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अब गीता अपने आख़िरी और सबसे लंबे अध्याय पर आ पहुँची है। यह किसी एक विषय का अध्याय नहीं, यह पूरी गीता का सार-संग्रह है। श्रीकृष्ण यहाँ पिछले सत्रह अध्यायों की सारी बातें फिर से बटोरते हैं, पर एक नई ऊँचाई से, और अंत में सब कुछ एक ही वचन में समेट देते हैं, जहाँ अर्जुन का संदेह मिटता है और उठा हुआ धनुष फिर हाथ में स्थिर हो जाता है।
त्याग और संन्यास
अर्जुन पहले यह जानना चाहते हैं कि त्याग और संन्यास में फ़र्क़ क्या है। श्रीकृष्ण साफ़ करते हैं। कामनाओं से प्रेरित कर्मों को छोड़ देना संन्यास है, और सब कर्मों के फल की आसक्ति छोड़ देना त्याग है। कुछ लोग कहते हैं कि सारे कर्म दोष की तरह छोड़ देने चाहिए, और कुछ कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप कभी नहीं छोड़ने चाहिए।
श्रीकृष्ण अपना निर्णय सुनाते हैं। यज्ञ, दान और तप को छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि ये मनुष्य को भीतर से पवित्र करते हैं। पर इन्हें भी आसक्ति और फल की चाह छोड़कर करना चाहिए, यही उनका दृढ़ मत है। फिर वे त्याग के भी तीन रंग बताते हैं। नियत कर्तव्य को मोह में पड़कर छोड़ देना तामसिक त्याग है। कष्ट के डर से, शरीर को तकलीफ़ न हो इसलिए कर्म छोड़ देना राजसिक त्याग है, और इससे त्याग का कोई फल नहीं मिलता। पर अपने कर्तव्य को करते हुए केवल उसकी आसक्ति और फल छोड़ देना, यही सात्त्विक त्याग है। सच्चा त्यागी न अप्रिय कर्म से घृणा करता है, न प्रिय से चिपकता है। देहधारी के लिए सब कर्मों को पूरी तरह छोड़ पाना संभव ही नहीं, इसलिए जो फल की आसक्ति छोड़ देता है, वही असली त्यागी कहलाता है।
कर्म के पाँच कारण
फिर श्रीकृष्ण एक बहुत सुंदर बात कहते हैं, जो अहंकार की जड़ पर चोट करती है। हर कर्म के पीछे पाँच कारण होते हैं, यह शरीर रूपी आधार, कर्ता, इंद्रियाँ और साधन, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव। इसलिए जो मनुष्य केवल अपने आप को अकेला कर्ता मान बैठता है, वह अधूरी बुद्धि से देखता है, सच्चाई को नहीं देख पाता। ‘सब मैंने किया’ का घमंड यहीं टूट जाता है।
तीन गुणों की छाया
इसके बाद वही सत्त्व, रज और तम की तिकड़ी हर चीज़ पर फैल जाती है। ज्ञान का सात्त्विक रूप वह है जो सब प्राणियों में एक ही अविनाशी सत्ता देखता है, राजसिक वह जो सबको अलग-अलग टुकड़ों में देखता है, और तामसिक वह जो किसी एक छोटी चीज़ को ही सब कुछ मान बैठता है। इसी तरह कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख, हर एक के तीन रंग हैं। सात्त्विक सुख शुरू में भले विष जैसा कड़वा लगे, पर आगे चलकर अमृत बन जाता है, और राजसिक सुख शुरू में अमृत-सा मीठा, पर अंत में विष। यह पूरा नक्शा हमें अपने भीतर झाँककर पहचानने के लिए है कि हम किस रंग में जी रहे हैं।
अपना धर्म, अपना स्वभाव
फिर बात वर्ण-धर्म पर आती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इनके कर्म इनके अपने स्वभाव से जन्मे हैं। हर एक का धर्म उसकी अपनी प्रकृति से जुड़ा है, और श्रीकृष्ण एक पुराना सूत्र और भी मज़बूती से दोहराते हैं।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
अर्थ यह कि अपना धर्म अधूरा और गुणहीन भी हो, तो भी दूसरे के अच्छे धर्म को अपनाने से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव से नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप को नहीं छूता। जो अपने ही काम को पूजा की तरह करता है, जिससे सारे प्राणी उपजे हैं उसी की आराधना अपने कर्म से करता है, वह सिद्धि तक पहुँच जाता है।
हृदय में बैठा ईश्वर
अब श्रीकृष्ण उस राह की ओर ले चलते हैं जो परम शांति में खुलती है। जिसकी बुद्धि निर्मल है, जिसने मन और इंद्रियों को साध लिया है, जो राग-द्वेष छोड़कर एकांत में स्थिर है, जिसने अहंकार, बल का घमंड, काम और क्रोध त्याग दिए हैं, वह ब्रह्म बनने योग्य हो जाता है। ब्रह्म को पाकर वह प्रसन्न रहता है, न किसी के लिए शोक करता है न कुछ चाहता है, और तब उसके भीतर श्रीकृष्ण के प्रति परम भक्ति जागती है। इसी भक्ति से वह उन्हें सचमुच जान लेता है। फिर वे एक गहरी बात कहते हैं।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
अर्थ यह कि हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में बसा है, और माया के द्वारा सबको मानो किसी यंत्र पर चढ़ाकर घुमाता रहता है। हम सोचते हैं कि हम अपने बल पर चल रहे हैं, पर हम एक बड़े चक्र पर चढ़े हुए हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि पूरे मन से उसी की शरण में जाइए, उसकी कृपा से ही परम शांति और सनातन धाम मिलता है।
चरम वचन
अब गीता अपनी सबसे ऊँची चोटी पर आती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह ज्ञान गुप्त से भी गुप्त है, इसे मैंने आपके सामने खोल दिया है, अब इस पर पूरी तरह विचार कर लीजिए, फिर जैसा आप ठीक समझें वैसा कीजिए। यहाँ वे कोई ज़ोर नहीं डालते, पूरी स्वतंत्रता दे देते हैं। और फिर सबसे गोपनीय वचन सुनाते हैं, ‘अपना मन मुझमें रखिए, मेरे भक्त बनिए, मेरे लिए यज्ञ कीजिए, मुझे नमस्कार कीजिए, आप मुझे ही पाएँगे, यह मेरा सच्चा वचन है, क्योंकि आप मुझे प्रिय हैं।’ इतने बड़े उपदेश के बीच यह ‘आप मुझे प्रिय हैं’ किसी मित्र की कोमल फुसफुसाहट जैसा है।
और तब आती है वह पंक्ति जिसे परंपरा ‘चरम श्लोक’ कहती है, पूरी सात सौ श्लोकों की गीता जिसमें आकर ठहर जाती है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
अर्थ यह कि सब धर्मों को छोड़कर केवल एक मेरी शरण में आइए। मैं आपको सब पापों से मुक्त कर दूँगा, आप शोक न कीजिए। यह छोड़ना हार मान लेना नहीं है, यह उस बोझ को उतार देना है जिसे हम जीवन भर अकेले उठाए फिरते हैं। जहाँ सब जोड़-घटाव थक जाते हैं, वहाँ बस एक शरणागति बचती है, और उसी में सबसे बड़ी राहत है।
अर्जुन का उत्तर
अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि क्या अज्ञान से पैदा हुआ आपका मोह अब नष्ट हुआ? और तब गीता का सबसे बड़ा मोड़ आता है, अर्जुन का उत्तर। वे कहते हैं कि मेरा मोह नष्ट हो गया, स्मृति लौट आई, मैं संशय से मुक्त होकर स्थिर हूँ, और अब मैं आपका वचन पूरा करूँगा। जो अध्याय एक में हाथ से धनुष गिरा बैठा था, वही अब भीतर से सीधा खड़ा है।
फिर संजय की बारी आती है, जो यह सारा संवाद धृतराष्ट्र को सुना रहे थे। वे कहते हैं कि यह अद्भुत बातें सुनकर उनके रोंगटे खड़े हो गए, और वे इस दिव्य संवाद को बार-बार याद करके आनंदित होते हैं। और सबसे अंत में वे पूरी गीता पर अपनी मुहर लगा देते हैं।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
अर्थ यह कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य और अटल नीति निश्चित है, यही मेरा मत है। यही गीता का आख़िरी वचन है। जहाँ ज्ञान और कर्म साथ खड़े हों, जहाँ भीतर का मार्गदर्शक और बाहर का योद्धा एक हो जाएँ, वहाँ हार का कोई रास्ता नहीं बचता। अठारह अध्यायों की सारी यात्रा यहीं आकर शांत होती है, एक शरणागति में, और एक निश्चित जीत के भरोसे में।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
श्लोक-दर-श्लोक
इस अध्याय के सभी 78 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/18/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।
18.1संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥1॥
saṃnyāsasya mahābāho tattvam icchāmi veditum |
tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthak keśiniṣūdana
- संन्यासस्य
- संन्यास का
- महाबाहो
- हे महाबाहु
- तत्त्वम्
- तत्त्व को
- इच्छामि
- चाहते हैं
- वेदितुम्
- जानना
- त्यागस्य
- त्याग का
- च
- और
- हृषीकेश
- हे हृषीकेश
- पृथक्
- अलग अलग
- केशिनिषूदन
- हे केशी का वध करने वाले
अन्वय: हे महाबाहो, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन, संन्यासस्य त्यागस्य च तत्त्वम् पृथक् वेदितुम् इच्छामि।
हे महाबाहु हृषीकेश, हे केशी का वध करने वाले, हम संन्यास और त्याग का तत्त्व अलग अलग जानना चाहते हैं।
18.2काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥2॥
kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ |
sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhus tyāgaṃ vicakṣaṇāḥ
- काम्यानाम्
- कामना से किए जाने वाले
- कर्मणाम्
- कर्मों के
- न्यासम्
- छोड़ने को
- संन्यासम्
- संन्यास
- कवयः
- ज्ञानी जन
- विदुः
- जानते हैं
- सर्वकर्मफलत्यागम्
- सब कर्मों के फल के त्याग को
- प्राहुः
- कहते हैं
- त्यागम्
- त्याग
- विचक्षणाः
- विवेकी जन
अन्वय: कवयः काम्यानाम् कर्मणाम् न्यासम् संन्यासम् विदुः। विचक्षणाः सर्वकर्मफलत्यागम् त्यागम् प्राहुः।
ज्ञानी जन काम्य कर्मों के छोड़ने को संन्यास जानते हैं। विवेकी जन सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।
18.3त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥3॥
tyājyaṃ doṣavad ity eke karma prāhur manīṣiṇaḥ |
yajñadānatapaḥkarma na tyājyam iti cāpare
- त्याज्यम्
- त्यागने योग्य
- दोषवत्
- दोष के समान
- इति
- ऐसा
- एके
- कुछ
- कर्म
- कर्म
- प्राहुः
- कहते हैं
- मनीषिणः
- मनीषी
- यज्ञदानतपःकर्म
- यज्ञ, दान और तप रूप कर्म
- न
- नहीं
- त्याज्यम्
- त्यागने योग्य
- इति
- ऐसा
- च
- और
- अपरे
- दूसरे
अन्वय: एके मनीषिणः कर्म दोषवत् त्याज्यम् इति प्राहुः। अपरे च यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् इति प्राहुः।
कुछ मनीषी कहते हैं कि कर्म दोष के समान त्यागने योग्य है। दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।
18.4निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥4॥
niścayaṃ śṛṇu me tatra tyāge bharatasattama |
tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṃprakīrtitaḥ
- निश्चयम्
- निश्चय को
- शृणु
- सुनिए
- मे
- मेरा
- तत्र
- उस विषय में
- त्यागे
- त्याग के विषय में
- भरतसत्तम
- हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ
- त्यागः
- त्याग
- हि
- क्योंकि
- पुरुषव्याघ्र
- हे पुरुषों में सिंह समान
- त्रिविधः
- तीन प्रकार का
- संप्रकीर्तितः
- कहा गया है
अन्वय: हे भरतसत्तम, तत्र त्यागे मे निश्चयम् शृणु। हे पुरुषव्याघ्र, त्यागः हि त्रिविधः संप्रकीर्तितः।
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ, त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनिए। हे पुरुषों में सिंह समान, त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।
18.5यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥5॥
yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṃ kāryam eva tat |
yajño dānaṃ tapaś caiva pāvanāni manīṣiṇām
- यज्ञदानतपःकर्म
- यज्ञ, दान और तप रूप कर्म
- न
- नहीं
- त्याज्यम्
- त्यागने योग्य
- कार्यम्
- करने योग्य
- एव
- ही
- तत्
- वह
- यज्ञः
- यज्ञ
- दानम्
- दान
- तपः
- तप
- च
- और
- एव
- ही
- पावनानि
- पवित्र करने वाले
- मनीषिणाम्
- मनीषियों को
अन्वय: यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम्, तत् कार्यम् एव। यज्ञः दानम् तपः च एव मनीषिणाम् पावनानि।
यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं है, वह तो अवश्य करने योग्य है। यज्ञ, दान और तप मनीषियों को भी पवित्र करने वाले हैं।
18.6एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥6॥
etāny api tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca |
kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matam uttamam
- एतानि
- ये
- अपि
- भी
- तु
- परन्तु
- कर्माणि
- कर्म
- सङ्गम्
- आसक्ति को
- त्यक्त्वा
- त्यागकर
- फलानि
- फलों को
- च
- और
- कर्तव्यानि
- करने चाहिए
- इति
- यह
- मे
- मेरा
- पार्थ
- हे पार्थ
- निश्चितम्
- निश्चित
- मतम्
- मत
- उत्तमम्
- उत्तम
अन्वय: हे पार्थ, एतानि अपि तु कर्माणि सङ्गम् फलानि च त्यक्त्वा कर्तव्यानि इति मे निश्चितम् उत्तमम् मतम्।
हे पार्थ, ये कर्म भी आसक्ति और फलों को त्यागकर करने चाहिए। यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
18.7नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥7॥
niyatasya tu saṃnyāsaḥ karmaṇo nopapadyate |
mohāt tasya parityāgas tāmasaḥ parikīrtitaḥ
- नियतस्य
- नियत
- तु
- परन्तु
- संन्यासः
- त्याग
- कर्मणः
- कर्म का
- न
- नहीं
- उपपद्यते
- उचित है
- मोहात्
- मोह से
- तस्य
- उसका
- परित्यागः
- त्याग
- तामसः
- तामस
- परिकीर्तितः
- कहा गया है
अन्वय: नियतस्य तु कर्मणः संन्यासः न उपपद्यते। मोहात् तस्य परित्यागः तामसः परिकीर्तितः।
नियत कर्म का त्याग तो उचित नहीं है। मोह से उसका त्याग तामस कहा गया है।
18.8दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥8॥
duḥkham ity eva yat karma kāyakleśabhayāt tyajet |
sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāgaphalaṃ labhet
- दुःखम्
- दुःख रूप
- इति
- ऐसा मानकर
- एव
- ही
- यत्
- जो
- कर्म
- कर्म
- कायक्लेशभयात्
- शारीरिक कष्ट के भय से
- त्यजेत्
- त्याग देता है
- सः
- वह
- कृत्वा
- करके
- राजसम्
- राजस
- त्यागम्
- त्याग
- न
- नहीं
- एव
- किसी प्रकार
- त्यागफलम्
- त्याग का फल
- लभेत्
- पाता है
अन्वय: यत् कर्म दुःखम् इति एव कायक्लेशभयात् त्यजेत्, सः राजसम् त्यागम् कृत्वा त्यागफलम् न एव लभेत्।
जो कर्म को दुःख रूप मानकर शारीरिक कष्ट के भय से त्याग देता है, वह राजस त्याग करके त्याग का फल किसी प्रकार नहीं पाता।
18.9कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥9॥
kāryam ity eva yat karma niyataṃ kriyate ’rjuna |
saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ
- कार्यम्
- करने योग्य
- इति
- ऐसा मानकर
- एव
- ही
- यत्
- जो
- कर्म
- कर्म
- नियतम्
- नियत
- क्रियते
- किया जाता है
- अर्जुन
- हे अर्जुन
- सङ्गम्
- आसक्ति को
- त्यक्त्वा
- त्यागकर
- फलम्
- फल को
- च
- और
- एव
- ही
- सः
- वह
- त्यागः
- त्याग
- सात्त्विकः
- सात्त्विक
- मतः
- माना गया है
अन्वय: हे अर्जुन, यत् नियतम् कर्म कार्यम् इति एव सङ्गम् फलम् च एव त्यक्त्वा क्रियते, सः त्यागः सात्त्विकः मतः।
हे अर्जुन, जो नियत कर्म केवल कर्तव्य मानकर आसक्ति और फल को त्यागकर किया जाता है, वही त्याग सात्त्विक माना गया है।
18.10न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥10॥
na dveṣṭy akuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate |
tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ
- न
- नहीं
- द्वेष्टि
- द्वेष करता है
- अकुशलम्
- अकुशल
- कर्म
- कर्म से
- कुशले
- कुशल कर्म में
- न
- नहीं
- अनुषज्जते
- आसक्त होता है
- त्यागी
- त्यागी
- सत्त्वसमाविष्टः
- सत्त्व से भरा हुआ
- मेधावी
- मेधावी
- छिन्नसंशयः
- जिसका संशय कट गया है
अन्वय: सत्त्वसमाविष्टः मेधावी छिन्नसंशयः त्यागी अकुशलम् कर्म न द्वेष्टि, कुशले न अनुषज्जते।
सत्त्व से भरा हुआ, मेधावी और संशय से मुक्त त्यागी अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता।
18.11न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥11॥
na hi dehabhṛtā śakyaṃ tyaktuṃ karmāṇy aśeṣataḥ |
yas tu karmaphalatyāgī sa tyāgīty abhidhīyate
- न
- नहीं
- हि
- क्योंकि
- देहभृता
- देहधारी के द्वारा
- शक्यम्
- सम्भव
- त्यक्तुम्
- त्यागना
- कर्माणि
- कर्मों को
- अशेषतः
- पूरी तरह
- यः
- जो
- तु
- परन्तु
- कर्मफलत्यागी
- कर्मफल का त्यागी
- सः
- वह
- त्यागी
- त्यागी
- इति
- ऐसा
- अभिधीयते
- कहा जाता है
अन्वय: देहभृता हि कर्माणि अशेषतः त्यक्तुम् न शक्यम्। यः तु कर्मफलत्यागी, सः त्यागी इति अभिधीयते।
देहधारी के द्वारा कर्मों को पूरी तरह त्यागना सम्भव नहीं है। जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी कहा जाता है।
18.12अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्व चित् ॥12॥
aniṣṭam iṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam |
bhavaty atyāgināṃ pretya na tu saṃnyāsināṃ kva cit
- अनिष्टम्
- अनिष्ट
- इष्टम्
- इष्ट
- मिश्रम्
- मिश्रित
- च
- और
- त्रिविधम्
- तीन प्रकार का
- कर्मणः
- कर्म का
- फलम्
- फल
- भवति
- होता है
- अत्यागिनाम्
- त्याग न करने वालों को
- प्रेत्य
- मरने के बाद
- न
- नहीं
- तु
- परन्तु
- संन्यासिनाम्
- संन्यासियों को
- क्व चित्
- कहीं भी
अन्वय: अनिष्टम् इष्टम् मिश्रम् च त्रिविधम् कर्मणः फलम् अत्यागिनाम् प्रेत्य भवति, संन्यासिनाम् तु क्व चित् न भवति।
कर्म का अनिष्ट, इष्ट और मिश्रित, यह तीन प्रकार का फल त्याग न करने वालों को मरने के बाद होता है। संन्यासियों को कहीं भी नहीं होता।
18.13पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥13॥
pañcaitāni mahābāho kāraṇāni nibodha me |
sāṃkhye kṛtānte proktāni siddhaye sarvakarmaṇām
- पञ्च
- पाँच
- एतानि
- ये
- महाबाहो
- हे महाबाहु
- कारणानि
- कारण
- निबोध
- जानिए
- मे
- मुझसे
- सांख्ये
- सांख्य शास्त्र में
- कृतान्ते
- कर्मों का अन्त करने वाले
- प्रोक्तानि
- कहे गए
- सिद्धये
- सिद्धि के लिए
- सर्वकर्मणाम्
- सब कर्मों की
अन्वय: हे महाबाहो, सर्वकर्मणाम् सिद्धये कृतान्ते सांख्ये प्रोक्तानि एतानि पञ्च कारणानि मे निबोध।
हे महाबाहु, सब कर्मों की सिद्धि के लिए ये पाँच कारण कर्मों का अन्त करने वाले सांख्य शास्त्र में कहे गए हैं, इन्हें मुझसे जानिए।
18.14अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥14॥
adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham |
vividhāś ca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam
- अधिष्ठानम्
- अधिष्ठान, शरीर
- तथा
- तथा
- कर्ता
- कर्ता
- करणम्
- करण, साधन
- च
- और
- पृथग्विधम्
- अनेक प्रकार के
- विविधाः
- विविध
- च
- और
- पृथक्
- भिन्न भिन्न
- चेष्टाः
- चेष्टाएँ
- दैवम्
- दैव
- च
- और
- एव
- ही
- अत्र
- इस विषय में
- पञ्चमम्
- पाँचवाँ
अन्वय: अत्र अधिष्ठानम् तथा कर्ता पृथग्विधम् करणम् च विविधाः पृथक् चेष्टाः च दैवम् च एव पञ्चमम्।
इस विषय में अधिष्ठान, कर्ता, अनेक प्रकार के करण, भिन्न भिन्न विविध चेष्टाएँ और पाँचवाँ दैव है।
18.15शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥15॥
śarīravāṅmanobhir yat karma prārabhate naraḥ |
nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ
- शरीरवाङ्मनोभिः
- शरीर, वाणी और मन से
- यत्
- जो
- कर्म
- कर्म
- प्रारभते
- आरम्भ करता है
- नरः
- मनुष्य
- न्याय्यम्
- न्याययुक्त
- वा
- अथवा
- विपरीतम्
- विपरीत
- वा
- अथवा
- पञ्च
- पाँच
- एते
- ये
- तस्य
- उसके
- हेतवः
- कारण
अन्वय: नरः शरीरवाङ्मनोभिः न्याय्यम् वा विपरीतम् वा यत् कर्म प्रारभते, एते पञ्च तस्य हेतवः।
मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी न्याययुक्त या विपरीत कर्म आरम्भ करता है, उसके ये पाँच कारण हैं।
18.16तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥16॥
tatraivaṃ sati kartāram ātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ |
paśyaty akṛtabuddhitvān na sa paśyati durmatiḥ
- तत्र
- वहाँ
- एवम्
- ऐसा
- सति
- होने पर
- कर्तारम्
- कर्ता
- आत्मानम्
- आत्मा को
- केवलम्
- केवल
- तु
- परन्तु
- यः
- जो
- पश्यति
- देखता है
- अकृतबुद्धित्वात्
- अशुद्ध बुद्धि के कारण
- न
- नहीं
- सः
- वह
- पश्यति
- देखता है
- दुर्मतिः
- दुर्बुद्धि
अन्वय: तत्र एवम् सति यः तु अकृतबुद्धित्वात् केवलम् आत्मानम् कर्तारम् पश्यति, सः दुर्मतिः न पश्यति।
ऐसा होने पर भी जो अशुद्ध बुद्धि के कारण केवल आत्मा को कर्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि ठीक नहीं देखता।
18.17यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥17॥
yasya nāhaṃkṛto bhāvo buddhir yasya na lipyate |
hatvāpi sa imāṃl lokān na hanti na nibadhyate
- यस्य
- जिसका
- न
- नहीं
- अहंकृतः
- कर्तापन का
- भावः
- भाव
- बुद्धिः
- बुद्धि
- यस्य
- जिसकी
- न
- नहीं
- लिप्यते
- लिप्त होती है
- हत्वा
- मारकर
- अपि
- भी
- सः
- वह
- इमान्
- इन
- लोकान्
- लोगों को
- न
- नहीं
- हन्ति
- मारता है
- न
- नहीं
- निबध्यते
- बँधता है
अन्वय: यस्य अहंकृतः भावः न, यस्य बुद्धिः न लिप्यते, सः इमान् लोकान् हत्वा अपि न हन्ति, न निबध्यते।
जिसमें कर्तापन का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोगों को मारकर भी न मारता है और न बँधता है।
18.18ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥18॥
jñānaṃ jñeyaṃ parijñātā trividhā karmacodanā |
karaṇaṃ karma karteti trividhaḥ karmasaṃgrahaḥ
- ज्ञानम्
- ज्ञान
- ज्ञेयम्
- जानने योग्य वस्तु
- परिज्ञाता
- जानने वाला
- त्रिविधा
- तीन प्रकार की
- कर्मचोदना
- कर्म की प्रेरणा
- करणम्
- करण
- कर्म
- कर्म
- कर्ता
- कर्ता
- इति
- यह
- त्रिविधः
- तीन प्रकार का
- कर्मसंग्रहः
- कर्म का संग्रह
अन्वय: ज्ञानम् ज्ञेयम् परिज्ञाता इति त्रिविधा कर्मचोदना। करणम् कर्म कर्ता इति त्रिविधः कर्मसंग्रहः।
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता, यह तीन प्रकार की कर्म की प्रेरणा है। करण, कर्म और कर्ता, यह तीन प्रकार का कर्म का संग्रह है।
18.19ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥19॥
jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ |
procyate guṇasaṃkhyāne yathāvac chṛṇu tāny api
- ज्ञानम्
- ज्ञान
- कर्म
- कर्म
- च
- और
- कर्ता
- कर्ता
- च
- और
- त्रिधा
- तीन प्रकार के
- एव
- ही
- गुणभेदतः
- गुणों के भेद से
- प्रोच्यते
- कहे जाते हैं
- गुणसंख्याने
- गुणों की गणना करने वाले शास्त्र में
- यथावत्
- ठीक ठीक
- शृणु
- सुनिए
- तानि
- उन्हें
- अपि
- भी
अन्वय: गुणसंख्याने ज्ञानम् कर्म च कर्ता च गुणभेदतः त्रिधा एव प्रोच्यते। तानि अपि यथावत् शृणु।
गुणों की गणना करने वाले शास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता गुणों के भेद से तीन तीन प्रकार के कहे गए हैं। उन्हें भी ठीक ठीक सुनिए।
18.20सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥20॥
sarvabhūteṣu yenaikaṃ bhāvam avyayam īkṣate |
avibhaktaṃ vibhakteṣu taj jñānaṃ viddhi sāttvikam
- सर्वभूतेषु
- सब प्राणियों में
- येन
- जिससे
- एकम्
- एक
- भावम्
- भाव को
- अव्ययम्
- अविनाशी
- ईक्षते
- देखता है
- अविभक्तम्
- अविभक्त
- विभक्तेषु
- विभक्तों में
- तत्
- उस
- ज्ञानम्
- ज्ञान को
- विद्धि
- जानिए
- सात्त्विकम्
- सात्त्विक
अन्वय: येन सर्वभूतेषु एकम् अव्ययम् भावम् विभक्तेषु अविभक्तम् ईक्षते, तत् ज्ञानम् सात्त्विकम् विद्धि।
जिस ज्ञान से मनुष्य सब प्राणियों में एक अविनाशी भाव को, विभक्तों में अविभक्त रूप से देखता है, उस ज्ञान को सात्त्विक जानिए।
18.21पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥21॥
pṛthaktvena tu yaj jñānaṃ nānābhāvān pṛthagvidhān |
vetti sarveṣu bhūteṣu taj jñānaṃ viddhi rājasam
- पृथक्त्वेन
- भिन्नता से
- तु
- परन्तु
- यत्
- जो
- ज्ञानम्
- ज्ञान
- नानाभावान्
- अनेक भावों को
- पृथग्विधान्
- भिन्न भिन्न प्रकार के
- वेत्ति
- जानता है
- सर्वेषु
- सब
- भूतेषु
- प्राणियों में
- तत्
- उस
- ज्ञानम्
- ज्ञान को
- विद्धि
- जानिए
- राजसम्
- राजस
अन्वय: यत् तु ज्ञानम् सर्वेषु भूतेषु पृथग्विधान् नानाभावान् पृथक्त्वेन वेत्ति, तत् ज्ञानम् राजसम् विद्धि।
जो ज्ञान सब प्राणियों में भिन्न भिन्न प्रकार के अनेक भावों को अलग अलग जानता है, उस ज्ञान को राजस जानिए।
18.22यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥22॥
yat tu kṛtsnavad ekasmin kārye saktam ahaitukam |
atattvārthavad alpaṃ ca tat tāmasam udāhṛtam
- यत्
- जो
- तु
- परन्तु
- कृत्स्नवत्
- सम्पूर्ण के समान
- एकस्मिन्
- एक
- कार्ये
- कार्य में
- सक्तम्
- आसक्त
- अहैतुकम्
- युक्तिरहित
- अतत्त्वार्थवत्
- तत्त्व के अर्थ से रहित
- अल्पम्
- तुच्छ
- च
- और
- तत्
- वह
- तामसम्
- तामस
- उदाहृतम्
- कहा गया है
अन्वय: यत् तु एकस्मिन् कार्ये कृत्स्नवत् सक्तम् अहैतुकम् अतत्त्वार्थवत् अल्पम् च, तत् तामसम् उदाहृतम्।
जो ज्ञान एक कार्य में ही सम्पूर्ण के समान आसक्त है, युक्तिरहित है, तत्त्व के अर्थ से रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
18.23नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥23॥
niyataṃ saṅgarahitam arāgadveṣataḥ kṛtam |
aphalaprepsunā karma yat tat sāttvikam ucyate
- नियतम्
- नियत
- सङ्गरहितम्
- आसक्ति से रहित
- अरागद्वेषतः
- राग और द्वेष के बिना
- कृतम्
- किया गया
- अफलप्रेप्सुना
- फल न चाहने वाले के द्वारा
- कर्म
- कर्म
- यत्
- जो
- तत्
- वह
- सात्त्विकम्
- सात्त्विक
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: यत् नियतम् कर्म अफलप्रेप्सुना सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम्, तत् सात्त्विकम् उच्यते।
जो नियत कर्म आसक्ति से रहित होकर, राग और द्वेष के बिना, फल न चाहने वाले के द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक कहा जाता है।
18.24यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥24॥
yat tu kāmepsunā karma sāhaṃkāreṇa vā punaḥ |
kriyate bahulāyāsaṃ tad rājasam udāhṛtam
- यत्
- जो
- तु
- परन्तु
- कामेप्सुना
- भोग की इच्छा वाले के द्वारा
- कर्म
- कर्म
- साहंकारेण
- अहंकार सहित
- वा
- अथवा
- पुनः
- फिर
- क्रियते
- किया जाता है
- बहुलायासम्
- बहुत परिश्रम से
- तत्
- वह
- राजसम्
- राजस
- उदाहृतम्
- कहा गया है
अन्वय: यत् तु कर्म कामेप्सुना साहंकारेण वा पुनः बहुलायासम् क्रियते, तत् राजसम् उदाहृतम्।
जो कर्म भोग की इच्छा वाले के द्वारा या अहंकार सहित बहुत परिश्रम से किया जाता है, वह राजस कहा गया है।
18.25अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥25॥
anubandhaṃ kṣayaṃ hiṃsām anapekṣya ca pauruṣam |
mohād ārabhyate karma yat tat tāmasam ucyate
- अनुबन्धम्
- परिणाम को
- क्षयम्
- हानि को
- हिंसाम्
- हिंसा को
- अनपेक्ष्य
- न देखकर
- च
- और
- पौरुषम्
- अपनी सामर्थ्य को
- मोहात्
- मोह से
- आरभ्यते
- आरम्भ किया जाता है
- कर्म
- कर्म
- यत्
- जो
- तत्
- वह
- तामसम्
- तामस
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: यत् कर्म अनुबन्धम् क्षयम् हिंसाम् पौरुषम् च अनपेक्ष्य मोहात् आरभ्यते, तत् तामसम् उच्यते।
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य को न देखकर मोह से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
18.26मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥26॥
muktasaṅgo ’nahaṃvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ |
siddhyasiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika ucyate
- मुक्तसङ्गः
- आसक्ति से मुक्त
- अनहंवादी
- अहंकार की बात न करने वाला
- धृत्युत्साहसमन्वितः
- धैर्य और उत्साह से युक्त
- सिद्ध्यसिद्ध्योः
- सिद्धि और असिद्धि में
- निर्विकारः
- निर्विकार
- कर्ता
- कर्ता
- सात्त्विकः
- सात्त्विक
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: मुक्तसङ्गः अनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्त्विकः उच्यते।
जो कर्ता आसक्ति से मुक्त, अहंकार की बात न करने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सिद्धि और असिद्धि में निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।
18.27रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥27॥
rāgī karmaphalaprepsur lubdho hiṃsātmako ’śuciḥ |
harṣaśokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ
- रागी
- रागी
- कर्मफलप्रेप्सुः
- कर्मफल का इच्छुक
- लुब्धः
- लोभी
- हिंसात्मकः
- हिंसा के स्वभाव वाला
- अशुचिः
- अशुद्ध
- हर्षशोकान्वितः
- हर्ष और शोक से युक्त
- कर्ता
- कर्ता
- राजसः
- राजस
- परिकीर्तितः
- कहा गया है
अन्वय: रागी कर्मफलप्रेप्सुः लुब्धः हिंसात्मकः अशुचिः हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।
जो कर्ता रागी, कर्मफल का इच्छुक, लोभी, हिंसा के स्वभाव वाला, अशुद्ध और हर्ष तथा शोक से युक्त है, वह राजस कहा गया है।
18.28अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैकृतिकोऽलसः
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैकृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥28॥
ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭho naikṛtiko ’lasaḥ |
viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyate
- अयुक्तः
- असंयमी
- प्राकृतः
- असंस्कृत
- स्तब्धः
- घमण्डी
- शठः
- धूर्त
- नैकृतिकः
- दूसरों का अपमान करने वाला
- अलसः
- आलसी
- विषादी
- विषाद करने वाला
- दीर्घसूत्री
- काम को टालता रहने वाला
- च
- और
- कर्ता
- कर्ता
- तामसः
- तामस
- उच्यते
- कहा जाता है
अन्वय: अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठः नैकृतिकः अलसः विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामसः उच्यते।
जो कर्ता असंयमी, असंस्कृत, घमण्डी, धूर्त, दूसरों का अपमान करने वाला, आलसी, विषाद करने वाला और काम को टालता रहने वाला है, वह तामस कहा जाता है।
18.29बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥29॥
buddher bhedaṃ dhṛteś caiva guṇatas trividhaṃ śṛṇu |
procyamānam aśeṣeṇa pṛthaktvena dhanaṃjaya
- बुद्धेः
- बुद्धि का
- भेदम्
- भेद
- धृतेः
- धृति का
- च
- और
- एव
- भी
- गुणतः
- गुणों के अनुसार
- त्रिविधम्
- तीन प्रकार का
- शृणु
- सुनिए
- प्रोच्यमानम्
- कहा जा रहा
- अशेषेण
- पूरी तरह
- पृथक्त्वेन
- अलग अलग
- धनंजय
- हे धनंजय
अन्वय: हे धनंजय, बुद्धेः धृतेः च एव गुणतः त्रिविधम् भेदम् अशेषेण पृथक्त्वेन प्रोच्यमानम् शृणु।
हे धनंजय, बुद्धि और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद, जो पूरी तरह और अलग अलग कहा जा रहा है, सुनिए।
18.30प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥30॥
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kāryākārye bhayābhaye |
bandhaṃ mokṣaṃ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī
- प्रवृत्तिम्
- प्रवृत्ति को
- च
- और
- निवृत्तिम्
- निवृत्ति को
- च
- और
- कार्याकार्ये
- कार्य और अकार्य को
- भयाभये
- भय और अभय को
- बन्धम्
- बन्धन को
- मोक्षम्
- मोक्ष को
- च
- और
- या
- जो
- वेत्ति
- जानती है
- बुद्धिः
- बुद्धि
- सा
- वह
- पार्थ
- हे पार्थ
- सात्त्विकी
- सात्त्विकी
अन्वय: हे पार्थ, या बुद्धिः प्रवृत्तिम् च निवृत्तिम् च कार्याकार्ये भयाभये बन्धम् मोक्षम् च वेत्ति, सा सात्त्विकी।
हे पार्थ, जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कार्य और अकार्य को, भय और अभय को तथा बन्धन और मोक्ष को जानती है, वह सात्त्विकी है।
18.31यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥31॥
yayā dharmam adharmaṃ ca kāryaṃ cākāryam eva ca |
ayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī
- यया
- जिससे
- धर्मम्
- धर्म को
- अधर्मम्
- अधर्म को
- च
- और
- कार्यम्
- कार्य को
- च
- और
- अकार्यम्
- अकार्य को
- एव
- भी
- च
- और
- अयथावत्
- ठीक ठीक नहीं
- प्रजानाति
- जानता है
- बुद्धिः
- बुद्धि
- सा
- वह
- पार्थ
- हे पार्थ
- राजसी
- राजसी
अन्वय: हे पार्थ, यया धर्मम् अधर्मम् च कार्यम् च अकार्यम् एव च अयथावत् प्रजानाति, सा बुद्धिः राजसी।
हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कार्य और अकार्य को भी ठीक ठीक नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
18.32अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥32॥
adharmaṃ dharmam iti yā manyate tamasāvṛtā |
sarvārthān viparītāṃś ca buddhiḥ sā pārtha tāmasī
- अधर्मम्
- अधर्म को
- धर्मम्
- धर्म
- इति
- ऐसा
- या
- जो
- मन्यते
- मानती है
- तमसा
- तम से
- आवृता
- ढकी हुई
- सर्वार्थान्
- सब पदार्थों को
- विपरीतान्
- विपरीत
- च
- और
- बुद्धिः
- बुद्धि
- सा
- वह
- पार्थ
- हे पार्थ
- तामसी
- तामसी
अन्वय: हे पार्थ, तमसा आवृता या अधर्मम् धर्मम् इति मन्यते, सर्वार्थान् च विपरीतान् मन्यते, सा बुद्धिः तामसी।
हे पार्थ, जो बुद्धि तम से ढकी हुई अधर्म को धर्म मानती है और सब पदार्थों को विपरीत जानती है, वह तामसी है।
18.33धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥33॥
dhṛtyā yayā dhārayate manaḥprāṇendriyakriyāḥ |
yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī
- धृत्या
- धृति से
- यया
- जिस
- धारयते
- धारण करता है
- मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः
- मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को
- योगेन
- योग के द्वारा
- अव्यभिचारिण्या
- अव्यभिचारिणी, अटल
- धृतिः
- धृति
- सा
- वह
- पार्थ
- हे पार्थ
- सात्त्विकी
- सात्त्विकी
अन्वय: हे पार्थ, यया अव्यभिचारिण्या धृत्या योगेन मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः धारयते, सा धृतिः सात्त्विकी।
हे पार्थ, जिस अटल धृति से मनुष्य योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।
18.34यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥34॥
yayā tu dharmakāmārthān dhṛtyā dhārayate ’rjuna |
prasaṅgena phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī
- यया
- जिस
- तु
- परन्तु
- धर्मकामार्थान्
- धर्म, काम और अर्थ को
- धृत्या
- धृति से
- धारयते
- धारण करता है
- अर्जुन
- हे अर्जुन
- प्रसङ्गेन
- आसक्ति के साथ
- फलाकाङ्क्षी
- फल की आकांक्षा वाला
- धृतिः
- धृति
- सा
- वह
- पार्थ
- हे पार्थ
- राजसी
- राजसी
अन्वय: हे अर्जुन, यया तु धृत्या फलाकाङ्क्षी प्रसङ्गेन धर्मकामार्थान् धारयते, हे पार्थ, सा धृतिः राजसी।
हे अर्जुन, जिस धृति से फल की आकांक्षा वाला मनुष्य आसक्ति के साथ धर्म, काम और अर्थ को धारण करता है, हे पार्थ, वह धृति राजसी है।
18.35यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥35॥
yayā svapnaṃ bhayaṃ śokaṃ viṣādaṃ madam eva ca |
na vimuñcati durmedhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī
- यया
- जिससे
- स्वप्नम्
- निद्रा को
- भयम्
- भय को
- शोकम्
- शोक को
- विषादम्
- विषाद को
- मदम्
- मद को
- एव
- भी
- च
- और
- न
- नहीं
- विमुञ्चति
- छोड़ता है
- दुर्मेधा
- दुर्बुद्धि
- धृतिः
- धृति
- सा
- वह
- पार्थ
- हे पार्थ
- तामसी
- तामसी
अन्वय: हे पार्थ, यया दुर्मेधा स्वप्नम् भयम् शोकम् विषादम् मदम् एव च न विमुञ्चति, सा धृतिः तामसी।
हे पार्थ, जिस धृति से दुर्बुद्धि मनुष्य निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद को भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।
18.36सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥36॥
sukhaṃ tv idānīṃ trividhaṃ śṛṇu me bharatarṣabha |
abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati
- सुखम्
- सुख
- तु
- और
- इदानीम्
- अब
- त्रिविधम्
- तीन प्रकार का
- शृणु
- सुनिए
- मे
- मुझसे
- भरतर्षभ
- हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ
- अभ्यासात्
- अभ्यास से
- रमते
- रमता है
- यत्र
- जिसमें
- दुःखान्तम्
- दुःख के अन्त को
- च
- और
- निगच्छति
- पा लेता है
अन्वय: हे भरतर्षभ, इदानीम् तु त्रिविधम् सुखम् मे शृणु। यत्र अभ्यासात् रमते, दुःखान्तम् च निगच्छति।
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ, अब तीन प्रकार का सुख मुझसे सुनिए। जिसमें मनुष्य अभ्यास से रमता है और दुःख के अन्त को पा लेता है।
18.37यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥37॥
yat tadagre viṣam iva pariṇāme ’mṛtopamam |
tat sukhaṃ sāttvikaṃ proktam ātmabuddhiprasādajam
- यत्
- जो
- तत्
- वह
- अग्रे
- आरम्भ में
- विषम्
- विष के
- इव
- समान
- परिणामे
- परिणाम में
- अमृतोपमम्
- अमृत के समान
- तत्
- वह
- सुखम्
- सुख
- सात्त्विकम्
- सात्त्विक
- प्रोक्तम्
- कहा गया है
- आत्मबुद्धिप्रसादजम्
- आत्मविषयक बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न
अन्वय: यत् तत् अग्रे विषम् इव परिणामे अमृतोपमम्, तत् आत्मबुद्धिप्रसादजम् सुखम् सात्त्विकम् प्रोक्तम्।
जो सुख आरम्भ में विष के समान और परिणाम में अमृत के समान है, आत्मविषयक बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
18.38विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥38॥
viṣayendriyasaṃyogād yat tadagre ’mṛtopamam |
pariṇāme viṣam iva tat sukhaṃ rājasaṃ smṛtam
- विषयेन्द्रियसंयोगात्
- विषयों और इन्द्रियों के संयोग से
- यत्
- जो
- तत्
- वह
- अग्रे
- आरम्भ में
- अमृतोपमम्
- अमृत के समान
- परिणामे
- परिणाम में
- विषम्
- विष के
- इव
- समान
- तत्
- वह
- सुखम्
- सुख
- राजसम्
- राजस
- स्मृतम्
- माना गया है
अन्वय: विषयेन्द्रियसंयोगात् यत् तत् अग्रे अमृतोपमम् परिणामे विषम् इव, तत् सुखम् राजसम् स्मृतम्।
जो सुख विषयों और इन्द्रियों के संयोग से आरम्भ में अमृत के समान और परिणाम में विष के समान है, वह सुख राजस माना गया है।
18.39यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥39॥
yad agre cānubandhe ca sukhaṃ mohanam ātmanaḥ |
nidrālasyapramādotthaṃ tat tāmasam udāhṛtam
- यत्
- जो
- अग्रे
- आरम्भ में
- च
- और
- अनुबन्धे
- परिणाम में
- च
- भी
- सुखम्
- सुख
- मोहनम्
- मोहित करने वाला
- आत्मनः
- आत्मा को
- निद्रालस्यप्रमादोत्थम्
- निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न
- तत्
- वह
- तामसम्
- तामस
- उदाहृतम्
- कहा गया है
अन्वय: यत् सुखम् अग्रे च अनुबन्धे च आत्मनः मोहनम्, निद्रालस्यप्रमादोत्थम्, तत् तामसम् उदाहृतम्।
जो सुख आरम्भ में और परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है तथा निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामस कहा गया है।
18.40न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥40॥
na tad asti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ |
sattvaṃ prakṛtijair muktaṃ yad ebhiḥ syāt tribhir guṇaiḥ
- न
- नहीं
- तत्
- वह
- अस्ति
- है
- पृथिव्याम्
- पृथ्वी पर
- वा
- अथवा
- दिवि
- आकाश में
- देवेषु
- देवताओं में
- वा
- अथवा
- पुनः
- फिर
- सत्त्वम्
- प्राणी
- प्रकृतिजैः
- प्रकृति से उत्पन्न
- मुक्तम्
- मुक्त
- यत्
- जो
- एभिः
- इन
- स्यात्
- हो
- त्रिभिः
- तीन
- गुणैः
- गुणों से
अन्वय: पृथिव्याम् वा दिवि देवेषु वा पुनः तत् सत्त्वम् न अस्ति यत् एभिः प्रकृतिजैः त्रिभिः गुणैः मुक्तम् स्यात्।
पृथ्वी पर, आकाश में या देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
18.41ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥41॥
brāhmaṇakṣatriyaviśāṃ śūdrāṇāṃ ca paraṃtapa |
karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavair guṇaiḥ
- ब्राह्मणक्षत्रियविशाम्
- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के
- शूद्राणाम्
- शूद्रों के
- च
- और
- परंतप
- हे परंतप
- कर्माणि
- कर्म
- प्रविभक्तानि
- विभक्त किए गए हैं
- स्वभावप्रभवैः
- स्वभाव से उत्पन्न
- गुणैः
- गुणों के द्वारा
अन्वय: हे परंतप, ब्राह्मणक्षत्रियविशाम् शूद्राणाम् च कर्माणि स्वभावप्रभवैः गुणैः प्रविभक्तानि।
हे परंतप, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किए गए हैं।
18.42शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥42॥
śamo damas tapaḥ śaucaṃ kṣāntir ārjavam eva ca |
jñānaṃ vijñānam āstikyaṃ brahmakarma svabhāvajam
- शमः
- मन का निग्रह
- दमः
- इन्द्रियों का दमन
- तपः
- तप
- शौचम्
- शुद्धि
- क्षान्तिः
- क्षमा
- आर्जवम्
- सरलता
- एव
- ही
- च
- और
- ज्ञानम्
- ज्ञान
- विज्ञानम्
- विज्ञान, अनुभव
- आस्तिक्यम्
- आस्तिकता
- ब्रह्मकर्म
- ब्राह्मण का कर्म
- स्वभावजम्
- स्वभाव से उत्पन्न
अन्वय: शमः दमः तपः शौचम् क्षान्तिः आर्जवम् एव च ज्ञानम् विज्ञानम् आस्तिक्यम् स्वभावजम् ब्रह्मकर्म।
मन का निग्रह, इन्द्रियों का दमन, तप, शुद्धि, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता, यह ब्राह्मण का स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।
18.43शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षत्रकर्म स्वभावजम् ॥43॥
śauryaṃ tejo dhṛtir dākṣyaṃ yuddhe cāpy apalāyanam |
dānam īśvarabhāvaś ca kṣatrakarma svabhāvajam
- शौर्यम्
- शौर्य
- तेजः
- तेज
- धृतिः
- धैर्य
- दाक्ष्यम्
- दक्षता
- युद्धे
- युद्ध में
- च
- और
- अपि
- भी
- अपलायनम्
- न भागना
- दानम्
- दान
- ईश्वरभावः
- स्वामी का भाव
- च
- और
- क्षत्रकर्म
- क्षत्रिय का कर्म
- स्वभावजम्
- स्वभाव से उत्पन्न
अन्वय: शौर्यम् तेजः धृतिः दाक्ष्यम् युद्धे च अपि अपलायनम् दानम् ईश्वरभावः च स्वभावजम् क्षत्रकर्म।
शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में भी न भागना, दान और स्वामी का भाव, यह क्षत्रिय का स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।
18.44कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥44॥
kṛṣigorakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam |
paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam
- कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यम्
- कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य
- वैश्यकर्म
- वैश्य का कर्म
- स्वभावजम्
- स्वभाव से उत्पन्न
- परिचर्यात्मकम्
- सेवा रूप
- कर्म
- कर्म
- शूद्रस्य
- शूद्र का
- अपि
- भी
- स्वभावजम्
- स्वभाव से उत्पन्न
अन्वय: कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यम् स्वभावजम् वैश्यकर्म। परिचर्यात्मकम् कर्म शूद्रस्य अपि स्वभावजम्।
कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य वैश्य का स्वभाव से उत्पन्न कर्म है। सेवा रूप कर्म शूद्र का भी स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।
18.45स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥45॥
sve sve karmaṇy abhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ |
svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tac chṛṇu
- स्वे स्वे
- अपने अपने
- कर्मणि
- कर्म में
- अभिरतः
- लगा हुआ
- संसिद्धिम्
- परम सिद्धि को
- लभते
- पाता है
- नरः
- मनुष्य
- स्वकर्मनिरतः
- अपने कर्म में लगा हुआ
- सिद्धिम्
- सिद्धि को
- यथा
- जिस प्रकार
- विन्दति
- पाता है
- तत्
- वह
- शृणु
- सुनिए
अन्वय: स्वे स्वे कर्मणि अभिरतः नरः संसिद्धिम् लभते। स्वकर्मनिरतः यथा सिद्धिम् विन्दति, तत् शृणु।
अपने अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि पाता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनिए।
18.46यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥46॥
yataḥ pravṛttir bhūtānāṃ yena sarvam idaṃ tatam |
svakarmaṇā tam abhyarcya siddhiṃ vindati mānavaḥ
- यतः
- जिससे
- प्रवृत्तिः
- उत्पत्ति
- भूतानाम्
- प्राणियों की
- येन
- जिससे
- सर्वम्
- सब
- इदम्
- यह
- ततम्
- व्याप्त है
- स्वकर्मणा
- अपने कर्म से
- तम्
- उसकी
- अभ्यर्च्य
- पूजा करके
- सिद्धिम्
- सिद्धि को
- विन्दति
- पाता है
- मानवः
- मनुष्य
अन्वय: यतः भूतानाम् प्रवृत्तिः, येन इदम् सर्वम् ततम्, तम् स्वकर्मणा अभ्यर्च्य मानवः सिद्धिम् विन्दति।
जिससे प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सब व्याप्त है, उसकी अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।
18.47श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥47॥
śreyān svadharmo viguṇaḥ paradharmāt svanuṣṭhitāt |
svabhāvaniyataṃ karma kurvan nāpnoti kilbiṣam
- श्रेयान्
- श्रेष्ठ
- स्वधर्मः
- अपना धर्म
- विगुणः
- गुणरहित
- परधर्मात्
- दूसरे के धर्म से
- स्वनुष्ठितात्
- अच्छी तरह किए गए
- स्वभावनियतम्
- स्वभाव से नियत
- कर्म
- कर्म
- कुर्वन्
- करता हुआ
- न
- नहीं
- आप्नोति
- पाता है
- किल्बिषम्
- पाप को
अन्वय: स्वनुष्ठितात् परधर्मात् विगुणः स्वधर्मः श्रेयान्। स्वभावनियतम् कर्म कुर्वन् किल्बिषम् न आप्नोति।
अच्छी तरह किए गए परधर्म से गुणरहित स्वधर्म भी श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं पाता।
18.48सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥48॥
sahajaṃ karma kaunteya sadoṣam api na tyajet |
sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnir ivāvṛtāḥ
- सहजम्
- सहज
- कर्म
- कर्म को
- कौन्तेय
- हे कौन्तेय
- सदोषम्
- दोषयुक्त
- अपि
- भी
- न
- नहीं
- त्यजेत्
- त्यागना चाहिए
- सर्वारम्भाः
- सब कर्म
- हि
- क्योंकि
- दोषेण
- दोष से
- धूमेन
- धुएँ से
- अग्निः
- अग्नि
- इव
- की तरह
- आवृताः
- ढके हुए हैं
अन्वय: हे कौन्तेय, सदोषम् अपि सहजम् कर्म न त्यजेत्। सर्वारम्भाः हि धूमेन अग्निः इव दोषेण आवृताः।
हे कौन्तेय, सहज कर्म को दोषयुक्त होने पर भी नहीं त्यागना चाहिए। क्योंकि सब कर्म धुएँ से अग्नि की तरह दोष से ढके हुए हैं।
18.49असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥49॥
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ |
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ saṃnyāsenādhigacchati
- असक्तबुद्धिः
- अनासक्त बुद्धि वाला
- सर्वत्र
- सब ओर से
- जितात्मा
- जिसने अपने को जीत लिया है
- विगतस्पृहः
- इच्छा से रहित
- नैष्कर्म्यसिद्धिम्
- नैष्कर्म्य सिद्धि को
- परमाम्
- परम
- संन्यासेन
- संन्यास के द्वारा
- अधिगच्छति
- पाता है
अन्वय: सर्वत्र असक्तबुद्धिः जितात्मा विगतस्पृहः संन्यासेन परमाम् नैष्कर्म्यसिद्धिम् अधिगच्छति।
जिसकी बुद्धि सब ओर से अनासक्त है, जिसने अपने को जीत लिया है और जिसकी इच्छा चली गई है, वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्य सिद्धि पाता है।
18.50सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥50॥
siddhiṃ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me |
samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā
- सिद्धिम्
- सिद्धि को
- प्राप्तः
- पाया हुआ
- यथा
- जिस प्रकार
- ब्रह्म
- ब्रह्म को
- तथा
- उस प्रकार
- आप्नोति
- पाता है
- निबोध
- जानिए
- मे
- मुझसे
- समासेन
- संक्षेप में
- एव
- ही
- कौन्तेय
- हे कौन्तेय
- निष्ठा
- निष्ठा
- ज्ञानस्य
- ज्ञान की
- या
- जो
- परा
- परा, सर्वोच्च
अन्वय: हे कौन्तेय, सिद्धिम् प्राप्तः यथा ब्रह्म आप्नोति, तथा समासेन एव मे निबोध, या ज्ञानस्य परा निष्ठा।
हे कौन्तेय, सिद्धि को पाया हुआ मनुष्य जिस प्रकार ब्रह्म को पाता है, वह मुझसे संक्षेप में ही जानिए। यह ज्ञान की परा निष्ठा है।
18.51बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥51॥
buddhyā viśuddhayā yukto dhṛtyātmānaṃ niyamya ca |
śabdādīn viṣayāṃs tyaktvā rāgadveṣau vyudasya ca
- बुद्ध्या
- बुद्धि से
- विशुद्धया
- विशुद्ध
- युक्तः
- युक्त
- धृत्या
- धृति से
- आत्मानम्
- अपने को
- नियम्य
- नियम में रखकर
- च
- और
- शब्दादीन्
- शब्द आदि
- विषयान्
- विषयों को
- त्यक्त्वा
- त्यागकर
- रागद्वेषौ
- राग और द्वेष को
- व्युदस्य
- दूर करके
- च
- और
अन्वय: विशुद्धया बुद्ध्या युक्तः, धृत्या आत्मानम् नियम्य च, शब्दादीन् विषयान् त्यक्त्वा, रागद्वेषौ व्युदस्य च।
विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धृति से अपने को नियम में रखकर, शब्द आदि विषयों को त्यागकर और राग तथा द्वेष को दूर करके।
18.52विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥52॥
viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ |
dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ
- विविक्तसेवी
- एकान्त में रहने वाला
- लघ्वाशी
- थोड़ा खाने वाला
- यतवाक्कायमानसः
- वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला
- ध्यानयोगपरः
- ध्यानयोग में लगा हुआ
- नित्यम्
- सदा
- वैराग्यम्
- वैराग्य का
- समुपाश्रितः
- आश्रय लिया हुआ
अन्वय: विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः नित्यम् ध्यानयोगपरः वैराग्यम् समुपाश्रितः।
एकान्त में रहने वाला, थोड़ा खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, सदा ध्यानयोग में लगा हुआ और वैराग्य का आश्रय लिया हुआ।
18.53अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥53॥
ahaṃkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ parigraham |
vimucya nirmamaḥ śānto brahmabhūyāya kalpate
- अहंकारम्
- अहंकार को
- बलम्
- बल को
- दर्पम्
- दर्प को
- कामम्
- काम को
- क्रोधम्
- क्रोध को
- परिग्रहम्
- परिग्रह को
- विमुच्य
- छोड़कर
- निर्ममः
- ममता से रहित
- शान्तः
- शान्त
- ब्रह्मभूयाय
- ब्रह्म होने के लिए
- कल्पते
- योग्य होता है
अन्वय: अहंकारम् बलम् दर्पम् कामम् क्रोधम् परिग्रहम् विमुच्य निर्ममः शान्तः ब्रह्मभूयाय कल्पते।
अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को छोड़कर, ममता से रहित और शान्त हुआ मनुष्य ब्रह्म होने के योग्य होता है।
18.54ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥54॥
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati |
samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām
- ब्रह्मभूतः
- ब्रह्म हुआ
- प्रसन्नात्मा
- प्रसन्न मन वाला
- न
- नहीं
- शोचति
- शोक करता है
- न
- नहीं
- काङ्क्षति
- कामना करता है
- समः
- समभाव वाला
- सर्वेषु
- सब
- भूतेषु
- प्राणियों में
- मद्भक्तिम्
- मेरी भक्ति को
- लभते
- पाता है
- पराम्
- परा
अन्वय: ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। सर्वेषु भूतेषु समः पराम् मद्भक्तिम् लभते।
ब्रह्म हुआ, प्रसन्न मन वाला मनुष्य न शोक करता है और न कामना करता है। सब प्राणियों में समभाव रखता हुआ वह मेरी परा भक्ति पाता है।
18.55भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥55॥
bhaktyā mām abhijānāti yāvān yaś cāsmi tattvataḥ |
tato māṃ tattvato jñātvā viśate tadanantaram
- भक्त्या
- भक्ति से
- माम्
- मुझे
- अभिजानाति
- जानता है
- यावान्
- जितना
- यः
- जो
- च
- और
- अस्मि
- मैं हूँ
- तत्त्वतः
- तत्त्व से
- ततः
- फिर
- माम्
- मुझे
- तत्त्वतः
- तत्त्व से
- ज्ञात्वा
- जानकर
- विशते
- प्रवेश करता है
- तदनन्तरम्
- उसके बाद ही
अन्वय: भक्त्या माम् यावान् यः च अस्मि तत्त्वतः अभिजानाति। ततः माम् तत्त्वतः ज्ञात्वा तदनन्तरम् विशते।
भक्ति से वह मुझे तत्त्व से जानता है कि मैं जितना हूँ और जो हूँ। फिर मुझे तत्त्व से जानकर वह उसके बाद ही मुझमें प्रवेश करता है।
18.56सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥56॥
sarvakarmāṇy api sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ |
matprasādād avāpnoti śāśvataṃ padam avyayam
- सर्वकर्माणि
- सब कर्मों को
- अपि
- भी
- सदा
- सदा
- कुर्वाणः
- करता हुआ
- मद्व्यपाश्रयः
- मेरा आश्रय लिया हुआ
- मत्प्रसादात्
- मेरी कृपा से
- अवाप्नोति
- पाता है
- शाश्वतम्
- शाश्वत
- पदम्
- पद को
- अव्ययम्
- अविनाशी
अन्वय: मद्व्यपाश्रयः सदा सर्वकर्माणि कुर्वाणः अपि मत्प्रसादात् शाश्वतम् अव्ययम् पदम् अवाप्नोति।
मेरा आश्रय लिया हुआ मनुष्य सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपा से शाश्वत और अविनाशी पद पाता है।
