रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · गाँव की स्त्रियाँ और वन का मार्ग
गाँव की स्त्रियाँ और वन का मार्ग
सीता से सम्बन्ध पूछती ग्रामवधुएँ, विदा के बाद भी साथ लगे हुए मन, और पथ पर सँभालकर रखे जाते तीन यात्रियों के चरण।
गाँव की स्त्रियों के सामने दो सुन्दर राजकुमार और सीता हैं। रूप देखकर उनके मन में एक सीधा प्रश्न उठा है, इनसे आपका क्या सम्बन्ध है। वे सीता से पूछती हैं, और उनके पूछने में इतना प्रेम है कि उत्तर दिये बिना रहा भी नहीं जाता। सीता सकुचाती हैं। उनकी कठिनाई दोनों ओर है, पूछनेवालियों का मन भी रखना है और अपनी लज्जा भी सँभालनी है। इसी छोटी सी बातचीत से तुलसीदास के रामचरितमानस का यह प्रसंग खुलता है।
फिर मार्ग पूछा जायेगा और विदा होगी। मिलने का समय समाप्त होने पर भी गाँव के लोगों की बातें समाप्त नहीं होतीं। कोई विधाता को दोष देगा, कोई इन्हें विधाता की रचना से परे मानेगा, और कोई इतना भर कहेगा कि हम बहुत नहीं जानते, इनका दर्शन पाकर धन्य हुए हैं। इन अलग अलग बातों के बीच एक चिन्ता बार बार लौटती है, इतने कोमल चरण कठिन वनमार्ग पर कैसे चलेंगे। आगे उसी मार्ग पर राम, सीता और लक्ष्मण चलते दिखाई देंगे, और कवि उनके पाँव रखने तक में एक दूसरे के प्रति प्रेम दिखायेंगे।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- सीता ग्रामवधुओं को सम्बन्ध बताती हैं, उनकी प्रेमभरी प्रार्थना सुनती हैं और मधुर वचनों से सन्तोष देती हैं।
- राम लोगों को प्रिय वचन कहकर विदा करते हैं और सीता तथा लक्ष्मण के साथ वन का मार्ग लेते हैं।
- लक्ष्मण राम का रुख समझकर रास्ता पूछते हैं और चलते हुए राम तथा सीता के चरणचिह्नों को बचाते हैं।
- ग्रामवधुएँ और गाँव के लोग दर्शन से हर्षित, विदा से व्याकुल, और अपनी अपनी समझ के अनुसार स्नेहभरी बातें कहनेवाले।
सुमुखि, ये आपके कौन हैं
स्त्रियाँ सीता को सुमुखि कहकर सम्बोधित करती हैं। प्रश्न से पहले दोनों राजकुमारों के रूप की प्रशंसा है, ये तो अपनी सुन्दरता से करोड़ों कामदेवों को लजानेवाले हैं। फिर पूछती हैं कि ये आपके कौन हैं। जिस परिचय की उन्हें इच्छा है, वह सीता के साथ इनके सम्बन्ध का परिचय है। सामने दिखाई देते रूप के विषय में उनके मन में विस्मय है, और उसी विस्मय में मिलने का अपनापन भी जुड़ गया है। सीता यह प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सकुचा जाती हैं और मन ही मन मुसकराती हैं।
कोटि मनोज लजावनिहारे । सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥
चौपाई १
सुनि सनेहमय मंजुल बानी । सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥
सीता उन स्त्रियों को देखती हैं, फिर पृथ्वी की ओर देखती हैं। तुलसी यहाँ दोनों ओर के संकोच का उल्लेख करते हैं। पोद्दार जी की टीका उसे खोलती है: उत्तर न देने से गाँव की स्त्रियों को दुःख होगा, इसका संकोच है; बताने में अपनी लज्जा का संकोच है। उनके लिये सामनेवालियों के प्रेम का भी मान है। इसीलिये उनकी चुप्पी के पास मुसकराहट है और उनके सकुचाने के भीतर उत्तर देने की इच्छा। दो भावों को सँभालती हुई सीता प्रेमसहित मधुर वचन कहती हैं।
उनकी आँखों के लिये हिरण के बच्चे की उपमा आती है और वाणी के लिये कोयल की। इस उत्तर को सुनते हुए हम केवल सम्बन्ध का नाम नहीं पाते, कहनेवाली की कोमलता भी पाते हैं। सीता पहले गोरे शरीरवाले राजकुमार का परिचय देती हैं। वे सहज स्वभाव के हैं, सुन्दर हैं, उनका नाम लक्ष्मण है और वे मेरे छोटे देवर हैं। यहाँ नाम साफ़ कहा जाता है और सम्बन्ध भी साफ़ कहा जाता है। स्त्रियों के प्रश्न का एक भाग इतने मधुर, थोड़े से शब्दों में पूरा हो गया।
सहज सुभाय सुभग तन गोरे । नामु लखनु लघु देवर मोरे॥
चौपाई २
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥
इसके बाद सीता अपने चन्द्रमा जैसे मुख को आँचल से ढकती हैं। प्रियतम की ओर देखती हैं, भौंहें बाँकी करती हैं, और खंजन पक्षी जैसे सुन्दर नेत्रों को तिरछा करके संकेत से बता देती हैं कि ये मेरे पति हैं। लक्ष्मण के परिचय में उनका नाम मुख से निकला था। पति का परिचय इस नेत्र संकेत से मिल जाता है। स्त्रियों ने जो पूछा था, उसका पूरा उत्तर उनके सामने है। तुलसी उस उत्तर को आँखों और संकेतों में ठहराकर दिखाते हैं, जहाँ सीता की लज्जा भी बनी रहती है और प्रेम से पूछी बात का मान भी रह जाता है।
खंजन मंजु तिरीछे नयननि । निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥
चौपाई ३
भईं मुदित सब ग्रामबधूटीं । रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥
जानते ही सब ग्रामवधुएँ आनन्दित हो जाती हैं। उनके हर्ष का परिमाण बताने के लिये कवि बड़ी सीधी उपमा चुनते हैं, जैसे कंगालों ने धन की राशियाँ लूट ली हों। परिचय पाने में इतना सुख मिला है। सामने आये यात्रियों से अपने प्रश्न का उत्तर मिलना ही उनके लिये निधि बन गया। थोड़ी देर पहले सीता को संकोच था कि उत्तर न देने से इन्हें दुःख होगा। अब इन्हीं स्त्रियों का आनन्द धन पानेवाले निर्धनों के आनन्द जैसा बताया गया है। उनकी वाणी में जो प्रेम आया था, उसे सीता के उत्तर ने सन्तोष दिया है।
ग्रामवधुओं के प्रेमभरे प्रश्न पर सीता दोनों ओर के संकोच को सँभालती हैं। लक्ष्मण को नाम लेकर अपना छोटा देवर बताती हैं और पति का परिचय नेत्रों के संकेत से देती हैं। सब स्त्रियाँ धन पा गये निर्धनों की तरह आनन्दित हो उठती हैं।
आशीष में फिर मिलने की विनती
हर्षित स्त्रियाँ अत्यन्त प्रेम से सीता के पैरों पड़ती हैं और अनेक प्रकार की आशीष देती हैं। पहली शुभकामना सुहाग की है। जब तक शेषजी के सिर पर पृथ्वी बनी रहे, तब तक सीता सदा सुहागिनी रहें। आशीष में अपने गाँव या अपने जीवन की अवधि से कहीं आगे का विस्तार है। जिस सम्बन्ध का परिचय अभी मिला, उसी सम्बन्ध की अखण्डता के लिये यह मंगलकामना उठती है। स्त्रियाँ पति का परिचय पाकर प्रसन्न हुई थीं, अब उसी सौभाग्य के चिरस्थायी होने की कामना करती हैं।
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।
दोहा ११७
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥ ११७॥
इसके साथ वे चाहती हैं कि सीता पार्वती के समान पति की प्रिय हों। सुहाग की दीर्घता के साथ दाम्पत्य के प्रेम की भी शुभकामना है। फिर देवी कहकर निवेदन करती हैं कि हम पर कृपा बनाये रखियेगा। मिलनेवालियों का मन अब इस बात पर पहुँच गया है कि आज का स्नेह आगे भी बना रहे। वे केवल आशीष देकर पीछे नहीं हट जातीं। अपने लिये जो चाहती हैं, उसे भी बड़ी विनय से कहती हैं, और वह चाह इसी मार्ग पर फिर दर्शन पाने की है।
वे बार बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं कि लौटते समय इसी रास्ते आइयेगा। हमें अपनी दासी समझकर दर्शन दीजियेगा। लौटने की कोई तिथि वे नहीं पूछतीं। उनके निवेदन में मार्ग का नाम भी यही है, जिस पर आज यह मिलना हुआ है। उसी पर पुनः आने की इच्छा उनके प्रेम को आगे तक ले जाती है। अभी सीता से सम्बन्ध पूछा था; अब वे अपने लिये दासी का सम्बन्ध कह रही हैं। कृपा बनी रहे और दर्शन मिलता रहे, उनकी विनती में ये दोनों बातें साथ जुड़ी हैं।
दरसनु देब जानि निज दासी । लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी॥
चौपाई ४
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं । जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं॥
सीता उन सबको प्रेम की प्यासी देखती हैं। वे मधुर वचन कह कहकर उन्हें भलीभाँति सन्तोष देती हैं। तुलसी उन वचनों का पूरा संवाद नहीं लिखते, उनके प्रभाव का चित्र देते हैं: जैसे चाँदनी कुमुदिनियों को खिलाकर पुष्ट कर रही हो। इस चित्र में स्त्रियों की प्यास और सीता के वचनों से मिला पोषण एक साथ अनुभव में आता है। उनके बार बार किये निवेदन को मधुर उत्तर मिलते हैं। जिन आँखों ने संकेत से पति को पहचाना, वही स्त्रियाँ अब वचन सुनकर तृप्त हो रही हैं।
इस भेंट में बोलने और सुनने का क्रम कितना कोमल है। पहले ग्रामवधुओं की सुन्दर वाणी सुनकर सीता के मन में मुसकराहट आयी; अब सीता की मधुर वाणी से ग्रामवधुओं को सन्तोष मिला। प्रश्न, परिचय, आशीष और फिर मिलने की प्रार्थना, हर बात पिछली बात के प्रेम को आगे बढ़ाती है। यहाँ चाँदनी की उपमा इसी सन्तोष के साथ आती है। थोड़ी देर बाद बिछुड़ने का दुःख होगा, पर उससे पहले कवि इस मिलने का आनन्द पूरा होने देते हैं, स्त्रियों की विनती समेत और सीता के उत्तर समेत।
स्त्रियाँ सीता को शेषजी के सिर पर पृथ्वी रहने तक सुहागिनी और पार्वती के समान पति की प्रिय रहने की आशीष देती हैं। कृपा बनाये रखने तथा लौटते समय इसी मार्ग से दर्शन देने की विनती करती हैं। सीता के मधुर वचन उन्हें चाँदनी से पुष्ट कुमुदिनियों जैसा सन्तोष देते हैं।
रास्ता बताते हुए भर आयीं आँखें
उसी समय लक्ष्मण राम का रुख समझ लेते हैं और कोमल वाणी से लोगों से मार्ग पूछते हैं। चलने की इच्छा राम की है, उसे समझकर प्रश्न लक्ष्मण करते हैं। अभी मधुर वचनों से सन्तोष पाया था, अब रास्ते का प्रश्न सुनते ही स्त्री पुरुष दुःखी हो जाते हैं। शरीर पुलकित हैं और आँखों में जल है। पोद्दार जी की टीका इस जल को वियोग की सम्भावना से उमड़ा हुआ प्रेम बताती है। प्रस्थान अभी हुआ नहीं, उसकी बात आते ही मिलने के सुख में बिछुड़ने की पीड़ा आ गयी है।
उनका आनन्द मिट जाता है, मन उदास हो जाते हैं। यहाँ फिर निधि की उपमा आती है, मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीन रहा हो। परिचय पाकर ग्रामवधुएँ धन पा गये कंगालों जैसी प्रसन्न हुई थीं; अब विदा का संकेत उसी मिली सम्पत्ति के छिनने जैसा है। इस थोड़ी सी मुलाकात में कितना कुछ अपना लगने लगा, यह दोनों उपमाओं को साथ रखने से समझ आता है। गाँव के लोगों के पास अभी दर्शन है और वाणी सुनने का सुख है। मार्ग पूछा गया तो उसी सुख के हाथ से निकलने का बोध हुआ।
फिर वे कर्म की गति समझकर धैर्य रखते हैं। जिस बात से दुःख हुआ है, उसी का उत्तर देना है। वे अच्छी तरह विचार करके सुगम मार्ग बता देते हैं। उनका स्नेह यहाँ रास्ता बताने की सावधानी में भी दिखाई देता है। यात्रियों को जाते देखना कठिन है, और उनके लिये सहज मार्ग ढूँढ़कर बताना आवश्यक है। प्रेम से व्याकुल हुए यही लोग उस आवश्यकता को पूरा करते हैं। कवि पहले उनका दुःख दिखाते हैं, फिर धैर्य और फिर सुगम मार्ग बताना, ताकि हम उनके बताये रास्ते के पीछे का मन भी जान सकें।
लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।
दोहा ११८
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ॥ ११८॥
अब रघुनाथ लक्ष्मण और जानकी सहित चल देते हैं। वे सब लोगों को प्रिय वचन कहकर लौटा देते हैं। दोहे में जाने और लौटाने की बात एक साथ है: यात्री आगे गये, मिलनेवाले अपने स्थान को लौटे। पर उसी दोहे का अन्त बताता है कि राम उनके मन अपने साथ लगा ले गये। लौटनेवाले शरीर से लौट रहे हैं और चित्त यात्रियों के साथ लगा है। इसी कारण आगे की कथा उन लोगों की बातचीत में कुछ देर बनी रहती है। विदा हो गयी है, फिर भी उनके लिये देखने और मिलने का विषय समाप्त नहीं हुआ।
प्रिय वचन दोनों ओर की भेंट को थामे हुए हैं। सीता ने उनसे सन्तोष दिया था, राम उन्हीं की मधुरता से लोगों को लौटाते हैं। फिर भी विदा का दुःख रहता है। तुलसी उस दुःख को मिटा हुआ नहीं बताते; आगे लौटते हुए लोगों का पछतावा सुनायेंगे। यहाँ इतना होता है कि राम चल पड़ते हैं और मिलनेवालों के मन उनके साथ जुड़ जाते हैं। मार्ग की यात्रा और मन का साथ साथ चलना इसी दोहे से आगे बढ़ते हैं।
राम का रुख समझकर लक्ष्मण रास्ता पूछते हैं। लोग दुःखी होते हैं, फिर धैर्य रखकर सुगम मार्ग बताते हैं। राम सीता और लक्ष्मण के साथ चल देते हैं, सबको प्रिय वचन कहकर लौटाते हैं और उनके मन अपने साथ लगा लेते हैं।
लौटते लोगों का विधाता से उलाहना
लौटते हुए स्त्री पुरुष बहुत पछताते हैं और मन ही मन दैव को दोष देते हैं। परस्पर विषादभरी बातें करते हुए कहते हैं कि विधाता के सब काम उलटे हैं। अभी जिन राजकुमारों का रूप देखा है, उनके वनवास को वे समझ नहीं पा रहे। उनकी शिकायत में अब सृष्टि के दूसरे उदाहरण भी आते हैं। चन्द्रमा पर कलंक क्यों है, उसमें घटने बढ़ने का रोग क्यों है, कल्पवृक्ष को पेड़ क्यों बनाया और समुद्र को खारा क्यों किया। जिस विधाता ने यह सब किया, उसी ने इन राजकुमारों को वन में भेजा है।
निपट निरंकुस निठुर निसंकू । जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू॥
चौपाई ५
रूख कलपतरु सागरु खारा । तेहिं पठए बन राजकुमारा॥
वे उसे निरंकुश, निर्दय और निडर कहते हैं। ये लौटते लोगों के दुःख से निकले हुए दोष हैं। उनकी दृष्टि अभी यात्रियों की सुकुमारता पर अटकी है और मन उस वनमार्ग पर लगा है जहाँ वे जा रहे हैं। इसी भाव से वे विधाता की सारी रचना का हिसाब लगाने लगते हैं। जिनके लिये भोग विलास उपयुक्त जान पड़ते हैं, उन्हें वनवास दिया गया है, तो भोग विलास बनाये ही किस प्रयोजन से गये। उनकी बात में हर सुविधा का मूल्य इन यात्रियों के सुख से जुड़ जाता है।
एक एक सुविधा का नाम लेकर वे अपनी पीड़ा खोलते हैं। ये बिना जूते के रास्ते पर चलते हैं, तो अनेक प्रकार के वाहन रचने में क्या मिला। ये कुश और पत्ते बिछाकर धरती पर पड़े रहते हैं, तो सुन्दर पलंग और बिछौने किसलिये बनाये जाते हैं। जब इनके लिये बड़े वृक्षों का निवास रखा, तब उज्ज्वल महल बना बनाकर विधाता ने व्यर्थ परिश्रम किया। उनके उलाहने में नंगे पाँव, कुश पत्तों की शय्या और वृक्ष का आश्रय साथ आते हैं। इन्हीं को सोचकर सवारियाँ, सेज और महल उन्हें निष्फल लगते हैं।
जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार।
दोहा ११९
बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार॥ ११९॥
दोहा उसी शिकायत को वस्त्र और आभूषण तक ले जाता है। इतने सुन्दर, इतने सुकुमार ये राजकुमार मुनियों के वल्कल पहनते हैं और जटा धारण करते हैं। तब भाँति भाँति के गहने और कपड़े बनाने का प्रयोजन क्या रहा। फिर भोजन की बात आती है: जब ये कन्द, मूल और फल खाते हैं, तो जगत में अमृत आदि भोजन भी व्यर्थ हैं। यात्रा की प्रत्येक आवश्यकता के सामने लोग उससे जुड़ा ऐश्वर्य रखते हैं और दुःख से भरकर उसे निष्फल कहते हैं। खाने, पहनने, सोने, रहने और चलने तक उनका ध्यान गया है।
इन बातों के बीच यात्रियों के लिये उनका स्नेह बार बार प्रकट होता है। वनवास का दुःख वे अपने परिचित सुखों के सहारे कह रहे हैं। सुन्दर सेज बन सकती है, सवारी हो सकती है, महल और अच्छे वस्त्र हो सकते हैं, फिर ये इतने कोमल होकर इनसे वंचित क्यों चल रहे हैं। प्रश्न विधाता से है और उसका कारण अभी पाया हुआ दर्शन है। तुलसी लौटते जनों को इतना अवकाश देते हैं कि उनका उलाहना एक वाक्य में दब न जाये, हर सुख सुविधा के साथ उनका व्यथित मन सामने आये।
लौटते स्त्री पुरुष विधाता की रचना को उलटा कहते हैं। चन्द्रमा, कल्पवृक्ष और समुद्र के उदाहरण देकर राजकुमारों के वनवास पर दुःख जताते हैं। इनके नंगे पाँव, कुश पत्तों की शय्या, वृक्ष निवास, वल्कल, जटा और फल मूल के सामने उन्हें वाहन, सेज, महल, आभूषण, वस्त्र तथा उत्तम भोजन व्यर्थ लगते हैं।
किसी का तर्क, किसी की कृतज्ञता
इसी बातचीत में कुछ लोग दूसरी बात कहते हैं। उनकी समझ में ये स्वभाव से ही सुन्दर हैं और स्वयं प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा के बनाये हुए नहीं हैं। पोद्दार जी की टीका उनके कथन का आशय इनका सौन्दर्य और माधुर्य नित्य तथा स्वाभाविक होना बताती है। इस मत को कहनेवाले अब समान रूप खोजने की बात उठाते हैं। कान, आँख और मन की पहुँच में आनेवाली विधाता की करनी का वेदों ने जहाँ तक वर्णन किया है, वहाँ तक खोजकर देख लिया जाये।
चौदहों लोकों में ऐसे पुरुष कहाँ हैं और ऐसी स्त्री कहाँ है। उनकी बात का आधार अनुपम रूप है: रचना भर में ऐसी समानता नहीं मिलती, इसलिये ये विधाता के बनाये हुए कैसे होंगे। इस प्रश्न में उनका देखा हुआ सौन्दर्य समूची जानी हुई सृष्टि के सामने रखा जाता है। वेद में वर्णित संसार, इन्द्रियों और मन के अनुभव का संसार, सबमें इसकी बराबरी खोजने की बात है। उनके लिये दर्शन ने ऐसा रूप सामने रख दिया है जिसके लिये कोई दूसरा उदाहरण हाथ नहीं आता।
इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा । पटतर जोग बनावै लागा॥
चौपाई ६
कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए॥
फिर यही लोग एक और कल्पना कहते हैं। इन्हें देखकर विधाता का मन मुग्ध हो गया होगा और वह इनके समान दूसरे स्त्री पुरुष बनाने लगा होगा। बहुत परिश्रम किया, पर कोई भी उसकी अटकल में पूरा नहीं उतरा। इसी ईर्ष्या में वह इन्हें वन में लाकर छिपा गया। वनवास की यह व्याख्या उन प्रेममग्न लोगों की है। एक ओर विधाता को सुखों से वंचित करने का दोष दिया गया था; इस दूसरी बात में वह इनके रूप की बराबरी बनाने में असफल और ईर्ष्यालु बताया गया है। दोनों कथनों में देखनेवालों का विस्मय अपनी अपनी तरह बोलता है।
और कुछ लोग इस सारे ज्ञान का दावा अपने लिये नहीं लेते। वे कहते हैं कि हम बहुत नहीं जानते, हाँ, अपने को परम धन्य मानते हैं। अपने दर्शन का सुख कहने के लिये उन्हें सृष्टि का कारण समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे उस सुख को दूसरों तक भी बढ़ाते हैं: जिन्होंने इन्हें देखा है, जो देख रहे हैं और जो आगे देखेंगे, हमारी समझ में वे सब पुण्य के पुंज हैं। बीता हुआ दर्शन, सामने का दर्शन और आनेवाला दर्शन, तीनों को उनकी कृतज्ञता एक साथ स्थान देती है।
एक कहहिं हम बहुत न जानहिं । आपुहि परम धन्य करि मानहिं॥
चौपाई ७
ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे । जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे॥
इस स्वर को अलग सुनना चाहिये। पहले लोगों ने ब्रह्मा की रचना पर विचार किया, इनके स्वयं प्रकट होने का कथन रखा और वन में छिपाये जाने की कल्पना कही। अब कहनेवाले अपनी जानकारी की सीमा स्वीकार करके दर्शन का फल बताते हैं। वे स्वयं को धन्य मानते हुए किसी दूसरे दर्शक को पीछे नहीं रखते। जिनका दर्शन पहले हुआ और जिनका अभी होगा, सब उनके प्रेम में सम्मिलित हैं। गाँव की बातचीत में इतनी भिन्न बातें हैं, और तुलसी हर बात के आगे उसके कहनेवालों को उपस्थित रखते हैं।
इस तरह प्रिय वचन कहते कहते सबके नेत्र जल से भर आते हैं। दोहा एक सौ बीस में उनकी चिन्ता फिर कठिन रास्ते पर लौटती है। ये शरीर इतने सुकुमार हैं, दुर्गम मार्ग पर कैसे चलेंगे। सृष्टि और सौन्दर्य के बड़े विचारों के बाद भी आँखों के सामने उन्हीं यात्रियों का शरीर है। जिन्हें अनुपम कहा, जिन्हें देखकर अपने को धन्य माना, उनके लिये पथ की कठोरता अब भी अखर रही है। कथनों की भिन्नता के बीच यह ममता सबकी वाणी को एक जगह ले आती है।
कुछ लोग यात्रियों को स्वयं प्रकट, अनुपम और ब्रह्मा की रचना से परे कहते हैं, फिर ईर्ष्यावश वन में छिपाये जाने की कल्पना करते हैं। दूसरे अपनी जानकारी की सीमा मानकर स्वयं को तथा सभी कालों के दर्शकों को धन्य कहते हैं। सबकी आँखें भरती हैं और सुकुमार शरीरों के कठिन पथ पर चलने की चिन्ता बनी रहती है।
फूलों का रास्ता और आँखों में रखने की इच्छा
स्त्रियाँ स्नेह के वश विकल हो जाती हैं। कवि उन्हें सन्ध्या के समय की चकवियों जैसा बताते हैं। पोद्दार जी की टीका यहाँ आनेवाले वियोग की पीड़ा खोलती है। अभी का दर्शन उनके लिये इतना प्रिय है कि उसके बाद का अभाव व्याकुल कर रहा है। वे चरणकमलों की कोमलता और मार्ग की कठोरता जानकर व्यथित हृदय से वचन कहती हैं। पिछले दोहे का प्रश्न, ये कैसे चलेंगे, अब धरती को छूते उन चरणों के चित्र में और निकट आ जाता है।
परसत मृदुल चरन अरुनारे । सकुचति महि जिमि हृदय हमारे॥
चौपाई ८
जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा । कस न सुमनमय मारगु कीन्हा॥
वे कहती हैं कि इनके कोमल लाल चरणों का स्पर्श पाते ही पृथ्वी वैसे सकुचाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। अपने मन की व्यथा को वे धरती का संकोच बना देती हैं। जिस भूमि पर पाँव पड़ना है, वह भी उनके कहे में उन पाँवों की कोमलता पहचानती है। फिर जगदीश्वर से उनका प्रश्न है कि यदि इन्हें वनवास दिया ही था तो मार्ग को फूलों से भरा क्यों नहीं कर दिया। वे अपने प्रिय यात्रियों के लिये वन के रास्ते में भी कोमलता चाहती हैं।
इसके बाद इच्छा और भी निकट आ जाती है। यदि विधाता से माँगने पर मिल सके तो, सखि, हम इन्हें अपनी आँखों में ही रख लें। अभी पूरे मार्ग को फूलों का बनाने की चाह थी; अब उन्हें नेत्रों में सुरक्षित रखने का मन है। यह स्त्रियों की प्रेमभरी कामना है। जो रूप दर्शन में मिला है, उसे फिर ओझल होते देखना कठिन पड़ रहा है। उनकी वाणी में पृथ्वी, मार्ग और आँखें एक क्रम में आते हैं, हर बार वही कोमल चरण और वही प्रिय रूप उनके दुःख का कारण बने रहते हैं।
गाँव से लौटते इन लोगों का मन राम के साथ लगा हुआ है, दोहा यही कह चुका है। अब उसकी गति इन इच्छाओं में दिखाई देती है। स्वयं जहाँ लौट रहे हैं, वहाँ रहते हुए भी उनका ध्यान आगे के पथ पर है। वह पथ फूलों का हो जाये, धरती उन चरणों को सावधानी से छुए, और यदि माँगकर पाया जा सके तो दर्शन आँखों में बना रहे। प्रेम से भरी ये बातें स्त्रियाँ आपस में कह रही हैं; इसी समय कथा उन लोगों की ओर भी जाती है जो इस अवसर पर पहुँच ही नहीं सके।
सन्ध्या की चकवियों जैसी विकल स्त्रियाँ कहती हैं कि कोमल लाल चरणों को छूकर धरती भी उनके हृदयों जैसी सकुचाती है। वे वनमार्ग को पुष्पमय चाहती हैं और कामना करती हैं कि विधाता से माँगकर इन्हें अपनी आँखों में रख लें।
जो समय पर नहीं पहुँच सके
जो स्त्री पुरुष उस अवसर पर नहीं आये, वे सीताराम को देख नहीं सके। फिर उनके सौन्दर्य का वर्णन सुनते हैं तो अकुलाकर पूछते हैं, भाई, अब तक वे कहाँ तक गये होंगे। जिनसे पूछ रहे हैं, उन्हें दर्शन मिल चुका है। सुननेवालों के लिये अभी दूरी जानना आवश्यक हो गया है, ताकि पहुँचकर देख सकें। पहले जिन लोगों ने दर्शन पाया था, वे बिछुड़ने से दुखी थे। यहाँ उन लोगों की व्याकुलता है जिन्हें दर्शन का अवसर हाथ नहीं लगा। रूप की सुनायी हुई बात उनमें उसे स्वयं देखने की तीव्र इच्छा जगा देती है।
जो समर्थ हैं, वे दौड़ते हुए जाते हैं और दर्शन कर लेते हैं। लौटते समय बहुत प्रसन्न हैं, उन्होंने जन्म का फल पा लिया है। कुछ लोगों के लिये देर हो जाने पर भी मिलना सम्भव हुआ। उनकी दौड़ सफल होती है और वापसी आनन्द से भर जाती है। पर हर व्यक्ति इस तरह दौड़कर जा सकने की स्थिति में नहीं है। तुलसी दर्शन पा लेनेवालों की प्रसन्नता के साथ उन लोगों का दुःख भी कहते हैं जो चाह होने पर भी पीछे रह गये।
अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।
दोहा १२१
होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं॥ १२१॥
बच्चे, वृद्ध और असमर्थ स्त्रियाँ हाथ मलते हैं और पछताते हैं। पोद्दार जी की टीका यहाँ अबला स्त्रियों के प्रसंग में गर्भवती, प्रसूता आदि को स्पष्ट करती है। बात उन स्त्रियों की है जो इस समय दौड़कर दर्शन लेने नहीं जा सकतीं। अभी स्त्री पुरुषों में से समर्थ लोगों का जाना बताया गया था; अब असमर्थ रह गये लोगों की पीड़ा कही जाती है। सबकी इच्छा दर्शन की है, पर सबके लिये उसे पूरा करना सम्भव नहीं हुआ।
इसी दोहे की दूसरी पंक्ति इस गाँव से आगे का विस्तार देती है। राम जहाँ जहाँ जाते हैं, लोग इसी तरह प्रेम के वश हो जाते हैं। मिलने की खुशी, विदा का दुःख, सुनकर दौड़ना और रह जाने का पछतावा, ये सब उनके मार्ग पर लोगों के अनुभव हैं। यात्रा आगे बढ़ रही है और प्रत्येक स्थान पर किसी के लिये दर्शन मिल रहा है, किसी के लिये उसकी लालसा जग रही है। कवि अब इसी फैलते हुए प्रेम के साथ गाँव गाँव की ओर बढ़ते हैं।
देर से सुननेवाले व्याकुल होकर यात्रियों की दूरी पूछते हैं। समर्थ लोग दौड़कर दर्शन पाते और प्रसन्न लौटते हैं। बच्चे, वृद्ध तथा गर्भवती या प्रसूता आदि असमर्थ स्त्रियाँ दर्शन से वंचित रहकर पछताती हैं। राम जहाँ जाते हैं, वहाँ लोग प्रेम के वश हो जाते हैं।
धन्य वे लोग, धन्य वे स्थान
गाँव गाँव ऐसा ही आनन्द हो रहा है। तुलसी राम को सूर्यकुल रूपी कुमुदिनी के लिये चन्द्रमा कहते हैं, जिसके दर्शन से हर्ष खिल रहा है। जहाँ वनवास के विषय में कुछ समाचार सुनने को मिलता है, वहाँ लोग राजा रानी को दोष लगाते हैं। पोद्दार जी की टीका इन राजा रानी की पहचान दशरथ और कैकेयी से करती है। उनकी शिकायत इस बात पर है कि ऐसे यात्रियों को वनवास क्यों दिया गया। दर्शन की प्रसन्नता के साथ समाचार सुनने का दुःख भी उनकी बातचीत में आ गया है।
कुछ दूसरे लोग राजा को बहुत अच्छा कहते हैं। उनका कारण भी सुनिये: उन्होंने हमारे नेत्रों को यह लाभ दिया। इन्हें इस मार्ग पर देखकर जो सुख हमें मिला, वह उसी से मिला। एक ही घटना सुनकर किसी को दोष सूझता है और किसी को अपने दर्शन का सौभाग्य। तुलसी दोनों बातें रहने देते हैं। स्त्री पुरुष आपस में सरल, स्नेहभरी और सुहावनी बातें कहते हैं। इन वचनों में यात्रियों के लिये प्रेम है, और उस प्रेम से अलग अलग निष्कर्ष निकल रहे हैं।
ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए॥
चौपाई ९
धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ । जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥
फिर लोगों का कहना है, वे माता पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया, वह नगर धन्य है जहाँ से ये आये हैं। वह देश, वह पर्वत, वह वन और वह गाँव धन्य है जहाँ ये जाते हैं। आशीष अब यात्रा से जुड़े सब स्थानों तक फैलती है। जन्म देनेवालों से चलकर मूल नगर तक, और वहाँ से आगे के प्रत्येक ठिकाने तक, उनका मन इसी दर्शन के सुख को बाँट रहा है। पहले सब कालों के दर्शकों को पुण्यवान् कहा गया था; यहाँ सब स्थानों को धन्य कहा जा रहा है।
वे यह भी कहते हैं कि ब्रह्मा ने उसी को रचकर सुख पाया है जिसके ये सब प्रकार से स्नेही हैं। थोड़ी देर पहले विधाता की बनाई सुविधाएँ व्यर्थ कही गयी थीं। अब लोगों की वाणी में उसी रचना की सार्थकता का एक आधार है, इनका स्नेह मिलना। उस सौभाग्य का मूल्य इतना है कि उसके रचे जाने को ही ब्रह्मा का सुख कहा जाता है। पथिक रूप राम और लक्ष्मण की सुन्दर कथा इस तरह सारे मार्ग और जंगल में छा गयी है। हर ओर उनके विषय में कही जाती स्नेहभरी बातें हैं।
एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।
दोहा १२२
जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत॥ १२२॥
रघुनाथ इस प्रकार मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीता और सौमित्रि के साथ वन को देखते हुए चले जा रहे हैं। इस दोहे में वे रघुकुल रूपी कमल को खिलानेवाले सूर्य हैं। गाँवों के आनन्द में कुमुदिनी और चन्द्रमा की उपमा थी, यहाँ कमल और सूर्य का चित्र है। दोनों में खिलना जुड़ा है और दोनों उनके सुख देने के साथ आते हैं। जनों की बातचीत पीछे फैल रही है, आगे स्वयं वे यात्रियों के रूप में वन देख रहे हैं। कथा अब उनके चलते हुए स्वरूप के पास लौट आती है।
गाँवों में कोई राजा रानी को दोष देता है, कोई राजा को दर्शन दिलाने के लिये अच्छा कहता है। लोग माता पिता, मूल नगर और हर उस स्थान को धन्य कहते हैं जहाँ यात्री जाते हैं। राम मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीता और लक्ष्मण सहित वन देखते चले जाते हैं।
तीन यात्रियों के लिये तीन उपमाएँ
आगे राम हैं और पीछे लक्ष्मण। दोनों तपस्वियों के वेष में सुशोभित हैं। बीच में सीता हैं। गाँव के लोगों की आँखों से देखा जाता रहा रूप अब कवि की उपमाओं में सामने आता है। सबसे पहले वे कहते हैं कि दोनों के बीच सीता ऐसी सोह रही हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया। यहाँ यात्रियों का क्रम स्पष्ट रहता है और उस मध्यवर्ती शोभा को कहने के लिये यह तत्त्वमयी उपमा आती है। राम आगे, सीता मध्य में, लक्ष्मण पीछे, इसी दृश्य को कवि देखते हैं।
आगें रामु लखनु बने पाछें । तापस बेष बिराजत काछें॥
चौपाई १०
उभय बीच सिय सोहति कैसें । ब्रह्म जीव बिच माया जैसें॥
फिर तुलसी अपने मन में बसी छवि को दूसरी उपमा से कहते हैं। जैसे वसन्त ऋतु और कामदेव के बीच रति शोभित हो रही हों। इस बार वही दृश्य ऋतु, सौन्दर्य और प्रेम के नामों से व्यक्त होता है। पोद्दार जी की टीका रति का परिचय कामदेव की पत्नी के रूप में देती है। कवि के मन में बसे चित्र के लिये एक और समानता मिली है। तीनों यात्रियों की शोभा इतनी प्रिय है कि उसे कहने की इच्छा पहली उपमा के बाद भी बनी रहती है।
बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई । जनु मधु मदन मध्य रति लसई॥
चौपाई ११
उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही । जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही॥
फिर हृदय में खोजकर एक और उपमा कहते हैं, जैसे बुध और चन्द्रमा के बीच रोहिणी सोह रही हों। टीका बुध को चन्द्रमा का पुत्र और रोहिणी को चन्द्रमा की पत्नी बताती है। ब्रह्म, माया और जीव से आरम्भ हुआ उपमानों का क्रम वसन्त, रति और कामदेव से होकर इन आकाशीय नामों तक आता है। हर बार बीच की शोभा सामने रखी गयी है। कवि स्वयं कहते हैं कि मन में जैसी छवि बसती है, उसे कह रहे हैं, और फिर हृदय में खोजकर कह रहे हैं।
इन उपमाओं को सुन लेने पर भी मार्ग का वास्तविक क्रम आँखों के सामने रहता है। दोनों भाई तपस्वी वेष में हैं, सीता उनके बीच हैं, और तीनों चल रहे हैं। अगली चौपाई उन्हीं चलते पाँवों पर ध्यान ले जायेगी। रूप के लिये मिली इतनी उपमाओं के बाद चरण रखने की सावधानी आयेगी। कवि पहले उनकी शोभा का विस्तार करते हैं, फिर उस प्रीति को एक बहुत छोटे, प्रत्यक्ष व्यवहार में दिखाते हैं जो साथ चलते इन तीनों के बीच है।
राम आगे, लक्ष्मण पीछे और सीता बीच में चलती हैं। कवि इस छवि को ब्रह्म और जीव के बीच माया, वसन्त और कामदेव के बीच रति, तथा बुध और चन्द्रमा के बीच रोहिणी की उपमाओं से कहते हैं।
चरणचिह्नों को बचाकर चलते हुए
राम के चरणों के चिह्न मार्ग पर बनते हैं। सीता उनके बीच बीच में अपने चरण रखती हुई चलती हैं। उनके चलने में सावधानी है। पोद्दार जी की टीका इस भय को स्पष्ट करती है कि कहीं प्रभु के चरणचिह्नों पर अपना पाँव न टिक जाये। इसीलिये वे उनके बीच पैर रख रही हैं। पथ पर चरण रखने की इस क्रिया में स्मरण उन्हीं का है जिनके पीछे वे चल रही हैं। रास्ते का चित्र अब इतना निकट है कि पाँव और उनका अङ्कन अलग अलग देखा जा सकता है।
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता । धरति चरन मग चलति सभीता॥
चौपाई १२
सीय राम पद अंक बराएँ । लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥
लक्ष्मण राम और सीता, दोनों के चरणचिह्नों को बचाते हैं। वे उन चिह्नों को अपने दाहिने रखकर चलते हैं। इस स्थिति में उनका चलना चिह्नों की बायीं ओर है। बचाना दोनों के पदों को है और दाहिने रखना उन्हीं पदचिह्नों को है। पोद्दार जी की टीका इसे मर्यादा की रक्षा से जोड़कर समझाती है। आगे पीछे के क्रम के साथ अब यह भी स्पष्ट होता है कि लक्ष्मण मार्ग में किस ओर पैर रखते हैं। उनकी सावधानी में राम के साथ सीता के चरणों का भी समान आदर है।
इसके बाद कवि कहते हैं कि राम, लक्ष्मण और सीता की सुन्दर प्रीति वाणी के विषय में आती ही नहीं, फिर उसे कैसे कहा जाये। यह अनिर्वचनीयता चलते हुए इन छोटे छोटे व्यवहारों के बाद आती है। सीता प्रभु के पदचिह्नों को बचाती हैं और लक्ष्मण दोनों के चिह्नों को अपने दाहिने रखते हैं। इतना दिखाने के बाद भी प्रेम को पूरा कह देने का दावा नहीं है। कवि उसकी सुन्दरता कहते हैं और साथ ही उसकी वाणी से परे होने की बात रखते हैं।
उस छवि को देखकर पक्षी और पशु भी मग्न हो जाते हैं। पथिक रूप राम ने उनके चित्त भी चुरा लिये हैं। गाँव के मनुष्य दर्शन से प्रेम के वश हुए थे, वन के जीवों तक भी वही आकर्षण पहुँचता है। यहाँ किसी नये पड़ाव का नाम नहीं आता। तीनों का पथ पर चलना, परस्पर प्रेम और उनके रूप में मग्न होते जीव, यही दृश्य बना रहता है। उस चलते हुए दर्शन पर अन्तिम दोहा अपना फल कहता है।
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।
दोहा १२३
भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ॥ १२३॥
जिन जिन लोगों ने सीता सहित दोनों प्रिय पथिक भाइयों को देखा, उन्होंने संसार का दुर्गम मार्ग बिना परिश्रम आनन्द से पूरा कर लिया। पोद्दार जी की टीका इसका अर्थ जन्म मृत्यु के आवागमन से सहज मुक्ति बताती है। गाँव के लोगों को चिन्ता थी कि ये सुकुमार शरीर कठिन वनपथ कैसे चलेंगे। अन्त में तुलसी उन्हीं यात्रियों के दर्शन से दर्शकों का कठिन भवमार्ग पूरा हो जाने की बात कहते हैं। चलते राम, सीता और लक्ष्मण के इस दर्शन पर प्रसंग ठहरता है, और दृश्य के साथ उसका भक्तिमय फल भी सामने रहता है।
सीता राम के चरणचिह्नों के बीच पाँव रखती हैं। लक्ष्मण दोनों के पदचिह्नों को बचाकर अपने दाहिने रखते हुए चलते हैं। उनकी प्रीति वाणी से परे है, पक्षी और पशु भी रूप में मग्न हैं। कवि कहते हैं कि इन प्रिय पथिकों के दर्शक कठिन भवमार्ग सहज ही पूरा कर लेते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस भेंट में लोगों की वाणी पर ध्यान बना रहे तो प्रेम के अनेक रूप सुनाई देते हैं। किसी ने सम्बन्ध पूछा, किसी ने सुहाग की आशीष दी, किसी ने उसी मार्ग से फिर आने की प्रार्थना की। विदा का दुःख हुआ तो कोई विधाता से उलाहना करने लगा और कोई अपने दर्शन पर धन्य हुआ। इन अलग अलग बातों को एक जैसी बात बना देने से इन गाँवों के लोगों की अपनी अपनी पहचान खो जायेगी। तुलसी उन्हें बोलने देते हैं, अपने दुःख से, अपने विस्मय से और अपनी कृतज्ञता से।
लोगों की ममता जिस बात पर लौटती है, वह चरणों की कोमलता है। वे उनके लिये फूलों का रास्ता चाहते हैं। उधर चलते हुए यात्रियों का ध्यान एक दूसरे के चरणचिह्नों पर है। सीता उनके बीच पाँव रखती हैं और लक्ष्मण दोनों के अङ्कन को बचाते हैं। गाँव के प्रेम में यात्रियों की सुख सुविधा की चिन्ता है; यात्रियों के प्रेम में परस्पर आदर की सावधानी है। कठिन मार्ग पर यही दो दृश्य साथ रहते हैं, देखनेवालों का व्याकुल स्नेह और चलनेवालों की सुन्दर प्रीति।
राम आगे चले जा रहे हैं, बीच में सीता हैं और पीछे लक्ष्मण। गाँव के लोग लौट चुके हैं, उनके मन साथ लगे हैं। वन के पक्षी और पशु भी छवि में मग्न हैं। जिन चरणों के लिये लोग दुर्गम पथ की चिन्ता कर रहे थे, उन्हीं प्रिय यात्रियों का दर्शन पाकर भव का कठिन पथ सहज हो गया, तुलसी का अन्तिम दोहा यही कहता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ११७ से १२३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।