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लक्ष्मण का आग्रह और सुमित्रा का आशीर्वाद

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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 9

राम के साथ जाने की व्याकुल प्रार्थना, और माता के सामने विदा का संकोच। सेवा का वह आशीर्वाद, जिसके बाद तीनों राजा के महल में पहुँचते हैं।

खबर मिलने पर लक्ष्मण व्याकुल होकर दौड़ पड़ते हैं, और राम के चरण पकड़ लेते हैं। उनके हृदय में सोच है कि राम उन्हें घर में रखेंगे या साथ ले चलेंगे। राम उनसे घर रहने को कहते हैं। वे कहते हैं कि यदि वे भाई को साथ लेकर वन गये, तो अयोध्या हर तरह से अनाथ हो जायेगी।

रामचरितमानस के इस प्रसंग में लक्ष्मण विनती करते हैं कि उन्हें त्यागा न जाये, और राम उन्हें समझाते हैं। राम उनसे कहते हैं कि माता से विदा माँग आइये, और साथ वन चलिये। विदा माँगते हुए लक्ष्मण डरते और सकुचाते हैं। सुमित्रा धीरज धरती हैं, और उन्हें राम और सीता के साथ वन जाने की सीख देती हैं। वे उन्हें आज्ञा और आशीर्वाद देती हैं। लक्ष्मण राम और सीता के साथ राजमहल आते हैं। नगर के नर नारी पछताते हैं, और राजा व्याकुल होकर तीनों को हृदय से लगाते हैं।

लक्ष्मण, सुमित्रा और राम

  • राम नीति से लक्ष्मण को घर रहकर माता पिता की सेवा करने और सबको सन्तोष देने को कहते हैं। वे उनके कोमल और विनीत वचन सुनते हैं, उनका डर जानते हैं, और उन्हें हृदय से लगाकर समझाते हैं। फिर वे उन्हें माता से विदा माँगकर साथ वन चलने को कहते हैं।
  • लक्ष्मण राम के भाई, जो खबर पाकर व्याकुल होकर दौड़ते हैं और राम के चरण पकड़ लेते हैं। वे राम से कहते हैं कि वे दास हैं, और गुरु, पिता, माता किसी को नहीं जानते। माता से विदा माँगते हुए वे डरते और सकुचाते हैं।
  • सुमित्रा खबर सुनकर सहम जानेवाली माता, जो धीरज धरकर पुत्र को मन, कर्म और वचन से सेवा का उपदेश और प्रेम का आशीर्वाद देती हैं।
  • सीता जिन्हें सुमित्रा लक्ष्मण की माता कहती हैं, और जिनके और राम के सुख के लिये सुमित्रा लक्ष्मण को सेवा की सीख देती हैं।
  • राजा पिता, जिन्हें राम वृद्ध बताते हैं, और जिनके मन में, राम के कहे अनुसार, उनका दुःख है। सीता सहित दोनों पुत्रों को देखकर वे व्याकुल होते हैं, और बार बार उन्हें हृदय से लगाते हैं।

चरण पकड़ लिये, वाणी ठहर गयी

खबर मिलते ही लक्ष्मण व्याकुल और उदास मुख होकर उठ दौड़ते हैं। उनका शरीर काँप रहा है, रोमांच है, आँखें आँसुओं से भरी हैं, और प्रेम से अधीर होकर वे राम के चरण पकड़ लेते हैं।

वे कुछ बोल नहीं पाते, खड़े खड़े देखते रहते हैं, जैसे पानी से निकाली गयी मछली दीन हो जाती है।

मन में वे विधाता से पूछते हैं: अब क्या होगा, क्या हमारे सारे सुख और पुण्य समाप्त हो गये? राम क्या कहेंगे, घर में रखेंगे या साथ ले चलेंगे?

राम देखते हैं कि भाई हाथ जोड़े हैं, और उन्होंने शरीर, घर, सबसे तिनका तोड़ लिया है। राम नीति में निपुण हैं, और शील, स्नेह और सरलता से भरे हैं। वे उनसे कहते हैं: तात, प्रेम के वश हिम्मत मत हारिये, परिणाम के उत्साह को हृदय में समझकर।

अयोध्या में रह जाने का आग्रह

राम कहते हैं: जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामी की सीख को सहज भाव से सिर पर रखकर मानते हैं, उन्होंने जन्म का लाभ पाया है। नहीं तो जगत् में जन्म व्यर्थ है।

वे कहते हैं: भाई, हृदय में ऐसा जानकर सीख सुनिये, और माता पिता के चरणों की सेवा कीजिये। भरत और शत्रुघ्न घर में नहीं हैं, राजा बूढ़े हैं और उनके मन में मेरा दुःख है।

वे कहते हैं: आपको साथ लेकर मैं वन गया तो अयोध्या हर तरह से अनाथ हो जायेगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार, सब पर दुःख का असह्य भार पड़ेगा।

वे कहते हैं: रहिये, और सबको सन्तोष दीजिये, नहीं तो तात, बड़ा दोष होगा। जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य नरक का अधिकारी होता है।

वे कहते हैं: तात, ऐसी नीति विचारकर घर रहिये। यह सुनकर लक्ष्मण बहुत व्याकुल हो जाते हैं। उन शीतल वचनों से वे ऐसे सूख गये, जैसे पाला लगने से कमल सूख जाता है।

सभी सम्बन्ध एक राम में

प्रेम के वश उत्तर नहीं निकलता, और लक्ष्मण व्याकुल होकर फिर राम के चरण पकड़ लेते हैं। वे कहते हैं: नाथ, मैं दास हूँ और आप स्वामी। आप छोड़ दें तो मेरा क्या वश चलेगा?

वे कहते हैं: स्वामी, आपने मुझे बहुत अच्छी सीख दी है। अपनी कायरता से वह अगम लगती है। वेद और नीति के अधिकारी वे श्रेष्ठ पुरुष हैं जो धीर हों और धर्म की धुरी धारण करते हों।

वे कहते हैं: मैं आपके स्नेह में पला हुआ बच्चा हूँ। क्या हंस मन्दर और मेरु को उठा सकते हैं?

वे कहते हैं: मैं गुरु, पिता, माता, किसी को नहीं जानता। नाथ, यह मैं स्वभाव से कहता हूँ, विश्वास कीजिये।

वे कहते हैं कि संसार में जितने स्नेह के नाते हैं, जितना प्रेम और विश्वास है, जिनका वेद ने स्वयं वर्णन किया है, वे सब उनके लिये बस राम हैं। वे राम को मन की बात जाननेवाला कहकर पुकारते हैं।

वे कहते हैं: धर्म और नीति का उपदेश उसे करना चाहिये जिसे कीर्ति, विभूति और सद्गति प्यारी हो। जो मन, कर्म और वचन से आपके चरणों में लगा हो, क्या उसे छोड़ देना चाहिये?

भाई के कोमल और विनीत वचन सुनकर राम समझ जाते हैं कि वे स्नेह के कारण डरे हुए हैं। वे उन्हें हृदय से लगा लेते हैं और समझाते हैं।

राम साथ चलने को कहते हैं, और माता के सामने लक्ष्मण का संकोच

राम कहते हैं: माता के पास जाकर विदा माँग आइये, और जल्दी वन चलिये, भाई। राम की वाणी सुनकर लक्ष्मण आनन्दित हो उठते हैं। बड़ा लाभ हुआ और बड़ी हानि दूर हो गयी।

हर्षित हृदय से लक्ष्मण माता के पास आते हैं, मानो अन्धे को फिर आँखें मिल गयी हों। वे जाकर माता के चरणों में सिर नवाते हैं, और उनका मन राम और सीता के साथ है।

माता उनका उदास मन देखकर पूछती हैं, और लक्ष्मण उन्हें सारी कथा विस्तार से सुना देते हैं।

कठोर वचन सुनकर सुमित्रा सहम जाती हैं, मानो हिरनी चारों ओर वन में आग लगी देख रही हो। लक्ष्मण देखते हैं कि आज अनर्थ हो गया, और माता स्नेह के वश काम बिगाड़ देंगी। विदा माँगते हुए वे डरते और सकुचाते हैं। टीका के अनुसार वे मन में विधाता से पूछते हैं: माता साथ जाने को कहेंगी या नहीं?

सुमित्रा राम और सीता के रूप, शील और स्वभाव को समझकर, और राजा का प्रेम देखकर, सिर धुनती हैं। टीका के अनुसार वे कहती हैं कि पापिनी ने बुरा दाँव लगाया, और टीका इस पापिनी को कैकेयी बताती है।

फिर सुमित्रा कुसमय जानकर धीरज धरती हैं। स्वभाव से हितैषी सुमित्रा कोमल वाणी में बोलती हैं।

जहाँ राम रहें, वहीं अयोध्या

सुमित्रा कहती हैं: तात, सीता आपकी माता हैं और हर तरह से स्नेह करनेवाले राम आपके पिता।

वे कहती हैं: अयोध्या वहीं है जहाँ राम रहते हैं। दिन वहीं है जहाँ सूर्य का प्रकाश है। यदि सीता और राम सचमुच वन जा रहे हैं, तो अयोध्या में आपका कोई काम नहीं।

वे कहती हैं कि गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, सबकी सेवा प्राणों की तरह करनी चाहिये। राम प्राणों के समान प्रिय हैं, हृदय के जीवन हैं और सबके निःस्वार्थ मित्र हैं।

वे कहती हैं कि संसार में जितने पूजनीय और परम प्रिय लोग हैं, सबको राम के नाते ऐसा मानना चाहिये। यह हृदय में समझकर उनके साथ वन जाइये, और तात, जगत् में जीवन का लाभ उठाइये।

पुत्र के साथ माँ का सौभाग्य

वे कहती हैं: बलिहारी जाऊँ, आप मेरे सहित बड़े सौभाग्य के पात्र हुए, यदि आपके मन ने छल छोड़कर राम के चरणों में जगह पायी है।

