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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 35
भरतकूप, राम की सीख और चरणपादुकाएँ
तीर्थजल का समर्पण, और वन में पाँच दिन का भ्रमण। विदा से पहले मिला वह अवलम्ब, जिसे भरत आदर से सिर पर रखते हैं।
अत्रि मुनि की आज्ञा पाकर भरत जल के सब पात्र आगे भेज देते हैं। वे अपने छोटे भाई, अत्रि मुनि और साधुओं के साथ उस अथाह कुएँ तक जाते हैं। वहाँ अत्रि बताते हैं कि यह स्थान अनादि सिद्ध है, जिसे समय ने लुप्त कर दिया था। पाँच दिन भरत वन के स्थल और तीर्थ देखते हैं, और फिर एक सवेरे सभा जुटती है, जिसमें भरत राम से अपनी विनती करते हैं।
राम मन में जानते हैं कि आज अच्छा दिन है, पर कहने में सकुचाते हैं और धरती की ओर देखने लगते हैं। भरत उनका रुख देखकर अवध जाकर सेवा करने की आज्ञा और अवधि भर के लिये सीख माँगते हैं। राम बहुत प्रकार से समझाते हैं, पर किसी अवलम्ब के बिना भरत के मन को न सन्तोष मिलता है, न शान्ति। राम कृपा करके अपनी चरणपादुकाएँ देते हैं, और उन्हें पाकर भरत को वैसा सुख होता है जैसा सीता और राम के रहने से होता।
भरतकूप से विदा की सभा तक
- भरत तीर्थजल समर्पित करते हैं, वन के पवित्र स्थल देखते हैं और राम से अवध के पालन की शिक्षा तथा चरणपादुकाओं का अवलम्ब पाते हैं।
- राम भरत को पिता की आज्ञा और प्रजा के पालन का मार्ग बताते हैं। वे चरणपादुकाएँ देकर भाई को हृदय से लगाते हैं।
- शत्रुघ्न भरत के छोटे भाई, जो जल के समर्पण और वनभ्रमण में उनके साथ जाते हैं।
- अत्रि मुनि भरतकूप का माहात्म्य बताते हैं और वन के स्थलों का नाम, कारण, गुण तथा पुण्यप्रभाव समझाते हैं।
- वसिष्ठ, विश्वामित्र और जनक गुरु, मुनि और मिथिलापति, जो राम के वचनों में दोनों भाइयों के सिर पर हैं। पोद्दार की टीका मुनि को विश्वामित्र बताती है। राम कहते हैं कि घर और वन की चिन्ता गुरु और राजा को है।
- इन्द्र जो कुटिल हैं, और बुरा अवसर पाकर लोगों के मन उचाट कर देते हैं। उनकी वह कुचाल सबके लिये भली हो जाती है, और राम की कृपा उलझन सुधार देती है।
तीर्थजल को मिला स्थान
अत्रि मुनि की आज्ञा पाकर भरत जल के सब पात्र भेज देते हैं। फिर वे स्वयं शत्रुघ्न, अत्रि मुनि और साधुओं के साथ वहाँ जाते हैं जहाँ वह अथाह कुआँ है। उस पुण्यस्थल पर वे पवित्र जल रख देते हैं।
जल रखे जाने पर अत्रि मुनि प्रेम से प्रसन्न होकर भरत को तात कहकर उस स्थान का परिचय देते हैं: यह अनादि सिद्धस्थल है। समय के साथ यह लुप्त हो गया था, और किसी को इसका पता नहीं रहा।
मुनि आगे बताते हैं कि सेवकों ने उस जल भरे स्थान को देखा और सुन्दर जल के लिये वहाँ एक विशेष कुआँ बना लिया। पोद्दार की टीका इन्हें भरत के सेवक बताती है।
अत्रि कहते हैं कि विधाता के वश संसार का उपकार हो गया, और धर्म का जो विचार अत्यन्त अगम था, वह सुगम हो गया। पोद्दार की टीका इस सुगमता को कूप के प्रभाव से जोड़ती है।
अत्रि कहते हैं कि अब लोग इसे भरतकूप कहेंगे। तीर्थों के जल के संयोग से यह अत्यन्त पवित्र है। प्रेम और नियम से इसमें स्नान करनेवाले प्राणी कर्म, मन और वचन से निर्मल होंगे।
कूप की महिमा कहते हुए सब वहाँ जाते हैं जहाँ राम हैं, और अत्रि मुनि राम को इस तीर्थ का पुण्यप्रभाव सुनाते हैं।
नंगे पाँव चले दोनों भाई
उस रात प्रेम से धर्म के इतिहास कहे जाते हैं, रात सुख से बीतती है, और सवेरा होता है। भरत और शत्रुघ्न नित्यक्रिया पूरी करके राम, अत्रि और गुरु वसिष्ठ की आज्ञा लेते हैं। फिर वे समाज सहित वन में भ्रमण के लिये निकलते हैं।
सबका साज सादा है। भरत और शत्रुघ्न राम के वन में पैदल चलते हैं, पाँवों में जूते भी नहीं। पोद्दार की टीका इस भ्रमण के लिये प्रदक्षिणा शब्द भी रखती है। कोमल चरणों को नंगे पाँव चलते देखकर धरती मन ही मन सकुचाकर कोमल हो जाती है।
कुश, काँटे, कंकड़ियाँ और दरारें, रास्ते की जितनी कड़वी, कठोर और बुरी चीज़ें हैं, पृथ्वी उन्हें छिपाकर मार्ग सुन्दर और कोमल कर देती है। तीनों प्रकार की हवा सुख लिये हुए चलती है, जिसे पोद्दार की टीका शीतल, मन्द और सुगन्धित बताती है।
देवता फूल बरसाते हैं, बादल छाया करते हैं, वृक्ष फूलते फलते हैं। घास अपनी कोमलता से, पशु देखकर और पक्षी सुन्दर बोली बोलकर, सब भरत को राम का प्रिय जानकर उनकी सेवा करते हैं।
जब साधारण मनुष्य को भी जँभाई लेते हुए राम कह देने से सब सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं, तब राम के प्राणप्रिय भरत के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं।
पाँच दिन में देखे स्थल और तीर्थ
भरत इसी प्रकार वन में घूमते हैं, और उनका नियम और प्रेम देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। वे पवित्र जल के स्थान देखते हैं, जिन्हें पोद्दार की टीका नदी, बावली और कुण्ड बताती है। भूमि के अलग अलग भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष और घास, पर्वत, वन और बगीचे, सब उनके सामने आते हैं।
इन सबको विशेष रूप से सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरत प्रश्न करते हैं। अत्रि मुनि प्रसन्न मन से सबका कारण, नाम, गुण और पुण्यप्रभाव बताते हैं।
कहीं भरत स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम, कहीं मनोहर स्थल देखते हैं। कहीं वे अत्रि मुनि की आज्ञा पाकर बैठते हैं और सीता सहित राम और लक्ष्मण का स्मरण करते हैं।
भरत का स्वभाव, प्रेम और सेवाभाव देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं। ढाई पहर दिन बीतने पर वे घूम फिरकर लौटते हैं और आकर राम के चरणों का दर्शन करते हैं।
पाँच दिन में भरत सब स्थल और तीर्थ देख लेते हैं। हरि और हर का सुन्दर यश कहते सुनते दिन बीत जाता है, और सन्ध्या हो जाती है। पोद्दार की टीका हरि को भगवान् विष्णु बताती है, और इस दिन को पाँचवाँ।
सवेरे की सभा और राम का संकोच
अगली सुबह स्नान करके सब एकत्र होते हैं: भरत, ब्राह्मण, तिरहुत के राजा जनक और सारा समाज। पोद्दार की टीका इसे छठा दिन कहती है। राम मन में जानते हैं कि आज अच्छा दिन है, फिर भी कहने में सकुचाते हैं। टीका के अनुसार यह दिन सबको विदा करने के लिये अच्छा है।
वे गुरु वसिष्ठ, राजा जनक, भरत और सभा की ओर देखते हैं, फिर सकुचाकर दृष्टि फेर लेते हैं और पृथ्वी की ओर देखने लगते हैं। सभा उनके शील की सराहना करते हुए सोचती है कि राम के समान संकोची स्वामी कहीं नहीं।
सुजान भरत राम का रुख देखते हैं। वे प्रेम से उठते हैं, विशेष धीरज धरते हैं, दण्डवत् प्रणाम करते हैं और हाथ जोड़कर कहते हैं: नाथ, आपने मेरी सब रुचियाँ रखीं।
वे कहते हैं कि उनके लिये सब लोगों ने सन्ताप सहा, और राम ने भी बहुत प्रकार से दुःख पाया। फिर वे आज्ञा माँगते हैं कि अवध जाकर अवधि भर उसकी सेवा करें। टीका इस अवधि को चौदह वर्ष कहती है।
फिर भरत प्रार्थना करते हैं: हे दीनदयाल, हे कृपालु कोसलाधीश, जिस उपाय से यह सेवक फिर आपके चरणों का दर्शन कर सके, अवधि भर के लिये वह सीख दीजिये।
दोनों ओर निभाने का भरोसा
भरत कहते हैं: नगरवासी, कुटुम्बी और प्रजा, हे गोसाईं, सब आपके प्रेम और सम्बन्ध से पवित्र और रस से भरे हैं। आपके लिये भवदुःख की आग में जलना अच्छा है, और प्रभु के बिना परमपद का लाभ व्यर्थ है। पोद्दार की टीका परमपद का अर्थ मोक्ष करती है।
फिर भरत राम की सुजानता पर भरोसा रखते हैं: राम सबके हृदय की बात जानते हैं, और इस सेवक की रुचि, लालसा और रहनी भी। शरणागतों का पालन करनेवाले राम सबका पालन करेंगे और दोनों ओर अन्त तक निभायेंगे, ऐसा भरत का विश्वास है।
यह भरोसा उन्हें सब प्रकार से बहुत बड़ा लगता है। विचार करने पर तिनके भर भी सोच नहीं बचता। फिर वे अपनी ढिठाई का कारण कहते हैं: उनकी दीनता और स्वामी का स्नेह, दोनों ने मिलकर उन्हें जबरदस्ती ढीठ बना दिया है।
भरत कहते हैं कि स्वामी इस बड़े दोष को दूर करके, संकोच छोड़कर अपने अनुगामी को शिक्षा दें। सब उनकी विनती की प्रशंसा करते हैं, जो दूध और जल को अलग करनेवाली हंसिनी की चाल जैसी है।
भाई के दीन और छलरहित वचन सुनकर दीनबन्धु और प्रवीण राम देश, काल और अवसर के अनुकूल उत्तर देते हैं।
पिता की आज्ञा और प्रजा का पालन
राम भरत से कहते हैं, “हे तात, आपकी, मेरी और परिजनों की, घर और वन की चिन्ता गुरु और राजा को है। हमारे सिर पर गुरु, मुनि और मिथिलापति हैं। हमें और आपको स्वप्न में भी क्लेश नहीं।” पोद्दार की टीका यहाँ मुनि को विश्वामित्र बताती है।
राम कहते हैं कि उनका और भरत का परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ यही है कि दोनों भाई पिता की आज्ञा का पालन करें। राजा की भलाई लोक और वेद दोनों में भली है। पोद्दार की टीका इस भलाई को उनके व्रत की रक्षा कहती है।
फिर वे कहते हैं कि गुरु, पिता, माता और स्वामी की शिक्षा का पालन करने से कुमार्ग पर चलते हुए भी पैर गड्ढे में नहीं पड़ता। वे भरत से कहते हैं कि ऐसा विचारकर और सब सोच छोड़कर वे अवध जायें और अवधि भर उसका पालन करें।
राम कहते हैं कि देश, खजाना, कुटुम्ब और परिवार का भार गुरु के चरणों की रज पर है। भरत मुनि, माताओं और मन्त्रियों की सीख मानकर पृथ्वी, प्रजा और राजधानी का पालन करें। पोद्दार की टीका यहाँ मुनि को वसिष्ठ बताती है।
राम कहते हैं कि मुखिया मुख के समान होना चाहिये, जो खाने पीने को एक है, पर विवेक से सब अंगों का पालन और पोषण करता है।
वे कहते हैं कि राजधर्म का सर्वस्व इतना ही है, जैसे मन के भीतर मनोरथ छिपा रहता है। राम भाई को बहुत प्रकार से समझाते हैं। किसी अवलम्ब के बिना भरत के मन को न सन्तोष मिलता है, न शान्ति।
सिर पर धरी हुई चरणपादुकाएँ
