आधी रात की मथुरा। कारागार की दीवारें गीली हैं, पहरेदार नींद में डूबे हैं, और देवकी की आठवीं सन्तान अभी अभी जन्मी है। बाहर यमुना उफान पर है, भीतर वसुदेव के हाथ काँप रहे हैं, और तभी वह होता है जिसे कोई पहरा रोक नहीं सकता, ताले अपने आप खुल जाते हैं। श्रीमद्भागवत की यह कथा इस साइट पर शुकदेव की उसी वाणी में मिलती है जो गंगा-तट पर परीक्षित को उत्तर देती है, “जहाँ अँधेरा परम सघन होता है, वहीं वे सब की नज़र बचाकर चुपके से उतर आते हैं।” राजमहल नहीं, उत्सव नहीं, ज़ंजीरों के बीच जन्म। कृष्ण की पूरी कथा इसी उलटबाँसी पर खड़ी है, जहाँ सबसे अधिक भय है, वहीं सबसे अधिक भरोसा उतरता है।
भागवत की आँख से देखिए तो वृन्दावन की हर लीला में एक ही ढंग बार बार दिखता है, संकट जितना बड़ा, उत्तर उतना सहज। पूतना विष लेकर आती है और दूध के साथ अपने प्राण भी सौंप जाती है। कालिय का फन यमुना को ज़हर करता है, तो वह ग्वाल-बालक उस फन पर नाचता है, मारता नहीं, मान भर तोड़ता है, और फिर नाग को कुटुम्ब समेत विदा कर देता है। और जब इन्द्र सात दिन की प्रलय-वर्षा उतारते हैं, तो सात बरस का वही बालक गोवर्धन को एक हाथ पर ऐसे थामता है, साइट का पन्ना कहता है, “मानो किसी ने केवल बरसते पानी से बचने को एक छाता तान लिया हो”। सात दिन, कोहनी तक नहीं झुकी, और चेहरे पर वही माखन-चोरी वाली मुस्कान। भागवत में शक्ति का यही स्वभाव है, वह कभी अपना भार दूसरों को महसूस नहीं होने देती।
फिर रास की वह रात है, जिसमें वंशी बजती है और गोपियाँ घर-द्वार छोड़कर चली आती हैं। भागवत उसे भक्ति का सबसे गहरा रूपक कहता है, जिसमें हर गोपी को लगता है कि कृष्ण केवल उसके साथ हैं। और जिस क्षण मन में अभिमान जागता है, वे अन्तर्धान हो जाते हैं। जो अपने को विशेष मानने लगे, उसके लिए कृष्ण अनुपस्थित हैं, और जो पुकार में डूब जाए, उसके लिए हर ओर उपस्थित। यही कसौटी आगे रुक्मिणी के पत्र में दिखती है, जिसके सात श्लोकों पर वे रथ दौड़ा देते हैं, और सुदामा की उस पोटली में, जिसका मुट्ठी भर चिउड़ा वे ऐसे खाते हैं जैसे तीनों लोक की निधि हो। मित्र ने माँगा कुछ नहीं, और पाया वह जो माँगने से कभी नहीं मिलता।
वंशी से सुदर्शन तक
व्यास के महाभारत में यही कृष्ण दूसरे वेश में मिलते हैं। अब हाथ में वंशी नहीं, रासें हैं, और सामने वृन्दावन नहीं, कुरुक्षेत्र। युद्ध से पहले वे स्वयं शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर जाते हैं, पाँच गाँव माँगते हैं, और भरी सभा में अपमानित होकर भी अन्त तक सन्धि का हर द्वार खटखटाते हैं। जब दुर्योधन उन्हें बाँधने चलता है, तब वे अपना विश्वरूप दिखाते हैं, और फिर भी युद्ध टल नहीं पाता। कृष्ण की यह हार पढ़ने लायक़ है, क्योंकि यह बताती है कि जो सर्वसमर्थ है, वह भी दूसरों के निर्णय नहीं छीनता।
फिर वह भोर आती है जब दो सेनाओं के बीच अर्जुन का धनुष हाथ से छूटता है। वहीं, दो समुद्रों के बीच ठहरे एक रथ पर, वह संवाद जन्म लेता है जिसे संसार भगवद्गीता कहता है। कर्म का अधिकार आपका है, फल का नहीं, यह एक पंक्ति उस दिन से आज तक हर उलझे हुए मन की गाँठ खोलती आ रही है। और इसी युद्ध में वह क्षण भी आता है जब भीष्म के बाणों से पाण्डव-सेना जलती देखकर कृष्ण अपनी ही प्रतिज्ञा भूल जाते हैं, रासें छोड़कर, चक्र उठाकर रथ से कूद पड़ते हैं, और अर्जुन उन्हें दसवें पग पर जाकर मुश्किल से रोक पाते हैं। शस्त्र न उठाने का वचन टूटने को था, क्योंकि उससे बड़ा वचन यह था कि पाण्डवों का नाश नहीं होने दूँगा। कृष्ण के यहाँ नियम भी प्रेम से छोटा है।
और अन्त, महाभारत के मौसल पर्व में, प्रभास के वन में आता है। यादव आपस में कट चुके हैं, द्वारका अपनी घड़ियाँ गिन रही है, और एक पीपल तले लेटे कृष्ण के तलवे को हिरण समझकर जरा नाम का व्याध बाण मारता है। जो सबका सारथी था, वह अकेला, चुपचाप, बिना किसी सेना और शंखनाद के लौट जाता है। जन्म पहरों के बीच, विदा एकान्त में। बीच का सारा जीवन दूसरों की गाँठें खोलने में गया।
उनकी राह
कंस का भय और कृष्ण का जन्म · जिस रात ताले अपने आप खुल गए, और यमुना ने नन्हे पाँवों को राह दी।
कालिय नाग · ज़हरीले फन पर नाचता बालक, जो दण्ड नहीं, दिशा देता है।
गोवर्धन · सात दिन की प्रलय-वर्षा के नीचे एक हाथ का छाता, और इन्द्र का उतरा हुआ अभिमान।
रास लीला · वंशी की वह रात, जिसमें जो डूबा उसे कृष्ण हर ओर मिले, और जिसने अपने को विशेष माना उससे ओझल हो गए।
सुदामा की यात्रा · मुट्ठी भर चिउड़ा, झुका हुआ सिर, और मित्रता की वह तुला जिस पर वैभव हल्का पड़ गया।
कृष्ण का शान्ति-दूत बनना · पाँच गाँवों की माँग, भरी सभा का विश्वरूप, और सन्धि का अन्तिम प्रयास।
गीता का क्षण · दो सेनाओं के बीच ठहरा रथ, अर्जुन का विषाद, और वह उत्तर जो आज भी उत्तर है।
कृष्ण का रथ से उतरना · भीष्म के आगे टूटती अपनी ही प्रतिज्ञा, क्योंकि प्रेम वचन से बड़ा निकला।
कृष्ण का स्वधाम-गमन · पीपल की छाँव, व्याध का बाण, और सारथी की मौन विदा।
भगवद्गीता · अठारह अध्यायों का वह पूरा संवाद, अपनी अलग बैठक में, धीरे धीरे पढ़ने के लिए।
सारथी की सीख
कृष्ण को पढ़ते हुए हमें सबसे अधिक यह बात रोकती है कि उन्होंने कुरुक्षेत्र में शस्त्र नहीं उठाया, रासें उठाईं। जो सब कुछ कर सकता था, उसने अपने लिए वह भूमिका चुनी जिसमें दिशा तो उसके हाथ में हो, पर प्रहार का दायित्व और श्रेय दूसरे का रहे। निर्णय लेने वालों के लिए इसमें एक पूरा शास्त्र छिपा है, सबसे बड़ी शक्ति वह नहीं जो सबसे आगे दिखे, वह है जो रथ की दिशा तय करे और स्वयं धूल में रहे। दूसरी सीख भय के बारे में है, कृष्ण संकट को कभी संकट के आकार में नहीं देखते, गोवर्धन उनके लिए छाता है और कालिय एक भटका हुआ पड़ोसी। और तीसरी बात निष्ठा की है, जो वचन प्रेम की रक्षा न कर सके, कृष्ण उसे टूट जाने देते हैं, और जो सम्बन्ध बिना माँगे निभे, सुदामा की पोटली की तरह, उसके लिए वे दौड़कर द्वार तक आते हैं। नियम, पद और प्रतिष्ठा, तीनों उनके यहाँ साधन हैं, साध्य केवल एक है, जिसे उन्होंने अर्जुन से कहा था, निर्भय होकर अपना काम कीजिए, शेष हम देख लेंगे।