रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · लक्ष्मण का आग्रह और सुमित्रा का आशीर्वाद
लक्ष्मण का आग्रह और सुमित्रा का आशीर्वाद
राम के साथ जाने की व्याकुल प्रार्थना, माता के सामने विदा का संकोच, और सेवा का वह आशीर्वाद जिसके बाद तीनों राजा के महल में पहुँचते हैं।
समाचार सुनते ही लक्ष्मण उठ दौड़ते हैं। मुख उदास है, शरीर काँप रहा है, आँखों में आँसू हैं। राम के चरण पकड़ लेने तक पहुँच गये हैं, पर जो कहना है वह मुँह से निकल नहीं रहा। वन जाने की बात उनके सामने एक और प्रश्न लेकर आयी है: राम उन्हें साथ ले चलेंगे या घर में रहने को कहेंगे। इस प्रश्न का उत्तर अभी मिला नहीं है, और लक्ष्मण के लिये सारे सुख का रहना या चुक जाना उसी उत्तर पर टिका हुआ है।
रामचरितमानस के इस प्रसंग में साथ चलने की अनुमति तक पहुँचने के लिये दो संवाद होते हैं। पहले राम अयोध्या में रह जाने का कारण समझाते हैं। फिर लक्ष्मण अपनी सारी आशा उनके चरणों में रख देते हैं। राम मानते हैं और माता से विदा लेने भेजते हैं। सुमित्रा के सामने पहुँचकर फिर संकोच घेर लेता है। माँ का स्नेह किस ओर जाएगा, रोकने की ओर या विदा देने की ओर, यह लक्ष्मण अभी नहीं जानते। हम उनकी व्याकुलता के साथ इन दोनों भेंटों से होकर चलेंगे और उस राजमहल तक पहुँचेंगे जहाँ सीता सहित दोनों पुत्र पिता के सामने आते हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम नीति और स्नेह से लक्ष्मण को माता पिता तथा अयोध्या की सेवा समझाते हैं, फिर उनका भय पहचानकर साथ चलने की अनुमति देते हैं।
- लक्ष्मण राम से अलग रह जाने की आशंका से व्याकुल छोटे भाई, जिनकी विनती का आधार राम के चरणों में एकनिष्ठ प्रेम है।
- सुमित्रा समाचार सुनकर सहम जानेवाली माता, जो धैर्य धारण करके पुत्र को सीता राम की सेवा का उपदेश और प्रेम का आशीर्वाद देती हैं।
- सीता जिन्हें सुमित्रा लक्ष्मण की माता कहती हैं और जिनके सुख की देखभाल वन में उनकी सेवा का अंग बनती है।
- राजा वृद्ध पिता, जिनका दुःख राम की चिन्ता में है और जो अन्त में सीता सहित दोनों पुत्रों को बार बार हृदय से लगाते हैं।
चरण पकड़ लिये, वाणी ठहर गयी
लक्ष्मण के आने में एकाएक उठी हुई व्याकुलता है। समाचार मिला और उसी समय वे दौड़ पड़े। तुलसी उनके शरीर की दशा को अलग अलग सामने रखते हैं: कम्पन, रोमांच, आँसुओं से भरे नेत्र। प्रेम का आवेग पूरे शरीर में दिखाई दे रहा है। राम के पास पहुँचते ही वे चरण पकड़ लेते हैं। अभी कोई निवेदन नहीं रखा गया, कोई अनुमति नहीं मिली, फिर भी यह पकड़ बता रही है कि लक्ष्मण किस सम्बन्ध को छूटने से बचाना चाहते हैं।
समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥
चौपाई १
कंप पुलक तन नयन सनीरा । गहे चरन अति प्रेम अधीरा॥
चरणों के पास आ जाने पर भी बोलना सम्भव नहीं होता। वे खड़े होकर राम को देखते रहते हैं। इस मौन के लिये तुलसी जल से निकाली हुई मछली की उपमा देते हैं। उस मछली की दीनता को समझने के लिये उसके सामने आनेवाले रास्ते गिनने की जरूरत नहीं पड़ती। जल छूटना ही उसके संकट का पूरा अर्थ है। लक्ष्मण के सामने राम हैं, फिर भी उनसे अलग रह जाने की आशंका उन्हें ऐसी ही निराश्रय दशा में पहुँचा रही है। जिस साथ के बिना जीना असम्भव जान पड़ता है, उसी के विषय में अभी निर्णय होना है।
भीतर विधाता से प्रश्न चल रहा है। अब क्या होनेवाला है, क्या हमारे सारे सुख और पुण्य समाप्त हो गये। इसके बाद चिन्ता और स्पष्ट होकर आती है: रघुनाथ क्या कहेंगे, भवन में रखेंगे या साथ ले चलेंगे। लक्ष्मण के लिये वन की कठिनाई का हिसाब यहाँ नहीं खुलता। उनका मन पहले इस आशंका में उलझा है कि कहीं राम की आज्ञा उन्हें घर में ही न रख दे। पाँव राम तक पहुँच चुके हैं, पर साथ चलने का मार्ग अभी राम के वचन से खुलना बाकी है।
राम भाई को देखते हैं। हाथ जुड़े हुए हैं और देह तथा घर से उनका नाता टूटा हुआ दिखाई देता है। इतना देखकर राम जो बोलते हैं, उसके पहले कवि उनका स्वभाव सामने रख देते हैं। वे नीति में निपुण हैं, शील, स्नेह, सरलता और सुख के समुद्र हैं। इसलिए आनेवाली सीख को उसी स्नेह के भीतर सुनना पड़ता है। राम लक्ष्मण से परिणाम में होनेवाले आनन्द को हृदय में समझने और प्रेम के वश होकर अधीर न होने को कहते हैं। पहले धीरज की बात रखी जाती है, फिर उस धीरज के साथ निभाये जानेवाले कर्तव्य की।
समाचार सुनकर लक्ष्मण व्याकुल होकर राम के चरण पकड़ लेते हैं। उनकी सबसे बड़ी चिन्ता साथ से वंचित रह जाने की है। राम उनका देह और घर से छूटा हुआ मन देखकर स्नेहपूर्वक धीरज की सीख देते हैं।
अयोध्या में रह जाने का आग्रह
राम की सीख माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा से आरम्भ होती है। जो लोग उनकी शिक्षा को स्वाभाविक भाव से सिर पर रखकर पालन करते हैं, राम उनके जन्म को सफल कहते हैं। इस शिक्षा का पालन न होने पर वे जगत में जन्म को व्यर्थ बताते हैं। इस वचन में पालन के साथ उसका ढंग भी रखा गया है। स्वभाव से सिर धरना, अर्थात् शिक्षा को अपने जीवन में आदर का स्थान देना। लक्ष्मण हाथ जोड़े सामने हैं; अब राम उन्हें बताते हैं कि इस समय उस आदर का व्यवहार कहाँ होना चाहिये।
मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ।
दोहा ७०
लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ॥ ७०॥
भाई से वे माता पिता के चरणों की सेवा करने को कहते हैं। कारण एक एक करके सामने रखते हैं। भरत और शत्रुघ्न घर में नहीं हैं। महाराज वृद्ध हैं और उनके मन में राम के जाने का दुःख है। इस दशा में लक्ष्मण भी साथ चले जाएँ तो पीछे सँभालनेवाला कौन रहेगा, राम की बात इसी चिन्ता से आगे बढ़ती है। वन की ओर जाने से पहले उनकी दृष्टि अयोध्या में रहनेवालों पर है। वे लक्ष्मण को जिस काम के लिये रोकना चाहते हैं, वह दुःख में पड़े माता पिता का सहारा होना है।
फिर बात घर से बाहर तक फैलती है। राम कहते हैं कि लक्ष्मण को साथ लेकर वन जाने पर अवध सभी प्रकार से अनाथ हो जाएगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार, सब पर दुःख का असह्य भार पड़ेगा। इन नामों को साथ रखने से राम का विचार पूरा खुलता है। किसी एक सम्बन्ध को सान्त्वना दे देना पर्याप्त नहीं होगा। घर के बड़े भी हैं, नगर के लोग भी हैं, और परिवार के दूसरे जन भी। लक्ष्मण की उपस्थिति से उन सबको सन्तोष मिल सकता है, इसलिए राम चाहते हैं कि वे वहीं रहें।
रहहु करहु सब कर परितोषू । नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥
चौपाई २
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी । सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥
प्रजा के दुःख पर आते ही वचन कठोर हो जाता है। जिसके राज्य में प्रिय प्रजा दुःखी रहती है, उस राजा को राम अवश्य नरक का अधिकारी कहते हैं। यहाँ राज्य का उत्तरदायित्व लोगों के सुख से बाँधा गया है। राम वन की ओर जानेवाले हैं, फिर भी प्रजा का दुःख उनके निर्णय में बना हुआ है। वे लक्ष्मण से कहते हैं कि सबको सन्तोष देते हुए रहें, अन्यथा बड़ा दोष होगा। छोटे भाई को रोकने के पीछे अपने से बिछुड़नेवाले नगर की यही चिन्ता है।
राम इस नीति पर विचार करके घर में रह जाने का आग्रह करते हैं। उनका पूरा तर्क लक्ष्मण सुनते हैं, और सुनते ही उनकी व्याकुलता बहुत बढ़ जाती है। तुलसी इन वचनों को शीतल कहते हैं। धीरज देनेवाली शिक्षा है, पर लक्ष्मण उस शिक्षा के स्पर्श से सूख गये हैं, जैसे पाला लगते ही कमल सूख जाए। उपमा में शीतलता के साथ उसका प्रभाव भी सुरक्षित है। जो वचन राम की ओर से सबको सँभालने के लिये आया, वही लक्ष्मण के लिये राम से अलग रह जाने की आज्ञा बनकर पहुँचा।
अब लक्ष्मण को केवल अपने मन का दुःख बताना पर्याप्त नहीं होगा। सामने ऐसी सीख है जिसमें माता पिता, गुरु, परिवार और प्रजा, सबका हित रखा गया है। वे इस सीख का आदर करते हैं, फिर भी उसे निभाने के लिये अपने भीतर आवश्यक धैर्य नहीं पाते। उनके उत्तर की कठिनाई यहीं है। राम की बात को अच्छा मानते हुए उन्हें यह कहना है कि राम के बिना रहने का भार उनसे उठ नहीं सकेगा।
राम माता पिता की सेवा के लिये लक्ष्मण को रोकते हैं। भरत और शत्रुघ्न की अनुपस्थिति, वृद्ध पिता का दुःख और गुरु, परिवार तथा प्रजा की दशा उनके विचार में है। यह नीति सुनकर लक्ष्मण पाले से छुए कमल की तरह म्लान हो जाते हैं।
सभी सम्बन्ध एक राम में
प्रेम के कारण उत्तर फिर अटक जाता है। लक्ष्मण व्याकुल होकर राम के चरण पकड़ लेते हैं। आने पर भी उन्होंने यही किया था, अब घर में रहने की बात सुनकर फिर उसी आश्रय को पकड़ते हैं। इस बार कुछ शब्द निकलते हैं। वे अपना दास होना और राम का स्वामी होना सामने रखते हैं। स्वामी छोड़ दें तो दास का क्या वश चलेगा। इस निवेदन में साथ चलने का आग्रह अत्यन्त प्रबल है, पर निर्णय का अधिकार वे राम के पास ही रखते हैं।
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।
दोहा ७१
नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ॥ ७१॥
लक्ष्मण स्वीकार करते हैं कि राम ने उन्हें बहुत अच्छी सीख दी है। कठिनाई अपनी बताते हैं: उनकी कायरता के कारण वह सीख उन्हें पहुँच से बाहर लगती है। शास्त्र और नीति के अधिकारी वे श्रेष्ठ पुरुष हैं जो धीर हों और धर्म की धुरी सँभाल सकें। लक्ष्मण अपने को उस धैर्य से सम्पन्न नहीं कहते। जिस अयोध्या को सान्त्वना देने का काम सौंपा जा रहा है, उसके लिये पहले अपने भीतर स्थिरता चाहिये। अभी उनके भीतर तो राम से छूट जाने का भय भरा हुआ है।
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला । मंदरु मेरु कि लेहिं मराला॥
चौपाई ३
गुर पितु मातु न जानउँ काहू । कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥
अपने को वे प्रभु के स्नेह में पला हुआ छोटा बच्चा कहते हैं। इसी के साथ हंस और पर्वत की उपमा आती है। क्या हंस मन्दराचल या सुमेरु को उठा सकते हैं। राम की बतायी जिम्मेदारी का भार लक्ष्मण को इतना बड़ा जान पड़ रहा है। वे उस भार को तुच्छ नहीं करते। उसे उठाने की अपनी क्षमता पर प्रश्न रखते हैं। स्नेह में पले होने की स्मृति उनके निवेदन का कारण बनती है: जिस आश्रय ने उन्हें सँभाला है, उसी से अलग होकर यह भारी काम करना उन्हें अगम लगता है।
फिर वे अपने हृदय की सीधी बात कहते हैं। राम को छोड़कर गुरु, पिता और माता, किसी को नहीं जानते। यह सहज स्वभाव से कहा गया वचन है, और वे राम से उस पर विश्वास करने की प्रार्थना करते हैं। अभी राम ने इन्हीं सम्बन्धों की सेवा समझायी थी। लक्ष्मण उत्तर में बताते हैं कि उनके अनुभव में उन सबका आश्रय राम ही हैं। जिनके चरणों के सामने वे हैं, उन्हीं में गुरु का मार्गदर्शन, पिता का सहारा और माता का स्नेह एक साथ मिलता है।
बात यहीं पूरी नहीं होती। संसार में जितने स्नेह के सम्बन्ध हैं, जितना प्रेम और विश्वास है, जिनका वेद स्वयं वर्णन करते हैं, वे सब लक्ष्मण के लिये एक राम हैं। वे उन्हें स्वामी, दीनों के बन्धु और हृदय के भीतर की जाननेवाले कहकर सम्बोधित करते हैं। अन्तर्यामी कहने से उनकी प्रार्थना और निकट आ जाती है। जिस मन का हाल बताने के लिये वाणी बार बार रुक रही है, वह मन राम से छिपा नहीं है। लक्ष्मण उसी जाननेवाले के सामने अपने एकमात्र अवलम्ब की बात रख रहे हैं।
धरम नीति उपदेसिअ ताही । कीरति भूति सुगति प्रिय जाही॥
चौपाई ४
मन क्रम बचन चरन रत होई । कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई॥
अन्त में वे धर्म और नीति के उपदेश का प्रश्न उठाते हैं। ऐसा उपदेश उसे दिया जाए जिसे कीर्ति, ऐश्वर्य या सद्गति प्रिय हो। लक्ष्मण की अपनी चाह मन, कर्म और वचन से राम के चरणों में प्रेम रखने की है। वे कृपा के समुद्र से पूछते हैं कि ऐसा सेवक भी क्या त्याग देने योग्य है। इस प्रश्न में अपनी कोई अलग प्राप्ति नहीं गिनाते। जिस कीर्ति, विभूति और सुगति का नाम लिया, उनमें से किसी को अपने निवेदन का फल नहीं बनाते। साथ रहकर चरणों की सेवा करना ही उनकी प्रार्थना में बचा रहता है।
राम इन वचनों को सुनते हैं। तुलसी उनकी कोमलता और विनय को स्पष्ट कहते हैं। लक्ष्मण का आग्रह तीखा है, पर वाणी में नम्रता बनी हुई है। राम यह भी पहचान लेते हैं कि भाई स्नेह के कारण डरे हुए हैं। उनकी दशा का कारण समझकर वे उन्हें हृदय से लगा लेते हैं और समझाते हैं। इस आलिंगन में उस भय को उत्तर मिलता है जो अभी तक लक्ष्मण से पूरा वाक्य भी नहीं कहने दे रहा था।
करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत।
दोहा ७२
समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत॥ ७२॥
लक्ष्मण राम की सीख को उत्तम मानते हैं, पर स्वयं को उनके स्नेह में पला बालक बताते हैं। उनके लिये सारे प्रिय सम्बन्ध राम में हैं और सारी चाह चरणों की सेवा है। राम उनकी विनम्र वाणी सुनकर प्रेम से उत्पन्न भय पहचानते हैं और उन्हें गले लगा लेते हैं।
अनुमति मिली, माँ के सामने फिर संकोच
अब राम साथ चलने की अनुमति दे देते हैं। भाई से कहते हैं कि माता के पास जाकर विदा माँग आएँ और जल्दी वन को चलें। इस वचन में लक्ष्मण को मिला हुआ साथ भी है और माँ की आज्ञा लेने का काम भी। राम की अनुमति सुनते ही वे आनन्दित हो उठते हैं। तुलसी इसे बड़ी हानि के टल जाने और बड़ा लाभ मिल जाने की तरह कहते हैं। जिस साथ के छूटने से सारा सुख समाप्त होता जान पड़ रहा था, वही साथ अब मिल गया है।
हरषित हृदयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए॥
चौपाई ५
जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा॥
हृदय हर्षित है जब लक्ष्मण माता के पास पहुँचते हैं। उपमा है, मानो किसी अन्धे को फिर नेत्र मिल गये हों। कुछ देर पहले राम की सीख सुनकर कमल के सूख जाने का चित्र था, अब दृष्टि लौट आने का आनन्द है। लक्ष्मण जाकर जननी के चरणों में मस्तक नवाते हैं। शरीर माँ के सामने झुका है, मन राम और जानकी के साथ लगा हुआ है। विदा का यह छोटा काम भी उन्हें उसी साथ तक लौटने के लिये पूरा करना है।
इसके बाद माँ उनके उदास मन को देखकर पूछती हैं। हर्ष लेकर आने और माँ को उदासी दिखाई देने, दोनों बातें इस भेंट में साथ रखी गयी हैं। लक्ष्मण को राम की अनुमति मिल चुकी है, पर अयोध्या पर आयी विपत्ति का समाचार भी उनके पास है। माँ के प्रश्न पर वे पूरी कथा विस्तार से सुना देते हैं। हम अभी आनन्दित पुत्र को माँ के चरणों पर झुकते देख रहे थे; अब उन्हीं के मुँह से सुनी बात माता को सहमा देती है।
सुमित्रा कठोर समाचार सुनकर ऐसी डर जाती हैं जैसे हिरनी चारों ओर वन में लगी आग देखकर सहम जाए। यह सुनते ही लक्ष्मण के मन में नयी आशंका उठती है। उन्हें लगता है कि अब अनर्थ हुआ, माता स्नेह के वश होकर काम बिगाड़ देंगी। यह लक्ष्मण का डर है। माँ ने अभी उन्हें रोकने का वचन नहीं दिया है। फिर भी विदा माँगते हुए वे डर और संकोच अनुभव करते हैं। मन में विधाता से फिर वही प्रकार का प्रश्न है: साथ जाने को कहेंगी या नहीं।
समुझि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ।
दोहा ७३
नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ॥ ७३॥
सुमित्रा राम और सीता का रूप, उनका सुन्दर शील और स्वभाव स्मरण करती हैं। उन पर राजा के प्रेम को देखकर सिर धुनती हैं। अपने दुःख में वे कैकेयी को पापिनी कहती हैं। पोद्दार जी की टीका उनके कथन को खोलती है: कैकेयी ने बुरी तरह घात लगाया। इस क्षण सुमित्रा की दृष्टि उन प्रिय जनों पर है जिनके गुण और स्नेह के बीच ऐसी विपत्ति आ गयी है। लक्ष्मण सामने विदा की प्रतीक्षा कर रहे हैं और माँ समाचार की चोट सँभाल रही हैं।
