रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · भरतकूप, राम की सीख और चरणपादुकाएँ
भरतकूप, राम की सीख और चरणपादुकाएँ
तीर्थजल का समर्पण, वन में पाँच दिन का भ्रमण और विदा से पहले मिला वह अवलम्ब, जिसे भरत आदर से सिर पर रखते हैं।
भरत के लाये हुए तीर्थजल का अब अपना स्थान होने जा रहा है। अत्रि मुनि की आज्ञा मिलते ही पात्र रवाना किये जाते हैं और भरत अपने छोटे भाई तथा साधु समाज के साथ उस गहरे कुएँ तक जाते हैं। वहाँ जल रख देने से आरम्भ हुई कथा आगे वन के रास्तों पर चलती है, फिर लौटकर राम की सभा में आती है। इन तीनों जगहों पर भरत की सेवा का अलग काम सामने है: जल का समर्पण करना, राम के वन को श्रद्धा से देखना और अवध लौटकर प्रजा का पालन करना।
विदा का अवसर आता है तो राम की दृष्टि धरती पर ठहर जाती है। भरत उनका संकोच समझ लेते हैं और स्वयं शिक्षा माँगते हैं। राम पूरा उत्तर देते हैं, घर और वन का आश्वासन, पिता की आज्ञा और राज्य चलाने की रीति, सब समझाते हैं। फिर भी भरत का मन किसी अवलम्ब को चाहता है। राम की चरणपादुकाएँ मिलते ही उन्हें वही सुख होता है जो सीताराम के रहने से होता। तुलसीदास इस सुख को कई उपमाओं में खोलते हैं; इसके बाद दोनों भाइयों के आलिंगन में कथा ठहरती है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- भरत तीर्थजल समर्पित करते हैं, वन के पवित्र स्थल देखते हैं और राम से अवध के पालन की शिक्षा तथा चरणपादुकाओं का अवलम्ब पाते हैं।
- श्रीराम भरत को पिता की आज्ञा और प्रजा के पालन का मार्ग बताते हैं; चरणपादुकाएँ देकर भाई को हृदय से लगाते हैं।
- शत्रुघ्न भरत के छोटे भाई, जो जल के समर्पण और वनभ्रमण में उनके साथ जाते हैं।
- अत्रि मुनि भरतकूप का माहात्म्य बताते हैं और वन के स्थलों का नाम, कारण, गुण तथा पुण्यप्रभाव समझाते हैं।
- वसिष्ठ, विश्वामित्र और जनक राम के आश्वासन में उपस्थित गुरु, मुनि और मिथिलापति, जिनका संरक्षण दोनों भाइयों के लिए भरोसा है।
- इन्द्र विदा के समय लोगों के मन उचाट करते हैं; राम की कृपा से उनकी कुचाल भी सबके हित में परिणत होती है।
तीर्थजल को मिला स्थान
अत्रि मुनि का अनुशासन पाकर भरत जल के सभी पात्र भेज देते हैं। फिर वे स्वयं वहाँ जाते हैं जहाँ वह अथाह कुआँ है। उनके साथ शत्रुघ्न हैं, अत्रि मुनि हैं और दूसरे साधु संत भी हैं। आरम्भ की चौपाई में पात्रों के रवाना होने और भरत के जाने, दोनों का उल्लेख है। जल को भेज देने के बाद भरत की अपनी उपस्थिति भी रहती है। छोटे भाई और ऋषियों सहित वे उस पुण्यस्थल तक पहुँचते हैं और पवित्र जल वहाँ रख देते हैं।
भरत अत्रि अनुसासन पाई । जल भाजन सब दिए चलाई॥
चौपाई १
सानुज आपु अत्रि मुनि साधू । सहित गए जहँ कूप अगाधू॥
जल के समर्पण पर अत्रि मुनि प्रेम से प्रसन्न होते हैं। वे भरत को तात कहकर उस स्थान का परिचय देते हैं: यह अनादि सिद्धस्थल है। समय के साथ इसका पता लुप्त हो गया था, इसलिए किसी को इसका ज्ञान नहीं रहा। जिस स्थल पर अभी सब उपस्थित हैं, उसका माहात्म्य ऋषि बहुत पहले से चला आता बताते हैं। उस प्राचीनता के साथ एक और बात भी वे रखते हैं, स्थान के विस्मृत हो जाने की। पुण्यभूमि अपने स्थान पर रही, लोगों की पहचान उससे छूट गयी।
मुनि आगे बताते हैं कि सेवकों ने उस जलयुक्त स्थान को देखा और सुन्दर तीर्थजल के लिए वहाँ विशेष कुआँ बना लिया। पोद्दारजी की टीका इन सेवकों को भरत के सेवक कहकर पहचानती है। इस विवरण में सेवकों का काम भी सुरक्षित है और स्थल की पुरातन महिमा भी। अत्रि पहले उसे अनादि सिद्धस्थल कहते हैं, फिर बताते हैं कि भूले हुए उसी जलयुक्त स्थान पर सेवकों ने जल के लिए कुआँ बनाया। भरत के साथ आये लोगों का यह कार्य उस स्थान को फिर परिचित कराता है।
अत्रि की दृष्टि में इस संयोग का लाभ बहुत व्यापक है। दैवयोग से संसार का उपकार हो गया। धर्म का जो विचार अत्यन्त अगम था, वह सुगम हुआ। टीका इस सुगमता को कूप के प्रभाव से जोड़ती है। जिन तीर्थों के जल यहाँ एकत्र हुए हैं, उनके संयोग से यह जगह अत्यन्त पवित्र हुई है। मुनि की बात में पहले सेवकों का काम आता है, फिर उस काम से होने वाला विश्व का उपकार। एक जगह रखा हुआ जल बहुत से प्राणियों के लिए पुण्य का अवसर बनता है।
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा॥
चौपाई २
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी॥
अब लोग इसे भरतकूप कहेंगे। अत्रि यह नाम बताते हुए स्नान का भाव भी स्पष्ट करते हैं। प्रेमपूर्वक और नियम से इसमें निमग्न होने वाले प्राणी मन, वचन और कर्म से निर्मल होंगे। तीनों को साथ रखिए: मन की वृत्ति, कही हुई बात और किया हुआ काम। मुनि के इस आशीर्वचन में निर्मलता जीवन के इन सभी पक्षों तक जाती है। तीर्थ के साथ प्रेम और नियम का सम्बन्ध इसी चौपाई में बताया गया है। उसका माहात्म्य सुनाते समय अत्रि आने वाले स्नानार्थियों के भाव को भी स्थान देते हैं।
कूप की महिमा कहते हुए सब राम के पास लौट आते हैं। वहाँ अत्रि मुनि रघुनाथ को इस तीर्थ का पुण्यप्रभाव सुनाते हैं। कथा कुएँ के पास पहुँचकर समाप्त नहीं होती; जो कार्य वहाँ हुआ और जिसका अर्थ वहाँ खुला, उसका समाचार राम तक आता है। भरत, शत्रुघ्न और साधु समाज के साथ किये गये इस समर्पण का वर्णन अब राम की उपस्थिति में होता है। दोहा इसी लौटने और सुनाने को साथ रखकर भरतकूप का यह प्रसंग पूरा करता है।
कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।
दोहा ३१०
अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ॥ ३१०॥
अत्रि की आज्ञा से भरत तीर्थजल समर्पित करते हैं। मुनि अनादि सिद्धस्थल, उसके लुप्त परिचय और सेवकों के बनाये विशेष कुएँ का सम्बन्ध बताते हैं। वे भरतकूप में प्रेम और नियम से स्नान का माहात्म्य कहकर लौटते हैं तथा राम को उसका पुण्यप्रभाव सुनाते हैं।
नंगे पाँव चले दोनों भाई
उस रात प्रेमपूर्वक धर्म के इतिहास कहे जाते हैं। रात सुख से बीतती है और सुबह होती है। तुलसी यहाँ उन इतिहासों के नाम नहीं गिनाते; आगे बढ़ने से पहले उनके कहने सुनने में बीती रात रखते हैं। अगली सुबह भरत और शत्रुघ्न अपनी नित्यक्रिया पूरी करते हैं। वे राम, अत्रि और गुरु वसिष्ठ की आज्ञा लेते हैं और समाज सहित वनभ्रमण के लिए निकलते हैं। इस यात्रा में दोनों भाई साथ हैं और आरम्भ से ही बड़ों की अनुमति उनके साथ है।
सबका साज सादा है। भरत और शत्रुघ्न राम के वन में पैदल चलते हैं, चरणों में पनही भी नहीं है। पोद्दारजी की टीका इस वनभ्रमण के लिए प्रदक्षिणा शब्द भी रखती है। कोमल चरणों को नंगे पाँव चलते देखकर धरती मन ही मन सकुचाती है और कोमल हो जाती है। तुलसी भूमि को भरत की दशा समझने वाली बना देते हैं। जिन चरणों के लिए रास्ता कठोर पड़ सकता था, उन्हीं की कोमलता देखकर धरती अपनी कठोरता हटाने लगती है।
आगे इस परिवर्तन की एक एक वस्तु बतायी गयी है। कुश, काँटे, कंकड़ियाँ और दरारें, रास्ते की जितनी कड़वी, कठोर और बुरी चीजें हैं, पृथ्वी उन्हें छिपा लेती है। मार्ग सुन्दर और मृदुल हो जाते हैं। केवल भूमि ही अनुकूल नहीं होती; सुख देने वाली हवा भी चलती है। वह शीतल है, मन्द है और सुगन्ध लिये हुए है। हवा की इन तीन विशेषताओं को साथ पढ़ने पर उस यात्रा की सहजता समझ में आती है: पाँव के नीचे की धरती और चारों ओर का वातावरण, दोनों सेवा में लग गये हैं।
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं । बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं॥
चौपाई ३
मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥
देवता फूल बरसाते हैं, बादल छाया करते हैं। वृक्ष फूलते और फलते हैं, तृण अपनी कोमलता से सेवा करते हैं। पशु देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर अपना स्नेह प्रकट करते हैं। कवि हर एक का अपना काम अलग रखते हैं। बादल के हिस्से छाया है, वृक्ष के हिस्से फल फूल, घास के हिस्से मृदुता और पक्षियों के हिस्से स्वर। सब भरत को राम का प्रिय जानकर सेवा में लगे हैं। इस वन में उनके लिए जो आदर उमड़ता है, उसका कारण भी उसी चौपाई में दिया गया है।
देवताओं से तृण तक फैली इस सेवा के बाद तुलसी एक दोहा कहते हैं। उसमें साधारण मनुष्य की जँभाई के समय निकले रामनाम की बात है। कवि के अनुसार, जब सहज जँभाई लेते हुए राम कह देने से प्राकृत मनुष्य को भी सब सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं, तब राम के प्राणप्रिय भरत के लिए प्रकृति का यह सहयोग कोई बड़ी आश्चर्य की बात नहीं। रामनाम की महिमा और भरत की प्रियता के सहारे वे इस पूरे दृश्य का अर्थ समझाते हैं।
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।
दोहा ३११
राम प्रानप्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात॥ ३११॥
दोहे में आलस्य भरे एक साधारण क्षण से आरम्भ करके भरत तक आने का क्रम है। एक ओर जँभाई में निकला नाम है, दूसरी ओर राम के प्राणों के समान प्रिय भाई हैं। कवि पहले नाम की इतनी सहज सुलभता कहते हैं, फिर भरत के प्रति उमड़ी सेवा को उसी विश्वास में रखते हैं। वन के मार्ग कोमल होने, फूलों के बरसने और पक्षियों के मधुर बोलने का वर्णन इस भक्तिभाव के भीतर है। उसके बीच भरत और शत्रुघ्न सादे साज में अपनी पैदल यात्रा करते रहते हैं।
रात के धर्मकथन के बाद दोनों भाई नित्यकर्म करके राम, अत्रि और वसिष्ठ की आज्ञा से नंगे पाँव निकलते हैं। धरती, हवा, देवता, बादल, पेड़ पौधे, पशु और पक्षी भरत को राम का प्रिय जानकर अपने अपने ढंग से उनकी सेवा करते हैं।
पाँच दिन का वनपरिचय
भरत इसी प्रकार वन में घूमते हैं। उनका नियम और प्रेम देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। जिस मार्ग में प्रकृति उनकी सेवा कर रही है, उसी में उनका अपना आचरण भी ऋषियों का ध्यान खींचता है। वे पवित्र जल के स्थान देखते हैं। पोद्दारजी की टीका नदी, बावली और कुण्ड का उल्लेख करके इस पद को खोलती है। भूमि के अलग अलग विभाग, पक्षी, पशु, वृक्ष और घास भी उनके सामने हैं। पर्वत, वन और बगीचे, सब इस दर्शन में आते हैं।
इन सबको भरत विशेष रूप से सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखते हैं। फिर वे प्रश्न करते हैं। अत्रि मुनि उनके प्रश्न सुनकर मन में प्रसन्न होते हैं और कारण, नाम, गुण तथा पुण्यप्रभाव कहते हैं। भरत के देखने के साथ पूछना जुड़ा हुआ है। किसी स्थल का स्वरूप देखकर वे उसके विषय में जानना चाहते हैं और मुनि उसे परिचय देते हैं। नाम से पहचान बनती है, कारण से उसका प्रसंग खुलता है, गुण और पुण्यप्रभाव से उसकी विशेषता समझ में आती है।
कथा इन सभी स्थानों के नाम अलग अलग नहीं गिनाती। वह भरत और अत्रि के बीच ज्ञान पाने का यह क्रम दिखाती है। पवित्र जल के स्थान से लेकर तृण तक, जो कुछ भरत देखते हैं उसके प्रति जिज्ञासा रखते हैं। ऋषि उनके प्रश्नों को आनन्द से लेते हैं। यहाँ वन का परिचय केवल दूर से निहार लेने में पूरा नहीं होता। भरत उसके स्थानों, जीवों और वनस्पतियों को देखते हैं तथा मुनि से उनके कारण और महिमा सुनते हैं। दर्शन के भीतर संवाद चलता है।
कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा॥
चौपाई ४
कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई । सुमिरत सीय सहित दोउ भाई॥
कहीं भरत स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं और कहीं मनोहर स्थल देखते हैं। कहीं अत्रि मुनि की आज्ञा पाकर बैठते हैं और सीता सहित राम तथा लक्ष्मण का स्मरण करते हैं। चौपाई ने हर स्थान पर एक ही आचरण नहीं रखा है। जल में स्नान है, किसी स्थल पर प्रणाम, कहीं दर्शन और कहीं अनुमति लेकर बैठना। बैठे हुए स्मरण में तीनों आते हैं: सीता, राम और लक्ष्मण। अत्रि का साथ भरत के प्रश्नों के उत्तर में भी है और बैठकर किये गये इस स्मरण की अनुमति में भी।
भरत का स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभाव देखकर वनदेवता आनन्द से आशीष देते हैं। ढाई पहर दिन बीत जाता है तो वे घूम फिरकर लौटते हैं और राम के चरणकमल देखते हैं। वन की यात्रा का दैनिक क्रम इसी लौटने से पूरा होता है। पवित्र स्थलों का दर्शन और राम के चरणों का दर्शन एक दिन के भीतर जुड़े हैं। यात्रा में स्मरण है, वापसी पर प्रत्यक्ष दर्शन। भरत का वनभ्रमण इस आवागमन के साथ चलता है, इसलिए दिनों की संख्या के साथ दिन में लौटने का समय भी याद रखना चाहिए।
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।
दोहा ३१२
कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ॥ ३१२॥
पाँच दिन में भरत सब तीर्थस्थानों को देख लेते हैं। पाँचवाँ दिन भी विष्णु और महादेव का सुन्दर यश कहते सुनते बीतता है, फिर सन्ध्या होती है। टीका यहाँ पाँचवें दिन को स्पष्ट करती है। अभी तक प्रत्येक दिन के भीतर भ्रमण, ढाई पहर बाद लौटना और राम के चरणों का दर्शन था; अब उन पाँच दिनों के पूरे होने का उल्लेख है। अन्तिम दिन की सन्ध्या हरि और हर के यश से भरी हुई है। अगली सुबह सभा में जो बात उठेगी, उसके पहले यह पाँच दिन का परिचय सम्पन्न हो चुका है।
भरत अत्रि से वन के स्थलों का नाम, कारण, गुण और पुण्यप्रभाव पूछते हैं। स्नान, प्रणाम, दर्शन तथा मुनि की अनुमति से बैठकर स्मरण करते हुए वे प्रतिदिन ढाई पहर बाद लौटते हैं। पाँच दिनों में सब तीर्थदर्शन पूरे होते हैं; पाँचवीं सन्ध्या विष्णु और महादेव का यश कहते सुनते आती है।
छठी सुबह और राम का संकोच
अगले दिन सुबह स्नान करके सब लोग एकत्र होते हैं। भरत हैं, ब्राह्मण हैं, तिरहुत के राजा जनक हैं और सारा समाज है। पोद्दारजी की टीका इसे छठा दिन कहती है। पाँच दिन के तीर्थदर्शन पूरे हो चुके हैं; अब यह सभा उस भ्रमण के बाद की है। राम अपने मन में जानते हैं कि आज सबको विदा देने के लिए अच्छा दिन है। समय अनुकूल है, फिर भी कृपालु राम उसे कहने में सकुचाते हैं। उचित अवसर को जान लेना उनके लिए विदा की बात कहना आसान नहीं कर देता।
गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी॥
चौपाई ५
सील सराहि सभा सब सोची । कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची॥
वे गुरु वसिष्ठ, राजा जनक, भरत और सभा की ओर देखते हैं। फिर संकोच के कारण दृष्टि फेरकर पृथ्वी की ओर देखने लगते हैं। यहाँ वह संकोच एक बतायी हुई मनःस्थिति भी है और दिखाई देने वाला व्यवहार भी। सभा ने उनकी दृष्टि देखी है। सब उनके शील की सराहना करते हुए सोचते हैं कि राम के समान संकोची स्वामी कहीं नहीं हैं। जिसकी ओर सब आज्ञा के लिए देखते हैं, वही किसी को विदा कहने में इतना संकोच कर रहा है।
भरत राम का रुख समझ लेते हैं। वे प्रेमपूर्वक उठते हैं, विशेष धैर्य धारण करते हैं, दण्डवत् प्रणाम करते हैं और हाथ जोड़कर बोलते हैं। इस क्रम में उनकी तैयारी साफ दिखाई देती है। भाई का आशय पहचानने के बाद उन्हें अपने भीतर धीरज भी लाना पड़ा है। उनकी बात राम की कृपा के स्वीकार से शुरू होती है: नाथ, आपने हमारी सारी रुचियाँ रखीं। वे अब तक मिली अनुमति और सम्मान को पूरा मानकर आगे की प्रार्थना रखते हैं।
वे कहते हैं कि हमारे लिए सब लोगों ने सन्ताप सहा और आपने भी बहुत तरह से दुःख पाया। अपने मन की इच्छा कहते समय वे पूरे समाज का कष्ट याद रखते हैं। फिर स्वामी से आज्ञा माँगते हैं कि अवध जाकर निश्चित अवधि तक उसकी सेवा करें। टीका इस अवधि को चौदह वर्ष कहती है। भरत की विदा की प्रार्थना में अवध के प्रति उनका काम भी आ गया है। वे जाकर उस नगर की सेवा करना चाहते हैं और उसके लिए राम की रजा माँग रहे हैं।
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।
दोहा ३१३
सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल॥ ३१३॥
इसके साथ वे एक और प्रार्थना करते हैं। हे दीनदयालु, हे कृपालु कोसलपाल, जिस उपाय से यह सेवक फिर चरणों का दर्शन कर सके, उसी की शिक्षा इस अवधि के लिए दीजिए। भरत केवल जाने की अनुमति लेकर संतुष्ट नहीं होते। उन्हें उन चौदह वर्षों के लिए सीख चाहिए, जिसका सम्बन्ध अन्ततः राम के चरणों तक फिर पहुँचने से हो। आगे की सेवा और आगे का मिलन, दोनों उनकी इस माँग में जुड़े हुए हैं। अवधि का पालन करते हुए दर्शन की आकांक्षा जीवित रखनी है।
राम जिस बात को कहने में संकोच कर रहे थे, भरत ने स्वयं उसे प्रार्थना का रूप दे दिया। मगर उन्होंने अपनी ओर से पूरा निर्णय घोषित नहीं किया। वे आज्ञा और शिक्षा, दोनों माँगते हैं। सभा के सामने उनके उठने, दण्डवत् करने और हाथ जोड़ने के बाद जो वचन आये हैं, उनमें कृपा की स्मृति, सबके कष्ट का ध्यान, अवध की सेवा और पुनर्दर्शन की चाह एक क्रम में हैं। विदा का दिन इस तरह भरत की विनती से आगे बढ़ता है।
छठी सुबह राम विदा का शुभ अवसर जानते हुए भी सकुचाकर धरती की ओर देखते हैं। भरत उनका आशय समझकर उठते हैं, प्रणाम करते हैं और चौदह वर्ष तक अवध की सेवा की आज्ञा माँगते हैं। साथ ही वे उस अवधि के लिए पुनर्दर्शन का मार्ग बताने वाली शिक्षा चाहते हैं।
दोनों ओर निभाने का भरोसा
भरत की विनती में अवध के लोग फिर आते हैं। वे राम से कहते हैं कि नगरवासी, कुटुम्बी और प्रजा, सभी आपके प्रेम और सम्बन्ध से पवित्र तथा आनन्दमय हैं। इस सम्बन्ध का मूल्य वे अगले ही वाक्य में रखते हैं। आपके लिए जन्म मरण के दुःख की आग में जलना भी अच्छा है; आपके बिना परमपद का लाभ भी व्यर्थ है। टीका परमपद का अर्थ मोक्ष करती है। भरत अपने लिए सुख की कोई अलग माप नहीं रखते। राम से सम्बन्ध ही उनके स्वीकार और अस्वीकार का आधार है।
दुःख और परमपद का यह उल्लेख उन्हीं की प्रार्थना का हिस्सा है। वे पहले प्रजा तथा परिजनों की पवित्रता कहते हैं, फिर उस प्रेम का अपना मूल्य बताते हैं। राम के लिए भवदुःख भी स्वीकार है, राम के बिना मोक्ष भी उन्हें सारहीन लगता है। अवध जाने की आज्ञा माँगते समय उन्होंने अपने मन की यह स्थिति भी सामने रख दी है। राज्य की सेवा का काम ग्रहण करने में उनके लिए सबसे बड़ा सहारा वही सम्बन्ध है, जिससे प्रजा और परिवार भी रस पाते हैं।
इसके बाद भरत राम की सुजानता पर भरोसा रखते हैं। आप सबके हृदय की बात जानते हैं। इस सेवक की रुचि, लालसा और रहनी भी आपसे छिपी नहीं है। वे केवल एक इच्छा का उल्लेख नहीं करते; इच्छा के साथ उसका ढंग और जीवन का आचरण भी रखते हैं। प्रणतपाल होकर राम सबका पालन करेंगे और दोनों ओर अन्त तक निभाएँगे, ऐसा भरत का विश्वास है। घर और वन के बीच पड़ने वाली दूरी के समय वे इसी सर्वज्ञता और पालन का आश्रय लेते हैं।
यह भरोसा उन्हें सब प्रकार से बहुत बड़ा लगता है। विचार करने पर तिनके के बराबर भी सोच शेष नहीं रहती। इतनी निश्चितता के बाद वे अपनी विनती की निर्भीकता पर आते हैं। हमारी दीनता और नाथ का स्नेह, दोनों ने मिलकर हमें ढीठ बना दिया है। वे अपनी ओर की आरति और राम की ओर के छोह को साथ बताते हैं। प्रार्थना कर पाने का साहस इन्हीं दो से मिला है। अपनी आवश्यकता का तीखापन भी है, और सामने वाले की करुणा पर पूरा विश्वास भी।
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी॥
चौपाई ६
भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी । खीर नीर बिबरन गति हंसी॥
भरत कहते हैं कि स्वामी इस बड़े दोष को दूर करें और संकोच छोड़कर अपने अनुगामी को शिक्षा दें। वे राम से वही माँग फिर रखते हैं, मगर अब उसका पूरा आधार कह चुके हैं। सबके प्रति राम का प्रेम, भरत की अनन्य चाह, दोनों ओर के पालन का भरोसा और अपनी दीनता, सब सुन लेने के बाद शिक्षा की यह माँग आती है। सभा के लोग उनकी विनती की प्रशंसा करते हैं। उसे दूध और जल को अलग करने वाली हंसिनी की चाल के समान कहा गया है।
यह उपमा विनती की विवेकपूर्ण स्पष्टता को सामने लाती है। भरत ने अपनी चाह छिपायी नहीं और सेवा का काम भी अस्पष्ट नहीं छोड़ा। वे राम को फिर देखना चाहते हैं, अवध की सेवा की अनुमति चाहते हैं और वह सीख चाहते हैं जो अवधि भर उनका मार्ग सँभाले। इन बातों को उनकी विनती अलग अलग पहचान देती है। उसी स्पष्टता पर सभा का अनुमोदन मिलता है। दूध और जल का विवेक करने वाली हंसिनी की छवि के बाद उत्तर देने वाले राम का परिचय आता है।
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।
दोहा ३१४
देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन॥ ३१४॥
दीनबन्धु राम भाई के दीन और छलरहित वचन सुनते हैं। वे प्रवीण हैं और देश, काल तथा अवसर के अनुकूल उत्तर देते हैं। तीनों का उल्लेख साथ है: स्थान की स्थिति, समय और सामने का अवसर। भरत की विनती जितनी विशिष्ट थी, उत्तर भी उसी परिस्थिति का होने जा रहा है। अवध की जिम्मेदारी, वन की अवधि और बड़ों का संरक्षण, सब अब राम की सीख में स्थान पाएँगे। प्रार्थना में मिले विश्वास को वे पालन की रीति में खोलते हैं।
भरत राम से सम्बन्ध को दुःख और मोक्ष से भी ऊपर रखते हैं। उन्हें भरोसा है कि सबके मन को जानने वाले राम दोनों ओर अन्त तक निभाएँगे। संकोच छोड़कर शिक्षा देने की उनकी स्पष्ट विनती सबको प्रिय लगती है; राम देश, काल और अवसर के अनुसार उत्तर आरम्भ करते हैं।
पिता की आज्ञा और प्रजा का पालन
राम भरत को तात कहकर पहले चिन्ता का भार हलका करते हैं। घर और वन की, दोनों भाइयों की तथा उनके परिवार की चिन्ता गुरु वसिष्ठ और राजा जनक को है। हमारे सिर पर गुरु, मुनि और मिथिलेश हैं, इसलिए स्वप्न में भी क्लेश नहीं है। पोद्दारजी की टीका यहाँ मुनि का नाम विश्वामित्र बताती है। राम के आश्वासन में वसिष्ठ, विश्वामित्र और जनक तीनों उपस्थित हैं। भरत जिस जिम्मेदारी की ओर लौटने वाले हैं, उसके ऊपर बड़ों का संरक्षण है।
फिर वे दोनों भाइयों के अपने काम पर आते हैं। परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ, ये सभी पिता की आज्ञा के पालन में हैं। राम पाँचों को एक साथ रखते हैं। अपना हित और लोक में मिलने वाला यश भी उसी में है, धर्म और परम कल्याण भी। दोनों भाई पिता की आज्ञा निभाएँ, यही उनका काम है। राजा की भलाई, जिसे टीका उनके व्रत की रक्षा कहती है, लोक और वेद दोनों में भलाई का आधार है।
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु । स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु॥
चौपाई ७
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाईं । लोक बेद भल भूप भलाईं॥
इस उत्तर में राम भरत को शिक्षा देते हुए स्वयं को भी उसी आज्ञा में रखते हैं। पिता के वचन का पालन दोनों भाइयों को करना है। घर में रहने वाले भाई और वन में रहने वाले भाई की जिम्मेदारियाँ अपनी अपनी जगह हैं, मगर व्रत की रक्षा दोनों का सम्बन्ध जोड़ती है। भरत ने अवधि भर की सीख माँगी थी; राम उस अवधि को किसी अकेले व्यक्ति पर रखा भार मानने का अवसर नहीं देते। गुरु और राजा संरक्षण सँभालते हैं, दोनों भाई पिता की आज्ञा का पालन करते हैं।
अगली चौपाई में वे गुरु, पिता, माता और स्वामी की शिक्षा का फल बताते हैं। ऐसी शिक्षा का पालन करने से कुमार्ग पर चलने पर भी पैर गड्ढे में नहीं पड़ता, अर्थात् पतन नहीं होता। यह आश्वासन राम के कथन के रूप में आता है। उसी को विचारकर वे भरत से सब सोच छोड़ने और अवध जाकर निश्चित अवधि तक उसका पालन करने को कहते हैं। मार्ग और गड्ढे की उपमा में शिक्षा का संरक्षण व्यक्त है। भरत के प्रश्न का उत्तर अब सीधे उनके आगामी काम तक पहुँच गया है।
