रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · दशरथ की विनती और कैकेयी का हठ
दशरथ की विनती और कैकेयी का हठ
भरत को राज्य देने की दशरथ की स्वीकृति के सामने राम के वनवास की माँग अडिग खड़ी है, और हर विनती पर कैकेयी वचन निभाने का आग्रह और कठोर कर देती हैं।
दशरथ मन ही मन व्याकुल हैं। सामने कैकेयी हैं, जिन्हें राजा की यह दशा देखकर क्रोध आ रहा है। वे उत्तर चाहती हैं, साफ़ हाँ या साफ़ नहीं। राजा का दुःख उनके लिये अपने माँगे हुए वरदानों के रास्ते में आ खड़ा हुआ है। दशरथ की ओर से अभी शब्द नहीं निकलते, और कैकेयी उसी चुप्पी पर चोट करती हैं। रामचरितमानस का यह प्रसंग ऐसी बातचीत से खुलता है जिसमें एक की पीड़ा दूसरे को और कठोर कर रही है।
जब राजा बोलेंगे तो भरत के लिये राज्य देने की बात स्वयं कहेंगे। दोनों भाइयों को बुलाने, शुभ दिन चुनने और अभिषेक की तैयारी करने तक का प्रस्ताव रखेंगे। फिर उनकी वाणी राम पर आकर ठहर जायेगी। वे राम को देखे बिना जीवित नहीं रह सकते। इसी आग्रह के सामने कैकेयी अपने दोनों वरदान और राजवचन की प्रतिष्ठा रखती हैं। हम दोनों की बात साथ सुनते हैं तो समझ में आता है कि दशरथ किस एक माँग को बदलवाने के लिये अपना सिर तक देने को तैयार हो गये हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- दशरथ अयोध्या के राजा, जो भरत का अभिषेक स्वीकार करते हैं और राम को अपने पास रख लेने की विनती करते हैं।
- कैकेयी अपने दोनों वरदान पूरे कराने पर अड़ी रानी, जिनके कठोर उत्तर राजा की हर विनती को रोक देते हैं।
- राम जिनके स्वभाव, भरत के प्रति प्रेम और वनवास की माँग पर यह पूरा संवाद चल रहा है।
- भरत जिन्हें राजा राज्य देने को तैयार हैं और जिनके विषय में कहते हैं कि वे राजपद चाहते ही नहीं।
- कौसल्या राम की माता, जिन पर कैकेयी व्यंग्य करती हैं और जिनका दशरथ स्पष्ट बचाव करते हैं।
चुप्पी पर पड़ते हुए कठोर वचन
कैकेयी राजा के भीतर चल रही पीड़ा को देख रही हैं, पर उनकी बात भरत के अधिकार से शुरू होती है। क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं? फिर वे अपने सम्बन्ध पर प्रश्न रखती हैं, क्या हमें दाम देकर खरीद लाये थे? पोद्दार जी की टीका इस दूसरे प्रश्न का आशय विवाहिता पत्नी के अधिकार से खोलती है। राजा के मौन में कैकेयी अपने और भरत के प्रति भेद देख रही हैं। अभी दशरथ ने कुछ कहा भी नहीं है, पर उन्हें ऐसे आरोपों का उत्तर देना पड़ रहा है जो उनके पुत्रस्नेह और दाम्पत्य, दोनों को एक साथ कटघरे में खड़ा करते हैं।
वे आगे पूछती हैं, हमारी बात सुनकर आपको बाण जैसा लगा है तो सोचकर उत्तर क्यों नहीं देते? जो माँगा गया है उस पर हाँ कीजिये, या नहीं कह दीजिये। अपने आग्रह में वे रघुकुल के सत्यप्रतिज्ञ राजा का परिचय भी सुनाती हैं। यह परिचय दशरथ का सम्मान बढ़ाने के लिये नहीं सुनाया जा रहा। उसी प्रतिष्ठा से उनके मौन को असहनीय बनाया जा रहा है। कैकेयी चाहती हैं कि राजा अपने दुःख के बीच भी एक निर्णय बोलें, और उस निर्णय का परिणाम उनके सामने पहले से रख देती हैं।
वर देने की बात आपने ही कही थी, वे कहती हैं। अब चाहें तो न दीजिये, सत्य छोड़कर संसार का अपयश ले लीजिये। सत्य की प्रशंसा करते समय क्या समझ लिया था कि हम बस चबेना माँगकर रह जायेंगे? चबेने का यह छोटा सा बिम्ब उनके व्यंग्य को बहुत तीखा कर देता है। उनके अनुसार राजा ने उदारता का वचन उस समय दिया जब माँग की कीमत मामूली होने की आशा थी। अब माँग भारी पड़ी है तो वही वचन कठिन लगने लगा है। वे दशरथ के दुःख में उस पहले आश्वासन से पीछे हटने की कोशिश देखती हैं।
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥
चौपाई १
अति कटु बचन कहति कैकेई । मानहुँ लोन जरे पर देई॥
कैकेयी शिबि, दधीचि और राजा बलि का नाम लेकर याद दिलाती हैं कि उन्होंने जो कहा, उसका प्रण शरीर और धन छोड़कर भी निभाया। तीनों नाम उनके तर्क में वचन के मूल्य की गवाही देते हैं। इतने बड़े त्याग का उदाहरण रख देने के बाद राजा की पीड़ा के लिये उनके शब्दों में कोई जगह नहीं बचती। तुलसी उसी क्षण जले हुए पर नमक पड़ने की उपमा देते हैं। दशरथ पहले ही दुखी हैं, और सत्य की यह कठोर दुहाई उनके घाव पर फिर से जलन डाल रही है।
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
दोहा ३०
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥ ३०॥
अब धर्म की धुरी धारण करनेवाले राजा धीरज सँभालकर आँखें खोलते हैं। सिर धुनते हैं, लम्बी साँस लेते हैं और कहते हैं कि कैकेयी ने उन्हें बड़े कुठौर मारा है। चोट की जगह ऐसी है जहाँ से बच निकलना कठिन है। कैकेयी अभी उनके वचन को तौल रही थीं; दशरथ को अपनी पूरी परिस्थिति एक घातक चोट की तरह अनुभव हो रही है। उत्तर देने से पहले नेत्र खोलने और साँस लेने का यह छोटा क्रम उनकी दशा सामने रख देता है। उन्हें बोलने के लिये पहले अपने बिखरे हुए धैर्य को समेटना पड़ रहा है।
कैकेयी भरत के पुत्र होने और अपने पत्नी होने का प्रश्न उठाती हैं, राजा से हाँ या नहीं माँगती हैं और शिबि, दधीचि तथा बलि के वचनपालन का उदाहरण देती हैं। दशरथ धीरज धरकर आँखें खोलते हैं और इस माँग को ऐसी चोट कहते हैं जिससे निकलना कठिन है।
दो आँखें, और भरत को राज्य देने का प्रस्ताव
आँखें खुलने पर सामने जो रानी दिखती हैं, तुलसी उन्हें म्यान से निकली हुई क्रोध की तलवार बना देते हैं। इस रूपक का हर अंश अलग पहचान रखता है। कुबुद्धि उसकी मूठ है, निष्ठुरता उसकी धार है और वह कुबरी रूपी सान पर तेज की गयी है। पोद्दार जी कुबरी को मन्थरा कहकर पहचानते हैं। जिस कठोरता का राजा सामना कर रहे हैं, उसमें विचार की पकड़, वाणी की काट और उसे तीखा करनेवाली प्रेरणा एक ही हथियार में इकट्ठी हो गयी है।
आगें दीखि जरत रिस भारी । मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥
चौपाई २
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई । धरी कूबरीं सान बनाई॥
राजा उस तलवार को भयानक और कठोर देखते हैं। मन में प्रश्न उठता है कि क्या सचमुच यही उनका जीवन ले लेगी। इसके बाद भी वे अपनी बात नम्रता से कहते हैं। छाती कड़ी करके ऐसी वाणी बोलते हैं जो कैकेयी को प्रिय लगे। यह प्रयास उनकी कठिनाई को और खोलता है। सामने उन्हें प्राण लेनेवाला भय दिखाई दे रहा है, फिर भी उसी रानी का मन बदलने के लिये उन्हें कोमल शब्द चुनने हैं। उनका उत्तर आरोपों की उतनी ही कठोर वापसी से शुरू नहीं होता। वे अभी प्रेम और विश्वास तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं।
रानी को प्रिय और भीरु कहकर सम्बोधित करते हुए दशरथ पूछते हैं कि विश्वास और प्रेम नष्ट करनेवाले ऐसे वचन क्यों कहे जा रहे हैं। फिर कैकेयी के पहले प्रश्न का सीधा उत्तर देते हैं। भरत और राम उनकी दो आँखें हैं। शंकर को साक्षी करके वे इसे सत्य कहते हैं। दो आँखों की उपमा में किसी एक पुत्र का स्थान दूसरे को देकर खाली नहीं हो सकता। राजा दोनों को अपने लिये समान कहते हैं, और यह बात केवल आश्वासन बनकर न रह जाये, इसके लिये अगले ही वाक्य में भरत के राज्याभिषेक का उपाय रखते हैं।
अवसि दूतु मैं पठइब प्राता । ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥
चौपाई ३
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई । देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥
वे कहते हैं कि सबेरे अवश्य दूत भेजेंगे। समाचार सुनते ही दोनों भाई शीघ्र आ जायेंगे। टीका इन दोनों भाइयों के नाम भरत और शत्रुघ्न बताती है। दशरथ का प्रस्ताव दोनों को बुलाने का है। फिर अच्छा दिन देखा जायेगा, पूरा साज सजाया जायेगा और डंका बजाकर भरत को राज्य दिया जायेगा। इस वाणी में तैयारी का क्रम है, और भरत का सम्मान भी। राजा रानी की माँग के इस हिस्से को पूरा करने के लिये अपना निर्णय स्पष्ट कर चुके हैं। दूत भेजना अभी उनकी कही हुई आगामी व्यवस्था है।
लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
दोहा ३१
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति॥ ३१॥
दशरथ इसके बाद राम का मन सामने रखते हैं। राम को राज्य का लोभ नहीं है और भरत पर उनका बहुत प्रेम है। पहले जो निर्णय किया गया था, राजा उसका कारण अपने भीतर बताते हैं। बड़े और छोटे का विचार करके वे राजधर्म की नीति निभा रहे थे। इस स्वीकार में राम की इच्छा पर कोई आरोप नहीं आता। बड़े पुत्र का अभिषेक करने का विचार स्वयं राजा का था। कैकेयी ने भरत के अधिकार का प्रश्न उठाया था, और दशरथ अब उत्तर के दोनों हिस्से दे चुके हैं: भरत उन्हें समान प्रिय हैं, और राम का प्रेम भी भरत के साथ है।
दशरथ राम और भरत को अपनी दो आँखें कहते हैं। वे सबेरे दूत भेजकर भरत और शत्रुघ्न को बुलाने तथा शुभ दिन भरत का अभिषेक करने का प्रस्ताव रखते हैं। राम को राज्य का लोभ नहीं, भरत से प्रेम है; ज्येष्ठता के अनुसार अभिषेक का पहला विचार स्वयं राजा का था।
कौसल्या ने कुछ नहीं कहा, राम का अपराध बताइये
दशरथ अपनी सफ़ाई में एक और बात बहुत स्पष्ट करते हैं। वे राम की सौ बार सौगन्ध खाकर कहते हैं कि राम की माता ने इस विषय में कभी उनसे कुछ नहीं कहा। कौसल्या को उनके निर्णय के पीछे खड़ा करने की गुंजाइश वे स्वयं बन्द करते हैं। कैकेयी से बिना पूछे सब कुछ करने की बात वे मानते हैं और कहते हैं कि उसी से उनका मनोरथ निष्फल हुआ। दोष की यह स्वीकृति अपने ऊपर है। राजा रानी की नाराज़गी को समझाने के लिये किसी और को उत्तरदायी नहीं बनाते।
राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ॥
चौपाई ४
मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें । तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥
वे अब क्रोध छोड़कर मंगल की तैयारी करने को कहते हैं। कुछ ही दिन बीतने पर भरत युवराज होंगे। वाणी में यह आश्वासन दूसरी बार आता है, मानो राजा भरत के अभिषेक वाली बात को इतना सुनिश्चित कर देना चाहते हों कि उसके सहारे दूसरी माँग बदली जा सके। उन्हें दुःख एक बात का लगा है, दूसरा वर बड़ी अड़चन का माँगा गया है। इस वाक्य में पूरे विवाद की कठिन जगह उभरती है। भरत के लिये राज्य का रास्ता वे खोल रहे हैं, पर राम के वन जाने की बात उनके हृदय में अब भी जल रही है।
राजा उस जलन को कहते भी हैं। दूसरे वर की आँच अभी तक उनके हृदय में लगी है। वे रानी से पूछते हैं कि यह बात दिल्लगी में कही गयी, क्रोध में निकली, या सचमुच की माँग है। प्रश्न में बची हुई आशा सुनाई देती है। यदि शब्द हँसी या रोष में निकले हों तो उन्हें वापस लेने की जगह हो सकती है। दशरथ उसी जगह की तलाश कर रहे हैं। वे आग्रह करते हैं कि क्रोध अलग रखकर राम का अपराध बताया जाये। सब लोग राम को बहुत साधु कहते हैं, फिर उनके लिये ऐसा दण्ड क्यों माँगा जा रहा है?
इसके लिये उन्हें केवल लोगों की कही हुई बात का सहारा नहीं लेना पड़ता। कैकेयी स्वयं भी राम की प्रशंसा करती थीं, उन पर स्नेह रखती थीं। अब उनकी यह माँग सुनकर दशरथ को उस स्नेह पर संशय हो गया है। टीका इसे राजा की शंका के रूप में खोलती है कि कहीं वह प्रशंसा और प्रेम झूठा तो न था। जो माँ अभी तक राम की सराहना करती रही है, उसी के मुँह से वनवास की बात सुनना उनके लिये समझ के बाहर है। वे उस पुराने स्नेह को पुकारकर वर्तमान हठ रोकना चाहते हैं।
राम के स्वभाव पर उनका अगला प्रश्न और भी सीधा है। जिसका आचरण शत्रु के लिये भी अनुकूल रहता है, वह अपनी माता के प्रतिकूल कैसे हो सकता है? राजा राम का पक्ष एक पुत्र के व्यवहार से खोलते हैं। वे रानी से किसी अनजाने गुण पर विश्वास करने को नहीं कह रहे; वही स्नेह और वही सराहना याद दिला रहे हैं जो कैकेयी स्वयं करती थीं। इसीलिये अपराध बताने का आग्रह बार बार लौटता है। राजा को माँग और राम के परिचित स्वभाव के बीच कोई सम्बन्ध नहीं मिल रहा।
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।
दोहा ३२
जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥ ३२॥
अन्त में वे फिर प्रिय कहकर सम्बोधित करते हैं। हँसी और क्रोध छोड़कर विवेक से वर माँगने की विनती करते हैं, ताकि अपनी आँखें भरकर भरत का राज्याभिषेक देख सकें। उनकी चाह में भरत के अभिषेक का सुख पूरी जगह लिये हुए है। उसे देख पाने के लिये राम के वनवास की माँग हटना आवश्यक हो गया है। राजा जिस मंगल की तैयारी कह रहे थे, उसी को देखने की अपनी सामर्थ्य के लिये अब रानी के विवेक से याचना कर रहे हैं।
दशरथ राम की सौ सौगन्ध खाकर कौसल्या को निर्णय की प्रेरणा से अलग बताते हैं और कैकेयी से बिना पूछे काम करने का दोष स्वीकारते हैं। वे राम का अपराध पूछते हैं तथा रानी से ऐसी माँग करने को कहते हैं जिससे वे भरत का अभिषेक आँख भरकर देख सकें।
राम के दर्शन पर टिका जीवन
भरत के अभिषेक को देखने की इच्छा कहने के बाद दशरथ अपने जीवन की शर्त खोल देते हैं। मछली चाहे पानी के बिना जी ले, मणि खोकर साँप भी दीन और दुखी जीवन काट ले, पर राम के बिना वे नहीं जी सकते। पहली दोनों सम्भावनाएँ वे इतनी दूर खींचते हैं कि अपना रामवियोग उनसे भी असह्य कह सकें। वे साथ ही स्पष्ट करते हैं कि उनके मन में कोई छल नहीं है। यह उनके स्वभाव की बात है। रानी इसे समझाने की युक्ति मान सकती हैं, इसलिये राजा अपने कथन की सच्चाई भी उसके साथ रखते हैं।
जिऐ मीन बरु बारि बिहीना । मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥
चौपाई ५
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥
वे कैकेयी को चतुर प्रिया कहकर जी में विचारने को कहते हैं। उनका जीवन राम के दर्शन के अधीन है। दर्शन का उल्लेख इस दुःख को बहुत निकट ले आता है। राम का कहीं जीवित और कुशल होना भर राजा की कही हुई आवश्यकता पूरी नहीं करेगा। उन्हें राम को देखना है। अभी वे नेत्र भरकर भरत का अभिषेक देखने की प्रार्थना कर रहे थे, अब उन्हीं नेत्रों के लिये राम के दर्शन की अनिवार्यता कहते हैं। दोनों पुत्रों को दो आँखें कहनेवाले पिता की विनती इसी देखने और जीवित रहने में आ सिमटी है।
कैकेयी पर इन कोमल वचनों का प्रभाव उलटा पड़ता है। उनकी जलन और बढ़ जाती है, मानो अग्नि में घी की आहुतियाँ पड़ रही हों। जो शब्द राजा ने मन पिघलाने के लिये कहे, वे रानी के क्रोध को पोषण दे रहे हैं। दशरथ अपनी विवशता जितनी खोलते हैं, कैकेयी उसमें उतनी ही चालबाजी देखती हैं। अब वे उस सम्भावना को भी नकार देती हैं कि राजा किसी उपाय से उनकी माँग बदलवा सकेंगे। उनके लिये विनती भी उसी प्रपंच का हिस्सा हो गयी है जिसे वे सुनना नहीं चाहतीं।
कहइ करहु किन कोटि उपाया । इहाँ न लागिहि राउरि माया॥
चौपाई ६
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं । मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥
करोड़ों उपाय कर लीजिये, कैकेयी का उत्तर है, यहाँ आपकी चाल नहीं चलेगी। जो माँगा है वह दीजिये, या नहीं करके अपयश लीजिये। बहुत बखेड़े उन्हें नहीं सुहाते। वही दो विकल्प फिर सामने रख दिये जाते हैं जिनसे प्रसंग शुरू हुआ था। राजा की बात अब तक उन विकल्पों के बीच एक तीसरा रास्ता ढूँढ़ रही थी, भरत को राज्य मिले और राम यहीं रहें। कैकेयी उस रास्ते के लिये सुनने की जगह देने को तैयार नहीं हैं। उनकी माँग अपने दोनों हिस्सों के साथ पूरी होनी चाहिये।
फिर उनकी वाणी राम, दशरथ और कौसल्या पर व्यंग्य करती है। राम साधु हैं, राजा सयाने साधु हैं, राम की माता भी भली हैं, सबको उन्होंने पहचान लिया है। कौसल्या ने उनका जैसा भला चाहा है, वे भी उन्हें याद रहने योग्य वैसा ही फल देंगी। ये कैकेयी के आरोप हैं। राजा अभी कौसल्या की प्रेरणा का स्पष्ट निषेध कर चुके हैं, और रानी अब उन्हीं कौसल्या से बदला लेने की बात कह रही हैं। सामने रखी गयी सफ़ाई उनकी धारणा को बदल नहीं सकी है।
होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।
दोहा ३३
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥ ३३॥
अब वे समय की सीमा बाँध देती हैं। सबेरा होते ही राम मुनि का वेष धारण करके वन चले जायें। ऐसा न हुआ तो उनकी मृत्यु होगी और राजा का अपयश। इसे वे मन में निश्चय कर लेने को कहती हैं। दशरथ ने सबेरे दूत भेजने का प्रस्ताव किया था; कैकेयी उसी आनेवाले सबेरे के लिये राम के प्रस्थान की शर्त रख देती हैं। राजा की वाणी में तैयारी का समय था, रानी की वाणी में अन्तिम सीमा। अभी इस संवाद में भोर आई नहीं है, पर उसकी धमकी राजा के सामने रख दी गयी है।
दशरथ अपना जीवन राम के दर्शन पर निर्भर कहते हैं। उनकी कोमलता कैकेयी का क्रोध बढ़ाती है। वे सभी उपाय ठुकराकर कौसल्या पर व्यंग्य करती हैं और कहती हैं कि भोर होते राम मुनिवेष में वन न गये तो उनका मरना और राजा का अपयश निश्चित है।
उमड़ती नदी के सामने झुकते हुए राजा
यह कहकर कैकेयी उठ खड़ी होती हैं। अब तलवार का रूपक एक उमड़ी हुई नदी में बदल जाता है। पाप उसका पहाड़ है, जहाँ से वह प्रकट हुई है। क्रोध उसका जल है, जो इतना भयानक भर आया है कि देखा नहीं जाता। राजा के सामने खड़ी हुई रानी के भीतर का रोष इस चित्र में बहने लगा है। उसकी गति कहाँ तक जायेगी, तुलसी आगे उसी नदी के किनारों, धारा और भँवर से दिखाते हैं। हठ का यह रूप केवल अड़ा हुआ नहीं है; वह रास्ते में आनेवाली वस्तु को उखाड़ता हुआ चल रहा है।
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा । भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥
चौपाई ७
ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला॥
दोनों वरदान उस नदी के दो किनारे हैं। कठिन हठ उसकी तेज धारा है। कुबरी के वचनों की प्रेरणा उसमें भँवर बनी हुई है। टीका यहाँ भी कुबरी को मन्थरा बताती है। नदी राजा रूपी वृक्ष को जड़ समेत ढहाती हुई विपत्ति के समुद्र की ओर जा रही है। किनारे उसे अपनी दिशा से हटने नहीं देते, धारा बहाव को प्रबल बनाती है, और भँवर उस वेग के भीतर दूसरी चोट जोड़ता है। दो वरदानों से बँधा क्रोध जिस समुद्र में पहुँचता है, उसका नाम ही विपत्ति है।
दशरथ अब समझ लेते हैं कि कैकेयी की बात वास्तव में सच्ची है। हँसी या क्षणिक रोष की आशा समाप्त हो गयी है। उन्हें लगता है कि पत्नी के बहाने उनकी मृत्यु सिर पर नाच रही है। इस अनुभव के बाद भी उनका अगला काम रानी को मनाना है। वे कैकेयी के चरण पकड़ते हैं, उन्हें बिठाते हैं और विनती करते हैं कि सूर्यकुल के लिये कुल्हाड़ी न बनें। अभी नदी में राजा वृक्ष थे; अब उनके शब्दों में सूर्यवंश वृक्ष है और उसे काटनेवाली कुल्हाड़ी बनने से रानी को रोका जा रहा है।
मागु माथ अबहीं देउँ तोही । राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥
चौपाई ८
राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥
विनती यहाँ उस सीमा तक पहुँचती है जहाँ राजा अपना मस्तक देने को तैयार हो जाते हैं। सिर माँग लीजिये, वे अभी दे देंगे, पर राम के विरह में उन्हें न मारिये। उनकी बात में अपने प्राणों से चिपके रहने का आग्रह ढूँढ़ना कठिन है, क्योंकि उन्हीं प्राणों का सबसे सीधा मूल्य वे स्वयं सामने रख चुके हैं। कैकेयी के पहले तर्क में शरीर देकर भी वचन निभानेवाले नाम आये थे। अब दशरथ अपने शरीर को देने की बात कह रहे हैं, पर राम का वियोग उनसे सहा नहीं जा रहा।
जिस किसी प्रकार हो, राम को रख लीजिये, राजा कहते हैं। उपाय का चुनाव भी वे रानी पर छोड़ देते हैं। उन्हें इस समय बस राम का रह जाना चाहिये। इसके बाद चेतावनी देते हैं कि ऐसा न हुआ तो कैकेयी की छाती जीवन भर जलेगी। यह राजा की कही हुई परिणति है, उस स्त्री से कही गयी जिसके चरण वे पकड़ चुके हैं। अपने हृदय की वर्तमान आँच के साथ उन्हें रानी का आनेवाला पश्चात्ताप भी दिखाई दे रहा है। वे उसे शब्द देते हैं, किन्तु कैकेयी अपनी माँग बदलती नहीं हैं।
देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।
दोहा ३४
कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥ ३४॥
राजा को रोग असाध्य दिखता है। अभी तक वे एक के बाद एक सम्भव उपचार रख रहे थे, प्रेम की याद, दोनों पुत्रों की समानता, अभिषेक की तैयारी, राम की निर्दोषता, अपना जीवन और अपना सिर। अब उसी प्रयत्न की समाप्ति रोग के असाध्य होने में कही जाती है। दशरथ सिर पीटकर भूमि पर गिर पड़ते हैं। उनकी वाणी अत्यन्त आर्त होकर राम, राम, रघुनाथ पुकारती है। तर्क की जगह नाम की यह पुकार भर रह गयी है। राजा जिस दर्शन के बिना जीवन नहीं मानते, उसी प्रिय को अपने दुःख में पुकार रहे हैं।
क्रोध की नदी राजा रूपी वृक्ष को उखाड़ती हुई विपत्ति के समुद्र की ओर जाती है। दशरथ कैकेयी के चरण पकड़कर उन्हें बिठाते हैं, अपना सिर देने को कहते हैं और किसी भी तरह राम को रोक लेने की विनती करते हैं। हठ असाध्य देखकर वे राम पुकारते हुए भूमि पर गिर पड़ते हैं।
घाव में विष और सत्य की कठोर दुहाई
गिरे हुए दशरथ की दशा अब उनके शरीर पर लिखी जाती है। वे व्याकुल हैं, सारे अंग शिथिल हैं। तुलसी उन्हें हथिनी के उखाड़े हुए कल्पवृक्ष की तरह दिखाते हैं। कल्पवृक्ष का यह गिरना उस राजा की असहायता खोलता है जो अभी भरत को राज्य देने का पूरा प्रबन्ध कह रहा था। उनका कण्ठ सूख गया है, मुँह से वाणी नहीं निकलती। वे पानी के बिना दीन मछली जैसे हैं। पोद्दार जी इस मछली का नाम पहिना बताते हैं। पहले राजा ने मछली और पानी की उपमा स्वयं दी थी; अब कवि उनकी देह की दशा उसी अभाव में दिखाते हैं।
कैकेयी फिर कटु और कठोर शब्द कहती हैं। पहले जले पर नमक का चित्र था, अब घाव में विष भरने का है। वे पूछती हैं कि अन्त में ऐसा ही करना था तो बार बार माँगने को किस बल पर कहा था। राजा की शिथिल देह और सूखे कण्ठ के सामने वे पुराने आश्वासन का हिसाब रखती हैं। उनकी दृष्टि में अभी भी प्रश्न वही है, वचन दिया गया था तो अब उसे पूरा करने में यह दशा क्यों। जिस गिरावट को हम राजा की पीड़ा में देख रहे हैं, कैकेयी उसे अपने तर्क को रोकने का कारण नहीं मानतीं।
दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥
चौपाई ९
दानि कहाउब अरु कृपनाई । होइ कि खेम कुसल रौताई॥
वे एक साथ न हो सकनेवाली बातें गिनाती हैं। ठहाका लगाकर हँसना और गाल फुलाना साथ कैसे होगा? दानी भी कहलाना है और कृपणता भी करनी है? बहादुरी दिखाने निकलें और क्षेम कुशल भी अक्षुण्ण रहे, यह कैसे हो? टीका इस आखिरी प्रश्न को युद्ध में वीरता दिखाने और कहीं चोट न लगने की चाह से समझाती है। तीनों उदाहरण राजा से एक ही उत्तर माँगते हैं। जिस यश का दावा है, उसकी चोट भी स्वीकार कीजिये। रानी की वाणी दशरथ के दुःख को उस चोट से बचना बताकर और निर्दय हो जाती है।
वे कहती हैं कि वचन छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। असहाय स्त्री की तरह रोने पीटने का उलाहना भी देती हैं। इस उपहास में रानी राजा के शोक को तुच्छ ठहरा रही हैं। उनके मुँह का यह कठोर आक्षेप उसी संवाद की चोट है। वे आगे सत्यव्रती के लिये शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी, सबको तिनके के बराबर कहा गया बताती हैं। सूची में पुत्र भी रख दिये गये हैं, और दशरथ की सारी विनती उसी पुत्रवियोग के चारों ओर घूम रही थी।
कैकेयी के तर्क में त्याग की सीमा शरीर से शुरू होकर पृथ्वी तक चली जाती है। दशरथ की बात बार बार राम के दर्शन पर लौट आती थी। अब रानी उसे भी सत्यपालन के लिये छोड़ी जा सकनेवाली वस्तुओं में गिनती हैं। यही इस उत्तर को मर्मभेदी बनाता है। शब्द ऊँचे आदर्श का सहारा लेते हैं, लेकिन जिसको सुनाये जा रहे हैं उसके सबसे कोमल स्थान पर पड़ते हैं। राजा की देह पहले ही शिथिल हो चुकी है; यह आखिरी सूची उनके हृदय पर रखी जाती है।
मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।
दोहा ३५
लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥ ३५॥
दशरथ सुनकर कहते हैं कि जो चाहें कह लें, उनका कोई दोष नहीं। राजा को अपना काल ऐसा लगता है मानो पिशाच बनकर कैकेयी को लग गया हो और वही उनसे यह सब कहला रहा हो। यह उपमा उनके असह्य अनुभव की भाषा है। वे अपने विनाश का कारण इतने निकट देख रहे हैं कि पत्नी की वाणी में अपना अन्त बोलता सुनाई देता है। अगली बात में वे उसी दुःख को अपने पाप और विपरीत विधाता से जोड़ेंगे। फिलहाल उनका उत्तर कैकेयी से दोष हटाकर अपने काल पर रखता है।
शिथिल राजा को तुलसी उखड़े कल्पवृक्ष और जलविहीन मछली की उपमा देते हैं। कैकेयी दान, वीरता और सत्यव्रत की दुहाई देकर उनके शोक पर कटु आक्षेप करती हैं। दशरथ कहते हैं कि उनका अपना काल मानो पिशाच बनकर रानी से ये वचन कहलवा रहा है।
राजा का पछतावा और रानी की चुप्पी
राजा भरत की बात फिर कहते हैं, और इस बार बहुत स्पष्ट निषेध के साथ। भरत भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। जो कुमति कैकेयी के हृदय में बस गयी है, वे उसे होनहार के वश में हुआ मानते हैं। फिर अपने पापों का परिणाम कहते हैं, जिसके कारण कुसमय में विधाता विपरीत हो गया। इस कथन में भरत पर इच्छा या षड्यन्त्र का कोई दोष नहीं रखा जाता। दशरथ अपना दुःख समझने के लिये जिन कारणों को पुकारते हैं, वे कैकेयी की कुमति, अपना पाप और प्रतिकूल होनहार हैं। भरत का मन राजा की दृष्टि में राज्य की माँग से मुक्त है।
सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई । सब गुन धाम राम प्रभुताई॥
चौपाई १०
करिहहिं भाइ सकल सेवकाई । होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥
इसके बाद दशरथ की वाणी भविष्य की ओर उठती है। वे कहते हैं कि सुहावनी अयोध्या फिर अच्छी तरह बसेगी। समस्त गुणों के धाम राम की प्रभुता होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकों में राम की बड़ाई होगी। अभी भूमि पर गिरे हुए राजा के मुँह से यह विश्वास निकल रहा है। उन्होंने भरत को राज्य देने की बात कही थी और अब राम के भावी प्रताप की बात कहते हैं। उनके कथन में भाइयों के बीच सेवा का सम्बन्ध है। अपने सामने उपस्थित विनाश के बीच भी वे अयोध्या की फिर सँवरती दशा की बात कह पाते हैं।
उस भविष्य के साथ राजा एक ऐसी बात जोड़ते हैं जो उनके अनुसार फिर कभी नहीं मिटेगी। कैकेयी का कलंक और उनका अपना पछतावा मृत्यु के बाद भी नहीं जायेगा। राम की बड़ाई और अयोध्या की सुन्दर बसावट का विश्वास कहने के बाद यह स्थायी दाग और अधिक स्पष्ट होता है। नगर के लिये वे फिर से सुख देखते हैं; अपने और कैकेयी के लिये इस घड़ी का चिह्न अमिट बताते हैं। उनके शब्द रानी को उस परिणाम तक देखने को कहते हैं जो माँग पूरी होने के बाद भी बना रहेगा।
अब दशरथ कहते हैं कि जो अच्छा लगे वही करें और मुँह छिपाकर उनकी आँखों की ओट जा बैठें। वे हाथ जोड़कर एक और प्रार्थना करते हैं। जब तक वे जीते रहें, कैकेयी फिर कुछ न कहें। जिस संवाद की शुरुआत राजा से उत्तर माँगने पर हुई थी, उसमें अब राजा रानी से मौन माँग रहे हैं। वे अब भी बोलकर उन्हें समझा रहे हैं, पर आगे की कठोर वाणी सहने की शक्ति समाप्त हो गयी है। प्रेम से मनानेवाले सम्बोधन से चलकर उनकी विनती सामने से हट जाने और चुप रहने तक पहुँच गयी है।
अन्तिम चेतावनी में राजा रानी को अभागिनी कहकर पुकारते हैं और कहते हैं कि वे बाद में पछतायेंगी। ताँत के लिये गाय मारी जा रही है। छोटी प्राप्ति के लिये इतने बड़े विनाश का यह तीखा चित्र उनका है। इससे पहले वे राम को किसी भी तरह रोक रखने की बात कह चुके हैं; अब उसी नाश को इस उपमा से समझाते हैं। लाभ का जो अंश कैकेयी पकड़े हुए हैं, दशरथ उसके लिये चुकनेवाला मूल्य असह्य देखते हैं। बहुत प्रकार से समझाकर वे फिर पूछते हैं कि ऐसा सर्वनाश क्यों किया जा रहा है।
परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।
दोहा ३६
कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु॥ ३६॥
यह कहते हुए राजा फिर धरती पर गिर पड़ते हैं। कैकेयी कुछ नहीं बोलतीं। तुलसी उनकी चुप्पी को ऐसी उपमा देते हैं मानो वे मसान जगा रही हों। पोद्दार जी टीका में इसका आशय श्मशान में बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध करने की क्रिया से समझाते हैं। यहाँ वह भयावह तुलना मौन का रंग दिखाती है। राजा की विनती पर कोई नरम उत्तर नहीं आता। उनकी बार बार की समझाइश के सामने यह चुप्पी अन्तिम बात बनकर रह जाती है, और इसी गिरे हुए राजा तथा मौन रानी पर प्रसंग ठहरता है।
दशरथ भरत को राज्य की इच्छा से सर्वथा मुक्त कहते हैं। वे राम की भावी प्रभुता और अयोध्या की फिर होनेवाली समृद्धि की बात करते हुए कैकेयी का कलंक तथा अपना पछतावा अमिट बताते हैं। अन्तिम विनती के बाद वे फिर गिरते हैं और रानी मौन रहती हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पूरी बातचीत में हम दशरथ की विनती का क्रम देखें तो हर बार राम को बचा रखने के लिये एक और सहारा सामने आता है। पहले दोनों पुत्रों की समानता, फिर भरत का अभिषेक, फिर कौसल्या की निर्दोषता, फिर राम का स्वभाव और कैकेयी का अपना पुराना स्नेह। ये सब निष्फल होते हैं तो अपना जीवन और अपना सिर तक देने का आग्रह है। राजा जिस भरत का अभिषेक नेत्र भरकर देखना चाहते हैं, उन्हीं के विषय में अन्त तक कहते हैं कि वे राज्य चाहते ही नहीं। उनकी दोनों पुत्रों के लिये कही हुई बातें साथ रहने पर ही उनकी पीड़ा पूरी सुनाई देती है।
कैकेयी के उत्तरों का क्रम भी उतना ही स्पष्ट है। वे पहले हाँ या नहीं चाहती हैं, फिर अपयश सामने रखती हैं, फिर राजा की उदारता और सत्य की प्रतिष्ठा को उनकी विनती के विरुद्ध लगा देती हैं। अन्त में वही रानी चुप हो जाती हैं, जबकि राजा अभी भी विनाश रोकने की बात कह रहे हैं। हम इस मौन तक पहुँचते हैं तो आरम्भ की चुप्पी याद आती है। वहाँ दशरथ दुःख से बोल नहीं पा रहे थे। यहाँ उनकी इतनी बातों के बाद कैकेयी की ओर से कोई उत्तर नहीं निकलता। दोनों चुप्पियों के बीच पूरी विनती खर्च हो चुकी है।
दशरथ की आँखों को राम का दर्शन चाहिये था, और वे अब कैकेयी से आँखों की ओट हो जाने को कह चुके हैं। वाणी राम को रोकने का उपाय माँगते माँगते थक गयी है। राजा फिर भूमि पर हैं। रानी की चुप्पी में उनके किसी आग्रह की स्वीकृति नहीं सुनाई देती। आनेवाली भोर की शर्त कही जा चुकी है; इस घड़ी का अन्त अभी इसी अनुत्तरित विनती में है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ३० से ३६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।