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वाल्मीकि का उत्तर और चित्रकूट में बसेरा

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · वाल्मीकि का उत्तर और चित्रकूट में बसेरा

वाल्मीकि का उत्तर और चित्रकूट में बसेरा

राम एक कुटी के लिये स्थान पूछते हैं। वाल्मीकि पहले उन हृदयों का पता देते हैं जहाँ वे रह सकते हैं, फिर चित्रकूट का मार्ग बताते हैं।

कहाँ रहा जाय, वन के यात्री के लिये यह प्रश्न बहुत सीधा है। पास में जल हो, ठहरने की जगह हो, और वहाँ रहने से किसी को कष्ट न पहुँचे। श्रीराम यही पूछने वाले हैं। जिन मुनि से पूछेंगे, वे पहले उनके लिये ऐसे घरों का वर्णन करेंगे जिनकी दीवारें दिखाई नहीं देतीं। किसी घर में कथा सुनने की प्यास है, किसी में दूसरों का सुख देखकर प्रसन्न होने का स्वभाव, किसी में गुरु की सेवा है, और किसी में ऐसी प्रीति जिसे अपने लिये कुछ चाहिये ही नहीं। चित्रकूट का नाम इस विस्तृत उत्तर के बाद आयेगा।

तुलसीदास के रामचरितमानस का यह प्रसंग एक विश्राम से दूसरे विश्राम तक चलता है। आरम्भ में सीता की थकान देखकर यात्रा रुकती है। फिर वाल्मीकि के आश्रम में स्वागत और संवाद होता है। अन्त में नदी के पास पत्तों और घास की दो कुटियाँ बनती हैं। इन पड़ावों के बीच मुनि उस राम का परिचय देते हैं जो मनुष्य की तरह निवास पूछ रहे हैं, और जिन्हें वे सारे जगत् का देखने वाला कहते हैं। हमें उनके उत्तर का बाहरी पता भी मिलता है और उस उत्तर में खुलते हुए हृदय भी।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम सीता और लक्ष्मण सहित वन में रहने का उपयुक्त स्थान पूछने वाले अतिथि।
  • सीता यात्रा से थकी हुई जानकी, जो आश्रम के स्वागत और चित्रकूट के नये निवास में साथ हैं।
  • लक्ष्मण राम के छोटे भाई, जो नदी के उत्तर में ऊँचा तट देखकर ठहरने का स्थान दिखाते हैं।
  • वाल्मीकि आश्रम के मुनि, जिनका उत्तर भक्तों के हृदयों से आरम्भ होकर चित्रकूट तक पहुँचता है।
  • विश्वकर्मा और देवता कोल और भीलों का वेष धारण करके दो सुन्दर पर्णकुटियाँ बनाने वाले।

थकी हुई सीता और मुनि का स्वागत

कथा की पहली चौपाई चलते हुए तीन बटोहियों का स्मरण करती है। कवि कहते हैं कि आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में कभी लक्ष्मण, सीता और राम आ बसें, वह राम के परमधाम का वह मार्ग पा सकता है जिसे कोई विरला मुनि ही पाता है। यहाँ हृदय में बसने की बात पहले ही आ गयी है। आगे वाल्मीकि इसी निवास को बहुत विस्तार से खोलेंगे। अभी सामने यात्रियों की थकान और वन में ठहरने का समय है।

राम सीता को थकी हुई जानते हैं। निकट ही बड़ का वृक्ष है और ठंडा पानी है, इसलिये वे वहाँ ठहर जाते हैं। कन्द, मूल और फल खाये जाते हैं। पोद्दारजी की टीका इस ठहराव को रातभर का विश्राम बताती है। प्रातःकाल स्नान करके राम आगे चलते हैं। रास्ते में सुन्दर वन, सरोवर और पर्वत देखते हुए वे वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं। एक दिन की यात्रा रोकने वाला ध्यान बहुत छोटा और बहुत स्पष्ट है, साथ चलने वाली सीता की थकान।

मुनि के निवास का सौन्दर्य अनेक दिशाओं में फैला हुआ है। पर्वत और वन सुन्दर हैं, जल पवित्र है। सरोवरों में कमल खिले हैं और वन के वृक्ष भी फूल रहे हैं। भौंरे मकरन्द के रस में मस्त होकर मधुर गुंजार करते हैं। बहुत से पक्षी और पशु कोलाहल करते हैं, पर उनके विचरण में वैर नहीं है। वे प्रसन्न मन से घूम रहे हैं। इस आश्रम का शान्त होना नीरव होना नहीं है। यहाँ जीवन की आवाज़ें बहुत हैं, और उन्हीं के बीच वैर का अभाव बताया गया है।

सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन॥ १२४॥

दोहा १२४

पवित्र और सुन्दर आश्रम देखकर राम प्रसन्न होते हैं। उधर उनके आने का समाचार सुनकर वाल्मीकि उन्हें लेने आगे आते हैं। राम मुनि को दण्डवत् प्रणाम करते हैं और मुनि आशीर्वाद देते हैं। अतिथि का रूप देखकर ऋषि के नेत्र शीतल हो जाते हैं। वे आदर के साथ सबको आश्रम में ले आते हैं। स्वागत में पहले दर्शन का सुख है, फिर अतिथि की आवश्यकताओं का ध्यान है। जिनके आने से मन भरा है, उनके भोजन और विश्राम का प्रबन्ध भी उतना ही अपना काम है।

वाल्मीकि को ये अतिथि प्राणों के समान प्रिय हैं। वे मधुर कन्द, मूल और फल मँगवाते हैं। सीता, लक्ष्मण और राम फल खाते हैं, फिर मुनि उनके लिये विश्राम के सुन्दर स्थान बताते हैं। राम की मंगलमूर्ति देखकर वाल्मीकि के मन में भारी आनन्द होता है। टीका इस समय मुनि को राम के पास बैठे हुए बताती है। तब राम कमल जैसे हाथ जोड़कर ऐसे मधुर वचन कहते हैं जो सुनने वालों को सुख देते हैं। कथा अब रास्ते और आश्रम के वर्णन से एक लम्बी बातचीत में प्रवेश करती है।

सीता की थकान देखकर राम एक रात बड़ के पास ठहरते हैं। अगली सुबह यात्रा करके तीनों वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं। मुनि स्वागत, आशीर्वाद, फलाहार और विश्राम की व्यवस्था करते हैं; फिर राम उनसे निवास का स्थान पूछने की भूमिका रखते हैं।

वनवास में गिने हुए पुण्यफल

राम वाल्मीकि को मुनियों के नाथ और त्रिकालदर्शी कहते हैं। उनके लिये सम्पूर्ण विश्व हथेली पर रखे बेर के समान है। इस उपमा में दूर की वस्तु भी इतनी निकट और स्पष्ट हो जाती है कि उसे अलग से खोजने की आवश्यकता नहीं रहती। फिर भी राम अपनी कथा कहते हैं। रानी ने जिस जिस प्रकार वनवास दिया, उसका पूरा वृत्तान्त सुनाते हैं। पोद्दारजी रानी का नाम कैकेयी बताते हैं। तुलसी यहाँ उस सुनाये हुए वृत्तान्त का फिर विस्तार नहीं करते; उसके बाद राम की कही हुई बात सामने रखते हैं।

तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ॥ १२५॥

दोहा १२५

पिता की आज्ञा का पालन, माता का हित, भरत जैसे भाई का राजा होना और मुझे आपके दर्शन मिलना, राम इन सबको अपने पुण्यों का प्रभाव कहते हैं। टीका भरत के लिये स्नेही और धर्मात्मा विशेषण खोलती है। इस गिनती में वनवास का वृत्तान्त मिटाया नहीं गया है, वह अभी सुनाया जा चुका है। उसी के बाद राम अपने सामने आये सम्बन्धों और अवसरों को इस ढंग से रखते हैं। मुनि का दर्शन उस गिनती का अन्तिम और इस समय का प्रत्यक्ष फल है।

वे आगे कहते हैं कि आपके चरणों के दर्शन से हमारे सब पुण्य सफल हो गये। इसके बाद उनकी विनती बहुत स्पष्ट है। अब ऐसा स्थान बताइये जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ किसी मुनि को उद्वेग न पहुँचे। वन में रहने की सुविधा पूछते समय वे वहाँ पहले से रहने वाले तपस्वियों की शान्ति का ध्यान रखते हैं। अपने लिये घर का प्रश्न दूसरों के लिये कष्ट का कारण न बने, यह बात निवास की माँग के साथ ही रखी गयी है।

राम इसी प्रसंग में राजधर्म का कठोर पक्ष कहते हैं। जिन राजाओं से मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे बिना अग्नि के जल जाते हैं। पोद्दारजी इसे अपने दुष्ट कर्मों से भस्म होने के अर्थ में स्पष्ट करते हैं। राम ब्राह्मणों के सन्तोष को सभी मंगलों की जड़ और उनके क्रोध को करोड़ों कुलों को भस्म करने वाला कहते हैं। ये इसी संवाद में राम के कहे हुए धार्मिक और सामाजिक विधान हैं। अपनी इच्छा रखने से पहले वे उस मर्यादा को स्मरण करते हैं जिसमें राजा की शक्ति तपस्वियों के कष्ट के लिये उत्तरदायी मानी गयी है।

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ । सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ ॥
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला । बासु करौं कछु काल कृपाला॥

चौपाई १

अब माँग पूरी होती है। ऐसा स्थान बताइये जहाँ हम सीता और लक्ष्मण सहित जा सकें, पत्तों और घास की सुन्दर कुटी बनाकर कुछ समय रह सकें। तीनों साथ रहने वाले हैं और निवास कुछ काल के लिये चाहिये। सामग्री का नाम भी सामने है, पत्ते और घास। यह प्रश्न सुनकर वाल्मीकि जिस उत्तर की ओर बढ़ते हैं, उसका कारण राम की वाणी का यही सहज सरल स्वरूप है। पहले मुनि उसकी प्रशंसा करेंगे, फिर उस पूछने वाले का ऐसा परिचय देंगे जिसके लिये कोई स्थान बाहर नहीं पड़ता।

राम पिता की आज्ञा, माता के हित, भरत के राज्य और मुनि के दर्शन को पुण्यफल कहते हैं। उनकी विनती है कि सीता और लक्ष्मण सहित ऐसी जगह पर्णकुटी बनाकर रहें जहाँ किसी तपस्वी को कष्ट न हो।

जहाँ राम न हों, वह स्थान कहाँ है

सहज सरल सुनि रघुबर बानी । साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू । तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥

चौपाई २

वाल्मीकि राम की सहज सरल वाणी सुनकर धन्य कहते हैं। रघुकुल की ध्वजा के समान राम ऐसा क्यों न कहेंगे, वे सदा वेद की मर्यादा की रक्षा करते हैं। राम ने तपस्वियों को कष्ट न पहुँचाने का विचार सामने रखा था। मुनि उसी विचार में उनके स्वरूप की पहचान करते हैं। उनका उत्तर राम के मनुष्य जैसे प्रश्न को स्वीकार करते हुए उन दिव्य भूमिकाओं को खोलता है जिनमें सीता और लक्ष्मण भी साथ हैं। आगे का छन्द तीनों का परिचय एक ही विस्तार में रखता है।

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥

छन्द, सोरठा १२६ से पहले

मुनि कहते हैं कि राम वेद की मर्यादा के रक्षक और जगदीश्वर हैं। जानकी माया हैं, जो कृपानिधान का रुख पाकर जगत् का सृजन, पालन और संहार करती हैं। पोद्दारजी इस माया को राम की स्वरूपभूता शक्ति के रूप में स्पष्ट करते हैं। यहाँ सृजन के साथ पालन और संहार भी कहा गया है, और तीनों का सम्बन्ध उसी प्रेरणा से है। छन्द में लक्ष्मण का परिचय भी पूरा आता है। हजार मस्तकों वाले, पृथ्वी को धारण करने वाले सर्पों के स्वामी शेष ही लक्ष्मण हैं, जो चराचर के स्वामी कहे गये हैं।

वाल्मीकि इस राजरूप धारण करने का प्रयोजन भी बताते हैं। देवताओं के कार्य के लिये नरराज का शरीर धारण करके राम दुष्ट राक्षसों की सेनाओं का विनाश करने चले हैं। आश्रम में आये अतिथि से मुनि जगदीश्वर की तरह बात कर रहे हैं। उनकी दृष्टि में यह पहचान राम की विनम्रता को हटाती नहीं है। उसी के भीतर वे वेद की मर्यादा का पालन देखते हैं। फिर सोरठे में वे उस स्वरूप की सीमा बताने का प्रयास भी छोड़ देते हैं।

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह॥ १२६॥

सोरठा १२६

राम का स्वरूप वाणी की पहुँच से बाहर, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद उसका वर्णन निरन्तर नेति नेति कहकर करते हैं। मुनि आगे जगत् को दृश्य और राम को उसका देखने वाला कहते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को भी वही नचाते हैं। जब वे राम का मर्म नहीं जानते, तो और कौन जान सकता है। इस प्रश्न के बाद ज्ञान की सम्भावना बन्द नहीं की जाती। उसका आधार राम की अपनी कृपा में रखा जाता है।

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥

चौपाई ३

जिसे राम अपना स्वरूप जना देते हैं, वही जानता है; जानने पर वह उन्हीं का स्वरूप हो जाता है। वाल्मीकि राम को भक्तों के हृदय शीतल करने वाला चन्दन कहते हैं और बताते हैं कि भक्त भी उनकी ही कृपा से उन्हें जानते हैं। जानने का यह कथन केवल परिचय प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। मुनि उसके साथ स्वरूप हो जाने की बात रखते हैं। जिस रहस्य को ब्रह्मा, विष्णु और शिव नहीं जान पाते, उसी का ज्ञान कृपा से सम्भव कहा गया है।

इसके बाद वाल्मीकि कहते हैं कि राम का शरीर चिदानन्दमय और सभी विकारों से रहित है। टीका स्पष्ट करती है कि यह प्रकृति के पाँच महाभूतों से बना, कर्मबन्धन और तीन देहों से विशिष्ट मायिक शरीर नहीं है; इसमें उत्पत्ति और नाश, वृद्धि और क्षय जैसे विकार नहीं हैं। मुनि कहते हैं कि इस रहस्य को अधिकारी ही जानते हैं। देवताओं और संतों के कार्य के लिये नररूप धारण करने पर राम साधारण राजाओं की तरह कहते और करते हैं। उनके चरित्र सुनकर और देखकर मूर्ख मोह में पड़ते हैं, ज्ञानी सुख पाते हैं।

वाल्मीकि इसी बात को स्वाँग और नृत्य की उपमा से समझाते हैं। जिस रूप को धारण किया गया है, व्यवहार भी उसी के अनुरूप होता है। इसलिये राम का जो कहना और करना है, वह उचित है। मनुष्यरूप में निवास का प्रश्न पूछना उसी व्यवहार का अंग है। मुनि उसे समझते हैं, पर उनके सामने पूछने वाले का व्यापक स्वरूप भी है। दोनों बातें साथ आते ही वे एक ऐसा प्रत्युत्तर रखते हैं जिससे साधारण प्रश्न का विस्तार खुल जाता है।

