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भरत का प्रयाग और भरद्वाज की पहुनाई

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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 24

प्रयाग में भरत त्रिवेणी से राम के चरणों का प्रेम माँगते हैं। भरद्वाज उनके मन का दुःख सुनते हैं। मुनि की आज्ञा से ऋद्धि और सिद्धियाँ सबका आतिथ्य करती हैं, और वह रात भरत आश्रम के वैभव के बीच बिताते हैं।

सखा के वचन सुनकर भरत राम का स्मरण करते हुए डेरे की ओर चलते हैं। त्रिवेणी के सामने हाथ जोड़कर वे कहते हैं कि उन्हें न अर्थ की रुचि है, न धर्म की, न काम की, और न वे निर्वाण चाहते हैं। वे जन्म जन्म में राम के चरणों का प्रेम माँगते हैं, और कोई वर नहीं। भरद्वाज के सामने उनके मन में बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे।

नगर के स्त्री और पुरुष उस स्थान को देखने जाते हैं, और सारी रात सब जागते हैं। सबेरे खेवा लगता है, और भरत बिना सवार के घोड़ों को साथ लिये पैदल चलते हैं। प्रयाग में वे सीता और राम के चरणों में दिन दिन बढ़ते प्रेम का वर माँगते हैं। त्रिवेणी के बीच से कोमल वाणी उत्तर देती है। भरद्वाज दौड़कर उन्हें उठाते हैं और कैकेयी, राज्य और भरत के यश के चन्द्रमा की बात कहते हैं। भरत मुनियों की मण्डली से कहते हैं कि किस बात का उन्हें सोच नहीं है, और किस दुःख से उनकी छाती जलती है। मुनि सबको अपना प्रेमप्रिय अतिथि बनाते हैं, और ऋद्धि और सिद्धियाँ सबके लिये सुन्दर घर रचती हैं। वैभव के बीच लोग संयमियों की तरह सकुचाते हैं, और रात बीतकर सबेरा होता है।

मुनि की पहुनाई पानेवाले

  • भरत प्रयाग में राम के चरणों का प्रेम माँगनेवाले यात्री। वे मुनियों से कहते हैं कि उनका दुःख वन में राम, लक्ष्मण और सीता की कठिनाई है।
  • भरद्वाज प्रयाग के मुनि, जो भरत को हृदय से लगाते हैं, उनका शील और संकोच देखकर बोलते हैं, और सब यात्रियों का आतिथ्य कराते हैं।
  • शत्रुघ्न छोटे भाई, जिन्हें भरत माताओं के साथ कर देते हैं और जो समाज सहित मुनि के अतिथि बनते हैं।
  • गुह भरत के सखा, जिनकी बात सुनकर वे डेरे लौटते हैं और जिन्हें आगे करके यात्रा चलती है।
  • ऋद्धि और सिद्धियाँ मुनि का सोच सुनकर उपस्थित होनेवाली शक्तियाँ। वे उनकी आज्ञा से हर अतिथि की रुचि के अनुसार सुखद निवास और सामग्री रचती हैं।

चार दण्ड में नदी पार, तीसरे पहर प्रयाग

सखा के वचन सुनकर, हृदय में धीरज धरकर, भरत राम का स्मरण करते हुए डेरे की ओर चल देते हैं। यह समाचार पाकर नगर के स्त्री और पुरुष बड़े आर्त होकर उस स्थान को देखने जाते हैं। पोद्दार की टीका इसे राम के ठहरने के स्थान का समाचार बताती है। वहाँ परिक्रमा करके वे प्रणाम करते हैं। वे कैकेयी को बहुत दोष देते हैं, आँखों में जल भर भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाता को दोष देते हैं।

कोई भरत के स्नेह की सराहना करता है, कोई कहता है कि राजा ने अपना प्रेम निभाया। गुह की सराहना करते हुए वे अपनी निन्दा करते हैं। मोह और विषाद को कौन कह सकता है? इस तरह सारी रात सब जागते हैं। सबेरा होता है और नदी पार करने का खेवा लग जाता है।

गुरु को सुन्दर नाव पर चढ़ाकर सब माताओं को नयी नावों पर चढ़ाया जाता है। चार दण्ड में सब पार उतर जाते हैं, और भरत उतरकर सबको सँभालते हैं। फिर प्रातःकाल की क्रियाएँ करके, माताओं के चरणों की वन्दना करके और गुरु को सिर नवाकर वे निषादों को आगे करते हैं। वे सेना चला देते हैं। पोद्दार की टीका बताती है कि निषाद रास्ता दिखाने के लिये आगे किये गये।

भरत गुह को आगे करते हैं और सब माताओं की पालकियाँ चलाते हैं। वे छोटे भाई शत्रुघ्न को बुलाकर उनके साथ कर देते हैं, और गुरु ब्राह्मणों के साथ प्रस्थान करते हैं। भरत स्वयं गंगा को प्रणाम करते हैं, लक्ष्मण सहित सीता और राम का स्मरण करते हैं और पैदल चल पड़ते हैं। बिना सवार के घोड़े बागडोर से बँधे उनके साथ जा रहे हैं।

अच्छे सेवक बार बार कहते हैं कि नाथ, घोड़े पर सवार हो जाइये। भरत उत्तर देते हैं कि राम पैदल गये, और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं। मुझे सिर के बल चलकर जाना उचित है। सेवक का धर्म सबसे कठोर है। उनकी दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सारे सेवक ग्लानि से गले जाते हैं।

प्रेम में उमग उमगकर “सीताराम, सीताराम” कहते हुए भरत तीसरे पहर प्रयाग में प्रवेश करते हैं।

तीर्थराज के सामने एक ही माँग

भरत के पैरों में छाले ऐसे चमक रहे हैं जैसे कमल की कली पर ओस की बूँदें। भरत आज पैदल आये हैं, यह सुनकर सारा समाज दुखी हो जाता है। भरत पता लेते हैं कि सब लोग नहा चुके हैं। त्रिवेणी पर आकर वे प्रणाम करते हैं और विधिपूर्वक श्वेत और श्याम जल में स्नान करते हैं। टीका बताती है कि ये गंगा और यमुना के जल हैं। वे दान देकर ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं।

श्याम और सफेद लहरें देखकर, पुलकित शरीर से, भरत हाथ जोड़ते हैं। वे तीर्थराज से कहते हैं कि आप सब कामनाएँ पूरी करनेवाले हैं, और आपका प्रभाव वेद में प्रसिद्ध और जगत् में प्रकट है। मैं अपना धर्म छोड़कर भीख माँगता हूँ। आर्त मनुष्य कौन सा कुकर्म नहीं करता? यह हृदय में जानकर सुजान और अच्छे दानी जगत् में माँगनेवाले की वाणी सफल करते हैं। पोद्दार इस धर्म को क्षत्रिय का न माँगने का धर्म बताते हैं।

वे कहते हैं कि मुझे न अर्थ की रुचि है, न धर्म की, न काम की, और न मैं निर्वाण की गति चाहता हूँ। जन्म जन्म में राम के चरणों में प्रेम हो, यही वरदान है, और कोई नहीं। वे कहते हैं कि राम मुझे कुटिल समझें, और लोग मुझे गुरु और स्वामी का द्रोही कहें। सीता और राम के चरणों में मेरा प्रेम आपकी कृपा से दिन दिन बढ़ता रहे।

भरत कहते हैं कि मेघ जन्म भर चातक की सुध भुला दे, और जल माँगने पर वज्र और पत्थर गिराये। चातक की रटन घटे तो वह घट जाता है। प्रेम बढ़ने में सब प्रकार से भलाई है।

जैसे आग में तपाने से सोने पर चमक चढ़ती है, वैसे ही प्रियतम के चरणों में नियम निभाने से होता है। भरत के वचन सुनकर त्रिवेणी के बीच से मंगल देनेवाली कोमल वाणी होती है।

वाणी कहती है कि भरत सब प्रकार से साधु हैं, और राम के चरणों में उनका अथाह प्रेम है। वे व्यर्थ ही मन में ग्लानि कर रहे हैं, और राम को उनके समान प्रिय कोई नहीं। त्रिवेणी के अनुकूल वचन सुनकर भरत का शरीर पुलकित हो उठता है और हृदय में हर्ष छा जाता है। “भरत धन्य हैं, धन्य” कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं।

मुनि भरत का संकोच देखकर बोलते हैं

प्रयाग में रहनेवाले वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और संन्यासी, सब आनन्दित हैं। दस पाँच मिलकर वे आपस में कहते हैं कि भरत का प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है। राम के गुण सुनते हुए भरत मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज के पास आते हैं। मुनि उन्हें दण्डवत् प्रणाम करते देखते हैं और अपना साकार सौभाग्य मानते हैं। वे दौड़कर उठाते हैं, हृदय से लगाते हैं और आशीर्वाद देकर कृतार्थ करते हैं।

मुनि आसन देते हैं। भरत सिर नवाकर ऐसे बैठते हैं मानो भागकर संकोच के घर में घुस जाना चाहते हों। मन में बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे, और टीका के अनुसार यह कि तब वे क्या उत्तर देंगे। उनका शील और संकोच देखकर ऋषि बोलते हैं कि भरत, सुनिये, हमें सब समाचार मिल चुके हैं, और विधाता के किये पर कुछ वश नहीं चलता।

वे कहते हैं कि भरत माता की करनी समझकर हृदय में ग्लानि न करें। कैकेयी का दोष नहीं है, सरस्वती जाकर उनकी बुद्धि बिगाड़ गयी। यह कहना भी कोई भला नहीं कहेगा। विद्वानों को लोक और वेद दोनों मान्य हैं। भरत का निर्मल यश गाकर लोक और वेद दोनों बड़ाई पायेंगे।

वे कहते हैं कि लोक और वेद दोनों मानते हैं, और सब यही कहते हैं, कि पिता जिसे राज्य दें, वही पाता है। राजा सत्यव्रती थे। भरत को बुलाकर राज्य देते, तो सुख, धर्म और बड़ाई होती। अनर्थ की जड़ राम का वन जाना है, जिसे सुनकर सारे संसार को पीड़ा हुई। वह भी भावी के वश हुआ। बेसमझ रानी भावी के वश कुचाल करके अन्त में पछतायी।

उसमें भी जो भरत का थोड़ा सा अपराध बताये, उसे मुनि अधम, अज्ञानी और असाधु कहते हैं। वे कहते हैं कि भरत राज्य करते तो उन्हें दोष न होता, और सुनकर राम को सन्तोष होता।

वे कहते हैं कि अब भरत ने बहुत अच्छा किया, और यह मत उनके लिये उचित है। राम के चरणों का प्रेम संसार में सब सुन्दर मंगलों का मूल है।

राम का प्रेम और कभी न घटनेवाला चन्द्रमा

भरद्वाज कहते हैं कि वही प्रेम भरत का धन, जीवन और प्राण है। उनके समान बड़भागी कौन है? भरत के लिये यह आश्चर्य की बात नहीं, वे दशरथ के पुत्र और राम के प्यारे भाई हैं। फिर वे कहते हैं कि भरत, सुनिये, राम के मन में आपके समान प्रेम का पात्र कोई नहीं।

लक्ष्मण, राम और सीता की सारी रात अत्यन्त प्रेम से भरत की सराहना करते बीती। मुनि कहते हैं कि प्रयाग में स्नान करते समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे भरत के प्रेम में मग्न हो रहे थे।

मुनि कहते हैं कि राम का भरत पर ऐसा स्नेह है जैसा मूर्ख मनुष्य का संसार में सुखमय जीवन पर होता है। यह राम की बहुत बड़ाई नहीं, राम शरणागत के कुटुम्ब को पालनेवाले हैं। भरत के बारे में मुनि का मत है कि वे मानो शरीर धारण किये हुए राम का प्रेम हैं।

वे कहते हैं कि भरत के लिये यह कलंक है, और हम सबके लिये उपदेश। राम की भक्ति के रस की सिद्धि के लिये यह समय गणेश हुआ है। पोद्दार की टीका गणेश को बड़ा शुभ बताती है। फिर वे कहते हैं कि भरत का यश निर्मल नया चन्द्रमा है, और राम के सेवक उसके कुमुद और चकोर हैं।

यह चन्द्रमा सदा उदित रहेगा और कभी अस्त नहीं होगा। जगत् के आकाश में यह घटेगा नहीं, दिन दिन दूना होगा। पोद्दार की टीका बताती है कि साधारण चन्द्रमा रोज़ अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोर को दुःख होता है।

तीनों लोक का चकवा इस चन्द्रमा से बहुत प्रेम करेगा। राम के प्रताप का सूर्य इसकी छवि नहीं हरेगा। यह रात दिन सदा सबको सुख देगा, और कैकेयी की करनी का राहु इसे ग्रस नहीं सकेगा। यह राम के सुन्दर प्रेम के अमृत से भरा है, और गुरु के अपमान के दोष से दूषित नहीं। मुनि कहते हैं कि अब राम के भक्त अमृत से तृप्त हो लें। भरत ने पृथ्वी पर भी अमृत सुलभ कर दिया है।

दर्शन का फल, और उस फल का फल

फिर भरद्वाज कहते हैं कि राजा भगीरथ गंगा को लाये, जिनका स्मरण सब सुन्दर मंगलों की खान है। दशरथ के गुणों का वर्णन नहीं हो सकता। अधिक क्या कहें, जगत् में उनकी बराबरी का कोई नहीं।

उन्हीं दशरथ के प्रेम और संकोच के वश होकर राम आकर प्रकट हुए, जिन्हें शिव ने हृदय के नेत्रों से कभी अघाकर नहीं देखा। पोद्दार इसे भीतर का दर्शन बताते हैं। मुनि कहते हैं कि भरत ने कीर्ति का अनुपम चन्द्रमा रचा है, जिसमें राम का प्रेम हिरन के रूप में बसता है।

वे कहते हैं कि भरत व्यर्थ ही हृदय में ग्लानि कर रहे हैं, पारस पाकर दरिद्रता से डर रहे हैं। फिर वे कहते हैं कि भरत, सुनिये, हम झूठ नहीं कहते। हम उदासीन हैं, तपस्वी हैं और वन में रहते हैं।

टीका इन तीनों के कारण बताती है। उदासीन होने से मुनि किसी का पक्ष नहीं लेते, और तपस्वी होने से किसी की मुँहदेखी नहीं कहते। वन में रहने से उन्हें किसी से कोई प्रयोजन नहीं।

मुनि कहते हैं कि सब साधनों का सुन्दर फल उन्हें लक्ष्मण, राम और सीता के दर्शन के रूप में मिला था। उस फल का फल भरत का दर्शन है। प्रयाग सहित उनका भाग्य बड़ा है। भरत धन्य हैं, उन्होंने अपने यश से जगत् को जीत लिया है। ऐसा कहकर मुनि प्रेम में मग्न हो जाते हैं।

मुनि की बात सुनकर सभासद हर्षित होते हैं। “साधु साधु” कहकर सराहते हुए देवता फूल बरसाते हैं। आकाश में और प्रयाग में “धन्य धन्य” की ध्वनि होती है, जिसे सुन सुनकर भरत प्रेम में मग्न हैं। उनका शरीर पुलकित है, हृदय में राम और सीता हैं और आँखों में जल भरा है। वे मुनियों की मण्डली को प्रणाम करके गद्गद वाणी से बोलते हैं।

भरत के दुःख की असली जगह

भरत कहते हैं कि यहाँ मुनियों का समाज है और तीर्थराज हैं। यहाँ सच्ची सौगन्ध खाना भी पूरी हानि करता है, और इस स्थान में कुछ बनाकर कहा जाये तो उसके बराबर पाप और नीचता नहीं। आप सर्वज्ञ हैं, मैं सच्चे भाव से कहता हूँ, और राम हृदय के भीतर की बात जाननेवाले हैं।

उन्हें माता की करनी का सोच नहीं है। न हृदय में यह दुःख है कि जगत् उन्हें नीच समझेगा। न परलोक बिगड़ने का डर है, न पिता के मरने का शोक। पिता का सुन्दर पुण्य और सुयश लोकों में भरा है, और उन्होंने लक्ष्मण और राम जैसे पुत्र पाये। राम के विरह में अपना क्षणभंगुर शरीर त्यागनेवाले राजा के लिये सोच का कौन सा प्रसंग है?

राम, लक्ष्मण और सीता पैरों में बिना जूते के, मुनियों का वेष बनाकर, वन वन फिरते हैं।

वे मृगचर्म पहनते हैं, जिसे पोद्दार वल्कल पढ़ते हैं। वे फल खाते हैं, धरती पर कुश और पत्ते बिछाकर सोते हैं, और पेड़ों के नीचे रहकर नित्य सर्दी, गर्मी, वर्षा और हवा सहते हैं।

इस दुःख की जलन से उनकी छाती दिन दिन जलती है। न दिन में भूख लगती है, न रात को नींद आती है। इस कुरोग की औषधि नहीं है, और उन्होंने मन में सारा विश्व खोज डाला।

भरत कहते हैं कि माता का कुमत पाप की जड़ बढ़ई है। उसने हमारे हित को बसूला बनाया। उसने कलि की बुरी लकड़ी का कुयन्त्र बनाया, और अवधि का कठिन कुमन्त्र पढ़कर उसे गाड़ दिया। पोद्दार कलि को कलह पढ़ते हैं।

टीका इन्हें नाम देती है: भरत को राज्य बसूला है, राम का वनवास कुयन्त्र है, और चौदह वर्ष की अवधि कुमन्त्र। भरत कहते हैं कि उसी बढ़ई ने मेरे लिये यह बुरा साज रचा, और सब जगत् को बारहबाट कर डाला। यह कुयोग राम के लौट आने पर मिटेगा। अयोध्या दूसरे किसी उपाय से नहीं बसेगी।

प्रेमप्रिय अतिथि बनने का संकोच

भरत के वचन सुनकर मुनि सुख पाते हैं, और सब उनकी बहुत प्रकार से बड़ाई करते हैं। भरद्वाज कहते हैं कि तात, अधिक सोच न कीजिये। राम के चरणों को देखने पर सब दुःख मिट जायेगा।

इस प्रकार समझाकर मुनि कहते हैं कि आप लोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये, और कृपा करके कन्द, मूल, फल और फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये। मुनि के वचन सुनकर भरत के हृदय में सोच होता है। बुरे अवसर पर कठिन संकोच आ पड़ा है।

गुरु की वाणी को भारी जानकर और फिर से चरणों की वन्दना करके, वे हाथ जोड़कर बोलते हैं। वे कहते हैं कि नाथ, आपकी आज्ञा सिर पर धरकर पालन करना हमारा परम धर्म है। भरत के वचन मुनि के मन को अच्छे लगते हैं। वे शुद्ध सेवकों और शिष्यों को पास बुलाकर कहते हैं कि भरत की पहुनाई करनी चाहिये, जाकर कन्द, मूल और फल लाये जायें। वे “बहुत अच्छा, नाथ” कहकर सिर नवाते हैं और आनन्दित होकर अपने अपने काम को चल देते हैं।

फिर मुनि को चिन्ता होती है कि उन्होंने बहुत बड़े मेहमान को न्योता है, और जैसा देवता हो, वैसी ही पूजा होनी चाहिये। यह सुनकर ऋद्धियाँ और अणिमा आदि सिद्धियाँ आ जाती हैं और कहती हैं कि गोसाईं, जो आज्ञा हो, वही हम करें।

भरद्वाज प्रसन्न होकर कहते हैं कि छोटे भाई और समाज सहित भरत राम के विरह में व्याकुल हैं। इनकी पहुनाई करके इनका श्रम दूर कीजिये।

पहले सबका ठिकाना

ऋद्धि और सिद्धियाँ मुनि की वाणी सिर पर धरकर अपने को बड़भागिनी मानती हैं। वे आपस में कहती हैं कि राम के छोटे भाई अतुलनीय अतिथि हैं। मुनि के चरणों की वन्दना करके आज वही करें जिससे सब राज समाज सुखी हो। ऐसा कहकर वे अनेक सुन्दर घर रचती हैं, जिन्हें देखकर विमान बिलखते हैं।

उन घरों में भोग और ऐश्वर्य की बहुत सामग्री भरकर रखी जाती है, जिसे देखकर देवता ललचा उठते हैं। दासियाँ और दास सब सामग्री लिये मन लगाकर अतिथियों की रुचि देखते रहते हैं। पोद्दार इसे मन के अनुकूल सेवा बताते हैं। जो सुख स्वर्ग में स्वप्न में भी नहीं, वह सारा साज सिद्धियाँ पलभर में सजा देती हैं।

पहले सबको उनकी अपनी रुचि के अनुसार सुन्दर और सुखद ठिकाने मिलते हैं, फिर परिवार सहित भरत को। ऋषि ने ऐसी ही आज्ञा दी थी। टीका कारण बताती है: भरत चाहते थे कि पहले उनके सब संगियों को आराम मिले, और मुनि ने उनके मन की बात जानकर यही निर्देश दिया।

मुनिश्रेष्ठ ने तपोबल से ऐसा वैभव रचा जो विधाता को चकित करता है। जब भरत मुनि का प्रभाव देखते हैं, तो उन्हें सब लोकपालों के लोक छोटे लगते हैं। पोद्दार इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर का नाम लेते हैं। सुख के साज का वर्णन नहीं हो सकता। उसे देखकर ज्ञानी वैराग्य भूल जाते हैं।

वैभव, और सबेरे तक की रात

आसन, सेजें, सुन्दर वस्त्र और चँदोवे हैं। वन और बगीचे हैं, और भाँति भाँति के पक्षी और पशु। सुगन्धित फूल हैं और अमृत जैसे फल। अनेक प्रकार के निर्मल जलाशय हैं, जिन्हें पोद्दार तालाब, कुएँ और बावलियाँ बताते हैं।

खाने पीने के पवित्र पदार्थ अमृत के भी अमृत जैसे हैं, और उन्हें देखकर लोग संयमियों की तरह सकुचाते हैं। सबके यहाँ कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें टीका मनचाही वस्तु देनेवाले बताती है। उन्हें देखकर इन्द्र और शची को अभिलाषा होती है।

वसन्त ऋतु है, और तीन प्रकार की हवा बह रही है। सबको चारों पदार्थ सुलभ हैं, जिन्हें टीका धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहती है।

माला, चन्दन, स्त्री आदि भोग देखकर लोग हर्ष और विस्मय के वश हैं। पोद्दार की टीका में हर्ष भोग और मुनि का तपःप्रभाव देखकर है, और विषाद यह कि राम के विरह में व्रत रखनेवाले वे भोग में क्यों आ फँसे।

सम्पत्ति चकवी है, भरत चकवा, और मुनि की आज्ञा खिलाड़ी, जिसने उस रात दोनों को आश्रम के पिंजरे में रखा, और सबेरा हो गया। पोद्दार खिलाड़ी को बहेलिया पढ़ते हैं। उनके अनुसार एक पिंजरे में रखे जाने पर भी चकवी और चकवे का रात में संयोग नहीं होता। वैसे ही भरत सारी रात भोग की सामग्री के साथ रहकर भी मन से उसका स्पर्श तक नहीं करते।

प्रसंग का क्रम

गुह के वचन सुनकर भरत डेरे को जाते हैं। नगर के स्त्री और पुरुष उस स्थान की परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं, और कैकेयी और विधाता को दोष देते हैं। सारी रात सब जागते हैं। सबेरे गुरु और माताएँ नाव से पार उतारी जाती हैं, और भरत उस पार सबको सँभालते हैं। वे गुह को आगे करते हैं, शत्रुघ्न को पालकियों के साथ करते हैं और पैदल चलते हैं। सेवकों के आग्रह पर वे उत्तर देते हैं कि सेवक का धर्म सबसे कठोर है। तीसरे पहर वे प्रयाग पहुँचते हैं। सबके नहा लेने पर वे त्रिवेणी में स्नान करते हैं और राम के चरणों का प्रेम माँगते हैं। त्रिवेणी के बीच से कोमल वाणी उत्तर देती है, और देवता फूल बरसाते हैं।

प्रयाग के वासी आपस में उनके प्रेम की बात कहते हैं। भरद्वाज दण्डवत् करते भरत को उठाकर हृदय से लगाते हैं। उनका शील और संकोच देखकर मुनि कहते हैं कि कैकेयी का दोष नहीं, और राज्य करने पर भी भरत को दोष न होता। वे उस रात की बात कहते हैं जिसमें तीनों ने भरत की सराहना की थी, और भरत के यश की। भरत मुनियों की मण्डली को प्रणाम करके वह दुःख कहते हैं जिससे उनकी छाती जलती है, वन में तीनों की कठिनाई। वे कहते हैं कि यह राम के लौटने पर मिटेगा। मुनि उन्हें समझाते हैं और सबको अपना अतिथि बनाते हैं। भरत कहते हैं कि उनकी आज्ञा का पालन हमारा परम धर्म है। ऋद्धि और सिद्धियाँ सबको ठिकाने देती हैं, फिर परिवार सहित भरत को। उस रात मुनि की आज्ञा भरत को आश्रम में रखती है, और सबेरा होता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 202 से 215, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।