Lulla Family

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग

पढ़ने में लगभग 6 मिनट · 971 शब्द

सार: दसवें अध्याय की माला सुनकर अर्जुन का मन कहता है कि अब शब्द बहुत हो गए, एक बार वह असली रूप आँखों से देख लें। कृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि देकर अपना विश्वरूप दिखाते हैं। उस एक ही रूप में सारे लोक हैं, सारे देवता हैं, और समय का वह भयानक मुख भी है जिसमें सेनाएँ समाती जा रही हैं। अर्जुन काँप उठते हैं, और तब गीता की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति गूँजती है, “मैं काल हूँ।”

अर्जुन की माँग

अर्जुन हाथ जोड़कर बोले, “आपने अपनी विभूतियाँ बता दीं, और मेरा मोह बहुत हद तक मिट गया। पर अब एक साध रह गई है। यदि आप समझते हैं कि मैं इसे सह पाऊँगा, तो कृपा करके अपना वह अविनाशी ऐश्वर्य-रूप मुझे दिखा दीजिए।”

कृष्ण बोले, “देखिए, मेरे सैकड़ों-हज़ारों रूप हैं, अनेक रंगों और आकारों के। पर इन चर्म-आँखों से आप उन्हें देख नहीं पाएँगे। इसलिए मैं आपको दिव्य दृष्टि देता हूँ।” और यह कहकर उन्होंने अर्जुन को वे आँखें दीं, जो साधारण नहीं थीं।

विश्वरूप

फिर जो दिखा, उसे शब्दों में बाँधना कठिन है। असंख्य मुख, असंख्य आँखें, असंख्य भुजाएँ। एक साथ हज़ारों सूर्य आकाश में फट पड़ें, तब शायद उस तेज की कुछ झलक मिले। उस एक ही रूप में सारे देवता दिख रहे थे, सारे लोक दिख रहे थे, ऋषि और नाग, सूर्य और चन्द्र, आदि जिसका न कोई ओर था, न छोर। अर्जुन के रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर, काँपती वाणी से स्तुति की।

अर्जुन की वाणी लड़खड़ाने लगी। उन्होंने कहा कि इस रूप को देखकर तीनों लोक काँप रहे हैं, देवता हाथ जोड़े हुए भीतर समाते जा रहे हैं, और ऋषिगण “कल्याण हो, कल्याण हो” कहकर स्तुति गा रहे हैं। उस विराट के मुख की दाढ़ें इतनी विकराल थीं कि देखते ही दिशाओं का बोध जाता रहा, और मन में न कहीं शान्ति बची, न कोई ठौर।

पर जैसे-जैसे वे देखते गए, विस्मय धीरे-धीरे डर में बदलने लगा। उन्होंने देखा कि उस विराट रूप के धधकते मुखों में योद्धा वैसे ही समाते जा रहे हैं, जैसे पतंगे आग की ओर दौड़कर उसमें गिरते हैं। भीष्म, द्रोण, कर्ण, और दोनों ओर के राजा, सब उन जलते जबड़ों की ओर खिंचे चले जा रहे थे। कुछ के सिर दाँतों के बीच पिसते दिखे। अर्जुन का धीरज टूट गया।

“मैं काल हूँ”

काँपते हुए उन्होंने पूछा, “मुझे बताइए, इस भयानक रूप में आप कौन हैं? आप करना क्या चाहते हैं?” तब वह उत्तर आया, जो सदियों से गूँजता चला आया है।

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥

“मैं काल हूँ, निरंतर बढ़ता हुआ, लोकों का संहार करने वाला। इस समय मैं इन सब लोकों को समेटने निकला हूँ। सामने खड़ी इन विरोधी सेनाओं के योद्धा, आपके लड़े बिना भी, बचने वाले नहीं हैं।” यही गीता का सबसे चौंका देने वाला वाक्य है। जीवन जिसे भविष्य समझकर सँजोता रहता है, वह समय अपना निर्णय पहले ही दे चुका होता है।

फिर कृष्ण ने अर्जुन का बोझ हल्का किया, “इसलिए आप उठिए, यश पाइए। शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोगिए। इन्हें तो मैं पहले ही मार चुका हूँ। हे सव्यसाची, आप केवल निमित्त बनिए।” अपना कर्म कीजिए, पर यह अहंकार छोड़ दीजिए कि ‘मैं ही मार रहा हूँ।’ कर्ता तो कोई और है, आप बस माध्यम हैं।

यही “निमित्त” शब्द इस पूरे अध्याय का मर्म है। कृष्ण अर्जुन से हाथ पर हाथ धरकर बैठने को नहीं कह रहे। धनुष उठाना है, बाण चलाना है, पूरा पराक्रम करना है। पर भीतर यह गाँठ खुल जानी चाहिए कि परिणाम का सूत्र किसी और के हाथ में है। कर्म पूरे मन से, और फल का अहंकार बिलकुल नहीं, गीता शुरू से यही कहती आई है, और यहाँ वह बात आँखों के सामने खड़ी हो जाती है।

ओपेनहाइमर की याद

यही “कालोऽस्मि” वाली पंक्ति बीसवीं सदी में एक बार फिर दुनिया के सामने आ गई। अमेरिका के भौतिक-विज्ञानी जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने, जिन्होंने परमाणु बम बनाने वाली मैनहटन परियोजना का नेतृत्व किया था, 16 जुलाई 1945 को हुए पहले परमाणु-परीक्षण के समय इसी श्लोक को याद किया। उस परीक्षण का नाम ट्रिनिटी था। वे कोई संस्कृत के अध्यापक नहीं थे, विज्ञान ही उनका क्षेत्र था, पर सन् 1933 के आस-पास उन्होंने संस्कृत सीखी थी और गीता को मूल भाषा में पढ़ा था। रेगिस्तान में उठे उस आग के गोले को देखकर उन्हें यही एहसास हुआ, मानो काल स्वयं, लोकों का संहारक, उनके सामने प्रकट हो गया हो।

अर्जुन की क्षमा-याचना

डर कुछ उतरा तो अर्जुन को अपनी पुरानी बातें याद आईं। कितनी ही बार उन्होंने खेल में, यात्रा में, भोजन की मेज़ पर इस सखा को हल्के-फुल्के ढंग से “हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र” कहकर पुकारा था, यह जाने बिना कि सामने कौन बैठा है। हाथ जोड़कर उन्होंने बार-बार क्षमा माँगी। फिर विनती की, “मैंने आपका यह अद्भुत रूप देख लिया, मेरा मन तृप्त भी है और भयभीत भी। कृपा कीजिए, अब उसी सौम्य रूप में लौट आइए, जिसे मैं जानता हूँ।”

कृष्ण ने कोमलता से पहले अपना चतुर्भुज रूप दिखाया, फिर वही परिचित मनुष्य-रूप धारण कर लिया, और अर्जुन को धीरज बँधाया। बोले, “यह रूप, जिसे आपने देखा, बड़े-बड़े साधकों को भी सुलभ नहीं। न वेदों के पाठ से, न यज्ञों से, न कठोर तप से यह दिखता है।”

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥

“हे अर्जुन, केवल अनन्य भक्ति से ही मुझे इस रूप में जाना, देखा, और मुझमें प्रवेश किया जा सकता है।” डर के रास्ते वह द्वार नहीं खुलता, प्रेम के रास्ते ही खुलता है।

सार

एक वाक्य में कहें तो, समय स्वयं कृष्ण का ही रूप है, और जो होना है वह पहले से तय है। हमारा काम इतना ही है कि अपना हिस्सा निष्ठा से निभाएँ, और फल का भार उन्हीं पर छोड़ दें। और उस विराट को भय से नहीं, प्रेम से देखा जाता है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता