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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 14
गाँव की स्त्रियाँ और वन का मार्ग
सीता से सम्बन्ध पूछती ग्रामवधुएँ, और विदा के बाद भी साथ लगे हुए मन। पथ पर राम के चरणचिह्नों के बीच पाँव रखती सीता।
गाँव की स्त्रियाँ सीता से पूछती हैं कि ये दोनों आपके कौन हैं। सीता लक्ष्मण का नाम बताती हैं, और नेत्रों के संकेत से कहती हैं कि राम उनके पति हैं। जो लोग समय पर नहीं आ सके, वे सीता और राम को देख नहीं पाते। यह प्रसंग रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड का है।
फिर लक्ष्मण रास्ता पूछते हैं, और राम सबको प्रिय वचन कहकर लौटा देते हैं। लौटते हुए लोग दैव को दोष देते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ये अपने आप प्रकट हुए हैं, विधाता के बनाये नहीं, और कुछ अपने को परम धन्य मानते हैं। वे आँखों में जल भरकर कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीर दुर्गम मार्ग पर कैसे चलेंगे। आगे उसी मार्ग पर राम, सीता और लक्ष्मण चलते हैं। सीता राम के चरणचिह्नों के बीच पाँव रखती हैं, और लक्ष्मण दोनों के चरणचिह्नों को बचाते हुए चलते हैं।
पूछती ग्रामवधुएँ और तीन पथिक
- सीता ग्रामवधुओं को सम्बन्ध बताती हैं, उनकी प्रेम भरी प्रार्थना सुनती हैं और मधुर वचनों से सन्तोष देती हैं।
- राम लोगों को प्रिय वचन कहकर लौटा देते हैं और सीता और लक्ष्मण के साथ वन को देखते हुए आगे चलते हैं।
- लक्ष्मण राम का रुख समझकर रास्ता पूछते हैं और चलते हुए राम और सीता के चरणचिह्नों को बचाते हैं।
- ग्रामवधुएँ और गाँव के लोग दर्शन से हर्षित, विदा से व्याकुल, और अपनी अपनी समझ से स्नेह भरी बातें कहनेवाले।
ये दोनों सीता के कौन हैं
स्त्रियाँ सीता को सुमुखि कहकर पूछती हैं कि करोड़ों कामदेवों को लजानेवाले ये आपके कौन हैं? यह प्रेम भरी सुन्दर वाणी सुनकर सीता सकुचा जाती हैं और मन ही मन मुसकराती हैं।
उन स्त्रियों को देखकर सीता धरती की ओर देखती हैं। वे दोनों ओर के संकोच से सकुचा रही हैं। पोद्दार की टीका के अनुसार उत्तर न दें तो गाँव की स्त्रियों को दुःख होगा, और बतायें तो अपनी लज्जा है। सकुचाकर और प्रेम सहित सीता मधुर वचन कहती हैं।
हिरन के बच्चे जैसी आँखों और कोयल जैसी वाणी वाली सीता पहले गोरे शरीरवाले राजकुमार का परिचय देती हैं: ये सहज स्वभाव के और सुन्दर हैं। इनका नाम लक्ष्मण है, ये मेरे छोटे देवर हैं।
फिर सीता अपना चन्द्रमुख आँचल से ढककर, प्रियतम की ओर देखकर और भौंहें टेढ़ी करके, सुन्दर तिरछे खंजन-नेत्रों के संकेत से बता देती हैं कि ये मेरे पति हैं।

सब ग्रामवधुएँ आनन्दित हो जाती हैं, मानो कंगालों ने धन की राशियाँ लूट ली हों।
आशीष में फिर मिलने की विनती
हर्षित स्त्रियाँ अत्यन्त प्रेम से सीता के पैरों पड़कर अनेक प्रकार से आशीष देती हैं: जब तक पृथ्वी सर्प के सिर पर रहे, तब तक आप सदा सुहागिनी रहें।
फिर वे आशीष देती हैं कि सीता पार्वती के समान पति की प्यारी हों। और देवी कहकर कहती हैं कि हम पर कृपा न छोड़ियेगा।
वे बार बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं कि यदि आप फिर इसी रास्ते लौटें, तो हमें अपनी दासी जानकर दर्शन दीजियेगा।
सीता उन सबको प्रेम की प्यासी देखती हैं और मधुर वचन कह कहकर उन्हें सन्तोष देती हैं, मानो चाँदनी ने कुमुदिनियों को पुष्ट किया हो।
रास्ता पूछते ही भर आयीं आँखें
उसी समय राम का रुख जानकर लक्ष्मण कोमल वाणी से लोगों से रास्ता पूछते हैं। यह सुनते ही स्त्री पुरुष दुःखी हो जाते हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और आँखों में जल है। पोद्दार की टीका इस जल को वियोग की सम्भावना से उमड़ा प्रेम बताती है।
उनका आनन्द मिट जाता है और मन उदास हो जाते हैं, मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीन रहा हो।
फिर वे कर्म की गति समझकर धीरज रखते हैं, और अच्छी तरह सोचकर सुगम मार्ग बता देते हैं।
तब राम लक्ष्मण और सीता के साथ चल देते हैं। वे सब लोगों को प्रिय वचन कहकर लौटा देते हैं, और उनके मन अपने साथ लगा ले जाते हैं।
लौटते लोगों का विधाता से उलाहना
लौटते हुए स्त्री पुरुष बहुत पछताते हैं और मन ही मन दैव को दोष देते हैं। आपस में विषाद के साथ कहते हैं कि विधाता के सब काम उलटे हैं। उसी ने चन्द्रमा को रोगी और कलंकी बनाया, कल्पवृक्ष को पेड़ बनाया और समुद्र को खारा किया। और उसी ने इन राजकुमारों को वन में भेजा है।
वे विधाता को बिलकुल निरंकुश, निर्दय और निडर कहते हैं। ये लौटते लोगों के अपने दुःख भरे शब्द हैं। जब विधाता ने इन्हें वनवास दिया, तो उसने भोग विलास व्यर्थ बनाये।
ये बिना जूते के रास्ते पर चलते हैं, तो उसने अनेक प्रकार के वाहन व्यर्थ रचे। ये कुश और पत्ते बिछाकर धरती पर पड़े रहते हैं, तो विधाता सुन्दर सेज किसलिये बनाता है? जब उसने इन्हें बड़े वृक्षों का निवास दिया, तब उज्ज्वल महल बना बनाकर उसने परिश्रम किया।
यदि ये सुन्दर और अत्यन्त सुकुमार होकर मुनियों के वस्त्र पहनते हैं और जटा रखते हैं, तो करतार ने भाँति भाँति के गहने और कपड़े व्यर्थ बनाये। और यदि ये कन्द, मूल और फल खाते हैं, तो जगत् में अमृत आदि भोजन व्यर्थ हैं।
स्वयं प्रकट हुए पथिक, और अपने को धन्य माननेवाले
कुछ लोग कहते हैं कि ये स्वभाव से सुन्दर हैं और अपने आप प्रकट हुए हैं, विधाता के बनाये हुए नहीं। पोद्दार की टीका इसका आशय बताती है कि इनका सौन्दर्य और माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है। वे कहते हैं कि कान, आँख और मन से अनुभव में आनेवाली विधाता की करनी का वेदों ने जहाँ तक वर्णन किया है, वहाँ तक खोजकर देख लीजिये।
चौदहों लोकों में ऐसे पुरुष कहाँ हैं, ऐसी स्त्री कहाँ है?
वे आगे कहते हैं कि इन्हें देखकर विधाता का मन अनुरक्त हो गया, और वह इनके योग्य उपमाएँ बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, और कोई नहीं बन पाया। इसी ईर्ष्या से उसने इन्हें वन में लाकर छिपा दिया।
कुछ लोग कहते हैं कि हम बहुत नहीं जानते। हम अपने को परम धन्य मानते हैं। और हमारी समझ में वे पुण्य के पुंज हैं जो इन्हें देखते हैं, जो देखेंगे और जिन्होंने देखा है।
इस तरह प्रिय वचन कहते कहते वे आँखों में जल भर लेते हैं, और कहते हैं: ये अत्यन्त सुकुमार शरीर दुर्गम मार्ग पर कैसे चलेंगे?
फूलों का रास्ता और आँखों में रखने की इच्छा
स्त्रियाँ स्नेह के वश विकल हो जाती हैं, मानो सन्ध्या के समय चकवियाँ सोह रही हों। पोद्दार की टीका के अनुसार चकवियाँ आनेवाले वियोग की पीड़ा से दुःखी हैं। चरणों को कोमल और मार्ग को कठोर जानकर वे व्यथित हृदय से उत्तम वाणी कहती हैं।
इनके कोमल, लाल चरणों को छूते ही धरती वैसे सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वर ने यदि इन्हें वनवास ही दिया था, तो सारा रास्ता फूलों का क्यों नहीं बना दिया?
सखि, यदि विधाता से माँगने पर मिल सके, तो हम इन्हें अपनी आँखों में रख लें।
जो समय पर नहीं पहुँच सके
जो स्त्री पुरुष उस अवसर पर नहीं आये, वे सीता और राम को देख नहीं सके। उनके सौन्दर्य का वर्णन सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं: भाई, अब तक वे कहाँ तक गये होंगे?
जो समर्थ हैं, वे दौड़कर जाते हैं और दर्शन कर लेते हैं, और जन्म का फल पाकर बहुत प्रसन्न लौटते हैं।
अबला स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध हाथ मलते हैं और पछताते हैं। पोद्दार की टीका अबला स्त्रियों में गर्भवती, प्रसूता आदि को गिनती है।
राम जहाँ जहाँ जाते हैं, लोग इसी तरह प्रेम के वश हो जाते हैं।
धन्य वे लोग, धन्य वे स्थान
गाँव गाँव में राम के दर्शन से ऐसा ही आनन्द हो रहा है। जो लोग कुछ समाचार सुन पाते हैं, वे राजा रानी को दोष देते हैं। पोद्दार की टीका इन्हें दशरथ और कैकेयी बताती है।
कुछ लोग कहते हैं कि राजा बहुत अच्छे हैं, जिन्होंने हमें नेत्रों का लाभ दिया। स्त्री पुरुष आपस में सीधी, स्नेह भरी, सुहावनी बातें करते हैं।
वे कहते हैं कि वे माता पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया, वह नगर धन्य है जहाँ से ये आये हैं। वह देश, वह पर्वत, वह वन और वह गाँव धन्य है, और वह हर स्थान धन्य है जहाँ ये जाते हैं।
वे यह भी कहते हैं कि ब्रह्मा ने उसी को रचकर सुख पाया है जिसके ये सब प्रकार से स्नेही हैं। पथिक बने राम और लक्ष्मण की सुन्दर कथा सारे रास्ते और जंगल में छा गयी है।
इस प्रकार राम मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीता और लक्ष्मण के साथ वन को देखते हुए चले जा रहे हैं।
तीन यात्रियों के लिये तीन उपमाएँ
आगे राम हैं और पीछे लक्ष्मण सुशोभित हैं। तपस्वियों का वेष बनाये दोनों शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच सीता ऐसी सोह रही हैं जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया।
फिर जैसी छवि मन में बसी है, वैसी कहता हूँ: मानो वसन्त और कामदेव के बीच रति शोभित हो। पोद्दार की टीका रति को कामदेव की पत्नी बताती है।
फिर हृदय में खोजकर उपमा कहता हूँ: मानो बुध और चन्द्रमा के बीच रोहिणी सोह रही हो। पोद्दार की टीका बुध को चन्द्रमा का पुत्र और रोहिणी को चन्द्रमा की पत्नी बताती है।
चरणचिह्नों को बचाकर चलते हुए
राम के चरणचिह्नों के बीच बीच में अपने पाँव रखती हुई सीता डरती हुई मार्ग पर चलती हैं। पोद्दार की टीका के अनुसार उन्हें डर है कि कहीं राम के चरणचिह्नों पर उनका पाँव न टिक जाये।
लक्ष्मण सीता और राम, दोनों के चरणचिह्नों को बचाते हुए, उन्हें अपने दाहिने रखकर चलते हैं। पोद्दार की टीका इसे मर्यादा की रक्षा बताती है।
राम, लक्ष्मण और सीता की यह सुन्दर प्रीति वाणी से परे है। उसे कैसे कहा जाये?
उस छवि को देखकर पक्षी और पशु मग्न हो जाते हैं। पथिक बने राम ने उनके चित्त चुरा लिये हैं।
जिन जिन लोगों ने सीता सहित दोनों प्रिय पथिक भाइयों को देखा, उन्होंने भव का अगम मार्ग बिना परिश्रम, आनन्द से पूरा कर लिया। पोद्दार की टीका इसका अर्थ जन्म मृत्यु के आवागमन से सहज मुक्ति बताती है।
प्रसंग का क्रम
गाँव की स्त्रियों ने सीता से पूछा कि ये दोनों आपके कौन हैं। सीता ने लक्ष्मण का नाम बताया, और संकेत से कहा कि राम उनके पति हैं। स्त्रियों ने पैरों पड़कर आशीष दी, और विनती की कि यदि वे इसी रास्ते लौटें तो उन्हें दर्शन दें। लक्ष्मण ने रास्ता पूछा। लोग दुःखी हुए, फिर धीरज रखकर उन्होंने सुगम मार्ग बताया, और राम ने उन्हें प्रिय वचन कहकर लौटा दिया।
लौटते हुए लोगों ने दैव को दोष दिया। कुछ ने कहा कि ये अपने आप प्रकट हुए हैं, और कुछ ने अपने को धन्य माना। स्त्रियों ने पूछा कि रास्ता फूलों का क्यों नहीं बना, और चाहा कि इन्हें आँखों में रख लें। जो समय पर नहीं आ सके, उनमें से समर्थ दौड़कर दर्शन कर आये, और अबला स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े हाथ मलकर पछताये। गाँव गाँव में लोगों ने इनके माता पिता और हर स्थान को धन्य कहा।
राम आगे चले, बीच में सीता और पीछे लक्ष्मण। सीता राम के चरणचिह्नों के बीच पाँव रखती चलीं, और लक्ष्मण दोनों के चरणचिह्नों को दाहिने रखते चले। पक्षी और पशु उस छवि में मग्न हुए। जिन्होंने इन्हें देखा, उन्होंने बिना परिश्रम भव का मार्ग पूरा कर लिया।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 117 से 123, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।