और राम भी उनके स्वामी हैं, और परिणाम उन्हें अच्छा लगता है। वे कहते हैं कि साधुओं की सभा में, गुरु और प्रभु के निकट, पवित्र स्थान में वे सच्चे भाव से कहते हैं। यह प्रेम है या प्रपंच, झूठ है या सच, इसे मुनि और राम जानते हैं।

सुनी हुई पीड़ा, आँखों के सामने

भरत कहते हैं कि प्रेम का प्रण निभाकर महाराज का मरना और माता की कुबुद्धि, इनका सारा जगत् साक्षी है। व्याकुल माताएँ देखी नहीं जातीं, और नगर के नर-नारी असह्य ताप में जल रहे हैं। वे कहते हैं कि इन सब अनर्थों का मूल वे ही हैं, और यह सुनकर और समझकर उन्होंने सब पीड़ा सही है।

पहले समाचार मिला था कि राम, लक्ष्मण और सीता मुनियों का वेष धारण करके, बिना जूते पहने पैदल वन चले गये। भरत शिव को साक्षी करके कहते हैं कि इस घाव के बाद भी वे जीवित रह गये।

उसके बाद गुह का प्रेम देखकर उनका वज्र-सा कठोर हृदय नहीं फटा।

अब यहाँ आकर सब कुछ आँखों से देख लिया है। भरत अपने जीव को जड़ कहते हैं, जो जीता रहकर सब सहेगा। रास्ते की साँपिन और बिच्छू जिन्हें देखकर अपना भयानक विष और तीखा क्रोध छोड़ देते हैं, वही राम, लक्ष्मण और सीता उनकी माता को शत्रु लगे।

वे पूछते हैं कि उस माता के पुत्र को छोड़कर दैव यह असह्य दुःख और किससे सहवायेगा? दुःख, प्रेम, विनय और नीति में सनी भरत की यह व्याकुल वाणी सुनकर सारी सभा शोक में डूब जाती है, मानो कमल के वन पर पाला पड़ गया हो।

ज्ञानी मुनि वसिष्ठ अनेक प्रकार की पुरानी कथाएँ कहकर भरत को समझाते हैं, और राम उचित वचन बोलते हैं।

ग्लानि पर राम का उत्तर

राम भरत को तात कहकर पुकारते हैं और कहते हैं कि वे हृदय में व्यर्थ ग्लानि कर रहे हैं। जीव की गति ईश्वर के अधीन है। राम के मत में तीनों कालों और तीनों लोकों के पुण्यात्मा भी भरत से नीचे हैं।

राम आगे कहते हैं कि हृदय में भरत पर कुटिलता लाने से लोक और परलोक दोनों नष्ट होते हैं। माता को वही जड़ दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया।

राम कहते हैं कि भरत का नाम स्मरण करते ही पाप, प्रपंच और सारे अमंगल मिट जायेंगे, इस लोक में सुयश और परलोक में सुख मिलेगा। फिर शिव को साक्षी करके, स्वभाव से सत्य कहते हैं कि यह पृथ्वी भरत की रखी रह रही है।

राम कहते हैं कि भरत व्यर्थ कुतर्क न करें। वैर और प्रेम छिपाये नहीं छिपते। पक्षी और पशु मुनियों के पास चले जाते हैं, और हिंसा करनेवाले बधिक को देखकर भाग जाते हैं। मित्र और शत्रु को पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। मनुष्य का शरीर गुण और ज्ञान का भण्डार है।

राम कहते हैं कि वे भरत को अच्छी तरह जानते हैं। क्या करें, उनके जी में असमंजस है। राजा ने राम को त्यागकर सत्य रखा, और प्रेम के प्रण के लिये शरीर छोड़ दिया। उनके वचन को मिटाने में राम के मन में सोच होता है।

उससे अधिक भरत का संकोच है, और उस पर गुरु ने राम को आज्ञा दी है। राम कहते हैं कि भरत जो कहेंगे, वे अवश्य वही करना चाहते हैं। भरत मन प्रसन्न करके और संकोच छोड़कर कहें, वे आज वही करेंगे। सत्यप्रतिज्ञ राम का यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो जाता है।

देवताओं की चिन्ता और भरत का स्मरण

देवगणों सहित इन्द्र भयभीत होकर सोचते हैं कि उनका काम बिगड़ना चाहता है। कोई उपाय करते नहीं बनता, और सब मन ही मन राम की शरण जाते हैं।

उसके बाद देवता विचार करके आपस में कहते हैं कि राम भक्त की भक्ति के वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासा को याद करके इन्द्र सहित सब देवता बिलकुल निराश हो जाते हैं। देवताओं ने बहुत समय तक विषाद सहा था, और प्रह्लाद ने नृसिंह भगवान को प्रकट किया था।

देवता एक दूसरे के कान से लगकर, सिर धुनते हुए कहते हैं कि अब देवताओं का काम भरत के हाथ है। और कोई उपाय नहीं दिखता। राम अच्छे सेवक की सेवा को मानते हैं। पोद्दार की टीका खोलती है कि उनके भक्त की कोई सेवा करे तो वे उस पर बहुत प्रसन्न होते हैं। अपने गुण और शील से राम को वश में करनेवाले भरत का सब हृदय में प्रेम से स्मरण करें।

देवताओं का मत सुनकर देवगुरु उसे अच्छा कहते हैं। उनके कहने में भरत के चरणों का अनुराग जगत् के सब मंगलों का मूल है, और राम के सेवक की सेवा सौ कामधेनुओं के समान सुन्दर है। देवताओं के मन में भरत की भक्ति आयी है, अब वे सोच छोड़ दें। विधाता ने बात बना दी है।

देवगुरु इन्द्र से भरत का प्रभाव देखने को कहते हैं: राम सहज स्वभाव से ही उनके वश में हैं। भरत को राम की परछाईं जानकर देवता मन स्थिर करें, डर की कोई बात नहीं। टीका छाया का अर्थ खोलती है: भरत परछाईं की तरह राम के पीछे चलनेवाले हैं।

मन की बात जाननेवाले राम देवगुरु और देवताओं की सम्मति और उनका सोच सुनते हैं, और उन्हें संकोच होता है। भरत मन में सारा बोझ अपने सिर जानते हैं, और हृदय में करोड़ों प्रकार के अनुमान करते हैं।

वृक्ष की छाया जो सब सोच हरती है

विचार करके भरत मन में निश्चय करते हैं कि राम की आज्ञा में उनका भला है। वे सोचते हैं कि राम ने अपना प्रण छोड़कर उनका प्रण रखा, और यह थोड़ी कृपा और स्नेह नहीं।

राम ने सब प्रकार से उन पर अपार अनुग्रह किया है। भरत प्रणाम करके, दोनों हाथ जोड़कर दोबारा बोलते हैं: अब वे स्वामी से और क्या कहें, क्या कहलवायें? गुरु को प्रसन्न और स्वामी को अनुकूल जानकर उनके मलिन मन की कल्पित पीड़ा मिट गयी है।

वे कहते हैं कि वे निराधार डर से डर गये थे, उनके सोच की जड़ न थी। दिशा भूल जाने पर सूर्य का दोष नहीं होता। उनका अभाग्य, माता की कुटिलता, विधाता की विषम गति और काल की कठिनाई, इन सबने मिलकर पैर रोपकर उन्हें कुचल दिया। प्रणतपाल राम ने अपना प्रण निभाया।

भरत कहते हैं कि यह राम की कोई नयी रीति नहीं। यह लोक और वेद में प्रसिद्ध है, छिपी नहीं। सारा जगत् बुरा हो और एक स्वामी भले हों, तो कहिये, किसकी भलाई से भला होता है? फिर वे राम के स्वभाव को कल्पवृक्ष जैसा कहते हैं, जो न किसी के अनुकूल होता है, न प्रतिकूल।

जो उस वृक्ष को पहचानकर उसके पास जाता है, उसकी छाया सारी चिन्ताएँ मिटा देती है। राजा हो या रंक, भला हो या बुरा, माँगते ही मनचाही वस्तु पाता है। गुरु और स्वामी का सब प्रकार से स्नेह देखकर उनका क्षोभ मिट चुका है, मन में कोई सन्देह नहीं रहा।

भरत कहते हैं कि अब राम वही करें जिससे दास के हित के लिये प्रभु के चित्त में क्षोभ न हो।

तीन प्रस्ताव, और प्रभु का प्रसन्न मन

भरत सेवक का हित बताते हैं: जो सेवक स्वामी को संकोच में डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवक का हित तो सब सुख और लोभ छोड़कर स्वामी की सेवा करने में है।

भरत कहते हैं कि स्वामी के लौटने में सबका स्वार्थ है, और उनकी आज्ञा पालने में करोड़ों प्रकार से भला है। यही स्वार्थ और परमार्थ का सार है, सब पुण्यों का फल और शुभ गति का शृंगार। फिर वे विनती करते हैं कि स्वामी उनकी एक विनती सुनकर, उसके बाद जैसा उचित हो, वैसा करें।

तिलक की सारी सामग्री सजाकर लायी गयी है। प्रभु का मन माने तो उसे सफल करें।

भरत कहते हैं कि छोटे भाई सहित उन्हें वन भेज दिया जाय, और सबको सनाथ किया जाय। नहीं तो दोनों भाई लौटा दिये जायँ, और वे राम के साथ चलें। पोद्दार की टीका छोटे भाई को शत्रुघ्न, और दोनों भाइयों को लक्ष्मण और शत्रुघ्न बताती है।

नहीं तो तीनों भाई वन चले जायँ, और राम सीता सहित लौटें।

भरत कहते हैं कि जिस प्रकार प्रभु का मन प्रसन्न हो, वही किया जाय।

जिसे जो आज्ञा मिले

भरत कहते हैं कि प्रभु ने सारा भार उन पर रख दिया है। उनमें न नीति का विचार है, न धर्म का। वे स्वार्थ के लिये सब बातें कह रहे हैं। आर्त के चित्त में चेत नहीं रहता।

भरत कहते हैं कि स्वामी की आज्ञा सुनकर जो सेवक उत्तर दे, उसे देखकर लाज लजा जाती है। वे ऐसे अवगुणों के अथाह समुद्र हैं, और स्वामी स्नेह से उन्हें साधु कहकर सराहते हैं।

अब उन्हें वही मत प्रिय है जिससे स्वामी का मन संकोच न पाये। राम के चरणों की शपथ लेकर, सत्य भाव से वे कहते हैं कि जगत् के मंगल का यही एक उपाय है। राम प्रसन्न मन से, संकोच छोड़कर जिसे जो आज्ञा देंगे, सब उसे सिर पर रखकर पालेंगे। और सारे उपद्रव और उलझनें मिट जायेंगी।

राम का मौन और मिथिला के दूत

भरत के पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित होते हैं, उन्हें साधु कहकर सराहते हैं और फूल बरसाते हैं। अयोध्या के निवासी असमंजस में हैं। पोद्दार की टीका खोलती है कि वे राह देख रहे हैं, अब राम क्या कहेंगे। तपस्वी और वनवासी मन में बहुत प्रसन्न हैं। टीका इसे राम के वन में बने रहने की आशा से जोड़ती है।

संकोची राम चुप रहते हैं, और उनका मौन देखकर सारी सभा सोच में पड़ जाती है। उसी समय जनक के दूत पहुँचते हैं। वसिष्ठ सुनकर उन्हें तुरन्त बुलवाते हैं। दूत प्रणाम करके राम को देखते हैं, और उनका वेष देखकर बहुत दुखी होते हैं।

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ उनसे विदेह के राजा का कुशल समाचार पूछते हैं। दूत सकुचाकर पृथ्वी पर मस्तक नवाते हैं और हाथ जोड़कर कहते हैं कि स्वामी का आदर से पूछना कुशल का कारण हो गया।

दूत कहते हैं कि नहीं तो कुशल कोसलनाथ के साथ चली गयी। मिथिला और अवध विशेष रूप से, सारा जगत् अनाथ हो गया।

प्रसंग का क्रम

भरत ने मुनि के वचन सुने, राम का रुख पाया, और सारा भार अपने सिर देखा। सभा में खड़े होकर उन्होंने राम के स्वभाव की, बचपन के साथ की, और खेल में हारने पर भी जिताये जाने की बात कही। उन्होंने विधाता, माता और अपने अभाग्य की बात कही, और अपने को सारे अनर्थों का मूल कहा।

राम ने कहा कि भरत की ग्लानि व्यर्थ है, और भरत जो कहेंगे, वे आज वही करेंगे। इन्द्र और देवता डरे, और देवगुरु ने कहा कि भरत को राम की परछाईं जानकर देवता मन स्थिर करें।

भरत ने मन में निश्चय किया कि राम की आज्ञा में उनका भला है। दोबारा बोलकर उन्होंने तीन प्रस्ताव रखे। प्रभु के चरणों की शपथ लेकर उन्होंने कहा कि प्रभु प्रसन्न मन से जिसे जो आज्ञा देंगे, सब उसे सिर पर रखकर करेंगे।

देवताओं ने फूल बरसाये, और राम संकोच से चुप रहे। उस अवसर पर जनक के दूत आये, और वसिष्ठ के पूछने पर उन्होंने कहा कि कुशल राजा के साथ चली गयी।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 260 से 270, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।