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अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

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कुरुक्षेत्र की धूल अभी पूरी तरह बैठी नहीं थी, और अर्जुन के भीतर का द्वंद्व भी। ऐसे ही एक क्षण में श्रीकृष्ण एक बात कहते हैं जो इस युद्ध से बहुत आगे की है। वे कहते हैं, हे अर्जुन, यह जो शरीर है, इसे शास्त्रक्षेत्र’ कहते हैं, यानी एक खेत। और जो इस खेत को भीतर बैठ कर जानता-देखता है, उसे ‘क्षेत्रज्ञ’ कहते हैं। इसी एक नन्हे से भेद में सारे ज्ञान का बीज छिपा है।

खेत और उसका जानने वाला

सोचिए, एक किसान अपने खेत को जानता है। खेत में मिट्टी है, बीज है, फ़सल है, खर-पतवार है, पर किसान न मिट्टी है, न फ़सल। वह तो देखने वाला है, जोतने वाला है, जो सब के बीच खड़ा रहता है और हर चीज़ को पहचानता है। श्रीकृष्ण कहते हैं, आप का यह शरीर भी ऐसा ही खेत है, और आप, असली आप, वह जानने वाले हैं जो इसे भीतर से देखता है। फिर वे एक और गहरी बात जोड़ते हैं, हे भारत, हर खेत का जो जानने वाला है, वह मैं ही हूँ। एक ही चेतना, अनगिनत खेतों में झाँकती हुई। इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को ठीक-ठीक पहचान लेना, उनके मत में यही सच्चा ज्ञान है।

इस खेत में क्या-क्या है

फिर श्रीकृष्ण इस खेत का पूरा नक़्शा खोल कर रख देते हैं। इसमें पाँच महाभूत हैं, यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इसमें अहंकार है, बुद्धि है, और वह अनदेखी मूल प्रकृति भी जिससे यह सब फूटता है। दस इन्द्रियाँ हैं और उनके साथ मन। पाँच विषय हैं जिनकी ओर ये इन्द्रियाँ दौड़ती हैं। और फिर इच्छा है, द्वेष है, सुख है, दुख है, देह का यह पूरा पिंड है, चेतना की झिलमिलाहट है, और टिके रहने की धृति है। यह सब मिल कर खेत बनता है। पर ध्यान दीजिए, इनमें से एक भी ‘जानने वाला’ नहीं है। ये सब तो उगती और मुरझाती फ़सलें हैं। जानने वाला इन सब से ज़रा पीछे, चुपचाप खड़ा देखता रहता है।

ज्ञान किसे कहते हैं

अब श्रीकृष्ण एक अनोखी बात कहते हैं। वे ज्ञान की परिभाषा किसी जानकारी से नहीं, बल्कि स्वभाव से देते हैं। सुनिए, वे कहते हैं, अभिमान का न होना, दिखावे का न होना, किसी को न सताना, धीरज, मन का सीधापन, गुरु की सच्ची सेवा, भीतर-बाहर की स्वच्छता, टिकाव, और अपने ऊपर अपना क़ाबू। विषयों के प्रति वैराग्य, अहंकार का पिघल जाना, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे तथा रोग में छिपे दुख को साफ़-साफ़ देख लेना। घर, बेटे और पत्नी के मोह में उलझ न जाना, हर हाल में एक सा मन, और उन परमेश्वर के प्रति अटूट, कभी न डगमगाने वाला प्रेम। एकान्त की चाह, और अपने भीतर के सत्य में ठहरे रहना। यही सब ज्ञान है, वे कहते हैं। और इससे उलटा जो कुछ है, वह अज्ञान है। यानी ज्ञान कोई पढ़ी हुई बात नहीं, जी हुई बात है।

जो जानने योग्य है

फिर वे उस तत्त्व की ओर इशारा करते हैं जिसे जान लेने पर अमरता मिलती है। वह न ‘है’ कहा जा सकता है, न ‘नहीं है’, क्योंकि वह इन दोनों शब्दों से बड़ा है। उसका न आदि है, न अंत। उसके हाथ-पैर हर ओर हैं, आँखें और सिर हर ओर हैं, कान हर ओर हैं, क्योंकि वह सब को घेर कर बैठा है। उसकी अपनी कोई इन्द्रिय नहीं, फिर भी हर इन्द्रिय उसी की रौशनी से काम करती है। वह किसी से बँधा नहीं, फिर भी सब को थामे हुए है। वह चराचर सब के बाहर भी है और भीतर भी, बहुत दूर भी और बहुत पास भी। वह एक है, पर अनगिनत प्राणियों में बँटा हुआ सा दिखता है। वह हर अँधेरे के पार की रौशनी है, और वह हर हृदय में बैठा हुआ है।

प्रकृति और पुरुष

अब श्रीकृष्ण दो शब्द सामने रखते हैं, प्रकृति और पुरुष। दोनों अनादि हैं। प्रकृति वह है जो सारा करना-धरना करती है, शरीर गढ़ती है, इन्द्रियाँ चलाती है, कारण और कार्य का सारा खेल रचती है। और पुरुष वह है जो इस खेल में बैठ कर सुख-दुख का स्वाद लेता है। जब यही पुरुष प्रकृति के गुणों से चिपक जाता है, तभी अच्छी-बुरी योनियों में उसका बार-बार जन्म होता है। पर इसी देह में एक और पुरुष भी बसा है, परम पुरुष, जो केवल साक्षी है, अनुमति देने वाला है, सब को धारण करने वाला, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा। श्रीकृष्ण कहते हैं, जो इस प्रकृति और पुरुष को उसके गुणों समेत ठीक से जान लेता है, वह चाहे जैसे भी जीता हो, फिर से जन्म नहीं लेता।

सब में एक ही को देखना

यहाँ तक पहुँच कर श्रीकृष्ण रास्ते बताते हैं। कोई ध्यान लगा कर अपने भीतर उस आत्मा को देख लेता है, कोई विचार और विवेक से, कोई निष्काम कर्म से, और कोई तो बस सुन कर, श्रद्धा से उसकी उपासना करते-करते उस पार उतर जाता है। और फिर आते हैं इस अध्याय के वे शब्द जिन्हें याद रख लेना ही काफ़ी है।

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥

जो सब प्राणियों में एक ही परमेश्वर को समान रूप से बसा हुआ देखता है, जो मिटने वाले हर रूप के भीतर उस न मिटने वाले को देख लेता है, सच में तो वही देखता है। (गीता 13.27)

इस पंक्ति में एक ही क्रिया दो बार आती है, देखता है, देखता है। पहली बार का देखना आँखों का है, दूसरी बार का देखना आत्मा का। जो सब में एक ही परमात्मा को देख लेता है, वह अपने ही हाथों अपना नाश नहीं करता, और सहज ही परम गति को पा जाता है। जैसे एक अकेला सूरज सारे संसार को रौशन कर देता है, वैसे ही खेत का यह जानने वाला अपने पूरे खेत को भीतर से रौशन रखता है। और जैसे आकाश हर जगह होते हुए भी किसी चीज़ से नहीं लिपटता, वैसे ही यह आत्मा देह में रहते हुए भी उसके सुख-दुख से नहीं लिपटती। जो ज्ञान की इस आँख से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का भेद पहचान लेते हैं, वे प्रकृति के बंधन से छूट कर उसी परम की ओर चल पड़ते हैं।

तो इस पूरे अध्याय को एक साँस में कहें, तो बात इतनी सी है, यह देह एक खेत है, और इसे देखने वाला कोई और है। इस एक फ़र्क़ को जी लेना ही ज्ञान की पहली किरण है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता