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अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

कुरुक्षेत्र की धूल अभी पूरी तरह बैठी नहीं थी, और अर्जुन के भीतर का द्वंद्व भी। ऐसे ही एक क्षण में श्रीकृष्ण एक बात कहते हैं जो इस युद्ध से बहुत आगे की है। वे कहते हैं, हे अर्जुन, यह जो शरीर है, इसे शास्त्र ‘क्षेत्र’ कहते हैं, यानी एक खेत। और जो इस खेत को भीतर बैठ कर जानता-देखता है, उसे ‘क्षेत्रज्ञ’ कहते हैं। इसी एक नन्हे से भेद में सारे ज्ञान का बीज छिपा है।

खेत और उसका जानने वाला

सोचिए, एक किसान अपने खेत को जानता है। खेत में मिट्टी है, बीज है, फ़सल है, खर-पतवार है, पर किसान न मिट्टी है, न फ़सल। वह तो देखने वाला है, जोतने वाला है, जो सब के बीच खड़ा रहता है और हर चीज़ को पहचानता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, आप का यह शरीर भी ऐसा ही खेत है, और आप, असली आप, वह जानने वाले हैं जो इसे भीतर से देखता है। फिर वे एक और गहरी बात जोड़ते हैं, हे भारत, हर खेत का जो जानने वाला है, वह मैं ही हूँ। एक ही चेतना, अनगिनत खेतों में झाँकती हुई। इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को ठीक-ठीक पहचान लेना, उनके मत में यही सच्चा ज्ञान है।

इस खेत में क्या-क्या है

फिर श्रीकृष्ण इस खेत का पूरा नक़्शा खोल कर रख देते हैं। इसमें पाँच महाभूत हैं, यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इसमें अहंकार है, बुद्धि है, और वह अनदेखी मूल प्रकृति भी जिससे यह सब फूटता है। दस इन्द्रियाँ हैं और उनके साथ मन। पाँच विषय हैं जिनकी ओर ये इन्द्रियाँ दौड़ती हैं। और फिर इच्छा है, द्वेष है, सुख है, दुख है, देह का यह पूरा पिंड है, चेतना की झिलमिलाहट है, और टिके रहने की धृति है। यह सब मिल कर खेत बनता है। पर ध्यान दीजिए, इनमें से एक भी ‘जानने वाला’ नहीं है। ये सब तो उगती और मुरझाती फ़सलें हैं। जानने वाला इन सब से ज़रा पीछे, चुपचाप खड़ा देखता रहता है।

ज्ञान किसे कहते हैं

अब श्रीकृष्ण एक अनोखी बात कहते हैं। वे ज्ञान की परिभाषा किसी जानकारी से नहीं, बल्कि स्वभाव से देते हैं। सुनिए, वे कहते हैं, अभिमान का न होना, दिखावे का न होना, किसी को न सताना, धीरज, मन का सीधापन, गुरु की सच्ची सेवा, भीतर-बाहर की स्वच्छता, टिकाव, और अपने ऊपर अपना क़ाबू। विषयों के प्रति वैराग्य, अहंकार का पिघल जाना, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे तथा रोग में छिपे दुख को साफ़-साफ़ देख लेना। घर, बेटे और पत्नी के मोह में उलझ न जाना, हर हाल में एक सा मन, और उन परमेश्वर के प्रति अटूट, कभी न डगमगाने वाला प्रेम। एकान्त की चाह, और अपने भीतर के सत्य में ठहरे रहना। यही सब ज्ञान है, वे कहते हैं। और इससे उलटा जो कुछ है, वह अज्ञान है। यानी ज्ञान कोई पढ़ी हुई बात नहीं, जी हुई बात है।

जो जानने योग्य है

फिर वे उस तत्त्व की ओर इशारा करते हैं जिसे जान लेने पर अमरता मिलती है। वह न ‘है’ कहा जा सकता है, न ‘नहीं है’, क्योंकि वह इन दोनों शब्दों से बड़ा है। उसका न आदि है, न अंत। उसके हाथ-पैर हर ओर हैं, आँखें और सिर हर ओर हैं, कान हर ओर हैं, क्योंकि वह सब को घेर कर बैठा है। उसकी अपनी कोई इन्द्रिय नहीं, फिर भी हर इन्द्रिय उसी की रौशनी से काम करती है। वह किसी से बँधा नहीं, फिर भी सब को थामे हुए है। वह चराचर सब के बाहर भी है और भीतर भी, बहुत दूर भी और बहुत पास भी। वह एक है, पर अनगिनत प्राणियों में बँटा हुआ सा दिखता है। वह हर अँधेरे के पार की रौशनी है, और वह हर हृदय में बैठा हुआ है।

प्रकृति और पुरुष

अब श्रीकृष्ण दो शब्द सामने रखते हैं, प्रकृति और पुरुष। दोनों अनादि हैं। प्रकृति वह है जो सारा करना-धरना करती है, शरीर गढ़ती है, इन्द्रियाँ चलाती है, कारण और कार्य का सारा खेल रचती है। और पुरुष वह है जो इस खेल में बैठ कर सुख-दुख का स्वाद लेता है। जब यही पुरुष प्रकृति के गुणों से चिपक जाता है, तभी अच्छी-बुरी योनियों में उसका बार-बार जन्म होता है। पर इसी देह में एक और पुरुष भी बसा है, परम पुरुष, जो केवल साक्षी है, अनुमति देने वाला है, सब को धारण करने वाला, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा। श्रीकृष्ण कहते हैं, जो इस प्रकृति और पुरुष को उसके गुणों समेत ठीक से जान लेता है, वह चाहे जैसे भी जीता हो, फिर से जन्म नहीं लेता।

सब में एक ही को देखना

यहाँ तक पहुँच कर श्रीकृष्ण रास्ते बताते हैं। कोई ध्यान लगा कर अपने भीतर उस आत्मा को देख लेता है, कोई विचार और विवेक से, कोई निष्काम कर्म से, और कोई तो बस सुन कर, श्रद्धा से उसकी उपासना करते-करते उस पार उतर जाता है। और फिर आते हैं इस अध्याय के वे शब्द जिन्हें याद रख लेना ही काफ़ी है।

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥

जो सब प्राणियों में एक ही परमेश्वर को समान रूप से बसा हुआ देखता है, जो मिटने वाले हर रूप के भीतर उस न मिटने वाले को देख लेता है, सच में तो वही देखता है। (गीता 13.27)

इस पंक्ति में एक ही क्रिया दो बार आती है, देखता है, देखता है। पहली बार का देखना आँखों का है, दूसरी बार का देखना आत्मा का। जो सब में एक ही परमात्मा को देख लेता है, वह अपने ही हाथों अपना नाश नहीं करता, और सहज ही परम गति को पा जाता है। जैसे एक अकेला सूरज सारे संसार को रौशन कर देता है, वैसे ही खेत का यह जानने वाला अपने पूरे खेत को भीतर से रौशन रखता है। और जैसे आकाश हर जगह होते हुए भी किसी चीज़ से नहीं लिपटता, वैसे ही यह आत्मा देह में रहते हुए भी उसके सुख-दुख से नहीं लिपटती। जो ज्ञान की इस आँख से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद पहचान लेते हैं, वे प्रकृति के बंधन से छूट कर उसी परम की ओर चल पड़ते हैं।

तो इस पूरे अध्याय को एक साँस में कहें, तो बात इतनी सी है, यह देह एक खेत है, और इसे देखने वाला कोई और है। इस एक फ़र्क़ को जी लेना ही ज्ञान की पहली किरण है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 34 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/13/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

13.1इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते

श्रीभगवानुवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥1॥

idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetram ity abhidhīyate |
etad yo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ

इदम्
यह
शरीरम्
शरीर
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
क्षेत्रम्
क्षेत्र
इति
इस नाम से
अभिधीयते
कहा जाता है
एतत्
इसको
यः
जो
वेत्ति
जानता है
तम्
उसको
प्राहुः
कहते हैं
क्षेत्रज्ञः
क्षेत्रज्ञ
इति
इस नाम से
तद्विदः
इन दोनों को जानने वाले ज्ञानी

अन्वय: कौन्तेय इदम् शरीरम् क्षेत्रम् इति अभिधीयते । एतत् यः वेत्ति तम् तद्विदः क्षेत्रज्ञः इति प्राहुः ।

हे कुन्तीपुत्र, यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है। जो इसको जानता है, उसको इन दोनों के तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी क्षेत्रज्ञ कहते हैं।

13.2क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥2॥

kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata |
kṣetrakṣetrajñayor jñānaṃ yat taj jñānaṃ mataṃ mama

क्षेत्रज्ञम्
क्षेत्रज्ञ
च
और
अपि
भी
माम्
मुझको
विद्धि
जानिए
सर्वक्षेत्रेषु
सब क्षेत्रों में
भारत
हे भारत
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का
ज्ञानम्
ज्ञान
यत्
जो
तत्
वह
ज्ञानम्
ज्ञान
मतम्
मत है
मम
मेरा

अन्वय: भारत सर्वक्षेत्रेषु क्षेत्रज्ञम् च अपि माम् विद्धि । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः यत् ज्ञानम् तत् ज्ञानम् मम मतम् ।

हे भारत, सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझको ही जानिए। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।

13.3तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥3॥

tat kṣetraṃ yac ca yādṛk ca yadvikāri yataś ca yat |
sa ca yo yatprabhāvaś ca tat samāsena me śṛṇu

तत्
वह
क्षेत्रम्
क्षेत्र
यत्
जो है
च
और
यादृक्
जैसा है
च
और
यद्विकारि
जिन विकारों वाला है
यतः
जिससे
च
और
यत्
जो हुआ है
सः
वह क्षेत्रज्ञ
च
और
यः
जो है
यत्प्रभावः
जिस प्रभाव वाला है
च
और
तत्
वह सब
समासेन
संक्षेप से
मे
मुझसे
शृणु
सुनिए

अन्वय: तत् क्षेत्रम् यत् च यादृक् च यद्विकारि च यतः यत् च सः च यः यत्प्रभावः च तत् समासेन मे शृणु ।

वह क्षेत्र जो है और जैसा है, जिन विकारों वाला है और जिससे जो हुआ है, तथा वह क्षेत्रज्ञ जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह सब संक्षेप में मुझसे सुनिए।

13.4ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥4॥

ṛṣibhir bahudhā gītaṃ chandobhir vividhaiḥ pṛthak |
brahmasūtrapadaiś caiva hetumadbhir viniścitaiḥ

ऋषिभिः
ऋषियों द्वारा
बहुधा
बहुत प्रकार से
गीतम्
गाया गया है
छन्दोभिः
वेदमन्त्रों द्वारा
विविधैः
विविध
पृथक्
अलग अलग
ब्रह्मसूत्रपदैः
ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा
च
और
एव
भी
हेतुमद्भिः
युक्तियुक्त
विनिश्चितैः
भली प्रकार निश्चित किये हुए

अन्वय: ऋषिभिः बहुधा गीतम् विविधैः छन्दोभिः पृथक् गीतम् हेतुमद्भिः विनिश्चितैः ब्रह्मसूत्रपदैः च एव गीतम् ।

यह तत्त्व ऋषियों ने बहुत प्रकार से गाया है, विविध वेदमन्त्रों ने अलग अलग कहा है, और युक्तियुक्त तथा भली प्रकार निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्र के पदों ने भी कहा है।

13.5महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥5॥

mahābhūtāny ahaṃkāro buddhir avyaktam eva ca |
indriyāṇi daśaikaṃ ca pañca cendriyagocarāḥ

महाभूतानि
पाँच महाभूत
अहंकारः
अहंकार
बुद्धिः
बुद्धि
अव्यक्तम्
मूल प्रकृति
एव
भी
च
और
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
दश
दस
एकम्
एक मन
च
और
पञ्च
पाँच
च
और
इन्द्रियगोचराः
इन्द्रियों के विषय

अन्वय: महाभूतानि अहंकारः बुद्धिः अव्यक्तम् एव च दश इन्द्रियाणि एकम् च पञ्च इन्द्रियगोचराः च ।

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी, दस इन्द्रियाँ, एक मन, और इन्द्रियों के पाँच विषय।

13.6इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥6॥

icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṃghātaś cetanā dhṛtiḥ |
etat kṣetraṃ samāsena savikāram udāhṛtam

इच्छा
इच्छा
द्वेषः
द्वेष
सुखम्
सुख
दुःखम्
दुःख
संघातः
स्थूल देह का पिण्ड
चेतना
चेतना
धृतिः
धारण शक्ति
एतत्
यह
क्षेत्रम्
क्षेत्र
समासेन
संक्षेप में
सविकारम्
विकारों के सहित
उदाहृतम्
कहा गया है

अन्वय: इच्छा द्वेषः सुखम् दुःखम् संघातः चेतना धृतिः एतत् क्षेत्रम् सविकारम् समासेन उदाहृतम् ।

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धारण शक्ति, इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।

13.7अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥7॥

amānitvam adambhitvam ahiṃsā kṣāntir ārjavam |
ācāryopāsanaṃ śaucaṃ sthairyam ātmavinigrahaḥ

अमानित्वम्
मान का अभाव
अदम्भित्वम्
दम्भ का अभाव
अहिंसा
हिंसा न करना
क्षान्तिः
क्षमा
आर्जवम्
सरलता
आचार्योपासनम्
गुरु की सेवा
शौचम्
शुद्धि
स्थैर्यम्
स्थिरता
आत्मविनिग्रहः
मन का संयम

अन्वय: अमानित्वम् अदम्भित्वम् अहिंसा क्षान्तिः आर्जवम् आचार्योपासनम् शौचम् स्थैर्यम् आत्मविनिग्रहः ।

मान का अभाव, दम्भ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, भीतर बाहर की शुद्धि, स्थिरता और मन का संयम।

13.8इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥8॥

indriyārtheṣu vairāgyam anahaṃkāra eva ca |
janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam

इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रियों के विषयों में
वैराग्यम्
वैराग्य
अनहंकारः
अहंकार का अभाव
एव
भी
च
और
जन्म
जन्म
मृत्यु
मृत्यु
जरा
वृद्धावस्था
व्याधि
रोग
दुःख
दुःख
दोष
इन दोषों का
अनुदर्शनम्
बार बार विचार करना

अन्वय: इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहंकारः एव च जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ।

इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य और अहंकार का अभाव भी, तथा जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था, रोग और दुःख रूप दोषों का बार बार विचार करना।

13.9असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥9॥

asaktir anabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu |
nityaṃ ca samacittatvam iṣṭāniṣṭopapattiṣu

असक्तिः
आसक्ति का अभाव
अनभिष्वङ्गः
ममता का अभाव
पुत्रदारगृहादिषु
पुत्र, स्त्री, घर आदि में
नित्यम्
सदा
च
और
समचित्तत्वम्
चित्त की समता
इष्टानिष्टोपपत्तिषु
प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में

अन्वय: असक्तिः पुत्रदारगृहादिषु अनभिष्वङ्गः इष्टानिष्टोपपत्तिषु च नित्यम् समचित्तत्वम् ।

आसक्ति का अभाव, पुत्र, स्त्री, घर आदि में ममता का अभाव, और प्रिय तथा अप्रिय की प्राप्ति में सदा चित्त की समता।

13.10मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥10॥

mayi cānanyayogena bhaktir avyabhicāriṇī |
viviktadeśasevitvam aratir janasaṃsadi

मयि
मुझमें
च
और
अनन्ययोगेन
अनन्य योग से
भक्तिः
भक्ति
अव्यभिचारिणी
कभी न टूटने वाली
विविक्तदेशसेवित्वम्
एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव
अरतिः
प्रीति का अभाव
जनसंसदि
लोगों के समुदाय में

अन्वय: मयि च अनन्ययोगेन अव्यभिचारिणी भक्तिः विविक्तदेशसेवित्वम् जनसंसदि अरतिः ।

मुझमें अनन्य योग से कभी न टूटने वाली भक्ति, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव, और लोगों के समुदाय में प्रीति का अभाव।

13.11अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥11॥

adhyātmajñānanityatvaṃ tattvajñānārthadarśanam |
etaj jñānam iti proktam ajñānaṃ yad ato ’nyathā

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम्
अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति
तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्
तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन
एतत्
यह सब
ज्ञानम्
ज्ञान
इति
ऐसा
प्रोक्तम्
कहा गया है
अज्ञानम्
अज्ञान
यत्
जो
अतः
इससे
अन्यथा
विपरीत है

अन्वय: अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् एतत् ज्ञानम् इति प्रोक्तम् । यत् अतः अन्यथा तत् अज्ञानम् ।

अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब ज्ञान कहा गया है। जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।

13.12ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥12॥

jñeyaṃ yat tat pravakṣyāmi yaj jñātvāmṛtam aśnute |
anādimat paraṃ brahma na sat tan nāsad ucyate

ज्ञेयम्
जानने योग्य
यत्
जो
तत्
वह
प्रवक्ष्यामि
मैं भली प्रकार कहूँगा
यत्
जिसको
ज्ञात्वा
जानकर
अमृतम्
अमरता
अश्नुते
प्राप्त करता है
अनादिमत्
आदि रहित
परम्
परम
ब्रह्म
ब्रह्म
न
न
सत्
सत्
तत्
वह
न
न
असत्
असत्
उच्यते
कहा जाता है

अन्वय: यत् ज्ञेयम् तत् प्रवक्ष्यामि यत् ज्ञात्वा अमृतम् अश्नुते । तत् अनादिमत् परम् ब्रह्म न सत् न असत् उच्यते ।

जो जानने योग्य है और जिसको जानकर मनुष्य अमरता पाता है, उसको मैं भली प्रकार कहूँगा। वह आदि रहित परम ब्रह्म न सत् कहा जाता है, न असत्।

13.13सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम्

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥13॥

sarvataḥpāṇipādaṃ tat sarvatokṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimal loke sarvam āvṛtya tiṣṭhati

सर्वतःपाणिपादम्
सब ओर हाथ पैर वाला
तत्
वह
सर्वतोक्षिशिरोमुखम्
सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला
सर्वतःश्रुतिमत्
सब ओर कान वाला
लोके
संसार में
सर्वम्
सबको
आवृत्य
व्याप्त करके
तिष्ठति
स्थित है

अन्वय: तत् सर्वतःपाणिपादम् सर्वतोक्षिशिरोमुखम् सर्वतःश्रुतिमत् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति ।

वह सब ओर हाथ पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला, तथा सब ओर कान वाला है। वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।

13.14सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥14॥

sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam |
asaktaṃ sarvabhṛc caiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca

सर्वेन्द्रियगुणाभासम्
सब इन्द्रियों के विषयों को प्रकाशित करने वाला
सर्वेन्द्रियविवर्जितम्
सब इन्द्रियों से रहित
असक्तम्
आसक्ति रहित
सर्वभृत्
सबका धारण पोषण करने वाला
च
और
एव
ही
निर्गुणम्
गुणों से रहित
गुणभोक्तृ
गुणों को भोगने वाला
च
और

अन्वय: तत् सर्वेन्द्रियगुणाभासम् सर्वेन्द्रियविवर्जितम् असक्तम् च एव सर्वभृत् निर्गुणम् च गुणभोक्तृ ।

वह सब इन्द्रियों के विषयों को प्रकाशित करने वाला है और सब इन्द्रियों से रहित है। वह आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण पोषण करने वाला है, और गुणों से रहित होने पर भी गुणों को भोगने वाला है।

13.15बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥15॥

bahir antaś ca bhūtānām acaraṃ caram eva ca |
sūkṣmatvāt tad avijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tat

बहिः
बाहर
अन्तः
भीतर
च
और
भूतानाम्
प्राणियों के
अचरम्
अचल
चरम्
चल
एव
भी
च
और
सूक्ष्मत्वात्
सूक्ष्म होने के कारण
तत्
वह
अविज्ञेयम्
जानने में न आने वाला
दूरस्थम्
दूर स्थित
च
और
अन्तिके
समीप
च
और
तत्
वह

अन्वय: तत् भूतानाम् बहिः अन्तः च अचरम् चरम् एव च । तत् सूक्ष्मत्वात् अविज्ञेयम् दूरस्थम् च अन्तिके च ।

वह प्राणियों के बाहर और भीतर है, अचल और चल भी है। सूक्ष्म होने के कारण वह जानने में नहीं आता, वह दूर भी स्थित है और समीप भी।

13.16अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥16॥

avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktam iva ca sthitam |
bhūtabhartṛ ca taj jñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca

अविभक्तम्
विभाग रहित
च
और
भूतेषु
प्राणियों में
विभक्तम्
विभक्त
इव
जैसा
च
और
स्थितम्
स्थित
भूतभर्तृ
प्राणियों का धारण पोषण करने वाला
च
और
तत्
वह
ज्ञेयम्
जानने योग्य
ग्रसिष्णु
संहार करने वाला
प्रभविष्णु
उत्पन्न करने वाला
च
और

अन्वय: तत् ज्ञेयम् अविभक्तम् च भूतेषु विभक्तम् इव च स्थितम् भूतभर्तृ च ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ।

वह जानने योग्य तत्त्व विभाग रहित है, फिर भी प्राणियों में विभक्त जैसा स्थित है। वही प्राणियों का धारण पोषण करने वाला, संहार करने वाला और उत्पन्न करने वाला है।

13.17ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥17॥

jyotiṣām api taj jyotis tamasaḥ param ucyate |
jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃ hṛdi sarvasya viṣṭhitam

ज्योतिषाम्
ज्योतियों की
अपि
भी
तत्
वह
ज्योतिः
ज्योति
तमसः
अन्धकार से
परम्
परे
उच्यते
कहा जाता है
ज्ञानम्
ज्ञान स्वरूप
ज्ञेयम्
जानने योग्य
ज्ञानगम्यम्
ज्ञान से प्राप्त होने वाला
हृदि
हृदय में
सर्वस्य
सबके
विष्ठितम्
विशेष रूप से स्थित

अन्वय: तत् ज्योतिषाम् अपि ज्योतिः तमसः परम् उच्यते । तत् ज्ञानम् ज्ञेयम् ज्ञानगम्यम् सर्वस्य हृदि विष्ठितम् ।

वह ज्योतियों की भी ज्योति है और अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान स्वरूप, जानने योग्य और ज्ञान से प्राप्त होने वाला है, तथा सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।

13.18इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥18॥

iti kṣetraṃ tathā jñānaṃ jñeyaṃ coktaṃ samāsataḥ |
madbhakta etad vijñāya madbhāvāyopapadyate

इति
इस प्रकार
क्षेत्रम्
क्षेत्र
तथा
तथा
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञेयम्
जानने योग्य
च
और
उक्तम्
कहा गया
समासतः
संक्षेप में
मद्भक्तः
मेरा भक्त
एतत्
इसको
विज्ञाय
तत्त्व से जानकर
मद्भावाय
मेरे स्वरूप को
उपपद्यते
प्राप्त होता है

अन्वय: इति क्षेत्रम् तथा ज्ञानम् ज्ञेयम् च समासतः उक्तम् । मद्भक्तः एतत् विज्ञाय मद्भावाय उपपद्यते ।