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥ १२७॥

दोहा १२७

आपने पूछा कि कहाँ रहें। मैं तो यह पूछते संकोच करता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह जगह बता दीजिये, तब रहने का स्थान दिखाऊँ। मुनि के प्रेम से भरे वचन सुनकर राम सकुचाते हैं और मन में मुसकराते हैं। पोद्दारजी इस संकोच में रहस्य खुल जाने का भाव बताते हैं। वाल्मीकि हँसकर फिर मीठे वचन कहते हैं। अब वे सचमुच निवास गिनाने वाले हैं। उन निवासों का पहला परिचय किसी पर्वत या नदी का नाम नहीं, कथा सुनने वाले कानों का रूप होगा।

वाल्मीकि राम, सीता और लक्ष्मण के दिव्य स्वरूप बताते हैं। राम को जानना उनकी कृपा से सम्भव है, और मनुष्य जैसा व्यवहार उनके धारण किये रूप के अनुरूप है। कहाँ रहने के प्रश्न पर मुनि पूछते हैं कि पहले ऐसा स्थान बताइये जहाँ राम उपस्थित न हों।

कथा का समुद्र, दर्शन की एक बूँद

वाल्मीकि कहते हैं कि अब वे स्थान बताते हैं जहाँ राम सीता और लक्ष्मण सहित बसें। इस उत्तर को सुनते हुए हमें एक एक इन्द्रिय का नया प्रयोजन दिखाई देता है। पहले कान आते हैं, फिर आँखें, फिर जीभ। हर एक के लिये पानी से जुड़ी अलग छवि है। कानों के लिये बहुत सी नदियों से भरता समुद्र है, आँखों के लिये मेघ की एक बूँद की अभिलाषा है, और जीभ के लिये निर्मल मानसरोवर में मोती चुनती हंसिनी है। एक ही प्रेम को तीन अलग आकृतियाँ मिलती हैं।

जिनके कान समुद्र के समान हैं और राम की सुन्दर कथाएँ उनमें अनेक नदियों की तरह निरन्तर आती रहती हैं, उनके हृदय सुन्दर घर हैं। इतना सुनते रहने पर भी कान पूरे नहीं होते, तृप्ति का अन्त नहीं आता। नदियों का बहुत होना इस चित्र का आवश्यक भाग है। राम की कथा एक बार सुनकर समाप्त कर देने की वस्तु नहीं रहती; सुन्दर कथाओं का प्रवाह चलता रहता है और सुनने का स्थान उसे ग्रहण करता जाता है। मुनि उसी निरन्तर चाह में निवास की सुन्दरता देखते हैं।

फिर ऐसे नेत्र आते हैं जिन्होंने अपने को चातक बना लिया है। उन्हें राम के दर्शनरूपी मेघ की अभिलाषा है। वे बड़ी बड़ी नदियों, समुद्रों और सरोवरों की ओर आकर्षित नहीं होते; राम के रूप की एक बूँद उन्हें सुखी कर देती है। सुनने वाले कानों के समुद्र में अनेक नदियाँ आती थीं। देखने वाली आँखों को एक बूँद पर्याप्त है। दोनों उपमाएँ अपनी अपनी जगह पूरी हैं, क्योंकि दूसरी जगह बूँद के सामने जलराशि का विस्तार भी फीका पड़ जाता है।

पोद्दारजी इस बूँद का अर्थ दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूप के किसी एक अंग की थोड़ी सी झाँकी से खोलते हैं। उसके सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण जगत् का, पृथ्वी से स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक का सौन्दर्य भी तुच्छ लगने लगता है। यह मुनि के वर्णित भक्त की दर्शन के लिये एकाग्र अभिलाषा है। राम का रूप मिल जाय तो उसके लिये जल के दूसरे भण्डार कोई आकर्षण नहीं रखते। वाल्मीकि ऐसे हृदयों को सुख देने वाले भवन कहते हैं और राम से भाई तथा सीता सहित उनमें रहने की विनती करते हैं।

जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥ १२८॥

दोहा १२८

अब जीभ हंसिनी है। राम का यश निर्मल मानसरोवर है और उनके गुणों के समूह उसमें मोती हैं। जीभ उन मोतियों को चुनती रहती है। कथा सुनना और रूप देखना अभी तक ग्रहण करने के दो ढंग थे। यहाँ गुणों को कहना भी उसी निवास का अंग बन जाता है। हंसिनी की चोंच जिस तरह मोती चुनती है, वैसे ही वाणी गुणों में रमती है। मुनि फिर कहते हैं कि राम ऐसे मन में बसें। कान, नेत्र और वाणी अपने अपने काम करते हैं, और उनके पीछे एक हृदय का घर बनता जाता है।

वाल्मीकि पहले उन हृदयों का निवास बताते हैं जो कथा सुनते हुए कभी तृप्त नहीं होते, दर्शन की एक झाँकी के लिये लालायित रहते हैं और राम के गुणों को वाणी से चुनते हैं। इन भावों को वे समुद्र, चातक और मानसरोवर की हंसिनी के चित्रों में खोलते हैं।

इतने कर्मों का एक ही फल

आगे नासिका का वर्णन आता है। वह प्रभु का पवित्र और सुगन्धित प्रसाद प्रतिदिन आदर से ग्रहण करती है। पोद्दारजी यहाँ सुगन्धित फूल आदि का आशय स्पष्ट करते हैं। फिर भोजन और पहनावे की बात है। भक्त भोजन राम को अर्पित करके करते हैं, और वस्त्र तथा आभूषण भी उनका प्रसाद समझकर धारण करते हैं। इन क्रियाओं में आदर और अर्पण दोनों हैं। जो ग्रहण किया जा रहा है, उसका सम्बन्ध पहले प्रभु से माना गया है। वाल्मीकि के घरों की सूची में साधारण दिन के ये काम भी स्थान पाते हैं।

देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर जिनके सिर प्रेम और विशेष विनय के साथ झुक जाते हैं, जिनके हाथ प्रतिदिन राम के चरणों की पूजा करते हैं, और जिनके हृदय का भरोसा राम ही हैं, मुनि उनका उल्लेख करते हैं। फिर चरणों का काम बताते हैं। वे राम के तीर्थों तक चलकर जाते हैं। नासिका, मस्तक, हाथ और चरण, शरीर का हर अंग इस वर्णन में अपने कर्म के साथ आया है। मन की शरण भी उसी के बीच स्पष्ट की गयी है, दूसरा भरोसा नहीं है।

वाल्मीकि ऐसे लोगों के मन में राम से निवास करने को कहते हैं और साधना का क्रम आगे बढ़ाते हैं। वे प्रतिदिन राम के मन्त्रराज का जप करते हैं। पोद्दारजी इसे रामनामरूप मन्त्रराज बताते हैं। वे परिवार सहित राम की पूजा करते हैं; टीका इस परिवार को राम के परिकर, उनके साथ रहने वालों के अर्थ में स्पष्ट करती है। इस तरह पहले से साथ बताये गये सम्बन्ध पूजन के चित्र में भी बने रहते हैं। फिर तर्पण और हवन की अनेक विधियाँ, ब्राह्मणों को भोजन कराना और बहुत दान देना कहा गया है।

इस वर्णन में गुरु के लिये एक विशेष स्थान है। भक्त हृदय में गुरु को राम से भी अधिक बड़ा जानते हैं और पूरे भाव से सम्मानपूर्वक उनकी सेवा करते हैं। मुनि यह बात स्वयं राम से कह रहे हैं। भक्ति के इन घरों में गुरुसेवा की महत्ता इतनी है कि उसी कथन में प्रभु से भी अधिक आदर कहा जाता है। पूजा, जप, तीर्थ, तर्पण, हवन, भोजन और दान का विस्तृत क्रम पूरा होने पर दोहा उस सबका माँगा हुआ फल सामने रखता है।

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥ १२९॥

दोहा १२९

इन सब कर्मों के बाद एक ही फल माँगा जाता है, राम के चरणों में प्रीति हो। कर्म बहुत हैं, पर फल की प्रार्थना एक है। वाल्मीकि ऐसे मन को मन्दिर कहते हैं और सीता तथा राम दोनों से उसमें बसने की विनती करते हैं। इस दोहे के पहले की लम्बी गिनती को याद रखें तो उसकी एकता समझ आती है। अलग अलग अंगों और विधियों से जो किया गया, वह सब चरणों के प्रेम की माँग में एकत्र होता है। मुनि के लिये ऐसा मन निवास के योग्य है।

प्रसाद, अर्पित भोजन, पूजा, तीर्थयात्रा, नामजप, तर्पण, हवन, दान और गुरु की सेवा, वाल्मीकि इन सबका वर्णन करते हैं। इन्हें करने वाले अन्त में राम के चरणों की प्रीति ही माँगते हैं; ऐसे मन में वे सीता और राम का निवास चाहते हैं।

दूसरे का सुख देखकर हर्षित होने वाला मन

अगले निवास का परिचय उन दोषों से शुरू होता है जो वहाँ नहीं हैं। वाल्मीकि काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह गिनाते हैं। फिर लोभ और क्षोभ, राग और द्रोह कहते हैं। अन्त में कपट, दम्भ और माया भी जोड़ते हैं। यह पूरी गिनती हृदय का स्वरूप बताती है। जिनके भीतर ये विकार नहीं हैं, मुनि राम से उनमें बसने को कहते हैं। अभी तक शरीर के कर्म और पूजा की विधियाँ आयी थीं। अब मन का बर्ताव, बोलने का ढंग और दूसरों के जीवन से उसका सम्बन्ध खुलता है।

सब के प्रिय सब के हितकारी । दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी । जागत सोवत सरन तुम्हारी॥

चौपाई ४

ये लोग सबके प्रिय हैं और सबका हित करते हैं। उन्हें दुःख और सुख समान हैं, प्रशंसा और गाली भी समान हैं। जो अपने लिये सुनते हैं, उसमें समता है; जो स्वयं कहते हैं, उसमें सत्य और प्रियता है। बोलने से पहले विचार भी है। मुनि तीनों बातें एक साथ रखते हैं, विचार करके सत्य और प्रिय वचन कहना। जागते और सोते उनकी शरण राम ही हैं। इस शरण का समय पूजा की किसी एक घड़ी तक सीमित नहीं किया गया। जागरण और निद्रा, दोनों का नाम आता है।

जिनके लिये राम को छोड़कर कोई दूसरा आश्रय नहीं है, उनके मन में भी मुनि राम से रहने को कहते हैं। फिर सम्बन्धों की मर्यादा बताते हैं। परायी स्त्री उनके लिये जन्म देने वाली माता के समान है, और दूसरे का धन विष से भी भारी विष है। दूसरे व्यक्ति के प्रति उनका सम्बन्ध इस सीमा के साथ खुलता है। अगले ही वर्णन में दूसरे के सुख और दुःख में भाग लेने का स्वभाव सामने आता है, जो उनके हितकारी होने का और स्पष्ट रूप है।

वे दूसरे की सम्पत्ति देखकर प्रसन्न होते हैं। दूसरे की विपत्ति देखकर उन्हें विशेष दुःख होता है। अपनी प्रशंसा और गाली को समान जानने वाला मन दूसरों के संकट के सामने उदासीन नहीं है। मुनि ने समता और संवेदना दोनों को साथ रखा है। राम जिन्हें प्राणों जैसे प्यारे हैं, ऐसे लोगों के मन उनके लिये शुभ भवन हैं। यह घर एकान्त की भक्ति भर से नहीं पहचाना जाता; उसके गुण दूसरे के सुख पर होने वाले हर्ष और दूसरे की विपत्ति पर होने वाले दुःख में भी व्यक्त होते हैं।

स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥ १३०॥

दोहा १३०

दोहा इन हृदयों में राम के सम्बन्ध गिनाता है। स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु, सब कुछ वही हैं। मुनि सीता सहित दोनों भाइयों से ऐसे मनरूपी मन्दिर में बसने की विनती करते हैं। अभी तक वर्णित व्यवहारों के पीछे यह पूरा आश्रय है। जिसका प्रभु प्रिय है, वही दूसरे का हित भी चाहता है, वाणी को सत्य और प्रिय रखता है, और दूसरे की वस्तु पर अधिकार नहीं करता। वाल्मीकि के कथन में हृदय की भक्ति को उसके व्यवहार से अलग पढ़ना कठिन है, क्योंकि उन्होंने दोनों को लगातार एक ही घर के गुण कहा है।

विकारों से रहित मन, सबका हित, सुख दुःख और प्रशंसा निन्दा में समता, विचारपूर्वक सत्य और प्रिय वाणी, दूसरों की समृद्धि में हर्ष और विपत्ति में दुःख, ये भी वाल्मीकि के बताये निवास हैं। ऐसे भक्त राम में अपने सभी प्रिय सम्बन्धों का आश्रय देखते हैं।

जिसे कुछ भी नहीं चाहिये

वाल्मीकि आगे उन लोगों का मन राम का घर कहते हैं जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुण ग्रहण करते हैं। वे ब्राह्मण और गौ के हित के लिये संकट सहते हैं, और नीति की निपुणता के लिये जगत् में उनकी मर्यादा है। यह मुनि के वर्णन का धार्मिक और सामाजिक रूप है। गुण ग्रहण करने की उदारता के साथ जिनकी रक्षा के लिये वे संकट उठाते हैं, उनका नाम भी स्पष्ट रखा गया है। मुनि ऐसे मन को सुन्दर घर कहते हैं।

एक और भक्त अपने गुणों को राम का समझता है और दोषों को अपना। उसे हर प्रकार राम का भरोसा है। राम के भक्त उसे प्रिय लगते हैं। वाल्मीकि उसके हृदय में वैदेही सहित राम का निवास चाहते हैं। यहाँ अपने गुणों और अपने दोषों का हिसाब अलग ढंग से रखा गया है। गुणों में प्रभु की देन स्वीकार की जाती है, दोषों का उत्तरदायित्व अपने पास रखा जाता है। और प्रेम का सम्बन्ध केवल राम तक नहीं रुकता, उनके भक्त भी प्रिय हो जाते हैं।

इसके बाद त्याग का एक बहुत पूर्ण चित्र आता है। जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देने वाला घर, इन सबको छोड़कर जो राम को ही हृदय में धारण किये रहता है, उसके भीतर मुनि राम से बसने को कहते हैं। प्रिय परिवार और सुखद घर का उल्लेख उसी त्याग का भार बताता है। वाल्मीकि यहाँ जिस समर्पित भक्त का वर्णन कर रहे हैं, उसके लिये आकर्षण केवल धन या प्रतिष्ठा में नहीं था; अपना प्रिय और सुख देने वाला संसार भी उस गिनती में है।

अगला भक्त स्वर्ग, नरक और मोक्ष को समान जानता है। इसका कारण पोद्दारजी स्पष्ट करते हैं, वह हर जगह धनुष और बाण धारण किये राम को ही देखता है। कर्म, वचन और मन से वह उनका सेवक है। मुनि राम से उसके हृदय में डेरा करने को कहते हैं। स्थानों की भिन्नता के बीच उसका दर्शन एक है। सेवा भी केवल कथन की नहीं रखी गयी, काम, बोली और मन, तीनों के साथ कही गयी है। अब इस पूरे उत्तर का सबसे संक्षिप्त निवास सामने आता है।

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥ १३१॥

दोहा १३१

जिसे कभी कुछ भी नहीं चाहिये और जिसका राम से सहज स्नेह है, मुनि कहते हैं कि उसके मन में निरन्तर रहिये। वह आपका अपना घर है। पहले सुन्दर घर, सुखद भवन और मनमन्दिर कहे गये थे। यहाँ अपना घर कहा जाता है। इस मन में प्रेम स्वाभाविक है और उसके साथ पाने की कोई माँग नहीं जुड़ी। जितने निवास अब तक बताये गये, उनके बाद इस दोहे की सादगी ठहरने देती है। मुनि की वाणी राम के मन को अच्छी लगती है। हृदयों के इतने घर दिखाने के बाद वे यात्रा के लिये उपयुक्त वास्तविक आश्रम का पता भी देते हैं।

गुण ग्रहण करना, संकट में धर्मसम्मत हित की रक्षा, अपने दोष स्वीकार करना, भक्तों से प्रेम, सम्पूर्ण त्याग और तीनों प्रकार की सेवा भी मुनि के बताये निवास हैं। अन्त में वे निष्काम सहज स्नेह वाले मन को राम का अपना घर कहते हैं।

चित्रकूट, इस समय का सुखद आश्रम

वाल्मीकि राम को सूर्यकुल के स्वामी कहकर सम्बोधित करते हैं। अब वे इस समय के लिये सुख देने वाला निवास बताते हैं, चित्रकूट पर्वत पर रहिये। वहाँ हर प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत और सुन्दर वन है, हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों का विहार है। हृदयों का वर्णन पूरा होने पर स्थान की अपनी विशेषताएँ लौट आती हैं। निवास पूछने वाले यात्रियों को वन, जल और रहने की सुविधा का पूरा उत्तर मिलता है।

वहाँ की नदी पवित्र है और पुराणों में उसकी प्रशंसा कही गयी है। मुनि बताते हैं कि अत्रि की पत्नी उसे अपने तप के बल से लायी थीं। पोद्दारजी उनका नाम अनसूया कहते हैं। यह गंगा की धारा है और इसका नाम मन्दाकिनी है। नदी की पवित्रता समझाने के लिये तुलसी एक तीखी छवि रखते हैं। सारे पाप बालकों के समान हैं और उन्हें खा डालने के लिये यह नदी डाकिनी के समान है। सुन्दर वन के साथ पाप मिटाने की यह शक्ति भी मुनि के कहे चित्रकूट की महिमा का अंग है।

अत्रि और दूसरे अनेक श्रेष्ठ मुनि वहाँ रहते हैं। वे योग, जप और तप करते हुए अपने शरीर को कसते हैं। वाल्मीकि राम से कहते हैं कि वहाँ चलकर उन सबका परिश्रम सफल कीजिये और श्रेष्ठ पर्वत को भी गौरव दीजिये। आरम्भ में राम ने पूछा था कि उनके रहने से किसी तपस्वी को उद्वेग न हो। यहाँ मुनि ऐसा स्थान बताते हैं जहाँ तपस्वियों की साधना राम के आगमन से फल पायेगी। निवास की सुविधा के साथ उन साधकों के आनन्द की सम्भावना भी रखी गयी है।

चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ।
आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ॥ १३२॥

दोहा १३२

महामुनि चित्रकूट की अपरिमित महिमा बखानते हैं। फिर कथा सीधे वहाँ पहुँचने और स्नान करने की घटना कहती है। सीता सहित दोनों भाई श्रेष्ठ नदी में स्नान करते हैं; टीका उस नदी को मन्दाकिनी कहती है। अभी तक जो स्थान मुनि के वचनों में था, वह अब यात्रा का पहुँचा हुआ पड़ाव है। पर्वत की प्रशंसा सुनना और उसके जल में स्नान करना दोहे में साथ आ गये हैं। आगे राम अपने छोटे भाई से वहीं ठहरने की व्यवस्था करने को कहेंगे।

वाल्मीकि चित्रकूट में वन, पर्वत, जीवों का विहार, मन्दाकिनी और अत्रि आदि तपस्वियों का निवास बताते हैं। उनकी कही महिमा के बाद सीता सहित दोनों भाई वहाँ पहुँचते हैं और मन्दाकिनी में स्नान करते हैं।

उत्तर का ऊँचा तट और दो पर्णकुटियाँ

राम लक्ष्मण से कहते हैं कि घाट बहुत अच्छा है, अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था हो। लक्ष्मण पयस्विनी नदी के उत्तर का ऊँचा किनारा देखते हैं। उसके चारों ओर धनुष के आकार का नाला फिरा हुआ है। उत्तर दिशा और ऊँचा तट, दोनों इस स्थान के स्पष्ट परिचय हैं। उसके बाद इसी भूभाग का रूप एक विस्तृत उपमा में बदलता है। पानी का घुमाव धनुष बनता है, नदी उसकी डोरी, और चित्रकूट स्वयं शिकारी का रूप ले लेता है।

नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना॥
चित्रकूट जनु अचल अहेरी । चुकइ न घात मार मुठभेरी॥

चौपाई ५

मन्दाकिनी उस धनुष की प्रत्यंचा है। शम, दम और दान उसके बाण हैं। कलियुग के सारे पाप अनेक हिंसक पशुओं के समान लक्ष्य हैं। चित्रकूट अचल शिकारी है, जिसका निशाना चूकता नहीं और जो सामने से प्रहार करता है। उपमा की हर वस्तु अपने काम के साथ रखी गयी है। धनुष का आकार नदी के निकट दिखाई देता है, उसके बाण साधना के गुण हैं और उनका लक्ष्य पाप हैं। पर्वत की स्थिरता भी शिकारी के अचल होने में बनी रहती है।

लक्ष्मण इस प्रकार कहकर ठहरने का स्थान दिखाते हैं। राम को वह जगह देखकर सुख होता है। देवता जान लेते हैं कि राम का मन यहाँ रम गया है। तब वे अपने प्रधान भवननिर्माता को साथ लेकर चलते हैं। पोद्दारजी उन्हें विश्वकर्मा के नाम से पहचानते हैं। रहने का स्थान लक्ष्मण ने देखा और दिखाया है; घर बनाने के लिये अब देवताओं का समुदाय विश्वकर्मा सहित आता है। एक एक काम का कर्ता कथा में अपने स्थान पर स्पष्ट है।

कोल किरात बेष सब आए । रचे परन तृन सदन सुहाए॥
बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला॥

चौपाई ६

सब देवता कोल और भीलों के वेष में आते हैं। वे पत्तों और घास के सुन्दर घर बनाते हैं। टीका उन पत्तों और घास को दिव्य कहती है। कुटियाँ दो हैं, और उनका आकार एक नहीं है। एक सुन्दर छोटी कुटी है, दूसरी बड़ी है। तुलसी उनके सौन्दर्य को वर्णन से परे कहते हैं। वाल्मीकि से निवास माँगते समय राम ने पत्तों और घास की कुटी का विचार रखा था। अब वही सामग्री वास्तविक बसेरे के रूप में सामने है, और निर्माण करने वालों में विश्वकर्मा के साथ देवता भी हैं।

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।
सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत॥ १३३॥

दोहा १३३

सुन्दर निवास में राम लक्ष्मण और जानकी सहित शोभा पा रहे हैं। अन्त का चित्र मुनिवेष में कामदेव, रति और वसन्त ऋतु की उपमा से बनता है। इस उपमा में वन का निवास अपनी शोभा के साथ दिखाई देता है। पत्तों और घास के घर के भीतर तीनों का साथ है, और वही इस दोहे का केन्द्र है। यहाँ पहुँचकर रहने का प्रश्न अपना ठोस उत्तर पा लेता है। एक रात के रास्ते वाले विश्राम से चली कथा अब चित्रकूट के बने हुए निवास तक आ गयी है।

लक्ष्मण पयस्विनी के उत्तर का ऊँचा तट दिखाते हैं और चित्रकूट को पापों का अचूक शिकारी बताते हैं। राम को स्थान प्रिय लगने पर विश्वकर्मा सहित देवता कोल और भीलों के वेष में आकर दो कुटियाँ बनाते हैं। राम, सीता और लक्ष्मण वहाँ निवास करते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में घर पूछने की बात बार बार अपना आकार बदलती है। पहले वह थकी हुई सीता के लिये पेड़ और ठंडे पानी के पास विश्राम है। फिर वह मुनियों को कष्ट पहुँचाये बिना रहने की विनती है। वाल्मीकि उसे कथा, दर्शन, सेवा, आचरण और प्रेम से भरे हृदयों में खोलते हैं। उसके बाद पहाड़, नदी का तट और दो कुटियाँ आती हैं। हर जगह निवास का प्रश्न सामने है, और हर जगह उसमें साथ रहने वालों तथा दूसरों के सुख का ध्यान जुड़ा हुआ है।

वाल्मीकि के बताये मनों में केवल अन्तर्मुखी भाव नहीं हैं। वहाँ सुनना और कहना है, भोजन और वस्त्र हैं, हाथ और चरणों के काम हैं, दूसरे की समृद्धि देखकर प्रसन्न होना है, विपत्ति देखकर दुःखी होना है। फिर कभी कुछ न चाहने वाला सहज प्रेम है। हम इस उत्तर को पढ़ते हैं तो भक्त के हृदय का घर उसके पूरे आचरण के साथ दिखाई देता है। मुनि उसी विस्तार को पूरा करके चित्रकूट का पता देते हैं, और कथा के अन्त में तीनों उस निवास में शोभा पाते हैं।

रहने का स्थान मिल गया है। दो पर्णकुटियाँ बन चुकी हैं। पीछे रह गये संवाद में वाल्मीकि का बताया वह अपना घर भी है जहाँ राम से सहज स्नेह करने वाले मन को कुछ माँगना नहीं पड़ता। चित्रकूट का ठोस बसेरा और उस प्रेम का निवास, दोनों इस प्रसंग के साथ हमारे स्मरण में रहते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा १२४ से १३३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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