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अध्याय 10: विभूति योग

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सार: नौवें अध्याय की बात सुनकर अर्जुन का मन और खुल गया। जिस विराट सत्ता की चर्चा हो रही थी, उसकी थोड़ी झलक वे अपनी आँखों से पाना चाहते थे। कृष्ण उन्हें अपनी विभूतियों की एक लम्बी माला सुनाते हैं। इस सृष्टि में हर श्रेणी का जो सबसे ऊँचा है, सबसे उजला है, वही उनका एक छोटा सा अंश है।

अर्जुन की जिज्ञासा

युद्ध की धूल अभी थमी नहीं थी, दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं, और रथ के भीतर एक और ही बातचीत चल रही थी। नौवें अध्याय में अर्जुन सुन चुके थे कि यह सारा जगत उसी एक के धागे में पिरोया हुआ है, और वह अपने भक्त को कभी नहीं छोड़ता। इस बात ने भीतर एक नई भूख जगा दी थी, कि जिस सत्ता की इतनी महिमा है, उसे ज़रा नज़दीक से, नाम लेकर, पहचान लिया जाए।

अर्जुन हाथ जोड़कर बोले, “आपने अपने बारे में जो कहा, उसे सुनकर मेरा मोह मिटता जा रहा है। पर मन अभी भी प्यासा है। आप कृपा करके बताइए, इस सृष्टि में आप किन-किन रूपों में फैले हुए हैं? मैं आपको कहाँ-कहाँ पहचानूँ?”

कृष्ण मुस्कुराए। बोले, “अच्छा, सुनिए। अपनी विभूतियों में से जो मुख्य हैं, वही कहता हूँ, क्योंकि पूरी सूची का तो कोई ओर-छोर ही नहीं। मेरे विस्तार का अंत न देवता जानते हैं, न बड़े-बड़े ऋषि, क्योंकि मैं ही तो उन सबका भी आदि हूँ।”

पहली पहचान, हृदय के भीतर

सबसे पहले कृष्ण बाहर की ओर इशारा नहीं करते, भीतर की ओर करते हैं।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥

“हे गुडाकेश (नींद को जीत लेने वाले अर्जुन), मैं हर प्राणी के हृदय में बैठी हुई आत्मा हूँ। सब भूतों का आदि भी मैं हूँ, मध्य भी मैं, और अंत भी मैं ही हूँ।” पहली विभूति किसी दूर पर्वत या नदी में नहीं, अपने ही सीने के भीतर छिपी है। जिसे हम खोजने कहीं और जाते हैं, वह पहले से ही भीतर बैठा है।

ब्रह्मांड की एक माला

फिर कृष्ण की वाणी एक माला की तरह खुलने लगती है। अचल पर्वतों में मैं हिमालय हूँ, बहती नदियों में गंगा। आदित्यों में विष्णु, चमकती ज्योतियों में तपता हुआ सूर्य, और नक्षत्रों में शीतल चन्द्रमा। वेदों में सामवेद, देवताओं में इन्द्र, इन्द्रियों में मन, और प्राणियों में उनकी चेतना।

वृक्षों में मैं पीपल हूँ, देव-ऋषियों में नारद, गंधर्वों में चित्ररथ, और सिद्धों में कपिल मुनि। महर्षियों में भृगु, यज्ञों में चुपचाप किया जाने वाला जपयज्ञ, और शब्दों में वह पहला अक्षर ‘अ’। छंदों में गायत्री, महीनों में अगहन, और ऋतुओं में फूलों से लदा हुआ वसंत। घोड़ों में उच्चैःश्रवा, हाथियों में ऐरावत, और मनुष्यों में राजा।

दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ, और जीत की इच्छा रखने वालों में नीति। मुनियों में व्यास हूँ, और कवियों में शुक्राचार्य। और फिर वे एक बात कहते हैं जो अर्जुन को भीतर तक छू जाती है, “पांडवों में, हे पार्थ, मैं आप ही हूँ, धनंजय।” जिस मित्र के सामने वे यह सारी माला खोल रहे थे, उसी में भी अपना अंश देख रहे थे।

जहाँ भी तेज है, वह तेज मैं हूँ। जीतने वालों की जीत, यत्न करने वालों का यत्न, और भले लोगों की भलाई भी मैं ही हूँ। और वह सब कुछ हर लेने वाली मृत्यु भी मैं हूँ, तथा आगे जो कुछ जन्म लेना है, उसका आदि-स्रोत भी। कोमल गुणों में मैं कीर्ति हूँ, वाणी हूँ, स्मृति हूँ, बुद्धि हूँ, धैर्य और क्षमा हूँ। भाव यह है कि जीवन की हर सुंदर लहर के पीछे वही एक समुद्र खड़ा है।

इतनी सारी वस्तुओं में अपने को दिखाकर कृष्ण असल में अर्जुन के भटकते मन को एक-एक खूँटी थमा रहे थे। मन जहाँ भी जाए, किसी पर्वत पर, किसी नदी पर, किसी गुणी व्यक्ति पर, वहीं उसे उनकी याद हो आए। भक्ति के लिए कहीं दूर मूरत ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं, सारा संसार ही उनका पता देता चलता है।

संक्षेप का सूत्र

यह सूची सत्तर से भी ज़्यादा नामों तक जाती है, पर कृष्ण जानते हैं कि इतनी गिनती याद रखना कठिन है। इसलिए वे एक सीधा सूत्र थमा देते हैं।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्॥

“जहाँ भी आपको कोई ऐश्वर्यवान, सुंदर या तेजस्वी वस्तु दिखे, उसे मेरे तेज के एक अंश से उपजी हुई समझ लीजिए।” पूरी माला रटने की ज़रूरत नहीं। जहाँ आँख ठिठक जाए, जहाँ मन चौंककर रुक जाए, वहीं उनकी एक झलक बैठी है। एक ऊँचा पर्वत, एक सधी हुई कला, एक निर्मल हृदय, सब उसी एक तेज के टुकड़े हैं।

और अंत में वे इस सारे विस्तार को एक साँस में समेट देते हैं।

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥

“या इतने विस्तार से आपको क्या मिलेगा, अर्जुन? इस सारे जगत को मैंने अपने एक छोटे से अंश से थाम रखा है।” जिसे हम पूरा ब्रह्मांड कहते हैं, वह उनके एक टुकड़े भर में टिका है। उन्हें हम कितना भी जान लें, बाक़ी सदा अनंत ही रहेगा।

सार

एक वाक्य में कहें तो, जहाँ भी कुछ बड़ा, सुंदर या ज़बरदस्त दिखे, वह कृष्ण की एक नन्ही झलक है। यह अध्याय जैसे उँगली पकड़कर, एक-एक करके, पूरे संसार में उनका पता बताता है। और यह पता इसलिए बताया जा रहा है, ताकि अगला अध्याय आते ही वह पूरा रूप एक साथ आँखों के सामने खुल सके।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता