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पहले अध्याय में अर्जुन रथ के बीच ढह गए थे, धनुष हाथ से छूट चुका था। दूसरा अध्याय ठीक वहीं से उठता है, जहाँ कृष्ण पहली बार बोलते हैं और अर्जुन पहली बार सुनने के लिए तैयार होते हैं। कई जानकार कहते हैं कि गीता पढ़नी हो तो यहीं से शुरू कीजिए, क्योंकि आगे के सारे अध्याय इसी एक अध्याय के बीज को ही खोलते हैं। आत्मा की पहचान, कर्म की पहली सीख, और एक ठहरे हुए इंसान की तस्वीर, तीनों यहीं मौजूद हैं।
पहली फटकार, पहली शरण
कृष्ण हमदर्दी की भूमिका नहीं बाँधते, सीधे सामना करते हैं। वे कहते हैं कि यह कमज़ोरी आप जैसे योद्धा को शोभा नहीं देती, इस ओछेपन को छोड़ कर उठिए। पर अर्जुन का सवाल भी सच्चा है, भीष्म और द्रोण तो पूज्य हैं, इन पर बाण कैसे चलाऊँ? इन्हें मार कर मिला राज तो ख़ून में सना होगा। और फिर वह मोड़ आता है जिसके बिना कोई सीख शुरू नहीं होती। अर्जुन कहते हैं कि मेरा मन कायरता से घिर गया है, मुझे धर्म नहीं सूझ रहा, मैं आपकी शरण में हूँ, आप मुझे सिखाइए। यहाँ दोस्त शिष्य बन जाता है, और यहीं से असली गीता खुलती है।
जो कभी नहीं मरता
कृष्ण मानो हल्के से मुस्कुराते हुए पहली सीख देते हैं। वे कहते हैं कि आप उन पर शोक कर रहे हैं जिन पर शोक करने की कोई बात ही नहीं, और साथ में ज्ञान की बातें भी कर रहे हैं। समझदार लोग न मरे हुओं पर रोते हैं, न जीवितों पर। फिर वे सबसे सीधी तस्वीर रखते हैं, इसी एक शरीर में बचपन आता है, जवानी आती है, बुढ़ापा आता है, फिर भी भीतर का मैं वही बना रहता है। मृत्यु भी बस एक और करवट है, जिसमें आत्मा नया शरीर पा लेती है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है, न ऐसा है कि पहले थी और आगे नहीं रहेगी। यह अजन्मी है, नित्य है, शाश्वत है, सबसे पुरानी है, और शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती। न इसे कोई हथियार काट सकता है, न आग जला सकती है, न पानी भिगो सकता है, न हवा सुखा सकती है।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
जैसे इंसान पुराने कपड़े उतार कर नए पहन लेता है, वैसे ही देह में बसने वाली आत्मा पुराना शरीर छोड़ कर नए शरीर में चली जाती है। कृष्ण यहीं वह मान्यता हिला रहे हैं कि शरीर ही हमारी पहचान है। ठंड और गर्मी, सुख और दुख, ये सब इन्द्रियों के छुअन से आते हैं, आते-जाते रहते हैं, इसलिए इन्हें सह लेना सीखिए। जो इन आते-जाते झोंकों में एक-सा बना रहता है, वही सच में टिकता है।
कर्म पर हक़, फल पर नहीं
अब कृष्ण देखने से करने की ओर मुड़ते हैं, और गीता का सबसे मशहूर वचन आता है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
आपका अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर कभी नहीं। न फल को अपने काम का कारण बनाइए, और न ही काम छोड़ बैठने में मन लगाइए। इसे लापरवाही मत समझिए, बात ठीक उल्टी है। जब फल ही निशाना न रहे, तब बस इतना काफ़ी वाला बहाना नहीं चलता, और मेहनत ख़ुद मंज़िल बन जाती है। फ़ैसला पूरा हमारे बस में है, नतीजा आधा हमारा और आधा समय के हाथ।
यहीं कृष्ण योग की दो सीधी पहचान देते हैं। एक, समत्व ही योग है, यानी कामयाबी और नाकामी में एक-सा बने रहना। दो, कर्म में कुशलता ही योग है, यानी काम को इस सफ़ाई से करना कि वह बंधन न बने। कर्म तो होते ही रहेंगे, पर बंधन तभी बनता है जब हम नतीजे से चिपक जाते हैं।
ठहरी हुई समझ वाला इंसान
अर्जुन यहाँ अपना पहला सवाल पूछते हैं, ऐसा ठहरा हुआ इंसान कैसा दिखता है, कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है? कृष्ण कोई सूखी परिभाषा नहीं देते, पहचान के निशान देते हैं। जो मन में उठी सारी इच्छाएँ छोड़ कर अपने भीतर ही संतोष पा लेता है, वही स्थिर समझ वाला है। दुख आने पर उसका मन डगमगाता नहीं, सुख आने पर तलब नहीं जागती, और भीतर से खिंचाव, डर और गुस्सा जा चुके होते हैं।
कृष्ण एक प्यारी तस्वीर देते हैं। जैसे कछुआ ख़तरा भाँप कर अपने अंग हर तरफ़ से समेट लेता है, वैसे ही यह इंसान अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है। फिर एक चेतावनी भी देते हैं, यह राह आसान नहीं, अच्छे-ख़ासे साधक का मन भी उमड़ती इन्द्रियाँ ज़बरदस्ती खींच ले जाती हैं। इसलिए इन्द्रियों को क़ाबू में रखिए और ध्यान सबसे ऊँचे बिंदु पर टिकाइए।
गिरावट की सीढ़ी
अब कृष्ण एक बारीक बात खोलते हैं, जो शायद इस अध्याय की सबसे काम की चेतावनी है। पूरी गिरावट किसी बड़े पाप से नहीं, बस मन के किसी चीज़ पर बार-बार मँडराने से शुरू होती है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
विषय पर मन टिकाने से लगाव बनता है, लगाव से इच्छा, और इच्छा से क्रोध। क्रोध से मोह होता है, मोह से याद भटकती है, याद बिगड़ने से समझ नष्ट होती है, और समझ के नष्ट होते ही इंसान ख़ुद डूब जाता है। इलाज भी वही इन्द्रियाँ और वही दुनिया है, बस खिंचाव और चिढ़ को छोड़ कर। ऐसा सधा इंसान दुनिया के बीच रहते, खाते, सुनते और बोलते हुए भी भीतर से शांत रहता है।
सार
कृष्ण आख़िर में एक गहरी तस्वीर देते हैं। जैसे नदियाँ भरे हुए समुद्र में आ कर समा जाती हैं पर समुद्र छलकता नहीं, वैसे ही जिसके भीतर सारी इच्छाएँ आ कर समा जाती हैं और फिर भी वह हिलता नहीं, वही सच्ची शांति पाता है। ममता और अहंकार छोड़ कर चलने वाला यही इंसान उस ठहरी हुई अवस्था में पहुँचता है जहाँ से फिर कोई फिसलन नहीं। इस अध्याय में कृष्ण ने टूटे हुए अर्जुन को पूरी राह का नक्शा थमा दिया है, और आगे के अध्याय बस इसी नक्शे के हिस्से खोलते जाएँगे।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
यही कथा वहाँ भी
- भाग 14 · जीवन्मुक्त की पहचान
विवेकचूडामणि: जीवन्मुक्त की पहचान - अष्टावक्र गीता
अष्टावक्र गीता: मुक्त पुरुष की दशा
श्लोक-दर-श्लोक
इस अध्याय के सभी 72 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/2/47/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।
2.1तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥1॥
taṃ tathā kṛpayāviṣṭam aśrupūrṇākulekṣaṇam |
viṣīdantam idaṃ vākyam uvāca madhusūdanaḥ
- तम्
- उन (अर्जुन) को
- तथा
- उस प्रकार
- कृपया
- करुणा से
- आविष्टम्
- व्याप्त
- अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्
- अश्रुओं से भरे व्याकुल नेत्रों वाले
- विषीदन्तम्
- शोक करते हुए
- इदम्
- यह
- वाक्यम्
- वचन
- उवाच
- बोले
- मधुसूदनः
- मधुसूदन श्रीकृष्ण
अन्वय: तथा कृपया आविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् विषीदन्तम् तम् मधुसूदनः इदम् वाक्यम् उवाच ।
इस प्रकार करुणा से भरे, अश्रुओं से भरे व्याकुल नेत्रों वाले और शोक में डूबे उस अर्जुन से मधुसूदन श्रीकृष्ण ने यह वचन कहा।
2.2कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥2॥
kutas tvā kaśmalam idaṃ viṣame samupasthitam |
anāryajuṣṭam asvargyam akīrtikaram arjuna
- कुतः
- कहाँ से
- त्वा
- आपको
- कश्मलम्
- मोह
- इदम्
- यह
- विषमे
- विषम समय में
- समुपस्थितम्
- प्राप्त हुआ
- अनार्यजुष्टम्
- श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा न आचरित
- अस्वर्ग्यम्
- स्वर्ग न देने वाला
- अकीर्तिकरम्
- अपकीर्ति करने वाला
- अर्जुन
- हे अर्जुन
अन्वय: अर्जुन, विषमे इदम् अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरम् कश्मलम् त्वा कुतः समुपस्थितम् ।
हे अर्जुन, इस विषम समय में यह मोह आपको कहाँ से प्राप्त हुआ? यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित नहीं है, स्वर्ग देने वाला नहीं है और अपकीर्ति करने वाला है।
2.3क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप ॥3॥
klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayy upapadyate |
kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha paraṃtapa
- क्लैब्यम्
- कायरता को
- मा स्म गमः
- मत प्राप्त हों
- पार्थ
- हे पार्थ
- न
- नहीं
- एतत्
- यह
- त्वयि
- आपमें
- उपपद्यते
- उचित है
- क्षुद्रम्
- तुच्छ
- हृदयदौर्बल्यम्
- हृदय की दुर्बलता को
- त्यक्त्वा
- त्यागकर
- उत्तिष्ठ
- खड़े हों
- परंतप
- हे शत्रुओं को तपाने वाले
अन्वय: पार्थ, क्लैब्यम् मा स्म गमः । एतत् त्वयि न उपपद्यते । परंतप, क्षुद्रम् हृदयदौर्बल्यम् त्यक्त्वा उत्तिष्ठ ।
हे पार्थ, कायरता को मत अपनाइए, यह आपमें शोभा नहीं देती। हे परंतप, हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर उठ खड़े हो जाइए।
2.4कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन
अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥4॥
kathaṃ bhīṣmam ahaṃ saṃkhye droṇaṃ ca madhusūdana |
iṣubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāv arisūdana
- कथम्
- कैसे
- भीष्मम्
- भीष्म से
- अहम्
- हम
- संख्ये
- युद्ध में
- द्रोणम्
- द्रोण से
- च
- और
- मधुसूदन
- हे मधुसूदन
- इषुभिः
- बाणों से
- प्रतियोत्स्यामि
- प्रतिकार में युद्ध करेंगे
- पूजार्हौ
- पूजा के योग्य दोनों
- अरिसूदन
- हे शत्रुनाशक
अन्वय: मधुसूदन, अरिसूदन, अहम् संख्ये पूजार्हौ भीष्मम् द्रोणम् च इषुभिः कथम् प्रतियोत्स्यामि ।
हे मधुसूदन, हे अरिसूदन, हम रणभूमि में पूजा के योग्य भीष्म और द्रोण के विरुद्ध बाणों से कैसे युद्ध करेंगे?
2.5गुरूनहत्वा हि महानुभावाञ्श्रेयो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके
गुरूनहत्वा हि महानुभावाञ्श्रेयो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥5॥
gurūn ahatvā hi mahānubhāvāñ śreyo bhoktuṃ bhaikṣam apīha loke |
hatvārthakāmāṃs tu gurūn ihaiva bhuñjīya bhogān rudhirapradigdhān
- गुरून्
- गुरुजनों को
- अहत्वा
- न मारकर
- हि
- निश्चय ही
- महानुभावान्
- महान प्रभाव वाले
- श्रेयः
- अधिक अच्छा
- भोक्तुम्
- भोगना
- भैक्षम्
- भिक्षा का अन्न
- अपि
- भी
- इह लोके
- इस लोक में
- हत्वा
- मारकर
- अर्थकामान्
- अर्थ और काम रूप
- तु
- तो
- गुरून्
- गुरुजनों को
- इह एव
- यहीं
- भुञ्जीय
- भोगेंगे
- भोगान्
- भोगों को
- रुधिरप्रदिग्धान्
- रक्त से सने
अन्वय: महानुभावान् गुरून् अहत्वा इह लोके भैक्षम् अपि भोक्तुम् हि श्रेयः । गुरून् हत्वा तु इह एव रुधिरप्रदिग्धान् अर्थकामान् भोगान् भुञ्जीय ।
इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी हमें अधिक अच्छा लगता है। गुरुजनों को मारकर तो हम यहाँ रक्त से सने हुए अर्थ और काम रूप भोग ही भोगेंगे।
2.6न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥6॥
na caitad vidmaḥ kataran no garīyo yad vā jayema yadi vā no jayeyuḥ |
yān eva hatvā na jijīviṣāmas te ’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ
- न च
- और नहीं
- एतत्
- यह
- विद्मः
- हम जानते
- कतरत्
- दोनों में कौन
- नः
- हमारे लिए
- गरीयः
- श्रेष्ठ
- यद् वा
- या तो
- जयेम
- हम जीतें
- यदि वा
- अथवा
- नः
- हमको
- जयेयुः
- वे जीतें
- यान्
- जिनको
- एव
- ही
- हत्वा
- मारकर
- न जिजीविषामः
- हम जीना नहीं चाहते
- ते
- वे
- अवस्थिताः
- खड़े हैं
- प्रमुखे
- सामने
- धार्तराष्ट्राः
- धृतराष्ट्र के पुत्र
अन्वय: एतत् च न विद्मः, नः कतरत् गरीयः, यद् वा जयेम यदि वा नः जयेयुः । यान् एव हत्वा न जिजीविषामः, ते धार्तराष्ट्राः प्रमुखे अवस्थिताः ।
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेष्ठ है, हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने खड़े हैं।
2.7कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥7॥
kārpaṇyadoṣopahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharmasaṃmūḍhacetāḥ |
yac chreyaḥ syān niścitaṃ brūhi tan me śiṣyas te ’haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam
- कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
- कायरता के दोष से नष्ट स्वभाव वाले
- पृच्छामि
- पूछते हैं
- त्वाम्
- आपसे
- धर्मसंमूढचेताः
- धर्म के विषय में मोहित चित्त वाले
- यत्
- जो
- श्रेयः
- कल्याणकारी
- स्यात्
- हो
- निश्चितम्
- निश्चित रूप से
- ब्रूहि
- कहिए
- तत्
- वह
- मे
- हमसे
- शिष्यः
- शिष्य
- ते
- आपका
- अहम्
- हम
- शाधि
- शिक्षा दीजिए
- माम्
- हमको
- त्वाम्
- आपकी
- प्रपन्नम्
- शरण में आए हुए
अन्वय: कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः धर्मसंमूढचेताः त्वाम् पृच्छामि । यत् निश्चितम् श्रेयः स्यात् तत् मे ब्रूहि । अहम् ते शिष्यः, त्वाम् प्रपन्नम् माम् शाधि ।
कायरता के दोष से स्वभाव खो चुके और धर्म के विषय में मोहित चित्त वाले हम आपसे पूछते हैं, जो निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह हमें कहिए। हम आपके शिष्य हैं, आपकी शरण में आए हुए हमको शिक्षा दीजिए।
2.8न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥8॥
na hi prapaśyāmi mamāpanudyād yac chokam ucchoṣaṇam indriyāṇām |
avāpya bhūmāv asapatnam ṛddhaṃ rājyaṃ surāṇām api cādhipatyam
- न हि
- नहीं
- प्रपश्यामि
- हम देखते
- मम
- हमारे
- अपनुद्यात्
- दूर कर सके
- यत्
- जो
- शोकम्
- शोक को
- उच्छोषणम्
- सुखा देने वाले
- इन्द्रियाणाम्
- इन्द्रियों को
- अवाप्य
- पाकर
- भूमौ
- पृथ्वी पर
- असपत्नम्
- निष्कण्टक
- ऋद्धम्
- समृद्ध
- राज्यम्
- राज्य
- सुराणाम्
- देवताओं का
- अपि
- भी
- च
- और
- आधिपत्यम्
- स्वामित्व
अन्वय: भूमौ असपत्नम् ऋद्धम् राज्यम् सुराणाम् आधिपत्यम् च अपि अवाप्य, यत् मम इन्द्रियाणाम् उच्छोषणम् शोकम् अपनुद्यात्, न हि प्रपश्यामि ।
पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य और देवताओं का स्वामित्व पाकर भी हमें ऐसा कुछ नहीं दिखता जो हमारी इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक को दूर कर सके।
2.9एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परंतप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥9॥
evam uktvā hṛṣīkeśaṃ guḍākeśaḥ paraṃtapa |
na yotsya iti govindam uktvā tūṣṇīṃ babhūva ha
- एवम्
- इस प्रकार
- उक्त्वा
- कहकर
- हृषीकेशम्
- हृषीकेश श्रीकृष्ण से
- गुडाकेशः
- निद्रा को जीतने वाले अर्जुन
- परंतप
- हे परंतप धृतराष्ट्र
- न योत्स्ये
- हम युद्ध नहीं करेंगे
- इति
- ऐसा
- गोविन्दम्
- गोविन्द से
- उक्त्वा
- कहकर
- तूष्णीम्
- मौन
- बभूव
- हो गए
- ह
- निश्चय ही
अन्वय: परंतप, गुडाकेशः हृषीकेशम् एवम् उक्त्वा, गोविन्दम् ‘न योत्स्ये’ इति उक्त्वा तूष्णीम् बभूव ह ।
हे परंतप धृतराष्ट्र, निद्रा को जीतने वाले अर्जुन हृषीकेश से इस प्रकार कहकर, फिर गोविन्द से “हम युद्ध नहीं करेंगे” ऐसा कहकर मौन हो गए।
2.10तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥10॥
tam uvāca hṛṣīkeśaḥ prahasann iva bhārata |
senayor ubhayor madhye viṣīdantam idaṃ vacaḥ
- तम्
- उनसे
- उवाच
- बोले
- हृषीकेशः
- हृषीकेश
- प्रहसन् इव
- मानो हँसते हुए
- भारत
- हे भारत धृतराष्ट्र
- सेनयोः उभयोः
- दोनों सेनाओं के
- मध्ये
- बीच में
- विषीदन्तम्
- शोक करते हुए
- इदम्
- यह
- वचः
- वचन
अन्वय: भारत, सेनयोः उभयोः मध्ये विषीदन्तम् तम् हृषीकेशः प्रहसन् इव इदम् वचः उवाच ।
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र, दोनों सेनाओं के बीच शोक में डूबे उस अर्जुन से हृषीकेश ने मानो हँसते हुए यह वचन कहा।
2.11अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥11॥
aśocyān anvaśocas tvaṃ prajñāvādāṃś ca bhāṣase |
gatāsūn agatāsūṃś ca nānuśocanti paṇḍitāḥ
- अशोच्यान्
- शोक न करने योग्य के लिए
- अन्वशोचः
- आपने शोक किया
- त्वम्
- आप
- प्रज्ञावादान्
- पण्डितों जैसे वचन
- च
- और
- भाषसे
- बोलते हैं
- गतासून्
- जिनके प्राण चले गए
- अगतासून्
- जिनके प्राण नहीं गए
- च
- और
- न अनुशोचन्ति
- शोक नहीं करते
- पण्डिताः
- ज्ञानी लोग
अन्वय: त्वम् अशोच्यान् अन्वशोचः प्रज्ञावादान् च भाषसे । पण्डिताः गतासून् अगतासून् च न अनुशोचन्ति ।
आप उनके लिए शोक करते हैं जो शोक के योग्य नहीं हैं, और साथ ही पण्डितों जैसे वचन बोलते हैं। ज्ञानी लोग न तो उनके लिए शोक करते हैं जिनके प्राण चले गए, न उनके लिए जिनके प्राण अभी हैं।
2.12न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥12॥
na tv evāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ |
na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayam ataḥ param
- न तु एव
- ऐसा भी नहीं
- अहम्
- मैं
- जातु
- किसी काल में
- न आसम्
- नहीं था
- न त्वम्
- न आप
- न इमे
- न ये
- जनाधिपाः
- राजा लोग
- न च एव
- और न ही
- न भविष्यामः
- नहीं रहेंगे
- सर्वे
- सब
- वयम्
- हम
- अतः परम्
- इसके बाद
अन्वय: न तु एव अहम् जातु न आसम्, न त्वम्, न इमे जनाधिपाः । न च एव अतः परम् सर्वे वयम् न भविष्यामः ।
ऐसा नहीं कि मैं किसी काल में नहीं था, या आप नहीं थे, या ये राजा लोग नहीं थे। और ऐसा भी नहीं कि इसके बाद हम सब नहीं रहेंगे।
2.13देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥13॥
dehino ’smin yathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā |
tathā dehāntaraprāptir dhīras tatra na muhyati
- देहिनः
- देहधारी आत्मा के
- अस्मिन्
- इस
- यथा
- जैसे
- देहे
- देह में
- कौमारम्
- बालपन
- यौवनम्
- युवावस्था
- जरा
- वृद्धावस्था
- तथा
- वैसे ही
- देहान्तरप्राप्तिः
- दूसरे देह की प्राप्ति
- धीरः
- धीर पुरुष
- तत्र
- उसमें
- न मुह्यति
- मोहित नहीं होता
अन्वय: यथा देहिनः अस्मिन् देहे कौमारम् यौवनम् जरा, तथा देहान्तरप्राप्तिः । धीरः तत्र न मुह्यति ।
जैसे देहधारी आत्मा के इस देह में बालपन, युवावस्था और वृद्धावस्था आती हैं, वैसे ही दूसरे देह की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होता।
2.14मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥14॥
mātrāsparśās tu kaunteya śītoṣṇasukhaduḥkhadāḥ |
āgamāpāyino ’nityās tāṃs titikṣasva bhārata
- मात्रास्पर्शाः
- इन्द्रियों और विषयों के संयोग
- तु
- तो
- कौन्तेय
- हे कुन्तीपुत्र
- शीतोष्णसुखदुःखदाः
- सर्दी गर्मी सुख दुःख देने वाले
- आगमापायिनः
- आने जाने वाले
- अनित्याः
- अनित्य
- तान्
- उनको
- तितिक्षस्व
- सहन कीजिए
- भारत
- हे भारत
अन्वय: कौन्तेय, मात्रास्पर्शाः तु शीतोष्णसुखदुःखदाः आगमापायिनः अनित्याः । भारत, तान् तितिक्षस्व ।
हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों और विषयों के संयोग सर्दी गर्मी और सुख दुःख देने वाले हैं, वे आते जाते हैं और अनित्य हैं। हे भारत, उन्हें सहन कीजिए।
2.15यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥15॥
yaṃ hi na vyathayanty ete puruṣaṃ puruṣarṣabha |
samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so ’mṛtatvāya kalpate
- यम्
- जिस
- हि
- निश्चय
- न व्यथयन्ति
- व्यथित नहीं करते
- एते
- ये संयोग
- पुरुषम्
- पुरुष को
- पुरुषर्षभ
- हे पुरुषों में श्रेष्ठ
- समदुःखसुखम्
- दुःख सुख में समान
- धीरम्
- धीर
- सः
- वह
- अमृतत्वाय
- अमरत्व के लिए
- कल्पते
- योग्य होता है
अन्वय: पुरुषर्षभ, एते यम् समदुःखसुखम् धीरम् पुरुषम् न व्यथयन्ति, सः हि अमृतत्वाय कल्पते ।
हे पुरुषों में श्रेष्ठ, सुख और दुःख में समान रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये संयोग व्यथित नहीं करते, वह अमरत्व के योग्य होता है।
2.16नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥16॥
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ |
ubhayor api dṛṣṭo ’ntas tv anayos tattvadarśibhiḥ
- न
- नहीं
- असतः
- असत् का
- विद्यते
- है
- भावः
- अस्तित्व
- न
- नहीं
- अभावः
- अभाव
- विद्यते
- है
- सतः
- सत् का
- उभयोः
- दोनों का
- अपि
- भी
- दृष्टः
- देखा गया है
- अन्तः
- निर्णय
- तु
- ही
- अनयोः
- इन दोनों का
- तत्त्वदर्शिभिः
- तत्त्व को देखने वालों द्वारा
अन्वय: असतः भावः न विद्यते, सतः अभावः न विद्यते । अनयोः उभयोः अपि अन्तः तु तत्त्वदर्शिभिः दृष्टः ।
असत् का अस्तित्व नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। तत्त्व को देखने वाले ज्ञानियों ने इन दोनों का यह निर्णय देखा है।
2.17अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥17॥
avināśi tu tad viddhi yena sarvam idaṃ tatam |
vināśam avyayasyāsya na kaś cit kartum arhati
- अविनाशि
- अविनाशी
- तु
- तो
- तत्
- उसको
- विद्धि
- जानिए
- येन
- जिससे
- सर्वम्
- सम्पूर्ण
- इदम्
- यह जगत
- ततम्
- व्याप्त है
- विनाशम्
- विनाश
- अव्ययस्य
- अविनाशी
- अस्य
- इसका
- न कश्चित्
- कोई भी नहीं
- कर्तुम्
- करने में
- अर्हति
- समर्थ है
अन्वय: येन इदम् सर्वम् ततम्, तत् तु अविनाशि विद्धि । अस्य अव्ययस्य विनाशम् कर्तुम् न कश्चित् अर्हति ।
जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, उसे आप अविनाशी जानिए। इस अव्यय का विनाश कोई भी नहीं कर सकता।
2.18अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥18॥
antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ |
anāśino ’prameyasya tasmād yudhyasva bhārata
- अन्तवन्तः
- नाशवान
- इमे
- ये
- देहाः
- शरीर
- नित्यस्य
- नित्य
- उक्ताः
- कहे गए हैं
- शरीरिणः
- शरीरधारी आत्मा के
- अनाशिनः
- अविनाशी
- अप्रमेयस्य
- अप्रमेय
- तस्मात्
- इसलिए
- युध्यस्व
- युद्ध कीजिए
- भारत
- हे भारत
अन्वय: नित्यस्य अनाशिनः अप्रमेयस्य शरीरिणः इमे देहाः अन्तवन्तः उक्ताः । तस्मात् भारत युध्यस्व ।
नित्य, अविनाशी और अप्रमेय आत्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत, आप युद्ध कीजिए।
2.19य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥19॥
ya enaṃ vetti hantāraṃ yaś cainaṃ manyate hatam |
ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate
- यः
- जो
- एनम्
- इस आत्मा को
- वेत्ति
- जानता है
- हन्तारम्
- मारने वाला
- यः च
- और जो
- एनम्
- इसको
- मन्यते
- मानता है
- हतम्
- मारा गया
- उभौ तौ
- वे दोनों
- न विजानीतः
- नहीं जानते
- न अयम्
- न यह
- हन्ति
- मारता है
- न हन्यते
- न मारा जाता है
अन्वय: यः एनम् हन्तारम् वेत्ति, यः च एनम् हतम् मन्यते, तौ उभौ न विजानीतः । अयम् न हन्ति, न हन्यते ।
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मारा गया मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। यह न मारता है और न मारा जाता है।
2.20न जायते म्रियते वा कदा चिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः
न जायते म्रियते वा कदा चिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥20॥
na jāyate mriyate vā kadā cin nāyaṃ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ |
ajo nityaḥ śāśvato ’yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre
- न जायते
- न जन्मता है
- म्रियते
- मरता है
- वा
- अथवा
- कदाचित्
- कभी
- न
- नहीं
- अयम्
- यह
- भूत्वा
- होकर
- भविता
- होने वाला
- वा
- अथवा
- न भूयः
- फिर नहीं
- अजः
- अजन्मा
- नित्यः
- नित्य
- शाश्वतः
- शाश्वत
- अयम्
- यह
- पुराणः
- पुरातन
- न हन्यते
- नहीं मारा जाता
- हन्यमाने
- मारे जाने पर
- शरीरे
- शरीर के
अन्वय: अयम् कदाचित् न जायते न वा म्रियते, न वा भूत्वा भूयः न भविता । अयम् अजः नित्यः शाश्वतः पुराणः, शरीरे हन्यमाने न हन्यते ।
यह आत्मा न कभी जन्मता है और न मरता है, न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
2.21वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥21॥
vedāvināśinaṃ nityaṃ ya enam ajam avyayam |
kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha kaṃ ghātayati hanti kam
- वेद
- जानता है
- अविनाशिनम्
- अविनाशी
- नित्यम्
- नित्य
- यः
- जो
- एनम्
- इस आत्मा को
- अजम्
- अजन्मा
- अव्ययम्
- अव्यय
- कथम्
- कैसे
- सः
- वह
- पुरुषः
- पुरुष
- पार्थ
- हे पार्थ
- कम्
- किसको
- घातयति
- मरवाता है
- हन्ति
- मारता है
- कम्
- किसको
अन्वय: पार्थ, यः एनम् अविनाशिनम् नित्यम् अजम् अव्ययम् वेद, सः पुरुषः कथम् कम् घातयति, कम् हन्ति ।
हे पार्थ, जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मरवाएगा या किसी को मारेगा?
2.22वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥22॥
vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro ’parāṇi |
tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇāny anyāni saṃyāti navāni dehī
- वासांसि
- वस्त्रों को
- जीर्णानि
- पुराने
- यथा
- जैसे
- विहाय
- त्यागकर
- नवानि
- नए
- गृह्णाति
- ग्रहण करता है
- नरः
- मनुष्य
- अपराणि
- दूसरे
- तथा
- वैसे ही
- शरीराणि
- शरीरों को
- विहाय
- त्यागकर
- जीर्णानि
- जीर्ण
- अन्यानि
- दूसरे
- संयाति
- प्राप्त करता है
- नवानि
- नए
- देही
- देहधारी आत्मा
अन्वय: यथा नरः जीर्णानि वासांसि विहाय अपराणि नवानि गृह्णाति, तथा देही जीर्णानि शरीराणि विहाय अन्यानि नवानि संयाति ।
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र ग्रहण करता है, वैसे ही देहधारी आत्मा जीर्ण शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करता है।
2.23नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥23॥
nainaṃ chindanti śastrāṇi nainaṃ dahati pāvakaḥ |
na cainaṃ kledayanty āpo na śoṣayati mārutaḥ
- न एनम्
- इसको नहीं
- छिन्दन्ति
- काटते हैं
- शस्त्राणि
- शस्त्र
- न एनम्
- इसको नहीं
- दहति
- जलाती है
- पावकः
- अग्नि
- न च एनम्
- और न इसको
- क्लेदयन्ति
- गीला करते हैं
- आपः
- जल
- न शोषयति
- नहीं सुखाता
- मारुतः
- वायु
अन्वय: एनम् शस्त्राणि न छिन्दन्ति, एनम् पावकः न दहति, एनम् आपः च न क्लेदयन्ति, मारुतः न शोषयति ।
इस आत्मा को शस्त्र नहीं काटते, इसे अग्नि नहीं जलाती। इसे जल गीला नहीं करता और वायु नहीं सुखाता।
2.24अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥24॥
acchedyo ’yam adāhyo ’yam akledyo ’śoṣya eva ca |
nityaḥ sarvagataḥ sthāṇur acalo ’yaṃ sanātanaḥ
- अच्छेद्यः
- न काटा जा सकने वाला
- अयम्
- यह
- अदाह्यः
- न जलाया जा सकने वाला
- अयम्
- यह
- अक्लेद्यः
- न गीला किया जा सकने वाला
- अशोष्यः
- न सुखाया जा सकने वाला
- एव च
- और निश्चय ही
- नित्यः
- नित्य
- सर्वगतः
- सर्वव्यापी
- स्थाणुः
- स्थिर
- अचलः
- अचल
- अयम्
- यह
- सनातनः
- सनातन
अन्वय: अयम् अच्छेद्यः, अयम् अदाह्यः, अयम् अक्लेद्यः अशोष्यः एव च । अयम् नित्यः सर्वगतः स्थाणुः अचलः सनातनः ।
यह आत्मा काटा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता, गीला नहीं किया जा सकता और सुखाया नहीं जा सकता। यह नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।
2.25अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥25॥
avyakto ’yam acintyo ’yam avikāryo ’yam ucyate |
tasmād evaṃ viditvainaṃ nānuśocitum arhasi
- अव्यक्तः
- अव्यक्त
- अयम्
- यह
- अचिन्त्यः
- अचिन्त्य
- अयम्
- यह
- अविकार्यः
- विकाररहित
- अयम्
- यह
- उच्यते
- कहा जाता है
- तस्मात्
- इसलिए
- एवम्
- इस प्रकार
- विदित्वा
- जानकर
- एनम्
- इसको
- न अनुशोचितुम्
- शोक करने के नहीं
- अर्हसि
- योग्य हैं
अन्वय: अयम् अव्यक्तः, अयम् अचिन्त्यः, अयम् अविकार्यः उच्यते । तस्मात् एनम् एवम् विदित्वा अनुशोचितुम् न अर्हसि ।
यह आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और विकाररहित कहा जाता है। इसलिए इसे ऐसा जानकर आपको शोक करना उचित नहीं है।
2.26अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥26॥
atha cainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam |
tathāpi tvaṃ mahābāho nainaṃ śocitum arhasi
- अथ च
- और यदि
- एनम्
- इस आत्मा को
- नित्यजातम्
- सदा जन्मने वाला
- नित्यम्
- सदा
- वा
- अथवा
- मन्यसे
- आप मानते हैं
- मृतम्
- मरने वाला
- तथापि
- तो भी
- त्वम्
- आप
- महाबाहो
- हे महाबाहु
- न एनम्
- इसके लिए नहीं
- शोचितुम्
- शोक करने के
- अर्हसि
- योग्य हैं
अन्वय: महाबाहो, अथ च एनम् नित्यजातम् नित्यम् वा मृतम् मन्यसे, तथापि त्वम् एनम् शोचितुम् न अर्हसि ।
हे महाबाहु, और यदि आप इस आत्मा को सदा जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानते हैं, तो भी आपको इसके लिए शोक करना उचित नहीं है।
2.27जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥27॥
jātasya hi dhruvo mṛtyur dhruvaṃ janma mṛtasya ca |
tasmād aparihārye ’rthe na tvaṃ śocitum arhasi
- जातस्य
- जन्मे हुए की
- हि
- क्योंकि
- ध्रुवः
- निश्चित
- मृत्युः
- मृत्यु
- ध्रुवम्
- निश्चित
- जन्म
- जन्म
- मृतस्य
- मरे हुए का
- च
- और
- तस्मात्
- इसलिए
- अपरिहार्ये
- जिसका उपाय न हो
- अर्थे
- विषय में
- न त्वम्
- आप नहीं
- शोचितुम्
- शोक करने के
- अर्हसि
- योग्य हैं
अन्वय: जातस्य हि मृत्युः ध्रुवः, मृतस्य च जन्म ध्रुवम् । तस्मात् अपरिहार्ये अर्थे त्वम् शोचितुम् न अर्हसि ।
क्योंकि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है। इसलिए जिस बात का कोई उपाय नहीं, उसके विषय में आपको शोक करना उचित नहीं है।
2.28अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥28॥
avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata |
avyaktanidhanāny eva tatra kā paridevanā
- अव्यक्तादीनि
- आरम्भ में अप्रकट
- भूतानि
- प्राणी
- व्यक्तमध्यानि
- मध्य में प्रकट
- भारत
- हे भारत
- अव्यक्तनिधनानि
- अन्त में अप्रकट
- एव
- ही
- तत्र
- उसमें
- का
- क्या
- परिदेवना
- विलाप
अन्वय: भारत, भूतानि अव्यक्तादीनि व्यक्तमध्यानि अव्यक्तनिधनानि एव । तत्र का परिदेवना ।
हे भारत, सब प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे, बीच में प्रकट हैं और मरने पर फिर अप्रकट हो जाते हैं। इसमें विलाप की क्या बात है?
2.29आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥29॥
āścaryavat paśyati kaś cid enam āścaryavad vadati tathaiva cānyaḥ |
āścaryavac cainam anyaḥ śṛṇoti śrutvāpy enaṃ veda na caiva kaś cit
- आश्चर्यवत्
- आश्चर्य की तरह
- पश्यति
- देखता है
- कश्चित्
- कोई
- एनम्
- इस आत्मा को
- आश्चर्यवत्
- आश्चर्य की तरह
- वदति
- कहता है
- तथा एव
- वैसे ही
- च
- और
- अन्यः
- दूसरा
- आश्चर्यवत्
- आश्चर्य की तरह
- च
- और
- एनम्
- इसको
- अन्यः
- दूसरा
- शृणोति
- सुनता है
- श्रुत्वा अपि
- सुनकर भी
- एनम्
- इसको
- वेद
- जानता है
- न च एव
- नहीं ही
- कश्चित्
- कोई
अन्वय: कश्चित् एनम् आश्चर्यवत् पश्यति, तथा एव च अन्यः आश्चर्यवत् वदति, अन्यः च एनम् आश्चर्यवत् शृणोति । श्रुत्वा अपि च एनम् कश्चित् न एव वेद ।
कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, वैसे ही कोई दूसरा इसे आश्चर्य की तरह कहता है और कोई अन्य इसे आश्चर्य की तरह सुनता है। सुनकर भी इसे कोई नहीं जानता।
2.30देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥30॥
dehī nityam avadhyo ’yaṃ dehe sarvasya bhārata |
tasmāt sarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitum arhasi
- देही
- देहधारी आत्मा
- नित्यम्
- सदा
- अवध्यः
- अवध्य
- अयम्
- यह
- देहे
- देह में
- सर्वस्य
- सबके
- भारत
- हे भारत
- तस्मात्
- इसलिए
- सर्वाणि
- सब
- भूतानि
- प्राणियों के लिए
- न त्वम्
- आप नहीं
- शोचितुम्
- शोक करने के
- अर्हसि
- योग्य हैं
अन्वय: भारत, सर्वस्य देहे अयम् देही नित्यम् अवध्यः । तस्मात् त्वम् सर्वाणि भूतानि शोचितुम् न अर्हसि ।
हे भारत, सबके देह में रहने वाला यह आत्मा सदा अवध्य है। इसलिए किसी भी प्राणी के लिए आपको शोक करना उचित नहीं है।
2.31स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥31॥
svadharmam api cāvekṣya na vikampitum arhasi |
dharmyād dhi yuddhāc chreyo ’nyat kṣatriyasya na vidyate
- स्वधर्मम्
- अपने धर्म को
- अपि च
- भी
- अवेक्ष्य
- देखकर
- न विकम्पितुम्
- विचलित होने के नहीं
- अर्हसि
- योग्य हैं
- धर्म्यात्
- धर्मयुक्त
- हि
- क्योंकि
- युद्धात्
- युद्ध से
- श्रेयः
- श्रेष्ठ
- अन्यत्
- दूसरा
- क्षत्रियस्य
- क्षत्रिय के लिए
- न विद्यते
- नहीं है
अन्वय: स्वधर्मम् अपि च अवेक्ष्य विकम्पितुम् न अर्हसि । क्षत्रियस्य हि धर्म्यात् युद्धात् अन्यत् श्रेयः न विद्यते ।
अपने धर्म को देखकर भी आपको विचलित होना उचित नहीं है। क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है।
2.32यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥32॥
yadṛcchayā copapannaṃ svargadvāram apāvṛtam |
sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddham īdṛśam
- यदृच्छया
- अपने आप
- च
- और
- उपपन्नम्
- प्राप्त हुआ
- स्वर्गद्वारम्
- स्वर्ग का द्वार
- अपावृतम्
- खुला हुआ
- सुखिनः
- भाग्यवान
- क्षत्रियाः
- क्षत्रिय
- पार्थ
- हे पार्थ
- लभन्ते
- पाते हैं
- युद्धम्
- युद्ध को
- ईदृशम्
- ऐसे
अन्वय: पार्थ, यदृच्छया च उपपन्नम् अपावृतम् स्वर्गद्वारम् ईदृशम् युद्धम् सुखिनः क्षत्रियाः लभन्ते ।
हे पार्थ, अपने आप प्राप्त हुआ और स्वर्ग का खुला द्वार बना हुआ ऐसा युद्ध भाग्यवान क्षत्रियों को ही मिलता है।
2.33अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥33॥
atha cet tvam imaṃ dharmyaṃ saṃgrāmaṃ na kariṣyasi |
tataḥ svadharmaṃ kīrtiṃ ca hitvā pāpam avāpsyasi
- अथ
- और
- चेत्
- यदि
- त्वम्
- आप
- इमम्
- इस
- धर्म्यम्
- धर्मयुक्त
- संग्रामम्
- युद्ध को
- न करिष्यसि
- नहीं करेंगे
- ततः
- तो
- स्वधर्मम्
- अपने धर्म को
- कीर्तिम्
- कीर्ति को
- च
- और
- हित्वा
- खोकर
- पापम्
- पाप को
- अवाप्स्यसि
- प्राप्त करेंगे
अन्वय: अथ चेत् त्वम् इमम् धर्म्यम् संग्रामम् न करिष्यसि, ततः स्वधर्मम् कीर्तिम् च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि ।
और यदि आप इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेंगे, तो अपने धर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करेंगे।
2.34अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥34॥
akīrtiṃ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te ’vyayām |
saṃbhāvitasya cākīrtir maraṇād atiricyate
- अकीर्तिम्
- अपकीर्ति को
- च अपि
- और भी
- भूतानि
- सब लोग
- कथयिष्यन्ति
- कहेंगे
- ते
- आपकी
- अव्ययाम्
- अमिट
- संभावितस्य
- सम्मानित पुरुष के लिए
- च
- और
- अकीर्तिः
- अपकीर्ति
- मरणात्
- मरण से
- अतिरिच्यते
- बढ़कर है
अन्वय: भूतानि च अपि ते अव्ययाम् अकीर्तिम् कथयिष्यन्ति । संभावितस्य च अकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते ।
और सब लोग आपकी अमिट अपकीर्ति की चर्चा करेंगे। सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है।
2.35भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥35॥
bhayād raṇād uparataṃ maṃsyante tvāṃ mahārathāḥ |
yeṣāṃ ca tvaṃ bahumato bhūtvā yāsyasi lāghavam
- भयात्
- भय से
- रणात्
- युद्ध से
- उपरतम्
- हटा हुआ
- मंस्यन्ते
- मानेंगे
- त्वाम्
- आपको
- महारथाः
- महारथी
- येषाम्
- जिनके लिए
- च
- और
- त्वम्
- आप
- बहुमतः
- बहुत सम्मानित
- भूत्वा
- होकर
- यास्यसि
- प्राप्त होंगे
- लाघवम्
- लघुता को
अन्वय: महारथाः त्वाम् भयात् रणात् उपरतम् मंस्यन्ते । येषाम् च त्वम् बहुमतः भूत्वा लाघवम् यास्यसि ।
महारथी लोग आपको भय से युद्ध से हटा हुआ मानेंगे। जिनकी दृष्टि में आप बहुत सम्मानित रहे हैं, उनकी दृष्टि में आप लघुता को प्राप्त होंगे।
2.36अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥36॥
avācyavādāṃś ca bahūn vadiṣyanti tavāhitāḥ |
nindantas tava sāmarthyaṃ tato duḥkhataraṃ nu kim
- अवाच्यवादान्
- न कहने योग्य वचन
- च
- और
- बहून्
- बहुत
- वदिष्यन्ति
- कहेंगे
- तव
- आपके
- अहिताः
- शत्रु
- निन्दन्तः
- निन्दा करते हुए
- तव
- आपके
- सामर्थ्यम्
- सामर्थ्य की
- ततः
- इससे
- दुःखतरम्
- अधिक दुःखदायी
- नु
- भला
- किम्
- क्या
अन्वय: तव अहिताः च तव सामर्थ्यम् निन्दन्तः बहून् अवाच्यवादान् वदिष्यन्ति । ततः दुःखतरम् नु किम् ।
आपके शत्रु आपके सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत से न कहने योग्य वचन कहेंगे। इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या होगी?
2.37हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥37॥
hato vā prāpsyasi svargaṃ jitvā vā bhokṣyase mahīm |
tasmād uttiṣṭha kaunteya yuddhāya kṛtaniścayaḥ
- हतः
- मारे जाकर
- वा
- या
- प्राप्स्यसि
- पाएँगे
- स्वर्गम्
- स्वर्ग को
- जित्वा
- जीतकर
- वा
- या
- भोक्ष्यसे
- भोगेंगे
- महीम्
- पृथ्वी को
- तस्मात्
- इसलिए
- उत्तिष्ठ
- उठिए
- कौन्तेय
- हे कुन्तीपुत्र
- युद्धाय
- युद्ध के लिए
- कृतनिश्चयः
- निश्चय करके
अन्वय: हतः वा स्वर्गम् प्राप्स्यसि, जित्वा वा महीम् भोक्ष्यसे । तस्मात् कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः उत्तिष्ठ ।
या तो आप मारे जाकर स्वर्ग पाएँगे, या जीतकर पृथ्वी को भोगेंगे। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, युद्ध का निश्चय करके उठ खड़े हो जाइए।
2.38सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥38॥
sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau |
tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpam avāpsyasi
- सुखदुःखे
- सुख और दुःख को
- समे
- समान
- कृत्वा
- करके
- लाभालाभौ
- लाभ और हानि को
- जयाजयौ
- जय और पराजय को
- ततः
- फिर
- युद्धाय
- युद्ध के लिए
- युज्यस्व
- जुट जाइए
- न
- नहीं
- एवम्
- इस प्रकार
- पापम्
- पाप को
- अवाप्स्यसि
- प्राप्त करेंगे
अन्वय: सुखदुःखे लाभालाभौ जयाजयौ समे कृत्वा ततः युद्धाय युज्यस्व । एवम् पापम् न अवाप्स्यसि ।
सुख और दुःख, लाभ और हानि, जय और पराजय को समान समझकर फिर युद्ध के लिए जुट जाइए। ऐसा करने से आप पाप को प्राप्त नहीं करेंगे।
2.39एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥39॥
eṣā te ’bhihitā sāṃkhye buddhir yoge tv imāṃ śṛṇu |
buddhyā yukto yayā pārtha karmabandhaṃ prahāsyasi
- एषा
- यह
- ते
- आपके लिए
- अभिहिता
- कही गई
- सांख्ये
- सांख्य के विषय में
- बुद्धिः
- बुद्धि
- योगे
- योग के विषय में
- तु
- अब
- इमाम्
- इसको
- शृणु
- सुनिए
- बुद्ध्या
- बुद्धि से
- युक्तः
- युक्त होकर
- यया
- जिससे
- पार्थ
- हे पार्थ
- कर्मबन्धम्
- कर्म के बन्धन को
- प्रहास्यसि
- त्याग देंगे
अन्वय: पार्थ, एषा ते सांख्ये बुद्धिः अभिहिता । योगे तु इमाम् शृणु, यया बुद्ध्या युक्तः कर्मबन्धम् प्रहास्यसि ।
हे पार्थ, यह बुद्धि आपके लिए सांख्य के विषय में कही गई। अब योग के विषय में इसे सुनिए, जिस बुद्धि से युक्त होकर आप कर्म के बन्धन को त्याग देंगे।
2.40नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥40॥
nehābhikramanāśo ’sti pratyavāyo na vidyate |
svalpam apy asya dharmasya trāyate mahato bhayāt
- न
- नहीं
- इह
- इस योग में
- अभिक्रमनाशः
- आरम्भ का नाश
- अस्ति
- है
- प्रत्यवायः
- विपरीत फल का दोष
- न विद्यते
- नहीं है
- स्वल्पम्
- थोड़ा
- अपि
- भी
- अस्य
- इस
- धर्मस्य
- धर्म का
- त्रायते
- रक्षा करता है
- महतः
- महान
- भयात्
- भय से
अन्वय: इह अभिक्रमनाशः न अस्ति, प्रत्यवायः न विद्यते । अस्य धर्मस्य स्वल्पम् अपि महतः भयात् त्रायते ।
इस योग में आरम्भ का नाश नहीं होता और विपरीत फल का दोष भी नहीं है। इस धर्म का थोड़ा सा भी पालन महान भय से रक्षा करता है।
2.41व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥41॥
vyavasāyātmikā buddhir ekeha kurunandana |
bahuśākhā hy anantāś ca buddhayo ’vyavasāyinām
- व्यवसायात्मिका
- निश्चय वाली
- बुद्धिः
- बुद्धि
- एका
- एक ही
- इह
- इस योग में
- कुरुनन्दन
- हे कुरुनन्दन
- बहुशाखाः
- बहुत शाखाओं वाली
- हि
- क्योंकि
- अनन्ताः
- अनन्त
- च
- और
- बुद्धयः
- बुद्धियाँ
- अव्यवसायिनाम्
- निश्चयरहित पुरुषों की
अन्वय: कुरुनन्दन, इह व्यवसायात्मिका बुद्धिः एका । अव्यवसायिनाम् बुद्धयः हि बहुशाखाः अनन्ताः च ।
हे कुरुनन्दन, इस योग में निश्चय वाली बुद्धि एक ही होती है। निश्चयरहित पुरुषों की बुद्धियाँ बहुत शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं।
2.42यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥42॥
yām imāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadanty avipaścitaḥ |
vedavādaratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥ
- याम् इमाम्
- जो यह
- पुष्पिताम्
- फूली हुई दिखावटी
- वाचम्
- वाणी को
- प्रवदन्ति
- कहते हैं
- अविपश्चितः
- अविवेकी लोग
- वेदवादरताः
- वेद के वचनों में रमे हुए
- पार्थ
- हे पार्थ
- न अन्यत् अस्ति
- और कुछ नहीं है
- इति
- ऐसा
- वादिनः
- कहने वाले
अन्वय: पार्थ, वेदवादरताः ‘न अन्यत् अस्ति’ इति वादिनः अविपश्चितः याम् इमाम् पुष्पिताम् वाचम् प्रवदन्ति ।
हे पार्थ, वेद के वचनों में रमे हुए और “इसके सिवा और कुछ नहीं है” ऐसा कहने वाले अविवेकी लोग यह फूली हुई दिखावटी वाणी कहते हैं।
2.43कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥43॥
kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām |
kriyāviśeṣabahulāṃ bhogaiśvaryagatiṃ prati
- कामात्मानः
- कामनाओं से भरे
- स्वर्गपराः
- स्वर्ग को ही परम मानने वाले
- जन्मकर्मफलप्रदाम्
- जन्म और कर्मफल देने वाली
- क्रियाविशेषबहुलाम्
- अनेक विशेष क्रियाओं से भरी
- भोगैश्वर्यगतिम्
- भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति
- प्रति
- के लिए
अन्वय: कामात्मानः स्वर्गपराः भोगैश्वर्यगतिम् प्रति क्रियाविशेषबहुलाम् जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
वे कामनाओं से भरे और स्वर्ग को ही परम मानने वाले लोग ऐसी वाणी कहते हैं जो जन्म और कर्मफल देने वाली है और भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अनेक विशेष क्रियाओं का विस्तार करती है।
2.44भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥44॥
bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām |
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate
- भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्
- भोग और ऐश्वर्य में आसक्त लोगों की
- तया
- उस वाणी से
- अपहृतचेतसाम्
- हरे गए चित्त वालों की
- व्यवसायात्मिका
- निश्चय वाली
- बुद्धिः
- बुद्धि
- समाधौ
- समाधि में
- न विधीयते
- स्थिर नहीं होती
अन्वय: तया अपहृतचेतसाम् भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम् व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ।
उस वाणी से जिनका चित्त हर लिया गया है, उन भोग और ऐश्वर्य में आसक्त लोगों की निश्चय वाली बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती।
2.45त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वंद्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥45॥
traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna |
nirdvaṃdvo nityasattvastho niryogakṣema ātmavān
- त्रैगुण्यविषयाः
- तीनों गुणों के विषय वाले
- वेदाः
- वेद
- निस्त्रैगुण्यः
- तीनों गुणों से रहित
- भव
- हो जाइए
- अर्जुन
- हे अर्जुन
- निर्द्वन्द्वः
- द्वन्द्वों से रहित
- नित्यसत्त्वस्थः
- सदा सत्त्व में स्थित
- निर्योगक्षेमः
- प्राप्ति और रक्षा की चिन्ता से रहित
- आत्मवान्
- आत्मा में स्थित
अन्वय: अर्जुन, वेदाः त्रैगुण्यविषयाः । निस्त्रैगुण्यः निर्द्वन्द्वः नित्यसत्त्वस्थः निर्योगक्षेमः आत्मवान् भव ।
हे अर्जुन, वेद तीनों गुणों के विषयों का वर्णन करते हैं। आप तीनों गुणों से रहित, द्वन्द्वों से मुक्त, सदा सत्त्व में स्थित, प्राप्ति और रक्षा की चिन्ता से रहित और आत्मा में स्थित हो जाइए।
2.46यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥46॥
yāvān artha udapāne sarvataḥ saṃplutodake |
tāvān sarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ
- यावान्
- जितना
- अर्थः
- प्रयोजन
- उदपाने
- छोटे जलाशय में
- सर्वतः
- सब ओर से
- संप्लुतोदके
- भरे हुए जल में
- तावान्
- उतना ही
- सर्वेषु
- सब
- वेदेषु
- वेदों में
- ब्राह्मणस्य
- ब्रह्मज्ञानी का
- विजानतः
- तत्त्व जानने वाले का
अन्वय: सर्वतः संप्लुतोदके यावान् अर्थः उदपाने, तावान् विजानतः ब्राह्मणस्य सर्वेषु वेदेषु ।
सब ओर से भरे हुए महान जलाशय के मिल जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, तत्त्व को जानने वाले ब्रह्मज्ञानी का सब वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।
2.47कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदा चन
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदा चन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥47॥
karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadā cana |
mā karmaphalahetur bhūr mā te saṅgo ’stv akarmaṇi
- कर्मणि
- कर्म में
- एव
- ही
- अधिकारः
- अधिकार
- ते
- आपका
- मा
- नहीं
- फलेषु
- फलों में
- कदाचन
- कभी भी
- मा
- मत
- कर्मफलहेतुः
- कर्मफल का हेतु
- भूः
- बनिए
- मा
- न
- ते
- आपकी
- सङ्गः
- आसक्ति
- अस्तु
- हो
- अकर्मणि
- कर्म न करने में
अन्वय: ते कर्मणि एव अधिकारः, फलेषु कदाचन मा । कर्मफलहेतुः मा भूः, ते अकर्मणि सङ्गः मा अस्तु ।
आपका अधिकार केवल कर्म में है, उसके फलों में कभी नहीं। आप कर्मफल के हेतु मत बनिए, और कर्म न करने में भी आपकी आसक्ति न हो।
2.48योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥48॥
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanaṃjaya |
siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate
- योगस्थः
- योग में स्थित होकर
- कुरु
- कीजिए
- कर्माणि
- कर्मों को
- सङ्गम्
- आसक्ति को
- त्यक्त्वा
- त्यागकर
- धनंजय
- हे धनंजय
- सिद्ध्यसिद्ध्योः
- सिद्धि और असिद्धि में
- समः
- समान
- भूत्वा
- होकर
- समत्वम्
- समता
- योगः
- योग
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: धनंजय, सङ्गम् त्यक्त्वा सिद्ध्यसिद्ध्योः समः भूत्वा योगस्थः कर्माणि कुरु । समत्वम् योगः उच्यते ।
हे धनंजय, आसक्ति को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म कीजिए। यह समता ही योग कही जाती है।
2.49दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥49॥
dūreṇa hy avaraṃ karma buddhiyogād dhanaṃjaya |
buddhau śaraṇam anviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ
- दूरेण
- बहुत
- हि
- निश्चय
- अवरम्
- निम्न
- कर्म
- फल की कामना वाला कर्म
- बुद्धियोगात्
- बुद्धियोग से
- धनंजय
- हे धनंजय
- बुद्धौ
- समबुद्धि में
- शरणम्
- शरण
- अन्विच्छ
- खोजिए
- कृपणाः
- दीन हैं
- फलहेतवः
- फल के हेतु बनने वाले
अन्वय: धनंजय, बुद्धियोगात् कर्म हि दूरेण अवरम् । बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ । फलहेतवः कृपणाः ।
हे धनंजय, बुद्धियोग की तुलना में फल की कामना वाला कर्म बहुत निम्न है, इसलिए आप समबुद्धि की शरण खोजिए। फल के हेतु बनने वाले लोग दीन हैं।
2.50बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥50॥
buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte |
tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam
- बुद्धियुक्तः
- समबुद्धि से युक्त पुरुष
- जहाति
- त्याग देता है
- इह
- इस लोक में
- उभे
- दोनों को
- सुकृतदुष्कृते
- पुण्य और पाप को
- तस्मात्
- इसलिए
- योगाय
- योग के लिए
- युज्यस्व
- जुट जाइए
- योगः
- योग
- कर्मसु
- कर्मों में
- कौशलम्
- कुशलता है
अन्वय: बुद्धियुक्तः इह उभे सुकृतदुष्कृते जहाति । तस्मात् योगाय युज्यस्व । योगः कर्मसु कौशलम् ।
समबुद्धि से युक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए आप योग में लग जाइए, कर्मों में कुशलता ही योग है।
2.51कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥51॥
karmajaṃ buddhiyuktā hi phalaṃ tyaktvā manīṣiṇaḥ |
janmabandhavinirmuktāḥ padaṃ gacchanty anāmayam
- कर्मजम्
- कर्म से उत्पन्न
- बुद्धियुक्ताः
- समबुद्धि से युक्त
- हि
- क्योंकि
- फलम्
- फल को
- त्यक्त्वा
- त्यागकर
- मनीषिणः
- ज्ञानी लोग
- जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः
- जन्म के बन्धन से मुक्त
- पदम्
- पद को
- गच्छन्ति
- जाते हैं
- अनामयम्
- दुःखरहित
अन्वय: बुद्धियुक्ताः मनीषिणः हि कर्मजम् फलम् त्यक्त्वा जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः अनामयम् पदम् गच्छन्ति ।
समबुद्धि से युक्त ज्ञानी लोग कर्म से उत्पन्न फल को त्यागकर जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और दुःखरहित पद को प्राप्त होते हैं।
2.52यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥52॥
yadā te mohakalilaṃ buddhir vyatitariṣyati |
tadā gantāsi nirvedaṃ śrotavyasya śrutasya ca
- यदा
- जब
- ते
- आपकी
- मोहकलिलम्
- मोह के दलदल को
- बुद्धिः
- बुद्धि
- व्यतितरिष्यति
- पार कर लेगी
- तदा
- तब
- गन्तासि
- प्राप्त होंगे
- निर्वेदम्
- वैराग्य को
- श्रोतव्यस्य
- सुनने योग्य के
- श्रुतस्य
- सुने हुए के
- च
- और
अन्वय: यदा ते बुद्धिः मोहकलिलम् व्यतितरिष्यति, तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च निर्वेदम् गन्तासि ।
जब आपकी बुद्धि मोह के दलदल को पार कर लेगी, तब आप सुने हुए और सुनने योग्य विषयों से वैराग्य को प्राप्त होंगे।
2.53श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥53॥
śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā |
samādhāv acalā buddhis tadā yogam avāpsyasi
- श्रुतिविप्रतिपन्ना
- अनेक सुने हुए वचनों से विचलित
- ते
- आपकी
- यदा
- जब
- स्थास्यति
- स्थिर होगी
- निश्चला
- निश्चल
- समाधौ
- समाधि में
- अचला
- अचल
- बुद्धिः
- बुद्धि
- तदा
- तब
- योगम्
- योग को
- अवाप्स्यसि
- प्राप्त करेंगे
अन्वय: यदा श्रुतिविप्रतिपन्ना ते बुद्धिः समाधौ निश्चला अचला स्थास्यति, तदा योगम् अवाप्स्यसि ।
जब अनेक प्रकार के सुने हुए वचनों से विचलित आपकी बुद्धि समाधि में निश्चल और अचल होकर स्थिर हो जाएगी, तब आप योग को प्राप्त करेंगे।
2.54स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥54॥
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava |
sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kim āsīta vrajeta kim
- स्थितप्रज्ञस्य
- स्थिर बुद्धि वाले का
- का
- क्या
- भाषा
- लक्षण
- समाधिस्थस्य
- समाधि में स्थित का
- केशव
- हे केशव
- स्थितधीः
- स्थिर बुद्धि वाला
- किम्
- कैसे
- प्रभाषेत
- बोलता है
- किम्
- कैसे
- आसीत
- बैठता है
- व्रजेत
- चलता है
- किम्
- कैसे
अन्वय: केशव, समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्य का भाषा । स्थितधीः किम् प्रभाषेत, किम् आसीत, किम् व्रजेत ।
हे केशव, समाधि में स्थित, स्थिर बुद्धि वाले पुरुष का क्या लक्षण है? स्थिर बुद्धि वाला पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
2.55प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥55॥
prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha manogatān |
ātmany evātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñas tadocyate
- प्रजहाति
- त्याग देता है
- यदा
- जब
- कामान्
- कामनाओं को
- सर्वान्
- सम्पूर्ण
- पार्थ
- हे पार्थ
- मनोगतान्
- मन में स्थित
- आत्मनि
- आत्मा में
- एव
- ही
- आत्मना
- आत्मा से
- तुष्टः
- सन्तुष्ट
- स्थितप्रज्ञः
- स्थितप्रज्ञ
- तदा
- तब
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: पार्थ, यदा मनोगतान् सर्वान् कामान् प्रजहाति, आत्मनि एव आत्मना तुष्टः, तदा स्थितप्रज्ञः उच्यते ।
हे पार्थ, जब मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
2.56दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥56॥
duḥkheṣv anudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ |
vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīr munir ucyate
- दुःखेषु
- दुःखों में
- अनुद्विग्नमनाः
- उद्विग्न न होने वाले मन वाला
- सुखेषु
- सुखों में
- विगतस्पृहः
- स्पृहा से रहित
- वीतरागभयक्रोधः
- राग भय और क्रोध से मुक्त
- स्थितधीः
- स्थिर बुद्धि वाला
- मुनिः
- मुनि
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीतरागभयक्रोधः मुनिः स्थितधीः उच्यते ।
जिसका मन दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, जिसे सुखों की स्पृहा नहीं है और जो राग, भय और क्रोध से मुक्त है, वह मुनि स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है।
2.57यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥57॥
yaḥ sarvatrānabhisnehas tat tat prāpya śubhāśubham |
nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā
- यः
- जो
- सर्वत्र
- सब जगह
- अनभिस्नेहः
- आसक्ति से रहित
- तत् तत्
- उस उस
- प्राप्य
- को पाकर
- शुभाशुभम्
- शुभ और अशुभ
- न अभिनन्दति
- न प्रसन्न होता है
- न द्वेष्टि
- न द्वेष करता है
- तस्य
- उसकी
- प्रज्ञा
- बुद्धि
- प्रतिष्ठिता
- स्थिर है
अन्वय: यः सर्वत्र अनभिस्नेहः तत् तत् शुभाशुभम् प्राप्य न अभिनन्दति न द्वेष्टि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।
जो सब जगह आसक्ति से रहित है और शुभ या अशुभ जो कुछ भी मिले उसे पाकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।
2.58यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥58॥
yadā saṃharate cāyaṃ kūrmo ’ṅgānīva sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā
- यदा
- जब
- संहरते
- समेट लेता है
- च
- और
- अयम्
- यह पुरुष
- कूर्मः
- कछुआ
- अङ्गानि
- अंगों को
- इव
- जैसे
- सर्वशः
- सब ओर से
- इन्द्रियाणि
- इन्द्रियों को
- इन्द्रियार्थेभ्यः
- इन्द्रियों के विषयों से
- तस्य
- उसकी
- प्रज्ञा
- बुद्धि
- प्रतिष्ठिता
- स्थिर है
अन्वय: यदा च अयम्, कूर्मः अङ्गानि इव, इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः सर्वशः संहरते, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।
जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों को उनके विषयों से सब ओर से समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है।
2.59विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥59॥
viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ |
rasavarjaṃ raso ’py asya paraṃ dṛṣṭvā nivartate
- विषयाः
- विषय
- विनिवर्तन्ते
- निवृत्त हो जाते हैं
- निराहारस्य
- विषयों को ग्रहण न करने वाले के
- देहिनः
- देहधारी के
- रसवर्जम्
- रस को छोड़कर
- रसः
- रस
- अपि
- भी
- अस्य
- इसका
- परम्
- परम तत्त्व को
- दृष्ट्वा
- देखकर
- निवर्तते
- निवृत्त हो जाता है
अन्वय: निराहारस्य देहिनः विषयाः रसवर्जम् विनिवर्तन्ते । अस्य रसः अपि परम् दृष्ट्वा निवर्तते ।
विषयों को ग्रहण न करने वाले देहधारी के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, केवल उनका रस शेष रह जाता है। परम तत्त्व को देखकर इस पुरुष का वह रस भी निवृत्त हो जाता है।
2.60यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥60॥
yatato hy api kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ |
indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ
- यततः
- प्रयत्न करते हुए
- हि
- क्योंकि
- अपि
- भी
- कौन्तेय
- हे कुन्तीपुत्र
- पुरुषस्य
- पुरुष के
- विपश्चितः
- विवेकशील
- इन्द्रियाणि
- इन्द्रियाँ
- प्रमाथीनि
- मथ देने वाली
- हरन्ति
- हर लेती हैं
- प्रसभम्
- बलपूर्वक
- मनः
- मन को
अन्वय: कौन्तेय, यततः विपश्चितः अपि पुरुषस्य प्रमाथीनि इन्द्रियाणि मनः प्रसभम् हि हरन्ति ।
हे कुन्तीपुत्र, प्रयत्न करते हुए विवेकशील पुरुष का भी मन इन मथ देने वाली इन्द्रियों द्वारा बलपूर्वक हर लिया जाता है।
2.61तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥61॥
tāni sarvāṇi saṃyamya yukta āsīta matparaḥ |
vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā
- तानि
- उन
- सर्वाणि
- सब इन्द्रियों को
- संयम्य
- वश में करके
- युक्तः
- युक्त होकर
- आसीत
- स्थित रहे
- मत्परः
- मेरे परायण
- वशे
- वश में
- हि
- क्योंकि
- यस्य
- जिसके
- इन्द्रियाणि
- इन्द्रियाँ
- तस्य
- उसकी
- प्रज्ञा
- बुद्धि
- प्रतिष्ठिता
- स्थिर है
अन्वय: तानि सर्वाणि संयम्य मत्परः युक्तः आसीत । यस्य हि इन्द्रियाणि वशे, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।
उन सब इन्द्रियों को वश में करके मेरे परायण होकर योगयुक्त स्थित रहे। क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।
2.62ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥62॥
dhyāyato viṣayān puṃsaḥ saṅgas teṣūpajāyate |
saṅgāt saṃjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate
- ध्यायतः
- चिन्तन करते हुए
- विषयान्
- विषयों का
- पुंसः
- पुरुष की
- सङ्गः
- आसक्ति
- तेषु
- उनमें
- उपजायते
- उत्पन्न होती है
- सङ्गात्
- आसक्ति से
- संजायते
- उत्पन्न होती है
- कामः
- कामना
- कामात्
- कामना से
- क्रोधः
- क्रोध
- अभिजायते
- उत्पन्न होता है
अन्वय: विषयान् ध्यायतः पुंसः तेषु सङ्गः उपजायते । सङ्गात् कामः संजायते, कामात् क्रोधः अभिजायते ।
विषयों का चिन्तन करते हुए पुरुष की उनमें आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
2.63क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥63॥
krodhād bhavati saṃmohaḥ saṃmohāt smṛtivibhramaḥ |
smṛtibhraṃśād buddhināśo buddhināśāt praṇaśyati
- क्रोधात्
- क्रोध से
- भवति
- होता है
- संमोहः
- मोह
- संमोहात्
- मोह से
- स्मृतिविभ्रमः
- स्मृति में भ्रम
- स्मृतिभ्रंशात्
- स्मृति के नाश से
- बुद्धिनाशः
- बुद्धि का नाश
- बुद्धिनाशात्
- बुद्धि के नाश से
- प्रणश्यति
- नष्ट हो जाता है
अन्वय: क्रोधात् संमोहः भवति, संमोहात् स्मृतिविभ्रमः, स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात् प्रणश्यति ।
क्रोध से मोह होता है और मोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति के नाश से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
2.64रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥64॥
rāgadveṣaviyuktais tu viṣayān indriyaiś caran |
ātmavaśyair vidheyātmā prasādam adhigacchati
- रागद्वेषवियुक्तैः
- राग और द्वेष से रहित
- तु
- तो
- विषयान्
- विषयों को
- इन्द्रियैः
- इन्द्रियों से
- चरन्
- भोगता हुआ
- आत्मवश्यैः
- अपने वश में की हुई
- विधेयात्मा
- जिसका मन वश में है
- प्रसादम्
- प्रसन्नता को
- अधिगच्छति
- प्राप्त करता है
अन्वय: विधेयात्मा तु रागद्वेषवियुक्तैः आत्मवश्यैः इन्द्रियैः विषयान् चरन् प्रसादम् अधिगच्छति ।
जिसका मन वश में है, वह पुरुष राग और द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इन्द्रियों से विषयों को भोगता हुआ भी प्रसन्नता को प्राप्त करता है।
2.65प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥65॥
prasāde sarvaduḥkhānāṃ hānir asyopajāyate |
prasannacetaso hy āśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate
- प्रसादे
- प्रसन्नता होने पर
- सर्वदुःखानाम्
- सब दुःखों का
- हानिः
- नाश
- अस्य
- इसके
- उपजायते
- हो जाता है
- प्रसन्नचेतसः
- प्रसन्न चित्त वाले की
- हि
- क्योंकि
- आशु
- शीघ्र
- बुद्धिः
- बुद्धि
- पर्यवतिष्ठते
- स्थिर हो जाती है
अन्वय: प्रसादे अस्य सर्वदुःखानाम् हानिः उपजायते । प्रसन्नचेतसः हि बुद्धिः आशु पर्यवतिष्ठते ।
चित्त की प्रसन्नता होने पर इसके सब दुःखों का नाश हो जाता है। क्योंकि प्रसन्न चित्त वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
2.66नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥66॥
nāsti buddhir ayuktasya na cāyuktasya bhāvanā |
na cābhāvayataḥ śāntir aśāntasya kutaḥ sukham
- न अस्ति
- नहीं है
- बुद्धिः
- निश्चयात्मक बुद्धि
- अयुक्तस्य
- असंयमी पुरुष की
- न च
- और न
- अयुक्तस्य
- असंयमी की
- भावना
- भावना
- न च
- और न
- अभावयतः
- भावना न करने वाले को
- शान्तिः
- शान्ति
- अशान्तस्य
- अशान्त को
- कुतः
- कहाँ से
- सुखम्
- सुख
अन्वय: अयुक्तस्य बुद्धिः न अस्ति, अयुक्तस्य च भावना न । अभावयतः च शान्तिः न, अशान्तस्य सुखम् कुतः ।
जिसका मन और इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती और उसमें भावना भी नहीं होती। भावना न करने वाले को शान्ति नहीं मिलती, और अशान्त को सुख कहाँ से मिले?
2.67इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥67॥
indriyāṇāṃ hi caratāṃ yan mano ’nuvidhīyate |
tad asya harati prajñāṃ vāyur nāvam ivāmbhasi
- इन्द्रियाणाम्
- इन्द्रियों के
- हि
- क्योंकि
- चरताम्
- विषयों में विचरती हुई
- यत्
- जिसका
- मनः
- मन
- अनुविधीयते
- अनुसरण करता है
- तत्
- वह इन्द्रिय
- अस्य
- इसकी
- हरति
- हर लेती है
- प्रज्ञाम्
- बुद्धि को
- वायुः
- वायु
- नावम्
- नौका को
- इव
- जैसे
- अम्भसि
- जल में
अन्वय: चरताम् इन्द्रियाणाम् हि यत् मनः अनुविधीयते, तत् अस्य प्रज्ञाम् हरति, अम्भसि वायुः नावम् इव ।
विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से जिस इन्द्रिय का मन अनुसरण करता है, वह इन्द्रिय इस पुरुष की बुद्धि को हर लेती है, जैसे जल में वायु नौका को हर लेती है।
2.68तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥68॥
tasmād yasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā
- तस्मात्
- इसलिए
- यस्य
- जिसकी
- महाबाहो
- हे महाबाहु
- निगृहीतानि
- वश में की हुई हैं
- सर्वशः
- सब प्रकार से
- इन्द्रियाणि
- इन्द्रियाँ
- इन्द्रियार्थेभ्यः
- इन्द्रियों के विषयों से
- तस्य
- उसकी
- प्रज्ञा
- बुद्धि
- प्रतिष्ठिता
- स्थिर है
अन्वय: तस्मात् महाबाहो, यस्य इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः सर्वशः निगृहीतानि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।
इसलिए हे महाबाहु, जिसकी इन्द्रियाँ अपने विषयों से सब प्रकार से वश में की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।
2.69या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥69॥
yā niśā sarvabhūtānāṃ tasyāṃ jāgarti saṃyamī |
yasyāṃ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyato muneḥ
- या
- जो
- निशा
- रात्रि
- सर्वभूतानाम्
- सब प्राणियों के लिए
- तस्याम्
- उसमें
- जागर्ति
- जागता है
- संयमी
- संयमी पुरुष
- यस्याम्
- जिसमें
- जाग्रति
- जागते हैं
- भूतानि
- प्राणी
- सा
- वह
- निशा
- रात्रि
- पश्यतः
- तत्त्व को देखने वाले
- मुनेः
- मुनि के लिए
अन्वय: सर्वभूतानाम् या निशा, तस्याम् संयमी जागर्ति । यस्याम् भूतानि जाग्रति, सा पश्यतः मुनेः निशा ।
जो सब प्राणियों के लिए रात्रि है, उसमें संयमी पुरुष जागता है। जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह तत्त्व को देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है।
2.70आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥70॥
āpūryamāṇam acalapratiṣṭhaṃ samudram āpaḥ praviśanti yadvat |
tadvat kāmā yaṃ praviśanti sarve sa śāntim āpnoti na kāmakāmī
- आपूर्यमाणम्
- सब ओर से भरे जाते हुए
- अचलप्रतिष्ठम्
- अचल स्थिति वाले
- समुद्रम्
- समुद्र में
- आपः
- जल
- प्रविशन्ति
- प्रवेश करते हैं
- यद्वत्
- जैसे
- तद्वत्
- वैसे ही
- कामाः
- भोग
- यम्
- जिसमें
- प्रविशन्ति
- प्रवेश करते हैं
- सर्वे
- सब
- सः
- वह
- शान्तिम्
- शान्ति को
- आप्नोति
- प्राप्त करता है
- न
- नहीं
- कामकामी
- भोगों की कामना वाला
अन्वय: यद्वत् आपः आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठम् समुद्रम् प्रविशन्ति, तद्वत् सर्वे कामाः यम् प्रविशन्ति, सः शान्तिम् आप्नोति, कामकामी न ।
जैसे सब ओर से भरे जाते हुए भी अचल स्थिति वाले समुद्र में जल प्रवेश करता है, वैसे ही जिस पुरुष में सब भोग प्रवेश करते हैं, वह शान्ति को प्राप्त करता है। भोगों की कामना करने वाला शान्ति नहीं पाता।
2.71विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥71॥
vihāya kāmān yaḥ sarvān pumāṃś carati niḥspṛhaḥ |
nirmamo nirahaṃkāraḥ sa śāntim adhigacchati
- विहाय
- त्यागकर
- कामान्
- कामनाओं को
- यः
- जो
- सर्वान्
- सम्पूर्ण
- पुमान्
- पुरुष
- चरति
- विचरता है
- निःस्पृहः
- स्पृहा से रहित
- निर्ममः
- ममता से रहित
- निरहंकारः
- अहंकार से रहित
- सः
- वह
- शान्तिम्
- शान्ति को
- अधिगच्छति
- प्राप्त करता है
अन्वय: यः पुमान् सर्वान् कामान् विहाय निःस्पृहः निर्ममः निरहंकारः चरति, सः शान्तिम् अधिगच्छति ।
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर स्पृहा, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त करता है।
2.72एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥72॥
eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṃ prāpya vimuhyati |
sthitvāsyām antakāle ’pi brahmanirvāṇam ṛcchati
- एषा
- यह
- ब्राह्मी
- ब्रह्म को प्राप्त पुरुष की
- स्थितिः
- स्थिति
- पार्थ
- हे पार्थ
- न एनाम्
- इसको नहीं
- प्राप्य
- पाकर
- विमुह्यति
- मोहित होता है
- स्थित्वा
- स्थित होकर
- अस्याम्
- इसमें
- अन्तकाले
- अन्तकाल में
- अपि
- भी
- ब्रह्मनिर्वाणम्
- ब्रह्मनिर्वाण को
- ऋच्छति
- प्राप्त करता है
अन्वय: पार्थ, एषा ब्राह्मी स्थितिः । एनाम् प्राप्य न विमुह्यति । अन्तकाले अपि अस्याम् स्थित्वा ब्रह्मनिर्वाणम् ऋच्छति ।
हे पार्थ, यह ब्रह्म को प्राप्त पुरुष की स्थिति है, इसे पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस स्थिति में स्थित होकर वह ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है।
मन हो तो
पढ़ने के बाद, एक छोटा-सा खेल
एक छोटे खेल में इन विचारों के पास फिर लौटिए। उत्तर के साथ उसकी व्याख्या और सम्बन्धित पाठ की कड़ी भी मिलेगी।
विचारों का मिलान कीजिए