देश, कोष, कुटुम्ब और परिवार की जिम्मेदारी गुरु की चरणरज पर है। इस भरोसे के साथ राम भरत को व्यवहार की स्पष्ट रीति बताते हैं: मुनि वसिष्ठ, माताओं और मन्त्रियों की शिक्षा मानकर पृथ्वी, प्रजा तथा राजधानी की रक्षा करते रहें। देश और खजाने की चिन्ता कही गयी है, परिवार और परिजनों की भी। जिनसे सलाह लेनी है, उनके नाम भी दिये गये हैं। अवध का पालन इन सब सम्बन्धों के बीच होगा। शिक्षा में माताएँ भी हैं, मुनि भी हैं और राज्य के मन्त्री भी हैं।
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
दोहा ३१५
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥ ३१५॥
अब मुखिया के लिए मुख की उपमा आती है। खाने पीने के लिए मुख अकेला है, मगर वह विवेक से सभी अंगों का पालन और पोषण करता है। ध्यान दीजिए कि दोहे में अकेले मुख के साथ सभी अंग रखे गये हैं। नेतृत्व के स्थान पर जो है, उसका ग्रहण पूरे शरीर के पोषण से जुड़ा होना चाहिए। विवेक इस उपमा का आवश्यक शब्द है। सब अंगों तक पोषण पहुँचना है और उसका ठीक विचार भी रखना है। यही छवि राम की राजधर्म सम्बन्धी सीख को बहुत निकट से समझा देती है।
अगली चौपाई इसे राजधर्म का सर्वस्व कहती है, जैसे मन के भीतर मनोरथ छिपा रहता है। विस्तृत राजधर्म का सार इस छोटे कथन में समाया हुआ है। राम ने भरत को बहुत प्रकार से समझाया है। उनके उत्तर में बड़ों के संरक्षण का विश्वास है, पिता की आज्ञा है, सलाह लेने वालों का परिचय है और प्रजा के पालन की रीति है। अब यह सब सुन लेने के बाद भरत के मन में जो बाकी है, कथा उसकी ओर आती है: किसी अवलम्ब के बिना न सन्तोष मिलता है, न शान्ति।
राम बड़ों के संरक्षण का भरोसा देकर दोनों भाइयों के लिए पिता की आज्ञा का पालन मुख्य ठहराते हैं। भरत को वसिष्ठ, माताओं और मन्त्रियों की सलाह से देश, प्रजा और राजधानी सँभालनी है। मुखिया मुख के समान विवेक से सभी अंगों का पोषण करे, इसी में राजधर्म का सार समाया है।
सिर पर धरी हुई चरणपादुकाएँ
भरत का मन अवलम्ब चाहता है। राम उनका शील और प्रेम देखते हैं। साथ ही गुरुजन हैं, मन्त्री हैं और समाज है। इन सबकी उपस्थिति में राम संकोच तथा स्नेह के विशेष वश में हो जाते हैं। पोद्दारजी की टीका इस स्थिति को खोलती है: भरत के प्रेमवश वे पादुकाएँ देना चाहते हैं, किन्तु गुरु आदि की उपस्थिति का संकोच भी है। पहले विदा की बात कहने में जो संकोच था, अब प्रेम का यह अवलम्ब देने के समय भी उसका अनुभव होता है।
भरत सील गुर सचिव समाजू । सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥
चौपाई ८
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं । सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥
आखिर प्रभु कृपा करके पादुकाएँ दे देते हैं। भरत उन्हें आदर से सिर पर धारण कर लेते हैं। देने और स्वीकार करने की घटना चौपाई में इतनी ही स्पष्ट है। राम की ओर से कृपा है, भरत की ओर से आदर। जिस अवलम्ब के अभाव में उनके मन को सन्तोष और शान्ति नहीं थी, वह अब मिल गया है। राम ने उन्हें अवध के पालन की रीति समझायी थी; अब उनके साथ रहने के लिए चरणपादुकाएँ भी हैं। भरत का सिर उन्हें ग्रहण करता है।
तुलसी इसके बाद पादुकाओं के अर्थ को छह तुलनाओं में खोलते हैं। पहली तुलना प्रजा से जुड़ी है: करुणानिधान के दोनों खड़ाऊँ लोगों के प्राणों की रक्षा के लिए दो पहरेदार जैसे हैं। राम की सीख में प्रजा का पालन था, यहाँ प्रजा के प्राणों की रखवाली है। दूसरी तुलना भरत के प्रेम से जुड़ती है। वह प्रेम रत्न है और पादुकाएँ उसे सुरक्षित रखने का सम्पुट, अर्थात् डिब्बा हैं। एक तुलना बाहर के लोगों की रक्षा दिखाती है, दूसरी भरत के अपने अमूल्य प्रेम का संरक्षण।
चरनपीठ करुनानिधान के । जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥
चौपाई ९
संपुट भरत सनेह रतन के । आखर जुग जनु जीव जतन के॥
तीसरी छवि रामनाम के दो अक्षरों की है। पोद्दारजी की टीका बताती है कि जीव के साधन के लिए पादुकाएँ उन दो अक्षरों के समान हैं। नाम की जो सहज महिमा वनभ्रमण के दोहे में आयी थी, वही नाम यहाँ अवलम्ब की उपमा में है। कवि पादुकाओं को देखते हुए जीव के प्रयत्न और साधन का सहारा कहते हैं। इस प्रकार उनका अर्थ प्रजा के प्राणों से भरत के प्रेम तक और वहाँ से जीव की साधना तक पहुँचता है। हर तुलना संरक्षण या साधन का एक नया पक्ष खोलती है।
चौथी तुलना रघुकुल की रक्षा करने वाले दो किवाड़ों की है। कुल के लिए जो द्वार सुरक्षित रखे, वह काम पादुकाओं में देखा गया है। पाँचवीं तुलना श्रेष्ठ कर्म करने वाले दो हाथों की है। हाथ काम में सहायक हैं; पादुकाएँ कुशल कर्म का सहारा हैं। छठी तुलना सेवा के सुन्दर धर्म को समझाने वाली निर्मल आँखों की है। इन आँखों में सेवा की राह को पहचानने की स्पष्टता है। कवि पहरेदार, सम्पुट, अक्षर, किवाड़, हाथ और नेत्र, इन छह रूपों से उसी प्राप्त अवलम्ब को समझाते हैं।
कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के॥
चौपाई १०
भरत मुदित अवलंब लहे तें । अस सुख जस सिय रामु रहे तें॥
इन उपमाओं का सम्बन्ध उस उत्तर से बना रहता है जो अभी राम ने दिया था। पालन करना है, श्रेष्ठ कर्म करना है और सेवा का धर्म समझना है। पादुकाओं में तुलसी इन कामों का सहारा दिखाते हैं। भरत का प्रेम भी उनमें सुरक्षित है, रघुकुल की रक्षा भी है। कोई एक उपमा बाकी सबको अपने भीतर नहीं समेट लेती, इसलिए कवि एक के बाद एक अलग काम बताते हैं। सभी का केन्द्र वही कृपापूर्वक मिला हुआ अवलम्ब है, जिसे भरत ने आदर से सिर पर रखा है।
भरत उससे परम प्रसन्न होते हैं। उन्हें ऐसा सुख मिलता है जैसा सीता और राम के रहने से होता। यह तुलना उनके आनन्द की माप है। सीख सुन लेने के बाद भी उनके मन में जो असन्तोष शेष था, अब उसके स्थान पर यही सुख है। राम की कृपा से मिला सहारा भरत के लिए इतना पूर्ण है। कथा उस प्रसन्नता को बताकर विदा की प्रार्थना की ओर आती है। भरत का प्रणाम और राम का आलिंगन अगली पंक्ति में आते हैं।
राम कृपा करके पादुकाएँ देते हैं और भरत उन्हें सिर पर रखते हैं। वे प्रजा के प्राणों के पहरेदार, प्रेमरत्न का सम्पुट, रामनाम के दो अक्षर, कुल के किवाड़, शुभ कर्मों के हाथ और सेवा की निर्मल आँखों जैसी हैं। इस अवलम्ब से भरत को सीताराम के रहने जैसा सुख मिलता है।
कुचाल भी जीवन का सहारा हुई
भरत प्रणाम करके विदा माँगते हैं। राम उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। इसी समय इन्द्र बुरा अवसर पाकर लोगों का मन उचाट कर देते हैं। दोहे में एक ओर भाइयों का स्नेह है और दूसरी ओर इन्द्र की कुटिलता। वे विदा के इस कठिन अवसर में लोगों की स्थिति को और बेचैन करने का काम करते हैं। मगर अगले ही चरण में कथा उनके किये का फल बताती है और वहाँ राम की कृपा से वह कुचाल सबके लिए हितकारी हो जाती है।
तुलसी कहते हैं कि वह उच्चाटन भी जीवन के लिए ऐसा सहारा हुआ जैसा अवधि पूरी होने की आशा है। जिन लोगों को सीता, राम और लक्ष्मण के वियोग का दुःख सहना है, उनके प्राणों के लिए पुनर्मिलन की निश्चित अवधि का भरोसा सहायक है। उसी के समान इन्द्र का किया उच्चाटन भी जीवन देने वाला पड़ता है। टीका उसे संजीवनी कहकर समझाती है। यहाँ अवधि की आशा और मन के उचाट होने का परिणाम साथ रखे गये हैं, दोनों इस समय वियोग को सह सकने में सहायक होते हैं।
कवि आगे जो कहते हैं, उसे सम्भावना के उसी रूप में सुनना चाहिए। यदि यह उच्चाटन न हुआ होता तो सीता, राम और लक्ष्मण के वियोगरूपी बुरे रोग से सब लोग घबराकर मर जाते। यह अनहोनी का अनुमान है, किसी की मृत्यु का समाचार नहीं। कथा बताती है कि ऐसा होने से वे बच गये। वियोग का रोग कितना घातक हो सकता था, उसकी गम्भीरता से इन्द्र की कुचाल का बदला हुआ फल समझ में आता है। जिस काम का आशय कुटिल था, राम की कृपा से उससे भी जीवन बचने का सहारा मिला।
राम की कृपा सारी उलझन सुधार देती है। देवताओं की सेना, जो लूटने आयी थी, वही अब हितकारी और रक्षक हो जाती है। यह अगली चौपाई की छवि है। पहले उच्चाटन का लोगों पर पड़ा फल कहा गया, अब देवताओं की उस कोशिश का पूरा रूप बदलकर सामने आता है। लूट के लिए आयी सेना का रक्षक हो जाना उसी कृपा की महिमा बताता है। वर्णन इसी बात पर लौटता है कि प्रतिकूल चाल का अन्तिम फल भी राम के हाथ में सुधर जाता है।
और उस समय राम भाई भरत को भुजाओं में भरकर मिल रहे हैं। तुलसी कहते हैं कि राम के उस प्रेम का रस कहा नहीं जाता। भरत को मिले अवलम्ब का आनन्द सुनाने के बाद अब राम के प्रेम की बारी है। भाई को आलिंगन में लेते हुए उनका तन, मन और वचन अनुराग से भर उठते हैं। धीरज की धुरी धारण करने वाले राम भी धीरज छोड़ देते हैं। जिनसे भरत को इतना आश्वासन मिला है, उनका अपना हृदय भी इस मिलन में छलक पड़ता है।
तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा॥
चौपाई ११
बारिज लोचन मोचत बारी । देखि दसा सुर सभा दुखारी॥
उनके कमल जैसे नेत्रों से जल बहने लगता है। प्रेम यहाँ तन, मन और वचन में उमड़ा है और आँखों से बहते हुए दिखाई देता है। देवताओं की सभा राम की यह दशा देखकर दुःखी हो जाती है। अभी उनके प्रयत्न का हितकारी परिणाम बताया गया था; अब उनके सामने राम के आँसू हैं। कथा दोनों को कहती है। कृपा से सब सँभलता है, और उस कृपालु का भाई के लिए उमड़ा प्रेम देखने वालों को व्याकुल करता है। आलिंगन का यह क्षण अभी पूरा नहीं हुआ है।
भरत विदा माँगते हैं और राम उन्हें हृदय से लगाते हैं। इन्द्र का उच्चाटन राम की कृपा से वियोग सहने में सहायक हो जाता है; उसके बिना सबके मर जाने की बात सम्भावना के रूप में कही गयी है। राम स्वयं प्रेम में धीरज छोड़कर आँसू बहाते हैं और देवसभा दुःखी होती है।
ज्ञान की अग्नि में कसा सोना
अन्त में तुलसी सभा के मुनियों, गुरु वसिष्ठ और जनक की ओर ले जाते हैं। ये धीरज के धुरन्धर हैं। अपने मन को ज्ञान की अग्नि में सोने की तरह कस चुके हैं। उपमा में ज्ञान अग्नि है और मन सोना; उसकी परीक्षा हो चुकी है। जिन लोगों के सामने अभी दोनों भाइयों का मिलन हो रहा है, उनका धैर्य समझाने के लिए कवि यह परिचय देते हैं। वे संसार के अनुभव से अनजान दर्शक नहीं हैं। ज्ञान में परखे हुए उनके मन भी इस प्रेम के सामने हैं।
दूसरी उपमा कमल के पत्ते की है। ब्रह्मा ने इन्हें निर्लेप ही रचा है; जगत के जल में जन्मे हुए भी वे कमलपत्र की तरह उससे अनासक्त हैं। पानी में कमल का पत्ता होने की छवि यहाँ जगत में रहते हुए निर्लेपता का अर्थ स्पष्ट करती है। पहली उपमा ज्ञान में परखे जाने की थी, दूसरी संसार के बीच अनासक्त रहने की है। मुनियों और जनक जैसे धीर पुरुषों का यह परिचय देने के बाद कवि बताते हैं कि राम और भरत के प्रेम को देखकर उनका क्या हुआ।
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
दोहा ३१७
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार॥ ३१७॥
वे भी उस अनुपम और अपार प्रेम में मन, तन तथा वचन से मग्न हो जाते हैं। दोहे में वैराग्य और विचार भी साथ हैं। पोद्दारजी की टीका विचार को विवेक कहती है। इसलिए इस मग्नता में उनका ज्ञान या वैराग्य नष्ट होने की बात नहीं कही गयी है। वे वैराग्य और विवेक सहित ही प्रेम में डूबते हैं। सोने और कमलपत्र की पिछली दोनों उपमाएँ इस अन्तिम विशेषता के साथ पूरी होती हैं। उनका परखा हुआ, निर्लेप मन भी दोनों भाइयों के स्नेह में पूरा सम्मिलित है।
यहाँ तक आकर आलिंगन का असर राम और भरत से बाहर पूरी सभा तक फैल गया है। राम के तन, मन और वचन में अनुराग उमड़ा था; अब मुनियों के तन, मन और वचन भी उसी प्रेम में मग्न हैं। देवसभा ने राम के आँसू देखकर दुःख अनुभव किया, धीर मुनियों ने विवेक और वैराग्य सहित अपार स्नेह में प्रवेश किया। इन अलग प्रतिक्रियाओं के बीच दोनों भाइयों का प्रेम ही सामने बना रहता है। भरत को अवलम्ब मिल चुका है, विदा माँगी जा चुकी है, और कथा अभी इसी मिलन पर ठहरी है।
ज्ञान की अग्नि में सोने जैसे परखे मन वाले, जगत में कमलपत्र जैसे निर्लेप मुनि भी राम और भरत के प्रेम में मग्न होते हैं। तुलसी उनके वैराग्य और विवेक को साथ रखते हैं। दोहा इन्हीं सहित तन, मन और वचन से प्रेम में डूबने पर समाप्त होता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में भरत के लिए मिलने वाला परिचय क्रमशः सेवा की दिशा साफ करता है। अत्रि तीर्थ के विषय में कारण, नाम, गुण और पुण्यप्रभाव बताते हैं। राम अवध की सेवा के लिए जिम्मेदारी, परामर्श और पालन की रीति बताते हैं। भरत दोनों जगह पूछते हैं और मिली हुई सीख के अनुसार चलना चाहते हैं। वन का एक स्थल समझने में भी उनकी जिज्ञासा है, चौदह वर्ष का काम ग्रहण करने में भी शिक्षा की माँग है।
मुख और अंगों की उपमा को पादुकाओं की उपमाओं के पास रखकर देखें तो पालन का एक क्रम दिखाई देता है। मुखिया सभी अंगों को पोषण देता है। पादुकाएँ प्रजा के प्राणों की रखवाली करती हैं, श्रेष्ठ कर्मों के लिए हाथ और सेवा समझने के लिए आँखें हैं। राजधर्म और भरत का निजी प्रेम इसी काम में जुड़ते हैं। जिसे उन्होंने सिर पर रखा है, कवि उसे लोगों के जीवन, कुल की रक्षा और सेवा की दृष्टि से परिचित कराते हैं।
और अन्तिम दोहे का छोटा सा विशेषण याद रहता है: वैराग्य और विवेक सहित। मुनियों की प्रेममग्नता पूरी है और उनकी समझ भी उनके साथ है। राम स्वयं धीरज छोड़कर रोते हैं, सभा उनका प्रेम देखती है और ज्ञान में परखे हुए मन उससे भर जाते हैं। इन सबके बीच भरत को मिला अवलम्ब अपनी जगह है। शिक्षा ने उनका काम बताया, चरणपादुकाओं ने उनके मन को सन्तोष दिया और आलिंगन में उस सम्बन्ध का अपार स्नेह दिखाई पड़ा।
भरतकूप में समर्पित जल से आरम्भ हुआ यह प्रसंग राम की भुजाओं में भरत पर ठहरता है। बीच में वन के पाँच दिन हैं, छठी सुबह की विनती है और राजधर्म की पूरी सीख है। हर चरण पर भरत का प्रेम किसी काम से जुड़ता है, समर्पण से, दर्शन से और प्रजा के पालन से। अब पादुकाओं का अवलम्ब पाकर वे प्रसन्न हैं; सामने वही राम हैं जिनकी कृपा और स्नेह ने उनकी विनती स्वीकार की है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ३१० से ३१७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।