अध्याय 8 · राज्य-विभाजन, इन्द्रप्रस्थ, खाण्डव-दहन

आदि पर्व · वैवाहिक, राज्यलाभ, अर्जुन-वनवास, हरण, खाण्डव-दाह-पर्व · अध्याय 192 से 229

आधा राज्य, एक नया नगर, और जलता हुआ वन

एक वचन से बँधे पाँच भाई, एक ऐसी नगरी जो आकाश को छूती थी, और एक आग जिसने एक वन को राख कर दिया

रात गहरी थी जब धृष्टद्युम्न राजभवन की ओर लौटा, और सीधा अपने पिता के पास जा खड़ा हुआ। द्रुपद सारी रात इसी एक प्रश्न में बैठे थे कि उनकी कृष्णा किसके साथ गई, और कहीं किसी नीच कुल के पुरुष ने उनके सिर पर अपना पैर तो नहीं रख दिया। धृष्टद्युम्न ने उन्हें वह सब कह सुनाया जो उसने अँधेरे में छिपकर देखा-सुना था। उसने उस युवक का वर्णन किया जिसकी आँखें लाल कमल-सी थीं और जिसने काले मृगचर्म पहनकर उस सुदृढ़ धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर पाँच बाणों से लक्ष्य गिरा दिया था, और उस दूसरे का जिसने गजराज की भाँति वृक्ष उखाड़कर अकेले समस्त राजाओं को रोक लिया था, और बताया कि उन दोनों ने चन्द्रमा और सूर्य की भाँति प्रकाशित होते हुए कृष्णा को बीच में लेकर कुम्हार के घर में प्रवेश किया। उसने उस घर में बैठी अग्निशिखा-सी तेजस्विनी स्त्री की बात कही, जो उसके अनुमान से उन वीरों की माता रही होगी, और उन तीन और नरश्रेष्ठों की, जो उसी अग्नि की भाँति दीप्त थे।

धृष्टद्युम्न ने आगे कहा कि उन सबने अपनी भिक्षा माता के कहे अनुसार बाँटी, सो उनका आचरण याचकों-सा था, पर रात को सोते समय वे आपस में जैसी विचित्र बातें करने लगे, वे न वैश्यों-जैसी थीं, न शूद्रों-जैसी, न ब्राह्मणों-जैसी। वे दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, खड्गों और गदाओं की बातें करते रहे, सेनापतियों के योग्य कथाएँ, इसलिये उसके मन में तनिक भी संदेह नहीं रहा कि वे क्षत्रियशिरोमणि हैं। और उसने सुना भी था कि कुन्ती के पुत्र लाक्षागृह की आग में से जीवित बचकर निकल आये हैं, इसलिये उसका अनुमान यही था कि ये वही पाण्डव हैं। यह सुनते ही द्रुपद के हृदय का वह काँटा निकल गया जो वर्षों से वहाँ चुभा था, क्योंकि उनकी आत्मा की एक ही अभिलाषा रही थी कि उनकी पुत्री का विवाह पाण्डु के पुत्रों से हो, और इस बात को वे किसी से कह न पाते थे, इस भय से कि कहीं वे जीवित न हों।

प्रातःकाल द्रुपद ने अपने पुरोहित को कुम्हार के घर भेजा, यह जानने के लिये कि वे वास्तव में कौन हैं। पुरोहित को विनयपूर्वक आता देख युधिष्ठिर ने भीम को संकेत किया कि इन माननीय अतिथि को पाद्य और अर्घ्य अर्पित किया जाय। पुरोहित ने राजा का सन्देश दिया, कि पाण्डु महाराज द्रुपद के आत्मा के समान प्रिय मित्र थे, और इसी से राजा की यह नित्य कामना रही है कि बड़ी-बड़ी भुजाओं वाले अर्जुन उनकी इस पुत्री का धर्मपूर्वक पाणिग्रहण करें। उन्होंने सीधे यह नहीं पूछा कि वे कौन हैं, और पाण्डवों ने भी सीधे यह नहीं कहा, क्योंकि उस समय अपनी पहचान खोलना दोनों ओर से अनुचित था। बात आधी कही गई और आधी समझ ली गई, और इतने में राजा का दूत फिर आया, इस सन्देश के साथ कि भोजन तैयार है, और एक सुसज्जित रथ बाहर खड़ा है जो उन्हें राजभवन ले चले।

एक स्त्री के पाँच पति

राजभवन में जब वे लोग आये और उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों, कवचों और धनुषों की ओर ही सबसे पहले दृष्टि डाली, अन्न-वस्त्र और रत्नों को छोड़कर, तब द्रुपद के मन में जो थोड़ा-सा संशय शेष था वह भी जाता रहा। द्रुपद ने युधिष्ठिर से उनका कुल पूछा, और जब युधिष्ठिर ने अपना और भाइयों का परिचय दिया, और यह कहा कि वे कुन्तीपुत्र पाण्डव हैं जो वारणावत की लाक्षागृह की आग से बचकर निकल आये हैं, तब राजा हर्ष से अधीर होकर बार-बार आँसू पोंछते हुए उनसे गले मिले। पर हर्ष के बीच एक बात ऐसी थी जिसका उत्तर किसी के पास न था, और द्रुपद ने वही पूछी। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि लक्ष्य अर्जुन ने बेधा था और कृष्णा ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, अतः अब उसका विवाह तो धर्मपूर्वक अर्जुन से ही होना चाहिये।

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि कृष्णा उन पाँचों की पत्नी होगी। यह सुनकर द्रुपद का मुख विवर्ण हो गया। उन्होंने कहा कि एक पुरुष की अनेक स्त्रियाँ होने का विधान तो उन्होंने सुना है, पर एक स्त्री के अनेक पति होने का विधान न वेद में है, न लोक में, और यह तो धर्म के विरुद्ध आचार है, जिसे कोई विद्वान् पुरुष कभी नहीं करता। धृष्टद्युम्न पास ही खड़ा था; उसने युधिष्ठिर से और भी सीधी बात कही, कि वे स्वयं ब्राह्मण हैं, तपोधन हैं, सो वही बतायें कि बड़ा भाई होते हुए छोटे भाई की स्त्री के साथ बड़े भाई का समागम कैसे धर्म हो सकता है। उसका तर्क खरा था, और उसका कोई उत्तर सीधे शब्दों में नहीं था।

तब युधिष्ठिर ने वे शब्द कहे जो उस सारी कथा के बीच में एक काँटे की तरह गड़े रहते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी वाणी कभी झूठ नहीं बोलती, और उनकी बुद्धि कभी अधर्म में नहीं लगती, इसलिये जब उनका मन इस विवाह की ओर झुक रहा है, तब यह किसी प्रकार अधर्म नहीं हो सकता। उन्होंने पुराण की एक बात याद दिलाई, कि जटिला नाम की गौतम-गोत्र की कन्या ने सात ऋषियों के साथ विवाह किया था, और यह भी कहा कि धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, उसकी गति को कोई पूरी तरह नहीं जानता, इसलिये यह कार्य धर्म है या अधर्म, इसका निश्चय उन-जैसे लोगों के लिये असम्भव है। सबसे सत्यनिष्ठ पुरुष अपने ही मन को धर्म का प्रमाण बता रहा था, और सभा में कोई बोला नहीं।

द्रुपद का संशय फिर भी नहीं टूटा, और उन्होंने कहा कि इस विषय में वे, उनकी पुत्री और स्वयं युधिष्ठिर मिलकर विचार करें कि आगे क्या किया जाय। उसी समय व्यास वहाँ आ पहुँचे। राजा ने उन्हें सब बात कह सुनाई, और मुनि ने द्रुपद का हाथ पकड़कर उन्हें एकान्त में ले जाकर एक पुरानी कथा सुनाई। किसी तपोवन में एक ऋषि-कन्या थी, जो रूप और गुण से सम्पन्न होने पर भी पति न पा सकी, और जिसने भगवान् शंकर की तपस्या करके पाँच बार पति माँगा, और शंकर ने उसे दूसरे शरीर में पाँच पति होने का वर दिया था; वही कन्या अब द्रुपद के कुल में कृष्णा होकर जन्मी है। फिर व्यास ने राजा को एक क्षण के लिये दिव्य दृष्टि दी, और द्रुपद ने देखा कि वे पाँचों भाई पूर्वजन्म में इन्द्र-स्वरूप थे, और कृष्णा स्वयं लक्ष्मी। यह देखकर द्रुपद का सारा विरोध शान्त हो गया, और उन्होंने कहा कि देवों का विधान जब ऐसा है, तब उन्हें कोई आपत्ति नहीं। जो बात अभी मनुष्य के विवेक में अधर्म जान पड़ी थी, उसके ऊपर एक देव-वचन और एक पूर्वजन्म की कथा आ बैठी, और राजा का मस्तक झुक गया।

आधा राज्य

शुभ नक्षत्र में, अग्नि को साक्षी करके, कृष्णा ने एक-एक करके पाँचों भाइयों का पाणिग्रहण किया, बड़े से छोटे तक, एक-एक दिन में एक-एक का। पुरोहित ने यथाविधि हवन किया, और भाइयों ने बारी-बारी उसका हाथ थामा। कृष्ण ने मित्रता के नाते बहुत-सा धन, रत्न, वस्त्र और गौएँ भेजीं, और पाण्डव अपनी ससुराल में, अपनी विजय और अपने विवाह के बीच, पहली बार उस भय से दूर बैठे थे जो उन्हें वारणावत से एकचक्रा तक खदेड़ता आया था।

यह समाचार धीरे-धीरे हस्तिनापुर पहुँचा, कि जिन्हें मरा समझा गया था वे पाँचों जीवित हैं, द्रुपद-जैसे प्रबल राजा के दामाद बन गये हैं, और कृष्ण तथा बलराम उनके मित्र हैं। धृतराष्ट्र के भवन में जो लोग जुटे, उनकी बातें दो दिशाओं में फटी हुई थीं। दुर्योधन और कर्ण कहने लगे कि जब तक पाण्डव और द्रुपद एक न हो जायें, तब तक उन्हें मार डालना चाहिये, कि कोई उपाय करके कुन्ती के पुत्रों में फूट डाल दी जाय, या उन्हें कहीं भेजकर भीमसेन को ही छिपे रहकर मरवा दिया जाय, क्योंकि भीम ही उनमें सबसे बलवान् है और उसी का सहारा पाकर अर्जुन युद्ध में अजेय हुआ है। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि किसी सुन्दरी स्त्री के द्वारा कृष्णा को उनसे विरक्त करा दिया जाय, ताकि पाँचों में परस्पर वैर पड़ जाय।

भीष्म, द्रोण, कृप और विदुर ने इन सब उपायों को सुनकर सिर हिला दिया। भीष्म ने कहा कि पाण्डवों का राज्य पर वैसा ही अधिकार है जैसा धृतराष्ट्र के पुत्रों का, क्योंकि पाण्डु इस राज्य के स्वामी थे। द्रोण ने भी यही कहा कि उन्हें सम्मानपूर्वक बुलाकर आधा राज्य दे देना ही श्रेयस्कर है। और जब दुर्योधन ने रोष में कर्ण की सलाह को ही ठीक कहा, तब विदुर ने धृतराष्ट्र को एकान्त में स्पष्ट कह दिया कि भीष्म और द्रोण दोनों धर्म के ज्ञाता और निष्पक्ष पुरुष हैं, और जो लोग आपके पुत्रों पर विशेष पक्षपात के कारण आपको पाण्डवों के अहित की सलाह देते हैं, वे आपका भला नहीं चाहते, और पाण्डव भी आपके वैसे ही पुत्र हैं जैसे दुर्योधन आदि। विदुर ने यह भी कहा कि इस समय यदि पाण्डवों को न बुलाया गया तो समस्त लोक धृतराष्ट्र की निन्दा करेगा।

धृतराष्ट्र ने, जो पुत्र-मोह और राजधर्म के बीच जीवन-भर डोलते रहे, इस बार धर्म की ओर झुककर विदुर को ही दूत बनाकर पाण्डवों को बुला भेजा। विदुर पाञ्चालनगर जाकर कुन्ती और पाण्डवों को आदरपूर्वक हस्तिनापुर ले आये, और नगर के लोग प्रजावत्सल पाण्डु के पुत्रों को जीवित लौटा देख हर्ष से भर उठे। तब धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा कि भाइयों में फूट न पड़े, इसलिये वे आधा राज्य लेकर खाण्डवप्रस्थ चले जायें। जो भूमि उन्हें मिली, वह कोई समृद्ध नगरी न थी; वह एक भयंकर वन था। कभी वह समस्त पौरव राजाओं की राजधानी रही थी, पर आगे चलकर बुध-पुत्र पुरूरवा के लोभ के कारण मुनियों ने उसे शाप देकर उजाड़ डाला था, और तब से वह उजड़ा हुआ खाण्डवप्रस्थ ही उनके भाग में आया। पाण्डवों ने यह आधा राज्य प्रणाम करके स्वीकार कर लिया, और भीष्म तथा द्रोण के ‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’ कहने के बीच, उस उजड़े वन की ओर चल पड़े जो उनका राज्य कहलाने वाला था।

इन्द्रप्रस्थ

वासुदेव कृष्ण ने उस उजाड़ भूमि को देखकर इन्द्र का ध्यान किया, और इन्द्र की आज्ञा से विश्वकर्मा खाण्डवप्रस्थ में आ उतरे। कृष्ण ने उनसे कहा कि वे कुरुराज युधिष्ठिर के लिये महेन्द्रपुरी के समान एक महानगर का निर्माण करें, और इन्द्र के दिये हुए नाम के अनुसार वह इन्द्रप्रस्थ कहलायेगा। पहले व्यास को आगे करके उस पवित्र भूमि पर शान्ति-कर्म कराया गया, फिर भूमि की नाप करवाई गई। नगर के चारों ओर समुद्र-सी विस्तृत और अगाध जल से भरी हुई खाइयाँ खोदी गईं, और उन पर श्वेत बादलों और चन्द्रमा-सी उज्ज्वल ऊँची चहारदीवारी उठाई गई, जो अपनी ऊँचाई से आकाश को छूती जान पड़ती थी। नगर के द्वार ऐसे थे मानो गरुड़ ने अपने दो पंख फैला रखे हों, और उन पर मेघों की घटा-से ऊँचे गोपुर खड़े थे। भीतर अभेद्य अस्त्रागार थे, जिनमें शस्त्र संचित थे, और चहारदीवारी पर हाथ से चलाई जाने वाली लोहे की शतघ्नियाँ इस प्रकार सजी थीं जैसे दो जीभ वाले साँप बैठे हों।

नगर के भीतर ऊँचे-ऊँचे प्रासाद बने, और उनके बीच उपवन और उद्यान, जिनमें आम, अशोक, चम्पा और अनेक फलदार वृक्ष लगे; जल से भरे कमल-सरोवर, हंसों और चकवों से सजे; और चौड़ी सीधी सड़कें। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सब वहाँ बस गये, व्यापारी देश-देश से आ जुटे, और वह उजड़ा हुआ खाण्डवप्रस्थ धीरे-धीरे इन्द्रप्रस्थ बन गया, धन-धान्य से सम्पन्न, स्वर्गलोक-सी शोभा वाला। युधिष्ठिर वहाँ धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों को आत्मा के समान प्रिय बन्धु मानते हुए न्याय और समता से उनका सेवन करते थे, और प्रजा उनकी छाया में ऐसे सुखी थी जैसे जीव पुण्यकर्म के फलस्वरूप उत्तम शरीर पाकर सुखी होता है।

एक दिन देवर्षि नारद घूमते हुए उनके पास आये। पाँचों भाई उन्हें प्रणाम करके बैठे, और कृष्णा भी, धर्म का आचरण करने वाले उन मुनि के सामने अपने अंगों को ढके, हाथ जोड़कर खड़ी हो गई और फिर भीतर चली गई। तब नारद ने पाण्डवों से एक ऐसी बात कही जो उस घर के भीतर ही छिपा हुआ संकट थी। उन्होंने कहा कि यशस्विनी पाञ्चाली उन सब लोगों की एक ही धर्मपत्नी है, इसलिये वे ऐसी कोई नीति बना लें जिससे उनमें कभी परस्पर फूट न पड़े। और उन्होंने पुरानी एक कथा सुनाई।

सुन्द और उपसुन्द नाम के दो असुर भाई थे, जो सदा साथ रहते थे और एक-दूसरे के लिये कुछ भी कर सकते थे। उनका एक ही राज्य था, एक ही घर, और वे एक ही शय्या पर सोते, एक ही आसन पर बैठते, और साथ ही भोजन करते थे। उन्होंने तपस्या के बल से तीनों लोकों को जीत लिया था, और उन्हें मारने का कोई उपाय शेष न रहा, क्योंकि उन्होंने वर माँगते समय यही माँगा था कि उन्हें एक-दूसरे के सिवा और किसी से मृत्यु न हो। तब ब्रह्मा ने तिलोत्तमा नाम की एक अप्सरा को संसार के समस्त सौन्दर्य के अंश लेकर रचा, और उसे उन दोनों के पास भेज दिया। उस एक स्त्री को देखकर वे दोनों भाई, जिनमें इतना अटूट प्रेम था कि कोई कल्पना भी न कर सकता था कि वे कभी अलग होंगे, उसी को पाने के लिये एक-दूसरे की गदा से एक-दूसरे को मारकर वहीं ढेर हो गये। नारद ने कहा कि वे पाण्डव इस कथा को स्मरण रखें, और ऐसा नियम बना लें कि द्रौपदी कभी उनके बीच वह तिलोत्तमा न बन जाय।

देवर्षि के सामने ही उन अमित-तेजस्वी महात्मा पाण्डवों ने एक नियम बना लिया। वह यह था कि कृष्णा एक-एक वर्ष एक-एक भाई के घर निवास करेगी, और जब वह एक भाई के साथ एकान्त में बैठी हो, तब यदि कोई दूसरा भाई उसे उस अवस्था में देख ले, तो वह बारह वर्ष तक ब्रह्मचारी रहकर वन में निवास करेगा। यह नियम बनाकर वे रहने लगे, और नारद प्रसन्न होकर अपने स्थान को चले गये।

एक गौ, एक ब्राह्मण, और एक बारह वर्ष का वनवास

बहुत दिन बीते। पाण्डव सुख से रहते रहे, और कृष्णा बारी-बारी पाँचों के साथ ऐसे प्रसन्न रहती जैसे नागलोक में भोगवती नगरी शोभायमान रहती है। तब एक दिन कुछ चोरों ने किसी ब्राह्मण की गौएँ चुरा लीं, और वह ब्राह्मण रोता-चिल्लाता हुआ इन्द्रप्रस्थ के द्वार पर आकर पाण्डवों को पुकारने लगा कि उसका धन हरा जा रहा है, कोई उसकी रक्षा करे। उस समय अर्जुन के अस्त्र-शस्त्र उस भवन में रखे थे जहाँ युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ एकान्त में बैठे थे, और नियम यह था कि उस एकान्त को कोई दूसरा भाई न देखे।

अर्जुन एक क्षण ठिठके। यदि वे उस आर्त ब्राह्मण के आँसू न पोंछते, यदि द्वार पर रोते हुए की रक्षा न करते, तो वे उपेक्षा-जनित महान् अधर्म के भागी होते, और लोक में यह बात फैल जाती कि पाण्डव किसी आर्त की रक्षा में श्रद्धा नहीं रखते। और यदि वे राजा का अनादर करके उस घर में चले जाते, तो उनके अग्रज की प्रतिज्ञा झूठी होती, और उन्हें नियम के अनुसार बारह वर्ष वन में रहना पड़ता। उन्होंने मन-ही-मन निश्चय किया कि चाहे राजा के तिरस्कार से उन्हें नियम-भंग का दोष लगे, अथवा वन में ही उनकी मृत्यु हो जाय, तब भी गौ और ब्राह्मण की रक्षा रूप धर्म का पालन ही श्रेष्ठ है। यह सोचकर वे उसी भवन में चले गये, युधिष्ठिर से अनुमति लेकर धनुष उठाया, चोरों का पीछा करके ब्राह्मण की गौएँ लौटा लाईं, और उसे सौंपकर लौट आये।

लौटकर अर्जुन ने युधिष्ठिर को प्रणाम किया और कहा कि उनसे नियम का भंग हुआ है, इसलिये वे प्रतिज्ञा के अनुसार बारह वर्ष वन में रहने के लिये विदा माँगते हैं। युधिष्ठिर का हृदय भर आया। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि बड़े भाई के घर में छोटे भाई का प्रवेश कोई दोष नहीं है, कि उनके द्वारा अर्जुन का कोई तिरस्कार नहीं हुआ, न उनका धर्म लुप्त हुआ, इसलिये वे वनवास का विचार छोड़ दें। पर अर्जुन ने वह उत्तर दिया जो उन्हीं के स्वभाव से उठ सकता था। उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं युधिष्ठिर के मुख से सुना है कि धर्म के पालन में कभी बहानेबाजी नहीं करनी चाहिये, इसलिये वे सत्य की शपथ खाकर और शस्त्र छूकर कहते हैं कि वे सत्य से विचलित नहीं होंगे। अर्जुन ने बड़े भाई की कही हुई बात को ही उस बड़े भाई के विरुद्ध एक तर्क बना दिया, और राजा की आज्ञा लेकर बारह वर्ष की वनवास-दीक्षा लेकर चल पड़े।

तीन ब्याह और एक हरण

वनवास में अर्जुन ने तीर्थों का सेवन किया। गंगाद्वार पर एक बार जब वे स्नान कर रहे थे, तब नागराज की कन्या उलूपी उन्हें जल के भीतर खींच ले गई, और उसने अर्जुन से अपनी कामना प्रकट की। अर्जुन ने उससे कहा कि वे इस समय धर्म के पालन में ब्रह्मचर्य की दीक्षा लिये हुए हैं। उलूपी ने उत्तर दिया कि उनका वह व्रत द्रौपदी के विषय में है, अन्य स्त्रियों के विषय में नहीं, और एक आर्त स्त्री की रक्षा करना भी धर्म है। अर्जुन ने एक रात उसके साथ बिताई, और उसने उन्हें यह वर दिया कि जल के भीतर रहने वाले सब प्राणी उन्हें कभी पराजित न कर सकेंगे।

आगे बढ़ते हुए वे मणिपुर पहुँचे, जहाँ राजा चित्रवाहन की कन्या चित्रांगदा थी। उस कुल में शंकर के वर के कारण सदा एक ही सन्तान होती चली आती थी, इसलिये राजा ने अपनी पुत्री को पुत्रिका-धर्म के अनुसार ही देने का प्रस्ताव रखा, कि उससे जो प्रथम पुत्र हो, वह उन्हीं का पुत्र माना जाय और उसी कुल की वंश-परम्परा को चलाये। अर्जुन ने यह शर्त स्वीकार करके चित्रांगदा का पाणिग्रहण किया, और तीन वर्ष तक मणिपुर में रहे। जब बभ्रुवाहन नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, तब अर्जुन उस पुत्र और उस पत्नी को वहीं छोड़कर, यह कहते हुए कि वियोग से वह संतप्त न हो, आगे चल पड़े। दक्षिण के तीर्थों में घूमते हुए वे प्रभास तीर्थ जा पहुँचे।

प्रभास पास ही द्वारका थी, और कृष्ण को जब यह पता चला कि अर्जुन वहाँ आये हैं, तब वे आकर उनसे मिले। द्वारका में रैवतक पर्वत पर वृष्णि और अन्धकवंशियों का एक बड़ा उत्सव होने वाला था, और उसमें कृष्ण की बहन सुभद्रा भी जाने वाली थी। अर्जुन ने उसे देखा और उस पर उनका मन गया, और कृष्ण ने ताड़ लिया। कृष्ण ने ही अर्जुन को परामर्श दिया कि क्षत्रिय कन्या का बल से हरण भी एक विवाह-विधि मानी जाती है, और स्वयंवर में सुभद्रा किसे चुनेगी, इसका कोई भरोसा नहीं, इसलिये उसे हर ले जाना ही उचित है। बलराम का स्नेह दुर्योधन की ओर था, और यदि बात उन पर छोड़ी जाती तो वे सुभद्रा को दुर्योधन को दे सकते थे; इसलिये कृष्ण ने अपनी ही बहन के हरण का उपाय अपने मित्र को सुझाया, और यह जानते हुए सुझाया कि इससे उनका भाई बलराम कुपित होगा।

कृष्ण की अनुमति और सम्मति पाकर अर्जुन ने एक सुसज्जित स्वर्णमय रथ तैयार करवाया, उसमें शैब्य और सुग्रीव आदि घोड़े जुतवाये, उसमें सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखवाये, और शिकार खेलने के बहाने रैवतक पर्वत पर जा पहुँचे। जब सुभद्रा देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करके पर्वत की प्रदक्षिणा करके द्वारका लौट रही थी, तब अर्जुन ने उसे बलपूर्वक अपने रथ पर उठा लिया और वेग से चल दिये। यह देखकर वृष्णिवंशी वीर युद्धोन्माद से लाल आँखें किये उठ खड़े हुए, और ‘जल्दी रथ जोतो, धनुष और कवच लाओ’ की पुकार से वह सारी सभा खौल उठी, जहाँ अभी सैकड़ों रत्नजटित सिंहासनों पर भोज, वृष्णि और अन्धक वंश के महारथी प्रज्वलित अग्नि की भाँति बैठे थे।

बलराम का क्रोध सबसे प्रबल था। उन्होंने आक्रोश में कहा कि अर्जुन ने उनका अन्न खाकर, उनके आतिथ्य में रहकर, उनके सिंहासन को रौंदकर उनकी कुल-कन्या का हरण किया है, और वे अकेले अर्जुन को मारकर समस्त कौरवों का नाश कर देंगे। तब कृष्ण ने उन्हें शान्त किया। उन्होंने भाई से कहा कि अर्जुन ने उनके कुल का अपमान नहीं किया, बल्कि क्षत्रिय की रीति से ही सुभद्रा को ले गये हैं, कि बल से कन्या का हरण क्षत्रियों के लिये विवाह की एक मान्य विधि है, और स्वयंवर में सुभद्रा किसे चुनती, इसका भरोसा ही क्या था। फिर अर्जुन-जैसा वर मिलना सुभद्रा का सौभाग्य ही है। बलराम का क्रोध शान्त हुआ, और सुभद्रा को विधिपूर्वक अर्जुन को सौंप दिया गया। बारह वर्ष का वनवास पूरा करके अर्जुन सुभद्रा को साथ लेकर इन्द्रप्रस्थ लौटे, उलूपी जल में, चित्रांगदा और बभ्रुवाहन मणिपुर में, और सुभद्रा अपने रथ पर।

खाण्डव की आग

इन्द्रप्रस्थ में रहते हुए पाण्डवों ने धृतराष्ट्र और भीष्म की आज्ञा से अपने बहुत-से शत्रु राजाओं को जीत लिया, और युधिष्ठिर का राज्य चारों ओर फैल गया। एक दिन अर्जुन और कृष्ण यमुना के तट पर खाण्डववन के पास विहार करने गये। ग्रीष्म का ताप था, और वे जल-क्रीड़ा करके, दिव्य भोजन और पेय का सेवन करके, उस वन के एकान्त में बैठे थे, जब एक ब्राह्मण-वेशधारी पुरुष उनके पास आया। उसका रंग तपे हुए सोने-सा था, उसकी जटाएँ अग्निशिखा-सी, और उसके अंगों से एक मन्द-सी ज्वाला फूट रही थी। उसने अपना परिचय अग्निदेव के रूप में दिया, और कहा कि वह बहुत भूखा है, और चाहता है कि खाण्डववन को भोजन के रूप में पा सके।

अग्निदेव ने अपनी क्षुधा का कारण बताया। श्वेतकि नाम के एक राजा ने बारह वर्ष तक लगातार एक घी की धारा से हवन कराया था, जिसमें निरन्तर घी ही पड़ता रहा, और उस मेद और घी को पी-पीकर अग्नि की जठराग्नि मन्द पड़ गई, और उन्हें अरुचि-सी हो गई। ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि खाण्डववन में नाना औषधियाँ और प्राणी हैं, उन्हें खाकर उनका पाचन ठीक हो जायेगा। पर खाण्डववन को वे अकेले नहीं जला पाते थे, क्योंकि उस वन में तक्षक नाग रहता था, जो इन्द्र का मित्र था, और इन्द्र अपने मित्र की रक्षा के लिये जब-जब अग्नि उस वन को जलाने लगते, तब-तब मेघों की झड़ी लगाकर उसे बुझा देते। अग्नि ने सात बार उस वन में मुँह डाला, और सातों बार इन्द्र ने उसे बुझा दिया था। इसीलिये अब वे अर्जुन और कृष्ण की शरण में आये थे, कि ये दोनों इन्द्र को रोक दें, तो वे अपना भोजन पा सकें।

अर्जुन ने कहा कि वे यह कार्य कर देंगे, पर उनके पास इन्द्र को रोकने योग्य दिव्य अस्त्र नहीं हैं। तब अग्नि ने वरुण का ध्यान किया, और जल के स्वामी वरुण ने उन्हें वे दिव्य आयुध दिये जो सोम ने वरुण को सौंपे थे। अर्जुन को गाण्डीव नाम का वह धनुष मिला, जिसकी टंकार से शत्रु-सेना थर्रा उठती थी; अक्षय बाणों वाले दो तरकस, जो कभी रीते न होते; और कपिध्वज नाम का वह दिव्य रथ, जिसमें श्वेत दिव्य घोड़े जुते थे, जिस पर ध्वजा में वानर बैठा था, और जिसकी घर्घराहट मेघ-गर्जन-सी होती थी। कृष्ण को वरुण ने सुदर्शन नाम का चक्र और कौमोदकी नाम की गदा दी। आयुध पाकर वे दोनों खाण्डववन के दोनों ओर खड़े हो गये, और अग्निदेव ने वन में मुख डाल दिया।

अग्नि चारों ओर से अपनी लपटों में वन को लपेटकर भीतर तक धँस गई। उसकी गर्जना मेघों-सी गम्भीर थी, और उस घोष से समस्त प्राणी काँप उठे। जलता हुआ वह वन सूर्य की किरणों से व्याप्त मेरु पर्वत-सा देदीप्यमान दीख रहा था। वन के भीतर से प्राणी भागने लगे, और जो ऊपर आकाश में उड़कर निकलने का प्रयत्न करते, उन्हें अर्जुन अपने बाणों से रोक देते। वन में जो असुर, राक्षस, नाग और पशु-पक्षी रहते थे, वे सब आग और बाण के बीच घिर गये। कृष्ण का सुदर्शन चक्र बार-बार छूटकर सैकड़ों प्राणियों का संहार करके फिर उन्हीं के हाथ में लौट आता था। चक्र के प्रहार से कटे हुए दानवों के मेद और रक्त से सनकर वह सन्ध्या के समय बादलों-सा लाल जान पड़ता था। जो वन की रक्षा के लिये भीतर रहते थे, वे सौ-सौ टुकड़ों में बँटकर गिरने लगे। उस आग में किसी को शान्ति नहीं थी, न वन के किनारे, न किसी दुर्गम कोने में।

इन्द्र को अपने मित्र तक्षक के वन को जलते देख क्रोध हुआ, और उन्होंने आकाश को मेघों से ढककर भयंकर जल-वृष्टि आरम्भ कर दी। पर अर्जुन ने अपने बाणों का ऐसा सघन छाजन वन के ऊपर तान दिया कि एक बूँद जल भी नीचे न पहुँच सका, और वर्षा बीच में ही सूखती रही। फिर इन्द्र अपनी सारी देव-सेना लेकर उतर आये। रुद्र, वसु, मरुद्गण, विश्वेदेव और साध्यगण नाना अस्त्र-शस्त्र लिये उन दोनों पर टूट पड़े, पर श्रीकृष्ण और अर्जुन धनुष तानकर अविचल खड़े रहे, और उन्होंने अपने अमोघ बाणों से देवताओं को बार-बार घायल करके पीछे हटा दिया। देवता बार-बार प्रयत्न करके भी सफल न हो सके, और भयभीत होकर युद्ध छोड़कर इन्द्र की ही शरण में चले गये। आकाश में खड़े महर्षियों को देवताओं की यह गति देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। इन्द्र ने अर्जुन के पराक्रम की परीक्षा लेने के लिये फिर उन पर पत्थरों की बड़ी भारी वर्षा की, और अर्जुन ने उन्हें भी अपने बाणों से चूर-चूर कर दिया। अन्त में इन्द्र प्रसन्न होकर अपने पुत्र अर्जुन और कृष्ण की प्रशंसा करते हुए पीछे हट गये, और एक अदृश्य वाणी ने आकाश से अर्जुन को बताया कि उनका कार्य पूरा हुआ।

जब आग सब ओर से वन को निगल रही थी और अग्नि की लपटें वृक्षों को चाट रही थीं, तब मय नाम का एक दानव, जो विश्वकर्मा-जैसा शिल्पी था, उस जलते हुए वन में से प्राण बचाकर भागा। उसके पीछे ताप की एक दीवार बढ़ रही थी, और हवा में जली हुई चर्बी और राल की वह गन्ध भरी थी जो साँस के साथ छाती में उतरकर खाँसी बन जाती है। कृष्ण उसे मारने के लिये अपना चक्र उठाये उसके पीछे दौड़े, और पीछे से अग्नि उसे भस्म करने को बढ़ी। मय के सामने दोनों ओर मृत्यु थी। आगे चक्र की सरसराहट, पीछे लपटों की गर्जना, और बीच में उसका सूखता हुआ गला, जिसमें राख की किरकिराहट बैठ गई थी। उसके पाँव झुलस रहे थे, घुटने काँप रहे थे, और जब उसने अर्जुन को धनुष ताने अविचल खड़े देखा, तब उसके मन में बस एक ही बात कौंधी, कि इस एक पुरुष की छाया ही अब उसके और मृत्यु के बीच बची है। वह दौड़कर अर्जुन के चरणों में जा गिरा, और हाँफते हुए, टूटते स्वर में, प्राणों की भीख माँगते हुए पुकार उठा कि अर्जुन उसकी रक्षा करें। अर्जुन को उसकी हथेलियाँ अपने पैरों पर काँपती हुई जान पड़ीं, गरम और पसीने से तर। उन्होंने मय के सिर पर हाथ रखकर कहा कि वह न डरे। एक शरणागत को अभय देकर अर्जुन ने उसे आग से और कृष्ण के चक्र से, दोनों से बचा लिया, और मय उसी अर्जुन की छाया में बैठा रहा, जब तक उसके चारों ओर का वन राख होकर ठंडा न पड़ गया।

आग ने खाण्डववन को राख कर दिया। उस सारे विनाश में केवल छह प्राणी बचे, और उनमें चार वे छोटे-छोटे पक्षी थे जिन्हें शार्ङ्गक कहते हैं। उनकी माता जरिता उन्हें छोटे और पंखहीन जानकर, आग को वृक्षों को चाटते हुए अपनी ओर बढ़ता देख, शोक से आतुर होकर विलाप करने लगी। उसने कहा कि यह भयंकर आग सारे संसार को भस्म कर डालेगी, और उसके बच्चे, जिनके अभी पंख तक नहीं निकले, जो पैरों से भी हीन हैं, उसके साथ उड़ नहीं सकते, और वह उन्हें न तो उठाकर ले जा सकती है, न छोड़कर जा सकती है, क्योंकि उसका हृदय फटा जाता है। पर मय और तक्षक का पुत्र अश्वसेन तो भागकर बच निकले, और वे चार नन्हे पक्षी, जो अपनी माता के पंखों तले काँप रहे थे, जिनके स्वयं पंख नहीं थे, अपने मुँह से अग्नि की स्तुति करते रहे, और अग्निदेव उस मुनि-पुत्रों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर उन्हें वहीं छोड़कर आगे निकल गये। जिस आग ने एक पूरे वन को, उसके असुरों, नागों, हाथियों और सिंहों को राख कर दिया था, वही आग चार पंखहीन चिड़ियों के घोंसले के पास से मुड़ गई, और राख में, जहाँ कुछ क्षण पहले एक वन साँस लेता था, वे चार नन्हे प्राण जीवित बैठे रहे, अपने चारों ओर अभी तक धुआँ उठती हुई काली भूमि पर।


साहित्यिक-संदर्भ

यह अध्याय गीता-प्रेस गोरखपुर के व्यास-महाभारत, आदि पर्व के वैवाहिक-पर्व, राज्यलाभ-पर्व, अर्जुन-वनवास-पर्व, सुभद्रा-हरण-पर्व और खाण्डव-दाह-पर्व पर आधारित है। धृष्टद्युम्न का द्रुपद को वृत्तान्त सुनाना तथा द्रुपद का पुरोहित भेजना अध्याय 192·194 से; पाँच पतियों के विषय में द्रुपद-धृष्टद्युम्न का विरोध, युधिष्ठिर का जटिला-गौतमी का दृष्टान्त और ‘मेरी वाणी कभी झूठ नहीं बोलती’ वाला कथन, तथा व्यास द्वारा शंकर के वर एवं दिव्य दृष्टि से समाधान अध्याय 195·198 से; विवाह तथा कृष्ण की भेंट अध्याय 199 से लिये गये हैं। हस्तिनापुर में दुर्योधन-कर्ण का मन्त्र, भीष्म-द्रोण-विदुर का आधा राज्य देने का परामर्श अध्याय 201·207 से; धृतराष्ट्र द्वारा खाण्डवप्रस्थ का दान, उस वन का पुरूरवा-शाप से उजड़ना अध्याय 207 से; विश्वकर्मा द्वारा इन्द्रप्रस्थ का निर्माण, समुद्र-सी खाई, श्वेत प्राचीर, गरुड-पंख-से द्वार और शतघ्नियाँ अध्याय 208·209 से हैं। नारद का आगमन, सुन्द-उपसुन्द एवं तिलोत्तमा की कथा तथा द्रौपदी-विषयक नियम-निर्धारण अध्याय 209·211 से; ब्राह्मण की गौ की रक्षा हेतु अर्जुन का नियम-भंग तथा ‘धर्म में बहानेबाजी न हो’ का निश्चय और बारह वर्ष का वनवास अध्याय 212 से; उलूपी, चित्रांगदा (बभ्रुवाहन, पुत्रिका-धर्म) तथा तीर्थयात्रा अध्याय 213·216 से; प्रभास में कृष्ण से भेंट, सुभद्रा-हरण और बलराम के क्रोध को कृष्ण का शान्त करना अध्याय 218·220 से लिये गये हैं। खाण्डव-दाह-पर्व में ब्राह्मण-वेशधारी अग्नि का आगमन, श्वेतकि-यज्ञ से उपजी अरुचि, तक्षक की रक्षा के लिये इन्द्र की वृष्टि, वरुण द्वारा गाण्डीव, अक्षय तरकस, कपिध्वज रथ, सुदर्शन चक्र व कौमोदकी गदा का प्रदान, इन्द्र-सहित देवताओं की पराजय, मय का शरणागत होना तथा शार्ङ्गक-उपाख्यान (जरिता के चार पक्षी और छह बचे प्राणी) अध्याय 221·229 से हैं। शकुनि-कृष्ण के परामर्श की नैतिक विषमता तथा युधिष्ठिर के अर्ध-सत्य को मूल पाठ के अनुसार बिना सरल किये रखा गया है। गीता-प्रेस से सत्यापित।