श्रीकृष्ण एक बहुत पुराने चित्र से बात शुरू करते हैं। वे कहते हैं, इस संसार को एक उल्टे पीपल के पेड़ की तरह देखिए, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर फैली हुई हैं। यह अजीब सा पेड़ ही यह सारा जगत है। और इसे काटने का एक ही औज़ार है, वैराग्य की तेज़ कुल्हाड़ी।
उल्टा पेड़, जड़ें ऊपर
सोचिए, हर पेड़ की जड़ नीचे मिट्टी में होती है और शाखाएँ ऊपर आकाश की ओर। पर श्रीकृष्ण जिस पेड़ की बात कर रहे हैं, वह उल्टा है। उसकी जड़ ऊपर है, उस परम सत्य में, और शाखाएँ नीचे की ओर, इस दिखने वाले संसार में फैली हुई हैं। इस पेड़ को गुण सींचते हैं, इसकी कोंपलें विषय-भोग हैं, और इसकी कुछ जड़ें नीचे तक उतर कर मनुष्य को कर्मों से बाँधती जाती हैं।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ऊपर जड़ और नीचे शाखाओं वाले इस अश्वत्थ को अविनाशी कहा गया है। इसकी पत्तियाँ वेद के छंद हैं, और जो इस पेड़ को सचमुच जान ले, वही असली वेद का जानकार है। (गीता 15.1)
यहाँ खड़े-खड़े हमें इस पेड़ का न सिरा दिखता है, न छोर, न वह ज़मीन जिस पर यह टिका है। श्रीकृष्ण कहते हैं, इस गहरी जमी हुई जड़ को वैराग्य की मज़बूत कुल्हाड़ी से काट डालिए। एक बार जड़ कट जाए, तो सारी शाखाएँ अपने आप झर जाती हैं। और तब उस परम पुरुष की शरण खोजिए, जिससे यह सारा पुराना विस्तार बहा है, और जहाँ पहुँच कर फिर लौटना नहीं होता।
वह धाम जहाँ से लौटना नहीं
श्रीकृष्ण उस धाम का एक अनूठा वर्णन देते हैं। वे कहते हैं, वहाँ न सूरज की रौशनी पहुँचती है, न चाँद की, न आग की। जो वहाँ एक बार पहुँच गया, वह फिर इस चक्कर में नहीं लौटता। वही मेरा परम धाम है। जो अभिमान और मोह से छूट गया, जिसने लगाव को जीत लिया, जो सदा अपने भीतर के सत्य में बसा रहता है, और जिसकी सारी चाहें शांत हो चुकी हैं, वह इसी अटल धाम तक पहुँच जाता है।
हर जीव उसी का एक अंश
अब श्रीकृष्ण एक बहुत आत्मीय बात कहते हैं। वे कहते हैं, इस जीव-लोक में जो जीव भटक रहा है, वह और कोई नहीं, मेरा ही सनातन अंश है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥इस जीव-लोक में जीव के रूप में मेरा ही एक सनातन अंश है। प्रकृति में टिकी हुई पाँच इन्द्रियों को और छठे मन को यही अंश अपनी ओर खींचता है। (गीता 15.7)
यानी हर प्राणी उन्हीं का एक टुकड़ा है, पूरा नहीं, बस एक नन्हा हिस्सा। यह अंश जब कोई देह पकड़ता है और जब उसे छोड़ता है, तो अपने साथ इन इन्द्रियों और मन को वैसे ही ले चलता है जैसे हवा फूलों की महक को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह ले जाती है। कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक, इन सब के सहारे यही अंश इस संसार का सारा रस चखता रहता है। पर जिनकी आँख पर मोह का परदा पड़ा है, वे इस आते-जाते, भोगते हुए अंश को देख नहीं पाते। जो ज्ञान की आँख खोल लेते हैं, वही इसे पहचानते हैं।
सब हृदयों में बैठा हुआ
फिर श्रीकृष्ण अपनी व्यापकता खोल कर रख देते हैं। वे कहते हैं, सूरज में जो तेज़ सारे संसार को रौशन करता है, चाँद में और आग में जो रौशनी है, वह सब मेरी ही है। मैं ही धरती में समा कर सब प्राणियों को अपनी शक्ति से थामे रहता हूँ, और चाँद जैसा रस बन कर सारी वनस्पति को पालता हूँ। मैं ही हर देह में जठर की आग बन कर, प्राण और अपान से जुड़ कर, खाए हुए अन्न को पचाता हूँ। और सब से भीतर की बात वे इस तरह कहते हैं।
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥मैं सब के हृदय में बैठा हूँ। याद रखना, जानना और भूल जाना, ये सब मुझी से होते हैं। सारे वेद अंत में मुझे ही जानने के लिए हैं, वेदान्त का रचने वाला भी मैं हूँ और वेद को जानने वाला भी मैं। (गीता 15.15)
क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम
अंत में श्रीकृष्ण वह भेद खोलते हैं जिससे इस अध्याय का नाम बना है। वे कहते हैं, इस संसार में दो पुरुष हैं। एक क्षर है, यानी वह सब कुछ जो बदलता और मिटता रहता है, सारे शरीर, सारे नाम-रूप। और दूसरा अक्षर है, वह जो कभी नहीं बदलता। पर इन दोनों से परे एक तीसरा है, उत्तम पुरुष, जिसे परमात्मा कहते हैं, जो तीनों लोकों में समा कर सब को थामे हुए है। श्रीकृष्ण कहते हैं, क्योंकि मैं इस मिटने वाले क्षर से परे हूँ और उस न मिटने वाले अक्षर से भी ऊँचा हूँ, इसीलिए संसार और वेद, दोनों मुझे पुरुषोत्तम के नाम से जानते हैं। जो बिना किसी भ्रम के मुझे इस पुरुषोत्तम रूप में पहचान लेता है, वह मानो सब कुछ जान लेता है, और अपने पूरे मन से मेरी ओर ढल जाता है।
तो इस अध्याय को एक साँस में कहें, तो बात यह है, यह संसार एक उल्टा पेड़ है जिसकी असली जड़ ऊपर उस परम सत्य में है, और हम सब उसी परम के छोटे-छोटे अंश हैं। जड़ को पहचान लीजिए, और यह पेड़ अपने आप हल्का हो जाएगा।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता