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सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरी स्वभाव की बात सुनकर अर्जुन के मन में एक सहज प्रश्न उठता है। हर कोई तो शास्त्र की पूरी विधि जानता नहीं, फिर भी लोग अपनी-अपनी श्रद्धा से पूजा और यज्ञ करते हैं। ऐसे लोगों की निष्ठा किस कोटि की है, सात्त्विक, राजसिक या तामसिक? इसी प्रश्न से यह अध्याय खुलता है, और श्रीकृष्ण का उत्तर श्रद्धा को ही जीवन की धुरी बना देता है। वे सीधे यह नहीं कहते कि श्रद्धा अच्छी या बुरी होती है, वे कहते हैं कि श्रद्धा भी हमारे भीतर के गुणों का रंग ओढ़ लेती है, और वही रंग हमारे पूरे जीवन पर फैल जाता है।
श्रद्धामय है मनुष्य
श्रीकृष्ण कहते हैं कि हर प्राणी की श्रद्धा उसके अपने स्वभाव के अनुसार होती है, और वह श्रद्धा तीन रंगों में बँटी रहती है, सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। फिर वे एक ऐसी पंक्ति कहते हैं जो पूरे अध्याय की जान है।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
अर्थ यह कि हे भारत, हर मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःस्वभाव के अनुसार बनती है। मनुष्य श्रद्धामय है, जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही है। आप भीतर से जो मानते हैं, धीरे-धीरे वही बन जाते हैं। यही वह अदृश्य पहचान है जो हमें गढ़ती रहती है। इसीलिए सात्त्विक स्वभाव के लोग देवताओं की ओर झुकते हैं, राजसिक मन यक्षों और शक्ति के प्रतीकों की ओर, और तामसिक वृत्ति भूत-प्रेतों तथा अंधकार की ओर। किसकी पूजा हो रही है, यह देखकर ही उसके भीतर के रंग का पता चल जाता है, क्योंकि हम वहीं झुकते हैं जहाँ हमारी श्रद्धा हमें खींचती है।
तीन रंग की भूख
यहाँ श्रीकृष्ण एक बहुत घरेलू उदाहरण से बात को छू लेते हैं, भोजन से। जो अन्न आयु, बल, आरोग्य, सुख और मन की प्रीति बढ़ाता है, जो रसीला, स्निग्ध, स्थिर और हृदय को भाने वाला है, वह सात्त्विक है। जो बहुत कड़वा, खट्टा, नमकीन, तीखा, रूखा और जलन पैदा करने वाला है, जो खाते ही दुख, शोक और रोग की ओर ले जाए, वह राजसिक है। और जो अधपका, रस-रहित, बासी, दुर्गंधयुक्त और जूठा है, वह तामसिक है। यों प्लेट में रखा भोजन भी हमारे भीतर के रंग की चुगली कर देता है।
यज्ञ, तप और दान के तीन रूप
फिर वे यही कसौटी हमारे बड़े कर्मों पर लगाते हैं। एक ही यज्ञ, एक ही तप, एक ही दान, पर भाव के फेर से वह तीन दिशाओं में मुड़ जाता है। श्रीकृष्ण चाहते हैं कि हम कर्म के बाहरी रूप से आगे बढ़कर उसके भीतर बैठे इरादे को पहचानें। यज्ञ यदि फल की इच्छा छोड़कर, केवल कर्तव्य मानकर और विधि के अनुसार किया जाए, तो वह सात्त्विक है। यदि दिखावे के लिए या फल की चाह से किया जाए, तो राजसिक। और यदि बिना विधि, बिना अन्नदान, बिना मंत्र, बिना दक्षिणा और बिना श्रद्धा के किया जाए, तो तामसिक।
तप को श्रीकृष्ण तीन जगह बाँटते हैं। शरीर का तप है देवता, गुरु और ज्ञानी का आदर, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा। वाणी का तप है ऐसी बात कहना जो किसी को उद्वेग न दे, जो सच्ची, प्रिय और हितकारी हो, और साथ में स्वाध्याय का अभ्यास। मन का तप है भीतर की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम और भावों की शुद्धता। यों तप केवल शरीर को तपाना नहीं, यह जीभ और मन को भी साधना है, और अक्सर सबसे कठिन तप वही मीठी वाणी और शांत मन का होता है। यही तीनों तप जब श्रद्धा से और फल की चाह छोड़कर किए जाएँ तो सात्त्विक हैं, जब मान-सम्मान और दिखावे के लिए हों तो राजसिक, और जब हठ से अपने को कष्ट देकर या दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए हों तो तामसिक।
अब बारी दान की। इसका सबसे स्वच्छ रूप श्रीकृष्ण इन शब्दों में रखते हैं।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
अर्थ यह कि जो दान केवल इस भाव से दिया जाए कि देना कर्तव्य है, जो बदले में किसी उपकार की उम्मीद न रखे, और जो उचित स्थान, उचित समय और योग्य पात्र को दिया जाए, वही सात्त्विक दान है, गीता 17.20 का। इसके विपरीत जो दान कुढ़ते हुए, बदले की आशा या फल की चाह से दिया जाए वह राजसिक है, और जो गलत जगह, गलत समय, अपात्र को, बिना आदर और तिरस्कार के साथ दिया जाए वह तामसिक है। देने का हाथ वही रहता है, पर देने के पीछे का भाव उसे ऊँचा या नीचा कर देता है।
ॐ तत् सत्
यहाँ एक बात साफ़ हो जाती है। भोजन, यज्ञ, तप और दान, ये सब कर्म एक जैसे दिख सकते हैं, पर इनके पीछे का भाव इन्हें तीन अलग-अलग दिशाओं में मोड़ देता है। एक ही थाली, एक ही मंदिर, एक ही दान का हाथ, पर भीतर की श्रद्धा तय करती है कि वह ऊपर उठाएगा या नीचे खींचेगा। श्रीकृष्ण हमें बाहर के आचरण से भीतर के भाव की ओर लौटा लाते हैं।
अंत में वे एक सूत्र देते हैं जो हर शुभ कर्म को ब्रह्म से जोड़ देता है, ॐ तत् सत्। यही ब्रह्म का तीन-अक्षरी नाम है। ‘ॐ’ के साथ यज्ञ, दान और तप का आरंभ होता है। ‘तत्’ का भाव है फल की चाह छोड़ देना, जो मुक्ति चाहने वाले करते हैं। और ‘सत्’ का अर्थ है सद्भाव और शुभ कर्म, जो अपने-आप में प्रशंसनीय हैं। पर इन सबके नीचे एक ही नींव है। जो कुछ बिना श्रद्धा के किया जाए, वह असत् है, न यहाँ काम आता है, न आगे। श्रद्धा ही वह अदृश्य धागा है जो हर कर्म को अर्थ देती है, और जिसकी जैसी श्रद्धा, उसका वैसा ही जीवन।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
श्लोक-दर-श्लोक
इस अध्याय के सभी 28 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/17/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।
17.1ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥1॥
ye śāstravidhim utsṛjya yajante śraddhayānvitāḥ |
teṣāṃ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvam āho rajas tamaḥ
- ये
- जो लोग
- शास्त्रविधिम्
- शास्त्र की विधि को
- उत्सृज्य
- छोड़कर
- यजन्ते
- यजन करते हैं
- श्रद्धया
- श्रद्धा से
- अन्विताः
- युक्त
- तेषाम्
- उनकी
- निष्ठा
- निष्ठा
- तु
- तो
- का
- कौन सी
- कृष्ण
- हे कृष्ण
- सत्त्वम्
- सत्त्व
- आहो
- अथवा
- रजः
- रज
- तमः
- तम
अन्वय: कृष्ण, ये शास्त्रविधिम् उत्सृज्य श्रद्धया अन्विताः यजन्ते, तेषाम् निष्ठा तु का, सत्त्वम् आहो रजः तमः।
हे कृष्ण, जो लोग शास्त्र की विधि को छोड़कर श्रद्धा से युक्त होकर यजन करते हैं, उनकी निष्ठा कौन सी है, सत्त्व, रज अथवा तम?
17.2त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥2॥
trividhā bhavati śraddhā dehināṃ sā svabhāvajā |
sāttvikī rājasī caiva tāmasī ceti tāṃ śṛṇu
- त्रिविधा
- तीन प्रकार की
- भवति
- होती है
- श्रद्धा
- श्रद्धा
- देहिनाम्
- देहधारियों की
- सा
- वह
- स्वभावजा
- स्वभाव से उत्पन्न
- सात्त्विकी
- सात्त्विकी
- राजसी
- राजसी
- च
- और
- एव
- ही
- तामसी
- तामसी
- च
- और
- इति
- इस प्रकार
- ताम्
- उसे
- शृणु
- सुनिए
अन्वय: देहिनाम् सा स्वभावजा श्रद्धा त्रिविधा भवति, सात्त्विकी राजसी च एव तामसी च इति। ताम् शृणु।
देहधारियों की वह स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसे आप सुनिए।
17.3सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥3॥
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata |
śraddhāmayo ’yaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ
- सत्त्वानुरूपा
- अन्तःकरण के अनुरूप
- सर्वस्य
- सबकी
- श्रद्धा
- श्रद्धा
- भवति
- होती है
- भारत
- हे भारत
- श्रद्धामयः
- श्रद्धामय
- अयम्
- यह
- पुरुषः
- पुरुष
- यः
- जो
- यच्छ्रद्धः
- जिस श्रद्धा वाला
- सः
- वह
- एव
- ही
- सः
- वह है
अन्वय: भारत, सर्वस्य श्रद्धा सत्त्वानुरूपा भवति। अयम् पुरुषः श्रद्धामयः, यः यच्छ्रद्धः सः एव सः।
हे भारत, सब मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, जो जिस श्रद्धा वाला है, वह वही है।
17.4यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥4॥
yajante sāttvikā devān yakṣarakṣāṃsi rājasāḥ |
pretān bhūtagaṇāṃś cānye yajante tāmasā janāḥ
- यजन्ते
- पूजते हैं
- सात्त्विकाः
- सात्त्विक लोग
- देवान्
- देवताओं को
- यक्षरक्षांसि
- यक्षों और राक्षसों को
- राजसाः
- राजस लोग
- प्रेतान्
- प्रेतों को
- भूतगणान्
- भूतगणों को
- च
- और
- अन्ये
- दूसरे
- यजन्ते
- पूजते हैं
- तामसाः
- तामस
- जनाः
- लोग
अन्वय: सात्त्विकाः देवान् यजन्ते, राजसाः यक्षरक्षांसि, अन्ये तामसाः जनाः च प्रेतान् भूतगणान् यजन्ते।
सात्त्विक लोग देवताओं को पूजते हैं, राजस लोग यक्षों और राक्षसों को, और दूसरे तामस लोग प्रेतों और भूतगणों को पूजते हैं।
17.5अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥5॥
aśāstravihitaṃ ghoraṃ tapyante ye tapo janāḥ |
dambhāhaṃkārasaṃyuktāḥ kāmarāgabalānvitāḥ
- अशास्त्रविहितम्
- शास्त्र से अविहित
- घोरम्
- घोर
- तप्यन्ते
- तपते हैं
- ये
- जो
- तपः
- तप
- जनाः
- लोग
- दम्भाहंकारसंयुक्ताः
- दम्भ और अहंकार से युक्त
- कामरागबलान्विताः
- कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से युक्त
अन्वय: ये जनाः दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः अशास्त्रविहितम् घोरम् तपः तप्यन्ते,
जो लोग दम्भ और अहंकार से युक्त तथा कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से युक्त होकर शास्त्र से अविहित घोर तप तपते हैं,
17.6कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥6॥
karśayantaḥ śarīrasthaṃ bhūtagrāmam acetasaḥ |
māṃ caivāntaḥśarīrasthaṃ tān viddhy āsuraniścayān
- कर्शयन्तः
- कृश करते हुए
- शरीरस्थम्
- शरीर में स्थित
- भूतग्रामम्
- भूतसमुदाय को
- अचेतसः
- अविवेकी
- माम्
- मुझको
- च
- और
- एव
- भी
- अन्तःशरीरस्थम्
- शरीर के भीतर स्थित
- तान्
- उन्हें
- विद्धि
- जानिए
- आसुरनिश्चयान्
- आसुरी निश्चय वाले
अन्वय: अचेतसः शरीरस्थम् भूतग्रामम् अन्तःशरीरस्थम् माम् च एव कर्शयन्तः, तान् आसुरनिश्चयान् विद्धि।
और जो अविवेकी शरीर में स्थित भूतसमुदाय को तथा शरीर के भीतर स्थित मुझको भी कृश करते हैं, उन्हें आप आसुरी निश्चय वाले जानिए।
17.7आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥7॥
āhāras tv api sarvasya trividho bhavati priyaḥ |
yajñas tapas tathā dānaṃ teṣāṃ bhedam imaṃ śṛṇu
- आहारः
- भोजन
- तु
- तो
- अपि
- भी
- सर्वस्य
- सबका
- त्रिविधः
- तीन प्रकार का
- भवति
- होता है
- प्रियः
- प्रिय
- यज्ञः
- यज्ञ
- तपः
- तप
- तथा
- और वैसे ही
- दानम्
- दान
- तेषाम्
- उनके
- भेदम्
- भेद को
- इमम्
- इस
- शृणु
- सुनिए
अन्वय: सर्वस्य प्रियः आहारः तु अपि त्रिविधः भवति, तथा यज्ञः तपः दानम्। तेषाम् इमम् भेदम् शृणु।
सबका प्रिय भोजन भी तीन प्रकार का होता है, और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी। उनका यह भेद आप सुनिए।
17.8आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥8॥
āyuḥsattvabalārogyasukhaprītivivardhanāḥ |
rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛdyā āhārāḥ sāttvikapriyāḥ
- आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः
- आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति बढ़ाने वाले
- रस्याः
- रसयुक्त
- स्निग्धाः
- चिकने
- स्थिराः
- स्थिर रहने वाले
- हृद्याः
- हृदय को प्रिय
- आहाराः
- भोजन
- सात्त्विकप्रियाः
- सात्त्विक पुरुष को प्रिय
अन्वय: आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः रस्याः स्निग्धाः स्थिराः हृद्याः आहाराः सात्त्विकप्रियाः।
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले और हृदय को प्रिय लगने वाले भोजन सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।
17.9कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥9॥
kaṭvamlalavaṇātyuṣṇatīkṣṇarūkṣavidāhinaḥ |
āhārā rājasasyeṣṭā duḥkhaśokāmayapradāḥ
- कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः
- कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गरम, तीखे, रूखे और जलन करने वाले
- आहाराः
- भोजन
- राजसस्य
- राजस पुरुष को
- इष्टाः
- प्रिय
- दुःखशोकामयप्रदाः
- दुःख, शोक और रोग देने वाले
अन्वय: कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः दुःखशोकामयप्रदाः आहाराः राजसस्य इष्टाः।
कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गरम, तीखे, रूखे और जलन करने वाले भोजन राजस पुरुष को प्रिय होते हैं, और वे दुःख, शोक और रोग देने वाले हैं।
17.10यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥10॥
yātayāmaṃ gatarasaṃ pūti paryuṣitaṃ ca yat |
ucchiṣṭam api cāmedhyaṃ bhojanaṃ tāmasapriyam
- यातयामम्
- अधपका
- गतरसम्
- रसहीन
- पूति
- दुर्गन्धयुक्त
- पर्युषितम्
- बासी
- च
- और
- यत्
- जो
- उच्छिष्टम्
- जूठा
- अपि
- भी
- च
- और
- अमेध्यम्
- अपवित्र
- भोजनम्
- भोजन
- तामसप्रियम्
- तामस पुरुष को प्रिय
अन्वय: यत् यातयामम् गतरसम् पूति पर्युषितम् च उच्छिष्टम् अपि च अमेध्यम् भोजनम्, तामसप्रियम्।
जो भोजन अधपका, रसहीन, दुर्गन्धयुक्त, बासी और जूठा है, और जो अपवित्र भी है, वह तामस पुरुष को प्रिय होता है।
17.11अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥11॥
aphalākāṅkṣibhir yajño vidhidṛṣṭo ya ijyate |
yaṣṭavyam eveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ
- अफलाकाङ्क्षिभिः
- फल न चाहने वालों द्वारा
- यज्ञः
- यज्ञ
- विधिदृष्टः
- शास्त्रविधि से नियत
- यः
- जो
- इज्यते
- किया जाता है
- यष्टव्यम्
- यज्ञ करना कर्तव्य है
- एव
- ही
- इति
- ऐसा
- मनः
- मन को
- समाधाय
- स्थिर करके
- सः
- वह
- सात्त्विकः
- सात्त्विक है
अन्वय: यष्टव्यम् एव इति मनः समाधाय अफलाकाङ्क्षिभिः यः विधिदृष्टः यज्ञः इज्यते, सः सात्त्विकः।
फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा, यज्ञ करना कर्तव्य ही है, ऐसा मन में निश्चय करके जो शास्त्रविधि से नियत यज्ञ किया जाता है, वह सात्त्विक है।
17.12अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥12॥
abhisaṃdhāya tu phalaṃ dambhārtham api caiva yat |
ijyate bharataśreṣṭha taṃ yajñaṃ viddhi rājasam
- अभिसंधाय
- उद्देश्य रखकर
- तु
- परन्तु
- फलम्
- फल को
- दम्भार्थम्
- दम्भ के लिए
- अपि
- भी
- च
- और
- एव
- ही
- यत्
- जो
- इज्यते
- किया जाता है
- भरतश्रेष्ठ
- हे भरतश्रेष्ठ
- तम्
- उस
- यज्ञम्
- यज्ञ को
- विद्धि
- जानिए
- राजसम्
- राजस
अन्वय: भरतश्रेष्ठ, यत् तु फलम् अभिसंधाय दम्भार्थम् अपि च एव इज्यते, तम् यज्ञम् राजसम् विद्धि।
परन्तु हे भरतश्रेष्ठ, जो यज्ञ फल का उद्देश्य रखकर और दम्भ के लिए भी किया जाता है, उस यज्ञ को आप राजस जानिए।
17.13विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥13॥
vidhihīnam asṛṣṭānnaṃ mantrahīnam adakṣiṇam |
śraddhāvirahitaṃ yajñaṃ tāmasaṃ paricakṣate
- विधिहीनम्
- विधि से रहित
- असृष्टान्नम्
- अन्नदान से रहित
- मन्त्रहीनम्
- मन्त्रों से रहित
- अदक्षिणम्
- दक्षिणा से रहित
- श्रद्धाविरहितम्
- श्रद्धा से रहित
- यज्ञम्
- यज्ञ को
- तामसम्
- तामस
- परिचक्षते
- कहते हैं
अन्वय: विधिहीनम् असृष्टान्नम् मन्त्रहीनम् अदक्षिणम् श्रद्धाविरहितम् यज्ञम् तामसम् परिचक्षते।
विधि से रहित, अन्नदान से रहित, मन्त्रों से रहित, दक्षिणा से रहित और श्रद्धा से रहित यज्ञ को तामस कहते हैं।
17.14देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥14॥
devadvijaguruprājñapūjanaṃ śaucam ārjavam |
brahmacaryam ahiṃsā ca śārīraṃ tapa ucyate
- देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनम्
- देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानी का पूजन
- शौचम्
- पवित्रता
- आर्जवम्
- सरलता
- ब्रह्मचर्यम्
- ब्रह्मचर्य
- अहिंसा
- अहिंसा
- च
- और
- शारीरम्
- शरीर सम्बन्धी
- तपः
- तप
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनम् शौचम् आर्जवम् ब्रह्मचर्यम् अहिंसा च शारीरम् तपः उच्यते।
देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है।
17.15अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥15॥
anudvegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat |
svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate
- अनुद्वेगकरम्
- उद्वेग न करने वाला
- वाक्यम्
- वचन
- सत्यम्
- सत्य
- प्रियहितम्
- प्रिय और हितकारी
- च
- और
- यत्
- जो
- स्वाध्यायाभ्यसनम्
- स्वाध्याय का अभ्यास
- च
- और
- एव
- भी
- वाङ्मयम्
- वाणी सम्बन्धी
- तपः
- तप
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: यत् अनुद्वेगकरम् सत्यम् प्रियहितम् च वाक्यम्, स्वाध्यायाभ्यसनम् च एव, वाङ्मयम् तपः उच्यते।
जो वचन उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी है, वह और स्वाध्याय का अभ्यास भी, यह वाणी सम्बन्धी तप कहा जाता है।
17.16मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥16॥
manaḥprasādaḥ saumyatvaṃ maunam ātmavinigrahaḥ |
bhāvasaṃśuddhir ity etat tapo mānasam ucyate
- मनःप्रसादः
- मन की प्रसन्नता
- सौम्यत्वम्
- शान्त भाव
- मौनम्
- मौन
- आत्मविनिग्रहः
- मन का निग्रह
- भावसंशुद्धिः
- भावों की शुद्धि
- इति
- यह
- एतत्
- यह सब
- तपः
- तप
- मानसम्
- मन सम्बन्धी
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: मनःप्रसादः सौम्यत्वम् मौनम् आत्मविनिग्रहः भावसंशुद्धिः इति एतत् मानसम् तपः उच्यते।
मन की प्रसन्नता, शान्त भाव, मौन, मन का निग्रह और भावों की शुद्धि, यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है।
17.17श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥17॥
śraddhayā parayā taptaṃ tapas tat trividhaṃ naraiḥ |
aphalākāṅkṣibhir yuktaiḥ sāttvikaṃ paricakṣate
- श्रद्धया
- श्रद्धा से
- परया
- परम
- तप्तम्
- तपा गया
- तपः
- तप
- तत्
- वह
- त्रिविधम्
- तीन प्रकार का
- नरैः
- मनुष्यों द्वारा
- अफलाकाङ्क्षिभिः
- फल न चाहने वाले
- युक्तैः
- योगयुक्त
- सात्त्विकम्
- सात्त्विक
- परिचक्षते
- कहते हैं
अन्वय: अफलाकाङ्क्षिभिः युक्तैः नरैः परया श्रद्धया तप्तम् तत् त्रिविधम् तपः सात्त्विकम् परिचक्षते।
फल न चाहने वाले योगयुक्त मनुष्यों द्वारा परम श्रद्धा से तपा गया वह तीन प्रकार का तप सात्त्विक कहा जाता है।
17.18सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥18॥
satkāramānapūjārthaṃ tapo dambhena caiva yat |
kriyate tad iha proktaṃ rājasaṃ calam adhruvam
- सत्कारमानपूजार्थम्
- सत्कार, मान और पूजा के लिए
- तपः
- तप
- दम्भेन
- दम्भ से
- च
- और
- एव
- भी
- यत्
- जो
- क्रियते
- किया जाता है
- तत्
- वह
- इह
- इस लोक में
- प्रोक्तम्
- कहा गया है
- राजसम्
- राजस
- चलम्
- चल
- अध्रुवम्
- अस्थिर
अन्वय: यत् तपः सत्कारमानपूजार्थम् दम्भेन च एव क्रियते, तत् इह चलम् अध्रुवम् राजसम् प्रोक्तम्।
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा दम्भ से भी किया जाता है, वह इस लोक में चल और अस्थिर राजस तप कहा गया है।
17.19मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥19॥
mūḍhagrāheṇātmano yat pīḍayā kriyate tapaḥ |
parasyotsādanārthaṃ vā tat tāmasam udāhṛtam
- मूढग्राहेण
- मूढ़तापूर्वक हठ से
- आत्मनः
- अपने को
- यत्
- जो
- पीडया
- पीड़ा देकर
- क्रियते
- किया जाता है
- तपः
- तप
- परस्य
- दूसरे के
- उत्सादनार्थम्
- नाश के लिए
- वा
- अथवा
- तत्
- वह
- तामसम्
- तामस
- उदाहृतम्
- कहा गया है
अन्वय: यत् तपः मूढग्राहेण आत्मनः पीडया परस्य उत्सादनार्थम् वा क्रियते, तत् तामसम् उदाहृतम्।
जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से अपने को पीड़ा देकर अथवा दूसरे का नाश करने के लिए किया जाता है, वह तामस कहा गया है।
17.20दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥20॥
dātavyam iti yad dānaṃ dīyate ’nupakāriṇe |
deśe kāle ca pātre ca tad dānaṃ sāttvikaṃ smṛtam
- दातव्यम्
- देना कर्तव्य है
- इति
- ऐसा मानकर
- यत्
- जो
- दानम्
- दान
- दीयते
- दिया जाता है
- अनुपकारिणे
- प्रत्युपकार न करने वाले को
- देशे
- उचित देश में
- काले
- उचित काल में
- च
- और
- पात्रे
- उचित पात्र को
- च
- और
- तत्
- वह
- दानम्
- दान
- सात्त्विकम्
- सात्त्विक
- स्मृतम्
- कहा गया है
अन्वय: दातव्यम् इति यत् दानम् देशे काले च पात्रे च अनुपकारिणे दीयते, तत् दानम् सात्त्विकम् स्मृतम्।
देना कर्तव्य है, ऐसा मानकर जो दान उचित देश, उचित काल और उचित पात्र को, प्रत्युपकार न करने वाले को दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
17.21यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥21॥
yat tu pratyupakārārthaṃ phalam uddiśya vā punaḥ |
dīyate ca parikliṣṭaṃ tad dānaṃ rājasaṃ smṛtam
- यत्
- जो
- तु
- परन्तु
- प्रत्युपकारार्थम्
- प्रत्युपकार के लिए
- फलम्
- फल को
- उद्दिश्य
- उद्देश्य बनाकर
- वा
- अथवा
- पुनः
- फिर
- दीयते
- दिया जाता है
- च
- और
- परिक्लिष्टम्
- क्लेशपूर्वक
- तत्
- वह
- दानम्
- दान
- राजसम्
- राजस
- स्मृतम्
- कहा गया है
अन्वय: यत् तु दानम् प्रत्युपकारार्थम् फलम् उद्दिश्य वा पुनः परिक्लिष्टम् च दीयते, तत् दानम् राजसम् स्मृतम्।
परन्तु जो दान प्रत्युपकार के लिए अथवा फल को उद्देश्य बनाकर, और फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
17.22अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥22॥
adeśakāle yad dānam apātrebhyaś ca dīyate |
asatkṛtam avajñātaṃ tat tāmasam udāhṛtam
- अदेशकाले
- अनुचित देश और काल में
- यत्
- जो
- दानम्
- दान
- अपात्रेभ्यः
- कुपात्रों को
- च
- और
- दीयते
- दिया जाता है
- असत्कृतम्
- बिना सत्कार
- अवज्ञातम्
- तिरस्कारपूर्वक
- तत्
- वह
- तामसम्
- तामस
- उदाहृतम्
- कहा गया है
अन्वय: यत् दानम् अदेशकाले अपात्रेभ्यः च असत्कृतम् अवज्ञातम् दीयते, तत् तामसम् उदाहृतम्।
जो दान अनुचित देश और काल में और कुपात्रों को, बिना सत्कार और तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है, वह तामस कहा गया है।
17.23ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः
ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥23॥
oṃ tat sad iti nirdeśo brahmaṇas trividhaḥ smṛtaḥ |
brāhmaṇās tena vedāś ca yajñāś ca vihitāḥ purā
- ओम्
- ओम्
- तत्
- तत्
- सत्
- सत्
- इति
- ऐसा
- निर्देशः
- निर्देश
- ब्रह्मणः
- ब्रह्म का
- त्रिविधः
- तीन प्रकार का
- स्मृतः
- कहा गया है
- ब्राह्मणाः
- ब्राह्मण
- तेन
- उससे
- वेदाः
- वेद
- च
- और
- यज्ञाः
- यज्ञ
- च
- और
- विहिताः
- रचे गए
- पुरा
- पूर्वकाल में
अन्वय: ओम् तत् सत् इति ब्रह्मणः त्रिविधः निर्देशः स्मृतः। तेन पुरा ब्राह्मणाः वेदाः च यज्ञाः च विहिताः।
ओम्, तत्, सत्, ऐसा यह ब्रह्म का तीन प्रकार का निर्देश कहा गया है। उसी से पूर्वकाल में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गए।
17.24तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥24॥
tasmād om ity udāhṛtya yajñadānatapaḥkriyāḥ |
pravartante vidhānoktāḥ satataṃ brahmavādinām
- तस्मात्
- इसलिए
- ओम्
- ओम्
- इति
- ऐसा
- उदाहृत्य
- उच्चारण करके
- यज्ञदानतपःक्रियाः
- यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ
- प्रवर्तन्ते
- आरम्भ होती हैं
- विधानोक्ताः
- शास्त्रविधि से कही हुई
- सततम्
- सदा
- ब्रह्मवादिनाम्
- ब्रह्मवादियों की
अन्वय: तस्मात् ब्रह्मवादिनाम् विधानोक्ताः यज्ञदानतपःक्रियाः सततम् ओम् इति उदाहृत्य प्रवर्तन्ते।
इसलिए ब्रह्मवादियों की शास्त्रविधि से कही हुई यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ सदा ओम् का उच्चारण करके आरम्भ होती हैं।
17.25तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः
तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥25॥
tad ity anabhisaṃdhāya phalaṃ yajñatapaḥkriyāḥ |
dānakriyāś ca vividhāḥ kriyante mokṣakāṅkṣibhiḥ
- तत्
- तत्
- इति
- ऐसा कहकर
- अनभिसंधाय
- उद्देश्य न रखकर
- फलम्
- फल का
- यज्ञतपःक्रियाः
- यज्ञ और तप की क्रियाएँ
- दानक्रियाः
- दान की क्रियाएँ
- च
- और
- विविधाः
- अनेक प्रकार की
- क्रियन्ते
- की जाती हैं
- मोक्षकाङ्क्षिभिः
- मोक्ष चाहने वालों द्वारा
अन्वय: मोक्षकाङ्क्षिभिः तत् इति फलम् अनभिसंधाय विविधाः यज्ञतपःक्रियाः दानक्रियाः च क्रियन्ते।
मोक्ष चाहने वाले पुरुषों द्वारा, तत्, ऐसा कहकर, फल का उद्देश्य न रखकर अनेक प्रकार की यज्ञ और तप की क्रियाएँ तथा दान की क्रियाएँ की जाती हैं।
17.26सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥26॥
sadbhāve sādhubhāve ca sad ity etat prayujyate |
praśaste karmaṇi tathā sacchabdaḥ pārtha yujyate
- सद्भावे
- सत्ता के भाव में
- साधुभावे
- श्रेष्ठता के भाव में
- च
- और
- सत्
- सत्
- इति
- ऐसा
- एतत्
- यह
- प्रयुज्यते
- प्रयोग किया जाता है
- प्रशस्ते
- प्रशंसनीय
- कर्मणि
- कर्म में
- तथा
- तथा
- सच्छब्दः
- सत् शब्द
- पार्थ
- हे पार्थ
- युज्यते
- लगाया जाता है
अन्वय: पार्थ, सद्भावे साधुभावे च एतत् सत् इति प्रयुज्यते, तथा प्रशस्ते कर्मणि सच्छब्दः युज्यते।
हे पार्थ, सत्ता के भाव में और श्रेष्ठता के भाव में यह सत् शब्द प्रयोग किया जाता है, तथा प्रशंसनीय कर्म में भी सत् शब्द लगाया जाता है।
17.27यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥27॥
yajñe tapasi dāne ca sthitiḥ sad iti cocyate |
karma caiva tadarthīyaṃ sad ity evābhidhīyate
- यज्ञे
- यज्ञ में
- तपसि
- तप में
- दाने
- दान में
- च
- और
- स्थितिः
- स्थिति
- सत्
- सत्
- इति
- ऐसा
- च
- भी
- उच्यते
- कही जाती है
- कर्म
- कर्म
- च
- और
- एव
- भी
- तदर्थीयम्
- उस परमात्मा के लिए किया हुआ
- सत्
- सत्
- इति
- ऐसा
- एव
- ही
- अभिधीयते
- कहा जाता है
अन्वय: यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सत् इति च उच्यते। तदर्थीयम् कर्म च एव सत् इति एव अभिधीयते।
यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी सत् कही जाती है। और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म भी सत् ही कहा जाता है।
17.28अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥28॥
aśraddhayā hutaṃ dattaṃ tapas taptaṃ kṛtaṃ ca yat |
asad ity ucyate pārtha na ca tat pretya no iha
- अश्रद्धया
- श्रद्धा के बिना
- हुतम्
- हवन किया हुआ
- दत्तम्
- दिया हुआ
- तपः
- तप
- तप्तम्
- तपा हुआ
- कृतम्
- किया हुआ
- च
- और
- यत्
- जो
- असत्
- असत्
- इति
- ऐसा
- उच्यते
- कहा जाता है
- पार्थ
- हे पार्थ
- न
- न
- च
- और
- तत्
- वह
- प्रेत्य
- मरने के बाद
- नो
- न ही
- इह
- यहाँ
अन्वय: पार्थ, अश्रद्धया यत् हुतम् दत्तम् तपः तप्तम् कृतम् च, असत् इति उच्यते, तत् न च प्रेत्य नो इह।
हे पार्थ, श्रद्धा के बिना जो हवन किया जाता है, जो दिया जाता है, जो तप तपा जाता है और जो कुछ किया जाता है, वह असत् कहा जाता है। वह न तो मरने के बाद फल देता है और न यहाँ।