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देवताओं की प्रार्थना और मन्थरा की चाल

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · देवताओं की प्रार्थना और मन्थरा की चाल

देवताओं की प्रार्थना और मन्थरा की चाल

अयोध्या कल के अभिषेक की बाट देखती है। देवता सरस्वती को मनाते हैं, और मन्थरा कैकेयी के रामप्रेम के सामने भय की एक के बाद एक बात रखती जाती है।

अयोध्या में बाजे बज रहे हैं और लोगों की बातचीत कल पर अटकी हुई है। राम सीता सहित सोने के सिंहासन पर बैठेंगे। भरत भी आ जायँ तो उनकी आँखें इस उत्सव का सुख पा लें। नगर की अभिलाषा में भाइयों का साथ और परिवार का आनन्द समाया है। उसी आनन्द को देखकर देवताओं को अपना काम बिगड़ता दिखाई देता है। वे चाहते हैं कि राम राज्य छोड़कर वन को जायँ। उत्सव के बीच इस विपरीत इच्छा से तुलसीदास का यह प्रसंग खुलता है।

फिर बात कैकेयी तक पहुँचती है। राम के अभिषेक का समाचार सुनकर वे प्रसन्न होती हैं, समाचार लानेवाली को मनचाहा उपहार देना चाहती हैं और राम को अपने प्राणों से बढ़कर प्रिय कहती हैं। मन्थरा को इसी प्रेम के सामने अपनी बात मनवानी है। वह पहले चुप रहती है, फिर रोती है, उलाहना देती है, हितैषी होने का दावा करती है और भविष्य के दुःख गिनाती है। उसकी हर अगली बात रानी के किसी पिछले उत्तर को पकड़ती है। अन्त तक वही रानी उसके कहे पर पति और पुत्र को भी छोड़ देने को तैयार हो जाती हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • सरस्वती देवताओं की विनती से संकोच में पड़नेवाली देवी, जो आगे के कार्य का विचार कर मन्थरा की बुद्धि फेरती हैं।
  • मन्थरा कैकेयी की दासी, जो राम के अभिषेक का समाचार सुनकर उसे बिगाड़ने की युक्ति सोचती है।
  • कैकेयी भरत की माता, जिनका राम के प्रति स्नेह मन्थरा के बारम्बार उभारे हुए भय से घिर जाता है।
  • राम और सीता जिन्हें एक साथ सिंहासन पर देखने की नगरवासियों की अभिलाषा है।
  • दशरथ अयोध्या के राजा, जिनके पास कैकेयी के दो वरदान धरोहर हैं।
  • भरत परदेश में रहनेवाले पुत्र, जिनके लौटने की नगरवासी कामना करते हैं और जिनके नाम पर मन्थरा रानी को डराती है।
  • कौसल्या राम की माता, जिन पर मन्थरा छल और षड्यन्त्र के आरोप लगाती है।
  • लक्ष्मण और शत्रुघ्न राम और भरत के साथ जिनकी कुशल कैकेयी पूछती हैं।

नगर को कल की प्रतीक्षा है

बहुत प्रकार के वाद्य बजते हैं। नगर का प्रमोद इतना अधिक है कि तुलसी उसका पूरा बखान कर सकने से हाथ खींच लेते हैं। इस सामूहिक हर्ष में भरत के लिये भी एक मंगलकामना उठती है। लोग चाहते हैं कि वे शीघ्र आ जायँ और नेत्रों का फल पायँ। पोद्दारजी की टीका इस फल को राज्याभिषेक का उत्सव देखने से जोड़ती है। भरत के आने की प्रार्थना बताती है कि राम के राजतिलक का आनन्द लोग उनसे भी बाँटना चाहते हैं।

बाजार हो या रास्ता, घर हो या गली, चबूतरे पर बैठे स्त्री पुरुष हों, बात एक ही चल रही है। कल का शुभ मुहूर्त कब आयेगा। विधाता कब मन की अभिलाषा पूरी करेंगे। जिस दृश्य की बाट है, वह बहुत स्पष्ट है: सुवर्ण का सिंहासन और उस पर सीता सहित राम। आनेवाले कल के लिये किसी निश्चित घड़ी का हिसाब यहाँ नहीं दिया जाता। लोगों के प्रश्न में प्रतीक्षा का अधैर्य है। उन्हें लग रहा है कि कल आने में अभी देर है।

इसी के साथ कथा दूसरी ओर मुड़ती है। नगरवासी कल को बुलाते हैं और देवता विघ्न चाहते हैं। तुलसी उन्हें कुचाली कहते हैं। अवध के बधावे उन्हें वैसे अखरते हैं जैसे चोर को चाँदनी रात। उजाला सबके लिये एक है, पर चोर का काम उस उजाले में रुकता है। इस उपमा में देवताओं का स्वार्थ खुलकर सामने आ जाता है। जिस उत्सव को हम अभी नगर के आनन्द की तरह देख रहे थे, उसे वे अपनी विपत्ति समझकर सरस्वती के पास ले जाते हैं।

बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।
रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु॥ ११॥

दोहा ११

देवता सरस्वती को माता कहकर पुकारते हैं, उनके चरण पकड़ते हैं और बार बार गिरकर विनय करते हैं। माँग साफ़ है। आज ऐसा हो कि राम राज्य त्यागकर वन को चले जायँ और देवताओं का सारा कार्य सिद्ध हो। उनके वचन में अपनी बड़ी विपत्ति का उल्लेख है। अयोध्या के लिये जिस दिन के आने की इतनी चाह है, उसी दिन को टालने के लिये यह प्रार्थना हो रही है। सरस्वती को दोनों ओर की बात सुनाई पड़ती है, और विनय सुनते ही उनके भीतर खेद उठता है।

नगर राम और सीता को सिंहासन पर देखना चाहता है तथा भरत के लौटने की कामना करता है। देवता उसी अभिषेक में विघ्न के लिये सरस्वती के चरण पकड़ते हैं। उनकी माँग है कि राम राज्य छोड़कर वन जायँ और देवकार्य पूरा हो।

सरस्वती का संकोच और आगे का विचार

सरस्वती खड़ी खड़ी पछताती हैं। अपने लिये उनके मन में जो उपमा आती है, वह कमलवन को ठिठुरा देनेवाली हेमन्त की रात है। अयोध्या का यह आनन्द उनके सामने खिलते हुए कमलों का वन है, और उनसे ऐसा काम माँगा गया है जो उस पर शीत बनकर पड़ेगा। देवी का खेद कथा में पूरा स्थान पाता है। वे विनती सुनते ही उत्साह से नहीं चल देतीं। पहले उस विपत्ति का अनुभव करती हैं जो उनके जाने से नगर पर आयेगी।

उन्हें इस दशा में देखकर देवता फिर निवेदन करते हैं। वे कहते हैं कि माता को तनिक भी दोष नहीं लगेगा। राम के प्रभाव को सरस्वती स्वयं जानती हैं, रघुनाथ विषाद और हर्ष से रहित हैं। जीव अपने कर्मों के वश सुख और दुःख का भागी होता है। इन्हीं बातों के आधार पर देवता उन्हें अपने हित के लिये अयोध्या जाने को कहते हैं। राम का स्वरूप और जीव का कर्मबन्धन यहाँ देवताओं की विनती के भीतर आते हैं। अपनी इच्छा के लिये वे इन्हीं तत्त्वों का सहारा ले रहे हैं।

बार बार गहि चरन सँकोची । चली बिचारि बिबुध मति पोची॥
ऊँच निवासु नीचि करतूती । देखि न सकहिं पराइ बिभूती॥

चौपाई १

बार बार चरण पकड़े जाने से देवी संकोच में पड़ती हैं और चलती हैं। चलते समय देवताओं के विषय में उनका विचार कठोर है: निवास ऊँचा है और करनी नीची। दूसरे का ऐश्वर्य देखा नहीं जाता। सरस्वती उनके आग्रह के पीछे का ओछापन पहचान रही हैं। विनय की मुद्रा उस पहचान को मिटा नहीं देती। चरण पकड़नेवालों की बात मान ली गयी है, फिर भी उनके आचरण के विषय में देवी का निर्णय अपनी जगह बना रहता है। तुलसी हमें वह भी सुनाते हैं।

इसके बाद सरस्वती आगे के कार्य का विचार करती हैं। पोद्दारजी की टीका इसे खोलती है: राम के वन जाने से राक्षसों का वध होगा और संसार सुखी होगा। वनवास के चरित्रों का वर्णन करने के लिये चतुर कवि भी सरस्वती की कामना करेंगे। अब इस भावी कार्य को सोचकर देवी के हृदय में हर्ष आता है और वे दशरथ की पुरी पहुँचती हैं। उनके मन में आगे के कल्याण की ओर दृष्टि है, जबकि अयोध्या में उनके आगमन का चित्र दुःसह दुःख देनेवाली ग्रहदशा जैसा है।

इन दोनों बातों को साथ रहने दीजिये। कमलवन के लिये शीतरात्रि होने का पछतावा, देवताओं की ओछी बुद्धि का विचार, आगे के कार्य का स्मरण और अयोध्या में दुःखद ग्रहदशा जैसा आगमन, एक के बाद एक आते हैं। देवी के मन की दिशा बदलती है, पर नगर पर पड़नेवाली छाया हलकी नहीं होती। जिस उत्सव को आरम्भ में हमने सुना था, अब उसके भीतर बाधा पहुँचने को है। यह बाधा एक व्यक्ति की बुद्धि में काम करेगी।

नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि।
अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि॥ १२॥

दोहा १२

कैकेयी की दासी का नाम मन्थरा है। तुलसी उसे मन्दमति कहकर परिचित कराते हैं। सरस्वती उसकी बुद्धि फेरती हैं, उसे अपयश की पिटारी बनाती हैं और चली जाती हैं। यहाँ देवी का काम और मन्थरा पर आनेवाला अपयश दोनों कहे गये हैं। आगे दासी जो बोलती और गढ़ती है, उसके पहले यह दैवी हस्तक्षेप घट चुका है। नगर के उल्लास से शुरू हुई कथा इस दोहे पर आकर एक दासी की मति में प्रवेश कर जाती है।

सरस्वती पहले पछताती हैं और देवताओं के स्वार्थ को पहचानती हैं। फिर आगे के कार्य और कवियों की कामना का विचार कर अयोध्या आती हैं। वे मन्थरा की बुद्धि फेरकर उसे अपयश की पिटारी बना जाती हैं।

पहले चुप्पी, फिर कुशल का प्रश्न

मन्थरा नगर को सजा हुआ देखती है। सुन्दर मंगलमय बधावे बज रहे हैं। वह लोगों से पूछती है कि यह कैसा उत्सव है, और राम के राजतिलक का समाचार सुनते ही उसका हृदय जल उठता है। वही समाचार, जिसकी नगर को इतनी प्रतीक्षा है, उसके लिये दाह बन जाता है। अब वह सोचती है कि रात ही रात में इस काम को किस प्रकार बिगाड़ा जा सके। उसकी चेष्टा को समझाने के लिये तुलसी शहद के छत्ते पर घात लगाती वनवासी शिकारिन का चित्र रखते हैं।

कवि की उस उपमा में छत्ता देखकर उसे उखाड़ लेने की युक्ति सोची जाती है। मन्थरा भी उत्सव की सजावट देख चुकी है और उसी को बिगाड़ने का ढंग खोजती है। तुलसी उसे दुर्बुद्धि और नीच जाति की दासी कहते हैं तथा उसकी घात को कुटिल भीलनी की घात से जोड़ते हैं। कवि के इन कठोर शब्दों के साथ कथा की क्रिया सामने है: शुभ समाचार मिला और उसे नष्ट करने की योजना बनने लगी। उस योजना का पहला दृश्य किसी बहस से नहीं खुलता। मन्थरा कैकेयी के पास उदास होकर जाती है।

रानी हँसकर पूछती हैं कि यह उदासी कैसी है। उत्तर नहीं मिलता। दासी लम्बी साँस लेती है और आँसू बहाती है। कैकेयी अभी इसे घर की कोई छोटी बात समझ रही हैं। वे हँसते हुए उसकी बढ़ बढ़कर बोलने की आदत का उल्लेख करती हैं और कहती हैं कि शायद लक्ष्मण ने कुछ सीख दी होगी। यह रानी का अनुमान है। मन्थरा फिर भी नहीं बोलती। उसकी लम्बी साँसों को तुलसी काली नागिन की फुँफकार जैसी बनाकर दिखाते हैं।

सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।
लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु॥ १३॥

दोहा १३

चुप्पी बनी रहती है तो रानी डर जाती हैं। वे राजा और राम की कुशल पूछती हैं, फिर लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की। अभी उनके प्रश्न में सबके लिये एक ही चिन्ता है। यह सुनकर मन्थरा के हृदय में पीड़ा उठती है। अब वह बोलती है कि उसे कौन सीख देगा और किसके बल पर वह बढ़कर बोलेगी। फिर कुशल के प्रश्न को मोड़ देती है: आज राम के सिवा और किसकी कुशल है, जिन्हें राजा युवराज बना रहे हैं।

मन्थरा कहती है कि कौसल्या के लिये विधाता बहुत अनुकूल हो गये हैं और उनके हृदय में गर्व नहीं समाता। वह कैकेयी को स्वयं सजावट देखने भेजना चाहती है, जिसे देखकर उसका अपना मन खिन्न हुआ है। फिर आरोप राजा की ओर जाता है। पुत्र परदेश में हैं, रानी को चिन्ता नहीं, वे स्वामी को अपने वश में समझती हैं और सुख की शय्या पर सोना प्रिय मानती हैं। राजा की कपटभरी चतुराई न पहचानने का उलाहना भी मन्थरा ही देती है।

कैकेयी उसके प्रिय बननेवाले शब्दों के भीतर मन की मैल पहचान लेती हैं। वे डाँटकर उसे चुप कराती हैं, घर में फूट डालनेवाली कहती हैं और दोबारा ऐसी बात कहने पर जीभ निकलवा देने की धमकी देती हैं। फिर मुसकराकर शारीरिक भिन्नताओं, स्त्रियों और विशेषतः दासी के विषय में कुटिलता से जुड़े कठोर कथन करती हैं। दोहे में वे रानी के शब्द हैं, और इस समय मन्थरा के प्रति उनकी अवमानना का हिस्सा हैं। राम के अभिषेक को अहित बताने की पहली कोशिश कैकेयी की इस डाँट से टकराती है।

मन्थरा आँसू और चुप्पी से रानी को चिन्तित करती है, फिर राम के अभिषेक को दूसरों की अकुशलता बताती है। कौसल्या और राजा पर उसके आरोप सुनकर कैकेयी उसे फूट डालने के लिये डाँटती हैं।

राम प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं

डाँट के बाद कैकेयी का स्वर फिर सहज होता है। वे मन्थरा को प्रिय बोलनेवाली कहकर समझाती हैं कि इतना कहना शिक्षा के लिये था, स्वप्न में भी उसके प्रति क्रोध नहीं है। जिस दिन राम के अभिषेक का समाचार सच होगा, वही सुन्दर और मंगल देनेवाला दिन होगा। मन्थरा ने जिस समाचार को सुनाकर दुःख जगाना चाहा था, रानी उसी को शुभ कहती हैं। उनके लिये अभी राजा के निर्णय और अपने सुख के बीच कोई विरोध पैदा नहीं हुआ है।

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई । यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली । देउँ मागु मन भावत आली॥

चौपाई २

कैकेयी सूर्यवंश की रीति बताती हैं। बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है। उन्हें इस परम्परा में सुहावनापन दिखाई देता है। कल राम का तिलक होने की बात यदि सच है तो मन्थरा मन को अच्छी लगनेवाली कोई वस्तु माँग ले, रानी उसे देंगी। सम्बोधन अब सखी का है। सूचना लानेवाली दासी को वे उपहार का अधिकार देती हैं। इस उत्तर में न भरत के लिये असन्तोष है, न राम के आगे आने से अपना मान घटने की आशंका।

फिर कैकेयी राम के व्यवहार को सामने रखती हैं। राम को सब माताएँ सहज स्वभाव से कौसल्या के समान प्यारी हैं। अपने ऊपर तो रानी उनका विशेष स्नेह बताती हैं। वे केवल किसी सुनी हुई प्रशंसा का सहारा नहीं लेतीं, कहती हैं कि प्रेम की परीक्षा करके देख चुकी हैं। मन्थरा ने कौसल्या के बढ़ते सौभाग्य की बात की थी। कैकेयी का उत्तर राम के उस स्वभाव पर है जिसमें सब माताओं का स्थान स्नेह से भरा हुआ है। कौसल्या का नाम उनके वचन में समान प्रेम का आधार बनता है।

जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू । होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥
प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें । तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें॥

चौपाई ३

और उस प्रेम की अगली अभिलाषा सुनिये। विधाता दया करके फिर जन्म दें तो राम पुत्र हों और सीता बहू हों। नगरवासी राम और सीता को एक साथ सिंहासन पर देखना चाहते थे। कैकेयी उसी जोड़ी को अपने घर के सम्बन्ध में अगले जन्म के लिये माँग रही हैं। वे राम को प्राणों से भी अधिक प्रिय कहती हैं। तभी मन्थरा से पूछती हैं कि उनके तिलक पर इतना क्षोभ क्यों है। रानी की अपनी प्रीति उन्हें दासी के शोक का कारण समझने नहीं देती।

भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।
हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ॥ १५॥

दोहा १५

अब कैकेयी भरत की सौगन्ध दिलाती हैं। छल और छिपाव छोड़कर सच्चा कारण कहने को कहती हैं। उनका प्रश्न अभी भी यही है कि हर्ष के समय यह विषाद क्यों हो रहा है। भरत का नाम यहाँ सत्य खुलवाने के लिये आता है। राम के प्रति अपना प्रेम कह चुकने के बाद रानी भरत की सौगन्ध से मन्थरा की बात बाँधती हैं। वे उसके मन का दुःख जानना चाहती हैं। इसी आग्रह में मन्थरा को फिर बोलने का अवसर मिलता है।

कैकेयी राम के अभिषेक को मंगल मानती हैं, मन्थरा को उपहार देना चाहती हैं और राम का परीक्षित स्नेह याद करती हैं। वे अगले जन्म में राम को पुत्र तथा सीता को बहू पाने की इच्छा कहकर भरत की सौगन्ध से मन्थरा के विषाद का कारण पूछती हैं।

कड़वा हित कहने का दावा

मन्थरा सीधा कारण बताने से पहले अपने अपमान का हिसाब खोलती है। कहती है कि एक बार बोलने में ही सारी आशाएँ पूरी हो गयीं, अब कुछ कहना हुआ तो दूसरी जीभ लगाकर कहना पड़ेगा। कैकेयी की जीभ निकलवाने की धमकी उसी चित्र में लौटा दी गयी है। दासी अपने अभागे कपाल को फोड़ने योग्य कहती है, क्योंकि भली बात कहने पर भी रानी को दुःख हुआ। अपने पहले आरोपों को वह इस प्रकार रानी का हित कहकर फिर सामने रखती है।

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई । ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥
हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती । नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥

चौपाई ४

फिर वह दूसरों और अपनी बात का भेद बनाती है। जो झूठी सच्ची बातें गढ़कर कहते हैं, वे रानी को प्रिय लगते हैं; उसकी अपनी बात कड़वी लगती है। अब वह भी मुँहदेखी बात कहा करेगी, या दिन रात चुप रहेगी। रानी पहले उसका मौन तुड़वाने में लगी थीं। मन्थरा अब फिर मौन हो जाने की बात उठाती है और अपने बोलने को ऐसा उपकार दिखाती है जिसे स्वीकार करने में रानी ने भूल की हो। सुनने का आग्रह कैकेयी की ओर से और बढ़ने को जगह पाता है।

इसके साथ दासी अपने रूप और पराधीनता की दुहाई देती है। उसका कहना है कि विधाता ने कुरूप बनाकर परवश कर दिया, जो बोया है वही काटती है और जैसा दिया है वैसा पाती है। कोई भी राजा बने तो उसकी क्या हानि होगी, दासी का पद छोड़कर वह रानी तो बनने से रही। यह बात उसके निष्पक्ष होने के दावे का हिस्सा है। राज्य बदलने से उसे कोई लाभ हानि नहीं, ऐसा कहकर वह अपने हस्तक्षेप को केवल स्वामिनी की चिन्ता से उपजा हुआ बताती है।

मन्थरा अपने स्वभाव को जलाने योग्य कहती है, क्योंकि कैकेयी का अहित उससे देखा नहीं जाता। इसी से उसने कुछ बात चलायी, किन्तु बड़ी भूल हुई, देवी क्षमा करें। यह क्षमा माँगना उसके पहले शब्दों को वापस नहीं लेता। राजा और कौसल्या पर लगाये गये आरोप अपनी जगह छोड़कर वह अब केवल अपने कथन की कीमत बता रही है। रानी के लिये चिंता, अपनी परवश दशा और कटु सत्य कहने की दुहाई एक ही विनती में इकट्ठी हो जाती है।

गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।
सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि॥ १६॥

दोहा १६

इस दोहे पर विश्वास की दिशा बदल जाती है। तुलसी इन प्रिय वचनों में गूढ़ कपट बताते हैं। रानी की बुद्धि को अस्थिर कहते हुए वे देवताओं की माया का वश भी साथ रखते हैं। कैकेयी बैरिन को सुहृद मानकर विश्वास करती हैं। कथा में मन्थरा के कहे की मिठास और उसका छिपा हुआ छल हमें एक साथ दिखते हैं। रानी के लिये इस समय बोलनेवाली अहैतुक हित चाहनेवाली बन गयी है। पहले जिस मुख को उन्होंने घर में फूट डालनेवाला कहा था, अब उसी पर भरोसा बैठता है।

मन्थरा अपमान, कटु सत्य, अपनी परवशता और रानी के प्रति चिन्ता की दुहाई देती है। तुलसी इन वचनों को कपटभरा कहते हैं। देवमाया के वश और अस्थिर बुद्धि से कैकेयी बैरिन को हितैषी मानने लगती हैं।

बीते प्रेम के सामने आनेवाले भय

कैकेयी अब आदर से बार बार पूछती हैं। तुलसी उन्हें भीलनी के गीत से मोहित हिरनी के समान दिखाते हैं। जैसी होनहार है, वैसी बुद्धि फिर गयी है। अपना दाँव लगा देखकर मन्थरा हर्षित होती है। फिर भी बोलते समय भय की मुद्रा रखती है। कहती है कि रानी पूछ तो रही हैं, पर वह कहने से डरती है, क्योंकि उसका नाम पहले ही घरफोड़ी रख दिया गया। वह कई तरह से बातें गढ़कर विश्वास जमाती है। कवि उसे अयोध्या की साढ़साती कहते हैं। पोद्दारजी की टीका इसमें शनि की साढ़े सात वर्ष की दशा की उपमा खोलती है।

अब मन्थरा रानी के प्रेम को आरम्भ से झूठा नहीं कहती। मान लेती है कि कैकेयी को सीता और राम प्रिय हैं तथा राम को कैकेयी प्रिय हैं। फिर उसमें समय का भेद डालती है: यह बात पहले थी, वे दिन बीत गये। समय फिरने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं। रानी ने अपने अनुभव का जो दृढ़ आधार रखा था, मन्थरा उसी अनुभव को पुराना ठहराती है। प्रेम हुआ करता था, यह मानकर वह आगे के लिये उसके भरोसे को ढीला करती है।

भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ सोइ छारा॥
जरि तुम्हरि चह सवति उखारी । रूँधहु करि उपाउ बर बारी॥

चौपाई ५

सूर्य कमलों का पोषण करता है, पर जल न रहे तो वही उन्हें जलाकर भस्म कर देता है। मन्थरा इस उपमा से समझाती है कि एक ही सम्बन्ध बदलती दशा में विपरीत फल दे सकता है। फिर आरोप जोड़ती है कि सौत कौसल्या कैकेयी की जड़ उखाड़ना चाहती हैं। इसलिये उपाय की अच्छी बाड़ लगाकर अपनी रक्षा कीजिये। कमल और जल की बात से जो डर उठाया गया, उसे वह तुरन्त घर के सम्बन्धों में रख देती है। कौसल्या की इच्छा के विषय में यह मन्थरा का दावा है।

वह कैकेयी के सुहाग के भरोसे पर भी चोट करती है। रानी राजा को अपने वश में मानकर निश्चिन्त हैं, जबकि मन्थरा उन्हें मन का मैला और मुख का मीठा बताती है। साथ ही कैकेयी के सीधे स्वभाव की प्रशंसा करती है। इस तरह पति के प्रति सन्देह और अपने लिये सरल होने का सुख एक साथ रानी के सामने रखती है। अभी पहले वही दासी सुख की शय्या पर पड़े रहने का उलाहना दे रही थी। अब सीधापन बताकर उनका विश्वास बढ़ाती है।

आगे मन्थरा कौसल्या को चतुर और गम्भीर बताकर कहती है कि उन्होंने अवसर पाकर अपना काम बना लिया। उसके अनुसार भरत को ननिहाल भेजने में राम की माता की सलाह थी। वह कौसल्या के मन का कथित विचार भी सुनाती है: अन्य सौतें सेवा करती हैं, केवल भरत की माता पति के बल पर गर्व करती हैं। फिर कहती है कि इसी से कैकेयी कौसल्या को खटकती हैं, पर कपट में चतुर होने के कारण कौसल्या अपने भीतर का भाव प्रकट नहीं होने देतीं।

ये सब बातें मन्थरा रानी को सुना रही है। वह आगे आरोप लगाती है कि राजा का कैकेयी के प्रति विशेष प्रेम कौसल्या से देखा नहीं जाता, इसीलिये उन्होंने जाल रचकर राजा को वश में किया और राम के तिलक की लग्न निश्चय करायी। पोद्दारजी की टीका यहाँ मन्थरा के आरोप में भरत की अनुपस्थिति का आशय भी खोलती है। फिर दासी कहती है कि राम का तिलक कुल के अनुकूल है, सबको अच्छा लगता है और उसे तो बहुत ही प्रिय है। उसका भय, वह कहती है, आगे की बात से है।

रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।
कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु॥ १८॥

दोहा १८

मन्थरा चाहती है कि उस आशंकित बुराई का फल उलटकर कौसल्या को मिले। तुलसी उसकी इस समझाइश को कपट का प्रबोध कहते हैं। वह करोड़ों कुटिल बातें रचती है और सौतों की सैकड़ों कहानियाँ इस ढंग से कहती है कि विरोध बढ़े। उन कथाओं का विस्तार यहाँ नहीं खुलता। उनके कहने का असर और प्रयोजन बताया जाता है। पुराने प्रेम की याद सुनकर शुरू हुई यह चाल अब कैकेयी के सामने अपने ही घर को शत्रुता की जगह बनाकर रख रही है।

मन्थरा पुराने प्रेम को स्वीकार कर भविष्य में शत्रुता का भय जगाती है। सूर्य और कमल की उपमा, राजा की मिठास पर सन्देह, कौसल्या पर षड्यन्त्र के आरोप और सौतों की अनेक कथाओं से वह रानी का विरोध बढ़ाती है।

पखवाड़े का दावा और भरत के बन्दी होने का डर

होनहार के वश कैकेयी के हृदय में मन्थरा की बात बैठ जाती है। वे फिर सौगन्ध देकर पूछती हैं। इस बार दासी उत्तर में उलाहना देती है कि अभी तक समझा ही नहीं, अपने हित और अहित को तो पशु भी पहचान लेते हैं। पहले जिस रानी ने उसके बोलने पर रोक लगायी थी, अब उसी रानी को वह समझ की कमी बताती है। प्रश्न करने का अधिकार कैकेयी के पास है, पर प्रश्न का अर्थ और उत्तर की दिशा मन्थरा तय करने लगी है।

अब वह एक अवधि बताती है। उसका दावा है कि तैयारी होते पूरा पखवाड़ा बीत गया और रानी को आज उससे खबर मिली है। यह पखवाड़े की बात कैकेयी को अलग रखे जाने का डर दिखाने के लिये कही जा रही है। मन्थरा यह भी कहती है कि वह उन्हीं के राज में खाती पहनती है, इसलिये सच कहने में उसका दोष नहीं। अपने आश्रय का सम्बन्ध फिर गिनाकर वह कथन को कर्तव्य का रूप देती है। बात के साथ बोलनेवाली की वफादारी का दावा जुड़ा रहता है।

दासी विधाता के दण्ड की दुहाई भी देती है। यदि कुछ गढ़कर झूठ कहा हो तो विधाता उसे सजा दें। ऐसी सौगन्ध के तुरन्त बाद वह कल के तिलक को रानी के लिये विपत्ति का बीज बताती है। नगर जिस कल को अपनी अभिलाषा की पूर्ति मानता है, उसी कल को मन्थरा कैकेयी के अनर्थ का आरम्भ कहती है। अब किसी प्रेम के धीरे बदलने की बात नहीं, अभिषेक होते ही विपत्ति बो दिये जाने की बात है।

अपने कथन को और पक्का दिखाने के लिये मन्थरा लकीर खींचकर बोलने का दावा करती है। कैकेयी को दूध की मक्खी कहती है। टीका उस उपमा का आशय घर से निकाल फेंके जाने की धमकी बताती है। दासी के अनुसार पुत्र सहित सेवा की जाये तो घर में रहना सम्भव होगा, अन्य कोई उपाय नहीं। पोद्दारजी की टीका सेवा का लक्ष्य कौसल्या बताती है। रानी को अब अपने मान के साथ पुत्र का मान भी संकट में दिखाई देने के लिये रखा जाता है।

कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।
भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब॥ १९॥

दोहा १९

मन्थरा कद्रू और विनता का नाम लेकर कहती है कि जैसे कद्रू ने विनता को दुःख दिया, वैसे कौसल्या कैकेयी को देंगी। इसी तुलना के साथ वह भरत के कारागार में होने और लक्ष्मण के राम के नायब बनने की बात कहती है। ये मन्थरा की डरावनी भविष्यवाणियाँ हैं। कैकेयी के सामने कौसल्या की कोई ऐसी घोषणा नहीं हुई है। दोहे में बोलनेवाली दासी ही अपने आरोपों को उस पुराने उदाहरण और दोनों भाइयों की विपरीत स्थितियों से बल देती है।

मन्थरा तैयारी के पूरे पखवाड़े का दावा करती है, अपनी सच्चाई की सौगन्ध खाती है और रानी को घर से निकाले जाने का भय दिखाती है। कद्रू तथा विनता की तुलना के साथ वह भरत के बन्दी और लक्ष्मण के नायब होने की बात कहती है।

डर अब रानी के अपने शब्दों में है

कड़वे वचन सुनकर कैकेयी सहम जाती हैं। बोल नहीं पातीं, शरीर पर पसीना आ जाता है और केले के वृक्ष की तरह काँपती हैं। मन्थरा अपनी जीभ दाँतों के नीचे दबाती है। पोद्दारजी की टीका इस चेष्टा का कारण बताती है: दासी को डर हुआ कि भविष्य का इतना भयावह चित्र सुनकर कहीं रानी के हृदय की गति न रुक जाये और उसका सारा काम उलटा बिगड़ जाये। जिस भय को उसने स्वयं बढ़ाया है, अब उसकी तीव्रता देखकर उसे सँभालने लगती है।

वह फिर कपट की असंख्य कहानियाँ कहती है और रानी को धीरज रखने के लिये समझाती है। तुलसी कहते हैं कि कैकेयी का भाग्य फिर गया, उन्हें कुचाल प्रिय लगने लगी। वे बगुली को हंसिनी समझकर सराहती हैं। यह उपमा पहचान की भूल को स्पष्ट करती है। जो सामने है उसकी चाल और जो रानी उसे मान रही हैं, उनमें दूरी है। मन्थरा के अपने हितैषी होने के दावे को अब कैकेयी प्रशंसा से ग्रहण करती हैं।

इसके बाद रानी स्वयं मन्थरा की बात को सत्य कहती हैं। अपनी दाहिनी आँख के नित्य फड़कने का उल्लेख करती हैं। बताती हैं कि हर रात बुरे स्वप्न देखती हैं, पर अपने अज्ञानवश दासी से कहा नहीं। अभी तक मन्थरा रानी के लिये भविष्य के चित्र बना रही थी। अब कैकेयी अपनी अनुभव की हुई बातों को उसी भय के साथ जोड़ती हैं। आँख और स्वप्न उनके अपने कहे हुए हैं; उनसे मन्थरा का आरोप सच होने का निष्कर्ष रानी निकाल रही हैं।

अपनें चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।
केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह॥ २०॥

दोहा २०

वे सखी से अपना सीधा स्वभाव कहती हैं, दायाँ बायाँ कुछ न जानने की बात करती हैं। फिर दुःख से पूछती हैं कि जहाँ तक अपना वश रहा, आज तक किसी का अहित नहीं किया; किस पाप से दैव ने एक साथ इतना असह्य दुःख दिया। यह आत्मवृत्तान्त भी कैकेयी के मुख से आता है। दासी जिस संकट को आनेवाला बता रही थी, रानी उसे अपने ऊपर पड़ा दुःख मानकर विलाप कर रही हैं। भविष्य की आशंका उनके वर्तमान अनुभव को भर चुकी है।

कैकेयी कहती हैं कि चाहें नैहर जाकर जीवन बिता देंगी, किन्तु जीते जी सौत की सेवा नहीं करेंगी। उनके वचन और कड़े होते हैं: दैव जिसे शत्रु के वश में रखकर जीवित रखता है, उसके लिये उस जीवन से मरना अच्छा है। ये निराशा के वचन हैं। आरम्भ में सूर्यवंश की रीति को सुहावनी कहनेवाली रानी अब मन्थरा के दिखाये भविष्य को सौत की चाकरी समझकर अस्वीकार कर रही हैं। राम के व्यवहार की जो स्मृति उन्होंने कही थी, वह इस उत्तर में पीछे पड़ गयी है।

कैकेयी भय से काँपती हैं और मन्थरा उन्हें फिर छलभरी सान्त्वना देती है। रानी आँख फड़कने तथा बुरे स्वप्नों को उसकी बात से जोड़ती हैं, अपने निष्कपट आचरण का स्मरण करती हैं और सौत की सेवा से अच्छा नैहर में जीवन बिताना कहती हैं।

उपाय सुनने से पहले सब मान लेने का वचन

रानी अनेक प्रकार के दीन वचन कहती हैं। उन्हें सुनकर मन्थरा फिर अपना छल फैलाती है। वह पूछती है कि मन में ग्लानि मानकर ऐसी बात क्यों कही जा रही है, कैकेयी का सुख और सुहाग तो दिन दूना होगा। जिसने उनका अहित चाहा है, अन्त में वही उसका फल पायेगी। थोड़ी ही देर में दासी भय दिखाने से आशा बँधाने पर आ गयी है। दोनों ही स्थितियों में वह रानी को अपनी बात के भीतर रखती है।

मन्थरा अपनी चिन्ता का और प्रमाण देती है। कहती है कि जबसे यह बुरी सलाह सुनी है, दिन में भूख और रात में नींद नहीं आती। फिर ज्योतिषियों से पूछने का दावा करती है। उसके अनुसार उन्होंने रेखा खींचकर निश्चित कहा है कि भरत राजा होंगे। कथन में अब घर के व्यवहार का अनुमान और सौतों के उदाहरण ही नहीं, भविष्य जाननेवालों का कथित आश्वासन भी जुड़ जाता है। ज्योतिषियों का यह उत्तर हमें मन्थरा की वाणी से ही मिलता है।

वह कैकेयी से कहती है कि यदि रानी करें तो उपाय बताये। राजा उनकी सेवा के वश में हैं ही। राजा के बारे में पहले की बात याद कीजिये। कैकेयी उन्हें अपने वश में समझती थीं तो मन्थरा ने उसी भरोसे का उपहास किया था और पति को भीतर से कपटी बताया था। अब उपाय देने की बारी है तो रानी की सेवा का उन पर प्रभाव सामने रखती है। जिस सम्बन्ध में उसने अभी भय भरा, उसी में काम बन सकने का भरोसा लौटाती है।

परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।
कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि॥ २१॥

दोहा २१

कैकेयी का उत्तर दासी को पूरा अधिकार दे देता है। वे कहती हैं कि उसके कहने से कुएँ में गिर सकती हैं, पुत्र और पति को भी छोड़ सकती हैं। जब मन्थरा उनका बड़ा दुःख देखकर कुछ कह रही है तो अपने हित के लिये वैसा क्यों नहीं करेंगी। उपाय अभी खुला नहीं है। उससे पहले ही रानी उस पर चलने की अपनी तैयारी कह देती हैं। जिन पति और पुत्रों की कुशल उन्होंने घबराकर पूछी थी, अब हित की इस समझ के आगे उनके त्याग की बात तक कहती हैं।

कुबरीं करि कबुली कैकेई । कपट छुरी उर पाहन टेई॥
लखइ न रानि निकट दुखु कैसें । चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें॥

चौपाई ६

कैकेयी को सब प्रकार से कबूल कराकर मन्थरा अपने हृदय के पत्थर पर कपट की छुरी तेज करती है। रानी निकट के दुःख को नहीं देखतीं। तुलसी उन्हें हरी घास चरते बलिपशु की तरह दिखाते हैं। इस चित्र में अभी स्वाद और सामने का विनाश एक साथ हैं। मन्थरा की बातें सुनने में कोमल हैं और परिणाम में कठोर। अगली उपमा में मधु के भीतर विष घोला जाता है। मीठी आशा का असर तभी पूरा समझ आता है जब उसके साथ कवि का यह परिणाम भी सुनाई दे।

अब दासी स्वामिनी से पूछती है कि पहले कही हुई एक कथा याद है या नहीं। कैकेयी ने स्वयं कभी उसे वह बात बतायी थी। मन्थरा उसी स्मरण को आगे की युक्ति का आधार बनाती है। इतने आरोपों, सौगन्धों और सान्त्वना के बाद वह अन्ततः ऐसी वस्तु का नाम लेनेवाली है जो रानी के पास पहले से है। उससे पहले रानी की ओर से सब करने का वचन मिल चुका है।

मन्थरा सुख बढ़ने का भरोसा, अपनी भूख नींद खोने का दावा और भरत के राजा होने की ज्योतिषियों की कथित भविष्यवाणी सुनाती है। उपाय जाने बिना कैकेयी पति और पुत्र तक छोड़ने का वचन देती हैं। तुलसी इस स्वीकृति को छुरी, बलिपशु और मधु में विष की उपमाओं से दिखाते हैं।

राजा के पास रखी दो धरोहरें

दुइ बरदान भूप सन थाती । मागहु आजु जुड़ावहु छाती॥
सुतहि राजु रामहि बनबासू । देहु लेहु सब सवति हुलासू॥

चौपाई ७

मन्थरा याद दिलाती है कि राजा के पास कैकेयी के दो वरदान धरोहर रखे हैं। आज उन्हें माँगकर अपने हृदय का दाह शान्त किया जा सकता है। दोनों माँगें वह अलग अलग बताती है: पुत्र को राज्य और राम को वनवास। सौत का सारा आनन्द ले लेने को कहती है। शुरुआत में नगर की अभिलाषा राम और सीता को सिंहासन पर देखने की थी। अब दासी उसी अभिषेक के स्थान पर भरत का राज्य तथा राम का वनवास माँगने की सीख देती है।

उसकी युक्ति केवल माँगों के नाम तक सीमित नहीं है। माँगने से पहले राजा से राम की सौगन्ध ली जाये। जब वे वह सौगन्ध कर लें, तभी वरदान माँगे जायँ, जिससे वचन टल न सके। राम के प्रति राजा के सम्बन्ध को इस प्रकार उनकी प्रतिज्ञा बाँधने के लिये चुना जाता है। मन्थरा क्रम बहुत स्पष्ट रखती है: पहले सौगन्ध, उसके बाद वरदान। रानी ने जिस उपाय को बिना जाने मान लिया था, अब उसका बन्धन और उसका प्रयोजन दोनों उनके सामने खुलते हैं।

दासी समय की सीमा भी रखती है। आज की रात बीत गयी तो काम बिगड़ जायेगा। उसकी बात को हृदय से प्रिय मानना होगा। नगर भी कल की प्रतीक्षा कर रहा था; मन्थरा के लिये उसी कल से पहले सब बदल देना आवश्यक है। उसके पहले विचार में रात ही रात अभिषेक बिगाड़ने की चेष्टा थी। अब उस विचार के लिये साधन और वचन का क्रम मिल गये हैं, और वह सावधानी की अन्तिम सीख देती है।

बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।
काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु॥ २२॥

दोहा २२

तुलसी इस सलाह को बड़ी बुरी घात कहते हैं। मन्थरा कैकेयी को कोपभवन जाने का निर्देश देती है। सब काम सजग होकर बनाना है और सहसा विश्वास नहीं कर लेना है। पोद्दारजी की टीका इस अन्तिम सावधानी का लक्ष्य राजा को बताती है, उनकी बातों में न आ जाना। रानी के लिये तैयार किया गया उपाय यहाँ जाकर पूरा कहा जाता है। कोपभवन जाने की सीख अभी दासी के मुख से निकल रही है।

मन्थरा दो धरोहर वरदान याद दिलाकर भरत के लिये राज्य और राम के लिये वनवास माँगने को कहती है। पहले राजा से राम की सौगन्ध लेनी है और आज की रात बीतने से पहले काम बनाना है। अन्त में वह कोपभवन जाने तथा सजग रहने की सीख देती है।

और अन्त में, अपनी ओर

कैकेयी के पहले उत्तर को अन्त के पास फिर सुनिये। राम प्राणों से अधिक प्रिय थे, सीता को बहू पाने की कामना थी और उनके प्रेम की परीक्षा देखी हुई थी। मन्थरा ने इस स्मृति को एक ही बार में हटाया नहीं। पहले अपना अपमान कहा, फिर हित की दुहाई दी, फिर बीते दिनों और आनेवाले समय में भेद किया। उसके बाद घर से निकाले जाने और भरत के बन्दी होने का डर सुनाया। रानी की स्वीकृति इन वचनों के क्रम से बनती है, और तुलसी इसके साथ देवमाया तथा होनहार का विधान भी रखते हैं।

हम आरम्भ और अन्त में दो तरह के आग्रह सुनते हैं। देवता सरस्वती के चरण पकड़कर राम को वन भेजने की प्रार्थना करते हैं। अन्त में मन्थरा दो वरदानों से उसी दिशा का उपाय बताती है। बीच में सरस्वती का खेद, उनका आगे का विचार और कैकेयी का प्रेम अपनी पूरी आवाज़ रखते हैं। यही कारण है कि अन्त की सलाह सुनते समय हमें केवल उसका परिणाम नहीं दिखाई देता। वह स्नेह भी याद रहता है जिसे रानी ने इतने विश्वास से स्वयं कहा था।

नगर अभी उस कल की अभिलाषा लिये है जिसमें सीता सहित राम सुवर्ण के सिंहासन पर बैठेंगे। कैकेयी के सामने मन्थरा उसी कल को रोकने की युक्ति रख चुकी है। उसके अन्तिम वचन सावधानी से भरे हैं: कोपभवन में जाइये, सजग होकर सारा काम बनाइये, सहसा विश्वास मत कर लीजिये।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ११ से २२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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