यहीं सुमित्रा समय को पहचानकर धैर्य धारण करती हैं। कवि उन्हें स्वभाव से हित चाहनेवाली कहते हैं। उनकी अगली वाणी कोमल है। सहम जाने और सिर धुनने के बाद यह धीरज आता है, इसलिए उनका आशीर्वाद दुःख से अनजान हृदय का सहज उच्चारण नहीं लगता। उन्होंने संकट सुना है, उसका आघात अनुभव किया है, फिर पुत्र से बोलने के लिये अपने को सँभाला है। अब जिस उत्तर से लक्ष्मण डर रहे थे, वह सामने आनेवाला है।
राम की अनुमति से लक्ष्मण हर्षित होकर माँ के पास आते हैं, फिर भी माँ उनकी उदासी देखकर प्रश्न करती हैं। समाचार सुमित्रा को सहमा देता है और लक्ष्मण को स्नेहवश रोके जाने का भय होता है। सुमित्रा राम सीता और राजा का दुःख सोचकर धैर्य धारण करती हैं।
जहाँ राम रहें, वहीं अयोध्या
सुमित्रा पुत्र को तात कहकर सम्बोधित करती हैं और सबसे पहले वन में मिलनेवाले परिवार का परिचय देती हैं। वैदेही उनकी माता हैं। सब प्रकार से स्नेह करनेवाले राम उनके पिता हैं। लक्ष्मण माता से विदा लेने आये थे; सुमित्रा उन्हें बता रही हैं कि जिनके साथ जाना है, उन्हीं में माता पिता का स्नेह मिलेगा। अभी राम के सामने लक्ष्मण ने अपने सारे सम्बन्ध एक राम में होने की बात कही थी। अब माँ स्वयं सीता और राम को उनके जीवन के इन दो अत्यन्त निकट सम्बन्धों में प्रतिष्ठित करती हैं।
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी । सहज सुहृद बोली मृदु बानी॥
चौपाई ६
तात तुम्हारि मातु बैदेही । पिता रामु सब भाँति सनेही॥
इसके बाद सुमित्रा अयोध्या का अर्थ भी उसी सम्बन्ध से खोलती हैं। जहाँ राम का निवास है, वहीं अवध है, जैसे जहाँ सूर्य का प्रकाश है, वहीं दिन होता है। सूर्य और दिन को साथ रखकर वे पुत्र के मन की दिशा स्पष्ट कर देती हैं। राम का निवास जिसके जीवन में अयोध्या का सुख देता है, उसके लिये राम के वन जाने पर घर का अर्थ भी उनके साथ चलता है। इसलिए सुमित्रा कहती हैं कि यदि सीता राम निश्चित ही वन जा रहे हैं तो लक्ष्मण का अयोध्या में कोई काम नहीं है।
अवध तहाँ जहँ राम निवासू । तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥
चौपाई ७
जौं पै सीय रामु बन जाहीं । अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं॥
उनकी सीख में अन्य सम्बन्धों का आदर भी पूरा बना रहता है। गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, सबकी सेवा प्राण के समान करनी चाहिये। फिर राम तो प्राणों से भी प्रिय हैं, हृदय के जीवन हैं और सभी के स्वार्थरहित मित्र हैं। सुमित्रा इस प्रकार एक एक सम्बन्ध का सम्मान रखते हुए राम का आश्रय बताती हैं। लक्ष्मण जिस सेवा के लिये व्याकुल हैं, माँ उसे इन्हीं प्रिय सम्बन्धों की सेवा के साथ समझाती हैं।
सुमित्रा आगे कहती हैं कि संसार में जहाँ तक पूजनीय और परम प्रिय जन हैं, सबको राम के नाते ही ऐसा मानना चाहिये। हृदय में यह समझकर उनके साथ वन जाने और जीवन का लाभ उठाने को कहती हैं। लक्ष्मण जिस अनुमति को माँगते हुए सकुचा रहे थे, वह अनुमति अब सीधे मिल रही है। साथ में उसका आशय भी मिल रहा है: राम और सीता के पास जाकर सेवा में जीवन का लाभ प्राप्त करना। माँ का उत्तर उस भय को दूर करता है कि उनका स्नेह पुत्र को रोक लेगा।
सुमित्रा सीता को लक्ष्मण की माता और राम को पिता कहती हैं। उनके लिये राम का निवास ही अयोध्या है। सभी पूजनीय सम्बन्धों का आदर राम के नाते समझाकर वे पुत्र को साथ वन जाने और जीवन का लाभ उठाने को कहती हैं।
पुत्र के साथ माँ का सौभाग्य
पुत्र के मन ने छल छोड़कर राम के चरणों में जगह पा ली है, सुमित्रा को इसी बात का आनन्द है। वे लक्ष्मण पर बलिहारी जाती हैं और उन्हें बड़े सौभाग्य का पात्र कहती हैं। इस सौभाग्य में अपने को भी सम्मिलित करती हैं। पुत्र को राम की सेवा का अवसर मिला है, इसलिए माँ भी अपने जीवन को उसी लाभ में भागी मानती हैं। लक्ष्मण के जाने की स्वीकृति के साथ सुमित्रा का यह अपनापन बना रहता है।
भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।
दोहा ७४
जौं तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ॥ ७४॥
इसी भक्ति के आवेग में सुमित्रा मातृत्व के विषय में बहुत कठोर बात कहती हैं। उनके कथन में संसार की वही स्त्री पुत्रवती कहलाती है जिसका पुत्र रघुनाथ का भक्त हो। राम से विमुख पुत्र में अपना हित देखनेवाली स्त्री की अपेक्षा वे बाँझ स्त्री को अच्छा कहती हैं और ऐसे पुत्र को जन्म देने को व्यर्थ ठहराती हैं। पोद्दार जी की टीका उनके इस कठोर कथन में पशु की भाँति ब्याने की उपमा भी स्पष्ट करती है। सुमित्रा अपने इस कथन में पुत्र की भक्ति को मातृत्व की सार्थकता मान रही हैं। जिस मन ने राम के चरणों में जगह पायी है, उसी के कारण वे अभी अपने सहित लक्ष्मण को सौभाग्यवान कह चुकी हैं।
फिर पुत्र को वे एक और आश्चर्यभरी बात कहती हैं। राम उनके ही भाग्य से वन जा रहे हैं, दूसरा कोई कारण नहीं है। अभी सुमित्रा ने संकट का दुःख अनुभव किया और कैकेयी को दोष दिया था। अब पुत्र से कहते हुए वे इस वनगमन में उन्हें मिलनेवाला सौभाग्य देख रही हैं। यह सुमित्रा की अपने पुत्र से कही हुई बात है, जिसमें उनका ध्यान सीता राम की निकट सेवा पर है। वन का समाचार जिस भेंट में भय लाया था, उसी में माँ अब भाग्य का अवसर दिखा रही हैं।
उनके वचन का अगला भाग उस सौभाग्य का फल ठीक ठीक बताता है। सभी पुण्यों का सबसे बड़ा फल सीता राम के चरणों में सहज स्नेह होना है। छल छोड़कर चरणों में स्थान पाने और सहज प्रेम होने की बातें साथ पढ़ने पर सुमित्रा की प्रसन्नता का कारण स्पष्ट रहता है। लक्ष्मण का मन उसी ओर लगा हुआ है जहाँ माँ उन्हें जाने का आशीर्वाद देना चाहती हैं। वे इस प्रेम को संसार के सारे पुण्यों की बड़ी उपलब्धि मानकर पुत्र के निश्चय को बल देती हैं।
सुमित्रा छलरहित रामप्रेम में पुत्र और अपने, दोनों का सौभाग्य मानती हैं। अपने कठोर मातृत्व सम्बन्धी कथन को भी वे पुत्र की रामभक्ति से जोड़ती हैं। फिर लक्ष्मण के भाग्य से वनगमन होने की बात कहकर सीता राम के चरणों में सहज स्नेह को सभी पुण्यों का बड़ा फल बताती हैं।
सेवा में मन, कर्म और वचन
वन जाने की स्वीकृति मिल गयी है, अब सुमित्रा उस साथ को निभाने का ढंग बताती हैं। सबसे पहले पाँच विकारों का नाम लेती हैं: राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह। इनमें राग आसक्ति है, रोष क्रोध है, मद अभिमान है। माँ की सीख है कि इनके वश स्वप्न में भी न हों। वे केवल सामने के व्यवहार की बात नहीं रखतीं। स्वप्न तक का उल्लेख करके मन के भीतर उठनेवाले विकारों से भी बचने को कहती हैं।
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥
चौपाई ८
सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥
इसके बाद सब प्रकार के विकार छोड़कर मन, कर्म और वचन से सेवा करने का निर्देश देती हैं। लक्ष्मण ने राम से इसी तरह चरणों में मन, कर्म और वचन का प्रेम होने की प्रार्थना कही थी। अब माँ उन्हें उसी प्रेम को सेवा में निभाने की शिक्षा दे रही हैं। भीतर का भाव, किया हुआ काम और बोला हुआ वचन, तीनों सेवा में लगें। पास रहने का अवसर मिल रहा है, उसे सँभालने के लिये यह सावधानी भी साथ दी जा रही है।
सुमित्रा कहती हैं कि लक्ष्मण के लिये वन में सब प्रकार का आराम है, क्योंकि उनके साथ राम और सीता रूपी पिता माता रहेंगे। इसके बाद अपना उपदेश बहुत स्पष्ट कर देती हैं। पुत्र वही करें जिससे राम को वन में क्लेश न हो। माँ ने आरम्भ में जिनको पिता और माता कहा था, अब उन्हीं का सुख लक्ष्मण की सेवा का उद्देश्य बनता है। अपने साथ की प्रसन्नता को दूसरे के आराम में बदलना है। लक्ष्मण को वन जाने का लाभ तभी पूरा मिलेगा जब उनकी सेवा राम के कष्ट को कम करे।
