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सुमंत्र की बिदाई और केवट की नाव

रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · सुमंत्र की बिदाई और केवट की नाव

सुमंत्र की बिदाई और केवट की नाव

सुमंत्र लौटने की विनती करते हैं, सीता अपने साथ रहने का कारण कहती हैं, और गंगा के तट पर केवट चरण धोने की अनुमति माँगता है।

सबेरा होने पर दोनों भाइयों के सिर पर जटाएँ बनती हैं। सुमंत्र उन्हें देखते हैं और उनकी आँखों में जल भर आता है। महाराज का सन्देश अब भी उनके पास है: वन दिखाकर, गंगा में स्नान कराकर राम, लक्ष्मण और सीता को लौटा लाना। उसी सन्देश के साथ वे राम से प्रार्थना करते हैं। इस बिदाई में अयोध्या के बहुत से सम्बन्ध एक साथ बोल रहे हैं। पिता की चिन्ता है, मन्त्री की व्याकुलता है, सीता को लौटा लेने की आशा है, और राम का सत्य पर स्थिर रहना है।

तुलसीदास के इस प्रसंग में हर विनती का अपना उत्तर मिलता है। सीता बताती हैं कि उनके लिये सुख कहाँ है। केवट अपनी नाव और परिवार की बात कहते हुए चरण धोने का अवसर पा लेता है। गंगा सीता को आशीर्वाद देती हैं। अन्त में गुह साथ रहने की प्रार्थना करता है और उसे अनुमति मिल जाती है। कोई लौटता है, कोई साथ लिया जाता है, किसी को निर्मल भक्ति का वर मिलता है। इन सबके बीच कथा एक एक संवाद को पूरा सुनती चलती है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम सत्य के धर्म पर स्थिर, पिता की चिन्ता दूर कराने को आतुर और सेवकों की विनती सुननेवाले।
  • सीता राम के साथ रहने का अपना निश्चय कहती हैं और सास तथा ससुर को कुशल का सन्देश भेजती हैं।
  • लक्ष्मण राम के साथ जटाएँ बनाते हैं और सीता के प्रिय देवर के रूप में वनयात्रा के सहचर हैं।
  • सुमंत्र महाराज का सन्देश लाये मन्त्री, जिन्हें तीनों को छोड़कर लौटना बहुत कठिन लगता है।
  • केवट नाव से परिवार पालनेवाला, जो चरण धोकर पार उतारता है और उतराई स्वीकार नहीं करता।
  • गुह निषादराज, जो गंगा पार करके भी राम के साथ रहना और रास्ता दिखाना चाहता है।
  • गंगा सीता की प्रार्थना सुनकर कुशलपूर्वक लौटने का आशीर्वाद देनेवाली देवनदी।

सबेरा और दोनों भाइयों की जटाएँ

लक्ष्मण अपनी बात सखा से कहते हुए मोह छोड़ने और सीता तथा रघुवीर के चरणों में प्रेम लगाने की सीख देते हैं। राम के गुण कहते कहते सबेरा हो जाता है। अब जगत् को मंगल और सुख देनेवाले राम जागते हैं। बात जिस प्रेम पर पूरी हुई थी, उसी के बीच दिन का काम आरम्भ होता है। शौच के सारे कार्य करके राम स्नान करते हैं, फिर बड़ का दूध मँगाते हैं। उस दूध से छोटे भाई सहित सिर पर जटाएँ बनाते हैं।

सखा समुझि अस परिहरि मोहू । सिय रघुबीर चरन रत होहू॥
कहत राम गुन भा भिनुसारा । जागे जग मंगल सुखदारा॥

चौपाई १

जटाएँ देखकर सुमंत्र की आँखें भर आती हैं। हृदय में अत्यन्त दाह है और मुख उदास हो गया है। वे हाथ जोड़कर बहुत दीन वचन कहते हैं। उनके सामने वे दोनों भाई हैं जिन्हें लौटाकर ले जाने की आज्ञा मिली थी। सुमंत्र उसी आज्ञा को राम के सामने रखते हैं: कोसलनाथ ने कहा था कि रथ लेकर राम के साथ जाइये। वन दिखाकर और गंगा में स्नान कराकर दोनों भाइयों को शीघ्र लौटा लाइये।

राजा की बात में लौटनेवाले सभी व्यक्तियों का नाम आता है। लक्ष्मण, राम और सीता, तीनों को फिरा लाना है। सब संशय और संकोच दूर करके यह काम करना है। सुमंत्र के कथन में इसलिए केवल अपना आग्रह नहीं है। वे उस आदेश को निभाना चाहते हैं जो महाराज ने उन्हें सौंपा था। फिर भी सामने राम हैं, इसलिए अपना अगला कदम उन्हीं की आज्ञा पर रख देते हैं। महाराज ने ऐसा कहा था, अब प्रभु जैसा कहें, वे वैसा ही करेंगे।

नृप अस कहेउ गोसाइँ जस कहइ करौं बलि सोइ।
करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ॥ ९४॥

दोहा ९४

विनती करते करते मन्त्री चरणों में गिर पड़ते हैं और बालक की तरह रो देते हैं। तुलसी इस रोने को इतने सीधे रूप में कहते हैं कि सुमंत्र की सारी असमर्थता दिख जाती है। उनके पास राजा की आज्ञा है, रथ है, लौटने का प्रयोजन है, पर जिनके लिये यह सब है उन्हें साथ ले जाने का उपाय नहीं बन रहा। वे फिर तात कहकर प्रार्थना करते हैं: कृपा करके वही कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो। नगर का पूरा दुःख उनके इस छोटे से वाक्य में आ गया है।

लक्ष्मण की सीख पूरी होते होते सबेरा होता है। दोनों भाई जटाएँ बनाते हैं। सुमंत्र महाराज की तीनों को लौटा लाने की आज्ञा सुनाते हैं, चरणों में गिरकर रोते हैं और अयोध्या को अनाथ होने से बचाने की विनती करते हैं।

सत्य का धर्म और पिता के लिये सन्देश

राम मन्त्री को उठाते हैं और धैर्य देते हुए समझाते हैं। उनका सम्बोधन भी तात है। जिस व्यक्ति से वापस जाने की बात कहनी है, उसके धर्मज्ञान का सम्मान पहले रखते हैं: आपने धर्म के सारे मत छान लिये हैं। फिर उन लोगों का स्मरण कराते हैं जिन्होंने धर्म के लिये कष्ट सहे। शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चन्द्र का नाम आता है। रन्तिदेव और राजा बलि का भी। वे अनेक संकट सहकर धर्म को पकड़े रहे। राम इन नामों से सुमंत्र को उसी धर्म का स्मरण करा रहे हैं जिसे मन्त्री भली भाँति जानते हैं।

धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥
मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा॥

चौपाई २

वेद, शास्त्र और पुराणों का मत बताते हुए राम कहते हैं कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं है। वह धर्म उन्हें सहज ही मिला है। उसे छोड़ने से तीनों लोकों में अपयश फैलेगा। वे प्रतिष्ठित मनुष्य के लिये अपयश की प्राप्ति को करोड़ों मृत्यु के समान दारुण सन्ताप कहते हैं। इस उत्तर में वन का कष्ट और लौट आने का सुख तौला ही नहीं गया। राम जिस बात पर अपने निर्णय को रखते हैं, वह सत्य से जुड़े रहने का धर्म है।

मन्त्री से इतना कहते हुए उन्हें उत्तर देने का संकोच भी है। वे कहते हैं कि आपसे अधिक क्या कहें, पलटकर उत्तर देने में भी पाप के भागी होते हैं। सुमंत्र उनके हितैषी और आदरणीय हैं। उनके आग्रह को न मानने की बात राम इसी आदर के भीतर कहते हैं। धर्म का निश्चय उनके वचन में दृढ़ है और बड़े के सामने बोलने की मर्यादा भी बनी हुई है। इसके बाद वे पिता के लिये अपना सन्देश देते हैं।

पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।
चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि॥ ९५॥

दोहा ९५

पिताजी के चरण पकड़कर, करोड़ों नमस्कार के साथ, हाथ जोड़कर विनती करनी है कि वे राम की किसी बात की चिन्ता न करें। जिस पिता ने सुमंत्र को पुत्र लौटाने के लिये भेजा था, उसी पिता के पास पुत्र अपनी चिन्ता छोड़ने की प्रार्थना भेज रहा है। सन्देश पहुँचाने का ढंग भी राम बताते हैं। प्रणाम और विनय के साथ वह कहा जाये। लौटने का निर्णय बदलता नहीं, पर पिता का दुःख दूर करने की इच्छा बराबर सामने रहती है।

फिर राम स्वयं हाथ जोड़कर सुमंत्र से कहते हैं कि आप भी पिता के समान बड़े हितकारी हैं। आपका कर्तव्य हर प्रकार से वही करना है जिससे पिताजी हम लोगों के सोच में दुःख न पायें। सुमंत्र को इस प्रकार अपना स्थान भी दिया जाता है और लौटने पर करने का काम भी। उन्हें केवल रथ वापस नहीं ले जाना है। राजा के पास रहकर उनकी चिन्ता सँभालनी है। राम का उत्तर वन में रहने का धर्म कहने के बाद अयोध्या में पिता की देखभाल पर आकर ठहरता है।

राम सत्य को सर्वोपरि धर्म बताते हैं और धर्म के लिये कष्ट सहनेवालों का स्मरण कराते हैं। वे पिता को प्रणाम और निश्चिन्त रहने का सन्देश देते हैं। सुमंत्र को पिता के समान हितकारी कहकर राजा का दुःख दूर रखने का कर्तव्य सौंपते हैं।

सीता को लौटा लेने की आशा

राम और मन्त्री का संवाद सुनकर निषादराज अपने परिवार सहित व्याकुल हो जाता है। इसी बीच लक्ष्मण कुछ कड़वे वचन कहते हैं। राम उन्हें बहुत अनुचित जानकर रोक देते हैं। उन वचनों का विस्तार यहाँ नहीं खुलता। राम सकुचाकर सुमंत्र को अपनी सौगन्ध दिलाते हैं कि जाकर लक्ष्मण का यह सन्देश न कहें। पिता तक पहुँचाने के लिये अभी जो विनय दी गयी है, उसमें यह कटु बात न मिले, इस पर राम स्वयं ध्यान देते हैं।

सुमंत्र फिर राजा का अगला सन्देश कहते हैं। इस बार बात सीता की है। महाराज को लगता है कि वे वन के क्लेश सह नहीं सकेंगी। इसलिए ऐसा उपाय करना चाहिये जिससे वे अयोध्या लौट आयें। यह प्रयत्न राम और सुमंत्र, दोनों को करना है। राजा की अपनी दशा भी इस विनती में आ जाती है। सीता भी न लौटीं तो वे सर्वथा निरवलम्ब हो जायेंगे, जल के बिना मछली की तरह जीवित न रह सकेंगे।

मइकें ससुरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।
तहँ तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान॥ ९६॥

दोहा ९६

सीता के रहने के लिये महाराज दोनों घर सामने रखते हैं। मायके में भी सब सुख हैं और ससुराल में भी। जब तक यह विपत्ति बीते, तब तक जब जहाँ उनका मन माने वहाँ सुख से रहें। यह केवल एक घर में वापस बुलाने की बात नहीं है। उन्हें अपनी सुविधा से दोनों में कहीं भी रहने की छूट दी गयी है। सुमंत्र बताते हैं कि राजा ने जिस आर्तता और प्रेम से विनती की थी, वह पूरी कही नहीं जा सकती।

पिता का सन्देश सुनकर राम सीता को अनेक प्रकार से समझाते हैं। लौटने पर सास, ससुर, गुरु, प्रियजन और परिवार, सबकी चिन्ता मिटेगी। इस सीख का आधार उन्हीं लोगों का दुःख है जो उनसे प्रेम करते हैं। सीता पति के वचन सुनकर उन्हें प्राणपति और परम स्नेही कहती हैं। उनका उत्तर करुणा और विवेक की ओर ही निवेदन करता है: प्रभु करुणामय हैं और भली भाँति विचार करनेवाले हैं, इसलिए उनके और सीता के सम्बन्ध पर विचार करें।

प्रभु करुनामय परम बिबेकी । तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी॥
प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई । कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥

चौपाई ३

सीता तीन सम्बन्ध सामने रखती हैं। शरीर छोड़कर छाया को अलग कैसे रोका जा सकता है। सूर्य को छोड़कर उसकी प्रभा कहाँ जाये। चन्द्रमा को छोड़कर चाँदनी कहाँ जाये। तीनों उदाहरणों में अलग भेजी जानेवाली वस्तु का होना ही अपने आधार के साथ जुड़ा है। राम ने लौटने पर सम्बन्धियों की चिन्ता मिटने का कारण कहा था। सीता उत्तर में अपने साथ रहने का कारण कहती हैं। प्रेममयी विनती सुनाने के बाद वे मन्त्री से बोलती हैं, और वहाँ भी आदर उनके पहले वाक्य में रहता है।

राम लक्ष्मण के कटु वचन रोककर उन्हें राजा तक पहुँचाने से मना करते हैं। राजा सीता को मायके या ससुराल में सुख से रहने का प्रस्ताव भेजते हैं। राम समझाते हैं, पर सीता छाया, प्रभा और चाँदनी के उदाहरणों से साथ रहने की विनती करती हैं।

सुख के दोनों घर और वन का साथ

सीता सुमंत्र से सुहावनी वाणी में कहती हैं कि आप पिता और ससुर के समान हितकारी हैं। आपको उत्तर देना बहुत अनुचित है। फिर अपने बोलने का कारण कहती हैं: आर्त होकर ही वे सामने हुई हैं, इसलिए तात बुरा न मानें। राम ने जिस आदरणीय मन्त्री के सामने उत्तर देने का संकोच कहा था, सीता भी उन्हीं के प्रति अपना आदर प्रकट करती हैं। वे उनकी सद्भावना स्वीकार करते हुए अपना निश्चय कह रही हैं।

आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।
आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात॥ ९७॥

दोहा ९७

स्वामी के चरणकमलों के बिना जहाँ तक नाते हैं, सीता के लिये वे सब व्यर्थ हैं। इसका अर्थ वे अपने दोनों घरों के परिचय से खोलती हैं। पिता का वैभव उन्होंने देखा है। राजाओं के मणिमय मुकुट उनके चरण रखने की चौकी तक आते हैं। पोद्दारजी की टीका इसे बड़े बड़े राजाओं के प्रणाम का चित्र बताती है। ऐसे पिता का घर सभी सुखों का भण्डार है, फिर भी पति के बिना वह उनके मन को भूलकर भी नहीं भाता। मायके का प्रस्ताव उनके लिये अपरिचित सुख का प्रस्ताव नहीं था। वे उस सुख को जानती हैं और उसी का नाम लेकर अपना उत्तर देती हैं।

फिर ससुर का परिचय आता है। कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट् हैं और उनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है। इन्द्र भी आगे होकर उनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासन पर बैठने के लिये स्थान देता है। ऐसे ससुर, अयोध्या का निवास, प्रिय परिवार और माता के समान सासुएँ, सीता सबको याद करती हैं। इनमें किसी की प्रीति कम नहीं कही गयी। सभी अपने हैं, सभी सुख देनेवाले सम्बन्ध हैं। फिर भी रघुनाथ के चरणकमलों की रज के बिना इनमें से कोई उन्हें स्वप्न में भी सुखद नहीं लगता।

अब वही बात वन के सम्बन्ध में कहती हैं। दुर्गम पथ हैं, जंगली धरती है, पहाड़ हैं। हाथी और सिंह हैं, अथाह सरोवर और नदियाँ हैं। कोल और किरात, हिरन और पक्षी भी हैं। प्राणपति साथ होंगे तो सीता को ये सब सुख देंगे। उनके कथन में वन का कठिन रास्ता भी है और वहाँ रहनेवाले समुदाय तथा जीव भी। जिस वन के क्लेश का भय महाराज ने कहा था, सीता उसी वन को राम के साथ रहने पर सुखद कहती हैं।

सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।
मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ॥ ९८॥

दोहा ९८

उनका सन्देश बहुत स्पष्ट है। सुमंत्र सास और ससुर के पाँव पड़कर उनकी ओर से विनती करें कि वे कुछ भी सोच न करें। सीता वन में स्वभाव से सुखी हैं। आगे वे अपने साथियों का परिचय फिर देती हैं: प्राणनाथ और प्रिय देवर साथ हैं। दोनों वीरों में अग्रगण्य हैं और धनुष तथा तरकश धारण किये हुए हैं। उनके रहते सीता को रास्ते की थकावट नहीं, भ्रम नहीं और मन में दुःख नहीं। उनके लिये भूलकर भी चिन्ता न की जाये।

सीता के उत्तर का यह अन्त उनके आरम्भ को पूरा कर देता है। पहले उन्होंने साथ से अलग न होने का कारण बताया था, अब साथ रहते हुए अपनी कुशल कह दी। घर के लोगों के प्रति आदर, अपने निश्चय की दृढ़ता और वन में सुखी रहने का विश्वास एक ही सन्देश में हैं। सुमंत्र से वे इन सभी बातों को उनके पास पहुँचाने की विनती करती हैं।

सीता पिता का वैभव, ससुर का प्रभाव, माता जैसी सासुएँ और प्रिय परिवार, सबको याद करती हैं। राम के बिना ये सुख नहीं देते। राम और लक्ष्मण के साथ वे वन में सुखी हैं, उन्हें थकान, भ्रम या दुःख नहीं, और यही कुशल घर पहुँचाने को कहती हैं।

मन्त्री लौटते हैं, घोड़े देखते रह जाते हैं

सीता की वाणी शीतल है, पर उसे सुनकर सुमंत्र की व्याकुलता बहुत बढ़ जाती है। तुलसी मणि खो चुके साँप की उपमा देते हैं। नेत्रों से कुछ सूझता नहीं, कानों से सुनायी नहीं देता, और मन्त्री कुछ कह भी नहीं पाते। सीता ने अपनी कुशल कह दी है, उनके लौटने की आशा भी समाप्त हो गयी है। जिन्हें लेकर अयोध्या जाना था, उन तीनों से बिछुड़ने की घड़ी सुमंत्र के सामने आ गयी है।

राम अनेक प्रकार से उन्हें समझाते हैं, फिर भी उनकी छाती शीतल नहीं होती। मन्त्री अब साथ चलने के लिये यत्न करते हैं। एक के बाद दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं और रघुनन्दन सबका उचित उत्तर देते जाते हैं। वे युक्तियाँ यहाँ अलग अलग नहीं कही गयीं। इतना स्पष्ट है कि सुमंत्र साथ रहने का उपाय खोजते हैं और राम की आज्ञा लौटने की बनी रहती है।

राम की आज्ञा मिटायी नहीं जा सकती। तुलसी कर्म की गति को कठिन कहते हैं, जिस पर कुछ वश नहीं चलता। अन्त में सुमंत्र राम, लक्ष्मण और सीता, तीनों के चरणों में सिर नवाकर लौट पड़ते हैं। उनकी दशा उस व्यापारी जैसी कही गयी है जो अपना मूलधन गँवाकर लौट रहा हो। यह उपमा उनके लिये बिदाई का मूल्य बता देती है। जिसे साथ ले जाना सबसे आवश्यक था, वही साथ नहीं जा रहा।

रथु हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।
देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं॥ ९९॥

दोहा ९९

सुमंत्र रथ हाँकते हैं। घोड़े राम की ओर बार बार देखकर हिनहिनाते हैं। निषाद लोग यह दशा देखकर विषाद में सिर धुनते और पछताते हैं। पशुओं का यह वियोग देखकर कवि पूछते हैं कि जब उनकी ऐसी व्याकुलता है तो प्रजा, माता और पिता कैसे जीवित रहेंगे। राम किसी तरह सुमंत्र को लौटाते हैं और फिर स्वयं गंगा के तीर पर आते हैं। रथ की बिदाई हो चुकी है। अब सामने नदी पार करने का काम है।

सुमंत्र की साथ रहने की युक्तियों का राम उचित उत्तर देते हैं। मन्त्री तीनों को प्रणाम करके लौटते हैं। घोड़े राम को देखकर हिनहिनाते हैं और निषाद लोग दुःखी होते हैं। सुमंत्र को भेजकर राम गंगा के तट पर आते हैं।

नाव की रक्षा के लिये चरण धोने की शर्त

राम नाव माँगते हैं, केवट उसे लाता नहीं। वह कहता है कि प्रभु का भेद जान गया है। सब लोग उनके चरणकमलों की धूल के बारे में कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है। उसी के छूने से पत्थर की शिला सुन्दर स्त्री हो गयी। केवट अपनी नाव पर यही बात लगाता है। नाव काठ की है और काठ पत्थर से अधिक कठोर तो है नहीं। वह भी मुनि की पत्नी हो गयी तो नाव हाथ से जाती रहेगी।

इस आशंका को वह अपनी रोजी से जोड़ता है। नाव गयी तो कमाने खाने का रास्ता भी गया। पोद्दारजी की टीका इस कथन का एक दूसरा आशय भी देती है: रास्ता रुक जायेगा, प्रभु पार न हो सकेंगे और केवट की जीविका जाती रहेगी। दोनों तरह बात नाव पर आकर टिकती है। इसी से वह सारे परिवार का पालन करता है और इसके सिवा कोई दूसरा धन्धा नहीं जानता। परिवार की यह बात उसकी प्रार्थना में पूरी जगह पाती है।

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू । नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥
जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू । मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥

चौपाई ४

वह अपना उपाय भी साथ रख देता है। यदि प्रभु को पार जाना ही है तो पहले उसे चरणकमल पखारने की अनुमति दें। धूल की जिस शक्ति को उसने नाव के लिये संकट बताया है, उसी के कारण चरण धोने की सेवा माँगता है। नाव, परिवार और अपने काम का परिचय देते देते उसकी बात इस अनुमति पर आ पहुँची है। फिर छन्द में वह अपनी शर्त और भी स्पष्ट कहता है।

पद कमल धोइ चढ़इ नाव न नाथ उतराई चहौं।
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं॥
बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

छन्द, सोरठा १०० से पूर्व

चरण धोकर वह सबको नाव पर चढ़ा लेगा और उतराई भी नहीं चाहेगा। राम की दुहाई और दशरथ की सौगन्ध देकर कहता है कि सारी बात सच है। लक्ष्मण भले उसे तीर मारें, पर जब तक पैर पखार न ले, तब तक पार नहीं उतारेगा। यह तीर की बात केवट की अपनी शर्त के भीतर है। उसका आग्रह इतना है कि वह इस सम्भावना तक को बोल देता है। लक्ष्मण की ओर से कोई ऐसी क्रिया यहाँ नहीं होती।

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥ १००॥

सोरठा १००

कवि केवट के वचनों को प्रेम में लिपटे हुए अटपटे वचन कहते हैं। राम जानकी और लक्ष्मण की ओर देखकर हँसते हैं। फिर मुसकराकर उसी नाव की चिन्ता का उत्तर देते हैं जिसे केवट ने सामने रखा था: वही कीजिये जिससे नाव न जाये। जल्दी जल ले आइये और पैर धो लीजिये। देर हो रही है, पार उतारिये। इस उत्तर से केवट का सारा आग्रह स्वीकार हो गया है। जिस काम के लिये नाव रोक रखी थी, अब उसी काम की आज्ञा मिल गयी।

