अध्याय 22 · गीता का क्षण (अर्जुन-विषाद, कृष्ण का उत्तर)

महाभारत · भीष्म पर्व
दो सेनाओं के बीच रुके रथ पर अर्जुन का विषाद, और कृष्ण का वह उपदेश जो भगवद्गीता कहलाया।

पढ़ने में लगभग 26 मिनट · 4,320 शब्द

कुरुक्षेत्र की धरती पर सूर्य अभी-अभी ऊपर आया था, और दोनों सेनाएँ आमने-सामने इस तरह खड़ी थीं मानो दो समुद्र अपने किनारे तोड़कर एक-दूसरे की ओर बढ़ चले हों। एक ओर धृतराष्ट्र के पुत्रों की विशाल वाहिनी पश्चिम की ओर मुँह किए खड़ी थी, उसके आगे शान्तनु के पुत्र भीष्म, श्वेत छत्र, श्वेत पगड़ी, श्वेत ध्वज और श्वेत अश्वों के साथ, किसी हिमशिखर जैसे दीप्त। दूसरी ओर पाण्डवों की सेना पूर्व की ओर मुँह किए, और उसके बीचोंबीच वह रथ जिसकी बागडोर केशव के हाथ में थी, और जिस पर गाण्डीव (अर्जुन का दिव्य धनुष) लिए स्वयं अर्जुन खड़े थे। हवा पाण्डवों के पीछे से बहकर धृतराष्ट्र-पक्ष के मुख पर पड़ रही थी, और वन्य पशु कौरव-दल की ओर अमंगल स्वर में चिल्ला रहे थे। यह वही क्षण था जिसके भीतर एक उपदेश छिपा बैठा था, वह उपदेश जो आगे चलकर भगवद्गीता कहलाया।

समझने की कुंजी: यह अध्याय उस क्षण की कथा है, सम्पूर्ण भगवद्गीता का पाठ नहीं। व्यास ने भीष्म पर्व के भीतर कृष्ण और अर्जुन के संवाद के सात सौ श्लोक रखे हैं। हम यहाँ केवल उस सजीव दृश्य को सुना रहे हैं, कृष्ण के उपदेश के सार के साथ। पूरी गीता, अध्याय-दर-अध्याय, आप लुल्ला परिवार के अलग भगवद्गीता खंड में पढ़ सकते हैं।

दो सेनाएँ, दो समुद्र

धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा कि सूर्योदय होते ही किसकी सेना पहले प्रसन्न मन से दूसरे की ओर बढ़ी, और किसके मुख पर कान्ति थी और किसके मन में उदासी। संजय ने उत्तर दिया कि आरम्भ में दोनों सेनाएँ समान रूप से हर्षित थीं, दोनों समान रूप से सुन्दर, फूलों से लदे वनों जैसी, और दोनों हाथी, रथ और अश्वों से भरी हुई थीं। किन्तु पवन की दिशा और पशुओं के स्वर बता रहे थे कि शकुन किसके पक्ष में हैं।

दुर्योधन कमल के रंग के हाथी पर सवार था, उसके सिर पर चन्द्रमा की-सी आभा वाला श्वेत छत्र था, और गान्धार-नरेश शकुनि अपने पर्वतवासी योद्धाओं के साथ उसके पीछे चल रहा था। सम्पूर्ण सेना के आगे आचार्य रूप में भीष्म खड़े थे। उनके पास धनुष और तलवार थी, और उनकी छटा ऐसी थी मानो कोई श्वेत पर्वत आकर खड़ा हो गया हो। उनके दल में धृतराष्ट्र के सब पुत्र, बाह्लीक देश के साल, अम्बष्ठ, सिन्धु, सौवीर, और पाँच नदियों के देश के वीर क्षत्रिय थे। सोने के रथ पर, लाल अश्वों के साथ, अमोघ-हृदय आचार्य द्रोण समस्त सेना के पीछे रहकर उसकी रक्षा कर रहे थे, इन्द्र की भाँति। शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य (जिन्हें गौतम भी कहा जाता है) शक, किरात, यवन और पह्लव योद्धाओं के साथ सेना के उत्तरी छोर पर डट गए। कृतवर्मा वृष्णि और भोज वीरों को लेकर दक्षिण की ओर बढ़ा। और दस सहस्र रथों वाले संशप्तक, जो अर्जुन के वध अथवा अपनी कीर्ति, इन दोनों में से किसी एक के लिए ही जन्मे थे, त्रिगर्तों के साथ निकल पड़े।

एक उप-कथा: भीष्म प्रतिदिन सेना को भिन्न-भिन्न व्यूहों में सजाते थे, कभी मानव व्यूह में, कभी देव-व्यूह में, कभी गन्धर्व व्यूह में, और कभी असुर व्यूह में। उनकी सेना अगणित थी और भयंकर दीखती थी। पाण्डवों की सेना संख्या में उतनी न थी, फिर भी संजय को वह विशाल और अजेय जान पड़ी, क्योंकि उसके नायक केशव और अर्जुन थे।

व्यूह की अभेद्यता देखकर एक क्षण को स्वयं युधिष्ठिर भी विषाद में डूब गए। उनका मुख पीला पड़ गया और उन्होंने अर्जुन से कहा कि भीष्म के रचे इस अभेद्य व्यूह के सामने हम विजय कैसे पाएँगे। अर्जुन ने उन्हें धीरज बँधाया, कि थोड़े योद्धा भी अनेक गुणवान शत्रुओं को जीत सकते हैं, यदि उनके साथ सत्य, करुणा और धर्म हो। उन्होंने नारद की वह वाणी दोहराई कि जहाँ धर्म है वहीं विजय है, और जहाँ कृष्ण हैं वहीं विजय है। इस आश्वासन से युधिष्ठिर का शोक हटा।

सार: युद्ध आरम्भ होने से पहले ही दोनों सेनाएँ अपने वैभव और भय के साथ खड़ी हैं। शकुन पाण्डवों के पक्ष में हैं, और अर्जुन का यह वचन कि जहाँ धर्म और कृष्ण हैं वहीं विजय है, आगे आने वाले उपदेश की भूमि तैयार कर देता है।

रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलिए

शंख गूँज उठे। हृषीकेश (कृष्ण का एक नाम, अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी) ने पाञ्चजन्य फूँका, अर्जुन ने देवदत्त, भयंकर कर्म वाले भीमसेन ने महाशंख पौण्ड्र, युधिष्ठिर ने अनन्तविजय, और नकुल तथा सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक। काशिराज, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और सुभद्रा का पुत्र, सब ने अपने-अपने शंख बजाए। वह घोष आकाश और पृथ्वी में गूँजकर धृतराष्ट्र-पुत्रों के हृदय विदीर्ण करने लगा।

सूर्योदय के समय कृष्ण चार श्वेत अश्वों वाला स्वर्ण रथ हांकते हैं, पीछे धनुष थामे अर्जुन खड़े हैं।

तब अर्जुन ने, जिनके रथ पर वानर का ध्वज था, धनुष उठाकर हृषीकेश से कहा कि “हे अच्युत, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच में ले चलिए, जिससे मैं उन्हें देख सकूँ जो यहाँ युद्ध के लिए खड़े हैं, और जान सकूँ कि इस संग्राम में मुझे किनके साथ जूझना है। मैं उन्हें देखना चाहता हूँ जो धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र का प्रिय करने के लिए यहाँ युद्ध को तत्पर हैं।” इस वचन को सुनकर केशव ने वह श्रेष्ठ रथ भीष्म, द्रोण और पृथ्वी के समस्त राजाओं के सामने, ठीक दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कर दिया, और कहा, “हे पार्थ, इन एकत्र हुए कौरवों को देखिए।”

एक उप-कथा: युद्ध की पूर्व-संध्या पर वासुदेव ने अर्जुन से दुर्गा की स्तुति करने को कहा था। अर्जुन रथ से उतरकर, हाथ जोड़कर, उस देवी की वन्दना करने लगे जो योगियों की नायिका है, जो ब्रह्मस्वरूपिणी है, जो काल और काष्ठा है, जो वेदों की माता सावित्री है। देवी आकाश में प्रकट हुईं और बोलीं कि “हे पाण्डव, आप शीघ्र ही शत्रुओं को जीतेंगे, क्योंकि आपकी सहायता के लिए स्वयं नारायण हैं।” यह वर पाकर अर्जुन अपने को सफल मानते हुए पुनः रथ पर चढ़ गए थे।

और वहाँ, ठीक दोनों सेनाओं के बीच, कुन्ती-पुत्र ने अपने सामने खड़े देखा अपने पितामहों और पौत्रों को, मित्रों को, श्वसुरों को, और हितैषियों को, दोनों ही सेनाओं में। ये सब के सब उनके अपने स्वजन थे।

सार: गीता का यह क्षण किसी एकान्त में नहीं, युद्ध के बीचोंबीच घटित होता है। अर्जुन स्वयं रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहते हैं, और वहीं उन्हें वह दीखता है जिसे देखने के लिए उन्होंने रथ रुकवाया था, अपने ही स्वजन, दोनों ओर खड़े।

गाण्डीव का हाथ से गिरना

अर्जुन व्याकुल भाव से दोनों हाथ फैलाए रथ पर बैठे कृष्ण से बोलते हैं, धनुष भूमि पर पड़ा है।

अपने इन स्वजनों को युद्ध के लिए तत्पर देखकर अर्जुन अत्यन्त दया से भर उठे, और शोक में डूबकर बोले, “हे कृष्ण, इन बन्धुओं को यहाँ एकत्र और लड़ने को आतुर देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जाते हैं, मेरा मुख सूख रहा है। मेरा शरीर काँप रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं। गाण्डीव मेरे हाथ से गिरा जा रहा है, मेरी त्वचा जल रही है। मैं अब खड़ा भी नहीं रह पाता, मेरा मन मानो भटक गया है। हे केशव, मुझे अमंगल के लक्षण दीख रहे हैं। मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य, न सुख। हे गोविन्द, हमें राज्य से, भोगों से, यहाँ तक कि जीवन से भी क्या प्रयोजन, जब जिनके लिए ये सब वांछित हैं, वे ही प्राण और धन त्यागने को यहाँ खड़े हैं, हमारे आचार्य, पितर, पुत्र, पितामह, मामा, श्वसुर, पौत्र और बन्धु?

“हे मधुसूदन, ये मुझे मारें तो भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता, चाहे तीनों लोकों के राज्य के लिए ही क्यों न हो, फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या। हे जनार्दन, धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारकर हमें कौन-सा सुख मिलेगा? ये भले ही शत्रु मान लिए जाएँ, फिर भी इन्हें मारने से तो पाप ही लगेगा। अपने ही कुटुम्बियों को मारकर हम कैसे सुखी हो सकते हैं? कुल के नष्ट होने पर सनातन कुल-धर्म लुप्त हो जाते हैं, और धर्म के लुप्त होने पर समस्त कुल पर अधर्म छा जाता है। अधर्म बढ़ने पर कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और स्त्रियों के दूषित होने पर वर्ण-संकर उत्पन्न होता है। यह वर्ण-संकर कुल के नाशकों और कुल, दोनों को नरक की ओर ले जाता है, और पितर भी पिण्ड तथा जल से वंचित होकर गिर पड़ते हैं। हाय, हमने राज्य के सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने का महान पाप करने का संकल्प कर लिया है। मेरे लिए तो यही श्रेयस्कर होगा कि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र-पुत्र मुझ निःशस्त्र और प्रतिकार न करने वाले को रणभूमि में मार डालें।”

सिर झुकाए उदास अर्जुन रथ के आसन पर बैठे हैं, पास कृष्ण रास थामे शांत भाव से बैठे हैं।

यह कहकर, युद्ध के मैदान में ही, शोक से व्याकुल अर्जुन ने अपने धनुष-बाण एक ओर रख दिए और रथ पर बैठ गए।

सार: यही गीता का मर्म-स्थल है। संसार का परम धनुर्धर, जिसका कोई समकक्ष न पृथ्वी पर है न होगा, अपने स्वजनों को सामने देखकर टूट जाता है। गाण्डीव हाथ से फिसल जाता है और अर्जुन रथ पर बैठ जाते हैं। यहाँ अर्जुन का संकट केवल भय का नहीं, धर्म का है, कि कुल-नाश और स्वजन-वध में क्या उचित है, क्या अनुचित।

मैं युद्ध नहीं करूँगा

दया से भरे, आँसुओं से भीगे, विषादग्रस्त अर्जुन को मधुसूदन ने कहा, “हे अर्जुन, इस संकट के समय यह अनार्य-जनोचित विषाद आप पर कहाँ से आ गया, जो स्वर्ग से दूर करने वाला और अपकीर्ति देने वाला है? हे कुन्ती-पुत्र, कायरता आपको शोभा नहीं देती। हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर उठिए, हे परन्तप।”

अर्जुन ने उत्तर दिया, “हे मधुसूदन, पूजा के योग्य भीष्म और द्रोण के विरुद्ध मैं बाणों से कैसे युद्ध करूँ? अपने महान आचार्यों को मारकर भोगे गए भोग तो रक्त से सने होंगे। इनको मारकर जीना मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरा हृदय करुणा के दोष से दूषित है, और धर्म के विषय में मेरी बुद्धि मोहित है। मैं आपसे पूछता हूँ, मुझे वही बताइए जो निश्चित रूप से मेरे लिए कल्याणकारी हो। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, मुझे उपदेश दीजिए।” यह कहकर, “मैं युद्ध नहीं करूँगा” इतना कहकर वे चुप हो गए।

कृष्ण हाथ उठाकर सामने बैठे अर्जुन को समझाते हैं, पीछे दोनों सेनाएं और क्षितिज पर सूर्य दिखता है।

तब, दोनों सेनाओं के बीच रुके उस रथ पर, हृषीकेश ने मानो हँसते हुए, उस शोकमग्न अर्जुन को वह कहना आरम्भ किया जो आगे चलकर भगवद्गीता कहलाया।

सार: अर्जुन केवल विलाप नहीं करते, वे शिष्य-भाव से कृष्ण की शरण में जाते हैं। “मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे उपदेश दीजिए”, यही वाक्य उस संवाद का द्वार खोलता है। और रथ अभी भी दोनों सेनाओं के बीच रुका हुआ है।

आत्मा न मरती है, न मारी जाती है

कृष्ण उंगली उठाकर उपदेश देते हैं, आकाश में प्रकाशमान ध्यानस्थ आकृति अमर आत्मा का संकेत करती है।

कृष्ण ने पहले उस शोक की जड़ पर प्रहार किया जो अर्जुन को घेरे थी। उन्होंने कहा कि आप उनके लिए शोक कर रहे हैं जो शोक के योग्य नहीं, और बातें ज्ञानियों जैसी कर रहे हैं, किन्तु जो सचमुच ज्ञानी हैं वे न मरे हुओं के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए। ऐसा कभी न था कि मैं, या आप, या ये राजा लोग न रहे हों, और न ऐसा होगा कि हम आगे न रहें। जैसे इस देह में बचपन, यौवन और बुढ़ापा आते हैं, वैसे ही देही (देहधारी आत्मा) को दूसरी देह की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता।

इन्द्रियों का अपने विषयों से सम्पर्क सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देता है, किन्तु ये आने-जाने वाले हैं, अनित्य हैं। हे भारत, इन्हें सहिए। जिस आत्मा से यह समस्त जगत व्याप्त है, उसे अविनाशी जानिए, उस अव्यय का विनाश कोई नहीं कर सकता। आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है, न उत्पन्न होकर फिर अनस्तित्व में जाती है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती। जो इसे मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ समझता है, दोनों ही नहीं जानते, क्योंकि यह न मारती है, न मारी जाती है।

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए पहन लेता है, वैसे ही देही जीर्ण शरीरों को त्यागकर नए शरीरों में प्रवेश करता है। इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता, और वायु सुखा नहीं सकती। यह अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य है, नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर और सनातन है। इसे अव्यक्त, अचिन्त्य और निर्विकार कहा गया है। ऐसा जानकर शोक करना उचित नहीं। और यदि आप इसे निरन्तर जन्मने-मरने वाला भी मानें, तब भी शोक न करें, क्योंकि जन्मे का मरना और मरे का जन्मना निश्चित है, इस अनिवार्य बात पर शोक कैसा? सब प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त थे, बीच में व्यक्त होते हैं, और मृत्यु में फिर अव्यक्त हो जाते हैं, इसमें शोक की क्या बात।

सार: कृष्ण के उपदेश की पहली नींव आत्मा की अमरता है। जो वध से डरता है, वह वस्तुतः उसी को मरा मान रहा है जो कभी मरती ही नहीं। शरीर वस्त्र है, देही उसे बदलता रहता है। इसलिए स्वजनों के नाश का जो शोक अर्जुन को घेरे है, वह अधूरे ज्ञान से उपजा है।

अपना धर्म, चाहे अधूरा ही क्यों न हो

कृष्ण हाथ के संकेत से सेनाओं की ओर दिखाते हैं, धनुष थामे अर्जुन ध्यान से उनकी बात सुनते हैं।

आत्मा की बात के बाद कृष्ण ने अर्जुन को उनके अपने धर्म (स्वधर्म, जन्म और स्वभाव से प्राप्त कर्तव्य) की ओर मोड़ा। उन्होंने कहा कि अपने वर्ण के कर्तव्य पर दृष्टि डालकर भी आपको विचलित होना उचित नहीं, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कुछ श्रेयस्कर नहीं। ऐसा युद्ध अपने आप आया हुआ, स्वर्ग का खुला द्वार है, और भाग्यशाली हैं वे क्षत्रिय जिन्हें ऐसा अवसर मिलता है।

किन्तु यदि आप यह धर्मयुद्ध न करें, तो अपने वर्ण-धर्म और कीर्ति को त्यागकर पाप के भागी होंगे। लोग आपकी सदा रहने वाली अपकीर्ति का बखान करेंगे, और सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी भारी है। बड़े-बड़े रथी समझेंगे कि आप भय से युद्ध से हट गए, और जो अब तक आपका आदर करते थे, वे आपको तुच्छ समझेंगे। शत्रु आपके पराक्रम की निन्दा करते हुए ऐसे वचन कहेंगे जो कहने योग्य नहीं, और इससे बढ़कर पीड़ा क्या होगी? मारे जाने पर आप स्वर्ग पाएँगे, और विजयी होने पर पृथ्वी का भोग करेंगे, इसलिए हे कुन्ती-पुत्र, युद्ध का निश्चय करके उठिए।

आगे चलकर इसी सूत्र को कृष्ण ने और गहरा किया, कि अपना धर्म गुण-रहित होते हुए भी दूसरे के भली-भाँति किए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्तव्य करते हुए मनुष्य पाप का भागी नहीं होता। अपने सहज कर्म को, चाहे वह दोष से युक्त ही क्यों न जान पड़े, त्यागना नहीं चाहिए, क्योंकि जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है, वैसे ही समस्त कर्म किसी न किसी दोष से ढके रहते हैं।

एक उप-कथा: कृष्ण ने स्पष्ट किया कि चारों वर्णों के कर्तव्य उनके सहज स्वभाव से उपजते हैं। ब्राह्मण का धर्म शम, दम, तप, शुद्धि, क्षमा, सरलता और ज्ञान है; क्षत्रिय का धर्म शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, रणभूमि से न भागना, दान और शासन का भाव है; वैश्य का धर्म कृषि, गोरक्षा और व्यापार है; और शूद्र का धर्म सेवा है। हर मनुष्य अपने ही कर्म में लगकर सिद्धि पाता है। यह वर्ण-व्यवस्था व्यास की कथा का एक प्राचीन ढाँचा है, जिसे हम यहाँ मूल के पास रहकर सुना रहे हैं।

सार: स्वधर्म का सिद्धान्त कहता है कि अपना सहज कर्तव्य, अपूर्ण रूप में किया गया भी, दूसरे के श्रेष्ठ कर्तव्य से ऊँचा है। अर्जुन क्षत्रिय हैं, और न्यायपूर्ण युद्ध उनका धर्म है। इससे मुँह मोड़ना अपकीर्ति और पाप दोनों को बुलाना है।

कर्म में अधिकार, फल में नहीं

कृष्ण उंगली उठाकर अर्जुन को समझाते हैं, आकाश के प्रकाश-मंडल में कमल और फल अर्पित करते हाथ दिखते हैं।

फिर कृष्ण ने वह सूत्र दिया जो गीता का हृदय कहलाता है, निष्काम कर्म (फल की इच्छा छोड़कर किया गया कर्म)। उन्होंने कहा कि आपका अधिकार केवल कर्म में है, उसके फल में नहीं। फल की इच्छा आपके कर्म का प्रेरक न बने, और कर्म न करने में भी आपकी आसक्ति न हो। योग (समत्व) में स्थित होकर, आसक्ति त्यागकर, सफलता और असफलता में समान रहकर कर्म कीजिए। यही समत्व योग कहलाता है।

फल की कामना से किया कर्म, समबुद्धि से किए कर्म की तुलना में बहुत निम्न है, इसलिए बुद्धि (समता) की शरण लीजिए। जो लोग केवल फल के लिए कर्म करते हैं वे दीन हैं। समबुद्धि से युक्त मनुष्य इसी जीवन में अच्छे और बुरे, दोनों के बन्धन से छूट जाता है, इसलिए योग में लगिए। योग ही कर्म में कुशलता है। बुद्धिमान, समत्व में स्थित होकर, कर्म से उत्पन्न फल को त्याग देते हैं, और बार-बार के जन्म के बन्धन से मुक्त होकर उस परम पद को पाते हैं जहाँ कोई दुःख नहीं।

आकाश के प्रकाश-वृत्त में अंग समेटता कछुआ दिखता है, कृष्ण अर्जुन को इंद्रिय-संयम का दृष्टांत समझाते हैं।

स्थिरबुद्धि पुरुष कैसा होता है, यह पूछने पर कृष्ण ने कहा कि जब मनुष्य अपने हृदय की समस्त कामनाओं को त्यागकर अपने ही भीतर अपने में सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जो अपनी इन्द्रियों को विषयों से समेट लेता है, उसकी बुद्धि स्थिर है। विषयों का चिन्तन आसक्ति को जन्म देता है, आसक्ति से क्रोध, क्रोध से अविवेक, अविवेक से स्मृति का नाश, और स्मृति के नाश से बुद्धि का नाश हो जाता है, और बुद्धि के नष्ट होने पर मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है। जिसमें समस्त कामनाएँ समुद्र में मिलने वाली नदियों की भाँति समा जाती हैं, वही शान्ति पाता है, न कि वह जो कामनाओं के पीछे दौड़ता है।

सार: निष्काम कर्म अर्जुन के संकट का व्यावहारिक उत्तर है। समस्या युद्ध करना नहीं, फल से चिपकना है। यदि कर्म फल की पकड़ छोड़कर, समता में स्थित होकर किया जाए, तो वह बन्धन नहीं बनता। कर्म से भागना समाधान नहीं, कर्म को बिना आसक्ति के करना समाधान है।

और तब विश्वरूप का संकेत

अनगिनत मुखों और शस्त्रधारी भुजाओं वाला कृष्ण का विराट विश्वरूप आकाश भरता है, अर्जुन रथ पर हाथ जोड़े देखते हैं।

संवाद आगे बढ़ता गया, और एक क्षण ऐसा आया जब अर्जुन ने कृष्ण से उनके ऐश्वर्यमय रूप को देखने की इच्छा प्रकट की, “हे प्रभु, यदि आप मानते हैं कि मैं उस रूप को देखने योग्य हूँ, तो मुझे अपना वह शाश्वत स्वरूप दिखाइए।” कृष्ण ने कहा कि “हे पार्थ, मेरे सैकड़ों-सहस्रों दिव्य रूपों को देखिए, अनेक रंगों और आकारों वाले। आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों और मरुतों को देखिए। इस सम्पूर्ण चराचर जगत को मेरी इस देह में एक साथ इकट्ठा देखिए। किन्तु आप इसे अपनी इस आँख से नहीं देख सकते, इसलिए मैं आपको दिव्य दृष्टि देता हूँ।”

तब उस योगेश्वर ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया, अनेक मुखों और नेत्रों वाला, अनेक अद्भुत दृश्यों से युक्त, अनेक दिव्य आभूषणों और उठे हुए दिव्य अस्त्रों से सज्जित, सब ओर मुख किए हुए। यदि आकाश में सहस्र सूर्यों का तेज एक साथ फूट पड़े, तो वह उस महान रूप के तेज जैसा होता। उस देव-देव की देह में अर्जुन ने सम्पूर्ण जगत को, अनेक भागों में बँटा और फिर एक साथ इकट्ठा, देखा। रोमांचित होकर, सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर अर्जुन ने उस रूप की स्तुति की।

आकाश-व्यापी विश्वरूप के जलते मुखों में सेनाएं समा रही हैं, अर्जुन भूमि पर घुटने टेककर हाथ जोड़ते हैं।

उन्होंने देखा कि धृतराष्ट्र के पुत्र, राजाओं के समूह, भीष्म, द्रोण और सूतपुत्र कर्ण, सब उन भयानक मुखों में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं। जैसे अनेक नदियों के स्रोत समुद्र की ओर वेग से बहते हैं, वैसे ही मनुष्यलोक के ये वीर उन ज्वलित मुखों में समा रहे थे, और जैसे पतंगे अपने नाश के लिए जलती अग्नि में दौड़ते हैं, वैसे ही ये लोग बढ़ते वेग से उन मुखों में प्रवेश कर रहे थे। काँपते हुए, हाथ जोड़कर अर्जुन ने पूछा कि “इतने उग्र रूप वाले आप कौन हैं? मुझ पर कृपा कीजिए।” तब उस परमात्मा ने उत्तर दिया, “मैं काल हूँ, लोकों का संहार करने वाला, पूर्ण रूप से बढ़ा हुआ। मैं अब इस मनुष्य-जाति का संहार करने में लगा हूँ। आपके बिना भी ये समस्त योद्धा, जो भिन्न-भिन्न दलों में खड़े हैं, नहीं रहेंगे। इसलिए उठिए, यश पाइए, शत्रुओं को जीतकर इस समृद्ध राज्य का भोग कीजिए। ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्, आप केवल निमित्त बनिए।”

सार: विश्वरूप वह संकेत है जहाँ अर्जुन का सारथि और मित्र अचानक समस्त ब्रह्माण्ड के रूप में प्रकट होता है। यहाँ कृष्ण स्वयं को काल, अर्थात् संहारक समय, कहते हैं, और अर्जुन को बताते हैं कि जो होना है वह हो चुका है, अर्जुन तो केवल निमित्त हैं। यह दृश्य अर्जुन के व्यक्तिगत शोक को एक विराट दृष्टि में घोल देता है।

मेरा मोह नष्ट हो गया

रथ पर बैठे कृष्ण खुले हाथ से अर्जुन को समझाते हैं, अर्जुन शांत भाव से उनकी ओर देखते हैं।

अन्त में, संवाद के समापन पर, कृष्ण ने अर्जुन से वह परम गोपनीय बात कही, कि समस्त धर्मों को छोड़कर मेरी अकेली शरण में आइए, मैं आपको सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक न कीजिए। यह उपदेश, उन्होंने कहा, उसे न देना जो तप नहीं करता, जो भक्त नहीं, जो सेवा नहीं करता, या जो मेरी निन्दा करता है। फिर उन्होंने पूछा, “हे पार्थ, क्या यह आपने एकाग्र मन से सुना? क्या अज्ञान से उत्पन्न आपका मोह नष्ट हुआ?”

अर्जुन ने उत्तर दिया, “हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है, और मुझे अपनी स्मृति प्राप्त हो गई है। मैं अब स्थिर हूँ, मेरे सन्देह दूर हो गए हैं, मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।”

दीपों से आलोकित सभा में संजय हाथ उठाकर सिंहासन पर बैठे धृतराष्ट्र को गीता का संवाद सुनाते हैं।

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा कि वासुदेव और पृथा-पुत्र का यह अद्भुत और रोमांचकारी संवाद उन्होंने व्यास की कृपा से सुना, और इसे बार-बार स्मरण कर वे बार-बार आनन्दित होते हैं। और उन्होंने वही प्राचीन वचन दोहराया, कि जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर पार्थ हैं, वहीं श्री है, वहीं विजय है, वहीं ऐश्वर्य है, और वहीं अटल नीति है।

सार: उपदेश का अन्त शरणागति पर होता है, समस्त धर्मों को छोड़कर परमात्मा की शरण में जाना। अर्जुन का मोह दूर होता है, और वे “आपकी आज्ञा का पालन करूँगा” कहकर पुनः कर्म के लिए तैयार हो जाते हैं। रथ अब आगे बढ़ने को है।

गाण्डीव फिर हाथ में

अर्जुन रथ पर खड़े होकर धनुष ऊंचा उठाते हैं, कृष्ण रास थामे हैं, सैनिक शंख-नगाड़े बजाते हैं।

संजय ने आगे कहा कि धनंजय को पुनः बाण और गाण्डीव उठाते देख पाण्डव-पक्ष के महारथियों ने भीषण सिंहनाद किया, और हर्ष से भरकर अपने समुद्र-जन्म शंख बजाए। ढोल, पेशी, करकच और गोशृंग एक साथ बजने लगे, और बड़ा कोलाहल हुआ। तभी देवता, गन्धर्व, पितर, सिद्धों और चारणों के समूह उस दृश्य को देखने के लिए वहाँ आ पहुँचे, और सौ यज्ञ करने वाले इन्द्र के साथ परम पूज्य ऋषिगण उस महान संहार को देखने एकत्र हुए।

तब, दो समुद्रों जैसी निरन्तर हिलती हुई उन दोनों सेनाओं को युद्ध के लिए तैयार देखकर, धर्मराज युधिष्ठिर ने एक विचित्र काम किया। उन्होंने अपना कवच उतार दिया, अपना श्रेष्ठ शस्त्र एक ओर रखा, और रथ से उतरकर, हाथ जोड़े, संयमित वाणी के साथ, पूर्व की ओर मुँह किए, पैदल ही शत्रु-सेना की दिशा में चल पड़े, पितामह की ओर दृष्टि लगाए। उन्हें इस प्रकार जाते देख अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव भी अपने रथों से उतरकर उनके पीछे हो लिए, और भगवान वासुदेव भी उनके पीछे चले। अर्जुन ने व्याकुल होकर पूछा कि “हे राजन्, यह आप क्या कर रहे हैं, जो भाइयों को छोड़कर पैदल शत्रु की ओर बढ़ रहे हैं?” भीम, नकुल और सहदेव ने भी चिन्तित होकर रोका, किन्तु युधिष्ठिर मौन ही चलते रहे।

तब वासुदेव ने मुस्कुराते हुए सब से कहा कि उन्हें युधिष्ठिर का अभिप्राय ज्ञात है, कि वे भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य, अपने इन गुरुजनों को प्रणाम करके ही युद्ध करेंगे। पुरानी कथाओं में सुना जाता है कि जो विधिपूर्वक अपने आचार्यों और पूज्य कुटुम्बियों को प्रणाम करके अपने से बड़ों के विरुद्ध युद्ध करता है, उसकी विजय निश्चित होती है।

कौरव-पक्ष ने युधिष्ठिर को पैदल आते देखकर तरह-तरह की बातें कीं, कि यह राजा भयभीत होकर भीष्म की शरण में आ रहा है। किन्तु युधिष्ठिर शर-समूह से भरी शत्रु-सेना को चीरते हुए सीधे भीष्म के पास पहुँचे और दोनों हाथों से उनके चरण पकड़कर बोले, “हे अजेय, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। हम आपसे युद्ध करेंगे, हमें इसकी अनुमति दीजिए और आशीर्वाद भी।” भीष्म ने प्रसन्न होकर कहा कि यदि आप इस प्रकार मेरे पास न आते, तो मैं आपको पराजय का शाप दे देता; अब युद्ध कीजिए और विजय पाइए। साथ ही उन्होंने वह कठोर सत्य भी कहा, कि “मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। मैं कौरवों के धन से बँधा हुआ हूँ, इसीलिए नपुंसक की भाँति ये वचन कह रहा हूँ कि युद्ध को छोड़कर और जो चाहिए वह माँग लीजिए। मैं तो कौरवों के लिए ही लड़ूँगा।” युधिष्ठिर ने केवल इतना ही वर माँगा कि भीष्म प्रतिदिन उनके हित का विचार करते रहें।

इसी प्रकार युधिष्ठिर ने द्रोण, कृप और शल्य के पास जाकर प्रणाम किया और बिना पाप के युद्ध करने की अनुमति माँगी। तीनों ने वही उत्तर दिया, कि वे धन से कौरवों के बँधे हैं और उन्हीं के लिए लड़ेंगे, किन्तु युधिष्ठिर की विजय की प्रार्थना करेंगे। द्रोण ने यह भी जोड़ा कि “जहाँ धर्म है वहाँ कृष्ण हैं, और जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है, इसलिए हे कुन्ती-पुत्र, जाइए और युद्ध कीजिए।” युधिष्ठिर ने प्रत्येक से उनके वध का उपाय भी पूछा, और प्रत्येक ने अपने अन्त का सूत्र बता दिया, यह व्यास की कथा की वह नैतिक जटिलता है, जहाँ गुरु अपने ही शिष्यों को अपने वध का मार्ग बताते हैं।

एक उप-कथा: इसी बीच वासुदेव कर्ण के पास गए और उससे कहा कि जब तक भीष्म जीवित हैं, वह पाण्डवों के पक्ष में आ जाए, और भीष्म के मारे जाने पर चाहे तो दुर्योधन के पक्ष में लौट जाए। कर्ण ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि वह दुर्योधन का अप्रिय कुछ नहीं करेगा, उसने तो दुर्योधन के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हैं। तब धृतराष्ट्र-पुत्र युयुत्सु, सबके बीच, अपने भाइयों को छोड़कर पाण्डवों के पक्ष में चला आया, और युधिष्ठिर ने उसे सहर्ष स्वीकार किया। यही युयुत्सु आगे चलकर धृतराष्ट्र-वंश का सूत्र और उसकी पिण्ड-क्रिया का अधिकारी बना।

इन सम्मानों के बाद युधिष्ठिर अपनी सेना से बाहर निकलकर लौटे, और हर्ष से भरकर फिर अपना स्वर्ण-कवच पहन लिया। सब वीर अपने-अपने रथों पर चढ़े और पहले की भाँति अपनी सेनाओं को व्यूह में सजा लिया। और जिन राजाओं ने, और म्लेच्छों तथा आर्यों ने, पाण्डवों का यह आचरण देखा या सुना, कि उन्होंने पूज्यों को यथोचित आदर दिया, सबने गला भर आने पर अश्रु बहाए और उनकी प्रशंसा की।

सार: उपदेश का फल कर्म में दिखता है, अर्जुन गाण्डीव फिर उठा लेते हैं। किन्तु व्यास तुरन्त युद्ध की लपटों में नहीं कूदते; पहले युधिष्ठिर पैदल जाकर अपने गुरुजनों, भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य का आशीर्वाद लेते हैं, और शत्रु-शिविर में खड़े वही गुरु अपने वध का उपाय भी बता देते हैं। यहाँ “धन का दास मनुष्य” वाला भीष्म का स्वीकार और गुरुओं का यह कठोर संवाद महाभारत की उस नैतिक उलझन को बनाए रखता है, जहाँ कोई पक्ष सर्वथा श्वेत या श्याम नहीं।

समझने की कुंजी: यह अध्याय जान-बूझकर छोटा रखा गया है, क्योंकि यह “गीता का क्षण” है, सम्पूर्ण गीता नहीं। कृष्ण के उपदेश के जो सूत्र यहाँ छुए गए हैं, आत्मा की अमरता, स्वधर्म, निष्काम कर्म और विश्वरूप, वे सब अपने पूरे विस्तार में, सातों सौ श्लोकों के साथ, आप लुल्ला परिवार के अलग भगवद्गीता खंड में पढ़ सकते हैं।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), भीष्म पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।