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वाल्मीकि का उत्तर और चित्रकूट में बसेरा

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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 15

राम मुनि से वह स्थान पूछते हैं जहाँ वे कुटी बनाकर कुछ समय रहें। वाल्मीकि पहले वे निवास बताते हैं जहाँ राम बसें, फिर उन्हें चित्रकूट पर्वत पर रहने को कहते हैं।

आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी लक्ष्मण, सीता और राम, ये बटोही बसें, वह राम के धाम का मार्ग पायेगा। वाल्मीकि के आश्रम में राम मुनि से वह स्थान पूछेंगे जहाँ वे पत्तों और घास की कुटी बनाकर कुछ समय रहें। मुनि पूछते सकुचायेंगे, और राम से कहेंगे कि वह स्थान बता दीजिये जहाँ आप न हों।

रामचरितमानस के इस प्रसंग में सीता को थकी जानकर राम बड़ के पेड़ और ठंडे जल के पास ठहरते हैं। वाल्मीकि सीता को माया कहते हैं, और लक्ष्मण को पृथ्वी को धारण करनेवाले सर्पों के स्वामी। फिर मुनि वे निवास बताते हैं जहाँ राम बसें। वे उनके हृदयों से, जिनके कानों को राम की कथा निरन्तर भरती रहती है, उसके मन तक जाते हैं जिसे कुछ नहीं चाहिये। वे राम को चित्रकूट पर्वत पर रहने को कहते हैं। लक्ष्मण नदी के उत्तर का ऊँचा किनारा देखते हैं और स्थान दिखाते हैं, और देवता कोल और किरातों के वेष में दो कुटियाँ बनाते हैं।

वाल्मीकि के आश्रम में अतिथि

  • राम सीता और लक्ष्मण सहित वन में रहने का उपयुक्त स्थान पूछनेवाले अतिथि।
  • सीता यात्रा से थकी हुई, जो आश्रम के स्वागत और चित्रकूट के नये निवास में साथ हैं।
  • लक्ष्मण राम के छोटे भाई, जो नदी के उत्तर में ऊँचा तट देखकर ठहरने का स्थान दिखाते हैं।
  • वाल्मीकि आश्रम के मुनि, जो राम का स्वागत करते हैं और सकुचाते हुए उनसे वह स्थान पूछते हैं जहाँ वे न हों। फिर वे उनके बसने के निवास बताते हैं और उन्हें चित्रकूट पर रहने को कहते हैं।
  • देवता और उनके प्रधान शिल्पी देवता, जो राम का मन रमा जानकर अपने प्रधान शिल्पी के साथ चलते हैं। वे कोल और किरातों का वेष धारण करके पत्तों और घास के सुहावने घर बनाते हैं। दो कुटियाँ हैं, एक ललित और छोटी, एक बड़ी।

थकी हुई सीता और मुनि का स्वागत

आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण, सीता और राम, ये बटोही आ बसें, वह राम के धाम का मार्ग पायेगा। उस मार्ग को कभी कोई मुनि पाता है।

तब सीता को थकी हुई जानकर और पास ही बड़ का पेड़ और ठंडा पानी देखकर राम वहीं ठहर जाते हैं। वे कन्द, मूल और फल खाते हैं। पोद्दार की टीका इस ठहराव को रातभर का विश्राम बताती है। सुबह स्नान करके राम चल पड़ते हैं, और सुहावने वन, सरोवर और पर्वत देखते हुए वाल्मीकि के आश्रम पहुँचते हैं।

राम देखते हैं कि मुनि का निवास सुहावना है: सुन्दर पर्वत और वन, और पवित्र जल। सरोवरों में कमल और वनों में वृक्ष फूले हैं। रस में मस्त भौंरे मधुर गुंजार करते हैं। बहुत से पक्षी और पशु कोलाहल करते हैं, और वैर से रहित होकर प्रसन्न मन से विचरते हैं।

पवित्र और सुन्दर आश्रम देखकर राम प्रसन्न होते हैं। उनके आने का समाचार सुनकर वाल्मीकि उन्हें लेने आगे आते हैं। राम मुनि को दण्डवत् करते हैं, और मुनि आशीर्वाद देते हैं। राम की छवि देखकर ऋषि के नेत्र शीतल हो जाते हैं, और वे आदर के साथ सबको आश्रम में ले आते हैं।

वाल्मीकि को ये अतिथि प्राणों के समान प्रिय हैं। वे मधुर कन्द, मूल और फल मँगवाते हैं। सीता, लक्ष्मण और राम फल खाते हैं। तब मुनि उन्हें सुन्दर स्थान देते हैं, जिन्हें टीका विश्राम के लिये बताती है। मंगलमूर्ति को आँखों से निहारकर वाल्मीकि के मन में भारी आनन्द है। टीका कहती है कि मुनि राम के पास बैठे हैं। तब राम हाथ जोड़कर कानों को सुख देनेवाले वचन बोलते हैं।

सफल हुए पुण्य

राम कहते हैं, हे मुनिनाथ, आप त्रिकालदर्शी हैं। विश्व आपके हाथ में बेर के समान है। ऐसा कहकर वे सारी कथा सुनाते हैं कि रानी ने जिस जिस प्रकार उन्हें वन दिया। पोद्दार रानी का नाम कैकेयी बताते हैं।

पिता का वचन, फिर माता का हित, भरत जैसे भाई का राजा होना, और मुझे आपके दर्शन मिलना, राम इन सबको अपने पुण्यों का प्रभाव कहते हैं। टीका भरत के लिये स्नेही और धर्मात्मा, ये दो विशेषण जोड़ती है।

वे कहते हैं, हे मुनिराज, आपके चरणों को देखकर हमारे सब पुण्य सफल हो गये। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो, और जहाँ कोई मुनि उद्वेग न पाये।

राम आगे कहते हैं, जिन राजाओं से मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे बिना अग्नि के जलते हैं। ब्राह्मणों का सन्तोष मंगल की जड़ है, और भूसुरों का क्रोध करोड़ों कुलों को जला देता है। पोद्दार इस जलने को राजाओं के अपने ही दुष्ट कर्मों से भस्म होना बताते हैं।

ऐसा समझकर, राम कहते हैं, वह स्थान बताइये जहाँ मैं सीता और लक्ष्मण सहित जाऊँ, और पत्तों और घास की सुन्दर कुटी बनाकर कुछ समय रहूँ।

जहाँ राम न हों, वह स्थान कहाँ है

राम की सहज सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि कहते हैं, साधु, साधु! आप ऐसा क्यों न कहें? आप सदा वेद के सेतु के रक्षक हैं।

मुनि आगे कहते हैं, हे राम, आप जगत् के स्वामी हैं। सीता माया हैं, जो आपका रुख पाकर जगत् का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार सिरोंवाले, सर्पों के स्वामी, पृथ्वी को धारण करनेवाले और चराचर के स्वामी हैं, वे लक्ष्मण हैं। पोद्दार इस माया को राम की स्वरूपभूता बताते हैं, और सर्पों के उन स्वामी को शेष।

देवताओं के काम के लिये आप राजा का शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसों की सेना का नाश करने चले हैं।

आपका स्वरूप वाणी की पहुँच से बाहर, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद उसे निरन्तर नेति नेति कहते हैं। जगत् दृश्य है और आप उसे देखनेवाले हैं। आप विधाता, विष्णु और शिव को नचानेवाले हैं। वे भी आपका मर्म नहीं जानते। और कौन आपको जाननेवाला है?

वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं, और जानते ही वह आपका ही स्वरूप हो जाता है। आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।

आपका शरीर चिदानन्दमय है और विकारों से रहित है। टीका बताती है कि यह पाँच महाभूतों का बना, कर्मबन्धन में बँधा और तीन देहोंवाला मायिक शरीर नहीं है, और इसमें जन्म और नाश, बढ़ना और घटना जैसे विकार नहीं। मुनि कहते हैं कि इस रहस्य को अधिकारी जानते हैं। संतों और देवताओं के काम के लिये आपने मनुष्य का शरीर धारण किया है, और प्राकृत राजा की तरह कहते और करते हैं। आपके चरित्र देख सुनकर मूर्ख मोह में पड़ते हैं और ज्ञानी सुख पाते हैं।

आप जो कहते और करते हैं, सब सत्य है। जैसा स्वाँग भरे, वैसा नाचना चाहिये। टीका जोड़ती है कि इस समय आप मनुष्य रूप में हैं, इसलिये मनुष्य के योग्य व्यवहार ठीक है।

आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ। मैं पूछते सकुचाता हूँ। जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिये, और मैं आपको रहने का स्थान दिखाऊँ। मुनि के प्रेम रस में सने वचन सुनकर राम सकुचाकर मन में मुसकराते हैं। पोद्दार इस संकोच का कारण रहस्य खुल जाने का डर बताते हैं। वाल्मीकि हँसकर फिर अमृत रस में डुबोयी मीठी वाणी बोलते हैं।

कथा का समुद्र, रूप की एक बूँद

वाल्मीकि कहते हैं, हे राम, सुनिये, अब मैं वे निवास बताता हूँ जहाँ आप सीता और लक्ष्मण सहित बसिये।

जिनके कान समुद्र के समान हैं, आपकी कथा की अनेक सुहावनी नदियाँ उन्हें निरन्तर भरती रहती हैं, और वे कभी पूरे नहीं होते, उनके हृदय आपके लिये सुन्दर घर हैं।

और कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अपनी आँखों को चातक बना रखा है, और जो आपके दर्शन रूपी मेघ की अभिलाषा में रहते हैं। वे बड़ी बड़ी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं, और आपके रूप की एक बूँद जल से सुखी हो जाते हैं।

पोद्दार इस बूँद का अर्थ राम के दिव्य सच्चिदानन्द स्वरूप के किसी एक अंग की थोड़ी सी झाँकी बताते हैं। उनके अनुसार उसके सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण, तीनों जगत् का सौन्दर्य, पृथ्वी से स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक, फीका पड़ जाता है। वाल्मीकि ऐसे हृदयों को सुख देनेवाले भवन कहते हैं और राम से भाई और सीता सहित उनमें बसने को कहते हैं।

जिसकी जीभ हंसिनी बनकर आपके यश रूपी निर्मल मानसरोवर में आपके गुण रूपी मोती चुगती रहती है, राम, आप उसके हृदय में बसिये।

सब कर्मों का एक फल

जिनकी नासिका आपका पवित्र, सुन्दर और सुगन्धित प्रसाद नित्य आदर से ग्रहण करती है। वे भोजन आपको निवेदित करके करते हैं, और वस्त्र और आभूषण आपका प्रसाद मानकर धारण करते हैं। पोद्दार यहाँ प्रसाद का अर्थ फूल आदि बताते हैं।

कुछ ऐसे हैं जिनके सिर देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर प्रेम के साथ बड़ी विनय करके झुकते हैं। उनके हाथ नित्य राम के चरणों की पूजा करते हैं, और उनके हृदय में राम का भरोसा है, दूसरा नहीं। उनके चरण राम के तीर्थों तक चलकर जाते हैं।

राम, आप उनके मन में बसिये। कुछ ऐसे हैं जो नित्य आपके मन्त्रराज का जप करते हैं और परिवार सहित आपकी पूजा करते हैं। वे अनेक प्रकार से तर्पण और हवन करते हैं, और ब्राह्मणों को भोजन कराकर बहुत दान देते हैं। पोद्दार मन्त्रराज को रामनाम बताते हैं, और परिवार का अर्थ राम का परिकर, यानी उनके साथ रहनेवाले।

वे गुरु को हृदय में आपसे अधिक जानकर, सब भाव से उनका सम्मान करके सेवा करते हैं।

ये सब कर्म करके वे एक फल माँगते हैं, कि राम के चरणों में प्रीति हो। वाल्मीकि ऐसे मन को मन्दिर कहते हैं और सीता और राम, दोनों से उसमें बसने की विनती करते हैं।

दूसरे की सम्पत्ति देखकर हर्षित होनेवाले

जिनके न काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है, न लोभ, न क्षोभ, न राग, न द्रोह, और न कपट, दम्भ और माया है, राम, आप उनके हृदय में बसिये।

जो सबके प्रिय हैं और सबका हित करते हैं, जिन्हें दुःख और सुख, प्रशंसा और गाली समान हैं। जो विचार करके सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं, और जो जागते और सोते आपकी शरण में हैं।

जिनके लिये आपको छोड़कर कोई दूसरा आश्रय नहीं, राम, आप उनके मन में बसिये। जो परायी स्त्री को माता के समान जानते हैं, और जिनके लिये पराया धन विष से भी भारी विष है।

जो दूसरे की सम्पत्ति देखकर प्रसन्न होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष दुःखी होते हैं। जिन्हें आप प्राणों के समान प्यारे हैं, उनके मन आपके शुभ भवन हैं।

जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मन रूपी मन्दिर में सीता सहित आप दोनों भाई बसिये।

जिसे कुछ भी नहीं चाहिये

वाल्मीकि आगे कहते हैं, कुछ ऐसे हैं जो अवगुण छोड़कर सबके गुण ग्रहण करते हैं, और ब्राह्मण और गौ के हित के लिये संकट सहते हैं। वे नीति में निपुण हैं, और जगत् में उनकी लीक है। उनका सुन्दर मन आपका घर है।

जो गुणों को आपका और दोषों को अपना समझता है, और जिसे सब प्रकार से आपका भरोसा है। जिसे राम के भक्त प्यारे लगते हैं, उसके हृदय में आप सीता सहित बसिये।

जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर, सब छोड़कर जो आपको हृदय में धारण किये रहता है, आप उसके हृदय में रहिये।

जिसकी दृष्टि में स्वर्ग, नरक और मोक्ष समान हैं, और जो जहाँ तहाँ धनुष और बाण धारण किये आपको देखता है। पोद्दार इसे स्वर्ग, नरक और मोक्ष के समान होने का कारण बताते हैं। जो कर्म, वचन और मन से आपका सेवक है, राम, आप उसके हृदय में डेरा कीजिये।

जिसे कभी कुछ नहीं चाहिये, और जिसका आपसे सहज स्नेह है, मुनि कहते हैं, आप उसके मन में निरन्तर बसिये, वह आपका अपना घर है। इस प्रकार श्रेष्ठ मुनि ने निवास दिखाये। उनके प्रेम भरे वचन राम के मन को अच्छे लगते हैं।

चित्रकूट, इस समय का सुखद आश्रम

फिर मुनि कहते हैं, हे राम, सुनिये, मैं इस समय के लिये सुख देनेवाला आश्रम बताता हूँ। चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत और सुन्दर वन है, और वह हाथियों, सिंहों, हिरनों और पक्षियों के विहार का स्थान है।

वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणों ने प्रशंसा की है, और जिसे अत्रि की पत्नी अपने तप के बल से लायी थीं। पोद्दार उनका नाम अनसूया बताते हैं। वह गंगा की धारा है और उसका नाम मन्दाकिनी है। मुनि कहते हैं कि वह सब पाप रूपी बालकों के लिये डाकिनी है।

अत्रि आदि अनेक श्रेष्ठ मुनि वहाँ बसते हैं, जो योग, जप और तप करते हैं और शरीर को कसते हैं। चलिये, सबका परिश्रम सफल कीजिये। हे राम, श्रेष्ठ पर्वत को भी गौरव दीजिये।

महामुनि चित्रकूट की अपार महिमा का बखान करते हैं। सीता सहित दोनों भाई आकर श्रेष्ठ नदी में स्नान करते हैं। टीका उस नदी को मन्दाकिनी कहती है।

उत्तर का ऊँचा तट और दो पर्णकुटियाँ

राम कहते हैं, लक्ष्मण, अच्छा घाट है, अब कहीं ठहरने का ठाट कीजिये। लक्ष्मण नदी के उत्तर का ऊँचा किनारा देखते हैं। टीका उस नदी को पयस्विनी कहती है। लक्ष्मण कहते हैं कि उस किनारे के चारों ओर धनुष की तरह एक नाला घूमा हुआ है।

नदी उस धनुष की डोरी है, और शम, दम और दान बाण हैं। कलियुग के सारे पाप उसके अनेक शिकार के पशु हैं। चित्रकूट मानो अचल शिकारी है, जिसका वार कभी नहीं चूकता और जो सामने से मारता है।

ऐसा कहकर लक्ष्मण ठहरने का स्थान दिखाते हैं, और राम को वह जगह देखकर सुख होता है। देवता जान लेते हैं कि राम का मन यहाँ रम गया है। तब वे अपने प्रधान भवन बनानेवाले को साथ लेकर चलते हैं। पोद्दार उन्हें विश्वकर्मा बताते हैं।

सब कोल और किरातों के वेष में आते हैं और पत्तों और घास के सुहावने घर बनाते हैं। टीका उन पत्तों और घास को दिव्य कहती है। दो सुन्दर कुटियाँ हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता, एक ललित और छोटी, एक बड़ी।

सुन्दर निवास में लक्ष्मण और सीता सहित राम शोभा पा रहे हैं, मानो कामदेव मुनि का वेष धारण करके रति और वसन्त के साथ सुशोभित हो।

प्रसंग का क्रम

सीता को थकी जानकर राम बड़ के पेड़ और ठंडे जल के पास ठहरते हैं। सुबह स्नान करके वे चल पड़ते हैं, और सुहावने वन, सरोवर और पर्वत देखते हुए वाल्मीकि के आश्रम आते हैं। मुनि उन्हें लेने आगे आते हैं। राम दण्डवत् करते हैं, और मुनि आशीर्वाद देते हैं। वे मधुर कन्द, मूल और फल मँगवाते हैं, और तीनों खाते हैं। राम हाथ जोड़कर सारी कथा सुनाते हैं। पिता के वचन, माता के हित, भरत के राजा होने और मुनि के दर्शन को वे अपने पुण्यों का प्रभाव कहते हैं। वे वह स्थान पूछते हैं जहाँ मुनि की आज्ञा हो, कोई मुनि उद्वेग न पाये, और जहाँ वे पत्तों और घास की कुटी में कुछ समय रहें।

वाल्मीकि कहते हैं कि राम वेद के सेतु के रक्षक हैं, सीता माया हैं, और लक्ष्मण पृथ्वी को धारण करनेवाले हैं। सकुचाते हुए वे राम से कहते हैं कि वह स्थान बता दीजिये जहाँ आप न हों, और मैं आपको स्थान दिखाऊँगा। राम मन में मुसकराते हैं, और मुनि हँसते हैं। फिर वे निवास बताते हैं। इन निवासों में उनके हृदय हैं जिनके कान राम की कथा सुनते हैं और जिनकी आँखें उनके दर्शन की अभिलाषा में रहती हैं। उनके मन भी हैं जिनके सिर देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर झुकते हैं। उनके हृदय हैं जिनमें काम और क्रोध नहीं, और उनके मन जो परायी स्त्री को माता के समान जानते हैं। जिसे कुछ नहीं चाहिये, उसका मन, मुनि कहते हैं, राम का अपना घर है।

फिर मुनि राम को चित्रकूट पर्वत पर रहने को कहते हैं, जहाँ मन्दाकिनी नाम की पवित्र नदी है, जिसे अत्रि की पत्नी अपने तप के बल से लायी थीं। वे चित्रकूट की महिमा का बखान करते हैं। सीता सहित दोनों भाई आकर श्रेष्ठ नदी में स्नान करते हैं। राम घाट को अच्छा कहते हैं और लक्ष्मण से ठहरने का ठाट करने को कहते हैं। लक्ष्मण उत्तर का ऊँचा किनारा देखते हैं, कहते हैं कि उसके चारों ओर धनुष की तरह नाला घूमा है, और स्थान दिखाते हैं। उसे देखकर राम सुख पाते हैं। देवता राम के मन का रमना जानते हैं। वे कोल और किरातों के वेष में अपने प्रधान शिल्पी के साथ आकर दो कुटियाँ बनाते हैं, एक ललित और छोटी, एक बड़ी। उस सुन्दर निवास में लक्ष्मण और सीता सहित राम शोभा पाते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 124 से 133, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।