केवट नाव और परिवार की जीविका का हवाला देकर चरण धोने की शर्त रखता है। वह उतराई न लेने की बात भी कहता है। प्रेम से भरे उसके अटपटे वचन सुनकर राम हँसते हैं और जल्दी जल लाकर पैर धोने को कहते हैं।

पहले चरणोदक, फिर गंगा पार

इस आज्ञा के बीच तुलसी राम की महिमा स्मरण कराते हैं। जिनका नाम एक बार स्मरण करने से मनुष्य अपार भवसागर पार कर जाते हैं, वही कृपालु यहाँ केवट का निहोरा कर रहे हैं। उन्होंने जगत् को तीन पग से छोटा कर दिया था। पोद्दारजी की टीका इसे वामनावतार का संकेत कहकर खोलती है, जब दो ही पग में त्रिलोकी नाप ली गयी थी। कवि की बात में उस महिमा के साथ गंगा पार कराने का यह निवेदन रखा है।

प्रभु के वचन सुनकर गंगा की बुद्धि भी मोह में पड़ गयी थी। पोद्दारजी की टीका बताती है कि भगवान् होकर केवट से पार उतारने का निहोरा करना उनके लिये विस्मय का कारण बना। फिर चरणों के नख देखकर वे हर्षित होती हैं। टीका में वे नख गंगा की अपनी उत्पत्ति के स्थान के रूप में पहचाने गये हैं। उन्हें पहचानकर गंगा समझती हैं कि यह भगवान् की नरलीला है। मोह मिटता है और इन चरणों का स्पर्श पाने का आनन्द होता है।

केवट आज्ञा पाकर काठ के कठौते में जल भर लाता है। अत्यन्त आनन्द है, अनुराग उमड़ रहा है और वह चरणकमल धोने लगता है। देवता फूल बरसाते हैं। वे उसके पुण्य की सराहना करते हैं कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं। जिस सेवा को केवट ने नाव बचाने के उपाय की तरह माँगा था, उस सेवा का यह गौरव देवताओं के कथन में खुलता है। उसके लिये मिली हुई अनुमति अब चरण धोने का प्रत्यक्ष सुख बन गयी है।

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥ १०१॥

दोहा १०१

चरण धोने के बाद वह उस जल को स्वयं पीता है और उसके साथ सारा परिवार भी पीता है। इसी से पहले उसके पितर भवसागर से पार होते हैं। पोद्दारजी की टीका इसे उस महान् पुण्य का फल कहती है। फिर वह आनन्दपूर्वक प्रभु को गंगा पार ले जाता है। दोहे में दोनों पार होना अलग क्रम से रखे हैं। चरणोदक का पान और पितरों का उद्धार हो लेने के बाद नाव की यात्रा होती है। परिवार जिसके पालन की बात उसने कही थी, वही परिवार अब चरणोदक के इस प्रसाद में साथ है।

पार पहुँचकर सीता, राम, गुह और लक्ष्मण नाव से उतरते हैं और गंगा की बालू में खड़े होते हैं। गुह भी उनके साथ पार आया है। केवट उतरकर दण्डवत् करता है। राम को संकोच होता है कि उसे कुछ दिया नहीं। नदी पार करने का काम पूरा हो चुका है और अब राम की चिन्ता उस सेवा का प्रतिदान देने की है। नाव माँगने से आरम्भ हुई बातचीत दूसरे तट पर भी आगे चलती है।

केवट कठौते में जल लाकर चरण धोता है। परिवार सहित चरणोदक पीता है और पहले पितरों को पार करता है, फिर प्रभु को गंगा पार ले जाता है। सीता, राम, गुह और लक्ष्मण उतरते हैं। राम को केवट को कुछ न देने का संकोच होता है।

अँगूठी और निर्मल भक्ति का वर

सीता पति का हृदय जाननेवाली हैं। वे प्रसन्न मन से अपनी रत्नजटित अँगूठी उतार देती हैं। राम के मन में केवट को कुछ देने का संकोच आया है और सीता ने उसके लिये वस्तु दे दी है। फिर राम केवट से उतराई लेने को कहते हैं। पहले तट पर वह स्वयं कह चुका था कि उतराई नहीं चाहता। दूसरे तट पर अब प्रभु उसे देना चाहते हैं।

पिय हिय की सिय जाननिहारी । मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई । केवट चरन गहे अकुलाई॥

चौपाई ५

केवट व्याकुल होकर चरण पकड़ लेता है। उसके उत्तर में आज के दिन की उपलब्धि है: नाथ, आज ऐसा क्या है जो उसने नहीं पाया। दोष मिट गये, दुःख मिट गये और दरिद्रता की आग बुझ गयी। बहुत समय तक उसने मजदूरी की है। आज विधाता ने बहुत अच्छी और भरपूर मजदूरी दे दी। वह अपनी सेवा का मूल्य उसी प्राप्त आनन्द और कृपा में देख रहा है। अँगूठी सामने है, पर उसके कथन में पाने का काम पहले ही पूरा हो चुका है।

वह दीनदयाल से कहता है कि उनकी कृपा से अब उसे कुछ नहीं चाहिये। फिर लौटती बार की बात जोड़ता है। उस समय प्रभु जो देंगे, वह प्रसाद मानकर सिर पर रख लेगा। इस वचन में उनका फिर आना भी है और उनके दिये को स्वीकार करने की इच्छा भी। आज की उतराई वह नहीं लेता, लौटने पर मिलनेवाली वस्तु को प्रसाद कहकर ग्रहण करने की बात कहता है।

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ॥ १०२॥

दोहा १०२

राम, लक्ष्मण और सीता, तीनों बहुत आग्रह करते हैं। केवट कुछ स्वीकार नहीं करता। अन्त में करुणा के धाम राम निर्मल भक्ति का वर देकर उसे विदा करते हैं। प्रार्थना की शुरुआत चरण धोने की अनुमति से हुई थी और बिदाई में भक्ति मिली। उसके बीच नाव से पालन होनेवाला परिवार भी चरणोदक पा चुका है, पितर पार हो चुके हैं और चारों यात्री इस तट पर पहुँच चुके हैं। केवट का काम अपने सभी फलों के साथ पूरा होता है।

सीता रत्नजटित अँगूठी उतारती हैं और राम उतराई देते हैं। केवट अपनी मजदूरी कृपा में पूरी मिल जाने की बात कहता है तथा लौटती बार प्रसाद लेने का निवेदन करता है। तीनों के आग्रह पर भी कुछ नहीं लेता। राम निर्मल भक्ति का वर देकर उसे विदा करते हैं।

सीता की विनती और जल से उठी वाणी

केवट की बिदाई के बाद राम स्नान करते हैं। मिट्टी के शिवलिंग की पार्थिव पूजा करके शिवजी को मस्तक नवाते हैं। फिर सीता हाथ जोड़कर गंगा से प्रार्थना करती हैं। वे उन्हें माता कहती हैं और अपना मनोरथ पूरा करने को कहती हैं: पति और देवर के साथ कुशलपूर्वक लौट आयें, जिससे आकर गंगा की पूजा कर सकें। अभी आगे वन का मार्ग है। सीता की विनती लौटने की कुशल और लौटकर की जानेवाली पूजा, दोनों को एक साथ कहती है।

उनकी प्रार्थना प्रेमरस में सनी हुई है। उसे सुनकर गंगा के निर्मल जल से श्रेष्ठ वाणी होती है। उत्तर में रघुवीर की प्रियतमा वैदेही को सम्बोधित किया जाता है। वाणी कहती है कि जगत् में ऐसा कौन है जो उनका प्रभाव न जानता हो। उनके देखने से लोग लोकपाल हो जाते हैं और सारी सिद्धियाँ हाथ जोड़कर उनकी सेवा करती हैं। यह सीता के प्रभाव का गंगा द्वारा किया हुआ कथन है, जो माता से आशीर्वाद माँगनेवाली उनकी विनती के उत्तर में आता है।

गंगा आगे कहती हैं कि सीता ने इतनी विनती सुनाकर उन पर कृपा की है और उन्हें बड़ाई दी है। फिर भी वे देवी को आशीर्वाद देंगी, अपनी वाणी सफल करने के लिये। यहाँ वर देनेवाली नदी स्वयं इस विनती को अपने ऊपर हुआ अनुग्रह कहती है। सीता ने माता कहकर माँगा था। गंगा उनकी महिमा स्वीकार करके आशीर्वाद देती हैं। विनय और आदर दोनों ओर से व्यक्त होते हैं।

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।
पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ॥ १०३॥

दोहा १०३

आशीर्वाद में सीता अकेली नहीं हैं। वे अपने प्राणनाथ और देवर सहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटेंगी। उनकी सारी मनोकामनाएँ पूरी होंगी और सुन्दर यश जगत् में छा जायेगा। यही उनकी प्रार्थना का पहला भाग था, सबके साथ कुशल लौटना। गंगा उसे स्वीकार करने के साथ मनोकामनाओं की पूर्ति और यश का आशीष भी देती हैं। मंगल के मूल इन वचनों को सुनकर और देवनदी को अनुकूल पाकर सीता आनन्दित होती हैं।

