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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 32
जनक और वसिष्ठ का विचार
जनक सीता से उनके यश की बात कहते हैं, और माता-पिता सीता को विदा करते हैं। रात में जनक रानी से कहते हैं कि भरत मन से भी राम की आज्ञा नहीं टालेंगे। सुबह राम गुरु से उचित करने को कहते हैं, और वसिष्ठ के वचन सुनकर जनक भरत से उनकी आज्ञा पूछते हैं। भरत कहते हैं कि सेवाधर्म कठिन है।
सीता को तपस्विनी के वेष में देखकर जनक के हृदय में प्रेम और विशेष सन्तोष होता है, और वे बेटी से उनके निर्मल यश की बात कहते हैं। सीता कहती नहीं, मन में सकुचाती हैं कि यहाँ रात में रहना अच्छा नहीं। रानी उनका रुख देखकर राजा को बता देती हैं, और समय पाकर भरत की दशा कहती हैं। सुबह राम स्नान करके गुरु के पास जाते हैं।
रामचरितमानस के इस प्रसंग में जनक रानी से भरत की महिमा कहते हैं। वे कहते हैं कि भरत और राम का प्रेम और विश्वास तर्क से नहीं जाना जा सकता। राम गुरु से कहते हैं कि सबका हित आपके हाथ में है। वसिष्ठ राम के बिना दोनों राजसमाजों के सुख के साज को नरक के समान बताते हैं। वे जनक से पूछते हैं कि आपके बिना यह दुविधा कौन मिटा सकता है। भरत कहते हैं कि सेवाधर्म कठिन है। वे विनती करते हैं कि राम का रुख, धर्म और व्रत रखते हुए वही कीजिये जो सबको सम्मत हो और सबके हित का हो।
रात में राजा और रानी, प्रातः दोनों राजसमाज
- सीता जिन्हें जनक तपस्विनी के वेष में देखते हैं और जिनके यश की बात कहते हैं। सीता कहती नहीं कि यहाँ रात में रहना अच्छा नहीं, और सुनयना उनका रुख देखकर राजा को बता देती हैं।
- जनक सीता के पिता। वे रानी से भरत के सुयश की सराहना करते हैं, और वसिष्ठ के वचन सुनकर भरत के पास जाकर उनकी आज्ञा पूछते हैं।
- सुनयना जो सीता का संकोच पहचानती हैं और अवसर पाकर जनक से भरत की दशा कहती हैं।
- राम जो गुरु से कहते हैं कि भरत, नगरवासी और माताएँ शोक से व्याकुल हैं, और जनक समाज सहित बहुत दिनों से क्लेश सह रहे हैं। वे गुरु से विनती करते हैं कि जो उचित हो वही कीजिये।
- वसिष्ठ कुलगुरु, जो रामप्रेम का महत्त्व बताकर जनक के साथ धर्मसहित हित का विचार आगे बढ़ाते हैं।
- भरत जो जनक को पिता के समान प्रिय और पूज्य कहते हैं, और सेवाधर्म को कठिन बताते हैं। वे विनती करते हैं कि राम का रुख, धर्म और व्रत रखते हुए सबके हित का काम हो।
बेटी की कीर्ति और पिता का सन्तोष
जनक सीता को तपस्विनी के वेष में देखते हैं। उनके भीतर प्रेम और विशेष सन्तोष होता है। वे सीता से कहते हैं कि आपने दोनों कुल पवित्र कर दिये। सब कहते हैं कि आपके निर्मल यश से सारा जगत् उज्ज्वल हो रहा है।
वे कहते हैं कि आपकी कीर्तिरूपी नदी देवनदी गंगा को जीतकर करोड़ों ब्रह्माण्डों में बह चली है। पोद्दार की टीका जोड़ती है कि गंगा एक ही ब्रह्माण्ड में बहती है।
गंगा ने पृथ्वी पर तीन स्थान बड़े बनाये हैं। टीका इन्हें हरिद्वार, प्रयाग और गंगासागर बताती है। जनक कहते हैं कि सीता की कीर्तिनदी ने अनेक साधु समाजों को बड़ा बनाया है।
पिता स्नेह से सच्ची और सुन्दर वाणी कहते हैं। सीता मानो संकोच में समा जाती हैं। फिर माता और पिता दोनों उन्हें हृदय से लगा लेते हैं, और हित की सुन्दर सीख और आशीष देते हैं।
जो बात सीता ने मन में रखी
सीता कुछ कहती नहीं, मन में सकुचाती हैं कि यहाँ रात में रहना अच्छा नहीं। पोद्दार की टीका कारण बताती है कि यहाँ रहने से सासों की सेवा छूट जायेगी।
सुनयना बेटी का रुख देखकर राजा को बता देती हैं। तब दोनों अपने हृदय में सीता के शील और स्वभाव की सराहना करते हैं।
फिर माता-पिता बार बार मिलकर और हृदय से लगाकर सीता को सम्मान के साथ विदा करते हैं।
चतुर रानी समय पाकर सुन्दर वाणी में राजा से भरत की दशा कहती हैं।
भरत के समान भरत
जनक भरत का व्यवहार सुनते हैं: सोना, सुगन्ध, सुधा और चन्द्रमा का सार। पोद्दार की टीका इन्हें सोने में सुगन्ध और समुद्र से निकली सुधा में चन्द्रमा के सार की तरह जोड़ती है। राजा जल से भरे नेत्र मूँद लेते हैं, और उनका शरीर पुलकित हो जाता है।
आनन्दित मन से जनक भरत के सुयश की सराहना करने लगते हैं। वे सुनयना से सावधान होकर सुनने को कहते हैं: भरत की कथा संसार के बन्धन से छुड़ानेवाली है। फिर अपनी समझ का परिचय देते हैं: धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार, इनमें अपनी बुद्धि के अनुसार उनकी गति है।
वे कहते हैं कि उनकी वह बुद्धि भरत की महिमा का क्या वर्णन करे, छल करके उसकी छाया को नहीं छू पाती।
फिर जनक कहते हैं कि भरत के चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझने और सुनने में सबको सुख देते हैं। विधाता, गणेश, नागों के स्वामी, शिव और सरस्वती को, और कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान् को भी। पवित्रता में वे गंगा का, और स्वाद में अमृत का भी निरादर करते हैं।
वे भरत को असीम गुणोंवाला और उपमारहित पुरुष कहते हैं, और कहते हैं कि भरत को भरत के समान जानिये। क्या सुमेरु को सेर के बराबर कहा जा सकता है? कवियों के कुल की बुद्धि सकुचा जाती है। भरत की महिमा का वर्णन सबके लिये वैसा ही अगम है जैसे जलहीन धरती पर मछली का चलना। रानी से वे कहते हैं कि भरत की अपार महिमा राम जानते हैं, और उसका वर्णन नहीं कर सकते।
सबके मन की बात और भरत का मत
प्रेम से भरत के प्रभाव का वर्णन करके, और पत्नी के मन की रुचि देखकर, जनक कहते हैं कि लक्ष्मण लौट जायँ और भरत वन को जायँ। इसमें सबका भला है, और यह सबके मन में है।
फिर जनक रानी से कहते हैं कि भरत और राम का प्रेम और विश्वास तर्क से नहीं जाना जा सकता। भरत स्नेह और ममता की सीमा हैं, यद्यपि राम समता की सीमा हैं।
जनक कहते हैं कि परमार्थ, स्वार्थ और सारे सुख, इनकी ओर भरत ने स्वप्न में भी, मन से भी नहीं देखा।
राम के चरणों का प्रेम भरत का साधन है और सिद्धि। जनक को भरत का यह मत दिखाई पड़ता है।
राजा बिलखकर कहते हैं कि भरत भूलकर भी राम की आज्ञा को मन से भी नहीं टालेंगे, और स्नेह के वश होकर चिन्ता नहीं करनी चाहिये। पोद्दार की टीका के अनुसार वे प्रेम से गद्गद थे।
सुबह राम गुरु के पास जाते हैं
राम और भरत के गुण प्रेम से गिनते हुए जनक और सुनयना की रात पलक के समान बीत जाती है। प्रातःकाल दोनों राजसमाज जागते हैं, स्नान करते हैं और देवताओं की पूजा में लग जाते हैं।
राम स्नान करके गुरु वसिष्ठ के पास जाते हैं, और उनके चरणों की वन्दना करते हैं। उनका रुख पाकर वे कहते हैं: नाथ, भरत, नगरवासी और माताएँ शोक से व्याकुल हैं और वनवास से दुखी।
राम कहते हैं कि मिथिला के राजा जनक को समाज सहित क्लेश सहते बहुत दिन हो गये हैं। फिर वे कहते हैं: नाथ, जो उचित हो वही कीजिये। सबका हित आपके हाथ में है।
इतना कहकर राम बहुत सकुचा जाते हैं। उनका शील और स्वभाव देखकर वसिष्ठ पुलकित हो उठते हैं।
वसिष्ठ राम को सुख का सुख कहते हैं
वसिष्ठ राम से कहते हैं कि आपके बिना सुख का सारा साज दोनों राजसमाजों को नरक के समान है। पोद्दार की टीका इस साज में घर-बार आदि गिनाती है।
गुरु कहते हैं कि राम प्राणों के प्राण, आत्मा की आत्मा और सुख के सुख हैं। राम को छोड़कर जिन्हें घर अच्छा लगता है, उनके लिये विधाता प्रतिकूल है।
वे कहते हैं कि जहाँ राम के चरणों में प्रेम नहीं, वह सुख, वह कर्म और वह धर्म जल जाय। जिस योग में रामप्रेम प्रधान नहीं, वह कुयोग है, और वैसा ज्ञान अज्ञान है।
वसिष्ठ कहते हैं कि राम के बिना सब दुखी हैं, और जो सुखी हैं, वे राम से सुखी हैं। किसके मन में क्या है, यह राम सब जानते हैं।
वे कहते हैं कि राम की आज्ञा सबके सिर पर है, और कृपालु राम को सबकी दशा अच्छी तरह मालूम है। फिर वे राम से आश्रम को पधारने की विनती करते हैं, और स्वयं स्नेह से शिथिल हो जाते हैं।
राम प्रणाम करके चले जाते हैं। वसिष्ठ धीरज धरकर जनक के पास आते हैं।
गुरु के वचन और जनक का विचार
वसिष्ठ राजा को राम के वचन सुनाते हैं, जिनमें शील और स्नेह है और जो स्वभाव से सुन्दर हैं। फिर वे कहते हैं: महाराज, अब वही कीजिये जिसमें सबका हित धर्म के साथ हो।
वसिष्ठ जनक को ज्ञान का भण्डार, सुजान, पवित्र और धर्म में धीर कहते हैं। फिर वे पूछते हैं कि इस समय आपके बिना यह दुविधा मिटाने में कौन समर्थ है।
मुनि की बात सुनकर जनक प्रेम में मग्न हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्य को वैराग्य हो गया। टीका इसका भाव खोलती है कि उनके ज्ञान और वैराग्य छूट से गये। प्रेम से शिथिल राजा मन में सोचते हैं: हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया।
जनक मन में सोचते हैं: दशरथ ने राम को वन जाने को कहा, और स्वयं प्रिय के प्रति अपना प्रेम प्रमाणित कर दिया। हम अब राम को वन से वन भेजकर अपने विवेक की बड़ाई में प्रसन्न होकर लौटेंगे। पोद्दार की टीका दशरथ के प्रमाण को प्रिय के वियोग में प्राण त्याग देना कहती है।
टीका जनक के इस विचार को आगे खोलती है: हमें मोह नहीं हुआ, हम राम को वन में छोड़ आये और दशरथ की तरह मरे नहीं।
यह सब सुनकर और देखकर तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण प्रेमवश बहुत व्याकुल हो जाते हैं। फिर जनक समय का विचार करके धीरज धरते हैं, और अपने समाज सहित भरत के पास चलते हैं।
भरत से उनकी आज्ञा पूछी जाती है
भरत आगे आकर जनक और उनके साथ आये लोगों का स्वागत करते हैं और अवसर के अनुरूप अच्छे आसन देते हैं। जनक भरत को तात कहकर बात शुरू करते हैं, और याद दिलाते हैं कि राम का स्वभाव भरत भली भाँति जानते हैं।
मिथिला के राजा कहते हैं कि राम सत्य के व्रती हैं, धर्म में लगे हैं, और सबके शील और स्नेह का मान रखते हैं।
राम संकोच के वश संकट सह रहे हैं। जनक भरत से कहते हैं कि आप जो आज्ञा दें, वह कही जाय।
सेवा का कठिन धर्म
यह सुनकर भरत का शरीर पुलकित हो जाता है और आँखों में जल भर आता है। वे बहुत धीरज धरकर बोलते हैं: आप पिता के समान प्रिय और पूज्य हैं। कुलगुरु के समान हितैषी न माता है न पिता।
भरत कहते हैं कि विश्वामित्र आदि मुनियों और मन्त्रियों का समाज है, और आज ज्ञान के समुद्र आप स्वयं हैं। वे विनती करते हैं कि मुझे बच्चा, सेवक और आज्ञा पर चलनेवाला जानकर शिक्षा दीजिये।
फिर वे कहते हैं: इस समाज और स्थान में आपका पूछना। चुप रहूँ तो मलिन, बोलूँ तो बावला।
वे कहते हैं कि छोटे मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ। विधाता को प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजियेगा।
भरत कहते हैं कि आगम, निगम और पुराणों में प्रसिद्ध है, और संसार जानता है, कि सेवाधर्म कठिन है। स्वामी के धर्म और स्वार्थ में विरोध है। पोद्दार की टीका कहती है कि दोनों एक साथ नहीं निभ सकते।
फिर वे कहते हैं कि वैर अन्धा होता है, और प्रेम को ज्ञान नहीं रहता। टीका इसे भरत की दुविधा से जोड़ती है: स्वार्थवश कहें या प्रेमवश, दोनों में भूल का भय है।
भरत विनती करते हैं कि राम का रुख, धर्म और व्रत रखते हुए और मुझे पराधीन जानकर, प्रेम पहचानकर वही कीजिये जो सबको सम्मत हो और सबके हित का हो। टीका रुख को रुचि और व्रत को सत्य का व्रत बताती है।
सबकी सम्मति और सबका हित
जनक ने सीता से उनके यश की बात कही, और सीता मानो संकोच में समा गयीं। सीता ने नहीं कहा कि वहाँ रात में रहना अच्छा नहीं, और रानी ने उनका रुख देखकर राजा को बता दिया। माता-पिता ने सीता को सम्मान के साथ विदा किया। रात में राजा ने रानी से भरत के सुयश की सराहना की, और कहा कि भरत मन से भी राम की आज्ञा नहीं टालेंगे।
सुबह राम ने गुरु से जो उचित हो वही करने की विनती की। वसिष्ठ ने कहा कि राम के बिना सुख का साज दोनों समाजों को नरक के समान है, और जनक को राम के वचन सुनाये। मुनि के वचन सुनकर जनक ने मन में सोचा कि यहाँ आकर अच्छा नहीं किया। फिर वे समाज सहित भरत के पास गये और उनकी आज्ञा पूछी। भरत ने कहा कि सेवाधर्म कठिन है। उन्होंने विनती की कि राम का रुख, धर्म और व्रत रखते हुए वही किया जाय जो सबको सम्मत हो और सबके हित का हो।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 287 से 293, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।