18.57चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥57॥
cetasā sarvakarmāṇi mayi saṃnyasya matparaḥ |
buddhiyogam upāśritya maccittaḥ satataṃ bhava
- चेतसा
- मन से
- सर्वकर्माणि
- सब कर्मों को
- मयि
- मुझमें
- संन्यस्य
- अर्पण करके
- मत्परः
- मुझे परम लक्ष्य मानने वाला
- बुद्धियोगम्
- बुद्धियोग का
- उपाश्रित्य
- आश्रय लेकर
- मच्चित्तः
- मुझमें चित्त वाला
- सततम्
- निरन्तर
- भव
- होइए
अन्वय: चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः बुद्धियोगम् उपाश्रित्य सततम् मच्चित्तः भव।
मन से सब कर्मों को मुझमें अर्पण करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्त वाले होइए।
18.58मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥58॥
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāt tariṣyasi |
atha cet tvam ahaṃkārān na śroṣyasi vinaṅkṣyasi
- मच्चित्तः
- मुझमें चित्त वाले
- सर्वदुर्गाणि
- सब कठिनाइयों को
- मत्प्रसादात्
- मेरी कृपा से
- तरिष्यसि
- पार कर जाएँगे
- अथ
- और
- चेत्
- यदि
- त्वम्
- आप
- अहंकारात्
- अहंकार से
- न
- नहीं
- श्रोष्यसि
- सुनेंगे
- विनङ्क्ष्यसि
- नष्ट हो जाएँगे
अन्वय: मच्चित्तः मत्प्रसादात् सर्वदुर्गाणि तरिष्यसि। अथ चेत् त्वम् अहंकारात् न श्रोष्यसि, विनङ्क्ष्यसि।
मुझमें चित्त वाले होकर आप मेरी कृपा से सब कठिनाइयों को पार कर जाएँगे। और यदि आप अहंकार से नहीं सुनेंगे, तो नष्ट हो जाएँगे।
18.59यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥59॥
yad ahaṃkāram āśritya na yotsya iti manyase |
mithyaiṣa vyavasāyas te prakṛtis tvāṃ niyokṣyati
- यत्
- जो
- अहंकारम्
- अहंकार का
- आश्रित्य
- आश्रय लेकर
- न
- नहीं
- योत्स्ये
- युद्ध करेंगे
- इति
- ऐसा
- मन्यसे
- सोचते हैं
- मिथ्या
- मिथ्या
- एषः
- यह
- व्यवसायः
- निश्चय
- ते
- आपका
- प्रकृतिः
- प्रकृति
- त्वाम्
- आपको
- नियोक्ष्यति
- लगा देगी
अन्वय: यत् अहंकारम् आश्रित्य न योत्स्ये इति मन्यसे, एषः ते व्यवसायः मिथ्या। प्रकृतिः त्वाम् नियोक्ष्यति।
अहंकार का आश्रय लेकर आप जो सोचते हैं कि हम युद्ध नहीं करेंगे, आपका यह निश्चय मिथ्या है। प्रकृति आपको लगा देगी।
18.60स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥60॥
svabhāvajena kaunteya nibaddhaḥ svena karmaṇā |
kartuṃ necchasi yan mohāt kariṣyasy avaśo ’pi tat
- स्वभावजेन
- स्वभाव से उत्पन्न
- कौन्तेय
- हे कौन्तेय
- निबद्धः
- बँधे हुए
- स्वेन
- अपने
- कर्मणा
- कर्म से
- कर्तुम्
- करना
- न
- नहीं
- इच्छसि
- चाहते हैं
- यत्
- जो
- मोहात्
- मोह से
- करिष्यसि
- करेंगे
- अवशः
- विवश होकर
- अपि
- भी
- तत्
- उसे
अन्वय: हे कौन्तेय, स्वभावजेन स्वेन कर्मणा निबद्धः यत् मोहात् कर्तुम् न इच्छसि, तत् अपि अवशः करिष्यसि।
हे कौन्तेय, स्वभाव से उत्पन्न अपने कर्म से बँधे हुए आप जो मोह से करना नहीं चाहते, उसे भी विवश होकर करेंगे।
18.61ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥61॥
īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ hṛddeśe ’rjuna tiṣṭhati |
bhrāmayan sarvabhūtāni yantrārūḍhāni māyayā
- ईश्वरः
- ईश्वर
- सर्वभूतानाम्
- सब प्राणियों के
- हृद्देशे
- हृदय देश में
- अर्जुन
- हे अर्जुन
- तिष्ठति
- स्थित है
- भ्रामयन्
- घुमाता हुआ
- सर्वभूतानि
- सब प्राणियों को
- यन्त्रारूढानि
- यन्त्र पर चढ़े हुए
- मायया
- माया से
अन्वय: हे अर्जुन, ईश्वरः मायया यन्त्रारूढानि सर्वभूतानि भ्रामयन् सर्वभूतानाम् हृद्देशे तिष्ठति।
हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय देश में स्थित है। वह माया से यन्त्र पर चढ़े हुए सब प्राणियों को घुमा रहा है।
18.62तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥62॥
tam eva śaraṇaṃ gaccha sarvabhāvena bhārata |
tatprasādāt parāṃ śāntiṃ sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam
- तम्
- उसकी
- एव
- ही
- शरणम्
- शरण में
- गच्छ
- जाइए
- सर्वभावेन
- सब प्रकार से
- भारत
- हे भारत
- तत्प्रसादात्
- उसकी कृपा से
- पराम्
- परम
- शान्तिम्
- शान्ति को
- स्थानम्
- स्थान को
- प्राप्स्यसि
- पाएँगे
- शाश्वतम्
- शाश्वत
अन्वय: हे भारत, सर्वभावेन तम् एव शरणम् गच्छ। तत्प्रसादात् पराम् शान्तिम् शाश्वतम् स्थानम् प्राप्स्यसि।
हे भारत, सब प्रकार से उसी की शरण में जाइए। उसकी कृपा से आप परम शान्ति और शाश्वत स्थान पाएँगे।
18.63इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥63॥
iti te jñānam ākhyātaṃ guhyād guhyataraṃ mayā |
vimṛśyaitad aśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru
- इति
- इस प्रकार
- ते
- आपको
- ज्ञानम्
- ज्ञान
- आख्यातम्
- कह दिया
- गुह्यात्
- गुह्य से
- गुह्यतरम्
- और भी गुह्य
- मया
- मेरे द्वारा
- विमृश्य
- विचार करके
- एतत्
- इस पर
- अशेषेण
- पूरी तरह
- यथा
- जैसा
- इच्छसि
- आप चाहते हैं
- तथा
- वैसा
- कुरु
- कीजिए
अन्वय: इति मया ते गुह्यात् गुह्यतरम् ज्ञानम् आख्यातम्। एतत् अशेषेण विमृश्य यथा इच्छसि तथा कुरु।
इस प्रकार मैंने आपको गुह्य से भी गुह्यतर ज्ञान कह दिया। इस पर पूरी तरह विचार करके जैसा आप चाहते हैं वैसा कीजिए।
18.64सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥64॥
sarvaguhyatamaṃ bhūyaḥ śṛṇu me paramaṃ vacaḥ |
iṣṭo ’si me dṛḍham iti tato vakṣyāmi te hitam
- सर्वगुह्यतमम्
- सबसे गुह्यतम
- भूयः
- फिर
- शृणु
- सुनिए
- मे
- मेरा
- परमम्
- परम
- वचः
- वचन
- इष्टः
- प्रिय
- असि
- आप हैं
- मे
- मुझे
- दृढम्
- अत्यन्त
- इति
- इसलिए
- ततः
- तब
- वक्ष्यामि
- कहूँगा
- ते
- आपके
- हितम्
- हित की बात
अन्वय: सर्वगुह्यतमम् मे परमम् वचः भूयः शृणु। मे दृढम् इष्टः असि इति ततः ते हितम् वक्ष्यामि।
सबसे गुह्यतम मेरा परम वचन फिर सुनिए। आप मुझे अत्यन्त प्रिय हैं, इसलिए मैं आपके हित की बात कहूँगा।
18.65मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥65॥
manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru |
mām evaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo ’si me
- मन्मना
- मुझमें मन वाले
- भव
- होइए
- मद्भक्तः
- मेरे भक्त
- मद्याजी
- मेरी पूजा करने वाले
- माम्
- मुझे
- नमस्कुरु
- नमस्कार कीजिए
- माम्
- मुझे
- एव
- ही
- एष्यसि
- पाएँगे
- सत्यम्
- सत्य
- ते
- आपसे
- प्रतिजाने
- प्रतिज्ञा करता हूँ
- प्रियः
- प्रिय
- असि
- आप हैं
- मे
- मुझे
अन्वय: मन्मना मद्भक्तः मद्याजी भव, माम् नमस्कुरु। माम् एव एष्यसि, ते सत्यम् प्रतिजाने, मे प्रियः असि।
मुझमें मन वाले, मेरे भक्त और मेरी पूजा करने वाले होइए, मुझे नमस्कार कीजिए। आप मुझे ही पाएँगे, यह मैं आपसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, आप मुझे प्रिय हैं।
18.66सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥66॥
sarvadharmān parityajya mām ekaṃ śaraṇaṃ vraja |
ahaṃ tvā sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ
- सर्वधर्मान्
- सब धर्मों को
- परित्यज्य
- छोड़कर
- माम्
- मेरी
- एकम्
- केवल
- शरणम्
- शरण में
- व्रज
- आइए
- अहम्
- मैं
- त्वा
- आपको
- सर्वपापेभ्यः
- सब पापों से
- मोक्षयिष्यामि
- मुक्त कर दूँगा
- मा
- मत
- शुचः
- शोक कीजिए
अन्वय: सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एकम् शरणम् व्रज। अहम् त्वा सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि, मा शुचः।
सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आइए। मैं आपको सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कीजिए।
18.67इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदा चन
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदा चन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥67॥
idaṃ te nātapaskāya nābhaktāya kadā cana |
na cāśuśrūṣave vācyaṃ na ca māṃ yo ’bhyasūyati
- इदम्
- यह
- ते
- आपके द्वारा
- न
- नहीं
- अतपस्काय
- तप न करने वाले को
- न
- नहीं
- अभक्ताय
- भक्तिहीन को
- कदा चन
- कभी भी
- न
- नहीं
- च
- और
- अशुश्रूषवे
- सुनने की इच्छा न रखने वाले को
- वाच्यम्
- कहना चाहिए
- न
- नहीं
- च
- और
- माम्
- मुझसे
- यः
- जो
- अभ्यसूयति
- द्वेष करता है
अन्वय: इदम् ते अतपस्काय न, अभक्ताय न, अशुश्रूषवे च न कदा चन वाच्यम्, यः च माम् अभ्यसूयति तस्मै न।
यह आपके द्वारा कभी भी तप न करने वाले को, भक्तिहीन को और सुनने की इच्छा न रखने वाले को नहीं कहना चाहिए। और जो मुझसे द्वेष करता है, उसे भी नहीं।
18.68य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥68॥
ya idaṃ paramaṃ guhyaṃ madbhakteṣv abhidhāsyati |
bhaktiṃ mayi parāṃ kṛtvā mām evaiṣyaty asaṃśayaḥ
- यः
- जो
- इदम्
- इस
- परमम्
- परम
- गुह्यम्
- गुह्य ज्ञान को
- मद्भक्तेषु
- मेरे भक्तों में
- अभिधास्यति
- कहेगा
- भक्तिम्
- भक्ति
- मयि
- मुझमें
- पराम्
- परा
- कृत्वा
- करके
- माम्
- मुझे
- एव
- ही
- एष्यति
- पाएगा
- असंशयः
- निःसंदेह
अन्वय: यः इदम् परमम् गुह्यम् मद्भक्तेषु अभिधास्यति, सः मयि पराम् भक्तिम् कृत्वा असंशयः माम् एव एष्यति।
जो इस परम गुह्य ज्ञान को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझमें परा भक्ति करके मुझे ही पाएगा, इसमें संशय नहीं है।
18.69न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥69॥
na ca tasmān manuṣyeṣu kaś cin me priyakṛttamaḥ |
bhavitā na ca me tasmād anyaḥ priyataro bhuvi
- न
- नहीं
- च
- और
- तस्मात्
- उससे
- मनुष्येषु
- मनुष्यों में
- कश्चित्
- कोई
- मे
- मेरा
- प्रियकृत्तमः
- सबसे अधिक प्रिय कार्य करने वाला
- भविता
- होगा
- न
- नहीं
- च
- और
- मे
- मेरा
- तस्मात्
- उससे
- अन्यः
- दूसरा
- प्रियतरः
- अधिक प्रिय
- भुवि
- पृथ्वी पर
अन्वय: मनुष्येषु तस्मात् कश्चित् मे प्रियकृत्तमः न च। भुवि तस्मात् अन्यः मे प्रियतरः न च भविता।
मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है। और पृथ्वी पर उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई होगा भी नहीं।
18.70अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥70॥
adhyeṣyate ca ya imaṃ dharmyaṃ saṃvādam āvayoḥ |
jñānayajñena tenāham iṣṭaḥ syām iti me matiḥ
- अध्येष्यते
- अध्ययन करेगा
- च
- और
- यः
- जो
- इमम्
- इस
- धर्म्यम्
- धर्ममय
- संवादम्
- संवाद का
- आवयोः
- हम दोनों के
- ज्ञानयज्ञेन
- ज्ञानयज्ञ से
- तेन
- उसके द्वारा
- अहम्
- मैं
- इष्टः
- पूजित
- स्याम्
- होऊँगा
- इति
- ऐसा
- मे
- मेरा
- मतिः
- मत
अन्वय: यः च आवयोः इमम् धर्म्यम् संवादम् अध्येष्यते, तेन अहम् ज्ञानयज्ञेन इष्टः स्याम् इति मे मतिः।
और जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा, ऐसा मेरा मत है।
18.71श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभांल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥71॥
śraddhāvān anasūyaś ca śṛṇuyād api yo naraḥ |
so ’pi muktaḥ śubhāṃl lokān prāpnuyāt puṇyakarmaṇām
- श्रद्धावान्
- श्रद्धावान
- अनसूयः
- दोषदृष्टि से रहित
- च
- और
- शृणुयात्
- सुनेगा
- अपि
- केवल
- यः
- जो
- नरः
- मनुष्य
- सः
- वह
- अपि
- भी
- मुक्तः
- मुक्त होकर
- शुभान्
- शुभ
- लोकान्
- लोकों को
- प्राप्नुयात्
- पाएगा
- पुण्यकर्मणाम्
- पुण्य कर्म करने वालों के
अन्वय: यः श्रद्धावान् अनसूयः च नरः शृणुयात् अपि, सः अपि मुक्तः पुण्यकर्मणाम् शुभान् लोकान् प्राप्नुयात्।
जो श्रद्धावान और दोषदृष्टि से रहित मनुष्य इसे केवल सुनेगा, वह भी मुक्त होकर पुण्य कर्म करने वालों के शुभ लोकों को पाएगा।
18.72कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥72॥
kaccid etac chrutaṃ pārtha tvayaikāgreṇa cetasā |
kaccid ajñānasaṃmohaḥ pranaṣṭas te dhanaṃjaya
- कच्चित्
- क्या
- एतत्
- इसे
- श्रुतम्
- सुना
- पार्थ
- हे पार्थ
- त्वया
- आपने
- एकाग्रेण
- एकाग्र
- चेतसा
- चित्त से
- कच्चित्
- क्या
- अज्ञानसंमोहः
- अज्ञान से उत्पन्न मोह
- प्रनष्टः
- नष्ट हो गया
- ते
- आपका
- धनंजय
- हे धनंजय
अन्वय: हे पार्थ, कच्चित् एतत् त्वया एकाग्रेण चेतसा श्रुतम्? हे धनंजय, कच्चित् ते अज्ञानसंमोहः प्रनष्टः?
हे पार्थ, क्या आपने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनंजय, क्या आपका अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया?
18.73नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥73॥
naṣṭo mohaḥ smṛtir labdhā tvatprasādān mayācyuta |
sthito ’smi gatasaṃdehaḥ kariṣye vacanaṃ tava
- नष्टः
- नष्ट हो गया
- मोहः
- मोह
- स्मृतिः
- स्मृति
- लब्धा
- पा ली
- त्वत्प्रसादात्
- आपकी कृपा से
- मया
- हमने
- अच्युत
- हे अच्युत
- स्थितः
- स्थित
- अस्मि
- हैं
- गतसंदेहः
- संशय से रहित
- करिष्ये
- पूरा करेंगे
- वचनम्
- वचन
- तव
- आपका
अन्वय: हे अच्युत, त्वत्प्रसादात् मया मोहः नष्टः, स्मृतिः लब्धा। गतसंदेहः स्थितः अस्मि, तव वचनम् करिष्ये।
हे अच्युत, आपकी कृपा से हमारा मोह नष्ट हो गया और हमने स्मृति पा ली। हम संशय से रहित होकर स्थित हैं, हम आपका वचन पूरा करेंगे।
18.74इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः
संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥74॥
ity ahaṃ vāsudevasya pārthasya ca mahātmanaḥ |
saṃvādam imam aśrauṣam adbhutaṃ romaharṣaṇam
- इति
- इस प्रकार
- अहम्
- हमने
- वासुदेवस्य
- वासुदेव का
- पार्थस्य
- पार्थ का
- च
- और
- महात्मनः
- महात्मा
- संवादम्
- संवाद
- इमम्
- यह
- अश्रौषम्
- सुना
- अद्भुतम्
- अद्भुत
- रोमहर्षणम्
- रोमांच कर देने वाला
अन्वय: इति अहम् वासुदेवस्य महात्मनः पार्थस्य च इमम् अद्भुतम् रोमहर्षणम् संवादम् अश्रौषम्।
इस प्रकार हमने वासुदेव और महात्मा पार्थ का यह अद्भुत और रोमांच कर देने वाला संवाद सुना।
18.75व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥75॥
vyāsaprasādāc chrutavān etad guhyam ahaṃ param |
yogaṃ yogeśvarāt kṛṣṇāt sākṣāt kathayataḥ svayam
- व्यासप्रसादात्
- व्यास की कृपा से
- श्रुतवान्
- सुना
- एतत्
- इस
- गुह्यम्
- गुह्य
- अहम्
- हमने
- परम्
- परम
- योगम्
- योग को
- योगेश्वरात्
- योगेश्वर
- कृष्णात्
- कृष्ण से
- साक्षात्
- साक्षात्
- कथयतः
- कहते हुए
- स्वयम्
- स्वयं
अन्वय: अहम् व्यासप्रसादात् एतत् परम् गुह्यम् योगम् स्वयम् कथयतः योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् श्रुतवान्।
व्यास की कृपा से हमने इस परम गुह्य योग को स्वयं कहते हुए योगेश्वर कृष्ण से साक्षात् सुना।
18.76राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥76॥
rājan saṃsmṛtya saṃsmṛtya saṃvādam imam adbhutam |
keśavārjunayoḥ puṇyaṃ hṛṣyāmi ca muhur muhuḥ
- राजन्
- हे राजन
- संस्मृत्य संस्मृत्य
- बार बार स्मरण करके
- संवादम्
- संवाद को
- इमम्
- इस
- अद्भुतम्
- अद्भुत
- केशवार्जुनयोः
- केशव और अर्जुन के
- पुण्यम्
- पुण्यमय
- हृष्यामि
- हर्षित होते हैं
- च
- और
- मुहुः मुहुः
- बार बार
अन्वय: हे राजन्, केशवार्जुनयोः इमम् अद्भुतम् पुण्यम् संवादम् संस्मृत्य संस्मृत्य मुहुः मुहुः हृष्यामि च।
हे राजन, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पुण्यमय संवाद को बार बार स्मरण करके हम बार बार हर्षित होते हैं।
18.77तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान्राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥77॥
tac ca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpam atyadbhutaṃ hareḥ |
vismayo me mahān rājan hṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ
- तत्
- उस
- च
- और
- संस्मृत्य संस्मृत्य
- बार बार स्मरण करके
- रूपम्
- रूप को
- अत्यद्भुतम्
- अत्यन्त अद्भुत
- हरेः
- हरि के
- विस्मयः
- विस्मय
- मे
- हमें
- महान्
- महान
- राजन्
- हे राजन
- हृष्यामि
- हर्षित होते हैं
- च
- और
- पुनः पुनः
- फिर फिर
अन्वय: हे राजन्, हरेः तत् अत्यद्भुतम् रूपम् च संस्मृत्य संस्मृत्य मे महान् विस्मयः, पुनः पुनः हृष्यामि च।
हे राजन, हरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को भी बार बार स्मरण करके हमें महान विस्मय होता है और हम फिर फिर हर्षित होते हैं।
18.78यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥78॥
yatra yogeśvaraḥ kṛṣṇo yatra pārtho dhanurdharaḥ |
tatra śrīr vijayo bhūtir dhruvā nītir matir mama
- यत्र
- जहाँ
- योगेश्वरः
- योगेश्वर
- कृष्णः
- कृष्ण
- यत्र
- जहाँ
- पार्थः
- पार्थ
- धनुर्धरः
- धनुर्धर
- तत्र
- वहाँ
- श्रीः
- श्री
- विजयः
- विजय
- भूतिः
- ऐश्वर्य
- ध्रुवा
- अचल
- नीतिः
- नीति
- मतिः
- मत
- मम
- हमारा
अन्वय: यत्र योगेश्वरः कृष्णः, यत्र धनुर्धरः पार्थः, तत्र श्रीः विजयः भूतिः ध्रुवा नीतिः, इति मम मतिः।
जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर पार्थ हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य और अचल नीति है, ऐसा हमारा मत है।