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रामचरितमानसअयोध्याकाण्डप्रसंग 12
सुमंत्र की बिदाई और केवट की नाव
सुमंत्र लौटने की विनती करते हैं, और सीता अपने साथ रहने का कारण कहती हैं। गंगा के तट पर केवट चरण धोने की अनुमति माँगता है।
सबेरा होने पर दोनों भाई सिर पर जटाएँ बनाते हैं। सुमंत्र उन्हें देखते हैं और उनकी आँखें भर आती हैं। महाराज का सन्देश उनके पास है: वन दिखाकर, गंगा में स्नान कराकर लक्ष्मण, राम और सीता को लौटा लाना। उसी सन्देश के साथ वे राम से प्रार्थना करते हैं।
इस प्रसंग में राम मन्त्री को उठाकर समझाते हैं, और कहते हैं कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं। वे मन्त्री के हाथ पिता को विनती भेजते हैं। सीता पहले राम से, फिर मन्त्री से बोलती हैं। मन्त्री लौटते हैं और रथ हाँक ले जाते हैं। केवट राम के चरण धोकर उन्हें पार ले जाता है। वह उतराई नहीं लेता, और राम उसे वर देते हैं। सीता गंगा से विनती करती हैं, और जल से आयी वाणी उन्हें आशीर्वाद देती है। गुह साथ रहने की विनती करते हैं, और राम उन्हें साथ ले लेते हैं।
मन्त्री, केवट, गुह और गंगा
- राम सत्य के धर्म पर स्थिर। वे पिता को चिन्ता न करने की विनती भेजते हैं, केवट को चरण धोने को कहते हैं, और गुह को साथ ले लेते हैं।
- सीता राम के साथ रहने का अपना निश्चय कहती हैं और सास और ससुर से अपनी चिन्ता न करने की विनती भिजवाती हैं।
- लक्ष्मण राम के साथ जटाएँ बनाते हैं। सीता के प्रिय देवर और वनयात्रा के साथी हैं।
- सुमंत्र महाराज का सन्देश लाये मन्त्री, जिन्हें तीनों को छोड़कर लौटना बहुत कठिन लगता है।
- केवट नाव से परिवार पालनेवाला, जो चरण धोकर पार उतारता है और उतराई स्वीकार नहीं करता।
- गुह अपने परिवार सहित व्याकुल होते हैं। वे गंगा पार राम के साथ रहने, रास्ता दिखाने और पर्णकुटी बनाने की विनती करते हैं, और साथ ले लिये जाते हैं।
- गंगा सीता की प्रार्थना सुनकर कुशल लौटने का आशीर्वाद देनेवाली देवनदी।
सबेरा और दोनों भाइयों की जटाएँ
लक्ष्मण अपने सखा से कहते हैं कि ऐसा समझकर मोह छोड़िये और सीता और राम के चरणों में प्रेम लगाइये। राम के गुण कहते कहते सबेरा हो जाता है, और राम जागते हैं। शौच के सारे काम करके वे स्नान करते हैं। पवित्र और सुजान राम बड़ का दूध मँगाते हैं, और छोटे भाई सहित सिर पर जटाएँ बनाते हैं।
जटाएँ देखकर सुमंत्र की आँखें भर आती हैं। हृदय में अत्यन्त दाह है और मुख उदास हो गया है। वे हाथ जोड़कर बहुत दीन वचन कहते हैं कि महाराज दशरथ ने ऐसा कहा था: रथ लेकर राम के साथ जाइये। वन दिखाकर और गंगा में स्नान कराकर दोनों भाइयों को जल्दी लौटा लाइये।
सब संशय और संकोच दूर करके लक्ष्मण, राम और सीता, तीनों को लौटा लाना है। सुमंत्र कहते हैं कि महाराज ने ऐसा कहा था। स्वामी जैसा कहें, मैं वही करूँगा।
विनती करते करते मन्त्री चरणों में गिर पड़ते हैं और बालक की तरह रो देते हैं। फिर तात कहकर प्रार्थना करते हैं कि कृपा करके वही कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो।
सत्य का धर्म और पिता के लिये सन्देश
राम मन्त्री को उठाते हैं और तात कहकर समझाते हैं: आपने धर्म के सारे मत छान लिये हैं। शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चन्द्र ने धर्म के लिये करोड़ों कष्ट सहे। सुजान राजा रन्तिदेव और बलि अनेक संकट सहते हुए धर्म को पकड़े रहे।
राम कहते हैं कि आगम, वेद और पुराण बखानते हैं: सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं है। वह धर्म उन्हें सहज ही मिला है। उसे छोड़ने से तीनों लोकों में अपयश छा जाता है। प्रतिष्ठित मनुष्य के लिये अपयश का लाभ करोड़ों मृत्यु के समान दारुण दाह है।
फिर वे कहते हैं कि आपसे अधिक क्या कहूँ, पलटकर उत्तर देने में पाप का भागी होता हूँ। इसके बाद वे पिता के लिये अपना सन्देश देते हैं।
पिता के चरण पकड़कर, करोड़ों नमस्कार के साथ, हाथ जोड़कर उनसे विनती करनी है कि वे राम की किसी बात की चिन्ता न करें।
फिर राम हाथ जोड़कर सुमंत्र से कहते हैं कि आप पिता के समान मेरे बड़े हितैषी हैं। आपका कर्तव्य हर प्रकार से वही करना है जिससे पिताजी हम लोगों के सोच में दुःख न पायें।
सीता को लौटा लेने की आशा
राम और मन्त्री की बातचीत सुनकर गुह अपने परिवार सहित व्याकुल हो जाते हैं। फिर लक्ष्मण कुछ कड़वे वचन कहते हैं। राम उन्हें बहुत अनुचित जानकर रोक देते हैं। फिर राम सकुचाकर सुमंत्र को अपनी सौगन्ध दिलाते हैं कि जाकर लक्ष्मण का सन्देश न कहें।
सुमंत्र फिर राजा का सन्देश कहते हैं कि सीता वन के क्लेश सह नहीं सकेंगी। जिस तरह सीता अयोध्या लौट आयें, वही राम को और सुमंत्र को करना है। नहीं तो राजा बिलकुल बेसहारा होकर, जल के बिना मछली की तरह, जीवित न रहेंगे।
सीता के मायके में भी सब सुख हैं और ससुराल में भी। जब तक विपत्ति न बीते, तब तक जब और जहाँ उनका मन माने, वहाँ वे सुख से रहेंगी। राजा ने जिस आर्तता और प्रेम से विनती की, वह कही नहीं जा सकती।
पिता का सन्देश सुनकर राम सीता को करोड़ों प्रकार से सीख देते हैं कि आप लौट जायें तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन और परिवार, सबकी चिन्ता मिट जाये। पति के वचन सुनकर सीता उन्हें प्राणपति और परम स्नेही कहकर कहती हैं: आप करुणामय और परम विवेकी हैं।
शरीर को छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी जा सकती है? सूर्य को छोड़कर उसकी प्रभा कहाँ जाये? चन्द्रमा को छोड़कर चाँदनी कहाँ जाये? फिर वे मन्त्री से बोलती हैं।
सुख के दोनों घर और वन का साथ
पति को प्रेम भरी विनती सुनाकर सीता सुमंत्र से सुहावनी वाणी में कहती हैं कि आप मेरे पिता और ससुर के समान हितकारी हैं। आपको पलटकर उत्तर देना बहुत अनुचित है। आर्ति के वश मैं आपके सामने आयी हूँ। तात, बुरा न मानियेगा।
आर्यपुत्र के चरणकमलों के बिना, वे कहती हैं, जहाँ तक नाते हैं, सब उनके लिये व्यर्थ हैं। पिता का वैभव उन्होंने देखा है: श्रेष्ठ राजाओं के मुकुट उनके चरण रखने की चौकी से मिलते हैं। पोद्दार की टीका इसे बड़े बड़े राजाओं के प्रणाम का चित्र बताती है। सुखों का भण्डार ऐसा पिता का घर पति के बिना उनके मन को भूलकर भी नहीं भाता।
ससुर दशरथ कोसल के राजा और चक्रवर्ती सम्राट् हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है। इन्द्र आगे होकर उनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासन पर बैठने का स्थान देता है। ऐसे ससुर, अयोध्या का निवास, प्रिय परिवार और माता के समान सासुएँ। इनमें से कोई भी राम के चरणों की धूल के बिना उन्हें स्वप्न में भी सुखद नहीं लगता।
दुर्गम रास्ते, जंगली धरती, पहाड़, हाथी और सिंह, अथाह सरोवर और नदियाँ, कोल और किरात, हिरन और पक्षी। प्राणपति के संग ये सब सीता को सुख देनेवाले हैं।
सुमंत्र सास और ससुर के पाँव पड़कर उनकी ओर से विनती करें कि वे कुछ भी सोच न करें। सीता वन में स्वभाव से सुखी हैं। प्राणनाथ और प्रिय देवर साथ हैं, दोनों वीरों में अग्रगण्य और धनुष और तरकश धारण किये हुए। उन्हें न रास्ते की थकावट है, न भ्रम, न मन में कोई दुःख। उनके लिये भूलकर भी चिन्ता न की जाये।
मन्त्री लौटते हैं, घोड़े देखते रह जाते हैं
सीता की शीतल वाणी सुनकर सुमंत्र व्याकुल हो जाते हैं, मानो साँप की मणि खो गयी हो। आँखों से कुछ सूझता नहीं, कानों से सुनायी नहीं देता। वे बहुत अकुला जाते हैं, और कुछ कह नहीं पाते।
राम अनेक प्रकार से उन्हें समझाते हैं, फिर भी उनकी छाती ठंडी नहीं होती। मन्त्री साथ चलने के लिये अनेक यत्न करते हैं, और राम सबके उचित उत्तर देते हैं।
राम की आज्ञा मिटायी नहीं जा सकती। कर्म की गति कठिन है, उस पर कुछ वश नहीं चलता। सुमंत्र राम, लक्ष्मण और सीता, तीनों के चरणों में सिर नवाकर ऐसे लौटते हैं जैसे कोई व्यापारी अपना मूलधन गँवाकर लौट रहा हो।
सुमंत्र रथ हाँकते हैं। घोड़े राम की ओर बार बार देखकर हिनहिनाते हैं। यह देखकर निषाद लोग विषाद के वश सिर धुनते और पछताते हैं। जिनके वियोग में पशु ऐसे व्याकुल हैं, उनके बिना प्रजा, माता और पिता कैसे जीवित रहेंगे? राम सुमंत्र को बलपूर्वक लौटाते हैं, और तब स्वयं गंगा के तीर पर आते हैं।
नाव की रक्षा के लिये चरण धोने की शर्त
राम नाव माँगते हैं। केवट नाव नहीं लाता। वह कहता है कि मैं आपका भेद जान गया हूँ। सब लोग आपके चरणकमलों की धूल के बारे में कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है। उसके छूते ही शिला सुन्दर स्त्री हो गयी। पत्थर से काठ कठोर नहीं होता। मेरी नाव भी मुनि की पत्नी हो जायेगी। मैं लुट जाऊँगा, और मेरी नाव उड़ जायेगी।
पोद्दार की टीका इसका एक दूसरा अर्थ भी देती है: रास्ता रुक जायेगा, आप पार न हो सकेंगे और केवट की रोजी मारी जायेगी। इसी नाव से वह सारे परिवार का पालन करता है। कोई दूसरा धन्धा वह नहीं जानता।
फिर वह कहता है कि प्रभु, यदि आपको पार जाना ही है, तो मुझे चरणकमल पखारने को कहिये।
चरण धोकर वह नाव पर चढ़ायेगा, और उतराई नहीं चाहता। राम की दुहाई और दशरथ की सौगन्ध खाकर कहता है कि सब सच कह रहा है। लक्ष्मण भले उसे तीर मारें, पर जब तक पैर पखार न ले, तब तक पार नहीं उतारेगा।
केवट के प्रेम में लिपटे अटपटे वचन सुनकर राम सीता और लक्ष्मण की ओर देखकर हँसते हैं। फिर वे मुसकराकर केवट से कहते हैं: वही कीजिये जिससे आपकी नाव न जाये। जल्दी जल ले आइये और पैर धो लीजिये। देर हो रही है, पार उतारिये।
पहले चरणोदक, फिर गंगा पार
जिनका नाम एक बार स्मरण करने से मनुष्य अपार भवसागर पार कर जाते हैं, वही कृपालु राम केवट का निहोरा कर रहे हैं। उन्होंने जगत् को तीन पग से भी छोटा कर दिया था। पोद्दार की टीका तीन पग की बात को वामनावतार का संकेत बताती है, जब दो ही पग में त्रिलोकी नाप ली गयी थी।
चरणों के नख देखकर देवनदी गंगा हर्षित होती हैं। राम के वचन सुनकर उनकी बुद्धि मोह में खिंच जाती है। पोद्दार की टीका कारण बताती है: ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारने के लिये केवट का निहोरा कैसे कर रहे हैं। टीका यह भी कहती है कि वे नख गंगा की अपनी उत्पत्ति का स्थान हैं। उन्हें पहचानकर गंगा समझ जाती हैं कि यह भगवान् की नरलीला है। उनका मोह मिटता है, और इन चरणों के स्पर्श की आशा से वे आनन्दित होती हैं।
आज्ञा पाकर केवट काठ के कठौते में जल भर लाता है। अत्यन्त आनन्द और प्रेम में उमँगकर वह चरणकमल धोने लगता है। सब देवता फूल बरसाकर सिहाते हैं कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं।
चरण धोकर वह उस जल को स्वयं और सारे परिवार के साथ पीता है, और पितरों को पार करता है। फिर वह आनन्द से राम को पार ले जाता है। पोद्दार की टीका के अनुसार उस महान् पुण्य के द्वारा वह पितरों को भवसागर से पार करता है।
सीता, राम, गुह और लक्ष्मण उतरकर गंगा की बालू में खड़े होते हैं। केवट उतरकर दण्डवत् करता है। राम को संकोच होता है कि उसे कुछ दिया नहीं।
अँगूठी और निर्मल भक्ति का वर
सीता पति के मन की बात जानती हैं। वे प्रसन्न मन से अपनी रत्नजटित अँगूठी उतार देती हैं। फिर राम केवट से उतराई लेने को कहते हैं।
केवट व्याकुल होकर चरण पकड़ लेता है और कहता है: नाथ, आज मैंने क्या नहीं पाया? दोष, दुःख और दरिद्रता की आग, सब मिट गये। बहुत समय तक मैंने मजदूरी की है। आज विधाता ने बहुत अच्छी और भरपूर मजदूरी दे दी।
वह कहता है कि आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिये। लौटती बार आप जो देंगे, उसे मैं प्रसाद मानकर सिर पर रख लूँगा।
राम, लक्ष्मण और सीता, तीनों बहुत यत्न करते हैं। केवट कुछ नहीं लेता। अन्त में राम निर्मल भक्ति का वर देकर उसे विदा करते हैं।
सीता की विनती और जल से उठी वाणी
तब राम स्नान करते हैं और पार्थिव पूजा करके सिर नवाते हैं। पोद्दार की टीका कहती है कि वे शिव को सिर नवाते हैं। फिर सीता हाथ जोड़कर गंगा से प्रार्थना करती हैं। वे उन्हें माता कहती हैं और विनती करती हैं कि मेरा मनोरथ पूरा कीजिये। मैं पति और देवर के साथ कुशल से लौट आऊँ और आकर आपकी पूजा करूँ।
उनकी प्रेम भरी विनती सुनकर गंगा के निर्मल जल से श्रेष्ठ वाणी होती है। वाणी सीता से कहती है कि जगत् में ऐसा कौन है जो आपका प्रभाव न जानता हो। आपकी दृष्टि से लोकपाल बन जाते हैं, और सारी सिद्धियाँ हाथ जोड़कर आपकी सेवा करती हैं।
गंगा आगे कहती हैं कि आपने बड़ी विनती सुनाकर मुझ पर कृपा की है और मुझे बड़ाई दी है। फिर भी, देवी, मैं अपनी वाणी सफल करने के लिये आपको आशीर्वाद दूँगी।
आप अपने प्राणनाथ और देवर सहित कुशल से कोसल लौटेंगी। आपकी सारी मनोकामनाएँ पूरी होंगी, और आपका सुन्दर यश जगत् में छा जायेगा। मंगल के मूल ये वचन सुनकर सीता आनन्दित होती हैं, और देवनदी अनुकूल हैं।
गुह को साथ रहने की अनुमति
तब राम गुह से घर जाने को कहते हैं। सुनते ही गुह का मुख सूख जाता है और हृदय में दाह होता है। वे हाथ जोड़कर दीन वचन कहते हैं कि मेरी विनती सुनिये: मैं आपके साथ रहकर रास्ता दिखाऊँ और चार दिन चरणों की सेवा करूँ।
जिस वन में आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी बना दूँगा। उसके बाद आप जैसी आज्ञा देंगे, वैसा ही करूँगा। यह बात वे राम की दुहाई देकर कहते हैं।
राम उनका सहज प्रेम देखते हैं और उन्हें साथ ले लेते हैं। गुह का हृदय हर्ष से भर जाता है। फिर वे अपनी जाति के लोगों को बुलाते हैं, उन्हें सन्तुष्ट करते हैं और विदा कर देते हैं।
राम गणपति और शिव का स्मरण करते हैं, गंगा को सिर नवाते हैं और वन को चलते हैं। साथ में सखा गुह हैं, छोटे भाई लक्ष्मण हैं और सीता हैं।
प्रसंग का क्रम
लक्ष्मण गुह से अपनी बात पूरी करते हैं, और सबेरा हो जाता है। राम स्नान करते हैं और छोटे भाई के साथ जटाएँ बनाते हैं, और मन्त्री की आँखें भर आती हैं। सुमंत्र राजा की आज्ञा सुनाते हैं और राम के चरणों पर रो पड़ते हैं। राम उन्हें उठाते हैं, धर्म के लिये कष्ट और संकट सहनेवालों के नाम लेते हैं, और कहते हैं कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं। वे मन्त्री के हाथ पिता को सन्देश भेजते हैं और मन्त्री का कर्तव्य बताते हैं। लक्ष्मण कड़वे वचन कहते हैं, राम उन्हें रोकते हैं और मन्त्री को सौगन्ध दिलाते हैं। सुमंत्र सीता के विषय में राजा का सन्देश कहते हैं। राम सीता को सीख देते हैं, और सीता छाया, प्रभा और चाँदनी की बात पूछती हैं। मन्त्री से वे दोनों घरों की और वन की बात कहती हैं। वे सास ससुर के चरणों में अपनी ओर से विनती करने को कहती हैं। सुमंत्र उनकी बात सुनकर व्याकुल होते हैं, साथ चलने के यत्न करते हैं, और लौटते हैं। वे रथ हाँकते हैं, और घोड़े मुड़ मुड़कर देखते और हिनहिनाते हैं। राम सुमंत्र को बलपूर्वक लौटाकर गंगा के तट पर आते हैं। केवट नाव नहीं लाता, और राम और दशरथ की सौगन्ध खाकर अपनी शर्त कहता है। राम हँसकर उससे चरण धोने को कहते हैं। केवट चरण धोता है, परिवार सहित जल पीता है, और राम को पार ले जाता है। वह उतरकर दण्डवत् करता है। सीता अँगूठी उतारती हैं, राम उतराई लेने को कहते हैं, और केवट कुछ नहीं चाहता। राम उसे वर देकर विदा करते हैं। राम स्नान और पूजा करते हैं। सीता गंगा से विनती करती हैं, और गंगा उन्हें आशीर्वाद देती हैं। राम गुह से घर जाने को कहते हैं, उनका सहज प्रेम देखते हैं, और उन्हें साथ ले लेते हैं। गुह अपनी जाति के लोगों को विदा करते हैं। राम गणपति और शिव का स्मरण करते हैं, गंगा को सिर नवाते हैं, और गुह, लक्ष्मण और सीता के साथ वन को चलते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा 94 से 104, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।