रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · भरत की विनती और राम का वचन
भरत की विनती और राम का वचन
बचपन के खेलों से उठी हुई याद, पिता के सत्य और प्रेम की कठिन गाँठ, और वह विनती जो अपना सारा अधिकार फिर राम के हाथ रख देती है।
भरत को गुरु और स्वामी, दोनों अपने अनुकूल मिल गये हैं। फिर भी कुछ कहना सहज नहीं हो रहा। जिसे कहने की इतनी स्वतंत्रता मिली हो, उसके ऊपर अब कहे हुए की पूरी जिम्मेदारी भी है। भरत अपने सिर पर सारा भार अनुभव करते हैं। सभा में खड़े होते हैं तो शरीर पुलकित है, कमल जैसे नेत्रों में प्रेम का जल बढ़ रहा है। उनकी पहली बात किसी व्यवस्था की माँग नहीं उठाती। वह बड़े भाई के उस स्वभाव को याद करती है जिसे उन्होंने बचपन से जाना है।
तुलसीदास के इस प्रसंग में भरत दो बार अपनी बात रखते हैं। पहली विनती में स्मृति और ग्लानि एक दूसरे से जुड़ी आती हैं। राम उसका उत्तर देते हैं तो पिता का सत्य, पिता का प्रेम, गुरु की आज्ञा और भाई का संकोच, सब एक साथ सामने आ जाते हैं। फिर देवताओं की चिन्ता कथा में प्रवेश करती है। भरत दोबारा बोलते हैं, इस बार अपनी इच्छाओं के साथ यह भी स्पष्ट करते हुए कि प्रभु को किसी दबाव में डालना उन्हें स्वीकार नहीं।
हम इस बातचीत में एक ही प्रश्न के कई रूप सुनेंगे: जिसे हम चाहते हैं, उसके मन की प्रसन्नता हमारी चाह में कहाँ आती है? भरत लौटने की विनती भी पूरी कहेंगे और वन में रहने के अलग-अलग प्रस्ताव भी रखेंगे। निर्णय की घड़ी तब भी खुली रहेगी। इसी खुली हुई सभा में मिथिला से दूत आयेंगे, और उनका समाचार दोनों राजपरिवारों के साझा शोक को फिर सामने ले आयेगा।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- भरत राम के छोटे भाई, जिनकी पहली विनती आत्मग्लानि से भरी है और दूसरी राम की प्रसन्नता को निर्णय का आधार बनाती है।
- राम भरत को निर्दोष बताते हुए पिता के वचन, भाई के संकोच और गुरु की आज्ञा पर विचार करनेवाले रघुनाथ।
- वसिष्ठ सभा के गुरु, जो भरत को समझाते हैं और अन्त में मिथिला से आये दूतों को बुलाते हैं।
- इन्द्र और देवगण राम के वचन से अपने कार्य की चिन्ता में पड़कर भरत के स्मरण का उपाय सोचनेवाले देवता।
- देवगुरु भरत के चरणों में अनुराग को मंगल का मूल और उन्हें राम की छाया बतानेवाले गुरु।
- जनक के दूत मिथिला से समाचार लानेवाले, जो राम का मुनिवेष देखकर दुखी होते हैं।
खेल में भी जो हारने नहीं देते थे
मुनि के वचन सुनकर और राम का रुख पाकर भरत समझ गये कि उनकी बात के लिये पूरा अवकाश है। वे भीतर विचार करते हैं, पर शब्द नहीं निकलते। तुलसी इसके बाद उनकी देह का परिवर्तन दिखाते हैं: पुलक, सभा में खड़े होना, नेत्रों में उमड़ता प्रेम। इतना सहारा मिलने पर भी उनका आरम्भ विनय से होता है। मुनिनाथ ने जो कहना था, वह सब कह दिया है; अब उससे अधिक वे क्या कह सकते हैं? गुरु की वाणी में उन्हें अपनी अनकही बात मिल गयी है।
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े॥
चौपाई १
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा॥
फिर भरत राम के स्वभाव का परिचय देते हैं। अपराध करनेवाले पर भी उन्हें कभी क्रोध करते नहीं देखा। अपने लिये तो भरत को विशेष कृपा और स्नेह मिला है। इस बात को वे राजसभा के किसी बड़े सम्मान से नहीं समझाते। बचपन के खेल सामने रखते हैं। खेल में भी राम की अप्रसन्नता देखने को नहीं मिली। छोटे भाई का यह अनुभव बहुत निजी है। उसके प्रमाण किसी और के पास खोजने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि भरत ने उसे अपने साथ रहते हुए पाया है।
बचपन से उन्होंने राम का साथ नहीं छोड़ा था, और राम ने भी उनका मन कभी नहीं तोड़ा। मन के प्रतिकूल कुछ न करना, छोटे भाई के हृदय को चोट न पहुँचाना, यही वह रीति है जिसे भरत ने भीतर सँभालकर रखा है। फिर उससे भी छोटा और अधिक स्पष्ट उदाहरण आता है। भरत खेल में हार जाते, तब भी राम उन्हें जिता देते थे। आज वे जिसके सामने अपने लिये कुछ कहने में झिझक रहे हैं, वह बचपन में उनकी हार भी पलट देता था।
सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू । कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥
चौपाई २
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही । हारेहुँ खेल जितावहिं मोही॥
यह स्मरण सभा में क्यों आया है, इसे भरत की अगली बात खोलती है। इतने स्नेह के बीच भी उन्होंने प्रेम और संकोच के कारण राम के सामने मुँह नहीं खोला। निकटता ने संकोच मिटाया नहीं था। साथ रहना एक अनुभव था, सामने अपनी इच्छा कह देना दूसरा। आज भी दोनों एक साथ हैं: स्वामी की कृपा का पूरा भरोसा और उन्हीं के सम्मुख शब्द रखने में हिचक। भरत की विनती उस परिचय पर टिकी है जो सबसे पुराना है, और उसी परिचय से उनकी झिझक भी समझ में आती है।
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
दोहा २६०
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन॥ २६०॥
दोहा आँखों पर आकर ठहरता है। प्रेम की प्यास ऐसी है कि आज तक दर्शन से तृप्ति नहीं हुई। बचपन का निरन्तर साथ भी उस प्यास का अन्त नहीं कर सका। भरत जब कहते हैं कि उन्होंने राम की कृपा हृदय में देखी है, तो उस देखने में वर्षों का अनुभव है; जब कहते हैं कि आँखें अभी तृप्त नहीं, तो उसी अनुभव की अनन्त चाह है। बात अब अतीत से वर्तमान में लौट रही है। जिस स्नेह का इतना परिचय है, उसके बीच यह दुःख आ कैसे गया?
भरत सभा में खड़े होकर राम का बचपन से जाना हुआ स्वभाव याद करते हैं। खेल में हारने पर भी राम उन्हें जिता देते थे, कभी उनका मन नहीं तोड़ते थे। फिर भी प्रेम और संकोच ने भरत को अपनी इच्छा कहने से रोके रखा, और दर्शन की प्यास अब तक बनी हुई है।
माता को दोष देते हुए अपनी ओर लौटना
भरत पहले इस टूटे हुए सुख का कारण विधाता में खोजते हैं। उन्हें लगता है कि विधाता उनका इतना दुलार सह नहीं सका और माता के बहाने स्वामी तथा उनके बीच अन्तर डाल दिया। इस वाक्य में माता के लिये कठोर शब्द आता है। पर भरत उसी को कहकर आगे नहीं बढ़ जाते। तत्काल अपने कथन पर लौटते हैं: आज उन्हें ऐसा कहना भी शोभा नहीं देता। अपनी समझ में अपने को साधु और पवित्र मान लेने से कौन सचमुच वैसा हो जाता है? दूसरों को दोष देना जितना सरल लगा था, अपनी स्थिति देखना उतना ही कठिन हो उठता है।
मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली॥
चौपाई ३
फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली॥
अब वे अपने मन के सामने एक सीधी आपत्ति रखते हैं। माता को नीच और अपने को सदाचारी साधु समझना ही करोड़ों दुराचारों के समान है। भरत का आत्मपरीक्षण यहाँ उस दूरी को स्वीकार नहीं करता जो उन्हें माता से अलग करके निर्दोष ठहरा दे। वे दो उपमाएँ देते हैं। कोदों की बाली में उत्तम धान कहाँ फलता है? काली घोंघी मोती कैसे उत्पन्न करेगी? दोनों प्रश्न उनके अपने दावे पर रखे गये हैं। जिस जन्मसम्बन्ध को दोष देते हैं, उसी से अपने को अलग करके पवित्र कह लेने की सुविधा वे अपने लिये बन्द कर देते हैं।
इन उपमाओं को भरत की आत्मग्लानि के भीतर सुनना चाहिये। सभा में वे स्वयं अपने विरुद्ध तर्क कर रहे हैं। आगे राम इसी ग्लानि को व्यर्थ कहेंगे। इस समय भरत के लिये किसी और को दोष देना असम्भव हो गया है। वे कहते हैं कि स्वप्न में भी किसी पर दोष का लेश नहीं है; उनका अपना अभाग्य ही अथाह समुद्र है। पहले जो उँगली विधाता और माता की ओर उठी थी, वह वाणी अब अपना दोष खोजते हुए लौट आयी है।
माता से कहे गये कटु वचन भी उन्हें याद आते हैं। अपने पापों के परिणाम को समझे बिना उन्होंने माँ को व्यर्थ जलाया, ऐसा वे मानते हैं। यहाँ कठोरता का पछतावा स्पष्ट है। दुःख ने उनसे जो कहलवा दिया, उसी दुःख के भीतर अब वे उसे परख रहे हैं। वे अपने हृदय में हर ओर खोजकर हार गये हैं। भलाई का कोई ऐसा साधन नहीं दिखता जिसे वे अपने बल पर उपस्थित कर सकें। बात जहाँ आकर रुकती है, वहाँ गुरु का सामर्थ्य और सीता-राम का स्वामित्व बचा रहता है।
भरत को इसी में परिणाम अच्छा होने का भरोसा है। गुरु समर्थ हैं, सीता और राम उनके स्वामी हैं। इतनी बात के बाद वे अपने कथन की सच्चाई सभा के सामने रखते हैं। स्थान पवित्र तीर्थ है, सभा साधुओं की है, और निकट गुरु तथा प्रभु हैं। उनके शब्द प्रेम हैं या छल, झूठ हैं या सच, इसका निर्णय वसिष्ठ और रघुनाथ जानते हैं। वे अपनी पवित्रता का प्रमाण स्वयं देने का आग्रह छोड़कर उन्हीं की जानकारी पर टिकते हैं।
साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सतिभाउ।
दोहा २६१
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ॥ २६१॥
माता को दोष देने के तुरन्त बाद भरत अपनी ही बात रोकते हैं। अपने को साधु और माता को बुरा मानना उन्हें असह्य होता है; कटु वचनों का पछतावा भी सामने आता है। अन्त में गुरु और सीता-राम का आश्रय लेकर वे अपनी वाणी की सच्चाई उन्हीं के ज्ञान पर छोड़ देते हैं।
सुनी हुई पीड़ा, आँखों के सामने
भरत अब उन दुःखों को एक-एक करके कहते हैं जिनके बीच वे यहाँ पहुँचे हैं। महाराज ने प्रेम के प्रण को निभाकर प्राण त्यागे। माता की कुबुद्धि भी सारे जगत् को मालूम है। बाकी माताओं की व्याकुलता देखी नहीं जाती, और अवध के स्त्री-पुरुष असह्य ताप में जल रहे हैं। घर और नगर, दोनों का दुःख उनकी वाणी में आता है। इन सबके मूल में वे अपने को रखते हैं। उन्होंने यह सुनकर और समझकर सारे शूल सहे हैं कि अनर्थ का कारण वही हैं। यह भरत का अपने ऊपर रखा हुआ अभियोग है, जिसे सभा सुन रही है।
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला॥
चौपाई ४
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा॥
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ । संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ॥
बहुरि निहारि निषाद सनेहू । कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू॥
इस चौपाई में सुनने के बाद देखने का क्रम बनता है। पहले भरत को समाचार मिला था कि राम, लक्ष्मण और सीता मुनियों का वेष धारण करके वन चले गये। वे बिना जूते पहने पैदल गये। समाचार की हर बात चोट को अलग गहरा करती है: राजपरिवार का मुनिवेष, साथ सीता और लक्ष्मण, और नंगे पाँव यात्रा। भरत शिव को साक्षी मानकर कहते हैं कि इस घाव के बाद भी वे जीवित रहे। इतने दुःख पर प्राण बने रहना उन्हें अपनी कठोरता का प्रमाण लगता है।
फिर निषादराज का प्रेम देखा। वह दूसरा आघात था। भरत कहते हैं कि तब भी वज्र जैसे कठोर हृदय में छेद नहीं हुआ। निषाद का स्नेह उन्हें अपने प्रेम की जाँच में खड़ा कर देता है। वे उस भेंट का कोई नया वृत्तान्त नहीं सुनाते, केवल इतना बताते हैं कि उसे देखकर भी हृदय फटा नहीं। इस प्रकार समाचार, दूसरे का प्रेम और अपना बचा हुआ जीवन, तीनों उनके सामने एक ही पीड़ा के रूप में जुड़ते जाते हैं। जो कुछ सह लिया, उसी पर उन्हें आश्चर्य है।
अब यहाँ आकर सब आँखों से देख लिया है। सुनने और प्रत्यक्ष देखने के बीच की दूरी भी समाप्त हो गयी। भरत अपने जीव को जड़ कहते हैं, मानो उसका जीवित रहना अब आगे भी हर दुःख सहते रहने का साधन हो। राम, लक्ष्मण और सीता के स्वभाव को बताने के लिये वे रास्ते की साँपिन और बिच्छू की बात रखते हैं। जिनको देखकर ऐसे विषधर भी भयानक विष और तीखा क्रोध त्याग देते हैं, उन्हीं तीनों को उनकी माता अनहितकारी समझ बैठीं। इस तुलना से भरत अपनी ग्लानि और तीखी कर लेते हैं।
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
दोहा २६२
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि॥ २६२॥
अन्तिम प्रश्न फिर अपने ही विरुद्ध है। ऐसी माता के पुत्र को छोड़कर दैव असह्य दुःख और किससे सहवायेगा? विनती में दुःख है, प्रेम है, विनय है, नीति है। तुलसी कहते हैं कि भरत की इस व्याकुल वाणी को सुनकर सारी सभा शोक में डूब गयी। उसकी छवि कमलवन पर पड़े पाले की है। जिस वाणी को कहने के लिये भरत ने इतनी कठिनाई से अपने को सँभाला था, उसे सुनकर अब पूरा समाज व्याकुल है।
तब ज्ञानी मुनि वसिष्ठ अनेक पुरानी कथाएँ कहकर भरत को समझाते हैं। उन कथाओं का विस्तार यहाँ नहीं खुलता; उनका काम भरत का समाधान करना है। इसके बाद राम बोलते हैं। कवि उन्हें सूर्यकुल के कुमुदवन को खिलानेवाला चन्द्रमा कहते हैं। अभी सभा के लिये पाले से मुरझाये कमलों का चित्र था, अब राम की वाणी के आगे खिलानेवाले चन्द्रमा का। भरत ने अपने दोष का जो बोझ रखा है, राम उसी को सम्बोधित करके उत्तर आरम्भ करते हैं।
पिता का निधन, माताओं की व्याकुलता, नगर का ताप और नंगे पाँव वन गये राम, सीता तथा लक्ष्मण की स्मृति भरत को अपने विरुद्ध बोलने पर विवश करती है। निषाद का प्रेम और अब का प्रत्यक्ष दर्शन उनकी ग्लानि बढ़ाते हैं। सभा शोक में डूबती है; वसिष्ठ समझाते हैं, फिर राम उत्तर देते हैं।
राम का उत्तर: ग्लानि का भार उतारना
राम भरत को तात कहकर सम्बोधित करते हैं और उनके हृदय की ग्लानि को व्यर्थ बताते हैं। जीव की गति ईश्वर के अधीन है। इसके साथ भरत के विषय में अपना मत बहुत ऊँचा रखते हैं: तीनों कालों और तीनों लोकों के पुण्यात्मा भी उनसे नीचे हैं। जिस भाई ने अभी अपने को सारे अनर्थ का मूल कहा था, राम उसी को पुण्य का ऐसा मान देते हैं। यह उत्तर भरत की पीड़ा को सुनकर आया है, और सीधे उसी निर्णय को चुनौती देता है जो भरत अपने ऊपर कर चुके हैं।
राम आगे कहते हैं कि भरत पर मन में भी कुटिलता का आरोप करने से लोक और परलोक दोनों नष्ट होते हैं। माता को दोष देनेवालों के विषय में भी उनका कथन स्पष्ट है। ऐसे लोग गुरु और साधुओं की सभा से वंचित मूर्ख हैं। भरत अपनी माता को दोष देने से पीछे हट चुके थे; राम अब उस दोषारोपण को अपनी ओर से भी रोकते हैं। इस बातचीत में भरत की निर्दोषता और माता पर दोष न रखने की बात साथ आती हैं। एक को ऊँचा करने के लिये दूसरे को नीचा रखना राम के उत्तर का आधार नहीं बनता।
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।
दोहा २६३
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार॥ २६३॥
राम के अनुसार भरत का नाम स्मरण करने से पाप, प्रपंच और सारे अमंगल मिटेंगे, इस लोक में सुयश और परलोक में सुख मिलेगा। यह उनकी कही हुई भरत की महिमा है। फिर शिव को साक्षी करके वे स्वभाव से सत्य कहते हैं कि पृथ्वी भरत के कारण टिकी हुई है। अभी भरत अपने जीवित रहने को कठोरता मान रहे थे; राम उसी जीवन को पृथ्वी का सहारा कह रहे हैं। अपने को अनर्थ का मूल समझनेवाले भाई के सामने उनके अस्तित्व का मूल्य पूरी तरह बदलकर रखा जाता है।
राम भरत से व्यर्थ कुतर्क छोड़ने को कहते हैं। प्रेम और वैर छिपाये नहीं छिपते। इस बात का प्रमाण वे वन के जीवों से देते हैं। पक्षी और पशु मुनियों के निकट चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिक को देखकर भागते हैं। हित और अहित का इतना ज्ञान उनमें भी है; मनुष्य शरीर तो गुण और ज्ञान का भण्डार है। उदाहरण में पहचान का आधार आचरण है। राम अपने भाई के मन को जानने में किसी भ्रम की बात स्वीकार नहीं करते।
मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥
चौपाई ५
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥
वे भरत को अच्छी तरह जानते हैं। फिर भी हृदय में असमंजस है, और उस असमंजस का कारण अब स्पष्ट करते हैं। राजा ने राम को त्यागकर सत्य रखा और प्रेम का प्रण निभाने के लिये शरीर छोड़ दिया। पिता के सत्य और पिता के प्रेम को राम अलग-अलग घटनाओं में पहचानते हैं। त्याग सत्य की रक्षा से जुड़ा है; प्राण त्यागना प्रेम की रक्षा से। इसलिए पिता का वचन मिटाने में उन्हें सोच होता है। दशरथ के जाने के बाद भी उनके वचन की जिम्मेदारी बनी हुई है।
उसी के साथ भरत का संकोच सामने है, और राम उसे पिता के वचन को मिटाने की चिन्ता से भी अधिक कहते हैं। ऊपर से गुरु ने आज्ञा दे दी है। वे इन तीनों को छिपाते नहीं: पिता का वचन, छोटे भाई की दशा और गुरु का निर्देश। इसीलिये वे भरत से कहते हैं कि अब जो कुछ वे कहेंगे, राम अवश्य वही करना चाहते हैं। मन प्रसन्न करके, संकोच छोड़कर कहें; वे आज वही करेंगे। वचन सुनते ही समाज सुखी हो जाता है। सत्यप्रतिज्ञ राम ने भरत की इच्छा के लिये इतना बड़ा अवकाश दिया है।
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।
दोहा २६४
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु॥ २६४॥
समाज की प्रसन्नता इसी वचन पर है। भरत की चाह अभी फिर सुनी जानी है। राम ने अपनी दुविधा भी कह दी है और कहने का पूरा अधिकार भी दिया है। इसलिए आगे की विनती का भार अब और बढ़ जाता है। भरत जो माँगेंगे, वह ऐसे स्वामी से माँगेंगे जिन्होंने अपने मन के दोनों पक्ष उनके सामने रख दिये हैं।
राम भरत की ग्लानि को व्यर्थ बताते हैं और उनकी महिमा कहते हैं। फिर पिता के सत्य और प्रेम, भरत के संकोच और गुरु की आज्ञा को एक साथ रखते हैं। वे भरत को प्रसन्न मन से अपनी इच्छा कहने का वचन देते हैं, जिससे सभा सुखी हो जाती है।
देवताओं की चिन्ता और भरत का स्मरण
राम के वचन से समाज सुखी हुआ, पर देवताओं के लिये वही वचन चिन्ता का कारण बनता है। इन्द्र देवगणों सहित भयभीत होकर सोचते हैं कि बना हुआ काम बिगड़ने को है। उन्हें कोई उपाय करते नहीं बनता। तब सभी मन में राम की शरण जाते हैं। इस विचार में कथा सभा से देवताओं की ओर मुड़ती है। नीचे जिसे सुनकर आशा बढ़ी है, उसी से ऊपर भय उठता है। दोनों पक्षों की चाह अलग है, और राम के एक वचन ने दोनों को प्रभावित किया है।
फिर देवता आपस में विचार करते हैं कि रघुनाथ भक्त की भक्ति के वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासा की घटना याद आती है और इन्द्र सहित सब निराश हो जाते हैं। इस स्मरण का विस्तार यहाँ नहीं सुनाया जाता। नाम उस बात के प्रमाण बनकर आते हैं जिस पर वे अभी विचार कर रहे हैं, भक्त के प्रति भगवान् की निष्ठा। इसके बाद उन्हें प्रह्लाद का स्मरण होता है: देवताओं ने बहुत समय दुःख सहा था, तब प्रह्लाद ने ही नृसिंह को प्रकट किया था।
देवता एक दूसरे के कान से लगकर, सिर धुनते हुए कहते हैं कि अब उनका काम भरत के हाथ है। इससे आगे उपाय का स्वरूप बदलता है। राम अपने अच्छे सेवक की सेवा को मानते हैं। पोद्दार जी की टीका इस बात को खोलती है कि भगवान् के भक्त की सेवा करनेवाले पर वे प्रसन्न होते हैं। देवता इसी कारण भरत को प्रेम से हृदय में स्मरण करने का विचार करते हैं। भरत अपने गुण और शील से राम को वश में करते हैं, इसलिए उन्हीं की ओर मन लगाना उन्हें एकमात्र उपाय दिखता है।
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
दोहा २६५
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु॥ २६५॥
उनका मत सुनकर देवगुरु उसे अच्छा कहते हैं। टीका इन देवगुरु को बृहस्पति नाम से पहचानती है। भरत के चरणों में अनुराग जगत् के सभी मंगलों का मूल है, ऐसा उनका कथन है। वे सीतानाथ के सेवक की सेवा को सैकड़ों कामधेनुओं के समान सुन्दर बताते हैं। देवताओं के मन में भरत की भक्ति आयी है, इसलिए अब सोच छोड़ देना चाहिये। उनके अनुसार विधाता ने बात बना दी है। निराशा से निकला उपाय अब गुरु की सम्मति पाता है।
देवगुरु इन्द्र को भरत का प्रभाव देखने को कहते हैं। रघुनाथ अपने सहज स्वभाव से ही उनके वश हैं। इसके साथ वे भरत को राम की परछाईं जानकर देवताओं को मन स्थिर करने और भय छोड़ने की बात कहते हैं। छाया का अर्थ टीका विशेष रूप से खोलती है: भरत राम का अनुसरण करनेवाले हैं। इसलिए राम पर भरत के प्रेम का प्रभाव और राम के पीछे भरत का चलना, दोनों बातें एक साथ समझनी हैं। प्रेम में मिला यह प्रभाव अपनी अलग इच्छा को प्रभु पर थोपने की आशंका नहीं बनता।
अन्तर्यामी राम देवगुरु और देवताओं की सम्मति तथा उनका सोच सुनते हैं। उन्हें संकोच होता है। सभा के प्रश्न के साथ यह चिन्ता भी जुड़ गयी है। उधर भरत अपने मन में सारा भार फिर अपने ही सिर समझते हैं और अनेक प्रकार के विचार करते हैं। देवताओं की चर्चा के बाद कथा फिर उन्हीं के हृदय में लौटती है, जहाँ अब अगली विनती का निर्णय बनना है।
चिन्तित देवता राम की भक्तनिष्ठा के उदाहरण याद करते हैं और भरत का प्रेम से स्मरण करने का उपाय सोचते हैं। देवगुरु उसे स्वीकार करते हुए भरत को राम की छाया बताते हैं। राम उनकी चिन्ता सुनकर संकोच अनुभव करते हैं; भरत भी अपने ऊपर आये भार पर विचार करते हैं।
वही छाया जो सबका सोच हरती है
भरत सब ओर विचार करके अन्त में एक निर्णय पर पहुँचते हैं: राम की आज्ञा में ही उनका भला है। वे राम के अनुग्रह को इस रूप में समझते हैं कि प्रभु ने अपना प्रण छोड़कर उनका प्रण रखा, और इतना कृपालु व्यवहार कोई छोटी बात नहीं। यह भरत के भीतर राम के स्नेह की पहचान है। वे अभी तक निर्णय को अपने सिर का भार समझ रहे थे; अब उस भार को सँभालने का आधार भी मिल जाता है। अपना कल्याण राम की आज्ञा से अलग खोजने की आवश्यकता नहीं बचती।
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका॥
चौपाई ६
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा॥
जानकीनाथ ने उन पर सब प्रकार से अपार अनुग्रह किया है। भरत प्रणाम करके दोनों करकमल जोड़ते हैं और दोबारा बोलते हैं। पहले गुरु के वचन में उन्होंने अपनी बात पूरी पायी थी। अब कहते हैं कि कृपा के समुद्र, अन्तर्यामी स्वामी से और क्या कहें, क्या कहलवायें? गुरु को प्रसन्न और स्वामी को अनुकूल जानकर मन की कल्पित पीड़ा मिट गयी है। पहली विनती में जो ग्लानि उन्हें अपने विरुद्ध खड़ा कर रही थी, दूसरी के आरम्भ में उस भय की जड़ पर ही प्रश्न है।
वे स्वीकार करते हैं कि निराधार डर से डर गये थे। दिशा भूल जाने पर सूर्य का दोष नहीं होता। यह उपमा भरत के बदले हुए निर्णय को बहुत स्पष्ट करती है। राम का स्नेह अपनी जगह था; भरत की आशंका उसी को पहचानने में बाधा बनी थी। अब वे अपने अभाग्य, माता की कुटिलता, विधाता की विषम गति और काल की कठिनाई, इन चारों को याद करते हैं। उनके अनुसार सबने मिलकर उन्हें नष्ट करने की ठानी थी, पर शरणागतों के रक्षक राम ने अपना प्रण निभाया और उन्हें बचा लिया।
इस रक्षण को भरत कोई नयी रीति नहीं कहते। वह लोक और वेद में प्रसिद्ध है, छिपी हुई बात नहीं। वे ऐसी दशा रखते हैं जिसमें सारा जगत् किसी का बुरा करनेवाला हो, और केवल स्वामी अनुकूल हों। तब भले परिणाम का आश्रय उसी एक अनुकूलता में है। इतना कहकर राम के स्वभाव के लिये कल्पवृक्ष का रूपक देते हैं। उस वृक्ष की ओर से किसी के प्रति पक्ष या विपक्ष नहीं होता। जो उसे पहचानकर निकट आता है, उसे छाया मिलती है।
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
दोहा २६७
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच॥ २६७॥
कल्पवृक्ष की छाया सब चिन्ताओं को मिटानेवाली है। राजा हो या रंक, भला हो या बुरा, जो माँगता है उसे मनचाही वस्तु मिलती है। भरत की बात में यह भेद मिटाना आवश्यक है, क्योंकि अभी वे अपनी योग्यता को लेकर इतने सन्देह में थे। वृक्ष का स्वभाव माँगनेवाले की ऊँच-नीच से नहीं बदलता। पहचानकर उसके निकट जाना ही उस छाया तक पहुँचने का उपाय है। गुरु और स्वामी का हर प्रकार से स्नेह देखकर भरत का क्षोभ मिट चुका है, मन का सन्देह भी चला गया है।
इसके बाद उनकी प्रार्थना को नई दिशा मिलती है। वे दयालु स्वामी से कहते हैं कि अब वही हो जिससे दास के हित के कारण प्रभु के चित्त में क्षोभ न आये। कल्पवृक्ष से मनचाहा मिल सकता है, यह कहते ही भरत अपनी मनचाही वस्तु की सीमा भी बाँध देते हैं। माँग ऐसी हो जो राम के मन की प्रसन्नता में समा सके। कृपा का भरोसा बढ़ने पर उनकी सावधानी भी बढ़ी है। अब आगे के प्रत्येक प्रस्ताव के साथ यही शर्त रहेगी।
भरत राम की आज्ञा में अपना कल्याण निश्चित करते हैं। दूसरी विनती में वे अपने निराधार भय को दिशा भूलने जैसा बताते हैं और राम के स्वभाव को सबकी चिन्ता हरनेवाले कल्पवृक्ष के समान कहते हैं। उनका अगला आग्रह है कि सेवक के कारण स्वामी के मन में कोई क्षोभ न आये।
तीन प्रस्ताव, एक ही शर्त
भरत सेवक के हित की अपनी समझ बताते हैं। स्वामी को संकोच में डालकर जो अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि उन्हें निकृष्ट लगती है। सेवक का हित सुख और लोभ छोड़कर सेवा करने में है। यह बात वे अपनी अगली माँग के ठीक पहले रखते हैं। राम ने उन्हें जो कहने का अधिकार दिया है, उसका उपयोग कैसे हो, इसका उत्तर भरत स्वयं दे रहे हैं। वे चाहकर भी उस अधिकार को प्रभु के मन पर बोझ बनाने की छूट अपने को नहीं देते।
जो सेवकु साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची॥
चौपाई ७
सेवक हित साहिब सेवकाई । करै सकल सुख लोभ बिहाई॥
राम के लौटने में सबका स्वार्थ है, भरत यह भी खुले मन से कहते हैं। उस इच्छा को छिपाते नहीं। साथ ही राम की आज्ञा मानने में करोड़ों प्रकार का कल्याण बताते हैं। उनकी दृष्टि में यही स्वार्थ और परमार्थ का सार, सभी पुण्यों का फल और शुभ गति का शृंगार है। अपने लिये वांछित परिणाम और आज्ञा पालन का कल्याण, दोनों का वजन वे सामने रख देते हैं। फिर प्रार्थना है कि स्वामी उनकी एक विनती सुन लें और उसके बाद जैसा उचित हो, वैसा करें।
राजतिलक की सारी सामग्री सजाकर लायी गयी है। यदि राम का मन माने तो वे उसका उपयोग करके उसे सफल करें। भरत के वाक्य में सामग्री आ जाने से निर्णय तय नहीं हो जाता। उसे सफल करने के पहले प्रभु के मन की स्वीकृति रखी गयी है। इतनी तैयारी और सबकी आकांक्षा के बीच भी वही शर्त अडिग है। विनती की ठोस वस्तुएँ उपस्थित हैं, पर उनके कारण राम पर दबाव डालना भरत को स्वीकार नहीं।
सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।
दोहा २६८
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ॥ २६८॥
फिर पहला प्रस्ताव आता है: छोटे भाई सहित भरत को वन भेज दिया जाय और राम लौटकर सबको सनाथ करें। पोद्दार जी की टीका इस छोटे भाई को शत्रुघ्न बताती है। वन का दायित्व भरत और शत्रुघ्न लेने को तैयार हैं, ताकि राम के लौटने की आशा पूरी हो सके। यदि राम अयोध्या लौटने को तैयार न हों, तो दूसरा प्रस्ताव है: लक्ष्मण और शत्रुघ्न लौट जायँ, भरत राम के साथ चलें। इसमें भरत अपने लिये राम का साथ माँगते हैं और दोनों भाइयों के लौटने की बात रखते हैं।
तीसरा प्रस्ताव अगले चरण में पूरा होता है। तीनों भाई वन चले जायँ और राम सीता सहित लौटें। वन जानेवाले इस प्रस्ताव में भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न हैं। तीनों व्यवस्थाएँ अलग हैं, और भरत उन्हें विकल्प के रूप में कह रहे हैं। पहले वे शत्रुघ्न के साथ वन का भार लेना चाहते हैं, दूसरे में स्वयं राम के साथ रहने को कहते हैं, तीसरे में तीनों भाइयों को वन में भेजकर राम और सीता की वापसी चाहते हैं। किसी व्यवस्था को अभी स्वीकार नहीं किया गया है।
इन सभी के बाद वे फिर उसी आधार पर आते हैं जिससे विनती शुरू हुई थी: दयासागर वही करें जिससे उनका मन प्रसन्न हो। प्रस्तावों की संख्या बढ़ी है, शर्त नहीं बदली। भरत अपनी चाह को अस्पष्ट भी नहीं रखते और उसे अन्तिम आज्ञा भी नहीं बनाते। वे राम को प्रत्येक सम्भव विनती सुनाकर उनके प्रसन्न मन के लिये स्थान खुला रखते हैं। जो कहा गया है, वह सुनने और निर्णय करने के लिये प्रभु के सामने रखा गया है।
भरत सबके राम को लौटाने के स्वार्थ को स्वीकार करते हैं और आज्ञा पालन को कल्याण बताते हैं। राजतिलक की सामग्री का उपयोग राम की इच्छा पर है। वे वनवास और वापसी की तीन अलग व्यवस्थाएँ प्रस्तावित करते हैं, और हर एक के ऊपर राम के प्रसन्न मन की शर्त रखते हैं।
जिसे जो आज्ञा मिले
इतनी बातें कहने के बाद भरत अपने कहने की सीमा भी स्वीकार करते हैं। राम ने सारा भार उन्हें दे दिया है, पर वे अपने भीतर नीति और धर्म का विवेक नहीं मानते। उनके अनुसार वे अपने स्वार्थ के लिये बातें कह रहे हैं, क्योंकि दुःखी मनुष्य के चित्त में विवेक बना नहीं रहता। विनती में अपनी दुर्बलता का यह स्वीकार जुड़ता है। वे जानते हैं कि उनका दुःख उनके प्रस्तावों में बोल रहा है। इसलिए उन प्रस्तावों को धर्म का अन्तिम निर्णय कहकर स्थापित नहीं करते।
स्वामी की आज्ञा सुनकर उत्तर देनेवाले सेवक को देखकर लज्जा भी लजा जाती है, ऐसा भरत कहते हैं। वे अपने को अवगुणों का अथाह समुद्र मानते हैं और राम की प्रशंसा को उनका स्नेह बताते हैं। स्वामी उन्हें साधु कहकर सराहते हैं, जबकि वे उन्हीं को उत्तर दे रहे हैं। यह दूसरी विनती के भीतर बचा हुआ संकोच है। राम से मिला आदर भरत को अपनी वाणी के प्रति असावधान नहीं करता। इतना कहने के बाद भी उनकी चिन्ता प्रभु के मन पर पड़नेवाले संकोच की ही है।
अब उन्हें वही मत प्रिय है जिससे स्वामी का मन संकोच न पाये। वे प्रभु के चरणों की शपथ लेकर सत्य भाव से कहते हैं कि जगत् के मंगल का यही एक उपाय है। अन्त में कथन सबकी ओर फैलता है: राम प्रसन्न मन से संकोच छोड़कर जिसे जो आज्ञा देंगे, सभी उसे सिर पर रखकर पालन करेंगे। इससे उपद्रव और उलझनें मिटेंगी। भरत अपनी ओर से अनेक व्यवस्थाएँ रखकर अब प्रत्येक व्यक्ति का काम राम की आज्ञा पर छोड़ देते हैं।
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।
दोहा २६९
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब॥ २६९॥
पहली विनती में वे अपने सत्य भाव को गुरु और प्रभु की जानकारी पर छोड़ चुके थे। दूसरी के अन्त में अपने भाव के साथ व्यवहार भी उन्हीं को सौंप देते हैं। किसे कहाँ जाना है, किसे क्या करना है, इसका निर्णय अब उनके प्रस्तावों में बँधा नहीं है। उनकी आखिरी कही हुई बात सबके आज्ञापालन का भरोसा है। राम को जो प्रसन्न मन से कहना हो, उसके लिये भरत अपनी ओर से अवकाश पूरा कर देते हैं।
भरत अपने प्रस्तावों में दुःख और स्वार्थ का प्रभाव स्वीकार करते हैं। चरणों की शपथ लेकर वे अन्त में कहते हैं कि राम प्रसन्न मन से जिसे जो आज्ञा देंगे, सब उसे मानेंगे। उनकी विनती प्रभु के मन को संकोच से मुक्त रखने पर पूरी होती है।
राम का मौन और मिथिला के दूत
भरत की पवित्र वाणी सुनकर देवता हर्षित होते हैं। वे उन्हें साधु कहकर सराहते और फूल बरसाते हैं। अयोध्या के निवासी असमंजस में हैं। पोद्दार जी की टीका उनके मन की प्रतीक्षा खोलती है कि अब राम क्या कहेंगे। उधर तपस्वी और वनवासी मन में बहुत प्रसन्न हैं; टीका इसे राम के वन में बने रहने की आशा से जोड़ती है। एक ही विनती के बाद तीन अलग भाव सामने आते हैं। भरत ने निर्णय खुला रखा है, इसलिए हर ओर अपनी आशा अब भी जीवित है।
संकोची राम चुप ही रहते हैं। उनके मौन को देखकर पूरी सभा चिन्ता में पड़ती है। अभी कोई उत्तर नहीं आया है। इसी अवसर पर जनक के दूत पहुँचते हैं। वसिष्ठ समाचार सुनकर उन्हें शीघ्र बुलवाते हैं। वे प्रणाम करके राम को देखते हैं और उनका मुनियों जैसा वेष उन्हें बहुत दुखी कर देता है। जिनके पास वे समाचार लाये हैं, उनका रूप ही पहले उन पर दुःख की तरह उतरता है।
मुनिश्रेष्ठ उनसे विदेह के राजा का कुशल समाचार पूछते हैं। दूत इस प्रश्न को सुनकर सकुचाते हैं, पृथ्वी पर मस्तक नवाते हैं और हाथ जोड़कर उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि स्वामी ने इतने आदर से पूछा, यही कुशल का कारण हो गया। इस विनय के भीतर वास्तविक समाचार की कठिनाई है। कुशल कहने के लिये जो शब्द माँगे गये, उन्हें कहते हुए भी दूत जानते हैं कि दोनों राजपरिवारों पर कैसी विपत्ति है।
नाहिं त कोसलनाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।
दोहा २७०
मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ॥ २७०॥
उनका उत्तर है कि कुशल तो कोसलनाथ दशरथ के साथ ही चली गयी। उनके जाने से सारा संसार अनाथ हुआ, पर मिथिला और अवध विशेष रूप से असहाय हो गये। दूतों की वाणी में दोनों नगर एक साथ आते हैं। राम और भरत की बातचीत पिता के सत्य तथा प्रेम तक पहुँची थी; मिथिला का समाचार फिर उन्हीं पिता के अभाव को सामने लाता है। सभा में नया समाचार पहुँचा है, राम का उत्तर अभी नहीं खुला। यहाँ आनेवाले जनक के दूत हैं; राजा का अपना आगमन इस घड़ी की घटना नहीं है।
देवता प्रसन्न हैं, अवध के निवासी अनिश्चित हैं और वनवासी आशावान। राम मौन रहते हैं। तभी जनक के दूत आते हैं और वसिष्ठ के कुशलप्रश्न पर बताते हैं कि दशरथ के साथ ही कुशल चली गयी, विशेषकर मिथिला और अवध अनाथ हो गये हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
भरत की दोनों विनतियों के बीच राम का वह उत्तर है जिसमें प्रेम को पहचान लेने का विश्वास मिलता है। राम पशु-पक्षियों का उदाहरण देकर कहते हैं कि हित और अहित पहचाने जाते हैं। भरत को अपनी नीयत सिद्ध करने के लिये और क्या करना है, यह प्रश्न वहीं हल्का हो जाता है। अगली विनती में वे अपने निराधार भय को दिशा भूलने जैसा कह पाते हैं। हमारी दृष्टि से इस संवाद का परिवर्तन इसी क्रम में खुलता है: पहले सुना जाना, फिर पहचाना जाना, फिर अपनी इच्छा पूरी स्पष्टता से कहना।
बचपन के खेलों की स्मृति और अन्त में सबके आज्ञापालन का भरोसा, दोनों में वही सम्बन्ध है। भरत जानते हैं कि राम उन्हें हारने पर भी जिता देते थे। अब वे उसी कृपा के सामने यह सावधानी रखते हैं कि उनकी जीत से स्वामी का मन संकोच में न पड़े। प्रेम की याद उन्हें अपनी बात कहने का साहस देती है, और प्रेम का विचार उनकी माँग के लिये मर्यादा बनाता है। हम उनके प्रस्तावों को पूरा सुनते हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी चाह को दबाकर अस्पष्ट नहीं किया। हम उनकी आखिरी शर्त भी सुनते हैं, क्योंकि उन्होंने चाह को सबके लिये निर्णय नहीं बना दिया।
इस प्रसंग की कठिनाई अन्त तक बनी रहती है। भरत ने अपना विश्वास कह दिया है; राम अब भी मौन हैं। दूतों का आगमन उस मौन के बीच होता है और मिथिला को भी शोक की इस सभा से जोड़ देता है। एक परिवार के भीतर कही जा रही बात का भार दो नगरों तक पहुँचा हुआ है। निर्णय की प्रतीक्षा में इतना कुछ साफ़ हो चुका है कि आगे का वचन केवल व्यवस्था नहीं रहेगा, उसमें इन सबकी व्यथा और आशा भी सुनी जायेगी।
भरत की पहली बात राम के स्नेह की स्मृति थी, अन्तिम बात राम की प्रसन्नता में सबका कल्याण। बीच में अपनी ग्लानि, अपनी चाह और अपने विकल्प, सब उन्होंने कह दिये। दूतों का उत्तर आते ही कथा दशरथ के अभाव पर ठहरती है। राम का मौन और दोनों नगरों का दुःख, दोनों अभी सभा के सामने हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २६० से २७०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।