सुमित्रा माता होने के बारे में बहुत कठोर बात कहती हैं: संसार में वही स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र राम का भक्त हो। जो राम से विमुख पुत्र से अपना हित मानती है, उससे बाँझ अच्छी। ऐसे पुत्र को जन्म देना व्यर्थ है। पोद्दार की टीका उनके इस कथन में पशु की तरह ब्याने की उपमा भी खोलती है।

वे कहती हैं: राम आपके ही भाग्य से वन जा रहे हैं। तात, दूसरा कोई कारण नहीं है।

वे कहती हैं कि सब पुण्यों का बड़ा फल राम और सीता के चरणों में सहज स्नेह है।

सेवा में मन, कर्म और वचन

वे कहती हैं: राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह, सपने में भी इनके वश मत होइये। राग आसक्ति है, रोष क्रोध और मद अभिमान।

वे कहती हैं: सब तरह के विकार छोड़कर मन, कर्म और वचन से सेवा कीजिये।

वे कहती हैं कि आपके लिये वन में हर तरह का आराम है, जिनके साथ राम और सीता रूपी पिता माता हैं। पुत्र, आप वही कीजिये जिससे राम को वन में कोई क्लेश न हो। यही उपदेश है।

वे कहती हैं: तात, उपदेश यही है, जिससे आपके कारण राम और सीता सुख पायें, और वन में पिता, माता, प्रिय परिवार और नगर के सुखों की याद भूल जायें।

तुलसीदास कहते हैं कि सुमित्रा प्रभु को सीख देकर आज्ञा देती हैं। टीका इन प्रभु को लक्ष्मण बताती है। फिर वे आशीर्वाद देती हैं: सीता और राम के चरणों में आपका प्रेम अविरल हो, निर्मल हो और नित नया होता रहे। पोद्दार की टीका इस निर्मल प्रेम को निष्काम और अनन्य बताती है।

माता के चरणों से राम के पास

माता के चरणों में सिर नवाकर लक्ष्मण तुरन्त चल पड़ते हैं, और उनके हृदय में शंका है। टीका इसे डर बताती है कि कहीं अब भी कोई विघ्न न आ जाये। मानो कोई हिरन भाग्य से विषम फन्दा तोड़कर भाग निकला हो।

लक्ष्मण वहाँ पहुँचते हैं जहाँ राम हैं, और प्रिय का साथ पाकर उनका मन प्रसन्न हो जाता है। वे राम और सीता के सुहावने चरणों की वन्दना करके उनके साथ चल पड़ते हैं, और तीनों राजमहल में आते हैं।

नगर का विषाद और पिता की बाँहें

नगर के स्त्री पुरुष आपस में कहते हैं कि विधाता ने भली भाँति बनाकर बात बिगाड़ दी। उनके शरीर दुबले हैं, मन दुःखी और चेहरे उदास। वे व्याकुल हैं, मानो शहद छिन जाने पर मधुमक्खियाँ व्याकुल हों।

वे हाथ मलते हैं, सिर धुनकर पछताते हैं, मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हों। राजा के दरबार में बड़ी भीड़ हो जाती है। उस अपार विषाद का वर्णन नहीं हो सकता।

मन्त्री राजा को उठाकर बिठाते हैं और प्रिय वचन कहते हैं कि राम पधारे हैं। सीता सहित दोनों पुत्रों को देखकर राजा बहुत व्याकुल हो जाते हैं।

राजा सीता सहित दोनों सुन्दर पुत्रों को देख देखकर अकुलाते हैं, और स्नेह के वश बार बार उन्हें हृदय से लगाते हैं।

प्रसंग का क्रम

लक्ष्मण राम के पास दौड़कर उनके चरण पकड़ लेते हैं। राम उनसे अयोध्या में रहकर सबको सन्तोष देने को कहते हैं। शीतल वचनों से लक्ष्मण सूख जाते हैं। वे कहते हैं कि वे दास हैं, और गुरु, पिता, माता किसी को नहीं जानते। राम उन्हें हृदय से लगाकर समझाते हैं, और माता से विदा माँगकर साथ चलने को कहते हैं। लक्ष्मण हर्षित होकर सुमित्रा के पास आते हैं, और उन्हें सारी कथा सुनाते हैं। सुमित्रा सहम जाती हैं, सिर धुनती हैं, और फिर धीरज धरती हैं। वे उन्हें सीता और राम के साथ वन जाने, और मन, कर्म और वचन से सेवा करने को कहती हैं। सुमित्रा आज्ञा और आशीर्वाद देती हैं। लक्ष्मण तुरन्त राम के पास जाते हैं, और राम और सीता के चरणों की वन्दना करके उनके साथ राजमहल आते हैं। नगर के नर नारी पछताते हैं। मन्त्री राजा को बिठाते हैं और कहते हैं कि राम पधारे हैं। राजा सीता सहित दोनों पुत्रों को बार बार हृदय से लगाते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 70 से 76, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।