सार: यहाँ से गीता का स्वर बदलता है। अब तक कर्म और ज्ञान की बात थी, अब श्रीकृष्ण अपना असली परिचय खोलते हैं। वे कहते हैं कि सारी सृष्टि उन्हीं में पिरोई हुई है, जैसे धागे में मणियाँ, और उन्हें पूरी तरह पहचानने वाला हज़ारों में कोई एक ही निकलता है।
दोनों सेनाओं के बीच रथ अब भी खड़ा है। शंख शान्त हैं, धूल थमी हुई है, और अर्जुन का मन उस बात पर टिका है जो सारथी के वेश में खड़े सखा ने अभी कही थी। श्रीकृष्ण अर्जुन की ओर देखते हैं और अपनी वाणी को थोड़ा और गहरा कर लेते हैं, मानो अब वे कोई ऐसी बात कहने जा रहे हों जो अब तक परदे के पीछे रही।
वे कहते हैं, हे पार्थ, अब हम आपको वह ज्ञान देते हैं जिसके साथ विज्ञान भी जुड़ा है। ज्ञान यानी हमारे स्वरूप को जान लेना, और विज्ञान यानी उस जानने को अपने अनुभव में उतार लेना। यह दोनों जिसके भीतर एक हो जाएँ, उसके लिए फिर कुछ जानना बाकी नहीं रहता। और वे यह भी जोड़ देते हैं कि यह ज्ञान कहीं परदे में बंद नहीं है, यह तो सबके सामने खुला पड़ा है, पर इसे सचमुच जी लेने वाले बिरले ही निकलते हैं।
दो प्रकृतियाँ
श्रीकृष्ण अपनी बात एक सीधे चित्र से शुरू करते हैं। वे कहते हैं, हमारी दो प्रकृतियाँ हैं। एक नीची है, जिसे अपरा कहते हैं। इसी के आठ रूप हैं, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, और फिर मन, बुद्धि तथा अहंकार। यही वह जड़ पदार्थ है जिससे यह सारा दृश्य जगत बना है। दूसरी प्रकृति ऊँची है, परा, और वह है वह चेतन जीव–तत्त्व जो इस सारी सृष्टि को धारण किए हुए है। इन्हीं दोनों के मेल से सब प्राणी जन्म लेते हैं, और इन्हीं में सब लौट जाते हैं।
फिर वे एक बड़ी बात कहते हैं, जो पूरे अध्याय की रीढ़ है। हे धनंजय, हमसे परे कुछ भी नहीं। यह सारा जगत हम में उसी तरह पिरोया हुआ है, जैसे धागे में मणियाँ।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
हे धनंजय, हमसे बढ़कर और कुछ नहीं। यह सब कुछ हम में इस तरह गुँथा है, जैसे एक धागे में बहुत सारी मणियाँ। (गीता 7.7)
अर्जुन इस चित्र को समझते हैं। माला में मणियाँ अलग-अलग दिखती हैं, अपने-अपने रंग और रूप में, पर भीतर से उन्हें एक ही धागा पकड़े रहता है। वैसे ही संसार के अनगिनत रूप ऊपर से भिन्न लगते हैं, पर उन सबके भीतर एक ही तत्त्व बहता है।
हर चीज़ का सार
अब श्रीकृष्ण उस धागे को पहचानने का सरल रास्ता बताते हैं। वे कहते हैं, हे पार्थ, हमें कहीं दूर मत खोजिए, हमें हर चीज़ के सार में देखिए। हम जल का स्वाद हैं, हम सूरज और चाँद की चमक हैं, हम वेदों में गूँजता वह पवित्र अक्षर ॐ हैं, हम आकाश में शब्द हैं और मनुष्यों में उनका पौरुष। हम अग्नि का तेज हैं, हर प्राणी का जीवन हैं, तपस्वियों का तप हैं। और जो कुछ भी बीज है, हर अस्तित्व का मूल बीज हम ही हैं।
वे यह भी कहते हैं कि जो कुछ सत्त्व, रज और तम के भाव संसार में उठते हैं, वे सब हम से ही निकलते हैं, पर हम उनमें बँधे नहीं। जैसे सूरज पानी में झलकता है पर भीगता नहीं, वैसे ही हम इस सारी सृष्टि में हैं और फिर भी इससे परे हैं।
श्रीकृष्ण एक कटु सच्चाई भी सामने रखते हैं। वे कहते हैं, बहुत से लोगों का विवेक तरह-तरह की इच्छाओं ने चुरा लिया है, इसलिए वे छोटे-छोटे लक्ष्यों के पीछे भागते हैं और दूसरे-दूसरे रूपों को पूजते रहते हैं। फिर भी, जो श्रद्धा से किसी भी रूप की पूजा करता है, उसकी उस श्रद्धा को भी हम ही थाम कर दृढ़ कर देते हैं, क्योंकि हर सच्ची पूजा घूम-फिरकर हम तक ही पहुँचती है। भेद बस इतना है कि छोटे लक्ष्य वाले को छोटा फल मिलता है, और जो सीधे हमारी ओर आता है, वह हमें ही पा लेता है।
माया की चादर
तो फिर लोग इस सीधी बात को क्यों नहीं देख पाते? श्रीकृष्ण इसका कारण बताते हैं। वे कहते हैं, हमारी यह तीन गुणों वाली माया बड़ी कठिन है, इसे पार करना सहज नहीं। यही माया एक चादर की तरह लोगों की आँखों पर पड़ी रहती है, और वे रूपों को तो देखते हैं पर उनके पीछे के तत्त्व को चूक जाते हैं। पर जो हमारी शरण में आ जाता है, वह इस माया के पार निकल जाता है।
फिर वे बताते हैं कि उन तक आने वाले लोग कैसे-कैसे होते हैं।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
हे भरतश्रेष्ठ, चार तरह के पुण्यात्मा हमें भजते हैं, दुख में डूबा आर्त, जानने को आतुर जिज्ञासु, किसी वस्तु का इच्छुक अर्थार्थी, और वह ज्ञानी जो केवल हमें चाहता है। (गीता 7.16)
श्रीकृष्ण किसी को लौटाते नहीं। कोई पीड़ा लेकर आए, कोई प्रश्न लेकर, कोई ज़रूरत लेकर, या कोई केवल प्रेम लेकर, चारों दरवाज़े उन्हीं तक पहुँचते हैं। इन सब में वे ज्ञानी को अपने सबसे निकट मानते हैं, क्योंकि वह किसी और चीज़ के लिए नहीं, केवल उनके लिए आता है।
हज़ारों में एक
पर यहीं श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहते हैं जो अर्जुन को ठिठका देती है। वे कहते हैं, हज़ारों मनुष्यों में कोई एक हमें पाने का यत्न करता है, और उन यत्न करने वालों में भी कोई एक ही हमें सचमुच जान पाता है। यह जान लेना कि सब कुछ के भीतर एक ही है, इतना सहज नहीं। इसके लिए कई-कई जन्मों की यात्रा लग जाती है।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
बहुत जन्मों के अंत में वह ज्ञानी हमारी शरण में आता है, यह जानकर कि वासुदेव ही सब कुछ हैं। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ है। (गीता 7.19)
बहुत रास्ते चलकर, बहुत रूप देखकर, अंत में उसे यह भेद खुलता है कि जिसे वह जगह-जगह अलग-अलग खोजता रहा, वह तो हर जगह एक ही था।
इतना कहकर श्रीकृष्ण एक क्षण रुकते हैं। अर्जुन के भीतर अब वह प्रश्न उठने लगा है कि अंत समय में, जब देह छूट रही हो, इस एक को याद कैसे रखा जाए। रथ अब भी वहीं खड़ा है, पर अर्जुन की दृष्टि थोड़ी और भीतर मुड़ चुकी है।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता