दूसरे अध्याय में कृष्ण ने ज्ञान की भी बात की और कर्म की भी। इससे अर्जुन के मन में एक नया असमंजस उठ खड़ा होता है। अगर समझ ही सबसे ऊँची चीज़ है, तो फिर मुझे इस ख़ूनी काम में क्यों धकेला जा रहा है? क्यों न सब छोड़ कर संन्यासी बन जाऊँ? तीसरा अध्याय इसी उलझन का जवाब है, और इसका नाम ही कर्म योग है, यानी काम करते हुए ही भीतर से मुक्त रहने की कला।
अर्जुन सीधे पूछते हैं, हे कृष्ण, अगर आपकी नज़र में समझ ही कर्म से ऊँची है, तो फिर मुझे इस भयानक काम में क्यों लगा रहे हैं? आपकी उलझी हुई सी बातें मेरी बुद्धि को और भरमा रही हैं, इसलिए कोई एक बात पक्की कर के बता दीजिए जिससे मेरा सच में कल्याण हो। कृष्ण का जवाब यहीं से इस अध्याय की रीढ़ बन जाता है।
कर्म से भागा नहीं जा सकता
कृष्ण का जवाब दो-टूक है। काम छोड़ देना कोई रास्ता ही नहीं, क्योंकि छोड़ना ख़ुद एक करना है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
कोई भी एक पल के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति के गुण हर किसी से कोई न कोई काम करवा ही लेते हैं। चुपचाप बैठ जाना भी एक कर्म है। तो असली सवाल यह नहीं कि काम करें या न करें, सवाल यह है कि किस भाव से करें। जो ऊपर से सब त्याग कर बैठ जाता है पर मन ही मन विषयों में उलझा रहता है, वह ख़ुद को ही धोखा देता है।
यज्ञ की तरह काम
यहीं कृष्ण यज्ञ का विचार काम पर लगाते हैं। यज्ञ यानी अर्पण। जब हम अपना हर काम किसी बड़े उद्देश्य को अर्पित कर देते हैं, तब वही काम बंधन नहीं रहता, मुक्ति का साधन बन जाता है। अपने लिए बटोरा हुआ काम पीछे राख छोड़ता है, अर्पित किया हुआ काम भीतर को हल्का कर देता है। सृष्टि ख़ुद इसी लेन-देन पर चलती है, बादल जल देते हैं, धरती अन्न देती है, और हम भी उसी चक्र का एक हिस्सा हैं। जो सिर्फ़ अपनी थाली भरता है और लौटाता कुछ नहीं, वह इस चक्र से कट जाता है।
कृष्ण इसे एक घूमते पहिए की तरह दिखाते हैं। बादल से वर्षा होती है, वर्षा से अन्न उगता है, अन्न से प्राणी जीते हैं, और अर्पण से फिर वही वर्षा लौटती है। जो इस पहिए में अपना हिस्सा नहीं डालता, केवल अपनी इन्द्रियों के लिए जीता है, वह मानो व्यर्थ ही साँस लेता है। पर एक बात यहाँ साफ़ कर देनी ज़रूरी है, जो अपने भीतर ही तृप्त है, जिसे न कुछ पाना बाक़ी है न कुछ खोना, उसके लिए कोई काम बाक़ी नहीं रहता, फिर भी वह औरों की भलाई के लिए काम करता रहता है।
श्रेष्ठ जैसा करता है
फिर कृष्ण एक ज़िम्मेदारी की ओर इशारा करते हैं, जो ऊँचे स्थान पर बैठे हर इंसान के काम की है।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
श्रेष्ठ इंसान जैसा आचरण करता है, बाक़ी लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जिसे कसौटी बना लेता है, सारी दुनिया उसी के पीछे चलती है। इसीलिए जो आगे खड़ा है, उसके हर काम का असर औरों पर पड़ता है, और उतनी ही बड़ी उसकी ज़िम्मेदारी भी होती है। कृष्ण अपनी ही मिसाल देते हैं, उन्हें ख़ुद कुछ पाना बाक़ी नहीं, फिर भी वे काम में लगे रहते हैं, ताकि लोग सही राह देख सकें। राजा जनक जैसे ज्ञानी भी इसीलिए जीवन भर कर्म करते रहे, केवल लोक की भलाई के लिए। इसी भलाई को लोकसंग्रह कहते हैं, और यही समझदार इंसान के काम करते रहने का असली कारण है।
असली करने वाला कौन
अब कृष्ण उस भ्रम की जड़ पकड़ते हैं जिससे काम बंधन बनता है।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
सारे काम असल में प्रकृति के गुणों से हो रहे हैं, मगर अहंकार में भरा हुआ इंसान समझ बैठता है कि मैं ही करने वाला हूँ। जैसे ही यह मैंने किया वाली पकड़ ढीली होती है, काम अपने-आप हल्का हो जाता है। हम माध्यम भर हैं, और यही समझ हमें हर काम के बोझ से बचा लेती है। गुण अपना काम कर रहे हैं, यह देख लेने वाला न कामयाबी से फूलता है, न नाकामी से टूटता है।
अपना धर्म ही अपना
अध्याय का सबसे बड़ा व्यावहारिक सबक यही है, अपनी जगह पहचानिए और उसी को निभाइए।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
अपना धर्म अधूरा भी हो तो वह दूसरे के अच्छे से निभाए धर्म से बेहतर है। अपने धर्म में मर जाना भी कल्याणकारी है, दूसरे का धर्म तो डर पैदा करने वाला है। दूसरे की भूमिका कितनी ही चमकदार क्यों न लगे, उसे अपनी मत बना लीजिए। यह बात गीता में इतनी अहम है कि आगे अठारहवें अध्याय में भी लौट कर आती है।
सार
अध्याय के आख़िर में अर्जुन पूछते हैं कि आख़िर वह कौन है जो इंसान से न चाहते हुए भी पाप करवा देता है। कृष्ण का जवाब सीधा है, वह इच्छा है, वही भूख जो पूरी होने पर और भड़कती है, और यही इस राह का असली दुश्मन है। पूरे अध्याय का निचोड़ इतना-सा है, कर्म से बचा नहीं जा सकता, बस उसका ढंग बदला जा सकता है। काम को अर्पण की तरह कीजिए, मैंने किया कहना छोड़िए, और अपनी भूमिका को अपनी ही रहने दीजिए। यही निष्काम कर्म है, और यही कर्म योग है। दुनिया को छोड़ कर भाग जाने में नहीं, उसी के बीच सधे रह कर काम करने में ही असली त्याग छिपा है।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
यही कथा वहाँ भी
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निर्णय लेने वालों के लिए कर्मयोग: पठन-मार्गदर्शिका - अनुगीता · अश्वमेध पर्व
अनुगीता (अश्वमेध पर्व): कृष्ण का कर्म पर पुनः विवेचन