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अध्याय 4: ज्ञान कर्म संन्यास योग

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कुरुक्षेत्र की धूल अभी बैठी नहीं थी। दोनों सेनाओं के बीच खड़ा वह रथ जैसे समय की धारा से बाहर आकर ठहर गया हो। अर्जुन का गाण्डीव हाथ में था, मगर मन कहीं और अटका था। और सारथी के भेस में बैठे कृष्ण ने बात को एक नया मोड़ दिया। अब तक कर्म की चर्चा थी, अब ज्ञान की बारी थी। यह चौथा अध्याय उसी ज्ञान का है, जो उतरता कैसे है और मिलता किसे है।

पुरानी विद्या, फिर से

कृष्ण ने कहा, हे पार्थ, यह जो योग हम आपको सुना रहे हैं, यह कोई नयी बात नहीं। सृष्टि के आरम्भ में हमने यही विद्या सूर्य को दी थी। सूर्य ने अपने पुत्र मनु को दी, और मनु ने इक्ष्वाकु को। इसी क्रम से राजा भी ऋषि थे, और ऋषियों जैसा राज करते थे। मगर लम्बे समय की धारा में यह विद्या कहीं खो गयी। आज वही पुरानी विद्या हम फिर से आपको दे रहे हैं, क्योंकि आप हमारे भक्त हैं और हमारे मित्र भी।

अर्जुन को यह सुनकर एक सहज उलझन हुई। उन्होंने पूछा, हे केशव, आपका जन्म तो अभी हुआ, और सूर्य तो युगों पहले के हैं। यह हम कैसे मानें कि आपने आरम्भ में सूर्य को यह ज्ञान दिया?

अवतार का रहस्य

कृष्ण मुस्कुराए। यहीं उन्होंने वह बात कही जो आगे चलकर करोड़ों होंठों पर बसने वाली थी। बोले, हे अर्जुन, हमारे और आपके अनेक जन्म बीत चुके हैं। अन्तर बस इतना है कि आपको उनकी याद नहीं, और हमें सब याद है। हम अजन्मा हैं, अविनाशी हैं, फिर भी अपनी माया से देह धारण करके प्रकट होते हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म सिर उठाता है, तब-तब हम स्वयं को प्रकट करते हैं। साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्टों के नाश के लिए, और धर्म को फिर से खड़ा करने के लिए, हम युग-युग में जन्म लेते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता 4.7, 4.8

यही अवतार का सिद्धान्त है, जो यहाँ पहली बार इतने साफ़ शब्दों में खुलता है। हर युग में जब सचाई डगमगाती है, तब वह परम अपना कोई रूप गढ़कर उतर आता है, संतुलन लौटाने। “युग-युग में जन्म लेते हैं” का यह नाद आज भी मंदिरों की घंटियों के साथ गूँजता है। और कृष्ण ने साथ ही जोड़ा, जो हमारे इस जन्म और कर्म के दिव्य भेद को सच में जान लेता है, वह देह छोड़ने के बाद फिर जन्म नहीं लेता, हमीं में समा जाता है।

हर राह इसी ओर

फिर कृष्ण ने एक बहुत उदार बात कही। बोले, जो जिस भाव से हमारी शरण में आता है, हम उसे उसी भाव से अपना लेते हैं। कोई किसी भी राह पर चले, अंत में सब राहें हम तक ही आती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समाज के चार वर्ण गुण और कर्म के अनुसार ही बने, और उनका रचयिता होते हुए भी वे स्वयं अकर्ता ही हैं, क्योंकि किसी फल की चाह उन्हें छूती नहीं। यही कर्म का पहला सूत्र था, कि काम करते हुए भी भीतर से अछूता रहा जा सकता है।

कर्म, अकर्म और विकर्म

अब कृष्ण ने कर्म की सबसे बारीक गुत्थी खोली। तीन शब्द रखे सामने। कर्म, यानी उचित काम। अकर्म, यानी काम का न होना, या भीतर से निष्काम बने रहना। और विकर्म, यानी दूषित, टेढ़ा काम। बोले, यहाँ बड़े-बड़े भी उलझ जाते हैं, क्योंकि कर्म की गति गहरी है।

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥

जो कर्म में अकर्म देख लेता है और अकर्म में कर्म, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है, वही योग से जुड़ा है, वही सारा कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं।

श्रीमद्भगवद्गीता 4.18

बात बारीक है। कोई ऊपर से दिन-रात काम करता दिखे, मगर भीतर शान्त और निष्काम हो, तो वह असल में अकर्म में ठहरा है। और कोई हाथ पर हाथ धरे बैठा हो, मगर भीतर इच्छाओं की आँधी चल रही हो, तो वह असल में कर्म ही कर रहा है। असली भेद हाथ के हिलने में नहीं, मन के थमने में है।

ज्ञान की अग्नि

अंत में कृष्ण यज्ञ पर आए। बोले, यज्ञ कई तरह के हैं। कोई द्रव्य चढ़ाकर यज्ञ करता है, कोई तप से, कोई श्वास के संयम से, कोई इन्द्रियों को साधकर। मगर सबसे ऊँचा यज्ञ द्रव्य का नहीं, ज्ञान का है। जैसे धधकती आग लकड़ी के ढेर को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों को जला डालती है। यह भीतर का यज्ञ है, और बाहर के हर यज्ञ से ऊपर।

फिर उन्होंने अर्जुन को वह सूत्र दिया जो हर शिष्य के लिए है। यह ज्ञान मिलता कैसे है?

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

इसे विनम्र प्रणाम से जानिए, सच्चे प्रश्न से जानिए, और सेवा से जानिए। जिन्होंने तत्त्व को अपनी आँखों देखा है, वे ज्ञानी आपको यह ज्ञान देंगे।

श्रीमद्भगवद्गीता 4.34

तीन बातें, झुकना, सही सवाल, और सेवा। इन तीनों के बिना ज्ञान न आता है, न टिकता है। और जिसे यह ज्ञान मिल गया, कृष्ण ने कहा, वह फिर कभी मोह में नहीं भटकता, क्योंकि इसी ज्ञान की नाव पर बैठकर बड़े से बड़ा पापी भी संसार के समुद्र को पार कर जाता है।

इस अध्याय का सार एक साँस में यही है। यह ज्ञान बहुत पुराना है, बार-बार खोता है और बार-बार लौटता है। इसे पाने की राह कोई जादू नहीं, बस विनम्रता, सच्चा प्रश्न, और सेवा। जिसने भीतर की यह आग जला ली, उसके सारे संशय राख हो जाते हैं, और वह अपने ही भीतर एक गहरी शान्ति में ठहर जाता है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता