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भरत का प्रयाग और भरद्वाज की पहुनाई

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · भरत का प्रयाग और भरद्वाज की पहुनाई

भरत का प्रयाग और भरद्वाज की पहुनाई

प्रयाग में भरत राम के चरणों का प्रेम माँगते हैं। भरद्वाज उनके मन का दुःख सुनते हैं और फिर ऐसा आतिथ्य रचते हैं जिसके बीच भी भरत का मन राम में ही रहता है।

भरत की यात्रा में साथ चलनेवाले बहुत हैं, पर उनके पैरों की बात अलग है। घोड़े पास चलते हैं और वे उन पर चढ़ते नहीं। प्रयाग पहुँचने तक चरणों में छाले पड़ जाते हैं। वहाँ वे तीर्थराज के सामने हाथ जोड़ते हैं तो माँग में राज्य, सुख और मुक्ति तक छोड़ देते हैं। उन्हें जन्म-जन्म में राम के चरणों का प्रेम चाहिये। तुलसीदास इस प्रार्थना को पूरी यात्रा के बीच रखकर दिखाते हैं कि भरत कहाँ जा रहे हैं और उनके भीतर किस बात की खोज है।

प्रयाग में उन्हें दो आश्वासन मिलते हैं। पहले त्रिवेणी की वाणी उनके प्रेम को पहचानती है। फिर भरद्वाज उनके संकोच और दुःख को विस्तार से सुनते हैं। मुनि की बात में पिता, माता, राज्य, राम का स्नेह और भरत की कीर्ति, सबका स्थान है। उसी आश्रम में रात को अकूत वैभव उपस्थित होता है। भरत उस पहुनाई को मुनि की आज्ञा मानकर स्वीकार करते हैं, और उनका मन अपने प्रिय के चरणों में बना रहता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • भरत प्रयाग में राम के चरणों का प्रेम माँगनेवाले यात्री, जिनके लिये वनवासी राम, सीता और लक्ष्मण की कठिनाई सबसे बड़ा दुःख है।
  • भरद्वाज प्रयाग के मुनि, जो भरत को हृदय से लगाते हैं, उनका संकोच दूर करते हैं और सब यात्रियों का आतिथ्य कराते हैं।
  • शत्रुघ्न छोटे भाई, जिन्हें भरत माताओं के साथ कर देते हैं और जो समाजसहित मुनि के अतिथि बनते हैं।
  • निषादराज भरत के सखा, जिनकी बात सुनकर वे डेरे लौटते हैं और जिन्हें आगे करके यात्रा चलती है।
  • ऋद्धि और सिद्धियाँ भरद्वाज की आज्ञा पर उपस्थित होकर प्रत्येक अतिथि की रुचि के अनुसार सुखद निवास और सामग्री रचनेवाली शक्तियाँ।

चार घड़ी में नदी पार, तीसरे पहर प्रयाग

सखा के वचन सुनकर भरत हृदय में धीरज रखते हैं और रघुवीर का स्मरण करते हुए अपने डेरे की ओर चल देते हैं। नगर से आये स्त्री-पुरुषों को राम के ठहरने के स्थान का समाचार मिलता है तो वे बड़े आतुर होकर उसे देखने जाते हैं। वहाँ पहुँचकर परिक्रमा करते हैं, प्रणाम करते हैं, आँखों में जल भर लेते हैं। किसी की शिकायत कैकेयी से है, किसी की प्रतिकूल विधाता से। राम के विश्राम का वह स्थान लोगों के दुःख को फिर सामने ला देता है।

बातों में कई स्वर सुनायी देते हैं। कोई भरत के स्नेह की प्रशंसा करता है। कोई कहता है कि राजा दशरथ ने प्रेम खूब निबाहा। लोग अपनी निन्दा करते हैं और निषाद की सराहना करते हैं। तुलसी उस समय के विमोह और विषाद को कह सकने की कठिनाई बताते हैं। यह जागरण थोड़ी देर का नहीं रहता। सारी रात सब लोग जागते हैं, और सबेरा होते ही नदी पार करने का खेवा लग जाता है।

पहले गुरुजी को सुन्दर नाव पर चढ़ाया जाता है और सब माताओं को नयी नाव पर। चार घड़ी के भीतर सब गंगा के पार उतर जाते हैं। भरत उतरकर सबको सँभालते हैं। इतनी बड़ी यात्रा में उनका ध्यान सबसे पहले साथ आये लोगों पर जाता है। सब पार हो चुके हैं, यह बात पूरी होने पर प्रातःकाल की क्रियाएँ होती हैं। वे माता के चरणों की वन्दना करते हैं, गुरुजी को सिर नवाते हैं और निषादों को आगे करके सेना चला देते हैं। पोद्दार जी की टीका बताती है कि आगे किये गये निषाद रास्ता दिखानेवाले हैं।

प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।
आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ॥ २०२॥

दोहा २०२

चलने की व्यवस्था भी साफ़ है। निषादराज आगे हैं, पीछे सब माताओं की पालकियाँ चलती हैं। भरत छोटे भाई शत्रुघ्न को बुलाकर माताओं के साथ कर देते हैं। गुरुजी ब्राह्मणों सहित प्रस्थान करते हैं। इसके बाद भरत स्वयं गंगा को प्रणाम करते हैं और लक्ष्मण सहित सीताराम का स्मरण करके पैदल चल पड़ते हैं। उनके साथ बिना सवार के घोड़े बागडोर से बँधे हुए जा रहे हैं। सवारी का अभाव उन्हें पैदल नहीं कर रहा। सवारी सामने है और उनका निर्णय उसके होते हुए लिया गया है।

उत्तम सेवक बार-बार आग्रह करते हैं कि स्वामी घोड़े पर बैठ जायँ। भरत के उत्तर में राम की पदयात्रा सामने आ जाती है। राम पैदल गये हैं, और भरत के लिये रथ, हाथी तथा घोड़े तैयार हैं। उन्हें तो अपने लिये सिर के बल चलना उचित लगता है। वे सेवक के धर्म को सबसे कठोर कहते हैं। यह उनके प्रणय और विनय की बात है, यात्रा में सिर के बल चलने का कोई नया काम नहीं होता। वे पैदल ही चलते हैं। उनकी दशा और कोमल वाणी सुनकर सेवक ग्लानि से गले जाते हैं।

इसी तरह प्रेम में उमगते हुए, सीताराम का नाम कहते हुए भरत तीसरे पहर प्रयाग में प्रवेश करते हैं। नदी पार करने के लिये चार घड़ी बतायी गयी थीं और अब आगमन का तीसरा पहर बताया गया है। इन दोनों समयों के बीच सबको सँभालना, माताओं की व्यवस्था और लगातार पैदल चलना आता है। प्रयाग का स्वागत पढ़ते समय यह परिश्रम साथ रखिये, क्योंकि अगले ही दृश्य में वही परिश्रम भरत के चरणों पर दिखनेवाला है।

भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥ २०३॥

दोहा २०३

पूरी रात जागने के बाद सब लोग चार घड़ी में गंगा पार करते हैं। भरत सबकी व्यवस्था सँभालते हैं, शत्रुघ्न को माताओं के साथ करते हैं और स्वयं पैदल चलकर तीसरे पहर प्रयाग पहुँचते हैं।

तीर्थराज के सामने एक ही माँग

भरत के पैरों में छाले चमक रहे हैं। तुलसी उनकी उपमा कमल की कली पर चमकती ओस की बूँदों से देते हैं। चित्र कोमल है और उसके भीतर चलने की पीड़ा बनी हुई है। भरत आज पैदल आये हैं, यह सुनते ही सारा समाज दुःखी हो जाता है। स्वयं भरत पहले खबर लेते हैं कि सब लोग नहा चुके हैं या नहीं। सबके स्नान का पता पाने के बाद ही वे त्रिवेणी पर आते हैं, प्रणाम करते हैं और विधिपूर्वक श्वेत तथा श्याम जल में स्नान करते हैं। टीका इन दोनों रंगों को गंगा और यमुना का जल बताती है। वे दान देकर ब्राह्मणों का सम्मान भी करते हैं।

श्याम और धवल लहरें देखकर उनका शरीर पुलकित हो जाता है। वे हाथ जोड़कर तीर्थराज से कहते हैं कि आप सब कामनाओं को पूरा करनेवाले हैं। आपका प्रभाव वेदों में प्रसिद्ध है और जगत् में प्रकट है। ऐसी सामर्थ्य के सामने माँगने के लिये बहुत कुछ हो सकता है। भरत पहले अपने माँगने का संकोच रखते हैं। वे कहते हैं कि अपना धर्म छोड़कर भीख माँग रहे हैं। पोद्दार जी इसे क्षत्रिय के न माँगने के धर्म के रूप में स्पष्ट करते हैं। आर्त मनुष्य से कौन-सा अनुचित काम नहीं हो जाता, यह जानकर सुजान दानी याचक की वाणी सफल करते हैं।

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥ २०४॥

दोहा २०४

अर्थ, धर्म, काम और निर्वाण, चारों को वे अपनी इच्छा से अलग कर देते हैं। जन्म-जन्म में राम के चरणों का प्रेम बना रहे, यही वरदान है। इस माँग में अपने लिये निर्दोष सिद्ध हो जाने की शर्त भी नहीं है। वे आगे कहते हैं कि राम स्वयं उन्हें कुटिल समझ लें और लोग गुरु तथा स्वामी का द्रोही कहें, तब भी सीताराम के चरणों में उनका प्रेम तीर्थराज की कृपा से प्रतिदिन बढ़ता रहे। जिस राम तक पहुँचने के लिये वे चल रहे हैं, उन्हीं की ओर से गलत समझ लिये जाने की सम्भावना भी उनकी प्रार्थना का आधार नहीं बदलती।

भरत अपनी बात चातक और मेघ के चित्र में खोलते हैं। मेघ जन्मभर सुधि भुला दे, जल माँगने पर वज्र और ओले गिराये, तब भी चातक की पुकार घटने में चातक की ही प्रतिष्ठा घटती है। उसके लिये सब प्रकार का भला प्रेम के बढ़ने में है। यहाँ मेघ के कठोर होने की कल्पना उस आग्रह को परखती है जो अभी कहा गया था। प्रेम को अपने अनुकूल उत्तर का आश्वासन नहीं दिया गया। भरत उसके निभने की शक्ति माँग रहे हैं।

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥
चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥

चौपाई १

इसके बाद सोने की उपमा आती है। ताप मिलने पर सोने की चमक बढ़ती है। उसी तरह प्रियतम के चरणों में प्रेम का नियम निभाने से सेवक का गौरव बढ़ता है। चातक की लगातार रटन और तपते सोने की बढ़ती आब, दोनों में कठिनाई के बीच एक ही बात सुरक्षित रहती है। भरत अपने प्रेम के लिये इसी स्थिरता को चाहते हैं। उनके वचन पूरे होते हैं तो त्रिवेणी के बीच से मंगल देनेवाली कोमल वाणी सुनायी देती है।

यह वाणी भरत को सब प्रकार से साधु कहती है। राम के चरणों में उनका अनुराग अगाध है। उन्हें व्यर्थ ही मन में ग्लानि नहीं करनी चाहिये, क्योंकि राम को उनके समान प्रिय कोई नहीं है। यह आश्वासन सुनकर भरत का शरीर पुलकित हो उठता है और हृदय में हर्ष छा जाता है। देवता उन्हें धन्य कहते हुए आनन्द से फूल बरसाते हैं। भरत ने बढ़ता हुआ प्रेम माँगा था और उत्तर में उन्हें राम के प्रेम का भरोसा मिलता है।

तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।
भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल॥ २०५॥

दोहा २०५

सबके स्नान के बाद भरत त्रिवेणी में नहाते हैं और चारों पुरुषार्थ छोड़कर जन्म-जन्म का रामप्रेम माँगते हैं। त्रिवेणी की वाणी उन्हें राम का अतिशय प्रिय बताकर उनकी ग्लानि दूर करने का आश्वासन देती है।

मुनि पहले भरत का संकोच पहचानते हैं

प्रयाग में रहनेवाले वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और संन्यासी, सभी आनन्दित हैं। दस-पाँच लोग मिलकर भरत के प्रेम और शील की पवित्रता तथा सच्चाई की चर्चा करते हैं। भरत राम के सुन्दर गुण सुनते हुए मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज के पास पहुँचते हैं। वे दण्डवत् प्रणाम करते हैं। मुनि उन्हें देखते ही अपना सौभाग्य मूर्त रूप में सामने आया हुआ मानते हैं। वे दौड़ते हैं, भरत को उठाकर हृदय से लगाते हैं और आशीर्वाद देकर कृतार्थ करते हैं।

फिर मुनि आसन देते हैं। भरत सिर नवाकर बैठते हैं, पर संकोच इतना है मानो उसी के घर में भागकर छिप जाना चाहते हों। मन में बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे तो क्या उत्तर देंगे। भरद्वाज उनका शील और यह संकोच पहचान लेते हैं। वे पहले ही बता देते हैं कि सब समाचार उन्हें मिल चुके हैं। विधाता के किये पर किसी का वश नहीं चलता। भरत को अब अपनी कथा फिर सुनाकर अपने ऊपर अभियोग लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति।
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति॥ २०६॥

दोहा २०६

भरद्वाज कहते हैं कि माता की करनी सोचकर भरत हृदय में ग्लानि न करें। उनकी व्याख्या में कैकेयी की बुद्धि सरस्वती ने बिगाड़ी थी, इसलिये वे कैकेयी को दोषरहित कहते हैं। फिर मुनि अपनी इसी बात को कहने का संकोच भी रखते हैं। ऐसा कहने को भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि विद्वान लोक और वेद, दोनों को मानते हैं। वे उस असुविधा को अपने कथन से निकाल नहीं देते। आगे जिस बात को निश्चयपूर्वक रखते हैं, वह भरत का निर्मल यश है। उसे गाकर लोक और वेद, दोनों ही बड़ाई पायेंगे।

राज्य के विषय में मुनि का तर्क अलग से पूरा होता है। लोक और वेद को मान्य रीति यह है कि पिता जिसको राज्य दें, वही उसे पाये। दशरथ सत्यव्रती थे। यदि वे भरत को बुलाकर राज्य देते तो उसमें सुख, धर्म और बड़ाई होती। इस सम्भावना को भरद्वाज दोष नहीं मानते। वे आपत्ति का केन्द्र स्पष्ट करते हैं: राम का वनगमन सब अनर्थ की जड़ बना, उसके समाचार ने संसार को पीड़ा दी। उसी वनगमन को वे भावी के वश हुआ बताते हैं। बेसमझ रानी ने उसके अधीन कुचाल की और अन्त में पछतायी।

इस पूरे अनर्थ में भी जो भरत का तनिक अपराध बताये, उसे मुनि अधम, अज्ञानी और असाधु कहते हैं। उनका आश्वासन केवल वर्तमान त्याग पर निर्भर नहीं है। वे कहते हैं कि भरत राज्य करते तो भी उन्हें दोष नहीं होता, और राम को यह सुनकर सन्तोष होता। इस बात को सुनते समय मुनि की कही हुई सम्भावना को सम्भावना ही रहने देना चाहिये। भरत ने यहाँ राज्य सँभाल नहीं लिया है। भरद्वाज उनके मन में बैठी दोष की आशंका को उसकी जड़ तक जाकर खोल रहे हैं।

इसके बाद वे भरत के अभी लिये हुए मत की सराहना करते हैं। अब उन्होंने बहुत अच्छा किया है और उनके लिये यही उचित है। राम के चरणों का स्नेह संसार के सब सुन्दर मंगलों का मूल है। मुनि के कथन में राज्य पाने की स्वीकार्य रीति और रामप्रेम की बड़ाई, दोनों अपनी पूरी जगह पाते हैं। वे भरत को ऐसा निर्दोष सिद्ध नहीं करते जिसके लिये पिता की दी हुई गद्दी अपने आप अपराध हो। वे उनके प्रेम को पहचानते हैं और उसी के अनुकूल उनके निर्णय को उत्तम कहते हैं।

अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु॥ २०७॥

दोहा २०७

भरद्वाज भरत की ग्लानि समझकर उन्हें दोषरहित कहते हैं। वे कैकेयी के विषय में अपनी व्याख्या और उसका संकोच भी रखते हैं, पिता के दिये राज्य की रीति समझाते हैं और फिर रामप्रेम में लिये भरत के निर्णय की प्रशंसा करते हैं।

राम का प्रेम और कभी न घटनेवाला चन्द्रमा

भरद्वाज कहते हैं कि राम के चरणों का वही प्रेम भरत का धन, जीवन और प्राण है। उनके समान भाग्यवान कौन होगा। फिर इस प्रेम को उनके सम्बन्धों में रखकर देखते हैं। वे दशरथ के पुत्र और राम के प्यारे भाई हैं, उनके लिये ऐसा स्नेह आश्चर्य की बात भी नहीं। मुनि फिर स्पष्ट आश्वासन देते हैं कि राम के मन में भरत के समान प्रेम का पात्र दूसरा कोई नहीं है। इसके साथ वे अपने अनुभव का समाचार भी सुनाते हैं।

राम, लक्ष्मण और सीता, तीनों ने उस रात अत्यन्त प्रेम से भरत की सराहना की थी। भरद्वाज बताते हैं कि सारी रात इसी में बीती। प्रयाग में उनके स्नान के समय मुनि ने उनका मर्म जाना था। वे भरत के अनुराग में मग्न हो जाते थे। यहाँ भरत स्वयं वह रात देख नहीं रहे हैं, उन्हें मुनि उसका वृत्तान्त दे रहे हैं। राम की ओर से अपने लिये कैसा प्रेम है, यह बात भरत दूसरों के अनुभव से सुनते हैं।

उस स्नेह की तीव्रता बताने के लिये मुनि एक परिचित आसक्ति की उपमा लेते हैं। विषयों में फँसे मूर्ख मनुष्य को संसार के सुखमय जीवन से जैसा लगाव होता है, वैसा ही गहरा स्नेह राम को भरत से है। यह उपमा राम की स्थिति को अज्ञानमय नहीं कहती। वह लगाव की प्रबलता समझाती है। मुनि आगे कहते हैं कि शरणागत के पूरे परिवार को पालनेवाले रघुनाथ के लिये यह बड़ी बात भी नहीं। भरत के विषय में उनका अपना मत है कि वे मानो राम का प्रेम हैं जिसने शरीर धारण कर लिया है।

तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु॥ २०८॥

दोहा २०८

जिसे भरत अपने लिये कलंक समझते हैं, उसे भरद्वाज सबके लिये उपदेश कहते हैं। रामभक्ति के रस की सिद्धि के लिये यह समय गणेश की तरह मंगलकारी हुआ है। भरत का दुःख उनसे छिपा नहीं है, फिर भी वे उस दुःख में दिखाई पड़नेवाले प्रेम को सबके लिये प्राप्ति मानते हैं। अब इसी प्रेम की कीर्ति को वे निर्मल नये चन्द्रमा के रूप में देखते हैं। राम के सेवक उस चन्द्रमा के कुमुद और चकोर हैं।

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा । रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥
उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥

चौपाई २

इस चन्द्रमा का विधान साधारण चन्द्रमा से अलग है। वह सदा उदित रहेगा और कभी अस्त नहीं होगा। जगत् के आकाश में घटेगा नहीं, दिन-दिन दूना होगा। पोद्दार जी याद दिलाते हैं कि साधारण चन्द्रमा के अस्त होने और घटने से कुमुद तथा चकोर को दुःख होता है। भरत की कीर्ति के इस चन्द्रमा में उस दुःख का अवसर ही नहीं बचेगा। मुनि एक-एक गुण आगे बढ़ाकर अपने आश्वासन को पूरा करते हैं।

तीनों लोक चकवे के रूप में उससे बहुत प्रेम करेंगे। राम का प्रताप सूर्य के समान है, फिर भी वह भरत की कीर्ति की छवि नहीं हरेगा। यह चन्द्रमा दिन और रात, सदा सबको सुख देगा। कैकेयी की करनी राहु के रूप में उसका ग्रास नहीं कर सकेगी। वह राम के सुन्दर प्रेमरूपी अमृत से पूरा भरा है और गुरु के अपमानरूपी दोष से दूषित नहीं है। भरत ने ऐसा चन्द्रमा रचकर पृथ्वी पर भी अमृत सुलभ कर दिया है। मुनि रामभक्तों को उसी अमृत से तृप्त होने का निमन्त्रण देते हैं।

मुनि राम, सीता और लक्ष्मण के मुख से सुनी भरत की प्रशंसा बताते हैं। भरत की कीर्ति उनके लिये ऐसा चन्द्रमा है जो सदा बढ़ेगा, राम के प्रताप से फीका नहीं होगा और कैकेयी की करनी से ग्रस्त नहीं होगा।

दर्शन का फल, और उस फल का फल

कीर्ति के चन्द्रमा की बात के बीच भरद्वाज भगीरथ और दशरथ को याद करते हैं। भगीरथ गंगा को लाये, जिनका स्मरण ही सभी सुन्दर मंगलों की खान है। दशरथ के गुणों का समूह तो वर्णन में समा ही नहीं सकता। मुनि कहते हैं कि अधिक क्या कहा जाय, उनकी बराबरी का जगत् में कोई नहीं है। दोनों राजाओं का स्मरण उनके लिये किये हुए उपकार और स्नेह की महिमा के कारण आता है।

जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।
जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ॥ २०९॥

दोहा २०९

दशरथ के प्रेम और शील के वश होकर स्वयं राम आकर प्रकट हुए। उन्हीं राम का स्वरूप महादेव अपने हृदय के नेत्रों से देखते हुए कभी तृप्त नहीं हुए। पोद्दार जी इस देखने को भीतर का दर्शन बताते हैं। भरद्वाज दशरथ की बड़ाई को उस प्रेम तक ले जाते हैं जिसने भगवान को प्रकट किया। फिर भरत की ओर लौटते हैं। उन्होंने कीर्ति का ऐसा अनुपम चन्द्रमा रचा है जिसमें राम का प्रेम ही मृग के चिह्न के रूप में बसता है। चन्द्रमा का यह शेष अंश भी भरद्वाज की उपमा में प्रेम से पूरा हो जाता है।

इतनी बड़ी प्राप्ति के बाद भरत की ग्लानि मुनि को व्यर्थ प्रतीत होती है। उनके लिये भरत की दशा पारस पा लेने पर भी दरिद्रता से डरने जैसी है। जिस प्रेम को वे उनकी सबसे बड़ी सम्पत्ति कह चुके हैं, उसके रहते वे अपने को अभाव में क्यों मानें। यह कहते हुए भरद्वाज अपनी बात की विश्वसनीयता भी स्पष्ट करते हैं। वे झूठ नहीं कह रहे। वे उदासीन हैं, तपस्वी हैं और वन में रहते हैं।

इन तीन बातों को पोद्दार जी तीन अलग कारणों से खोलते हैं। उदासीन होने से मुनि किसी का पक्ष नहीं लेते। तपस्वी होने से किसी की मुँहदेखी बात नहीं करते। वन में रहने से किसी से उनका निजी प्रयोजन नहीं है। भरत को मिला यह सम्मान किसी लाभ की प्रतीक्षा में कही गयी प्रशंसा नहीं है। भरद्वाज अपने साधन के फल का लेखा देकर बताते हैं कि वे इस भेंट को कितना बड़ा मान रहे हैं।

सभी साधनों का सुन्दर फल उन्हें लक्ष्मण, राम और सीता का दर्शन मिला था। अब उस फल का भी फल भरत का दर्शन है। मुनि अपने साथ प्रयाग को भी इस सौभाग्य में सम्मिलित करते हैं। उनका और तीर्थराज का भाग्य बड़ा है। भरत धन्य हैं और उन्होंने अपने यश से संसार को जीत लिया है। ऐसा कहते-कहते भरद्वाज स्वयं प्रेम में मग्न हो जाते हैं। जिस अतिथि को वे संकोच से निकालना चाहते थे, उसके दर्शन को वे अपनी सिद्धि की पूर्णता कह रहे हैं।

तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा । सहित पयाग सुभाग हमारा॥
भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन मुनि भयऊ॥

चौपाई ३

मुनि की बात सुनकर सभासद हर्षित होते हैं। देवता साधु कहकर सराहते हैं और फूल बरसाते हैं। प्रयाग में और आकाश में धन्य की ध्वनि उठती है। भरत उसे सुन-सुनकर अनुराग में मग्न हो रहे हैं। उनका शरीर पुलकित है, हृदय में सीताराम हैं और कमल जैसे नेत्रों में जल भरा है। वे मुनियों की मण्डली को प्रणाम करते हैं और गद्गद वाणी से अपना उत्तर आरम्भ करते हैं।

पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।
करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन॥ २१०॥

दोहा २१०

भरद्वाज भगीरथ और दशरथ की महिमा के साथ भरत की प्रेममयी कीर्ति रखते हैं। वे निष्पक्ष होकर कहते हैं कि राम, सीता और लक्ष्मण के दर्शन का फल उन्हें भरत के दर्शन में मिला है। अब भरत अपना वास्तविक दुःख बताते हैं।

भरत के दुःख की असली जगह

भरत जिस स्थान पर बोल रहे हैं उसकी मर्यादा पहले कहते हैं। मुनियों का समाज है और तीर्थराज है। ऐसे स्थान में सच्ची सौगन्ध खाना भी बड़ी हानि का कारण है। फिर कोई बात बनाकर कहना हो तो उसके बराबर पाप और नीचता क्या होगी। वे अपनी बात को सौगन्ध से बल नहीं देते। सच्चे भाव से कहते हैं कि भरद्वाज सब जानते हैं और रघुनाथ हृदय के भीतर की बात जाननेवाले हैं। कुछ असत्य कहा भी जाये तो इन दोनों से छिप कैसे सकता है।

फिर वे अपनी चिन्ताओं को एक-एक करके स्पष्ट करते हैं। माता कैकेयी की करनी का उन्हें सोच नहीं है। जगत् उन्हें नीच मानेगा, इस बात का भी मन में दुःख नहीं है। परलोक बिगड़ जाने का भय भी नहीं है। पिता की मृत्यु को लेकर भी वे यहाँ शोक का कारण नहीं देखते। इसका कारण वे स्वयं बताते हैं। दशरथ का सुन्दर पुण्य और सुयश विश्व में भरा है। उन्हें राम और लक्ष्मण जैसे पुत्र मिले। उन्होंने राम के विरह में क्षणभंगुर शरीर त्यागा। ऐसे राजा के लिये सोच का कौन-सा प्रसंग बचता है।

पिता के बारे में भरत का यह वचन उनके पूर्ण हुए जीवन का गौरव है। वे पुण्य, कीर्ति, पुत्रों की प्राप्ति और अन्त में रामविरह में देहत्याग, सबको एक साथ रखते हैं। अब जिस बात से वे जल रहे हैं वह सामने आती है। राम, लक्ष्मण और सीता बिना जूते पहने मुनियों का वेष बनाकर वन-वन घूमते हैं। भरत की चिन्ता तीनों के लिये है। अपने नाम और अपनी गति से बात हटाकर वे उन प्रियजनों के कठिन जीवन का एक-एक अंश गिनाते हैं।

अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।
बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात॥ २११॥

दोहा २११

पोद्दार जी के अर्थ में वे वल्कल पहनते हैं और फलों का भोजन करते हैं। कुश तथा पत्ते बिछाकर पृथ्वी पर सोते हैं। वृक्षों के नीचे निवास करते हुए सर्दी, गर्मी, वर्षा और हवा सहते हैं। रहने, खाने, पहनने और सोने के ये चार साधारण काम भरत के मन में लगातार उपस्थित हैं। वे इन्हीं की कठिनाई सोचते हैं। जिसे हम वनवास कहकर एक शब्द में पार कर जाते हैं, भरत उसे दिन-रात सहन किये जानेवाले जीवन की तरह देख रहे हैं।

इसी दुःख की जलन से उनकी छाती निरन्तर जलती है। दिन में भूख नहीं लगती, रात में नींद नहीं आती। उन्होंने मन में सारे विश्व को खोज लिया है, पर इस कुरोग की कोई औषधि नहीं मिलती। मुनि ने अभी उनके लिये कीर्ति और राम का स्नेह बताया है। भरत अब बतला रहे हैं कि उनका रोग कहाँ है। अपना सम्मान सुन लेने से राम, सीता और लक्ष्मण का वन का श्रम मिट नहीं जाता। उसी श्रम को सोचकर उनकी भूख और नींद खो गयी है।

मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला॥
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू । गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रू॥

चौपाई ४

इस स्थिति को भरत बढ़ई और उसके बनाये बुरे यन्त्र के रूप में कहते हैं। माता की कुमति पापों की जड़ बढ़ई है। उसने भरत के हित को बसूला बनाया। उस औज़ार से कलहरूपी बुरी लकड़ी को काटकर कुयन्त्र रचा और अवधि का कठोर कुमन्त्र पढ़कर उसे गाड़ दिया। उपमा के प्रत्येक हिस्से का अपना काम है। विचार बढ़ई है, अपने कहे हित का औज़ार है, कलह उसकी लकड़ी है और उस लकड़ी से वह विनाशकारी व्यवस्था बनती है जिसमें सब फँस गये हैं।

पोद्दार जी इन सम्बन्धों को और स्पष्ट नाम देते हैं। भरत को राज्य देना बसूला है। राम का वनवास वह कुयन्त्र है। चौदह वर्ष की अवधि कठोर कुमन्त्र है। इस प्रकार भरत अपने नाम पर किये गये हित में पूरे अनर्थ का साधन देखते हैं। उनके लिये माता ने जो साज रचा, उसने सारे जगत् को छिन्न-भिन्न कर दिया। उनकी बात में बारहबाट होना बिखर जाने की दशा है। अब उस बिगड़े योग के मिटने का उपाय भी वे एक ही कहते हैं। राम लौट आयें, तभी अयोध्या फिर बसेगी। अन्य किसी उपाय से उनके हृदय का यह रोग नहीं मिटता।

भरत को अपनी अपकीर्ति, परलोक या पिता के पूर्ण हुए जीवन का शोक नहीं सताता। वे राम, सीता और लक्ष्मण के वन के कष्ट से जल रहे हैं। अपने लिये बनाया राज्य उन्हें अनर्थ का औज़ार लगता है और राम की वापसी ही उसका उपचार है।

प्रेमप्रिय अतिथि बनने का संकोच

भरत के वचन सुनकर मुनि को सुख मिलता है और सभी बहुत प्रकार से उनकी बड़ाई करते हैं। भरद्वाज उन्हें अधिक सोच न करने को कहते हैं। राम के चरणों का दर्शन पाते ही उनका सारा दुःख मिट जायेगा। इस प्रकार मन को समझाने के बाद मुनि उनके सामने अतिथि बनने का अनुरोध रखते हैं। जो अभी अपना दुःख कह रहे थे, अब उनके लिये आश्रम का प्रेम सामने आता है।

करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।
कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु॥ २१२॥

दोहा २१२

भरद्वाज चाहते हैं कि भरत और उनके लोग प्रेमप्रिय अतिथि हों। वे कृपा करके कन्द, मूल, फल और फूल स्वीकार करें, जो कुछ आश्रम दे। भरत के मन में इसे सुनकर फिर सोच होता है। उन्हें लगता है कि इस समय यह कठिन और बेढब संकोच आ पड़ा। उनके लिये आतिथ्य स्वीकार करना भी सहज नहीं है। अभी वे वन में प्रियजनों की कठिनाई गिना चुके हैं। अब अपने लिये मिला निमन्त्रण उन्हें रुककर विचार करने को बाध्य करता है।

फिर गुरुजनों की वाणी का महत्त्व जानकर वे चरणों की वन्दना करते हैं और हाथ जोड़कर कहते हैं कि मुनि की आज्ञा सिर पर रखकर उसका पालन करना उनका परम धर्म है। इस उत्तर से भरद्वाज प्रसन्न होते हैं। वे विश्वासपात्र सेवकों और शिष्यों को पास बुलाते हैं। उन्हें भरत की पहुनाई के लिये जाकर कन्द, मूल और फल लाने का निर्देश देते हैं। वे बहुत अच्छा कहकर सिर नवाते हैं और आनन्दित होकर अपने-अपने काम में लग जाते हैं।

इन तैयारियों के बीच मुनि के मन में अतिथि के योग्य सत्कार की चिन्ता आती है। उन्होंने बड़े पाहुन को बुलाया है। जैसा देवता हो, वैसी ही पूजा होनी चाहिये। यह सुनकर ऋद्धियाँ और अणिमा आदि सिद्धियाँ उपस्थित हो जाती हैं। वे पूछती हैं कि मुनि की जो आज्ञा हो, उसे करें। कथा में यह उनका वास्तविक आगमन है। आश्रम की प्रारम्भिक कन्द-मूल की तैयारी के आगे अब मुनि के तप की सामर्थ्य खुलनेवाली है।

भरद्वाज प्रसन्न होकर उन्हें काम बताते हैं। छोटे भाई और समाज के साथ भरत राम के विरह में व्याकुल हैं। उनकी पहुनाई करके उनका श्रम दूर किया जाय। यह निर्देश भरत अकेले के लिये नहीं है। शत्रुघ्न और साथ आये सभी लोग उसके भीतर हैं। मुनि ने भरत के मन का दुःख सुना है और अब यात्रा से थके समाज को विश्राम देना चाहते हैं। अतिथि के सम्मान में उसी समाज की देखभाल भी सम्मिलित है जिसे भरत रास्ते भर सँभालते आये हैं।

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज॥ २१३॥

दोहा २१३

मुनि रामदर्शन का आश्वासन देकर सबको अपना अतिथि बनने के लिये कहते हैं। भरत संकोच के बाद उनकी आज्ञा स्वीकार करते हैं। ऋद्धि और सिद्धियाँ आती हैं और मुनि उन्हें भरत, शत्रुघ्न तथा पूरे समाज का श्रम दूर करने का काम देते हैं।

पहले सब संगियों का ठिकाना

ऋद्धि और सिद्धियाँ मुनि की आज्ञा सिर पर रखती हैं और अपने को भाग्यवती मानती हैं। वे आपस में कहती हैं कि राम के छोटे भाई जैसे अतिथि की तुलना किसी से नहीं हो सकती। आज मुनि के चरणों की वन्दना करके वही करना है जिससे सारा राज-समाज सुखी हो। उनकी अपनी प्रसन्नता काम में उतरती है। वे अनेक सुन्दर घर रचती हैं, जिन्हें देखकर देवताओं के विमान भी लजा जायँ। आश्रम के अतिथियों का निवास इसी अद्भुत सामर्थ्य से तैयार होता है।

उन घरों में भोग और ऐश्वर्य की बहुत सामग्री भर दी जाती है। उसे देखकर देवता तक ललचाते हैं। दास और दासियाँ सब आवश्यक सामान लिये हुए मन लगाकर अतिथियों की रुचि देखते हैं। पोद्दार जी इस सेवा को मन के अनुकूल व्यवहार करना बताते हैं। प्रत्येक के लिये एक ही सुविधा रखकर काम पूरा नहीं माना जाता। जिसका मन जिस वस्तु में लगे, सेवा उसी के अनुसार होती है। तुलसी कहते हैं कि स्वर्ग में स्वप्न में भी न मिलनेवाले सुख के साधन सिद्धियाँ पलभर में सजा देती हैं।

निवास देने में भी एक क्रम रखा गया है। पहले सब लोगों को उनकी-अपनी रुचि के अनुसार सुन्दर और सुखद ठिकाने मिलते हैं। फिर परिवार सहित भरत को निवास दिया जाता है। भरद्वाज ने ऐसी ही आज्ञा दी थी। टीका इसका कारण भरत की इच्छा में बताती है। वे चाहते थे कि पहले उनके सभी संगियों को आराम मिले। मुनि ने उनके मन को जानकर दूसरों के ठिकाने पहले और उनके परिवार का ठिकाना बाद में देने का निर्देश दिया।

बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।
बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह॥ २१४॥

दोहा २१४

इस छोटे-से क्रम में भरत की यात्रा का स्वभाव फिर दिखाई देता है। नदी पार करके उन्होंने पहले सबको सँभाला था। प्रयाग में सबके स्नान का समाचार लेकर स्वयं नहाये थे। अब उनके मन की वही प्राथमिकता मुनि की व्यवस्था में उतरती है। भरत के नाम से हुआ निमन्त्रण उनके संगियों को प्रतीक्षा में नहीं छोड़ता। आश्रम में उनके स्वागत की पूर्णता सबके आराम से होती है।

मुनि के तपोबल से रचा यह वैभव ब्रह्मा को भी चकित कर देनेवाला है। भरत उसे देखते हैं तो सभी लोकपालों के लोक उसके सामने छोटे लगते हैं। पोद्दार जी उदाहरण में इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर का नाम देते हैं। सुख की सामग्री इतनी है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। तुलसी उसका प्रभाव बताते हुए कहते हैं कि उसे देखकर ज्ञानी भी वैराग्य भूल जायँ। यह उसी रात की तैयारी है जिसमें भरत को इस सारी सम्पन्नता के बीच रहना है।

सिद्धियाँ प्रत्येक अतिथि की रुचि के अनुसार निवास और सेवा सजाती हैं। भरत की इच्छा जानकर मुनि ने पहले सभी संगियों और फिर उनके परिवार को ठिकाना देने की आज्ञा दी है। तप से रचा वैभव देवताओं को भी चकित करता है।

एक आश्रम में वैभव और विरह

अब तुलसी उस आतिथ्य को अलग-अलग वस्तुओं में दिखाते हैं। बैठने के आसन हैं, सोने की सेजें हैं, सुन्दर वस्त्र और चँदोवे हैं। वन और बगीचे हैं, अनेक प्रकार के पक्षी और पशु हैं। सुगन्धित फूल और अमृत जैसे स्वादिष्ट फल हैं। निर्मल जलाशय भी कई प्रकार के हैं। पोद्दार जी इन्हें तालाब, कुएँ और बावलियों के रूप में समझाते हैं। भीतर के विश्राम से बाहर की हरियाली और जल तक, अतिथियों का पूरा परिवेश तैयार है।

पवित्र खान-पान के पदार्थ अमृत के भी अमृत जैसे हैं। उन्हें देखकर लोग संयमी मुनियों की तरह सकुचाते हैं। सभी के डेरों में कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं। टीका उन्हें मनचाही वस्तु देनेवाले बताती है। ऐसी उपलब्धि को देखकर इन्द्र और शची का मन भी ललचा उठता है। देवताओं की इच्छा जगानेवाली वस्तुएँ यात्रियों के लिये सहज उपलब्ध हैं, और यात्री उन्हें देखकर अपने मन का संकोच अनुभव करते हैं।

वसन्त ऋतु है। शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा बहती है। सभी को चारों पदार्थ सुलभ हैं, जिन्हें टीका धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कहती है। ये वही चार पुरुषार्थ हैं जिन्हें भरत ने त्रिवेणी की प्रार्थना में अपने माँगने से अलग रखा था। आश्रम की सम्पन्नता अब उन्हें सबके लिये उपलब्ध दिखाती है। इस दृश्य में वस्तुओं की सुन्दरता के साथ भरत की प्रार्थना भी हमारे मन में बनी रहती है। उन्होंने तीर्थराज के सामने अपनी इच्छा को एक ही प्रेम में रखा था।

उस युग के भोग-वर्णन की भाषा में तुलसी माला, चन्दन और स्त्रियों का उल्लेख भी इसी सामग्री के साथ करते हैं। लोगों को देखकर कवि हर्ष और विस्मय के वश बतलाते हैं। पोद्दार जी की टीका यहाँ हर्ष के साथ विषाद भी खोलती है। सुख की वस्तुओं और मुनि के तप के प्रभाव को देखकर आनन्द होता है। साथ ही लोगों के मन में यह दुःख है कि राम के विरह में नियम और व्रत से रहनेवाले वे इस भोग-विलास में कैसे आ फँसे।

टीका उनकी आशंका को आगे तक ले जाती है। कहीं इन वस्तुओं में आसक्ति होने से मन अपने नियम-व्रत न छोड़ दे। आश्चर्य, प्रसन्नता और यह चिन्ता एक ही आतिथ्य के भीतर उपस्थित हैं। अतिथियों की हिचक सुख की कमी से नहीं उठ रही। सब साधन सामने हैं, और उन्हीं के सामने अपना लिया हुआ संयम उन्हें याद आ रहा है। मुनि के तप का सम्मान तथा रामविरह का नियम, दोनों को सँभालते हुए वे रात उस आश्रम में रहते हैं।

संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार॥ २१५॥

दोहा २१५

अन्तिम दोहे में सम्पत्ति चकवी बनती है और भरत चकवा। मुनि की आज्ञा दोनों को आश्रमरूपी पिंजरे में रखनेवाली शक्ति है। पोद्दार जी बहेलिये का पूरा चित्र समझाते हैं। एक पिंजरे में रख देने पर भी चकवी और चकवे का रात में संयोग नहीं होता। वैसे ही मुनि की आज्ञा से भरत सारी रात भोग की सामग्री के साथ रहते हैं, फिर भी मन से उसका स्पर्श तक नहीं करते। निकट रखी हुई सम्पत्ति उनके अनुराग में प्रवेश नहीं पा जाती।

रात इसी तरह बीतती है और सबेरा हो जाता है। अन्त में भरत के लिये न कोई नयी माँग आती है, न उस वैभव का मन में उपभोग। जो निमन्त्रण उन्होंने आज्ञा समझकर स्वीकार किया था, उसका पालन हुआ। साथ आये लोगों को आराम मिला। आश्रम का सत्कार अपनी पूरी शोभा में सामने आया, और भरत की प्रार्थना में माँगा हुआ प्रेम अपनी जगह बना रहा। तुलसी इस रात को इसी एक पिंजरे के चित्र और उसके बाद के भिनसार में पूरा करते हैं।

आश्रम में प्रत्येक सुख उपलब्ध है। लोग आनन्द और आश्चर्य के साथ अपने नियमों की चिन्ता भी अनुभव करते हैं। भरत मुनि की आज्ञा से उस वैभव के बीच रात बिताते हैं, पर मन से भी भोगों में लिप्त नहीं होते।

और अन्त में, अपनी ओर

भरत की प्रार्थना को इस पूरे दिन के साथ पढ़िये। उन्होंने जन्म-जन्म का रामप्रेम माँगा, और उस प्रेम का रूप रास्ते में दूसरों की चिन्ता करते हुए भी दिखता रहा। नाव से उतरकर सबको सँभालना, अपना स्नान सबसे पीछे करना और अपने संगियों को पहले आराम दिलाने की इच्छा, इनमें उनके अनुराग का व्यवहार है। मुनि उसी इच्छा को समझकर अपने अतिथि का सम्मान करते हैं।

भरद्वाज के आश्वासन में भी सुनने की यह सावधानी है। वे भरत का संकोच पहचानते हैं, दोष का प्रश्न समझाते हैं और राम की ओर से मिले प्रेम का समाचार देते हैं। फिर भरत अपना दुःख स्पष्ट करते हैं तो मुनि उसे सुनते हैं। भरत अपने यश की चिन्ता से अधिक वन में तीन प्रियजनों की कठिनाई से व्याकुल हैं। इस पहचान के बाद ही आतिथ्य का निमन्त्रण आता है।

हम इस रात का अन्त उसके वैभव की गिनती में करें तो भरत की सबसे बड़ी बात छूट जायेगी। तुलसी का अन्तिम चित्र चकवा और चकवी का है। सम्पत्ति पास है, स्वीकार की गयी आज्ञा भी है, और फिर भी मन अपने प्रिय में है। प्रयाग में माँगा गया प्रेम उस रात की हर सुविधा के बीच अपनी दिशा सँभाले रहता है।

प्रयाग का सबेरा भरत को उसी अनुराग के साथ पाता है जिससे उन्होंने त्रिवेणी के सामने हाथ जोड़े थे। मुनि की पहुनाई पूरी हुई, समाज का श्रम दूर करने के लिये अद्भुत सुख रचे गये, और भरत के हृदय में राम का स्थान किसी दूसरी इच्छा ने नहीं लिया।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २०२ से २१५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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