सामने भरत का शील है, और गुरु, मन्त्री और समाज हैं। राम संकोच और स्नेह के वश में हो जाते हैं। पोद्दार की टीका बताती है कि भरत के प्रेमवश वे पादुकाएँ देना चाहते हैं, पर गुरु आदि का संकोच भी है।
राम कृपा करके पादुकाएँ दे देते हैं, और भरत उन्हें आदर से सिर पर धारण कर लेते हैं।

करुणानिधान राम की चरणपीठ मानो प्रजा के प्राणों के दो पहरेदार हैं। वे भरत के प्रेम के रत्न की डिबिया हैं।
वे जीव के साधन के लिये मानो दो अक्षर हैं, जिन्हें पोद्दार की टीका राम नाम के दो अक्षर बताती है।
वे कुल के किवाड़ हैं, कुशल कर्म के हाथ हैं, और सेवा के सुन्दर धर्म के निर्मल नेत्र हैं।
यह अवलम्ब पाकर भरत प्रसन्न होते हैं। उन्हें ऐसा सुख मिलता है जैसा सीता और राम के रहने से होता।
सबके लिये भली हुई कुचाल
भरत प्रणाम करके विदा माँगते हैं, और राम उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। कुटिल इन्द्र बुरा अवसर पाकर लोगों का मन उचाट कर देते हैं।
वह कुचाल सबके लिये भली हो गयी। अवधि की आशा के समान वह प्राणों का जीवन बन गयी। पोद्दार की टीका उसे संजीवनी कहती है।
नहीं तो लक्ष्मण, सीता और राम के वियोग के बुरे रोग से सब लोग घबराकर मर जाते।
राम की कृपा ने उलझन सुधार दी, और देवताओं की सेना गुण देनेवाली रक्षक बन गयी।
राम भाई भरत को भुजाओं में भरकर मिल रहे हैं। राम के उस प्रेम का रस कहा नहीं जाता। उनके तन, मन और वचन में अनुराग उमड़ पड़ता है, और धीरज के धनी राम भी धीरज छोड़ देते हैं।
राम के कमल जैसे नेत्रों से जल बहने लगता है, और उनकी यह दशा देखकर देवताओं की सभा दुखी हो जाती है।
ज्ञान की अग्नि में सोने की तरह कसे मन
मुनिगण, गुरु वसिष्ठ और जनक जैसे धीर पुरुषों ने अपने मन को ज्ञान की अग्नि में सोने की तरह कस लिया है।
ब्रह्मा ने उन्हें निर्लेप रचा है, और वे जगत् रूपी जल में कमल के पत्ते की तरह जन्मे हैं।
वे भी राम और भरत का अनुपम और अपार प्रेम देखकर वैराग्य और विचार सहित मन, तन और वचन से उसमें मग्न हो जाते हैं। पोद्दार की टीका विचार को विवेक कहती है।
माँगी हुई सीख, और मिला हुआ अवलम्ब
भरत तीर्थजल पुण्यस्थल में रखते हैं, और अत्रि कहते हैं कि लोग इसे भरतकूप कहेंगे। भरत और शत्रुघ्न पैदल वन में घूमते हैं, और धरती कठोर चीज़ें छिपाकर मार्ग कोमल कर देती है। पाँच दिन अत्रि भरत को हर स्थल का कारण, नाम, गुण और पुण्यप्रभाव बताते हैं। सवेरे राम अच्छे दिन की बात कहने में सकुचाते हैं। भरत उनका रुख देखकर अवध की सेवा की आज्ञा और अवधि भर की सीख माँगते हैं।
राम कहते हैं कि घर और वन की चिन्ता गुरु और राजा को है, और दोनों भाइयों का परम पुरुषार्थ पिता की आज्ञा का पालन है। वे मुखिया को मुख के समान बताते हैं। किसी अवलम्ब के बिना भरत को सन्तोष नहीं मिलता, और राम कृपा करके उन्हें पादुकाएँ देते हैं। इन्द्र लोगों का मन उचाट करते हैं, और वह कुचाल सबके लिये भली हो जाती है। राम भरत को भुजाओं में भरकर मिलते हैं और धीरज छोड़ देते हैं। मुनि, गुरु और जनक जैसे धीर वैराग्य और विचार सहित उस प्रेम में मग्न हो जाते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 310 से 317, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।