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और जानने योग्य तत्त्व संक्षेप में कहे गये। मेरा भक्त इसको तत्त्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

13.19प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥19॥

prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhy anādī ubhāv api |
vikārāṃś ca guṇāṃś caiva viddhi prakṛtisaṃbhavān

प्रकृतिम्
प्रकृति को
पुरुषम्
पुरुष को
च
और
एव
भी
विद्धि
जानिए
अनादी
आदि रहित
उभौ
दोनों को
अपि
भी
विकारान्
विकारों को
च
और
गुणान्
गुणों को
च
और
एव
भी
विद्धि
जानिए
प्रकृतिसंभवान्
प्रकृति से उत्पन्न

अन्वय: प्रकृतिम् पुरुषम् च एव उभौ अपि अनादी विद्धि । विकारान् च गुणान् च एव प्रकृतिसंभवान् विद्धि ।

प्रकृति और पुरुष, इन दोनों को ही आप आदि रहित जानिए। विकारों और गुणों को भी प्रकृति से उत्पन्न जानिए।

13.20कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥20॥

kāryakāraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtir ucyate |
puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve hetur ucyate

कार्यकारणकर्तृत्वे
कार्य और कारण को उत्पन्न करने में
हेतुः
कारण
प्रकृतिः
प्रकृति
उच्यते
कही जाती है
पुरुषः
पुरुष
सुखदुःखानाम्
सुख और दुःखों के
भोक्तृत्वे
भोगने में
हेतुः
कारण
उच्यते
कहा जाता है

अन्वय: कार्यकारणकर्तृत्वे प्रकृतिः हेतुः उच्यते । सुखदुःखानाम् भोक्तृत्वे पुरुषः हेतुः उच्यते ।

कार्य और कारण को उत्पन्न करने में प्रकृति कारण कही जाती है। सुख और दुःखों के भोगने में पुरुष कारण कहा जाता है।

13.21पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥21॥

puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijān guṇān |
kāraṇaṃ guṇasaṅgo ’sya sadasadyonijanmasu

पुरुषः
पुरुष
प्रकृतिस्थः
प्रकृति में स्थित
हि
ही
भुङ्क्ते
भोगता है
प्रकृतिजान्
प्रकृति से उत्पन्न
गुणान्
गुणों को
कारणम्
कारण है
गुणसङ्गः
गुणों का संग
अस्य
इस पुरुष के
सदसद्योनिजन्मसु
अच्छी और बुरी योनियों में जन्म का

अन्वय: प्रकृतिस्थः हि पुरुषः प्रकृतिजान् गुणान् भुङ्क्ते । गुणसङ्गः अस्य सदसद्योनिजन्मसु कारणम् ।

प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। गुणों का संग ही इसके अच्छी और बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।

13.22उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥22॥

upadraṣṭānumantā ca bhartā bhoktā maheśvaraḥ |
paramātmeti cāpy ukto dehe ’smin puruṣaḥ paraḥ

उपद्रष्टा
समीप रहकर देखने वाला
अनुमन्ता
अनुमति देने वाला
च
और
भर्ता
धारण पोषण करने वाला
भोक्ता
भोगने वाला
महेश्वरः
महान ईश्वर
परमात्मा
परमात्मा
इति
इस प्रकार
च
और
अपि
भी
उक्तः
कहा गया है
देहे
देह में
अस्मिन्
इस
पुरुषः
पुरुष
परः
परम

अन्वय: अस्मिन् देहे परः पुरुषः उपद्रष्टा अनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः परमात्मा इति च अपि उक्तः ।

इस देह में स्थित परम पुरुष समीप रहकर देखने वाला, अनुमति देने वाला, धारण पोषण करने वाला, भोगने वाला और महान ईश्वर है। उसे परमात्मा भी कहा गया है।

13.23य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥23॥

ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha |
sarvathā vartamāno ’pi na sa bhūyo ’bhijāyate

यः
जो
एवम्
इस प्रकार
वेत्ति
जानता है
पुरुषम्
पुरुष को
प्रकृतिम्
प्रकृति को
च
और
गुणैः
गुणों के
सह
सहित
सर्वथा
सब प्रकार से
वर्तमानः
बरतता हुआ
अपि
भी
न
नहीं
सः
वह
भूयः
फिर
अभिजायते
जन्मता है

अन्वय: यः एवम् पुरुषम् गुणैः सह प्रकृतिम् च वेत्ति सः सर्वथा वर्तमानः अपि भूयः न अभिजायते ।

जो इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जानता है, वह सब प्रकार से बरतता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।

13.24ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति के चिदात्मानमात्मना

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति के चिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥24॥

dhyānenātmani paśyanti ke cid ātmānam ātmanā |
anye sāṃkhyena yogena karmayogena cāpare

ध्यानेन
ध्यान से
आत्मनि
हृदय में
पश्यन्ति
देखते हैं
केचित्
कुछ लोग
आत्मानम्
आत्मा को
आत्मना
शुद्ध मन से
अन्ये
दूसरे
सांख्येन
ज्ञान रूप
योगेन
योग से
कर्मयोगेन
कर्मयोग से
च
और
अपरे
अन्य लोग

अन्वय: केचित् ध्यानेन आत्मना आत्मनि आत्मानम् पश्यन्ति । अन्ये सांख्येन योगेन च अपरे कर्मयोगेन ।

कुछ लोग ध्यान से शुद्ध मन द्वारा हृदय में आत्मा को देखते हैं। दूसरे ज्ञानयोग से और अन्य लोग कर्मयोग से देखते हैं।

13.25अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥25॥

anye tv evam ajānantaḥ śrutvānyebhya upāsate |
te ’pi cātitaranty eva mṛtyuṃ śrutiparāyaṇāḥ

अन्ये
दूसरे
तु
परन्तु
एवम्
इस प्रकार
अजानन्तः
न जानते हुए
श्रुत्वा
सुनकर
अन्येभ्यः
दूसरों से
उपासते
उपासना करते हैं
ते
वे
अपि
भी
च
और
अतितरन्ति
पार कर जाते हैं
एव
निश्चय ही
मृत्युम्
मृत्यु को
श्रुतिपरायणाः
सुने हुए पर श्रद्धा रखने वाले

अन्वय: अन्ये तु एवम् अजानन्तः अन्येभ्यः श्रुत्वा उपासते । श्रुतिपरायणाः ते अपि च मृत्युम् अतितरन्ति एव ।

परन्तु दूसरे लोग इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं। सुने हुए पर श्रद्धा रखने वाले वे भी निश्चय ही मृत्यु को पार कर जाते हैं।

13.26यावत्संजायते किं चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्

यावत्संजायते किं चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥26॥

yāvat saṃjāyate kiṃ cit sattvaṃ sthāvarajaṅgamam |
kṣetrakṣetrajñasaṃyogāt tad viddhi bharatarṣabha

यावत्
जितने
संजायते
उत्पन्न होते हैं
किञ्चित्
कोई भी
सत्त्वम्
प्राणी
स्थावरजङ्गमम्
स्थावर और जंगम
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से
तत्
उन सबको
विद्धि
जानिए
भरतर्षभ
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ

अन्वय: भरतर्षभ यावत् किञ्चित् स्थावरजङ्गमम् सत्त्वम् संजायते तत् क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् विद्धि ।

हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ, जितने भी स्थावर और जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको आप क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुआ जानिए।

13.27समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥27॥

samaṃ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhantaṃ parameśvaram |
vinaśyatsv avinaśyantaṃ yaḥ paśyati sa paśyati

समम्
समभाव से
सर्वेषु
सब
भूतेषु
प्राणियों में
तिष्ठन्तम्
स्थित
परमेश्वरम्
परमेश्वर को
विनश्यत्सु
नष्ट होते हुओं में
अविनश्यन्तम्
नष्ट न होने वाले को
यः
जो
पश्यति
देखता है
सः
वही
पश्यति
देखता है

अन्वय: यः सर्वेषु भूतेषु समम् तिष्ठन्तम् विनश्यत्सु अविनश्यन्तम् परमेश्वरम् पश्यति सः पश्यति ।

जो सब प्राणियों में समभाव से स्थित परमेश्वर को, नष्ट होते हुए इन प्राणियों में नष्ट न होने वाले को देखता है, वही देखता है।

13.28समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥28॥

samaṃ paśyan hi sarvatra samavasthitam īśvaram |
na hinasty ātmanātmānaṃ tato yāti parāṃ gatim

समम्
समभाव से
पश्यन्
देखता हुआ
हि
क्योंकि
सर्वत्र
सब में
समवस्थितम्
समान रूप से स्थित
ईश्वरम्
ईश्वर को
न
नहीं
हिनस्ति
नष्ट करता
आत्मना
अपने द्वारा
आत्मानम्
अपने को
ततः
इससे
याति
जाता है
पराम्
परम
गतिम्
गति को

अन्वय: हि सर्वत्र समवस्थितम् ईश्वरम् समम् पश्यन् आत्मना आत्मानम् न हिनस्ति ततः पराम् गतिम् याति ।

क्योंकि सब में समान रूप से स्थित ईश्वर को समभाव से देखता हुआ मनुष्य अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता। इससे वह परम गति को जाता है।

13.29प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥29॥

prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ |
yaḥ paśyati tathātmānam akartāraṃ sa paśyati

प्रकृत्या
प्रकृति द्वारा
एव
ही
च
और
कर्माणि
कर्म
क्रियमाणानि
किये जाते हुए
सर्वशः
सब प्रकार से
यः
जो
पश्यति
देखता है
तथा
तथा
आत्मानम्
आत्मा को
अकर्तारम्
अकर्ता
सः
वही
पश्यति
देखता है

अन्वय: यः च सर्वशः कर्माणि प्रकृत्या एव क्रियमाणानि तथा आत्मानम् अकर्तारम् पश्यति सः पश्यति ।

जो सब प्रकार से कर्मों को प्रकृति द्वारा ही किये जाते हुए देखता है, और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही देखता है।

13.30यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥30॥

yadā bhūtapṛthagbhāvam ekastham anupaśyati |
tata eva ca vistāraṃ brahma saṃpadyate tadā

यदा
जब
भूतपृथग्भावम्
प्राणियों के अलग अलग भाव को
एकस्थम्
एक में स्थित
अनुपश्यति
देखता है
ततः
उसी से
एव
ही
च
और
विस्तारम्
विस्तार को
ब्रह्म
ब्रह्म को
संपद्यते
प्राप्त होता है
तदा
तब

अन्वय: यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थम् ततः एव च विस्तारम् अनुपश्यति तदा ब्रह्म संपद्यते ।

जब वह प्राणियों के अलग अलग भाव को एक में ही स्थित देखता है और उसी एक से सबका विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

13.31अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥31॥

anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ |
śarīrastho ’pi kaunteya na karoti na lipyate

अनादित्वात्
आदि रहित होने से
निर्गुणत्वात्
गुणों से रहित होने से
परमात्मा
परमात्मा
अयम्
यह
अव्ययः
अविनाशी
शरीरस्थः
शरीर में स्थित
अपि
भी
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न
नहीं
करोति
करता
न
नहीं
लिप्यते
लिप्त होता

अन्वय: कौन्तेय अयम् अव्ययः परमात्मा अनादित्वात् निर्गुणत्वात् शरीरस्थः अपि न करोति न लिप्यते ।

हे कुन्तीपुत्र, यह अविनाशी परमात्मा आदि रहित और गुणों से रहित होने के कारण शरीर में स्थित होकर भी न कुछ करता है, न लिप्त होता है।

13.32यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥32॥

yathā sarvagataṃ saukṣmyād ākāśaṃ nopalipyate |
sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate

यथा
जैसे
सर्वगतम्
सब में व्याप्त
सौक्ष्म्यात्
सूक्ष्म होने के कारण
आकाशम्
आकाश
न
नहीं
उपलिप्यते
लिप्त होता
सर्वत्र
सब जगह
अवस्थितः
स्थित
देहे
देह में
तथा
वैसे ही
आत्मा
आत्मा
न
नहीं
उपलिप्यते
लिप्त होता

अन्वय: यथा सर्वगतम् आकाशम् सौक्ष्म्यात् न उपलिप्यते तथा देहे सर्वत्र अवस्थितः आत्मा न उपलिप्यते ।

जैसे सब में व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सब जगह स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।

13.33यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥33॥

yathā prakāśayaty ekaḥ kṛtsnaṃ lokam imaṃ raviḥ |
kṣetraṃ kṣetrī tathā kṛtsnaṃ prakāśayati bhārata

यथा
जैसे
प्रकाशयति
प्रकाशित करता है
एकः
एक
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
लोकम्
लोक को
इमम्
इस
रविः
सूर्य
क्षेत्रम्
क्षेत्र को
क्षेत्री
क्षेत्रज्ञ
तथा
वैसे ही
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
प्रकाशयति
प्रकाशित करता है
भारत
हे भारत

अन्वय: भारत यथा एकः रविः इमम् कृत्स्नम् लोकम् प्रकाशयति तथा क्षेत्री कृत्स्नम् क्षेत्रम् प्रकाशयति ।

हे भारत, जैसे एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।

13.34क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥34॥

kṣetrakṣetrajñayor evam antaraṃ jñānacakṣuṣā |
bhūtaprakṛtimokṣaṃ ca ye vidur yānti te param

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के
एवम्
इस प्रकार
अन्तरम्
भेद को
ज्ञानचक्षुषा
ज्ञान के नेत्र से
भूतप्रकृतिमोक्षम्
कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को
च
और
ये
जो
विदुः
जानते हैं
यान्ति
जाते हैं
ते
वे
परम्
परम को

अन्वय: ये एवम् ज्ञानचक्षुषा क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः अन्तरम् भूतप्रकृतिमोक्षम् च विदुः ते परम् यान्ति ।

जो इस प्रकार ज्ञान के नेत्र से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जानते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं।