Lulla Family

जनक और वसिष्ठ का विचार

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · जनक और वसिष्ठ का विचार

जनक और वसिष्ठ का विचार

सीता को विदा करते माता-पिता, भरत के प्रेम पर जनक का विचार, और अगली सुबह सबके हित की खोज में एक से दूसरे तक पहुँचती विनती।

सीता को तपस्विनी के वेष में देखकर जनक के हृदय में प्रेम और विशेष सन्तोष होता है। बेटी के सामने वे उसके निर्मल यश की बात कहते हैं। सीता अपनी प्रशंसा से सकुचाती हैं, और कुछ ही देर में उनके मन में रात की सेवा का ध्यान आ जाता है। इस छोटे से पारिवारिक क्षण के बाद उन्हीं माता-पिता की बातचीत भरत तक पहुँचती है। फिर सुबह होती है, और राम सबके दुःख का उपाय पूछने गुरु के पास जाते हैं। एक रात और अगली सुबह में स्नेह के कई रूप सामने आते हैं।

तुलसीदास के रामचरितमानस का यह प्रसंग हमें उन लोगों के बीच ले आता है जो एक-दूसरे का भला चाहते हैं और उसी कारण निर्णय करते हुए सकुचाते हैं। जनक भरत के प्रेम को समझते हैं। वसिष्ठ राम के बिना दोनों राजसमाजों के सुख को व्यर्थ बताते हैं। भरत अपनी इच्छा कहने से पहले राम की रुचि और सत्यव्रत की रक्षा चाहते हैं। बात जिस व्यक्ति तक पहुँचती है, वह अपने साथ दूसरों का मन भी रखता है। हम इस पूरी बातचीत को सुनें तो उसकी कठिनाई धीरे-धीरे खुलती है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • सीता जिनकी प्रशंसा जनक करते हैं और जिनके मन की सेवा सम्बन्धी बात सुनयना समझ लेती हैं।
  • जनक सीता के पिता, भरत के प्रेम के प्रशंसक और सबके हित का उपाय विचारनेवाले राजा।
  • सुनयना जो सीता का संकोच पहचानती हैं और अवसर पाकर जनक से भरत की दशा कहती हैं।
  • राम जो भरत, माताओं और दोनों समाजों का दुःख देखकर गुरु से उचित उपाय करने की विनती करते हैं।
  • वसिष्ठ कुलगुरु, जो रामप्रेम का महत्त्व बताकर जनक के साथ धर्मसहित हित का विचार आगे बढ़ाते हैं।
  • भरत जो बड़ों के सामने अपनी सेवकता रखकर राम की रुचि, धर्म और सत्यव्रत बचाने की प्रार्थना करते हैं।

बेटी की कीर्ति और पिता का सन्तोष

जनक की दृष्टि सीता के तपस्विनी-वेष पर पड़ती है। उस वेष को देखकर उनके भीतर जो होता है, तुलसी उसके लिये प्रेम के साथ सन्तोष भी कहते हैं। पिता के सामने बेटी है, और उसके जीवन की कठिन परिस्थिति के बीच वे उसके आचरण की उज्ज्वलता देख रहे हैं। उनका कथन बेटी के दोनों कुलों से आरम्भ होता है। वे सीता से कहते हैं कि आपने दोनों कुल पवित्र कर दिये; आपके निर्मल यश से सारा जगत् उज्ज्वल हो रहा है, ऐसा सब कहते हैं।

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी॥
पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ । सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ॥

चौपाई १

दोनों कुलों को एक साथ रखने से इस प्रशंसा का विस्तार समझ में आता है। जनक बेटी का यश कहते हुए अपने ही परिवार पर ठहर नहीं जाते। सीता जहाँ से आयी हैं और जिस कुल से उनका सम्बन्ध जुड़ा है, दोनों उसकी पवित्रता में सम्मिलित हैं। पिता की वाणी में अपनेपन के साथ यह उदारता भी है। बेटी का गौरव उनके लिये ऐसा प्रकाश है जिसे किसी एक घर में सीमित करके देखा ही नहीं जा सकता।

फिर वे कीर्ति को नदी का रूप देते हैं। उनके कथन में सीता की कीर्तिनदी देवनदी गंगा को भी जीतकर करोड़ों ब्रह्माण्डों में बह चली है। पोद्दारजी की टीका इस तुलना को खोलती है: गंगा का प्रवाह एक ब्रह्माण्ड में है, और सीता के यश का विस्तार उससे कहीं आगे बताया जा रहा है। पिता के प्रेम में उठी इस उपमा की भव्यता उसके अगले हिस्से में और स्पष्ट होती है। नदी जितनी दूर जाती है, अपने साथ उतने ही पवित्र स्थान बनाती चलती है।

जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी । गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी॥
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे । एहिं किए साधु समाज घनेरे॥

चौपाई २

गंगा के तीन बड़े तीर्थस्थानों को टीका हरिद्वार, प्रयागराज और गंगासागर के नाम से पहचानती है। जनक कहते हैं कि सीता की कीर्तिनदी ने तो अनेक साधु-समाजों को तीर्थस्थान बना दिया है। यहाँ यश का फल उन लोगों में दिखाई देता है जो उसे सुनते और सँजोते हैं। संतों के समुदाय ही इस नदी के तीर्थ हैं। गंगा की पवित्रता से आरम्भ हुई तुलना इस तरह सीता के चरित्र का स्मरण करनेवाले समुदायों तक पहुँचती है।

पिता की बात स्नेहभरी है, और तुलसी उसे सच्ची तथा सुन्दर वाणी कहते हैं। उसके उत्तर में सीता का संकोच इतना बढ़ता है कि मानो वे उसी में समा गयी हों। जनक ने जितना व्यापक यश कहा, सीता उसे सुनकर उतनी ही लज्जाशील दिखाई देती हैं। फिर माता और पिता दोनों उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। हित की सुन्दर सीख और आशीष देते हैं। प्रशंसा के बाद यह आलिंगन उस बड़े कथन को फिर परिवार की निकटता में लौटा लाता है।

जनक सीता के तपस्विनी-वेष को देखकर प्रेम और सन्तोष पाते हैं। वे दोनों कुलों की पवित्रता और गंगा से भी व्यापक उनकी कीर्ति कहते हैं। सीता प्रशंसा से सकुचाती हैं; माता-पिता उन्हें हृदय से लगाकर सीख और आशीष देते हैं।

जो बात सीता ने मन में रखी

माता-पिता के पास सीता हैं, पर उनके मन में रात का विचार आ गया है। वे सोचती हैं कि यहाँ रात बिताना अच्छा नहीं होगा। पोद्दारजी की टीका इस संकोच के भीतर का कारण बताती है: यहाँ रहने से सासुओं की सेवा छूटेगी। सीता की बात अभी उनके मन में ही है। तुलसी उस स्थिति को बहुत सावधानी से रखते हैं, जिसमें सेवा की चिन्ता स्पष्ट है और वाणी मौन।

कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं॥
लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ॥

चौपाई ३

सुनयना बेटी का रुख पहचान लेती हैं। जिस बात को सीता ने कहा नहीं, माँ उसे समझकर जनक को बता देती हैं। अब दोनों माता-पिता अपने हृदय में सीता के शील और स्वभाव की सराहना करते हैं। उनके लिये बेटी की प्रशंसा का एक और कारण सामने है। अभी जनक ने उसकी कीर्ति को ब्रह्माण्डों में बहती नदी कहा था। अब उसी बेटी की चिन्ता एक निश्चित काम की है, रात में माताओं की सेवा कैसे बनी रहे।

आप इस क्रम में दोनों ओर का आदर देख सकते हैं। सीता माता-पिता के स्नेह से सकुचाती भी हैं और सेवा का ध्यान भी रखती हैं। सुनयना उस मौन को समझती हैं; जनक तक बात पहुँचा देती हैं। माता-पिता बेटी के स्वभाव की सराहना मन में करते हैं। बार-बार मिलकर, हृदय से लगाकर और सम्मान देकर वे सीता को विदा करते हैं।

बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि।
कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥ २८७॥

दोहा २८७

विदाई के बाद सुनयना समय देखकर भरत की दशा का वर्णन करती हैं। तुलसी उन्हें सयानी कहते हैं, और उनकी वाणी को सुन्दर बताते हैं। सीता के मन को पहचानना और भरत की बात रखने का अवसर पहचानना, दोनों इसी समझ के अंग हैं। अब माता-पिता की बातचीत का विषय बदलता है। बेटी को मिली सीख और आशीष पूरी हो चुकी है; राजा के सामने भरत का व्यवहार आनेवाला है। उस समाचार का प्रभाव उनके मुख से निकलनेवाली लम्बी प्रशंसा में खुलता है।

सीता मन ही मन रात में सासुओं की सेवा छूटने से सकुचाती हैं। सुनयना समझकर जनक को बताती हैं। दोनों बेटी के शील की सराहना करते हैं, बार-बार गले लगाकर विदा करते हैं, फिर उचित अवसर पर भरत की बात आरम्भ होती है।

जिसके समान जनक को वही दिखाई देते हैं

भरत का व्यवहार सुनकर जनक के मन में जो आनन्द उठता है, उसके लिये दो उपमाएँ आती हैं। सोने में सुगन्ध मिल गयी हो। समुद्र से निकली सुधा में चन्द्रमा का सार अमृत मिल गया हो। दूसरी उपमा का यह सम्बन्ध पोद्दारजी की टीका स्पष्ट करती है। दोनों में पहले से मूल्यवान वस्तु और अधिक मनोहर हो उठती है। भरत के आचरण का समाचार राजा को ऐसा ही लगता है। उनके नेत्रों में प्रेम के आँसू भर आते हैं, वे उन्हें मूँद लेते हैं, और शरीर पुलकित हो जाता है।

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू॥
मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजसु सराहन लगे मुदित मन॥

चौपाई ४

जनक आनन्दित मन से भरत के सुयश की सराहना करने लगते हैं। वे सुनयना को सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली कहकर सावधानी से सुनने को कहते हैं। उनके अनुसार भरत की कथा संसार के बन्धन से मुक्त करनेवाली है। आगे की बात कहने के लिये वे पहले अपनी समझ का परिचय देते हैं। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार, इन तीनों विषयों में उनकी बुद्धि के अनुसार उनकी गति है। वे जानते हैं कि इन विषयों में कुछ विचार कर सकते हैं।

किन्तु भरत की महिमा के सामने उसी बुद्धि की सीमा उन्हें स्वीकार करनी पड़ती है। वे कहते हैं कि उसका वर्णन करना तो दूर, उनकी मति छल करके भी उसकी छाया तक को नहीं छू पाती। अपने ज्ञान के तीनों क्षेत्र गिनाने के बाद यह बात कहना उस स्वीकार को और गम्भीर बना देता है। जो राजा धर्म और राजकाज को समझता है, वही भरत का चरित्र सामने आने पर अपनी समझ का पूरा माप अपर्याप्त पाता है।

अब उनकी वाणी में ब्रह्मा, गणेश, शेष, शिव और सरस्वती के नाम आते हैं। कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान् भी उसी क्रम में हैं। जनक भरत के चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य की चर्चा करते हैं। ये सब किसी को समझने और सुनने में सुख देनेवाले हैं। उनकी पवित्रता के आगे गंगा की उपमा भी कम पड़ती है, और मधुरता के आगे अमृत की। राजा की प्रशंसा भरत के एक कर्म पर रुकने के बदले उनके पूरे आचरण के इन अलग-अलग पक्षों को सामने रखती है।

भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू॥

चौपाई ५

चरित्र और करनी के साथ धर्म तथा शील को देखिये। भीतर की दिशा भी गिनी गयी है और बाहर का व्यवहार भी। कीर्ति उस आचरण का यश है, और निर्मल विभूति उसका उज्ज्वल ऐश्वर्य। इन्हें सुनने का सुख और समझने का सुख दोनों कहे गये हैं। जनक का कथन इतना भर नहीं कि भरत की प्रशंसा अच्छी लगती है; वे कहते हैं कि उनके गुणों को समझना भी सुख देता है। जितना विचार किया जाए, उसी प्रेम की गहराई फिर सामने आती है।

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।
कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि॥ २८८॥

दोहा २८८

आखिर वे भरत को उपमारहित पुरुष कहते हैं। उनके समान भरत ही हैं। सुमेरु पर्वत को सेर के बराबर कैसे कहा जा सकता है? बड़ी वस्तु को बहुत छोटे माप से तौल देने में उसकी महिमा घटती है, इसीलिये कवियों की बुद्धि भी उपमा देने में सकुचाती है। जनक फिर जलहीन धरती पर मछली के चलने की तुलना रखते हैं। भरत की महिमा का वर्णन सबके लिये वैसा ही अगम है। रानी से वे यह भी कहते हैं कि उनकी अपरिमित महिमा एक राम जानते हैं, किन्तु उसका पूरा वर्णन वे भी नहीं कर सकते।

भरत का व्यवहार सुनकर जनक के नेत्र भरते हैं और शरीर पुलकित होता है। अपने धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार के ज्ञान को वे उनकी महिमा के सामने अपर्याप्त मानते हैं। भरत के गुण असीम हैं; उनके समान भरत ही हैं, और उनकी महिमा को जानकर भी राम उसका वर्णन नहीं कर सकते।

सबके मन की इच्छा और भरत का मन

भरत के प्रभाव का प्रेमपूर्वक वर्णन करने के बाद जनक सुनयना के मन की रुचि पहचानते हैं। वे कहते हैं कि लक्ष्मण लौट जाएँ और भरत वन को जाएँ, इसमें सबका भला है और यही सबके मन में है। इस सम्भावना में लोगों को राहत का उपाय दिखाई देता है। राजा पत्नी की इच्छा जानते हुए उसे सबके मन से जोड़ते हैं। बात एक ऐसे परिवर्तन की है जिसकी कामना की जा सकती है; उसके साथ भरत के अपने प्रेम को समझना भी आवश्यक है।

जनक उसी पर आ जाते हैं। वे सुनयना से कहते हैं कि भरत और राम का प्रेम तथा परस्पर विश्वास बुद्धि के तर्क में समा नहीं सकता। उनकी प्रीति के साथ प्रतीति भी है, एक-दूसरे के प्रति भरोसा। राम समता की सीमा हैं, और भरत स्नेह तथा ममता की सीमा। राजा दोनों के स्वभाव का विचार करते हैं। राम का सबके प्रति समभाव और भरत का उनके प्रति सम्पूर्ण लगाव, दोनों को साथ रखे बिना उनके सम्बन्ध पर कोई सरल निष्कर्ष निकालना कठिन है।

इसके बाद जनक भरत की चाह का विस्तार बताते हैं। राम के अनन्य प्रेम के अतिरिक्त उन्होंने सारे परमार्थ, स्वार्थ और सुखों की ओर स्वप्न में भी मन से नहीं देखा। पोद्दारजी की टीका इसी रामप्रेम को वाक्य का आधार बनाती है। लोक का लाभ हो, परमार्थ का फल हो या कोई सुख, भरत का मन उस प्रेम से अलग उन्हें पाने की आकांक्षा नहीं रखता। जनक के लिये यही उनकी इच्छा को समझने का सबसे स्पष्ट सूत्र है।

परमारथ स्वारथ सुख सारे । भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥
साधन सिद्धि राम पग नेहू । मोहि लखि परत भरत मत एहू॥

चौपाई ६

राम के चरणों में प्रेम ही भरत का साधन है और वही उनकी सिद्धि। जिस प्रेम से वे चलते हैं, उसी में उनकी प्राप्ति भी है। राजा इसे भरत का एकमात्र मत मानते हैं। इसीलिये किसी बाहरी सुविधा को गिनाकर उनके मन का हिसाब पूरा नहीं होता। उन्हें क्या मिल जाएगा, यह प्रश्न उनके चरित्र की बात को आधा ही पकड़ता है। जनक पहले यह देखते हैं कि उनके लिये प्रिय के चरणों का सम्बन्ध किस स्थान पर है।

भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।
करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ॥ २८९॥

दोहा २८९

फिर राजा प्रेम से गद्गद होकर निश्चय कहते हैं: भरत भूलकर भी राम की आज्ञा को मन से भी नहीं टालेंगे। सुनयना को स्नेहवश चिन्ता न करने को कहते हैं। यह भरोसा भरत की अपनी रुचि के विषय में है। लक्ष्मण के लौटने और भरत के वन में रहने की इच्छा लोगों के मन में हो सकती है, पर जनक जानते हैं कि भरत की ओर से राम की रज़ा का उल्लंघन नहीं होगा। उनके प्रेम की इसी मर्यादा का भरोसा देकर जनक रानी को धीरज देते हैं।

हम इस बातचीत में चाह और विश्वास दोनों का पूरा स्थान देखते हैं। जनक प्रस्ताव में सबका भला पहचानते हैं, फिर भरत की भक्ति का स्वभाव सामने रखते हैं। ऐसा कोई परिवर्तन अभी हुआ नहीं है। रात की यह बातचीत भरत को समझने तक आती है: जिनके लिये रामप्रेम ही साधन और फल है, वे राम की इच्छा से अलग अपनी इच्छा को आगे कैसे रखेंगे। राजा की बात किसी यात्रा या अदला-बदली का आदेश नहीं देती; वह सुनयना की चिन्ता को भरत के स्वभाव के सहारे शान्त करती है।

लक्ष्मण लौटें और भरत वन में रहें, जनक इसे सबके मन की इच्छा बताते हैं। साथ ही वे राम और भरत के परस्पर प्रेम का विचार करते हैं। भरत के लिये रामचरणों का प्रेम ही साधन और सिद्धि है; वे मन से भी राम की आज्ञा नहीं टालेंगे।

अगली सुबह राम गुरु के पास जाते हैं

राम और भरत के गुण प्रेम से कहते-सुनते जनक और सुनयना की रात पलक के समान बीत जाती है। तुलसी यहाँ रात का पूरा समय इसी स्मरण में रखते हैं। सीता की विदाई, भरत का समाचार, उनकी महिमा और उनकी आज्ञाकारिता पर विचार के बाद पति-पत्नी दोनों भाइयों के गुण गिनते रहते हैं। फिर प्रातःकाल आता है। दोनों राजसमाज जागते हैं, स्नान करते हैं और देवताओं की पूजा में लग जाते हैं। अब कथा उसी रात से अगली सुबह में प्रवेश करती है।

राम भी स्नान करके गुरु वसिष्ठ के पास जाते हैं। उनके चरणों की वन्दना करते हैं और उनका रुख पाकर अपनी बात कहते हैं। जिनके गुणों में राजा और रानी की रात बीत गयी, वे इस सुबह दूसरों की कठिनाई लेकर आये हैं। भरत, अवध के नगरवासी और माताएँ, ये सभी शोक से व्याकुल हैं और वनवास से दुःखी हैं। राम के कहने में पहले उन सबकी स्थिति आती है जिनका दुःख उन्हें चिन्तित कर रहा है।

सहित समाज राउ मिथिलेसू । बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा । हित सबही कर रौरें हाथा॥

चौपाई ७

मिथिलापति जनक को भी पूरे समाज सहित क्लेश सहते बहुत दिन हो चुके हैं। राम दोनों पक्षों को एक ही निवेदन में रख देते हैं। भरत और माताओं की पीड़ा के साथ मिथिला से आये लोगों की पीड़ा भी गुरु के सामने है। किसी एक परिवार की सुविधा करके बात पूरी नहीं होगी। राम कहते हैं कि हे नाथ, जो उचित हो वही कीजिये; सबका हित आपके हाथ में है। उपाय का निर्णय वे गुरु की समझ पर छोड़ते हैं।

इतना कहकर राम बहुत सकुचा जाते हैं। उनका यह शील और स्वभाव देखकर वसिष्ठ पुलकित हो उठते हैं। निवेदन में दूसरों की चिन्ता है, उचित मार्ग पूछने की विनय है, और गुरु को दिया हुआ अधिकार है। वसिष्ठ इसी को देखकर प्रेम तथा आनन्द से भरते हैं। अब उन्हें उस दुःख का उत्तर देना है जिसे राम वनवास की कठिनाई के साथ जोड़कर कह रहे हैं। गुरु लोगों के मन की उस दशा को सामने लाते हैं जिसमें राम का साथ ही सुख का आधार है।

इस सुबह की बातचीत में सभी का हित बार-बार लौटता है। राम किसी के लिये निर्णय सुनाकर गुरु के पास नहीं आते। वे कई दिनों की पीड़ा का ध्यान दिलाते हैं और उचित उपाय की प्रार्थना करते हैं। उनकी बात में भरत, नगरवासी, माताएँ और जनक का समाज अलग-अलग पहचाने जाते हैं। वसिष्ठ का उत्तर इसी पूरे समुदाय को लेकर होगा। आगे विचार जनक और भरत तक पहुँचेगा, पर उसकी शुरुआत राम की इस करुणा से हुई है।

दोनों भाइयों के गुण कहते-सुनते जनक और सुनयना की रात पलक जैसी बीतती है। अगली सुबह स्नान और पूजा के बाद राम गुरु से दोनों समाजों का दुःख कहते हैं और सबके लिये उचित उपाय करने की विनती करते हैं।

वसिष्ठ के लिये सुख का आधार

वसिष्ठ राम से कहते हैं कि आपके बिना दोनों राजसमाजों को सुख की सारी सामग्री नरक के समान लगती है। पोद्दारजी की टीका इस सामग्री में घर-बार आदि को समझाती है। राम ने सबके क्लेश का विषय उठाया था; गुरु उसी का भीतरी कारण बताते हैं। जिस सुख में राम का साथ छूट जाए, वह इन लोगों को सुहानेवाला नहीं है। इसलिये उनके लिये वन की कठिनाई और घर की सुविधा को भर गिनकर भलाई नहीं तय की जा सकती।

प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥ २९०॥

दोहा २९०

गुरु का सम्बोधन सीधे राम से है। वे उन्हें प्राणों के भी प्राण, आत्मा के भी आत्मा और सुख के भी सुख कहते हैं। इन तीनों पदों में जीवन और आनन्द के मूल तक जाने का भाव है। जिसके कारण प्राण प्रिय हैं और सुख सुखद लगता है, गुरु उसी को राम में देखते हैं। आगे उनका कथन और दृढ़ हो जाता है: राम को छोड़कर जिन्हें घर अच्छा लगता है, उनके लिये विधाता प्रतिकूल है। यह वसिष्ठ के रामप्रेम की वाणी है।

वे सुख, कर्म और धर्म को भी उसी प्रेम की कसौटी पर रखते हैं। जहाँ राम के चरणकमलों में अनुराग नहीं, वह सुख, वह कर्म और वह धर्म जल जाए। जिस योग में रामप्रेम की प्रधानता नहीं, उसे वे कुयोग कहते हैं; वैसा ज्ञान उनके लिये अज्ञान है। गुरु की यह उक्ति साधना के नाम गिनाकर संतुष्ट नहीं होती। वे प्रत्येक में यह देखते हैं कि राम का प्रेम प्रधान है या नहीं। उसी से उनके अनुसार उसका मूल्य बनता है।

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ॥
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू । जहँ नहिं राम पेम परधानू॥

चौपाई ८

राम के सामने वसिष्ठ की यह बात दोनों समाजों की दशा भी समझा रही है। सब उनके बिना दुःखी हैं; जो सुखी हैं, वे उन्हीं से सुखी हैं। गुरु राम को सबके भीतर की बात जाननेवाला कहते हैं। किसके जी में क्या है, यह उनसे छिपा नहीं है। इसीलिये उनके आगे सभी की स्थिति कहने में गुरु का भरोसा भी प्रकट होता है। जिसे सबके मन ज्ञात हैं, वही उनके दुःख और सुख को पूरा जानता है।

इसके साथ आज्ञा का सम्बन्ध भी बना रहता है। वसिष्ठ कहते हैं कि आपकी आज्ञा सबके सिर पर है, और कृपालु को सबकी दशा भलीभाँति मालूम है। प्रेम लोगों को व्याकुल किये हुए है, फिर भी राम का आदेश सबके लिये मान्य है। गुरु दोनों बातों को साथ रखते हैं। वे राम से आश्रम को पधारने को कहते हैं। इतना कहने पर स्वयं स्नेह से शिथिल हो जाते हैं। उनके उपदेश का भाव उनके अपने शरीर की दशा में भी दिखाई पड़ता है।

राम प्रणाम करके चले जाते हैं। वसिष्ठ धीरज सँभालते हैं और जनक के पास आते हैं। इस तरह गुरु की भक्ति का यह लम्बा उत्तर विचार को रोकता नहीं। वह लोगों के सुख का आधार स्पष्ट करने के बाद परामर्श को आगे ले जाता है। राम ने उचित उपाय गुरु पर छोड़ा था; गुरु अब जनक के साथ उसके धर्म और हित का विचार करेंगे। सबकी पीड़ा और राम के प्रति उनका प्रेम, दोनों इस अगले संवाद के साथ चलते हैं।

वसिष्ठ राम को प्राणों के प्राण और सुख के सुख कहते हैं। उनके अनुसार रामप्रेम के बिना सुख, कर्म, धर्म, योग और ज्ञान अपना मूल्य खो देते हैं। सबकी दशा राम को ज्ञात है और उनकी आज्ञा सभी को मान्य है। उन्हें आश्रम भेजकर गुरु जनक के पास जाते हैं।

जिस विवेक से जनक स्वयं प्रश्न करते हैं

वसिष्ठ राजा को राम के वचन सुनाते हैं। उनमें शील और स्नेह है, और वे स्वभाव से ही सुन्दर हैं। गुरु का निवेदन है कि अब वही किया जाए जिसमें सबका हित धर्म के साथ बना रहे। अकेला सुख निर्णय का आधार नहीं रखा गया; धर्म भी उसके साथ है। राम ने गुरु को सबके हित का अधिकारी माना था, और गुरु अब जनक की समझ से उस कठिनाई का समाधान चाहते हैं। एक के प्रति आदर दूसरे के प्रति विश्वास का रूप ले रहा है।

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल॥ २९१॥

दोहा २९१

वसिष्ठ जनक को ज्ञान का भण्डार, सुजान, पवित्र और धर्म में धीर कहते हैं। इस समय उनके बिना दुविधा दूर करने में कौन समर्थ होगा? जिन गुणों पर गुरु भरोसा कर रहे हैं, उनमें ज्ञान के साथ धैर्य और पवित्रता भी है। निर्णय के लिये समझ भर पर्याप्त नहीं मानी गयी। कठिन धर्म को धीर होकर निभाने की सामर्थ्य भी चाहिये। जनक से यह निवेदन करते हुए गुरु उन्हें उस पूरे दायित्व के सामने लाते हैं।

मुनि की बात सुनकर जनक प्रेम में मग्न हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर तुलसी कहते हैं कि ज्ञान और वैराग्य को भी वैराग्य हो गया। टीका इसका भाव खोलती है कि उनके ज्ञान-वैराग्य छूट से गये। राजा स्नेह से शिथिल होकर अपने मन में विचार करते हैं: हमारा यहाँ आना अच्छा नहीं हुआ। जिस विवेक पर अभी गुरु ने भरोसा जताया, उसी के विषय में उनके भीतर एक कठोर प्रश्न उठ रहा है।

रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥
हम अब बन तें बनहि पठाई । प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ई॥

चौपाई ९

जनक मन में राजा दशरथ को याद करते हैं। दशरथ ने राम को वन जाने के लिये कहा और स्वयं प्रिय के प्रति अपना प्रेम प्रमाणित कर दिया। पोद्दारजी की टीका इस प्रमाण को प्रिय-वियोग में प्राण त्याग देना कहती है। जनक अपने सामने दूसरी सम्भावना रखकर व्यथित होते हैं: हम राम को वन से और गहन वन में भेजेंगे, फिर अपने विवेक की बड़ाई में प्रसन्न होकर लौटेंगे। इस कथन में अपने लिये प्रशंसा का स्वर नहीं, अपने पर किया हुआ तीखा प्रश्न है।

टीका उस भीतर की कटुता को और स्पष्ट करती है। क्या वे यह गर्व लेकर लौटेंगे कि हमें मोह नहीं हुआ, हम राम को वन में छोड़ आये और दशरथ की तरह मरे नहीं? जनक की यह सोच उनके अपने विराग को उसी क्षण जाँच रही है। दशरथ का प्रेम उनके सामने ऐसा प्रमाण है जिसके बाद अपनी निर्लिप्तता की बड़ाई उन्हें असह्य लगती है। किसी को आगे भेजने का यह पूरा विचार उनके मन का आत्मप्रश्न बना हुआ है; उससे कोई निर्णय घोषित नहीं होता।

इस समय तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण भी सुनने और देखने से प्रेमवश बहुत व्याकुल हो उठते हैं। फिर जनक समय का विचार करते हैं और धीरज सँभालते हैं। वे समाज सहित भरत के पास चल पड़ते हैं। उनके मन का संकट बना हुआ है, पर उस संकट के बीच अगला काम वे करते हैं। जिन भरत के प्रेम की रात भर प्रशंसा हुई थी, अब उन्हीं से परामर्श होना है। जनक उनके पास अपने समाज को साथ लेकर पहुँचते हैं।

वसिष्ठ जनक से धर्मसहित सबका हित करने को कहते हैं। जनक मन में दशरथ के प्रेम और अपने विवेक की तुलना करके व्यथित होते हैं। वे समय समझकर धीरज सँभालते हैं और समाज के साथ भरत के पास जाते हैं।

अब भरत से पूछा जाता है

भरत सामने आकर जनक और साथ आये लोगों का स्वागत करते हैं। अवसर के अनुरूप अच्छे आसन देते हैं। जिनसे सलाह माँगने सब आये हैं, उनकी ओर से पहले आदर का यह व्यवहार होता है। आगे की बातचीत में भरत अपने को बालक और सेवक कहेंगे; उसके पहले उनका स्वागत यही सम्बन्ध प्रकट कर देता है। जनक बात का आरम्भ भरत को तात कहकर करते हैं। उन्हें याद दिलाते हैं कि राम का स्वभाव वे भलीभाँति जानते हैं।

तिरहुतराज का यह सम्बोधन भरत के अनुभव पर भरोसा रखता है। राम कैसे हैं, यह भरत को बाहर से समझाने की आवश्यकता नहीं। फिर भी उनके स्वभाव की वे बातें कही जाती हैं जो इस समय के संकट का कारण समझाती हैं: राम सत्य के व्रती हैं, धर्म में लगे हैं, और सबके शील तथा स्नेह का मान रखते हैं। उनकी विनय में दूसरों के मन की रक्षा जुड़ी है। इसी संकोच के कारण वे संकट सह रहे हैं।

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु॥ २९२॥

दोहा २९२

जनक अब भरत से कहते हैं कि आप जो आज्ञा दें, वह राम से कही जाए। एक पूज्य राजा की ओर से अपने लिये ऐसा सम्मान सुनना भरत के लिये भारी बात है। जनक उन्हें राम के मन का ज्ञाता मानकर पूछ रहे हैं, और भरत के सामने वे सभी बड़े हैं जिनसे वे स्वयं सीख की अपेक्षा रखते हैं। इसी उलझन में उनका उत्तर आकार लेता है। पूछनेवाले का प्रेम जितना गहरा है, उत्तर देनेवाले का संकोच भी उतना ही बढ़ता है।

राम के सत्यव्रत का उल्लेख यहाँ विचार की सीमा भी बाँधता है। जो बात कही जाएगी, उसे राम के धर्म और दूसरों के प्रति उनके आदर के बीच अपना स्थान पाना होगा। भरत के सामने केवल अपनी चाह बता देने का अवसर नहीं है। उनसे उस चाह को ऐसी वाणी देने को कहा जा रहा है जो राम तक पहुँच सके। इसलिये उनका उत्तर अपनी माँग से आरम्भ होने के बदले सामने उपस्थित बड़ों के परिचय और अपनी सेवकता से आरम्भ होता है।

भरत स्वागत करके अच्छे आसन देते हैं। जनक राम के सत्यव्रत, धर्म और सबके प्रति आदर का स्मरण कराते हैं, फिर पूछते हैं कि भरत की ओर से राम से क्या कहा जाए।

सेवा का कठिन धर्म

यह बात सुनकर भरत का शरीर पुलकित हो जाता है और नेत्रों में जल भर आता है। वे बहुत धीरज धरकर बोलते हैं। उनके पहले शब्द जनक के प्रति आदर के हैं: आप पिता के समान प्रिय और पूज्य हैं। फिर कुलगुरु वसिष्ठ का स्मरण करते हैं। उनके समान हित चाहनेवाले तो माता-पिता भी नहीं हैं। भरत जिस उत्तर की ओर बढ़ रहे हैं, उसमें उनकी ओर से निर्णय का अधिकार लेने से पहले बड़ों की हितैषिता स्वीकार की जाती है।

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी । बोले भरतु धीर धरि भारी॥
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू । कुलगुरु सम हित माय न बापू॥

चौपाई १०

विश्वामित्र आदि मुनियों और मन्त्रियों का समाज उपस्थित है। ज्ञान के समुद्र जनक स्वयं भी आज वहाँ हैं। भरत एक-एक करके उस परामर्श की सामर्थ्य गिनाते हैं जो उन्हें प्राप्त है। फिर विनती करते हैं कि मुझे अपना बच्चा, सेवक और आज्ञा का अनुसरण करनेवाला जानकर शिक्षा दीजिये। ये तीनों परिचय उनकी स्थिति बताते हैं। बच्चा सीख चाहता है, सेवक अपना कर्तव्य पूछता है, और आज्ञानुसार चलनेवाला आदेश का पालन करने को तैयार रहता है।

इसके बाद वे पूछे जाने की अपनी दुविधा कहते हैं। ऐसा समाज, ऐसा स्थल और आप जैसे पूज्य ज्ञानी का प्रश्न। इस पर चुप रहें तो मलिन समझे जाएँगे, बोलें तो वह बावलापन होगा। मौन को लोग मन की खिन्नता समझ सकते हैं, और बड़े-बड़े ज्ञाताओं के आगे अपनी ओर से बात कहना भरत को अपनी सीमा से बाहर पड़ता दिखाई देता है। वे दोनों ओर के संकोच को छिपाते नहीं। वही संकोच स्पष्ट करके वे अपनी बात के लिये क्षमा माँगते हैं।

वे कहते हैं कि छोटे मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ; विधाता को प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजियेगा। इसमें सामनेवालों के प्रति सम्मान बना रहता है और अपने समय की कठिनाई भी कही जाती है। भरत अपनी बात को अचूक निर्णय बनाकर नहीं रखते। उन्हें मालूम है कि जिनसे प्रेम है, उन्हीं के विषय में बोलते हुए अपने मन का आग्रह घुस सकता है। इसीलिये वे उत्तर का आधार अपने लाभ में ढूँढ़ने के पहले सेवा के धर्म का विचार करते हैं।

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना॥
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू । बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥

चौपाई ११

वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है, और संसार जानता है कि सेवाधर्म कठिन है। भरत की अगली बात उसकी कठिनाई बताती है: स्वामी के प्रति कर्तव्य और अपना स्वार्थ एक-दूसरे के विरोध में पड़ते हैं। पोद्दारजी की टीका कहती है कि दोनों एक साथ नहीं निभ सकते। सेवक को प्रिय वस्तु अपने लिये माँगते समय यह देखना पड़ता है कि उससे स्वामी की इच्छा पर क्या पड़ रहा है। भरत अपने उत्तर को इसी जाँच के सामने रखते हैं।

फिर वे वैर और प्रेम की बात कहते हैं। वैर अन्धा होता है और प्रेम को प्रबोध नहीं रहता। टीका इस उक्ति का आशय भरत की वर्तमान दुविधा से खोलती है: स्वार्थवश कहें या प्रेमवश, दोनों में भूल का भय है। अपनी चाह को प्रेम का नाम दे देने से यह भय अपने आप मिट नहीं जाता। भरत को राम से प्रेम है; उसी प्रेम के कारण वे बोलने के अपने अधिकार को बहुत सावधानी से देख रहे हैं।

उनकी विनती का अन्त अब स्पष्ट होता है। मुझे पराधीन जानिये, वे कहते हैं, और राम का रुख, धर्म तथा व्रत रखिये। टीका रुख को रुचि और व्रत को सत्यव्रत बताती है। भरत अपने लिये निर्णय करवाते हुए भी राम की इन बातों की रक्षा पहले चाहते हैं। अपनी पराधीनता कहने से वे बड़ों को याद दिलाते हैं कि उनका मार्ग राम की इच्छा से जुड़ा है। उसी सम्बन्ध को सुरक्षित रखकर कोई हितकारी उपाय निकाला जाए।

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि॥ २९३॥

दोहा २९३

अन्तिम विनती में सबकी सम्मति और सबका हित एक साथ माँगे गये हैं। सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिये, भरत कहते हैं, जो सभी को मान्य हो और सभी के लिये भला हो। अपनी इच्छा अलग रख देने के बाद भी वे किसी और का दुःख अनदेखा करने को नहीं कहते। राम की रुचि, धर्म और सत्य के साथ लोगों का प्रेम भी समझा जाए। इसी निवेदन पर उनकी बात यहाँ पूरी होती है। सभा की ओर से कोई अगला उत्तर अभी हमारे सामने नहीं आया है।

भरत बड़ों को अपना हितैषी मानकर शिक्षा माँगते हैं। वे मौन और वाणी, स्वार्थ और सेवाधर्म, प्रेम और भूल की दुविधा कहते हैं। अन्त में प्रार्थना करते हैं कि राम की रुचि, धर्म और सत्यव्रत रखते हुए सबकी सम्मति और सबके हित का उपाय किया जाए।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में सीता और भरत के दो संकोच हमें देर तक याद रह सकते हैं। सीता माता-पिता के पास रात रहने में सेवा छूटने का ध्यान करती हैं। भरत अपनी बात कहने में राम की रुचि पर आग्रह पड़ने की आशंका देखते हैं। दोनों अपने निकट सम्बन्धों के भीतर कर्तव्य को सँभाल रहे हैं। एक की बात माँ मौन से समझती हैं; दूसरा अपनी दुविधा बड़ों के सामने खोलता है। प्रेम के इन दोनों रूपों में दूसरे की आवश्यकता का ध्यान बना रहता है।

जनक का विचार भी उनके अपने भीतर लौटता है। जिनके ज्ञान और धैर्य पर वसिष्ठ भरोसा करते हैं, वही दशरथ के प्रेम को याद करके अपने विराग को जाँचते हैं। हम उन्हें केवल दूसरों को सलाह देनेवाले राजा के रूप में नहीं देखते। वे अपने निर्णय के सम्भावित गर्व तक से प्रश्न करते हैं। फिर समय पहचानकर धीरज धरते हैं और भरत के पास जाते हैं। अपने भीतर की कठिनाई को समझना और उसके बीच आवश्यक काम करना, दोनों उनके आचरण में साथ उपस्थित हैं।

और भरत की अन्तिम बात में सबके लिये जगह बनी रहती है। वे राम का सत्य बचाना चाहते हैं, बड़ों का सम्मान रखते हैं और सभी के प्रेम की पहचान माँगते हैं। हम जब अपनी चाह किसी प्रियजन के सामने रखते हैं, तो क्या उसकी रुचि और उसकी प्रतिज्ञा के लिये भी उतनी ही जगह छोड़ पाते हैं? भरत की विनती यह प्रश्न शान्ति से हमारे पास रख देती है। उत्तर देने की जल्दी से पहले प्रिय का मन समझने का उनका आग्रह सुनाई देता रहता है।

रात में जनक ने कहा था कि भरत मन से भी राम की आज्ञा नहीं टालेंगे। अगली सुबह भरत के अपने शब्द उसी विश्वास का रूप दिखाते हैं। उनके सामने पूछने का अवसर है, और वे राम की रुचि, धर्म तथा सत्यव्रत की रक्षा माँगते हैं। जनक की समझ और भरत की विनती के बीच यह सम्बन्ध पूरा होता है।

फिर भी परामर्श अभी खुला है। सबका प्रेम पहचानकर, सबकी सम्मति से, सबके हित का काम हो, यही भरत का अन्तिम निवेदन है। हम इसी विनती पर ठहरते हैं, जहाँ अपनी बात कहते हुए भी वे निर्णय बड़ों को सौंपते हैं और राम का मन सबसे पहले रखने को कहते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २८७ से २९३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

English