छन्द में यह उपदेश सीता और राम, दोनों के सुख तक पूरा फैलता है। सुमित्रा चाहती हैं कि लक्ष्मण के कारण वन में दोनों सुख पाएँ। सेवा ऐसी हो कि पिता, माता, प्रिय परिवार और नगर के सुखों की याद भूल जाएँ। वन में मिलनेवाली देखभाल में घर के छूटे हुए सुखों का अभाव उन्हें सताए नहीं। माँ अपनी विदाई की वाणी में भी सीता और राम के आराम का विचार कर रही हैं। लक्ष्मण का प्रेम बहुत गहरा है; उसे रोज निभाये जानेवाले हित में लगाना इसी सीख का उद्देश्य है।
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
छन्द, सोरठा ७५ से पूर्व
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं॥
तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।
रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई॥
शिक्षा देकर सुमित्रा वन जाने की आज्ञा देती हैं, फिर आशीर्वाद देती हैं। सीता और रघुवीर के चरणों में प्रेम अविरल हो, अमल हो और नित नया होता रहे। प्रेम की निरन्तरता, उसकी निर्मलता और उसका नया बने रहना, तीनों आशीर्वाद में हैं। पोद्दार जी की टीका इस निर्मल प्रेम को निष्काम और अनन्य बताती है। माँ ने सेवा में लगने को कहा है और उस सेवा का आधार बने रहनेवाले प्रेम के लिये भी आशीष दी है। साथ पाने का आनन्द अभी नया है; सुमित्रा चाहती हैं कि यह प्रेम प्रतिदिन ऐसा ही नया होता रहे।
सुमित्रा राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह से स्वप्न में भी बचने तथा मन, कर्म और वचन से सेवा करने को कहती हैं। राम और सीता वन में सुख पाएँ और घर के सुखों की याद भूलें, यही उनका उपदेश है। आज्ञा के बाद वे चरणों में निरन्तर, निर्मल और नित्य नये प्रेम का आशीर्वाद देती हैं।
माता के चरणों से राम के पास
आशीर्वाद पाकर लक्ष्मण माता के चरणों में सिर नवाते हैं और तुरन्त चल पड़ते हैं। हृदय में अब भी आशंका है। टीका इसे इस डर के रूप में खोलती है कि कहीं कोई विघ्न फिर न आ जाए। राम की अनुमति और माँ की आज्ञा, दोनों मिल चुकी हैं, फिर भी लक्ष्मण का मन तब तक पूरा निश्चिन्त नहीं होता जब तक वे लौटकर प्रिय के साथ न पहुँच जाएँ। इस शीघ्र प्रस्थान की उपमा तुलसी कठिन फन्दा तोड़कर सौभाग्य से भाग निकले हिरन से देते हैं।
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।
सोरठा ७५
बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस॥ ७५॥
माँ समाचार सुनकर चारों ओर अग्नि देखती हिरनी की तरह सहमी थीं। अब पुत्र फन्दा छूट जाने पर भागते हिरन की तरह चल रहे हैं। दोनों चित्रों के बीच सुमित्रा का धैर्य और उनका आशीर्वाद है। भय की स्थिति बदल गयी है। लक्ष्मण को रोके जाने की आशंका से निकलने का मार्ग मिल गया है, और वे बिना देर किये उसी मार्ग पर बढ़ते हैं।
गए लखनु जहँ जानकिनाथू । भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू॥
चौपाई ९
बंदि राम सिय चरन सुहाए । चले संग नृपमंदिर आए॥
लक्ष्मण वहाँ पहुँचते हैं जहाँ जानकीनाथ हैं। प्रिय का साथ पाकर उनका मन प्रसन्न हो जाता है। वे राम और सीता के सुन्दर चरणों की वन्दना करते हैं, फिर उनके साथ चलते हैं। तीनों राजभवन में आते हैं। माता की आज्ञा ने लक्ष्मण को जिस संग की ओर भेजा था, वह संग अब सामने है। पर इस प्रसन्नता के साथ कथा को पिता से मिलना भी बाकी है। नगर और राजमहल में दुःख अपने पूरे भार के साथ उपस्थित है।
माता का आशीर्वाद लेकर लक्ष्मण तत्काल लौटते हैं, यद्यपि किसी नये विघ्न का डर अभी बना है। राम के पास पहुँचकर वे सीता और राम के चरणों की वन्दना करते हैं और तीनों साथ राजभवन में आते हैं।
नगर का विषाद और पिता की बाँहें
नगर के स्त्री पुरुष आपस में विधाता को कोस रहे हैं। उनकी बात है कि विधाता ने खूब बनाकर बात बिगाड़ दी। दुःख उनके मन तक सीमित नहीं रहा। शरीर कृश हैं, चेहरे उदास हैं। तुलसी उन्हें शहद छिन जाने पर व्याकुल हुई मधुमक्खियों की तरह दिखाते हैं। नगर के लोगों की दशा में अपने प्रिय सुख के छिनने की पीड़ा है, और सब एक दूसरे से उसी बिगड़ी हुई बात का दुःख कह रहे हैं।
कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥
चौपाई १०
भइ बड़ि भीर भूप दरबारा । बरनि न जाइ बिषादु अपारा॥
वे हाथ मलते हैं, सिर धुनते हैं, पछताते हैं। अब उनकी उपमा पंखहीन पक्षियों से आती है। व्याकुलता बहुत है, उसे दूर करने की शक्ति नहीं दिखती। राजद्वार पर बड़ी भीड़ हो जाती है। तुलसी उस अपार विषाद को वर्णन से बाहर कहते हैं। राम ने लक्ष्मण को रोकते समय जिन पुरवासियों के दुःख का विचार किया था, उन्हीं की दशा यहाँ दिखाई दे रही है। परिवार और प्रजा को सान्त्वना देने की चिन्ता कितनी भारी थी, राजद्वार की यह भीड़ उसे सामने रख देती है।
भीतर मन्त्री राजा को उठाकर बैठाते हैं। वे प्रिय समाचार कहते हैं कि राम पधारे हैं। मिलने की इस सूचना में सुख है, पर सामने का दृश्य राजा को बहुत व्याकुल कर देता है। सीता के साथ दोनों पुत्र दिखाई देते हैं। पिता की आँखों के सामने अब वे तीनों हैं जिनसे बिछुड़ने का दुःख उनके मन में है। बाहर की भीड़ का अपार विषाद भीतर राजा की व्याकुलता तक पहुँचता है।
सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।
दोहा ७६
बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ॥ ७६॥
राजा सीता सहित दोनों सुन्दर पुत्रों को देखते हैं और बार बार अकुलाते हैं। स्नेह के वश होकर उन्हें हृदय से लगाते रहते हैं। एक बार का मिलन इस दुःख को शान्त नहीं करता। देखना फिर होता है, व्याकुलता फिर उठती है, आलिंगन फिर होता है। दोहे में इसी आवृत्ति के साथ पिता का स्नेह ठहर जाता है। लक्ष्मण को साथ मिल गया है, पर जिन पिता की सेवा की बात राम ने की थी, उनका दुःख अब उसी साथ को आँखों के सामने देखकर उमड़ रहा है।
नगर के लोग दुःख से कृश और उदास हैं, राजद्वार पर बड़ी भीड़ है। मन्त्री राम के आने की सूचना देकर राजा को बैठाते हैं। सीता सहित दोनों पुत्रों को देखकर राजा अत्यन्त व्याकुल होते हैं और स्नेह से बार बार हृदय से लगा लेते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस भेंट में लक्ष्मण के प्रेम को दो बार पहचाना गया। राम ने उसकी व्याकुलता में छिपा भय जाना और गले लगाया। सुमित्रा ने उसी प्रेम में पुत्र और अपना सौभाग्य देखा, फिर उसे निभाने के लिये सेवा की पूरी शिक्षा दी। अनुमति मिलने के साथ जिम्मेदारी भी स्पष्ट हुई: राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह से बचते हुए ऐसा आचरण करना जिससे सीता राम को सुख मिले। लक्ष्मण की चरणों में रखी प्रार्थना माँ के आशीर्वाद में दैनिक सेवा का रूप पाती है।
और पिता का दुःख इस सारी स्वीकृति के बाद भी बना है। राम ने आरम्भ में अयोध्या के पीछे रह जानेवाले जनों की चिन्ता की थी। अन्त में वही नगर राजद्वार पर व्याकुल खड़ा है और राजा दोनों पुत्रों तथा सीता को देखकर अकुला रहे हैं। साथ चलनेवाले के लिये मिला हुआ आनन्द और बिछुड़नेवाले का दुःख एक ही भेंट में उपस्थित हैं। तीनों पिता के सामने हैं, और उनकी बाँहें बार बार उन्हें अपने पास खींच लेती हैं।
राम के चरणों को पकड़ने से शुरू हुई यह प्रार्थना पिता के आलिंगन तक आयी है। बीच में भाई को मिला स्नेह, माता का धैर्य और सेवा का आशीर्वाद है। अब राजमहल में सीता सहित दोनों पुत्र सामने हैं। राजा उन्हें देखते हैं, व्याकुल होते हैं और फिर हृदय से लगा लेते हैं। इस क्षण उनका प्रेम उसी बार बार लौटते हुए आलिंगन में दिखाई देता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ७० से ७६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।