राम स्नान और पार्थिव शिवपूजा करते हैं। सीता गंगा से पति तथा देवर सहित कुशल लौटकर पूजा करने का मनोरथ कहती हैं। गंगा उनकी महिमा स्वीकार करती हैं और अपनी वाणी सफल करने के लिये कुशल वापसी, मनोकामना की पूर्ति तथा यश का आशीर्वाद देती हैं।

गुह को साथ रहने की अनुमति

अब राम गुह से घर जाने को कहते हैं। सुनते ही निषादराज का मुख सूख जाता है और हृदय में दाह होता है। वह हाथ जोड़कर दीन वचन कहता है। रघुकुलमणि उसकी विनती सुनें। वह उनके साथ रहकर रास्ता दिखाना चाहता है और कुछ दिन चरणों की सेवा करना चाहता है। गंगा पार कर लेने से उसकी सेवा की इच्छा पूरी नहीं हुई है। उसके निवेदन में आगे के पथ पर साथ देने का काम भी है।

जिस वन में राम जाकर रहेंगे, गुह वहाँ सुन्दर पर्णकुटी बना देगा। उसके बाद प्रभु जैसी आज्ञा देंगे, वह वैसा ही करेगा। रघुवीर की दुहाई देकर वह यह वचन कहता है। उसकी प्रार्थना में साथ चलना, पथ दिखाना, कुछ दिन सेवा करना और निवास के लिये पत्तों की कुटिया बनाना, सब आते हैं। फिर आज्ञा मानकर लौटने की बात भी उसी में रहती है। वह प्रभु की आज्ञा के भीतर अपने लिये थोड़ी और सेवा चाहता है।

राम उसका सहज प्रेम देखते हैं और साथ ले लेते हैं। गुह का हृदय हर्ष से भर जाता है। फिर वह अपने लोगों को बुलाता है, उन्हें सन्तुष्ट करता है और विदा देता है। साथ रहने की अनुमति उसे मिली है। उसके जाति बन्धु समझाये और विदा किये जाते हैं। इस बिदाई के बाद यात्रा का अगला समूह स्पष्ट हो जाता है।

तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।
सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ॥ १०४॥

दोहा १०४

राम गणपति और शिव का स्मरण करते हैं, गंगा को सिर नवाते हैं और वन को चलते हैं। साथ में सखा गुह है, छोटे भाई लक्ष्मण हैं और सीता हैं। यही इस प्रसंग की अन्तिम गति है। नदी पार हो चुकी, केवट को वर देकर विदा किया जा चुका और गंगा का आशीर्वाद मिल चुका है। अब चारों साथ वन के मार्ग पर प्रस्थान करते हैं।

गुह पथ दिखाने, कुछ दिन सेवा करने और पर्णकुटी बनाने की विनती करता है। राम उसका सहज प्रेम देखकर उसे साथ लेते हैं। गुह अपने लोगों को सन्तुष्ट करके विदा करता है। गणेश और शिव का स्मरण तथा गंगा को प्रणाम करके राम तीनों सहचरों सहित वन को चलते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग में साथ रहने की इच्छा बार बार आती है, पर हर व्यक्ति अपनी बात अलग तरह से रखता है। सुमंत्र राजा के सन्देश से आरम्भ करते हैं और अन्त में स्वयं साथ चलने की युक्तियाँ देते हैं। सीता छाया, प्रभा और चाँदनी से अपना सम्बन्ध समझाती हैं, फिर अपने सुख की पूरी बात कहती हैं। गुह मार्ग दिखाने और पर्णकुटी बनाने की सेवा माँगता है। इन वचनों को ध्यान से सुनें तो सभी का प्रेम अपने कार्य और अपने सम्बन्ध के साथ उपस्थित है।

राम के उत्तर भी उन्हीं अलग सम्बन्धों के अनुरूप हैं। मन्त्री को पिता की चिन्ता दूर रखने का कर्तव्य दिया जाता है। केवट की सेवा स्वीकार होती है और बिदाई में निर्मल भक्ति का वर मिलता है। गुह का सहज स्नेह देखकर उसे साथ ले लिया जाता है। सीता के सन्देश में घर के दोनों सुखपूर्ण आश्रयों का आदर बना रहता है और अपने वनसुख की बात भी पूरी रहती है। बिदाई के दुःख में भी किसी की विनती अधसुनी नहीं छूटती।

सुमंत्र के रथ से गंगा की नाव तक आते हुए सेवा का रूप बदलता है। मन्त्री को लौटकर पिता का दुःख सँभालने का दायित्व मिला है, केवट चरण धोकर पार उतारता है, गुह आगे का मार्ग दिखाने के लिये साथ चलता है। इन सबके बीच सीता अपने प्रियजनों को निश्चिन्त रहने का सन्देश देती हैं और माता गंगा से सबकी कुशल माँगती हैं। अन्तिम दोहे में राम, सीता, लक्ष्मण और गुह वन को चले जाते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा ९४ से १०४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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