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अध्याय 16: दैवासुर संपद् विभाग योग

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गीता अब अपने आख़िरी मोड़ों की ओर बढ़ रही है। कुरुक्षेत्र की धूल अभी बैठी नहीं है, पर अर्जुन के भीतर का तूफ़ान थमने लगा है। ऐसे में श्रीकृष्ण एक ऐसा दर्पण उनके सामने रख देते हैं जिसमें हर मनुष्य अपना असली चेहरा देख सकता है। यह अध्याय बाहरी शत्रुओं की बात नहीं करता। यह भीतर की दो प्रवृत्तियों की बात करता है, दैवी और आसुरी, जो हर हृदय में साथ-साथ बसती हैं।

दो स्वभाव, एक हृदय

श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में प्राणियों की रचना दो ढंग की हुई है। एक वह जो भीतर के प्रकाश को बढ़ाता है, और दूसरा वह जो अँधेरे को गाढ़ा करता है। इन्हें उन्होंने दैवी संपदा और आसुरी संपदा कहा। यह कोई जन्म की मुहर नहीं, न किसी कुल का ठप्पा। यह तो रोज़ के छोटे-छोटे चुनावों से बनने वाला स्वभाव है। कोई मनुष्य पूरी तरह देवता नहीं होता, न कोई पूरी तरह असुर। दोनों बीज हर छाती में पड़े रहते हैं, और जिसे हम सींचते हैं वही पनपता है।

दैवी संपदा के लक्षण

फिर वे उन गुणों की एक लंबी माला पिरोते हैं जो देवत्व की ओर ले जाती है। निर्भयता, अंतःकरण की स्वच्छता, और ज्ञान तथा योग में दृढ़ता। दान देने का खुला हाथ, इंद्रियों पर संयम, यज्ञ, स्वाध्याय और तप। सरलता, अहिंसा, सत्य और क्रोध का न होना। त्याग, भीतरी शांति, और किसी की चुगली न करने की टेक। प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, कोमलता, और अनुचित के सामने झुक जाने वाली लज्जा। चंचलता का अभाव, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से द्रोह न रखना, और अपने बड़प्पन का अभिमान न पालना।

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे भारत, ये सारे लक्षण उस मनुष्य में उगते हैं जो दैवी संपदा लेकर चलता है। ध्यान देने की बात यह है कि ये सब एक साथ किसी में उतर नहीं आते। हर गुण अपने आप में एक अभ्यास है, एक-एक करके सींचने की चीज़। आज निर्भयता का एक कदम, कल क्षमा का एक घूँट, परसों किसी की चुगली को होंठों पर आने से रोक लेना, यों ही भीतर का दीया धीरे-धीरे बड़ा होता जाता है। कोई इन्हें एक झटके में नहीं पा लेता, पर हर छोटा प्रयास इसी माला में एक और मनका जोड़ देता है।

इस सूची में एक बात छिपी है जिसे चूकना नहीं चाहिए। ये गुण किसी मंदिर या तीर्थ के नहीं, रोज़मर्रा के बरताव के हैं। कैसे बोलते हैं, किसका बोझ उठाते हैं, ग़ुस्से में क्या करते हैं, दूसरों की भूल पर कितना झुक जाते हैं। श्रीकृष्ण देवत्व को आकाश से उतारकर हमारी दिनचर्या में रख देते हैं। दैवी संपदा मुक्ति की ओर ले जाती है, वह मनुष्य को हल्का करती जाती है, जबकि आसुरी संपदा एक के बाद एक बंधन कसती है। इसीलिए वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि आप दैवी स्वभाव लेकर जन्मे हैं, इस भार से घबराने की कोई बात नहीं।

आसुरी वृत्ति की पहचान

अब वे दूसरी ओर मुड़ते हैं। आसुरी स्वभाव के लक्षण गिनती में थोड़े हैं, पर गहरे हैं। दिखावा, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान। ये गुण मनुष्य को खोलते नहीं, बाँध देते हैं। जहाँ दैवी संपदा मुक्ति की ओर ले जाती है, वहीं आसुरी वृत्ति एक के बाद एक जंजीर पहनाती चली जाती है।

फिर श्रीकृष्ण आसुरी मन की पूरी दुनिया का नक्शा खींचते हैं, और वह नक्शा आज भी उतना ही पहचाना हुआ लगता है। ऐसा मनुष्य कहता है कि यह जगत असत्य है, इसका कोई आधार नहीं, कोई ईश्वर इसे चला नहीं रहा, यह तो बस काम और वासना के मेल से पैदा हुआ है, और इससे आगे कुछ नहीं। इसी सोच के सहारे वह अतृप्त इच्छाओं से भरा, दंभ और मद में डूबा, गलत को कसकर पकड़े हुए चलता रहता है।

उसके भीतर का राग सुनिए, ‘आज मैंने यह पा लिया, कल वह इच्छा भी पूरी कर लूँगा। यह धन मेरा है, वह भी मेरा हो जाएगा। यह शत्रु मैंने मार गिराया, बाक़ी को भी निपटा दूँगा। मैं ही स्वामी हूँ, मैं ही भोगने वाला, मैं ही सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ।’ ऐसा मनुष्य यज्ञ भी करता है तो केवल नाम के लिए, दिखावे के लिए, बिना किसी सच्ची श्रद्धा के।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा मन सैकड़ों आशाओं की डोरियों में बँधा रहता है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सिर उठा लेती है, और वह भोग तथा संग्रह को ही जीवन का अंत मान बैठता है। भोग की चाह में वह न्याय-अन्याय का भेद भूल जाता है, धन इकट्ठा करने के लिए किसी भी रास्ते पर उतर आता है, और अपने ही धन, कुल और बल के मद में डूबा रहता है। अपने अहंकार के इसी बोझ के नीचे वह बार-बार गिरता चला जाता है, और जन्म-दर-जन्म उस प्रकाश से दूर होता रहता है जिसकी ओर दैवी स्वभाव सहज ही खिंचा जाता है। यही आसुरी वृत्ति का सबसे बड़ा दंड है, प्रकाश पास होकर भी दिखाई न देना।

नरक के तीन द्वार

और तब श्रीकृष्ण इस पूरी बात को एक तीखी चेतावनी में समेट देते हैं। इस सारे पतन की जड़ में तीन चीज़ें बैठी हैं, और वे तीनों नरक के दरवाज़े हैं।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

अर्थ यह कि नरक के तीन द्वार हैं, जो आत्मा का नाश कर देते हैं, काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए। यह इस अध्याय का सबसे याद रखने योग्य वचन है, गीता 16.21 का। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मनुष्य इन तीन अँधेरे दरवाज़ों से निकल आता है, वही अपना सच्चा कल्याण करता है और सर्वोच्च गति की ओर बढ़ता है।

आख़िर में वे एक कसौटी भी थमा देते हैं। जब यह समझ में न आए कि क्या करना है और क्या नहीं, तब अपनी इच्छा को नहीं, शास्त्र को प्रमाण मानिए। जो कर्तव्य शास्त्र दिखाता है, उसी राह पर पैर रखिए। यही दैवी स्वभाव की ओर लौटने का सीधा रास्ता है।

सोलहवें अध्याय का संदेश सीधा है। हमारे भीतर रोज़ एक चुनाव होता है, प्रकाश बढ़ाएँ या अँधेरा। न कोई पूरी तरह देवता है, न कोई पूरा असुर, यह फ़ैसला हर सुबह नए सिरे से करना पड़ता है। और यह जान लेना कि तीन दरवाज़े कहाँ खुलते हैं, आधी लड़ाई वहीं जीत लेने जैसा है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता